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शुक्रवार, 9 सितंबर 2022

बुक रिव्यू : 'डार्क हॉर्स' सफलता और असफलता की एक ऐसी कहानी कहती है जो सिविल सेवा परीक्षा के बारे में आपकी आंखें खोल देगी!!!

लेखक - नीलोत्पल मृणाल
प्रकाशक - हिंदी युग्म प्रकाशन 

सिविल सेवा का नाम जब सामने आता है तो सबसे पहले एक शहर सबसे पहले कौंधता है दिल्ली। दिल्ली का मुखर्जी नगर इसके लिए गढ़ माना जाता है। सिविल सेवक बनने के लिए लाखों-लाख लोग आते हैं कई को सफलता मिलती है और कई को असफलता हाथ लगती है। दिल्ली के मुखर्जी नगर की एक पूरी की पूरी फिल्म दिखाती किताब है 'डार्क हॉर्स'। 

आज हम 'डार्क हॉर्स' किताब का बुक रिव्यू करने जा रहे हैं...इसके लेखक हैं नीलोत्पल मृणाल। 

डार्क हॉर्स कहानी कहती है उन ढेर सारे उम्मीदवारों की जो भारत की सबसे प्रतिष्ठित सेवा आईएएस, आईपीएस आदि बनने अलग-अलग राज्यों से दिल्ली आते हैं। दिल्ली में कुछ के सपने साकार होते हैं और कुछ के नहीं। कोई इस दिल्ली नामक चकाचौंध में भ्रमित हो जाता है तो कोई तमाम कोशिश के बाद भी सफल नहीं हो पाता है।

कहानी संतोष, मनोहर, रायसाहब उर्फ कृपाशंकर, विमलेंदु , गुरु, मयूराक्षी, जावेद, पायल और विदिशा के चारों ओर घूमती है। रायसाहब हैं जो सबसे बुजुर्ग हैं कई बार परीक्षा दे चुके हैं फिर भी कुछ नहीं हुआ। लेकिन जहां लकड़ी देखी वहीं अपनी बिसात जमाना शुरू कर देते हैं। जहां मुंह मारते हैं वहीं धोखा मिलता है।

बिहारी नौजवान मनोहर जो नए नवेले अंदाज में रहता है। मॉडर्न लुक रखता है। बाकायदा सिर से लेकर पैर तक और कपड़ों से लेकर परफ्यूम तक का ध्यान रखता है। सिविल सेवा के अखाड़ा में इनकी पहलवानी जमी नहीं। लेकिन महिला मित्र बनाने में अव्वल रहा और दोस्तों को जोड़ने का काम किया।

गुरु जो पढ़ाई में अव्वल रहा और साक्षात्कार तक पहुंचने वाले लोगों में से एक है। गुरु को पढाई के साथ-साथ सामाजिक दुनिया का ज्ञान है जो अपने लंबे-चौड़े भाषण में यदा-कदा देता रहता है। वहीं विमलेंदु, गुरु का दोस्त है और वह भी साक्षात्कार दे चुका है।

इस उपन्यास की कहानी शुरू होती है संतोष के सफर से जो बिहार के भागलपुर से ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद दिल्ली का रुख करता है। भागलपुर से दिल्ली तक का सफर संतोष के लिए खट्टे-मीठे अनुभव लिए रहता है। संतोष दिल्ली पहुंचते ही रायसाहब के रुम पर रुकता है। फिर उसकी मुलाकात होती है बाकी दोस्तों मतलब मनोहर, गुरु, विमलेंदु, भरत, पायल और विदिशा से। 

पायल और विदिशा दोनों दोस्त हैं जो खुले विचार वाली हैं। जहां पायल के लिए कोई बंदिश की सीमा नहीं है जो हर बार नया प्रयोग करके देखना चाहती है। उसने कई बार प्रयोग किए। वहीं विदिशा मर्यादा के बंधन में बंधी लड़की है जो हमेशा नपे-तुले अंदाज में रहती है।

संतोष के लिए कोचिंग का अनुभव भी खास न रहा। कोचिंग के मोहजाल में न चाहते हुए भी फंस गया। कोचिंग के पाखंड से बच न सका। लेकिन कोचिंग की रिसेप्शनिस्ट को दिल दे बैठने वाले संतोष को सारी कोचिंग के सामने जलील होना पड़ा। यही से छरका संतोष संभल गया।

इस किताब में लव स्टोरी आपको ढूंढने से भी नहीं मिलेगी। जो हैं भी वो क्षणिक है। गुरु और मयूराक्षी का प्रेम भी शक के कारण परवान न चढ़ सका। वहीं मनोहर, पायल के प्रयोग से सहम कर उससे किनारा कर लिया।

उपन्यास में असफलता के कई सारे किस्से हैं लेकिन सफलता की भी चर्चा कम न रही। विमलेंदु और मयूराक्षी को सफलता मिली। जिन्हें नहीं मिली उन्होंने भाग्य को कोसा। 

किताब में रुलाने वाला और भयंकर पीड़ा देने वाला किस्सा है जावेद का। पिता की मृत्यु के बाद जावेद अपनी बीमार मां को घर पर छोड़कर दिल्ली तैयारी करने जाता है। मां की बीमारी में गांव की जमीन बिक जाती है। मां का एक सपना रहता है बेटा अधिकारी बने। एक चाचा है जो इस हालत में भी शोषण करने से बाज नहीं आता। जावेद की मुसीबत यही कम नहीं होती है सिविल सेवा परीक्षा पास नहीं कर पाता वहीं गांव से फोन आता है कि मां की तबीयत खराब है। गांव पहुंचता है तो दर्द कम होने की जगह बढ़ जाता है। मां का देहांत हो जाता है। लेकिन इस बीच उसे पता चलता है कि बिहार पब्लिक सर्विस कमीशन की परीक्षा पास कर लेता है।

वहीं संतोष की बात करें जो इस उपन्यास का मुख्य पात्र है। जब दो बार सिविल सेवा परीक्षा पास नहीं कर पाया तो उसने सबसे किनारा कर लिया। और "डार्क हॉर्स" बनकर निकला। डार्क हॉर्स का मतलब जिस व्यक्ति के बारे में किसी ने परीक्षा पास करने के बारे में सोचा नहीं वही व्यक्ति सफल होकर निकला। इसलिए इस किताब का नाम डार्क हॉर्स रखा गया। एक ऐसा घोड़ा जिस पर कोई दांव नहीं लगाता। वही घोड़ा रेस जीत जाता है।

किताब का सार यही है कि दिल्ली में आते तो बहुत हैं तैयारी करने वाले। जो दिल्ली की चकाचौंध, माया-मोहिनी के चक्कर में नहीं फंसता वही सफल होता है। 

जय हो!!!

BY_VINAYKUSHWAHA

रविवार, 4 सितंबर 2022

शहडार जंगल : इतना घना जंगल जहां सूरज की रोशनी भी जमीन तक नहीं पहुंचती, कटनी का ये जंगल आपको कर देगा दंग!!!

 


कटनी शहर से 40 किमी दूर शहडार जंगल है। ये जगह नेचर लवर्स के लिए स्वर्ग से कम नहीं है। घना जंगल जहां सूरज की रोशनी जमीन तक नहीं पहुंचती। आसमान को छूते पेड़ और कई स्तरों पर पेड़ों और लताओं की कतार नजर आती है। शहडार का ये जंगल कटनी वन मंडल के अंतर्गत आता है। इस जंगल में कई तरह के पशु-पक्षी रहते हैं। इनमें तेंदुआ, भालू, चीतल, हिरण, जंगली सुअर, सियार, जंगली कुत्ता, नीलगाय आदि हैं। कई तरह के सांप जैसे करैत, डबल करैत, धामन, गडैता, बफ स्ट्रिप्ड कीलबेक भी मिलते हैं। किंगफिशर, मोर और विभिन्न प्रकार के पक्षी भी पाए जाते हैं। ये जंगल वन विभाग के अंतर्गत आता है तो यहां पर किसी भी प्रकार से वन और वन्य जीवों को हानि पहुंचाना गैर-कानूनी है। 


शहडार का ये जंगल उष्णकटिबंधीय अर्द्धपर्णपाती वन (TROPICAL WET DECIDUOUS FOREST) के  अंतर्गत आता है क्योंकि इस क्षेत्र में 100 से लेकर 200 सेमी के बीच बारिश होती है। यहां सागवान, साल, सखुआ, खैर आदि पेड़ पाए जाते हैं जो आर्थिक रूप से काफी महत्त्वपूर्ण हैं। इसके अलावा बरगद, पीपल, हर्रा, बहेड़ा, नीम, बबूल, अर्जुन, महुआ, सप्तपर्णी, गुलमोहर, बेर आदि के पेड़ बहुतायत में दिखाई देते हैं। 


इस जंगल के अनेक रूप दिखाई देते हैं। बारिश के समय तो मानो यहां हरी चादर सी बिछ जाती है। बारिश के मौसम में जंगल की जमीन से लेकर पेड़ों के शिखर तक सबकुछ हरा ही हरा नजर आता है। कोपल जैसे नए जीवन के प्रतीक तरह दिखाई देती है। हरे जंगल के बीच से गुजरती काली सड़क काली नागिन तरह लगती है। 


बारिश का अतिरिक्त पानी सड़क के किनारे से जब गुजरता है तो लगता है मानो नदी साथ-साथ चल रही है। यही पानी इकट्ठा होकर कहीं-कहीं मैदान में जमा हो जाता है तो कहीं छोटे झरने का रूप ले लेता है। शहडार के जंगल की इन खासियस के अलावा जंगल के बीच-बीच में मैदान का होना जो कई सारे जानवरों की जगह होती है। 


ठंड के मौसम में ये जंगल अपने अलग ही अंदाज में दिखाई देता है। ठंड में शहडार के जंगल में सूरज की रोशनी कुछ इस आती हुई लगती है मानो किसी ने छन्नी लगा दी हो। घास जमा ओंस की बूंद सूरज की रोशनी से चमकने लगती है और ऐसी दिखती हैं जैसे कई सारे घास के पत्तियों पर हीरे लगा दिए हों। ठंड में जितनी प्यारी धूप इंसानों को लगती है उतनी जानवरों को भी लगती है। शहडार के जंगल में हिरण, चीतल, नीलगाय आदि जानवार चहलकदमी करते नजर आते हैं। तेंदुए जैसे जानवर शिकार करते नजर आते हैं।


ठंड के मौसम के बाद नमी को सुखा देने वाली गर्मी का मौसम आता है। हरी घास सूखकर सुनहरी हो जाती है। बड़े-बड़े पेड़ के पत्ते भी सुनहरे हो जाते हैं और आखिरकार शाख को छोड़ देते हैं। कुछ पेड़ बचते हैं जिनके सैनिक की तरह पत्ते अंत तक लड़ाई लड़ते हैं। शिरीष, गुलमोहर, पलाश, अमलताश के सफेद , लाल और पीले फूले से धहकता शहडार का जंगल भी रंग-बिरंगा नजर आता है। गर्मी के इस मौसम में आलस पसर जाता है। जंगल का कोना-कोना बारिश के इंतजार में आस लगाए बैठा होता है। 


शहडार का जंगल मुख्य रूप मध्यप्रदेश के कटनी जिले में स्थित है। इस जंगल की सीमा उमरिया और जबलपुर जिलों से भी लगती है। शहडार के जंगल के पास ही भारत का केंद्र बिंदु (CENTRE POINT) करौंदी है। शहडार जंगल, बांधवगढ़ नेशनल पार्क के नजदीक स्थित है। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के नजदीक होने के कारण शहडार का जंगल बफर जोन में आता है। यहां टाइगर का मूवमेंट भी देखने को मिल जाता है। 


नजदीकी पर्यटन स्थल 

(NEAREST TOURIST ATTRACTION)


शहडार के जंगल के पास कई सारे टूरिस्ट प्लेस हैं जिनमें रुपनाथ शिलालेख, बांधवगढ़ नेशनल पार्क, धुंआधार फॉल जबलपुर, चौंसठ योगिनी मंदिर जबलपुर, पनपठा सेंक्चुरी, भारत का सेंटर प्वॉइंट 'करौंदी', शारदा देवी मंदिर मैहर आदि। 


कब जाएं

(BEST TO VISIT)


शहडार के जंगल घूमने का सबसे अच्छा मौसम जुलाई से फरवरी है। बारिश के मौसम में जंगल हरा-भरा हो जाता है नेचर लवर के लिए स्वर्ग से कम होता है। वहीं ठंड के मौसम में आपको बड़ी संख्या में जंगली जानवरों की चहलकदमी नजर आती है। 


कैसे पहुंचे

(HOW TO REACH)


शहडार के जंगल पहुंचने के लिए एयर, रेल और बस तीनों माध्यम उपलब्ध हैं।


एयरपोर्ट - शहडार के जंगल से नजदीकी एयरपोर्ट जबलपुर है जो लगभग 90 किमी है। यहां से आप टैक्सी कर सकते हैं।


रेल - शहडार से नजदीकी सबसे बड़ा रेलवे स्टेशन कटनी है जो 40 किमी दूर स्थित है। यहां से आप टैक्सी किराये पर ले सकते हैं।


बस - कटनी बस स्टैंड नजदीक है जहां से  छोटे-बड़े शहरों के लिए बस उपलब्ध है।

मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

कोरोना 2.0 बच्चों के लिए काल बनकर आया है!

 


देश में अबतक 12 करोड़ लोगों को वैक्सीन लग चुकी है। ये 12 करोड़ लोग कुल जनसंख्या का लगभग 9 फीसदी बैठता है। जहां भारत में 45 साल से ऊपर वालों को वैक्सीन ड्राइव चलाई जा रही है वहीं यूएस में 16 साल से अधिक उम्र के लोगों का टीकाकरण किया जा रहा है।भारत में कोरोना की पहली लहर में जहां बच्चे  काफी हद तक सुरक्षित थे, वहीं कोरोना की दूसरी लहर में बच्चों पर प्रभाव दिखना शुरू हो गया है। कई मीडिया रिपोर्टस में सामने आया है कि कोरोना की दूसरी लहर में बच्चे ज्यादा शिकार हो रहे हैं। भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से बच्चों में किसी भी प्रकार के घातक प्रभाव के बारे में कोई जानकारी पब्लिक डोमेन में नहीं आई है।

कोरोना की दूसरी लहर जिसे इंडियन म्यूटेंट भी कहा जा रहा है। हेल्थ एक्सपर्ट  का कहना है कि ये डबल म्यूटेंट वायरस है जो पहले की अपेक्षा ज्यादा खतरनाक है। वायरोलॉजिस्ट का कहना है कि भारत में ये डबल म्यूटेंट वायरस यूके और ब्राजील से भारत में आया। यूके और ब्राजील वेरियेंट ने भारत में आकर अधिक तबाही मचाई है।  विश्व स्वास्थ्य संगठन कहना है कि कोरोना से बच्चे ज्यादा संक्रमित नहीं होते बल्कि वे इसके वाहक होते हैं। भारत में अब वयस्कों के साथ-साथ बच्चे भी इसका शिकार बन रहे हैं। 

ब्राजील में अबतक कोरोना की वजह से   1300 बच्चे काल के गाल में समा गए हैं। दक्षिण अमेरिका के इस देश ने सबको चौंका दिया है क्योंकि ब्राजील की स्वास्थ्य प्रणाली विश्व की  बेहतरीन थी। लेकिन चूक कहा हुई एक्सपर्ट का कहना है कि ब्राजील में कोविड 19 के टेस्ट बहुत ही कम हो रहे हैं। ऐसी भी खबर सामने आ रही है कि टेस्ट न होने की वजह से रोगी का सही ट्रीटमेंट नहीं हो पा रहा है और कोरोना के कारण उसकी मृत्यु हो जा रही है। भारत में बच्चों में कोरोना के लक्षण सामने आने का एक कारण ये भी हो सकता है कि लोग बच्चों का कोरोना टेस्ट करा रहे हैं। 

भारत में कोरोना की  पहली लहर में सबकुछ बंद था। कोई भी गतिविधि नहीं हो रही थी। ट्रेन, बस, एयरपोर्ट सब बंद थे। मॉल, स्कूल-कॉलेज, यूनिवर्सिटी, बाजार, सरकारी ऑफिस भी बंद था। लोग घरों में कैद हो गए हो गए थे। बच्चों का घरों से बाहर निकलना बंद हो गया था। बच्चों ने हाइजिन की नई परिभाषा सीख ली थी। मास्क, सैनिटाइजर और दो गज की दूरी रखना बच्चों ने सीख लिया था। भारत में जैसे ही धीरे-धीरे अनलॉक होने लगा तो बच्चों में ये आदतें धीरे-धीरे जाती रही। लोग बच्चों को लेकर शादी, सोशल प्रोग्राम, नई-नई जगह घूमने जाने लगे जिसका नतीजा नए स्ट्रेन ने बच्चों को भी अपनी गिरफ्त लेना शुरू कर दिया ।

इसमें कोई दोराय नहीं है कि कोरोना का दूसरी लहर ने लोगों को परेशान किया है। आईसीएमआर(ICMR), नीति आयोग और एम्स के डायरेक्टर रणदीप गुलेरिया की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में कुछ मुख्य आंकड़ें दिए गए। इन आंकड़ों में कहा गया है कि भारत के कुल संक्रमितों में 0 से 19 आयु वर्ग वाले बच्चों का हिस्सा मात्र 5.8 फीसदी है। यह आंकड़ा पिछली लहर से मात्र 1.8 फीसदी ज्यादा है जो पिछली बार 4.2 फीसदी था। दूसरी लहर में कोरोना से संक्रमित होने वाले सबसे ज्यादा लोगों में 40 से अधिक आयु वर्ग वाले लोगों का है। 

बच्चों की चिंता सबको है क्योंकि वे देश का भविष्य हैं। कोरोना इस दुनिया के लिए अभिशाप है। लोगों को धैर्य से काम रखना होगा। बच्चों में कोई लक्षण दिखाई दे तो टेस्ट कराएं। टेस्ट कराने के बाद सबकुछ सामने आता है। बेवजह न घबराएं। मास्क, सैनिटाइजर और दो गज की दूरी का पालन करवायें। यही एक उपाय है।  

 BY_vinaykushwaha 

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2020

चलते-चलते (सीरीज - 18)


बड़े-बुजुर्ग कहते हैं कि सुबह उठना सेहत के लिए लाभदायक है और सुबह उठने से ढेर सारे काम हो जाते हैं। सुबह की ठंडी हवा तन-मन को तरो-ताजा कर देती है। गुनगुनी धूप आपको विटामिन डी देती है और आपको सेहतमंद बनाती है। ये बातें सुनने में जितनी कानों को जितनी अच्छी लगती हैं, उतनी अच्छी तरीके से इन्हें फॉलो करना आसान नहीं है। कम से कम मेरे लिए तो बिल्कुल नहीं क्योंकि मैं उल्लू हूं। मैं ढेर सारे काम रात में ही निपटाया करता हूं। पढ़ना हो, वेब सर्फिंग, एक्सप्लोरिंग हो या ब्लॉग लिखना। मेरे लिए तो ये सब एक साधारण काम की तरह है। कॉफी का कप हो या चाय का कप और खाने के लिए स्नैक हो। रात में जागना मेरे लिए संजीवनी है।                         
ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि मुझे सुबह बिल्कुल पसंद नहीं है। सुबह मुझे तो मखमली लगती है। गुनगुनी धूप में बैठना, सैर पर जाना, चाय की चुस्की लेना और अखबार पढ़ना ये सब सुबह के अभिन्न अंग हैं। ठंड की धूप के क्या कहने...वाह...वाह... किया जा सकता है। ठंड का मौसम मेरे लिए अमृत है। मेरा सबसे पंसदीदा मौसम । मुझे तो  कभी-कभी ऐसा लगता है कि बारह महीने ठंड का मौसम हो और मैं इसी तरह ठंड का लुत्फ उठाते रहूं। ठंड का मौसम होता है सुबह-सुबह गुनगुनी धूप में बैठकर चाय की चुस्की लेने का, अखबार पढ़ने का और गरमा-गर्म नाश्ता करने का। रेवड़ी, गजक, चिक्की, लइया खाने का। गन्ना, सीताफल, सिंघाड़ा का आनंद लेना है तो ठंड बहुत जरूरी है।

ठंड में बिस्तर का क्या कहना? इस बिस्तर से निकलने का जी चाहता ही नहीं है।  रजाई, कंबल और स्वेटर, जैकिट की सजावट जी को ललचाती रहती है। शॉल की गर्मी शरीर को आराम में चार चांद लगा देती है। बिस्तर का मोह त्यागना आसान नहीं होता है। ब़ड़े सोचने-विचारने के बाद बिस्तर को टाटा, बाय-बाय, सायोनारा कहना पड़ता है। पानी तो मानो इस तरह लगता है कि जैसे हिमालय से सप्लाई हो रहा है। पानी को आग पर तपा कर उसे गर्माहट दी जाती है ताकि छूने पर दांत न किटकिटाएं। फिर भी  ठंड में कुछ इस तरह लगता है कि हम केवल बस यूं ही वक्त बिताएं। 

जब मैं सर्दियों के मौसम में अपने गांव जाता था तो चाय पीने के बाद सीधे खेत की तरफ दौड़ लगाता था। हमारे बघेलखंड में इस मौसम में गेहूं, चना, अरहर, सरसों जैसी फसल बोईं जाती हैं। पहले इतना ज्ञान तो था नहीं फिर भी खेल-खेल में समझते थे। खेत की बारी में जाकर बिही(जिसे अमरूद भी कहा जाता है) खाते थे। सीताफल तोड़कर खाते थे। खेतों में सरपट दौड़ लगाते थे। भले फिर चाहे दादी डंडा लेकर दौड़ लगाएं। ये तो हुई सुबह की बात। दोपहर को हम नदी किनारे पहुंच जाया करते थे। तैरना तो आता नहीं था तो किनारे ही  बैठकर थोड़े से पानी में नहाकर वहीं कपड़े पहनकर आन टोला (जिसे दूसरा मोहल्ला कहा जाता है) चले जाते थे। वहां सूरजमुखी और बेर का जायजा लेकर आते थे। 

शाम को लौटते हुए खेत से हरी और ताजा सब्जी तोड़कर ले जाते थे। रात का खाना मतलब चूल्हे की गरमा-गरम रोटी और सब्जी जीभ को तृप्त कर देती थी। मिट्टी के तेल (कैरोसिन) से बनी चिमनी(लैंप) के सामने बैठकर खाना खाया करते थे। खाने का मजा तब और बढ़ जाया करता था जब गक्कड़ और भरता खाया करते थे। रात में गप्पे लगाते थे और पैरा(पराली) से बने गद्दे में सोया करते थे। रात में नीले और साफ आकाश में ढेर सारे तारे दिखाई देते थे। गांव की रात शांत और गंभीर हुआ करती थी। इस गंभीरता को तोड़ते थे झींगुर और टिटहरी(रात में बोलने वाला पक्षी)। झींगुर फिर भी रहम खाकर बीच-बीच में चुप हो जाया करते थे लेकिन टिटहरी रात शोर मचाती थी और कभी-कभी तो सुबह तक। 

सूरज की लालिमा आसमान में छिटकने से पहले ही मुर्गियों की बांग सुनना और गाय-भैंस के अम्मा की वाली चिर-परिचित आवाज सुनने मिलती। दूर-दूर तक कोहरे की चादर और कोहरे के बीच बुत से खड़े पेड़ होते। घेरे में बैठकर गांव के बड़े लोगों का आग  तापना और बच्चों की भांप प्रतियोगिता यानी मुंह से कौन कितनी भांप निकालता है।  सूरज के क्षितिज पर आते ही वो चू्ल्हे वाली चाय का स्वाद आज भी याद है। चाय का सौंधापन मुंह में रच-बस जाया करता था। 

ठंड के मौसम में यात्रा करने का अपना ही मजा है। ट्रेन, बस और हवाई जहाज तीनों का अपना ही अलग मजा है। कोहरे को चीरती ट्रेन मानो इस तरह लगती है कि जैसे कोई दिव्यात्मा प्रकट हो गई हो। ट्रेन की ठंडक भरी यात्रा चाय की चुस्की आपको अलग ही आनंद देती है। दूर तक फैले खेत, पहाड़, मैदानों में कोहरे की चादर को झीना करती सूरज की किरण दिखाई देती है। हवाई जहाज से पूरा शहर ही दिखाई देता है कि कैसे कोहरे की चादर शहर को लपेटे रहती है। ऊपर से सबकुछ धुंधला दिखाई देता है लेकिन बहुत प्यारा दिखाई देता है।  

सर्दी के मौसम में मकर संक्रांति का पर्व मुझे सबसे शानदार लगता है। गजक, रेवड़ी, तरह-तरह के लड्डू, मुंगौंड़ी खूब पसंद है। तिल के लड्डू, बेसन के लड्डू, चावल के आटे के लड्डू, गुड़ के लड्डू, मखाने के लड्डू, गेहूं के आटे के लड्डू मानो अंतहीन श्रृंखला यूं ही चलते रहे। मुझे तो लगता है कि साल में मकर संक्रांति पचास बार आए। हरी सब्जी वाली खिचड़ी और ऊपर से टमाटर की चटनी मिलाकर खाना ठंड के असली मजे हैं।

ठंड की महानगाथा है मैंने तो बहुत कुछ जोड़ दिया बाकि आपके लिए। ठंड सदैव रहे....। 

📃BY_vinaykushwaha

मंगलवार, 8 सितंबर 2020

चलते-चलते (सीरीज - 17 ) : मेरा अंतर्मुखी होेना मेरे लिए कैसे कष्टदायक साबित हुआ

 

आज मुझे नोएडा में रहते हुए 2 साल से भी ज्यादा हो गए हैं। कभी सोचा भी नहीं था कि दिल्ली-एनसीआर में रहूंगा और एबीपी जैसे बड़े न्यूज चैनल में काम करने का मौका मिलेगा। साल 2018 में जब मेरा कैंपस सिलेक्शन हुआ तो मुझे ज्यादा खुशी नहीं हुई थी क्योंकि मन में कुछ और ही था। मन में जो था उसका यहां जिक्र नहीं करूंगा लेकिन कुछ-कुछ बातें जरूर कहूंगा। मुझे कैंपस सिलेक्शन से भले ही खुश नहीं थी लेकिन दुखी भी नहीं था। मेरा मन तो उन लोगों के लिग दुखी था जो आस लगाए बैठे थे कि एबीपी न्यूज आएगा और हमारा सिलेक्शन होगा। मेरे कुछ दोस्त तो इसके लिए वाकई लायक थे। कई के पास एक्सपीरियंस था तो कई टेक्नोलॉजी में आगे थे तो कई तेज-तर्रार थे। मैं अपने आपको रेस में कहीं भी नहीं गिनता ही नहीं था। 


जब मेरा एबीपी न्यूज में सिलेक्शन हुआ तो कुछ की सोच ऐसी थी कि इसका कैसे हो गया। ये है कौन ? इससे अच्छा तो वो था फिर भी उसका सिलेक्शन नहीं हुआ। मेरे बारे में तरह-तरह के विचार गढ़े जाते थे। मैं जानता था ऐसा होना लाजिमी था। इसका सबसे बड़ा कारण था मेरा अंतर्मुखी होना जिसे अंग्रेजी में Introvert कहते है। मैं ज्यादा लोगों से बात नहीं करता था। मुझे नए लोगों से मेलमिलाप में कठिनाई होती है। मैं थोड़ा रिजर्व तरह का इंसान हूं। मैं किसी से ज्यादा बात नहीं करता लेकिन जब मेरा कोई दोस्त बन जाता है तो मैं उससे खूब बातें करता हूं। यूनिवर्सिटी में जब मैंने एडमिशन लिया था तब मैं क्लास लेता था और सीधे अपने रूम पर चला जाता था। न किसी से मिलना, न किसी से बातचीत करना और न ही किसी को हैलो-हाय करना। जीवन में मुझे बहुत कुछ मिला है। 

जिसकी मैंने इच्छा भी नहीं की वो भी मुझे बड़े आराम से मिला। मैंने पहले सेमेस्टर में मैंने शायद ही किसी से बात की हो, हां ये जरूर है कि जरूरत पड़ने पर मैंने लोगों से बात की है। दूसरे सेमेस्टर में मेरा दायरा बढ़ा, मैंने लोगों से दोस्ती की। मेरी दोस्ती क्लास तक ही सीमित थी। वहीं तब तक मेरे क्लासमेट के फ्रेंड यूनिवर्सिटी के दूसरे डिपार्टमेंट के भी बन चुके थे। इसका सबसे बड़ा कारण ये हो सकता है कि मैं बहुत अकडू और अक्खड़ स्वभाव का था। मैं किसी से सीधे मुंह बात नहीं करता था। लोगों का मजाक मुझे पसंद नहीं था। धीरे-धीरे ये स्वभाव गुम होता चला गया और मेरे दोस्तों का दायरा बढ़ता चला गया। फर्स्ट सेमेस्टर की अपेक्षा सेकेंड सेमेस्टर में मेरे दोस्तों का दायरा बढ़ा। मैं उन लोगों के करीब आता गया जो मेरे टाइप के नहीं थे। जीवन बहुत कुछ सिखाता है।


तीसरे सेमेस्टर में वो सारी गतिविधियां होने लगीं जो मुझे अनैतिक लगती थीं। चाय की दुकान पर घंटों तक बैठना, कैंटीन में बैठकर गप्पे मारना, कॉलेज में फालतू बैठना, शॉपिंग मॉल जाना, घूमने जाना और रात में देर तक घूमना। सब कुछ धीरे-धीरे अच्छा लगने लगा। कभी-कभी तो मन करता था कि ये मैं नहीं हूं। मैं कभी भी इस तरह से अपने आपको नहीं पाया था। चौथे सेमेस्टर तक यूनिवर्सिटी से इतना लगाव हो गया मन में केवल यूनिवर्सिटी समा गई। जीवन को सरल और सीधा देखने वाला इंसान आज इतना ज्यादा कॉम्प्लेक्स हो गया कि कई बार मैं अपने आपको देखकर सोचता था कि क्या ये सही है। कई बार तो ये भी होता था कि मैं और मेरे दोस्त रात में घूमने के लिए उज्जैन निकल जाते थे। भोपाल से रात 10 बजे निकलना और रात को 3 से 4 बजे तक पहुंचना फिर राम घाट में नहाना और फिर महाकाल मंदिर में जाकर दर्शन करना फिर दिन में भोपाल लौटना सबकुछ अलग अनुभव होता था। 


मैं खुद ट्रैवल लवर हूं। मुझे ट्रैवल करना पसंद है और ट्रेवलॉग लिखना पसंद है। कॉलेज में पढ़ाई के दौरान भी मैं कहीं ना कहीं चले जाता था। घूमने का मतलब ये नहीं कि मैं चार लोगों को साथ लेकर जाऊं ऐसा नहीं होता था। मैं सोलो ट्रैवल पसंद करता था। उस यात्रा की व्याख्या अपने ब्लॉग से करना मुझे पसंद था। आज भी ये सिलसिला जारी है और रहेगा शायद। आज मुझे घर से बाहर रहते हुए 6 साल से ज्यादा हो गया है। इन 6 सालों में मैंने जितना जिया और जितना सीखा है, उतना शायद पहले कभी नहीं। मेरे 6 साल कभी न भूलने वाले रहेंगे क्योंकि इन 6 सालों में मैंने कई राज्यों और ढेर सारे शहरों की यात्राएं की। यात्राएं हमेशा सबक देती हैं और कुछ करने के लिए कहती हैं। मैंने इन यात्राओं से सीखा अलग-अलग जगहों पर जाने से भाषा, बोली और ट्रैवल एक्सपीरियंस को बहुत संजीदा तरीके से लिया है। 


आज मैंने Introvert वाली दीवार को तोड़ी है लेकिन एक पतली झिल्ली मुझे तुरंत रिएक्ट करने से रोकती है। मेरी झिझक मुझे एकदम से कुछ करने से रोक देती है। ये झिझक मुझे लोगों से दूर ले जाती है और मुझे कुछ सीखने से रोकती है। आज झिझक को अलग करना चाहता हूं क्योंकि ये मेरे आगे बढ़ने में बाधक है। इस झिझक में मुझे वर्कप्लेस पर काम करने से रोका और नया कुछ सीखने से रोका। एबीपी न्यूज में काम करने के दौरान मैंने सीखा की लोग बहुत निर्दयी होते है। आपको जीवन जीने के लिए इस निर्दयी दुनिया में हमें जीवित रहने के लिए लड़ना बहुत जरूरी है।

 

BY_vinaykushwaha   

रविवार, 6 सितंबर 2020

पुस्तक समीक्षा : दलाई लामा की आत्मकथा "मेरा देश निकाला" (FREEDOM IN EXILE : THE AUTOBIOGRAPHY OF THE DALAI LAMA)


तिब्बत के बारे में आपने पहले भी सुना होगा। आज भले ही तिब्बत चीन का हिस्सा है लेकिन एक समय था जब तिब्बत एक स्वतंत्र देश था। तिब्बत के कई देश के साथ राजनीतिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंध थे। तिब्बत, चीन के दक्षिण में स्थित है जिसकी सीमा भारत, नेपाल और भूटान से लगती है। साल 1959 से पहले तक तिब्बत की अपनी सभ्यता और संस्कृति थी। यहां बौद्ध धर्म का अलग ही रंग देखने को मिलता था। चौदहवें दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो ने अपनी किताब "मेरा देश निकाला" में बताया है कि चीन ने कैसे सांस्कृतिक क्रांति के नाम पर तिब्बत पर कब्जा कर लिया।

किताब "मेरा देश निकाला" चौदहवें दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो की आत्मकथा है। ये किताब अंग्रेजी में लिखी गई Freedom in exile : The Autobiography of the Dalai Lama का हिंदी अनुवाद है। इस किताब में दलाई लामा ने अपने दलाई लामा बनने, तिब्बत पर चीन ने कैसे कब्जा किया, बातचीत का लंबा दौर, निष्कासन और भारत में शरण कैसे मिली इसके में बारे में सारी जानकारी दी है। किताब केवल और केवल दलाई लामा को नहीं बताती बल्कि तिब्बत की संस्कृति, तिब्बत के रहन-सहन और खान-पान, वहां के लोगों के बारे में जानकारी देती है। मठ, मंदिर और ऊंचे-ऊंचे हिमालय के बारे में भी जानकारी देती है। किताब भाषा से लेकर राजधानी ल्हासा और तिब्बत की खूबसूरती के बारे में दिलचस्प जानकारी देती है। पहले तिब्बत में किसी भी देश का आम नागरिक जा सकता था लेकिन आज चीन का कब्जा होने के बाद ऐसा करना मुश्किल है क्योंकि वहां टूरिस्ट पर कई तरह की पाबंदियां लगाई जाती है। 

दलाई लामा ने किताब में लिखा है कि तिब्बत के कई राज्य थे। इन्हीं में से एक राज्य था आमदो। इसी राज्य में चौदहवें दलाई लामा का जन्म हुआ था। तिब्बत में दलाई लामा को चिन्हित करने की परंपरा है जिसमें पूर्व के दलाई लामा अगले दलाई लामा के बारे में जानकारी देते थे। तेरहवें दलाई लामा थुबतेन ग्यात्सो ने ही तेनजिन ग्यात्सो का नाम सुझाया था। तेरहवें दलाई लामा की मृत्यु के बाद चौदहवें की खोज की गई उन्हें ल्हासा लाया गया। ल्हासा में ही उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई। ल्हासा के विशाल और भव्य पोटाला हाउस में रहते हुए तेनजिन ग्यात्सो ने अपनी सारी परिक्षाएं पास की थीं। 

जो लोग तिब्बत के विषय में जानना चाहते हैं और उत्सुक हैं उनको जरूर "मेरा देश निकाला" पढ़ना चाहिए। किताब  में तिब्बत के बारे में  ढेर सारी रोचक जानकारी दी गई हैं। कैसे तिब्बत में त्योहार मनाए जाते हैं? सबसे बड़ी जानकारी तो ये है कि दलाई लामा कैसे रहते है? क्या करते हैं? अपना समय कैसे व्यतीत करते हैं? सब कुछ है इस किताब में। बर्फ से ढंके पर्वत पर बसा तिब्बत बेहद शानदार देश था। दलाई लामा किताब में बताते हैं कि कैसे ठंड मौसम में पोटाला हाउस और गर्मियों के दिनों में नोबुलिंग्का हाउस में दलाई लामा दिन बिताते थे। किताब में दलाई लामा बताते हैं कि दलाई लामा के पास कोई दैवीय शक्ति (Super power) नहीं होती है। दलाई लामा भी आम इंसान की तरह होता है लेकिन लोगों की आस्था उसे बड़ा बनाती है। तिब्बतियों के लिए दलाई लामा सर्वोपरि हैं वे दलाई लामा को पहला व्यक्ति मानते हैं। चौहदवें दलाई लामा किताब में लिखते हैं कि तेरहवें दलाई लामा भविष्य के बारे में योजनाएं बनाते थे और आधुनिक वस्तुओं में यकीन रखते थे। 

किताब में दलाई लामा लिखते हैं कि चीन ने तिब्बत को सांस्कृतिक क्रांति के नाम पर तबाह कर दिया। लाल क्रांति को सांस्कृतिक क्रांति का नाम देकर तिब्बत के मूल्यों (Value)को तोड़ा और तिब्बत के लोगों ने इसका विरोध किया तो उन पर अत्याचार किया गया। चीन ने तिब्बत को अंधेरे में रखकर 17 सूत्रीय योजना को लागू किया। तिब्बत सरकार की अनुमति के बिना नियमों को लागू किया गया। धीरे-धीरे तिब्बत में चीनी आर्मी को तैनात किया गया। चीनी आर्मी के अलावा चीनी लोगों को लाकर तिब्बत में बसाया गया। दलाई लामा लिखते हैं कि जब में बीजिंग दौरे पर गया तो मेरी मुलाकात सुप्रीम लीडर माओ से हुई। जब मैंने उनसे तिब्बत के बारे में बताया तो उन्होंने कहा कि तिब्बत की अनुमति के बिना कुछ भी नहीं होगा। जब माओ से विदा ली तो उसने कहा कि धर्म जहर है। 

तिब्बत की अनुमति के बिना काम होते रहे। दलाई लामा आगे बताते हैं कि तिब्बत की राजनीतिक नीतियों, सांस्कृतिक कार्यों में और धार्मिक कार्यों में दखल दी जाने लगी। विकास के नाम तेजी से तिब्बत में सड़क और पुल बनाए जाने लगे। दलाई लामा का कहना है कि ये पुल और सड़कें तिब्बत के विकास के लिए नहीं बल्कि चीन की सेना के सामान की आसान पहुंच के लिए बनाया गया था। जब तिब्बत में चीन का दखल बहुत अधिक हो गया तो दलाई लामा ने भारत समेत कई देशों से मदद मांगी लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। 

दलाई लामा आगे कहते है कि भगवान बुद्ध की 2500वीं जयंती के अवसर वे जब गया आए तो भारत सरकार से उन्होंने शरण मांगी जिसे भारत सरकार ने अस्वीकार कर दिया। भारत की इस इंकार का वे कारण बताते हैं कि साल 1954 में चीन और भारत के बीच एक समझौता हुआ था जिसे पंचशील सिद्धांत के नाम से जाना जाता है। भारत ने इस सिद्धांत के वजह से चीन के किसी भी मामले में दखल नहीं दी। जब साल 1959 को तिब्बत से भागकर दलाई लामा भारत आए तो प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें शरण दी। तब केवल दलाई लामा को ही नहीं बल्कि लगभग 60 हजार लोगों को भारत में शरण दी। तिब्बतियों को शरण देने के साथ-साथ भारत सरकार ने शरणार्थियों को कामकाज की सुविधा भी मुहैया करवाई। 

तिब्बत पर चीन ने कैसे कब्जा किया? तिब्बत के लोगों पर अत्याचार करके तिब्बत में तिब्बतियों को ही अल्पसंख्यक बना दिया। यदि आप तिब्बत के बारे में, दलाई लामा के बारे में और चीन की कुचाल के बारे में जानना चाहते हैं तो आपको जरूर इस किताब से बहुत कुछ मिलेगा। 


BY_vianykushwaha 

सोमवार, 4 मई 2020

राजा रवि वर्मा : एक ऐसा चित्रकार जिसने चित्रों में भगवान को जीवित कर दिया


रविवर्मा भातखण्डे भाग्यचन्द्रः स भूपतिः
कलावंतश्च विख्याताः स्मरणीया निरन्तरम्‌॥
इस संस्कृत के श्लोक में उन लोगों के नाम हैं जिन्होंने कला को भारत में सर्वोच्च स्थान दिया। चाहे चित्रकला हो, संगीत हो, नृत्य हो भारत में एक अलग ही स्थान पर स्थापित करवाया। आज हम देवी लक्ष्मी, देवी सरस्वती, महाराणा प्रताप, शंकुतला, जटायु वध, अर्जुन-सुभद्रा, सैरंध्री, कार्तिकेय जैसे जो चित्र देखते हैं जो मानव रूप में दिखाई देते हैं। इन चित्रों में जान फूंकने का काम किया है भारत के महान चित्रकार राजा रविवर्मा ने। रविवर्मा ने भारतीय चित्रकला को वो आयाम दिया जिससे भारत में कला की क्रांति आ गई।

ऐसा बिल्कुल नहीं है कि राजा रवि वर्मा से पहले भारत में चित्रकला नहीं होती थी। मध्यप्रदेश के रायसेन जिले में स्थित भीमबेटका में तो ईसा से हजारों साल पहले की चित्रकारी देख सकते हैं। यही नहीं महाराष्ट्र की अजंता गुफाओं, एमपी की बाघ की गुफाओं, लेपाक्षी मंदिर और तंजौर के मंदिर में मानवीय रूप में चित्रकारी की गई। यह सिलसिला चलता रहा और बाद में कई क्षेत्रीय कला में इसे प्रोत्साहन मिलता चला गया। रवि वर्मा ने केवल चित्रकारी ही नहीं की बल्कि प्रयोग किए हैं।


केरल के किलिमानूर में जन्मे रवि वर्मा बचपन से ही चित्रकारी में धनी रहे हैं। केरल में एक प्रथा थी जिसमें विवाह करने के बाद पति अपनी पत्नी के घर पर ही रहता था। रवि वर्मा के माता-पिता ने भी इसी प्रथा को मानते हुए रवि वर्मा के मामा राजा राज वर्मा के घर रूके। रवि वर्मा को बचपन में लोग प्यार से कोच्चू के नाम से पुकारते थे। एक बार कोच्चू और उनकी बहन मंदिर के बगल में स्थित बगीचे में खेल रहे थे। उन्होंने अपनी बहन से बोला कि मैं मंदिर की दीवार पर घोड़े की आकृति बनाता हूं। उनकी बहन ने बोला जी भइया। बहन ने कोच्चू को कोयला का टुकड़ा उठाकर दिया। इसी कोयले के टुकड़े से कोच्चू ने मंदिर की दीवार पर एक शानदार छलांग भरता हुआ घोड़ा बनाया।

मंदिर की दीवार पर घोड़े की आकृति देखकर माली ने बच्चों से कहा कि मैं तुम दोनों की शिकायत राजा से करता हूं। माली ने बच्चों की शिकायत राजा से की। राजा राज वर्मा ने माली से कहा कि वो चित्रकारी कहां है मुझे भी देखना है। जैसे ही राजा राज वर्मा उस दीवार के पास पहुंचे तो उनके मुंह से चित्रकारी की  तारीफ के अलावा कुछ नहीं निकला। माली ने राजा राज वर्मा से कहा कि इन बच्चों ने मंदिर की दीवार गंदी कर दी और आप तारीफ कर रहे हैं। राजा राज वर्मा ने माली से कहा कि कोच्चू ने वाकई अच्छी चित्रकारी की है। कोच्चू के मामा स्वयं भी एक चित्रकार थे। कोच्चू अर्थात रवि वर्मा के शुरुआती गुरु उनके मामा ही थे।


कई लोग कहते हैं कि रवि वर्मा को प्रारंभिक चित्रकारी उनके चाचा ने सिखाई थी। राजा राज वर्मा ने किलीमानूर में रवि वर्मा को चित्रकारी वॉटर कलर से करना सिखाया। रवि वर्मा कुशाग्र बुद्धि के धनी व्यक्ति थे। रवि वर्मा ने मात्र 18 वर्ष की उम्र में तमिल, मलयालम भाषा का ज्ञान, संगीत, वादन और कथकली नृत्य सीख लिया था। पहले तिरुवनंतपुरम को त्रिवेंद्रम के नाम से भी जाना जाता था। त्रिवेंद्रम के राजा तिरुनल ने राजा राज वर्मा को बुलावा भेजा और संदेश दिया कि वे राजधानी त्रिवेंद्रम आएं और साथ में एक ऐसे बालक को लेकर आएं जिसकी आयु विवाह योग्य हो। राजा राज वर्मा अपने साथ तरुण रवि वर्मा को ले गए। राज वर्मा ने जब राजा तिरुनल से रवि वर्मा के बारे में बताया तो तिरुनल आश्चर्यचकित रह गया। राजा राज वर्मा ने आग्रह किया कि रवि वर्मा किलीमानूर में जितनी शिक्षा ग्रहण कर सकता था कर चुका है। यदि आप चाहें तो रवि वर्मा त्रिवेंद्रम में रहकर आगे कुछ सीख सकता है। राजा तिरुनल ने इस आग्रह को तुरंत स्वीकार कर लिया।


कोच्चू अब राजा रवि वर्मा बनने की दिशा में पैर रख चुका था। एक ऐसी दिशा जहां उसे संघर्ष, हुनर, इज्जत, शोहरत और बेइज्जती मिलने वाली थी। अब कोच्चू त्रिवेंद्रम में रहने लगा। राजा तिरुनल ने उस समय के प्रसिद्ध चित्रकार रामास्वामी नायकर को कोच्चू के शिक्षक के रूप में नियुक्त कर दिया। रामास्वामी नायकर को जब मालूम चला कि रंगों की कूची चलाने में कोच्चू मुझसे ज्यादा माहिर है तो वह सिखाने में टालमटोल करने लगा। हां, कोच्चू ने नायकर से कुछ सीखा हो या नहीं एक अच्छी शुरुआत जरूर हुई वो थी ऑयल पेंटिंग। जब राजा तिरुनल को पता चला कि नायकर कोच्चू को चित्रकारी नहीं सिखा रहा तब राजा ने कोच्चू को पुराने चित्र देकर अभ्यास करने के लिए कहा। यही अभ्यास कोच्चू को आगे तक ले गए।


इसी समय नीदरलैंड्स का प्रसिद्ध चित्रकार थियोडोर जेंसन राज दरबार में आया हुआ था। राजपरिवार ने जेंसन को पोट्रेट बनवाने  के लिए बुलवाया था। राजा तिरुनल ने तय किया कि कोच्चू चित्रकार थियोडोर जेंसन से पोट्रेट बनाने और ऑयल पेंटिंग के गुर सीखेगा। जेंसन को जब मालूम चला कि राजा इस बारे में सोच रहे हैं तो उसने कोच्चू को सिखाने से मना कर दिया। इस बात पर राजा नाराज हो गया और कहा कि हमें पोट्रेट नहीं बनवाना है। इसके बाद थियोडोर जेंसन ने कोच्चू को पोट्रेट बनाना सिखाया क्योंकि वो ऐसा ना करता तो उसे मोटी रकम और इज्जत गंवानी पड़ती। रवि वर्मा ने जैसे-तैसे पोट्रेट बनाना सीख ही लिया। जो रवि वर्मा के जीवन में बड़ा काम आया। पोट्रेट, चित्रकारी की विधा है जिसमें चित्रकार सामने बैठे किसी व्यक्ति की चित्रकारी कैनवास पर उतारता है।


रवि वर्मा ने आगे की शिक्षा मैसूर और बडौदा में हासिल की। रवि  वर्मा ने देशभर के चक्कर लगाए। भारतीय संस्कृति को समझने में रवि वर्मा को भारत यात्रा बहुत काम आई। इन्हीं यात्राओं के बाद रवि वर्मा ने अपनी चित्रकारी की जादूगरी बिखेरी। भारत यात्रा से पहले भी रवि वर्मा ने कई चित्र बनाए थे लेकिन उन्हें अब समझ आ गया था कि उन्हें करना क्या है? भारतीय संस्कृति के नायकों और देवी-देवताओं की ऑयल पेटिंग बनाना शुरू कर दी। देवी लक्ष्मी, देवी सरस्वती, भगवान कार्तिकेय, राधा-कृष्ण, सीता हरण, जटायु वध, अष्टसिद्धि, भीष्म प्रतिज्ञा, अर्जुन-सुभद्रा, शांतनु-मत्स्यगंधा, कण्व ऋषि और ऋषि कन्या, राम की वरुण विजय जैसी शानदार ऑयल पेंटिंग रवि वर्मा ने बनाई। शुरुआत में रवि वर्मा पेंटिंग में तंजौर कला का उपयोग करते थे लेकिन समय के साथ-साथ एक मिश्रित कला में बदल गई।


देवी-देवताओं के चित्र के अलावा राजा रवि वर्मा ने महाराणा प्रताप, अप्सरा-रंभा, फल के साथ महिला, ग्वालिन,नायर जाति की स्त्री, विचारमग्न युवती शामिल हैं। यहां तक की रवि वर्मा ने अपनी बहू का पोट्रेट भी बनाया। रवि वर्मा की सर्वश्रेष्ठ कलाकृति रही शकुंतला। पत्र लिखती शकुंतला, बगीचे में सखियों के साथ पीछे मुड़कर देखती शकुंतला, राजा के सम्मुख खड़ी शकुंतला जैसे अनेक चित्र बनाए। महाकवि कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तलम् पर आधारित ये चित्र इतने प्रसिद्ध रहे की विदेश में भी इसकी चर्चा हुई। इसी समय सर मोनियर विलियम्स ने अभिज्ञानशाकुन्तलम् का अंग्रेजी अनुवाद किया और पुस्तक के प्रथम पृष्ठ पर रवि वर्मा से प्रेम पत्र लिखती शकुंतला का चित्र छापने का आग्रह किया। इस आग्रह को रवि वर्मा ने स्वीकार कर लिया।


रवि वर्मा से चित्र और पोट्रेट बनवाने की मानो होड़ सी लग गई। अंग्रेज अफसरों से लेकर राजा-महाराजाओं ने रवि वर्मा से चित्र और पोट्रेट बनवाए। एक बार इसी काम के लिए उन्हें मैसूर राजघराने ने उन्हें दो हाथी तोहफे में दिए। एक बार रिचर्ड टैंपल-ग्रेनविले भारत आए तो उनका स्वागत त्रावणकोर के महाराज और उनके छोटे भाई ने किया। इस पेंटिंग की अंग्रेजों के बीच बहुत तारीफ हुई और इसकी नीलामी 1.2 मिलियन डॉलर में हुई। रवि वर्मा ने मुंबई में लिथोग्राफिक प्रेस भी खेला। इस प्रेस से उन्होंने बहुत धन कमाया और इज्जत भी। धन और इज्जत कई लोगों को हजम नहीं होती। रवि वर्मा पर यह कहते हुए आरोप लगाया कि वे नग्न तस्वीर बनाते हैं और मुंबई स्थित प्रेस पर कई लोगों ने हमला कर दिया। प्रेस को जला दिया गया जिससे कई सारी पेंटिंग जलकर स्वाहा हो गईं।


राजा रवि वर्मा की मुझे 'गैलेक्सी ऑफ म्युजिसियन्स' नामक की पेंटिंग सबसे अच्छी लगी। इस पेंटिंग विभिन्न परिधानों में 11 महिलाएं हैं जो भारत को प्रस्तुत कर रही हैं। कोई महिला वायलिन बजा रही है तो कोई तानपुरा सभी के चेहरे पर शांत और गंभीर भाव देखने मिल रहा है। पेंटिंग का भाव महिला केंद्रित है जिसमें ये बताया गया है कि महिला ही इस ब्रह्मांड की जननी है।


लोगों ने रवि वर्मा की प्रेस को तो जला दिया लेकिन हुनर अभी भी जिंदा था जो ताउम्र उनके साथ रहा। अबनीन्द्रनाथ टैगोर जैसे चित्रकार ने तो रवि वर्मा को भारतीय चित्रकार होने पर ही प्रश्न खड़ा कर दिया। उनका कहना था कि रवि वर्मा पेंटिंग बनाने के लिए विदेशी तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। अंग्रेजों ने उन्हें कैसर-ए-हिंद सम्मान से नवाजा। राजा की उपाधि भी मिली और वे बन गए राजा रवि वर्मा। साल 1906 में मात्र 58 साल की उम्र में राजा रवि वर्मा का देहांत हो गया। शरीर भले ही नश्वर हो लेकिन उनकी कलाकृति आज भी जीवित है। सच में वे चित्रकारों में राजा थे राजा। आज भी उनके बनाए गए चित्र बडौदा के लक्ष्मी विलास पैलेस म्यूजियम में देखने को मिल जाएंगे। 

📃BY_vinaykushwaha

(नोट :- राजा रवि वर्मा की पेंटिंग्स के सभी चित्र इंटरनेट से डाउनलोड किए गए हैं।) 



शुक्रवार, 31 मई 2019

सिर्फ और सिर्फ नरेंद्र



लोकसभा चुनाव आखिरकार खत्म हुआ। सात चरणों में लोकसभा चुनाव का 23 मई को समापन हो गया। इस बार कई लोगों के लिए आंकड़े चौंकाने वाले रहे तो कई लोगों को सुकून देने वाले। इस बार एग्जिट पोल की भविष्यवाणी सच साबित हुई, यदि कुछ एग्जिट पोल को छोड़ दिया जाए तो। लगभग इस बार सभी एग्जिट पोल ने एनडीए को 350 के पार पहुंचाया था। एग्जिट पोल की डगर पर चलते हुए लोकसभा के नतीजे भी सच साबित हुए। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह समेत पार्टी के तमाम नेता कहते थे कि पिछले बार मोदी लहर थी लेकिन इस बार मोदी की सुनामी है। अमित शाह स्वयं कहते थे कि बीजेपी 300 से अधिक सीटें लेकर आएगी और एनडीए 350 सीटें जीतेगी। बीजेपी ने 2014 को दोहराते हुए 2019 में एक बड़े आंकड़े तक पहुंच बनाई। इस बार के आम चुनाव के नतीजों में बीजेपी अपनी दम पर 303 सीटें लेकर आई है तो वहीं एनडीए का आंकड़ा 350 के पार पहुंच गया है।

2019 के आम चुनाव में मोदी इतनी सीटें लाने में कैसे सफल रहे? क्या मोदी के खिलाफ कोई एंटी इंकम्बेंसी नहीं थी? लोगों में मोदी के खिलाफ गुस्सा नहीं था? क्या मोदी से बड़ा नेता आज भारत में कोई नहीं है? विपक्ष इतना कमजोर है कि मोदी का मुकाबला कर पाने में सक्षम नहीं है? इस पूरे परिदृश्य में जो चीज उभरकर सामने आती है वो यह है कि इस बार पॉलिटिकल पंडितों की सारी भविष्यवाणियां फेल हो गईं है। मैं इस लेख में बीजेपी की जीत पर प्रकाश डालूंगा। तथ्यों को सामने लाने की कोशिश करूंगा।

सबसे पहले मैं बात करूंगा नरेंद्र मोदी की छवि की। मोदी की छवि के कारण कहीं ना कहीं बीजेपी को फायदा मिला है। 2014 के बाद मोदी और बड़ी छवि बनकर उभरे हैं। आज के समय में कहा जाए तो मोदी से बड़ा नेता देश में कोई दूसरा नहीं है। केंद्र में सरकार बनाने के बाद नरेंद्र मोदी ने कई ऐसे काम किए जिसने मोदी की छवि बदलने का काम किया। मोदी के इन कामों में सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक, अभिनंदन की रिहाई, मसूद अजहर को ग्लोबल आंतकी घोषित करवाना, स्वच्छ भारत अभियान, 21 जून को योग दिवस घोषित करवाना जैसे मुद्दे शामिल हैं। इन कामों ने मोदी की छवि को बड़े से और बड़ा कर दिया। नरेंद्र मोदी की बोलने की कला और भाषण के दौरान लोगों से जुड़ने की कला, मोदी को लोगों के नजदीक लेकर गई। मोदी देश के जिस भी हिस्से में जाते हैं वहां की भाषा के शब्दों को अपने भाषण में शामिल करते हैं। पीएम नरेंद्र मोदी ने 5 साल के दौरान हर महीने के आखिरी रविवार को मन की बात करते हुए लोगों से उन्होंने जुड़ाव बनाए रखा। इसके अलावा शिक्षक दिवस के दिन छात्रों से बात करते थे।

नरेंद्र मोदी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में 146 रैलियां की। पूरब से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण तक पीएम ने रैलियां की। मेरठ से अपनी चुनावी सभा की शुरूआत करके एमपी के खरगोन में अपनी चुनावी अभियान को विराम दिया। कांग्रेस का 'चौकीदार चोर है' वाले बयान को लेकर पीएम ने अपनी हर रैली में कांग्रेस पर चौकीदार नाम का बम फोड़ा। ट्विटर पर अपने नाम के आगे चौकीदार लगाकर चौकीदार वर्ग का वोट समेट लिया। कांग्रेस के साथ-साथ महागठबंधन और टीएमसी को इस चुनाव में मोदी ने आड़े हाथों लिया। जहां महागठबंधन को महामिलावट कहा तो वहीं ममता बनर्जी को स्पीड ब्रेकर कहा। इन सब में सबसे बड़ी बात यह रही की इस बार बीजेपी कांग्रेस से भी ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ रही थी। बीजेपी ने 2019 का आम चुनाव 435 सीटों पर लड़ा। बीजेपी ने भले ही 435 सीटों पर चुनाव लड़ी लेकिन प्रत्याशी केवल एक ही था वो है 'मोदी'। बीजेपी ने पिछला आम चुनाव मोदी लहर के नाम पर लड़ा था लेकिन यह चुनाव बीजेपी ने मोदी के नाम पर लड़ा। बीजेपी नेता कहते भी थे कि पिछले चुनाव में मोदी लहर थी तो इस बार मोदी की सुनामी है।

विपक्ष हमेशा कहता था कि पीएम मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करते, इंटरव्यू नहीं देते, पीएम हमेशा वन-वे कम्यूनिकेशन करते हैं। पीएम नरेंद्र मोदी ने इस चुनाव में इंटरव्यू के साथ-साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टीवी से लेकर प्रिंट तक सभी को इंटरव्यू दिया। आखिरी चरण के चुनाव प्रचार के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की। इस बार प्रधानमंत्री मोदी ने पॉलिटिकल इंटरव्यू के साथ-साथ नॉन-पॉलिटिकल इंटरव्यू भी दिया। इसके अलावा मोदी ने कई रोड शो भी किए जिसमें काशी में किया रोड शो भव्य था।

बीजेपी की इस शानदार जीत के पीछे एक बहुत बड़ा कारण है मोदी-शाह की जोड़ी। पिछले आम चुनाव की तरह इस चुनाव में भी मोदी-शाह की जोड़ी ने कमाल कर दिखाया। पॉलिटिकल पंडित कहते थे कि बीजेपी को सरकार बनाने के लिए दूसरे दलों की जरुरत पड़ेगी। दोनों की जोड़ी ने इस बात को नकार दिया। अमित शाह को बीजेपी का चाणक्य कहा जाता है। अमित शाह ने शिवसेना को मनाने का काम किया, जेडीयू को फिर से एनडीए में लाने का श्रेय भी अमित शाह को जाता है। अमित शाह ने नरेंद्र मोदी से 17 रैलियां ज्यादा करके लोगों तक पहुंच बनाई। बूथ मैनेजमेंट और लोगों को बीजेपी से जोड़ने का काम अमित शाह ने किया। नरेंद्र मोदी की बिजनेस मैन, फिल्मी सितारों के साथ बैठक आदि भी अमित शाह के दिमाग की उपज है। बीजेपी ने राजस्थान, बिहार, उत्तरप्रदेश, झारखंड, तमिलनाडु, महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों से गठबंधन किया। तमिलनाडु को यदि छोड़ दिया तो बाकी राज्यों में बीजेपी ने अच्छा प्रदर्शन किया। अमित शाह की रणनीति के काऱण आज बंगाल में बीजेपी 18 सीटें लाने में सफल रही है। इस चुनाव में बीजेपी का फोकस यूपी और बिहार ना होकर पश्चिम बंगाल और ओडिशा था। इन दोनों राज्यों में बीजेपी ने अच्छा प्रदर्शन किया। बीजेपी अध्यक्ष होने के नाते अमित शाह ने बीजेपी को सशक्त बनाया बल्कि एनडीए को भी और ज्यादा मजबूत किया। बीजेपी की इस धुंआधार जीत के पीछे प्रचार-प्रसार का अहम योगदान रहा। इसमें कोई शक नहीं है कि बीजेपी ने इस चुनाव में प्रचार में सबसे ज्यादा पैसे खर्च किए हैं। सोशल मीडिया से लेकर ग्राउंड जीरो तक बीजेपी ने खूब पैसे बहाए। इस चुनाव में बीजेपी का चुनाव प्रचार विवाद का विषय रहा। नमो टीवी को लेकर विपक्ष बहुत आक्रामक रहा। व्हाट्सएप ग्रुप से लेकर फेसबुक और व्यक्तिगत रूप से फोन करके लोगों को बीजेपी के पक्ष में लाने का प्रयास बीजेपी ने किया। बीजेपी के साथ अपार जनसमर्थन जुड़ने के पीछे एक कारण और भी है।

सरकार की योजनाओं को घर-घर तक पहुंचाना और उनका प्रचार-प्रसार करना। उज्ज्वला योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, स्वच्छ भारत अभियान के तहत शौचालय का निर्माण करवाना। जिन परिवारों के पास ये सारी सुविधाएं नहीं थी यदि उऩको यह सब मिलता है तो व्यक्ति-व्यक्ति का लाभ पहुंचाने वालों को ही जाएगा।
कमजोर विपक्ष का होना भी बीजेपी के लिए फायदेमंद साबित हुआ। 2014 के अपेक्षा बीजेपी 2019 में और बड़ी पार्टी बनकर उभरी। 2014 में बीजेपी को अपने दम पर जहां 282 सीट मिली थीं तो वहीं 2019 में बढ़कर 303 हो गईं। विपक्ष और कमजोर हो गया। ऐसा कहना गलत वहीं होगा कि विपक्ष ने कोई प्रयास ही नहीं किया। मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को 2014 के आम चुनाव में 44 सीटें मिली थीं तो 2019 में यह मामूली बढ़त के साथ 52 हो गईं। इन सबमें सबसे बड़ी बात यह है कि देश के सबसे बड़े सियासी सूबे में कांग्रेस सिमटकर एक पर आ गई।  17 राज्यों में कांग्रेस खाता तक नहीं खोल पाई। बिहार जैसे राज्य में एनडीए ने 40 में से 39 सीटें जीतने में कामयाब रही। पश्चिम बंगाल में बीजेपी दो से 18 सीटों वाली बनी तो वहीं ओडिशा में बीजेपी एक से आठ पर पहुंच गई।  कई राज्यों में बीजेपी क्लीन स्वीप करने में कामयाब रही जिनमें राजस्थान, गुजरात, हिमाचल, उत्तराखंड, दिल्ली, हरियाणा, चंडीगढ़ जैसे राज्य शामिल हैं। 2019 का आम चुनाव कई दिग्गजों की हार वाला चुनाव रहा जिसमें दिग्विजय सिंह, शरद यादव,  राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सुशील कुमार शिंदे, नबाम टुकी जैसे बड़े-बड़े नाम धराशायी हो गए। 

विपक्ष ने मेहनत की या नहीं की इसका कोई मतलब नहीं क्योंकि बीजेपी ने बाजी मार ली है। नरेंद्र मोदी में एक बात बहुत खास है कि वे विपक्ष के मुद्दे को कैच कर लेते हैं।  2017 के गुजरात चुनाव में मणिशंकर अय्यर ने पीएम मोदी को नीच कहा था।  इस बयान को पीएम मोदी ने इतना प्रचार किया कि कांग्रेस को इसका भुगतान भुगतना पड़ा। 2019 के आम चुनाव में राहुल गांधी ने चौकीदार चोर है नारा लगवाया तो नरेंद्र मोदी ने ट्विटर हैंडल पर अपना बदल कर चौकीदार नरेंद्र मोदी कर दिया। राहुल गांधी के द्वारा उठाए गए भष्ट्राचार के मुद्दे को पलटकर बोफोर्स तक ले गए।  सैम पित्रोदा के सिख दंगों पर दिए हुआ तो हुआ वाले बयान पर पीएम ने आधी जंग ही जीत ली।

कहते हैं कि चुनाव में जातीय समीकरण मायने रखते हैं। पार्टियां अपने उम्मीदवारों को जातीय आधार पर उतारती है।  इस चुनावी में सारे जातीय समीकरण लोधी-कुर्मी, एम-वाय, सवर्ण-दलित सभी समीकरण फेल हो गए। इस बार राष्ट्रवाद का मुद्दा हावी रहा। राष्ट्रवाद के साथ-साथ आतंकवाद का मुद्दा हावी रहा। सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक ने इसे और हवा दी। 

जिस तरह सुनामी में सब कुछ तबाह हो जाता है ठीक उसी तरह मोदी नाम की सुनामी में 2019 में विपक्ष बह गया। 
BY_vinaykushwaha

सोमवार, 20 मई 2019

आम और ये मैंगो पीपुल!


आज जब मैं यह पोस्ट लिख रहा हूं तो 2019 का आम चुनाव खत्म हो चुका है। आम चुनाव खत्म होने के साथ ही देश भर में चुनाव प्रचार का शोर थम चुका है। अब सबकी नजर 23 मई को आने चुनाव के नतीजे पर हैं। यह पोस्ट नॉन पॉलिटिकल है जिस तरह प्रधानमंत्री का इंटरव्यू नॉन पॉलिटिकल था। अभिनेता अक्षय कुमार के सवाल का जवाब देते पीएम बड़े ही मासूम नजर आ रहे थे। आम की कहानी तो उन्होंने इस तरह बताई की मुझे अपने बचपन के दिन ध्यान आ गए क्योंकि हम भी लग्जरी में पले-बढ़े नहीं हैं। पत्रकार रवीश कुमार को तो बाकायदा प्राइम टाइम ही आम करना पड़ा। आम सफेदा हो या लंगड़ा, बादाम हो या दशहरी यही बताना पड़ा। गर्मी के मौसम में आम और आम से बने जूस आदि का आनंद हर व्यक्ति उठाता है। मैंने बचपन से लेकर आजतक बादाम, केसरी, तोतापरी, नीलम, लंगड़ा, दशहरी, चौसा, मोती, कल्मी, गोविंदगढ़ का आम खाया है। बचपन में हमने भी आम तोड़कर खाया है। हम भी प्रधानमंत्री बने तो कोई हमसे पूछे कि क्या आप भी आम खाते हैं? मेरा जवाब तैयार होगा हां, हमारी फैमिली में ऐसी कोई लक्जरी तो नहीं कि हम आम खरीद कर खा पाएं।

मैं नहीं जानता कितने लोगों ने अपनी जिंदगी गांव में बिताई है या गांव में रहकर गांव के जीवन को करीब से देखा है। मेरे पिताजी गांव से निकलकर शहर में नौकरी करने चले गए। शहर का जीवन मैंने जीया है लेकिन गांव को मैंने करीब से देखा है। गर्मी में स्कूल के छुट्टी के दरम्यान हम (हम मतलब मम्मी, भइया और मैं) गांव का रुख करते थे। सीधी-सीधी बात कहूं तो गांव का जीवन चले जाते थे। चूल्हे पर पकी चाय का सौंधापन क्या शानदार लगता था। मैंने चाय बेची नहीं है। हंडी में पकी दाल और हाथों से पोई रोटी का स्वाद जो गांव के खाने में था आज मैं याद करता हूं। उस खाने को भुलाया नहीं जा सकता है। आकाश तले रात गुजारना और दिन में बिजली आने का इंतजार करना दोनों का एक सुखद अनुभव था। गर्मी के दिनों में खाट पर सोना और कुत्तों के भौंकने की तेज आवाज आज भी याद आती है। खेत के किनारे खाट डालकर सोने का अनुभव तो और भी शानदार था। रात में फसल को छूकर आने वाली हवा गर्मी की उजाले वाली रात को और भी ठंडा कर देती थी।

मेरे गांव के घर में एक बारी थी। जो लोग बारी के बारे में कुछ नहीं जानते तो उनको बताता चलूं कि बारी एक ऐसी जगह होती है जिसे हम छोटा-सा बगीचा कह सकते हैं। गांव वाली बारी में एक छोटा-सा घर था जिसमें दादा-दादी रहते थे। इसी घर से दो कदम की दूरी पर एक बड़ा-सा कुंआ था। गर्मियों में इसी कुंए से पानी निकालकर हम ठंडा-ठंडा पानी पिया करते थे। गांव की बारी में कटहल (jack fruit), करौंदा, नींबू, सीताफल (custard apple) और आम के पेड़ थे। हम जब भी गांव जाते थे तो आम के पेड़ पर चढ़कर आम खाते थे क्योंकि हमारे पास कोई लक्जरी तो थी नहीं। दादी अक्सर खटिया पर अमावट बनाती थी। अमावट को शायद ही आजकल के लोग जानते हों। अमावट पके हुए आम का गूदा निकालकर उसे खटिया में चादर बिछाकर एक परतदार के रूप में आकार दिया जाता है। मैं बघेली हूं और हमारे यहां आम और आम से बनीं चीजों का बहुत इस्तेमाल किया जाता है। आम चाहे कच्चा हो या पका दोनों का इस्तेमाल बराबर होता है।

मैं जब छोटा था तो मई-जून के महीने में तूफान बारिश होने पर कैरियां गिर जाती थीं। मैं और मेरे दोस्त कैरियां अपनी टी-शर्ट में भरकर घर ले जाते थे। कई बार तो पत्थर मारकर,बांस की लग्गी बनाकर कैरी तोड़ी हैं क्योंकि हमारे पास कोई लक्जरी तो थी नहीं। कैरी बड़े काम का फल है। बघेली लोग कैरी की सब्जी, कैरी की कढ़ी, कैरी की चटनी, कैरी का पना, कैरी से आचार, कैरी को सुखाकर अमचूर बनाते हैं। कैरी से बने कई सारे पाकवान के बारे में लोग जानते हैं लेकिन डिश जो बघेली बड़े चाव से खाते हैं वो है 'बगजा'। बगजा, कैरी से बनता है। कैरियों को उबाला जाता है। कैरी का गूदा निकाला जाता है। इस गूदे में गुड़ मिलाया जाता है इसके साथ नमक,भुना जीरा मिलाया जाता है। इसके बाद बेसन का घोल तैयार करके सेंव बनाया जाता है। गूदे को सरसों के तेल में खड़ी लाल मिर्च, जीरा, खड़े मसाले के साथ छौंक लगाया जाता है। इस छौंक में सेंव को मिलाया जाता है, इसे कहते हैं 'बगजा'। बघेली इस डिश को बड़े चाव से खाते हैं और मैं भी क्योंकि हमारे पास कोई लक्जरी तो थी नहीं।

जैसे-जैसे बड़े होते गए तो आम खाने का तरीका बदलता गया। पहले तो हमें केवल रीवा के गोविंदगढ़ का आम और दशहरी पता था। जैसे-जैसे बड़े होते गए वैसे-वैसे आम के नए-नए नाम भी पता चलते गए। मैं मध्यप्रदेश से हूं। एमपी से यूपी तक आते-आते आम का राजा भी बदल गया। एमपी में जहां बादाम आम का राजा था तो वहीं यूपी आने के बाद आम का राजा सफेदा हो गया। आम रस तो बचपन में भी पीते थे। आमरस के साथ दाल की रोटी खाने का आनंद तो सच्चा बघेली ही जान सकता है। बचपन में आम का रस निकालकर हम उसमें काजू,किशमिश,बादाम, दूध और थोड़ी शक्कर मिलाकर फ्रिज में जमने के लिए रख देते थे। यही हमारे लिए आइसक्रीम थी। अब तो केवल दुकानों में ही मैंगो फ्लेवर वाली आइसक्रीम खाना होता है। आम रस के नाम पर बाजार में दस-पांच रुपये में मिल रहे मैंगो जूस को पीकर अपने आप को तृप्त करते हैं।

आम को फलों का राजा कहा जाता है। आम सच में फलों का राजा होने लायक है भी क्योंकि आम खाने के लिए किसी प्रकार की लक्जरी की जरूरत नहीं है। एक आम इंसान से लेकर अमीर तक आम को खाता है। मैंने आज तक आम खाने के लिए किसी व्यक्ति को कहते हुए नहीं सुना कि हमारे पास लक्जरी तो थी नहीं, सिवाय एक के। आम के लिए अब तो एक मौसम विशेष तक रुकने की जरुरत भी नहीं है क्योंकि अब आम बारहमासी हो गया है। जब मन करे आम खरीदो और खाओ। आम की टक्कर आज कीवी, ड्रेगन फ्रूट, आवोकाडो से हो गई है। मेरे लिए तो आम ही 'द बेस्ट' है जिसके लिए लक्जरी की जरुरत नहीं पड़ती है। हां मैंने आज तक मैंगो लस्सी का स्वाद नहीं चखा है। मैंगो लस्सी का स्वाद तो मैं कभी चख लूंगा लेकिन इसके लिए मैं लक्जरी को दोष नहीं दूंगा। मैंगो लस्सी के एवज में मैंने मैंगो फ्लेवर वाली टॉफी जरूर खाई है। पता नहीं और क्या बाकी है और क्या नहीं लेकिन मेरे हिसाब भारत का कोई भी वर्ग हो उसे आम खाने के लिए लक्जरी की जरुरत नहीं है।  आम की तरह हम भी तो मैंगो पीपुल(mango people) हैं।

मंगलवार, 14 मई 2019

लद्दाख के निर्माता - कुशोक बकुला रिम्पोछे



जम्मू कश्मीर के लद्दाख को अपनी खूबसूरती के लिए जाना जाता है। हिमालय की ऊंची-ऊंची पर्वतश्रृंखला, बौद्ध मठ और दूर-दूर तक फैली शांति सभी को लद्दाख आकर्षित करती है। लद्दाख की चीन की सीमा से करीबी सुरक्षा की दृष्टि से डर पैदा करता है। लद्दाख में इस डर का सबसे पहले जिक्र कुशोक बकुला रिम्पोछे ने किया था। कुशोक बकुला रिम्पोछे को आधुनिक लद्दाख का निर्माता कहा जाता है। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने लद्दाख में एयरपोर्ट का उद्घाटन किया तो उन्होंने कुशोक बकुला रिम्पोछे को आधुनिक लद्दाख का निर्माता कहा था। कुशोक बकुला रिम्पोछे का जन्म 19 मई 1917 में लद्दाख में हुआ था। कुशोक बकुला का असली नाम लोबजंग थुबथन छोगनोर था। असलियत में कुशोक बकुला को भगवान बुद्ध के सोलह अर्हतों में से एक माना जाता है। बकुला भगवान बुद्ध के समकालीन थे और उन्हें बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए स्वयं भगवान बुद्ध ने कहा था। बकुला के उन्नीसवें अवतार को कुशोक बकुला रिम्पोछे के नाम से जाना जाता है।

कुशोक बकुला की शिक्षा-दीक्षा तिब्बत में हुई थी। तिब्बत में कुशोक ने चौदह वर्षों तक बौद्ध धर्म का अध्ययन किया और शिक्षा पूरी की। लद्दाख के साथ-साथ उन्होंने बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार विदेशों में भी किया। लद्दाख के गांव-गांव में जाकर उन्होंने बुद्ध और उनकी शिक्षा को जन-जन तक पहुंचाने का काम किया। भारत के विभिन्न हिस्सों में जाकर उन्होंने बुद्ध के बचनों को लोगों तक पहुंचाया। मंगोलिया जाकर बकुला ने बौद्ध धर्म को फिर से जागृत करने का काम किया। मंगोलिया को ईसाई धर्म के मिशनरियों से बचाकर उन्होंने बौद्ध धर्म की पताका मंगोलिया में लहराने दी। 1996 में ब्रिटेन में मजहबों और पर्यावरण संरक्षण सम्मेलन में भारत से कुशोक बकुला रिम्पोछे और स्वामी चिदानंद गए थे। कुशोक ने इस सम्मेलन में ईसाई मिशनरियों के बारे में काले सच को उजागर किया कि कैसे ईसाई मिशनरी लोगों से जबरन धर्म परिवर्तन करा रहे हैं और ईसाई धर्म कबूल करवाने पर मजबूर कर रहे हैं। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से निवेदन किया की भगवान बुद्ध के दो शिष्यों सारिपुत्त और महामोदगलायन के अस्थि अवशेषों को लद्दाख लाया जाए। इस निवेदन को जवाहर लाल नेहरू ने स्वीकार और महाबोधि सभा की देखरेख में लेह में ले जाया गया। यहां ढ़ाई महीने तक लोगों ने अस्थि अवशेषों के दर्शन किए।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब जम्मू कश्मीर में पाकिस्तान की ओर से गतिविधियां बढ़ गईं तो उन्होंने इस पर चिंता जाहिर की। पंडित जवाहर लाल नेहरू से इस बात को साझा किया। तत्कालीन जम्मू कश्मीर के राजा डॉ हरिसिंह के निर्णय के खिलाफ कुशोक ने नाराजगी जताई थी। हरिसिंह ने जम्मू कश्मीर को अलग देश बनाने की मांग रखी थी। जम्मू कश्मीर को जब भारत का अंग बनाया गया तब कुशोक बकुला ने यह आशंका जताई थी कि पाकिस्तान के कबीले और सेना जम्मू कश्मीर को अस्थिर करने की कोशिश करेंगे। उन्होंने कारगिल को बेहद संवेदनशील इलाका कहा था और लद्दाख को मुख्य धारा से जोड़ने की बात कही थी। कुशोक बकुला लद्दाख की आधारभूत संरचना(fundamental development)बारे में कहते थे। जब वे लद्दाख से विधायक बने तो केवल विधायक ही नहीं बने बल्कि उन्होंने लद्दाख को वो सबकुछ देने की कोशिश की जो एक पिता करता है। शेख अब्दुल्ला की सरकार में उन्हीं की पार्टी से विधायक होते हुए उन्होंने लद्दाख को दी जा रही धनराशि के बारे में प्रश्न उठाया। जम्मू कश्मीर की विधानसभा में उन्होंने लद्दाख को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए आधारभूत संरचना को मजबूत करने, आधुनिक शिक्षा पद्धति लागू करने, विश्वविद्यालय और कॉलेज खोलने की बात कही। इसके साथ-साथ उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार को कभी बाधक नहीं बनने दिया।

लद्दाख में बोली जाने वाली भोटी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में  शामिल करने के लिए संघर्षरत रहे। जम्मू कश्मीर सरकार में विधायक रहते हुए उन्होंने सरकारी कामकाज की भाषा अंग्रेजी और उर्दू का विरोध किया। उनका कहना था कि अंग्रेजी और उर्दू दोनों कश्मीर की भाषा नहीं हैं इसकी जगह पर डोगरी,कश्मीरी या भोटी को शामिल किया जाना चाहिए। कुशोक बकुला कहते थे कि भोटी भाषा लद्दाख से अरुणाचल तक बोली जाती है और इस भाषा को बोलने वालों की संख्या 5 लाख है। अरुणाचल सरकार ने बाद में भोटी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए एक प्रस्ताव भी पारित किया था। ऐसा नहीं था कि उन्होंने और प्रयास नहीं किए। जब वे सांसद बने तो उन्होंने संसद में इस मुद्दे के साथ-साथ लद्दाख के विकास के मुद्दे को भी उठाया था। संसद के सदन में कुशोक बकुला ने उन रुपयों का जिक्र भी किया जो लद्दाख के विकास के लिए भेजे जाते थे। उनका कहना था कि लद्दाख के लिए जो धनराशि जारी की जाती है वो धनराशि लद्दाख तक पहुंचती नहीं है।

तिब्बत के जनसामान्य के बीच दलाई लामा का जितना महत्व है ठीक उसी तरह लद्दाख वासियों के लिए कुशोक बकुला रिम्पोछे का महत्व था। कुशोक बकुला के जीवन में तिब्बत का विशेष स्थान था। तिब्बत में उन्होंने शिक्षा-दीक्षा ग्रहण की और जीवन जीने की कला भी उन्होंने तिब्बत से ही सीखी थी। कुशोक बकुला, चौदहवें दलाई लामा के बारे में चिंतित रहते थे। सन 1956 में भारत सरकार ने भगवान गौतम बुद्ध की 2500वीं जयंती मनाने का निर्णय लिया। इस अवसर पर भारत सरकार ने एक प्रतिनिधिमंडल का गठन किया। इस प्रतिनिधिमंडल का काम था तिब्बत जाकर दलाई लामा और पंचेन लामा का समारोह के लिए आमंत्रित करना। इस प्रतिनिधिमंडल का अध्यक्ष कुशोक बकुला रिम्पोछे को बनाया गया। कुशोक हमेशा से ही तिब्बत की सलामती के बारे में सोचते थे। कुशोक बकुला तिब्बत को एक राष्ट्र के रूप में देखना चाहते थे। उनका कहना था कि यदि तिब्बत एक राष्ट्र के रूप में उभरता है तो यह चीन और भारत के बीच बफर जोन की तरह काम करेगा। वे हमेशा चीन की तरफ से आने वाले संकट की ओर इशारा करते थे। शायद उन्हें पहले ही ज्ञात हो गया था कि चीन ,भारत के विरुद्ध युद्ध छेड़ कर कायराना हरकत करेगा। सन् 1959 में तिब्बत में हालात बेहद नाजुक हो गए थे। चीन सरकार जबरदस्ती तिब्बत वासियों को नास्तिकता की ओर धकेल रही थी। इसी समय चौदहवें दलाई लामा को भारत लाया गया।

दलाई लामा और उनके साथ आए अनुयायियों को बसाने की जिम्मेदारी कुशोक बकुला ने अपने हाथ ले ली थी। सरकार की तरफ से तिब्बतियों को बसाने के लिए 1200 एकड़ जमीन दी गई। कुशोक बकुला रिम्पोछे ने  तिब्बतियों को जल्द से जल्द बसाने का काम करने के लिए उन्होंने भारत सरकार को पत्र लिखा। कुशोक बकुला, दलाई लामा के साथ कई बौद्ध समारोह में हिस्सा लिया। दलाई लामा और कुशोक बकुला साथ में मंगोलिया भी गए थे। दलाई लामा ने वहां पर ईसाई मिशनरी द्वारा किए जा रहे कार्य की सराहना की लेकिन कुशोक बकुला इस व्यक्तव्य के साइड इफेक्ट को समझ गए थे। उन्हें पता था कि दलाई लामा की बात का ईसाई मिशनरी फायदा उठाएंगे। ऐसा इसलिए था क्योंकि साम्यवादी विचारों को मंगोलिया पर थोपा जा रहा था। चीन, मंगोलिया को ईनर मंगोलिया कहकर चीन का हिस्सा का बताता था।

जब मंगोलिया के वे राजदूत बने तो उन्होंने अपने आपको दूसरा भिक्खू कहकर संबोधित किया। भारत से पाकिस्तान और चीन के रिश्ते हमेशा ठीक नहीं रहे। सन् 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण करके लद्दाख का कुछ हिस्सा छीन लिया। इस हिस्सा को चीन, अक्साई चीन कहता है। कुशोक बकुला ने हमेशा से चीन तरफ से आने वाले संकट की ओर इशारा किया था। वहीं वे आतंरिक शांति पर जोर देते थे। कुशोक बकुला का कहना था कि शांत रहकर बड़े से बड़ा काम किया जा सकता है। शेख अब्दुल्ला की सरकार में विधायक रहते हुए उन्होंने जम्मू कश्मीर विधानसभा में लद्दाख के संदर्भ में जोरदार भाषण दिया। कुशोक बकुला का भाषण भोटी भाषा में था। इस भाषण का सदन के कई सदस्यों ने भाषण की भाषा को लेकर सवाल उठाया। कुशोक बकुला ने इस भाषण में लद्दाख के विकास को लेकर शेख अब्दुल्ला सरकार को जो लताड़ लगाई उससे तो स्वयं शेख अब्दुल्ला को बगले झांकने पर मजबूर होना पड़ा। शेख अब्दुल्ला ने जम्मू कश्मीर में एक कानून बनाया जिसमें कोई भी 22 एकड़ से ज्यादा जमीन नहीं रख सकता था। इस कानून का कुशोक बकुला ने विरोध किया। इस कानून से मोनेस्ट्री का नुकसान होता।

भगवान गौतम बुद्ध की 2545वीं जयंती पर लद्दाख में कार्यक्रम का आयोजन किया गया। पूरे देश से लोग कुशोक बकुला से मिलने और आशीर्वाद लेने आए। अपनी आखिरी मंगोलिया यात्रा के दौरान उन्हें निमोनिया हो गया। मंगोलिया में ट्रीटमेंट और अस्पताल की ठीक व्यवस्था ना होने के कारण उन्हें एयर एंबुलेंस से चीन की राजधानी बीजिंग ले जाया गया। बीजिंग में कुशोक बकुला की तबीयत सुधरने के जगह और बिगड़ने लगी। कुशोक बकुला को बीजिंग से नई दिल्ली लाया गया और एम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया। समय को जो मंजूर होता है वही होता है। दिल्ली आने के बाद भी कुशोक बकुला की तबीयत सुधरी नहीं और चीवरधारी यह प्रखर व्यक्तिव्य इस दुनिया को छोड़कर चले गया।


📃BY_vinaykushwaha 

सोमवार, 1 अप्रैल 2019

जाति का विनाश कितना जरूरी है?

जात-पात तोड़ दो, तिलक-दहेज छोड़ दो।समाज के प्रवाह को नयी दिशा में मोड़ दो। यह उद्बोधन जेपी ने अपने आंदोलन के समय दिया था। जात-पात तोड़ दो, यह बात सबको आकर्षित करती है क्योंकि भारत में निम्न जाति के लोगों ने कभी न कभी जातिवाद का दंश झेला ही है। मैंने कुछ समय पहले एक किताब पढ़ी थी जिसका नाम "जाति का विनाश" है। यह किताब "Annihilation of caste" का हिंदी रूपांतरण है। इस किताब को बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने लिखी है। दरअसल यह एक किताब की शक्ल में भाषण का संकलन है। इस किताब में उसी भाषण का जिक्र किया गया है जिसे जात-पात तोड़क मंडल ने उन्हें देने नहीं दिया। जात-पात तोड़क मंडल का कहना था कि आंबेडकर जी का भाषण जाति व्यवस्था के बहिष्कार से ज्यादा हिंदू धर्म का अपमान है। जब कार्यक्रम रद्द हो गया तो आंबेडकर ने अपने भाषण को किताब की रूपरेखा में ढ़ाल  दिया। उन्होंने बताया कि उन्हें क्यों भाषण देने नहीं दिया गया? उनका कहना था कि जब मुझे अपने शब्दों को कहने की आजादी नहीं है तो मैं भाषण देने क्यों जाऊं?

जाति का विनाश किताब में बताया गया है कि कैसे जाति और जाति व्यवस्था हिंदू धर्म और मानने वाले लोगों के लिए अभिशाप है। उच्च जाति के लोग किस तरह निम्न जाति के लोगों पर कहर बरपाते हैं। आंबेडकर ने अपनी किताब में बताया कि कैसे जाति व्यवस्था भारत में आया और अब जड़ों तक समा चुका है। वैदिक सभ्यता के समय इस तरह के साक्ष्यों को पहली बार देखा गया था। उत्तर वैदिक काल में निम्न जाति को वेद आदि पढ़ने की अनुमति नहीं थी। जहां ऋग्वैदिक काल में व्यक्ति अपनी सुविधानुसार अपनी जाति बदल सकता था वहीं उत्तर वैदिक काल में यह व्यवस्था बदल गई। वैदिक काल में चार वर्णों वाली व्यवस्था अस्तित्व में आई थी उसने और विकराल रूप धारण कर लिया। वैदिक काल के बाद धीरे-धीरे जातीयता अन्य मुद्दों पर हावी होने लगी। ब्राह्मणवाद का विस्तार हिन्दू धर्म की नींव का हिलाने वाला था। किताब मैं बताया गया है कि वर्ण व्यवस्था में तिरस्कार केवल शूद्र को ही उठाना पड़ा है। किताब में महार जाति के बारे में बताया गया है कि कैसे उनके साथ गलत व्यवहार किया जाता था? जब महार जाति का कोई व्यक्ति  सड़क से निकलता था तो उसे कमर में झाड़ू बांधने और गले में एक मटका बांधने की सख्त हिदायत दी जाती थी। इस तरह की हिदायत देने का मतलब यह था कि सड़क गंदगी न हो। लेकिन इन सबके पीछे मुख्य कारण अपने वर्ण को सर्वश्रेष्ठ साबित करना था।

आंबेडकर ने अपनी आपबीती बताते हुए लिखा है कि कैसे  उनके साथ बचपन से लेकर नौकरी के समय तक छुआछूत किया जाता था। जहां बचपन में उन्हें स्कूल में अन्य बच्चों के साथ बैठने नहीं दिया जाता था और दिनभर उन्हें प्यासा रखा जाता था। जब उनकी नौकरी वडोदरा में लगी तो वहां नौकर उन्हें फाइल्स फेंक कर देता था और दिनभर प्यासा रखा जाता था। किताब में उन्होंने विभिन्न प्रकार के आंदोलन का जिक्र किया जिसमें सबसे महत्वपूर्ण महाड़ सत्याग्रह था। इसमें उन्होंने गांव के शूद्र जाति के लोगों के साथ जाकर तालाब के पानी को पिया और आचमन किया। किताब में एक मंदिर, एक कुंआ की बात लिखी हुई है। यह बात दर्शाती है कि कैसे निम्न जाति के लोगों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता था।

किताब में केवल जाति व्यवस्था जैसी कुरीति पर जमकर कटाक्ष किया गया है। इस किताब में पूना पैक्ट 1932 के बारे में जिक्र किया गया है। यह समझौता महात्मा गांधी और आंबेडकर के बीच हुआ था। इस समझौते में आंबेडकर ने महात्मा गांधी की बात मानी और "Depressed class" (दमित वर्ग) को चुनाव में दिए जाने वाले आरक्षण को वापस ले लिया। इससे आंबेडकर दुखी हुए क्योंकि वे दलितों को उनका हक दिलाना चाहते थे। इस किताब में कई संदर्भ दिए गए हैं जब आंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच तीखी बहस होती थी। महात्मा गांधी  अपने समाचार पत्र हरिजन में जाति व्यवस्था पर लेख लिखते थे। इन्हीं लेखों की आलोचना आंबेडकर पत्र व्यवहार के माध्यम से करते थे। इस पत्र का जवाब महात्मा गांधी भी मूकनायक में प्रकाशित लेख को आधार बनाकर देते थे। आंबेडकर अनुसूचित जाति वर्ग के लोगों को "Depressed class" कहते थे जबकि महात्मा गांधी हरिजन शब्द का उपयोग किया करते थे। इस किताब से स्पष्ट होता है कि कहीं न कहीं अनुसूचित जाति को अधिकार प्राप्त न होने के पीछे महात्मा गांधी को जिम्मेदार मानते थे।

आंबेडकर ने जहां अपनी किताब में आर्य समाज और स्वामी दयानंद सरस्वती की तारीफ की है। इसके अलावा उन्होंने राजा राममोहन राय की तारीफ की है क्योंकि उन्होंने समाज को कुरीतियों से मुक्त कराने लिए बहुत से काम किए। आंबेडकर ने दूसरी ओर हिन्दू धर्म में व्याप्त कुरीतियों छुआछूत, बाल-विवाह, सती प्रथा, अंतर जातीय विवाह पर प्रतिबंध के मामले पर जमकर लताड़ लगाई। किताब में डॉ आंबेडकर ने तो यहां तक लिख दिया कि हिन्दू धर्म की जाति व्यवस्था की वजह से भारत में अन्य धर्मों में जाति व्यवस्था के बीज फूट पड़े हैं। किताब में एक जगह यह भी लिखा है कि जातिवाद और वर्ण व्यवस्था का आरोप मनु पर नहीं लगा सकते हैं क्योंकि उसने तो जाति की एक व्यवस्था तैयार की थी

अपनी किताब में डॉ आंबेडकर ने विदेशी लोगों को भी नहीं छोड़ा उन्होंने उनकी भी जमकर खिंचाई की। रंगभेद में उनसे आगे कोई नहीं है। वे काले और गोरे में भेद करते हैं। ऐसा कहना था डॉ बाबासाहेब आंबेडकर का।
आपत्ति:- डॉ आंबेडकर ने जाति व्यवस्था जैसी कुरीति को केवल हिन्दू धर्म के साथ जोड़ा जबकि यह आधा सत्य है। अन्य धर्मों में भी जाति और वर्गों की प्रधानता है। ईसाई धर्म कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट, एवनजीलक, आर्थोडॉक्स आदि शाखाओं में बंटा हुआ है। इन सभी के अलग-अलग चर्च होते हैं और ये एक-दूसरे के चर्च में नहीं जाते। यही हाल मुस्लिम धर्म का भी है। बौद्ध धर्म भी मुख्यतया दो भागों में विभाजित है हीनयान और महायान। जातिवाद का सारा दोष हिन्दू धर्म पर मढ़ना गलत है। 
एक बार जरूर इस किताब को पढ़ें और निष्कर्ष पर पहुंचें।
BY_vinaykushwaha

रविवार, 11 नवंबर 2018

"अवनी" पर राजनीति क्यों?

"कोई बाघ आदमखोर खुद से नहीं बनता है बल्कि उसे मजबूरी में आदमखोर बनना पड़ता है।" यह पंक्ति है मशहूर बाघ संरक्षक जिम कार्बेट की। जिम कार्बेट को बाघों का संरक्षक कहा जाता है। जिम के साथ एक विरोधाभास जुड़ा हुआ है कि उन्होंने 33 बाघ-बाघिन को मारा था। इनमें मैन ईटर ऑफ कुमाऊं भी शामिल है। इस मैन ईटर ने 435 आदमियों को मारा था। अपनी किताब मैन ईटर ऑफ कुमाऊं में उन्होंने इस बात का जिक्र किया था। जिम की छवि एक अच्छे व्यक्ति के रुप में है क्योंकि उन्होंने आदमखोरों के आतंक से मुक्ति दिलाई थी। लेकिन बाद में उन्होंने बंदूक की जगह कलम को उठा लिया था। वे इस बात से वाकिफ थे कि हिमालय में बाघों की संख्या कम होने का मतलब है कि पारिस्थितिकी तंत्र में गड़बड़ी होना है। जिम कार्बेट लेखक और दार्शनिक भी रहे हैं। उन्हीं के नाम पर उत्तराखंड के राष्ट्रीय पार्क का नाम जिम कार्बेट नेशनल पार्क है। इसी नेशनल पार्क से प्रोजेक्ट टाइगर मिशन की शुरुआत की गई थी।

तारीख 2 नवंबर 2018 सभी को वैसे तो पता होगी लेकिन यह एक ऐसा दिन जिस दिन से सभी को पशुओं के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया है। लोग अब यह भी सोचने लगे हैं कि जानवरों को क्यों मारा जा रहा है। मैं बात कर रहा हूं बाघिन 'अवनि' की। कई लोग बाघिन अवनि को अवनी लिख रहे हैं। इस बाघिन का अाधिकारिक नाम टी-1 है। बाघिन अवनी को मार दिया गया। अवनी पर आरोप था कि उसने दो सालों में 14 लोगों की जान ली है। अवनी को मारने के लिए बकायदा वन विभाग से 100 लोगों की टीम को तैयार किया गया। पांढरकवड़ा के जंगल में बाघिन को खोजने के लिए गोल्फर ज्योति रंधावा के खोजी कुत्तों को बुलाया गया। पेड़ों आदि पर कैमरों का कड़ा पहरा लगा दिया गया। बाघिन को चारा देने के नाम पर नकली भेड़-बकरियों को बांधा गया। अमेरिकी से विशेष प्रकार का इत्र मंगाया गया ताकि बाघिन आकर्षित होकर जल्द से जल्द घने जंगलों से निकलकर खुले मैदान में आ जाए।

सारे जाल बिछा दिए गए बस अब बाघिन का फंसना बाकी  था। बाघिन आई और जाल में फंस गई। हैदराबाद से शार्प शूटर शाफत अली खान को बुलाया गया था। शाफत के पास एक लंबा अनुभव था कि कैसे जानवर को मारा जाता है। उनके दादा भी यही काम करते थे। वन विभाग के अनुसार शाफत को मुख्य रुप से बाघिन को ट्रैंकुलाइज  करने के लिए बुलाया गया था। अवनी जैसे ही थोड़े खुले हिस्से में आई तो उसे पहले ट्रैंकुलाइज गन से टैंकुलाइज्ड किया गया फिर उसे 10 मीटर दूर से पिछले हिस्से में गोली मार दी गई। आखिरकार आदमखोर बाघिन का अंत हो गया। यह बाघिन अवनी की दुखद अंत की कहानी है।

असली कहानी तो अवनी की मौत के बाद शुरू होती है। अवनी की मौत के बाद कई पशुप्रेमी और राजनेता सामने आए और उन्होंने जमकर इस बात का विरोध किया की अवनी की हत्या की गई है। अवनी की मौत से पहले कई पशु प्रेमियों और एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका देकर अवनी पर दया दिखाकर जीवनदान की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने दया याचिका को यह कहते हुए नकार दिया था कि चीफ लाइफ वार्डन ने यह स्वीकार किया है कि अवनी पर कार्रवाई जरुरी है। अब आते हैं राजनीति पर। केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने महाराष्ट्र के सीएम देवेन्द्र फडणवीस को पत्र लिखकर महाराष्ट्र के वन मंत्री सुधीर मुनगंटीवार को बर्खास्त करने की मांग की। आपको यहां बताते चलें कि मेनका गांधी की छवि एक पशु प्रेमी की है, वे कई सालों से पशुओं के संरक्षण में काम  रही हैं। मेनका गांधी शायद भूल गई थी कि केन्द्र में उनकी सरकार और महाराष्ट्र में एनडीए नीत सरकार फिर पत्र की औपचारिकता क्यों? इसके बाद सुधीर मुनगंटीवार ने उल्टा मेनका गांधी पर आरोप लगाते हुए कहा कि वे भी तो फर्जी बाबा के पास जाती हैं। मुझे नहीं लगता है कि इतने संवेदनशील मुद्दे पर ऐसी बात उछालने की जरूरत थी।

बात यदि महाराष्ट्र की हो और शिवसेना का जिक्र ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता। शिवसेना ने सरकार पर आरोप मढ़ दिया की सरकार ने अवनी की हत्या की है। मनसे भी कहां पीछे रहने वाली थी। राज ठाकरे ने अवनी पर बयान दे दिया। सबसे आखिर में एंट्री हुई कांग्रेस की। मुंबई से पूर्व सांसद संजय निरुपम ने इस सारे मामले को हगणदारी प्रथा से जोड़ दिया। हगणदारी प्रथा, महाराष्ट्र में खुले में शौच मुक्त करने के अभियान से जुड़ा है। संजय निरुपम ने हगणदारी प्रथा का जिक्र इसलिए किया क्योंकि वे बताना चाहते थे कि चंद्रपुर में जंगल में शौच करने गई महिला को बाघ ने मार दिया। अब बात अवनी की मौत से हगणदारी तक पहुंच गई। इस पर महाराष्ट्र के वन मंत्री सुधीर मुनगंटीवार कहते हैं कि अवनी की मौत पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। अरे साहब असली राजनीति की शुरुआत तो आपने ही की थी।

11 नवंबर को 168 संस्थाओं ने कैंडल मार्च निकालकर बाघिन अवनी की मौत का विरोध किया। यह कैंडल मार्च मात्र दिखावा नहीं बने। इस बात की बेहद अहमियत है कि पर्दे के पीछे की सच्चाई क्या है? बात यह है कि बाघिन को मारने के बाद उसे नागपुर ले जाया गया जहां उसे डॉक्टर ने मृत घोषित कर दिया। पोस्टमार्टम में यह पता चला कि उसके पिछले भाग पर गोली मारी गई थी। ऑटोप्सी करने के बाद पता चला कि अवनी ने 4-5 दिनों से कुछ खाया ही नहीं था क्योंकि उसके पेट में गैस और तरल पदार्थ भरा हुआ था। इसके अलावा उसके शरीर में नमी की कमी पाई गई और इंसानी मांस का कहीं कोई जिक्र नहीं हुआ। अवनी तो चली गई लेकिन अपने कई राज छोड़ गई।

बाघ और जंगली जानवर इतने आक्रामक क्यों रहे हैं? इसका सीधा सटीक कारण है अतिक्रमण। इंसान अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए वन्य जीवों के क्षेत्र में अतिक्रमण कर रहा है। खेती और आवास के लिए जंगलों का सफाया किया जा रहा है। नेशनल पार्क और अभ्यारण्यों में वन्यजीवों के आवास को छेड़ा जा रहा है। इन सबसे वन्यजीवों की इंसानी बस्ती में चहलकदमी बढ़ गई है। इन सबका नतीजा सबके सामने है। हमारे संविधान के भाग-4 में राज्य के नीति निर्देशक तत्वों का जिक्र किया है। अनुच्छेद 48(क) में जिक्र है कि पर्यावरण और वन्यजीवों का राज्यों द्वारा संरक्षण और संवर्धन किया जाएगा। मैं राज्यों से पूछना चाहता हूं कि अवनी की तरह? यह हमारा भी व्यक्तिगत दायित्व बनता है कि हम अपने पर्यावरण और वन्यजीवों को संरक्षित और संवर्धित करें।

अब सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे देश का कानून क्या कहता है? क्या अवनी को मारना सही है? महाराष्ट्र वन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार बताया गया कि उन्हें राष्ट्रीय व्याघ्र संरक्षण प्राधिकरण से अवनी पर कार्रवाई की इजाजत प्राप्त थी। भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अनुसार बाघिन अवनी की हत्या नहीं हुई है। उसे मारना सही है। अधिनियम कहता है कि यदि कोई बाघ आदमखोर हो चुका है, गंभीर बीमारी से ग्रस्त है या किसी अन्य कारण को लेकर चीफ लाइफ वार्डन तय कर सकता है कि बाघ को मारा जाए या नहीं। चीफ लाइफ वार्डन ही तय करता है कि उसे बेहोश किया जाए, स्थानांतरित किया जाए या गोली मार दी जाए। हमारा कानून यह भी कहता है कि आत्मरक्षा के लिए आप बाघ को मार सकते है और इसके साथ ही यदि वह सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है तो उसे मारा जा सकता है। यह है हमारा कानून। वन विभाग की टीम ने आत्मरक्षा का तर्क देते हुए बाघिन पर गोली चलाई थी। कई पशु प्रेमियों का कहना है कि यह गलत है कि उस पर गोली चलाई गई यदि आत्मरक्षा के लिए गोली चलाई गई होती तो गोली बाघिन के पिछले हिस्से की जगह अगले हिस्से में लगती।

अवनी चली गई। अपने पीछे कई सवाल छोड़ गई और बहस के लिए विषय भी। अवनी अपने पीछे दो नन्हें बच्चे भी छोड़ गई जिनका ध्यान रखना हमारा दायित्व है।

📃BY_vinaykushwaha

रविवार, 28 अक्टूबर 2018

बात केवल जमाल खाशोगी की नहीं है....



प्राचीनकाल में एक राजा अपना संदेश  दूसरे राजा  तक पहुंचाने के लिए अपना दूत भेजता था। दोनों राजाओं में भले ही कितनी भी शत्रुता हो लेकिन दूत को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुंचाई जाती थी। किसी भी प्रकार से दूत को नुकसान नहीं पहुंचाया जाता था। दूत को संदेशवाहक या मैसेंजर के रूप में देखना ठीक होगा। ये मैसेंजर समाचार और जानकारी को एक राज्य से दूसरे राज्य तक पहुंचाते थे। सामान्य जानकारी से लेकर युद्ध जैसी विध्वंस जानकारी भी पहुंचाई जाती थी। आज के दौर में दूत पत्रकार का रूप धारण कर चुके हैं। पत्रकार एक ऐसा प्राणी होता है जो कि दुनिया के सामने खबर को लेकर आता है।

पत्रकार का काम केवल खबरों को सबके सामने लेकर आना बस नहीं है। जो खबर वह लेकर आता है उसका विश्लेषण करना है और नफा-नुकसान के बारे में लोगों को अगाह करना है। पहले जहां पत्रकार स्वतंत्र होकर अपनी पत्रकारिता को अंजाम देते थे वही आज विभिन्न संगठनों से जुड़कर समाचारों का आदान-प्रदान किया जाता है। इस समय खबरों का दायरा बढ़ गया है और विविधता भी आई है। इसी कारण पत्रकारिता करने के तौर-तरीके भी बदले हैं। जहां पहले पत्रकारिता केवल समाचारपत्रों तक सीमित थी वही आज इसका दायरा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रिंट मीडिया, डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया तक फैल चुका है। एक बात जो पुराने समय से आजतक नहीं बदली है वह जान का खतरा।

पुराने समय में जहां लेख लिखने पर सरकार आपको जेल में डाल देती थी क्योंकि उसमें सरकार और उनके नेताओं की आलोचना होती थी। आपातकाल के समय सरकार ने कुछ इसी तरह का काम किया था। प्रेस सेंसरशिप लागू कर दी थी‌। पत्रकारों को सरकार के अनुरूप लिखना पड़ा था। जिन पत्रकारों ने इसके खिलाफ आवाज उठाई उनकी कलम की नोंक को तोड़ दिया गया। साल 1977 की तुलना वर्नाकुलर प्रेस एक्ट से करना बाजिव होगा। अंग्रेजी हुकूमत ने अखबारों को केवल इंग्लिश में लिखने की इजाजत दी थी। इंग्लिश में लिखने की इजाजत मतलब यह था कि किसी अन्य भारतीय भाषा में लिखने से आपको गैर-कानूनी समझा जाता था। इस पूरे वर्नाकुलर प्रेस एक्ट का सार यह था कि तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत ने पत्रकारिता में अन्य भाषाओं पर बैन इसलिए लगाया था ताकि वे ब्रिटिश सरकार के खिलाफ छापी जा खबरों पर नियंत्रण लगाया जा सके। इंग्लिश में लिखने से किसी भी गंभीरता को जल्दी से पकड़ा जा सकता था।

इसी एक्ट के कारण कई अखबारों ने खुद को रातों-रात स्थानीय भाषा से इंग्लिश में बदल लिया। इन अखबारों में बंगाल का अमृतबाजार पत्रिका शामिल है। अमृतबाजार पत्रिका ने इंग्लिश में लिखने के बावजूद आलोचना करना नहीं छोड़ा।  दो सम्पादकीय  'टु हूम डज इण्डिया बिलांग?'  और 'अरेस्ट ऑफ मिस्टर गांधी : मोर आउटरेजेज? इंग्लिश में छपे। इन्हीं सम्पादकीय के कारण समाचार पत्र की सम्पादकीय फीस जब्त कर ली गई। इस तरह पत्रकारिता ने अपना जीवन जिया है। इस घुटन भरे समय में पत्रकारिता करना दुष्कर था पता चलता है। 1878 और 1977 में 99 साल का अंतर है लेकिन बात वहीं की वहीं है। तब भी सत्ता डरती थी और आज भी डरती है। साल 1878 में किसी तरह का कोई तंत्र नहीं था लेकिन 1977 में लोकतंत्र होने के बावजूद पत्रकारिता राजतंत्र में जी रही थी।

भारत में आपातकाल लागू हुए 41 साल हो चुके हैं और आज भी पत्रकारिता का भय काल बनकर सत्ता को डराता है। आज भी कई ऐसे मामले सुनने में आते हैं जो कि डरा देने वाले होते हैं। पत्रकारों को जान से मारा जा रहा है। राजदेव रंजन हत्याकांड एक बेहद ही चौंका देने वाला हत्याकांड रहा है। इसने न केवल पत्रकारिता का गला नहीं घोंटा बल्कि पत्रकारिता को तिल-तिलकर मरने पर मजबूर किया। समाचार का सार न बताने पर इस तरह मारना वीभत्सता है। इन सबमें सबसे बड़ी बात यह है कि राजनेताओं का इन सब में हाथ होना है। इसी साल की खबर है जब जून 2018 में  शुजात बुखारी की हत्या कर दी गई। शुजात अंग्रेजी अखबार 'राइजिंग कश्मीर' के प्रधान संपादक थे। उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई। वे कश्मीर में स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा देने और शांति बहाल करने में लगे हुए थे। इस बात से किसको दिक्कत होगी कि वे इस तरह का एक शानदार काम रहे थे।

पत्रकारों की जमात में कुछ जयचंद भी होते है जो आसमान में कलंक की तरह होते हैं। शासन और प्रशासन की चाटुकारिता में तल्लीन होते हैं ताकि अपनी साख बनाए रखें और लंबी पारी खेल सकें। कुछ पत्रकार अडिग होते जो किसी लालच के बिना काम करते हैं। इन्हीं पत्रकारों पर सबसे ज्यादा मुसीबतें आती है। पत्रकारों का काम केवल अब खबरों का प्रकाशन मात्र नहीं रह गया है। इन सबसे आगे खबरों पर चर्चा और विश्लेषण एक बड़ा भाग बन चुका है। इसमें भी सरकार को समस्या है। इसी समस्या के कारण कुछ टीवी चैनलों को परेशान किया जा रहा है। पत्रकारों और संपादक को चैनल से बाहर निकलवाया जा रहा है। चैनलों पर एक अजीब तरह की सेंसरशिप लगी हुई है जिसमें लोग काम कर रहे हैं। जीवन जीने का माध्यम बन चुकी पत्रकारिता अब भी जीवंत है। सरकार के मन मुताबिक काम न करने पर चैनल को ब्लैक आउट करने की परंपरा बन गई है। यह कितना सही है और गलत यह समझने में किसी को देर नहीं लगेगी।

जर्मनी की एक प्रसिद्ध पत्रिका 'शार्ली एब्दो' पर आतंकियों ने 2015 में हमला कर दिया। इस हमले ने 12 लोगों की जान ले ली। इल्जाम लगा अलकायदा पर। पत्रिका की गलती केवल इतनी थी कि उसने व्यंग्य के लिए मोहम्मद साहब का कार्टून बना दिया। इससे घबराए लोगों ने पत्रिका के ऑफिस हमला बोल दिया। यह कितना सही है कि आपको जो अच्छा न लगे उसे हटा दें। विकल्प हमेशा मौजूद हैं। पाकिस्तान में ईशनिंदा के नाम पर जाने कितने पत्रकार भेंट चढ़ गए। कुछ साल पहले बांग्लादेश में ब्लॉगर्स का कत्ल-ए-आम चल रहा था। इस कत्ल-ए-आम में उन ब्लॉगर्स को निशाना बनाया गया जो कि सरकार के खिलाफ लिख रहे थे। इन ब्लॉगर्स को अपनी जान देकर पत्रकारिता का धर्म निभाना पड़ा।

दुनिया भर में इस तरह के किस्से हैं। चीन एक ऐसा देश है जहां सरकार तय करती है कि मीडिया में किस तरह का कंटेंट जाएगा। एक बार बीजिंग एयरपोर्ट पर एक बम ब्लास्ट हुआ जिसकी खबर कई घंटों तक मीडिया में नहीं आ पाई उसका कारण यह था कि यदि यह खबर मीडिया में आ जाती तो सरकार पर सुरक्षा लिहाज से अंगुली उठती। इसके अलावा चीन में केवल मेनस्ट्रीम मीडिया पर ही नहीं बल्कि सोशल मीडिया और माइक्रोब्लॉगिंग साइट पर भी कड़े प्रतिबंध लगाकर रखें गए हैं। इन प्रतिबंधों का कारण है कि लोगों पर निगरानी रखना है। चीन के पश्चिमी प्रांत शिंजियांग में उइगुर मुस्लिमों पर अत्याचार के किस्से जगजाहिर है। इसी साल चीन ने चार पत्रकारों को चीन का वीजा नहीं दिया। वीजा न देने का कारण था वे शिंजियांग प्रांत जाकर वहां की ग्राउंड रिपोर्ट करना चाहते थे। इन चार पत्रकारों में भारतीय मूल की अमेरिकी पत्रकार मेघा राजगोपालन भी थी।

मिस्त्र की क्रांति के समय कई पत्रकारों को इजिप्ट आने से रोक दिया गया था। इन पत्रकारों में सबसे कड़वा अनुभव अल-जजीरा का है। इसका कारण यह था कि अल-जजीरा ने कई सच को उजागर किया था। अल-जजीरा हमेशा से निशाने पर रहा है। चाहे अमेरिका हो या मध्य-पूर्व उसे सभी ने हाथोंहाथ लिया है। अल-जजीरा को तो अपना अमेरिका स्थित ब्यूरो ऑफिस ही बंद करना पड़ा। कतर का यह चैनल दुनिया भर में मशहूर है कारण साफ है पत्रकारिता की धार। कतर पर 2017 में छह मध्य पूर्व के देशों ने प्रतिबंध लगाए थे और राजनयिक संबंधों को तोड़ने के साथ-साथ अल-जजीरा पर भी प्रतिबंध लगा दिया था।

पत्रकारिता जगत को इस साल की सबसे बड़ी दुर्घटना का सामना करना पड़ा। जमाल खाशोगी की हत्या। जमाल सउदी अरब मूल के अमेरिकी पत्रकार थे। उन्हें केवल इसलिए मरवा दिया गया क्योंकि वे शाही परिवार की आलोचना कर रहे थे। परिवार के गलत निर्णयों के खिलाफ लिख रहे थे। लिखने की सजा उन्हें जान गवांकर  देनी पड़ी। सबसे बड़ी बात यह है कि उनकी हत्या न तो अमेरिका में हुई और न तो सउदी अरब में हुई। उनकी हत्या तुर्की में सउदी अरब के दूतावास में हुई। उनकी हत्या से पत्रकारिता जगत स्तब्ध है। सउदी अरब और तुर्की दोनों हत्या पर राजनीति कर रहे हैं। हत्या का इल्जाम सउदी अरब पर जा रहा है क्योंकि जब जमाल ने सउदी दूतावास के अंदर गए तो दुबारा नहीं लौटे। यहां तक उनका शव भी नहीं मिला। ऐसा तो कभी हो नहीं सकता कि तुर्की को इस हत्या के बारे में जानकारी न हो। उसके देश में दो प्राइवेट प्लेन से हत्यारे आते हैं और हत्या करके चले जाते हैं। इसका पता तुर्की को न हो ऐसा तो हो ही नहीं सकता ।

अब यह मुद्दा केवल जांच का नहीं रह गया है। यह मुद्दा पत्रकारिता और पत्रकारों को बचाने का भी है। आने वाला समय किसने देखा है परंतु पत्रकारिता जीवित रहे यह मेरी आस है।

📃BY_vinay Kushwaha

गुरुवार, 18 अक्टूबर 2018

इलाहाबाद और भी हैं...

भारत एक शानदार देश है। इसकी महानता इसकी विशालता और विविधता से दिखाई पड़ती है। भारत कोई एक झटके में बनने वाला देश नहीं है। इसने कई उतार-चढ़ाव देखें हैं। भारत का नाम शकुंतला के पुत्र भरत के नाम पड़ा। भारत को और भी अनेक नामों से जाना जाता था और है। इन नामों में आर्यावर्त, जम्बूद्वीप जैसे नाम हैं। भारत को भारत आज कितने लोग बोलते हैं? यह सवाल  नहीं बल्कि भारत सरकार के लिए एक बड़ा सवाल है। अंग्रेजों के आने के बाद भारत इंडिया बन गया। वास्कोडिगामा ने भारत की खोज नहीं की थी बल्कि इंडिया की खोज की। भारत को उसके बाद से इंडिया नाम से नाम भी जाना जाने लगा। आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत इंडिया है न कि भारत। यह हमारी बिडंबना है कि भारत, भारत में है और भारत से बाहर इंडिया। हमारे देश के कुछ अंग्रेजीदां लोग भी भारत की एवज में इंडिया ही बोलते हैं।

नामकरण संस्कार सोलह संस्कारों में से एक महत्वपूर्ण संस्कार है। जब बच्चा बड़ा होने लगता है तो उसे नाम की जरूरत होती है। नामकरण संस्कार इसी का कारण किया जाता है। इसी तरह किसी देश, राज्य और शहरों का नामकरण किया जाता है। किसी भी जगह का नामकरण उसके इतिहास, भूगोल, राजनैतिक कारण, व्यक्तिगत योगदान आदि पर निर्भर करता है। ताजा विवाद इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज रखने को लेकर है। इलाहाबाद उत्तरप्रदेश का एक महत्वपूर्ण शहर है।  इसका इतिहास कई दशकों का नहीं बल्कि कई युगों का है। यहां मनु के वंशज पुरुरवा एल का उल्लेख मिलता है। उत्तर प्रदेश सरकार ने यह कहते हुए नाम बदल दिया कि इलाहाबाद का पुरातन काल से नाम प्रयागराज ही था। एक और कारण बताया कि क्या आपका(मनुष्य) एक बार नामकरण करने बाद नाम बदला जाता है? नहीं बदलते तो फिर शहर का नाम क्यों? इसके अलावा इलाहाबाद का इतिहास भी हवा में तैर गया कि इसका नाम अकबर ने इलाहाबाद में बदल दिया था। इलाहाबाद का अर्थ निकाला गया कि अल्लाह का आबाद किया हुआ।

आज मैं एक लेख पढ़ रहा था जिसमें इलाहाबाद का नाम प्रयागराज करने को लेकर कटाक्ष किया गया था कि इलाहाबाद का अर्थ अल्लाह का आबाद शहर नहीं है। इसका कुछ और ही अर्थ होता है। उस लेख में इलाहाबाद का संबंध मनु की बेटी इला से जोड़ा गया। उसमें यह बताया गया कि इलाहाबाद का पहले नाम इलावास था। इलावास बाद में इलाहाबाद बन गया।

नाम बदलने की परंपरा कोई नहीं है। इसमें राजनीतिक प्रभाव ज्यादा रहा है। भारत में शहरों से लेकर राज्यों तक के नामों को बदला गया है। अंग्रेजों के समय मुंबई का नाम बॉम्बे था जो बाद में बंबई हो गया और आखिरी में मुंबई रखा गया। मुंबई रखने पीछे कारण दिया गया मुंबा देवी। मुंबा देवी के नाम पर मुंबई का नामकरण किया गया। केवल मुंबई ही नहीं और भी कई ऐसे शहर है जिनके नाम बदले गए। लोगों की भावना को बरकरार रखने के लिए तुष्टिकरण के लिए आदि। कोलकाता का पुराना नाम कलकत्ता था। कलकत्ता नाम अंग्रेज उपयोग किया करते थे। मद्रास का नाम चेन्नई किया गया। बंगलौर से बंगलुरू हो गया, त्रिवेंद्रम से तिरूवनंतपुरम हो गया, मैसूर , मैसूरू हो गया, पूना से पुणे हो गया। यह सब कुछ एक रात में नहीं हुआ। इन सबके पीछे बात यह थी कि अंग्रेजों की सोच को पीछे छोड़ना चाहते थे। लेकिन हमारे साथ दिक्कत है कि हम भावनाओं में बह जाते हैं।

इससे पहले गुड़गांव का नाम गुरुग्राम करने पर खूब विवाद हुआ लेकिन आखिरकार नाम बदल दिया गया। अब सवाल यह उठता है कि क्या बाकि शहरों का नाम भी बदला जाएगा। मथुरा को मधुपुर कहा जाएगा? कानपुर को कर्णनगरी? लखनऊ को लक्ष्मणावती? कर दिया जाएगा? इस सारे विवाद में वे शहर भी शामिल हैं जो अपने पुराने नामों से पहचाने जाने चाहिए। अजमेर को अजयमेरु, जैसलमेर को जैसलमेरु, अहमदाबाद को कर्णावती, भोपाल को भोजपाल, हैदराबाद को भाग्यनगर, इंदौर को इंदुर, भुवनेश्वर को बिंदु सरोवर, मेरठ को मयराष्ट्र, जबलपुर को जबआलीपुरम, दमोह को तुंडीकेर कर देना चाहिए। क्या यह संभव है? परंपरा और पुरातन व्यवस्था के आधार पर नाम बदलना कहां तक उचित है। क्या सरकार में हिम्मत है कि वह दिल्ली का नाम इंद्रप्रस्थ और पटना का पाटिलीपुत्र करके दिखाए।

राज्यों का नाम भी समय-समय पर बदला गया। उत्तरांचल को उत्तराखंड कर दिया। उड़ीसा को ओडिशा कर दिया। क्या असम का नाम भी प्रागज्योतिष रखा जाएगा? महाभारत में असम का उल्लेख प्रागज्योतिष‌ के नाम से मिलता है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ का रामायण में दंडकारण्य के नाम से उल्लेख मिलता है।

सरकार को नाम बदलने से बढ़िया है कि काम करें। लोगों का हित देखे। लोगों के जीवन में समृद्धि आए ऐसे काम करें। नाम बदलना सरकार काम नहीं है। जब जनता चाहेगी तब नाम बदल जाएगा। सरकार को नामकरण को ट्रेंड नहीं बना लेना चाहिए। छत्तीसगढ़ सरकार की तरह नया रायपुर का बदलकर अटल नगर कर दिया। इतिहास गवाह है कि सत्ता जिसके हाथ में रही है उसने अपने पूर्व की सत्ता की बातों को पलटा है। 

पुराने समय से लेकर आज तक इतिहास उठाकर देखिए एक शहर कितने नामों से जाना गया है। एक शहर के कम से कम दो नाम जरुर मिलेंगे। जब मुस्लिम आक्रमणकारी आए तो उन्होंने अरबी और फारसी वाले खूब नामकरण किए। लगभग सारे बाद वाले शहर इन्हीं की देन है। मुगलों के बाद अंग्रेज,डच, फ्रांसीसी, पुर्तगाली आए तो इन्होंने अपनी भाषा में शहर का नाम रखा। इसके बाद सुविधानुसार शहर का नाम बदलते गए और शहर भी।

📃BY_vinaykushwaha

शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

अटल सोचते होंगे



  

भारतीय राजनीति में सत्ता पाना मात्र लक्ष्य नहीं होता बल्कि उस सत्ता का किस तरह अच्छी तरह उपयोग करें, इसका ज्यादा मतलब होता है। गन्ने का रस बेचने वाला गन्ने को मशीन में तब तक ड़ालता है जब तक कि उसका सारा रस न निकल जाए। नेता भी कुछ इसी तरह के होते हैं वे सत्ता पाने के बाद उन सभी दांव-पेंच का उपयोग करते हैं जो उन्हें दुबारा सत्ता में लाने के लिए काफी हो। सत्तासीन नेतागण यह भी देखते हैं कि सत्ता का इस्तेमाल करने से वे किसी मामले में पीछे न रह जाएं। भारत की राजनीति में अनेक ऐसे उदाहरण देखने को मिलते हैं जहां सत्ता का दोहन इस हद तक किया गया कि राजनीति भी कराहने लगी।

सत्ता में आने वाली सरकार अपने पिछली सरकार से आगे निकलने की होड़ में रहती है। हमेशा ऐसा लगता सरकार जनता के बारे में चिंतामणि बनी हुई है। सरकार नई-नई योजनाओं को लेकर आती है ताकि लोगों को राहत और सहूलियत दी जा सके। इन सबके विपरीत चलता कुछ और ही है। सत्ता में आई सरकार ऑक्टोपस की तरह हो जाती है जो छद्म भेष धारण करने में माहिर होती है। पुरानी सरकार की योजनाओं को नए नाम के साथ पेश किया जाता है। जैसे बासी चावल को जीरा और प्याज का छौंक लगाकर परोस दिया गया हो। भारत में एक बड़ी समस्या नामकरण भी है।

नामकरण, जी हां। नया ब्रिज हो या सरकारी इमारत, नया हॉस्पिटल हो या सड़क सभी नामकरण की राजनीति का शिकार हुए हैं। सड़क का नाम बदलकर किसी नए नाम के साथ जोड़ देना हो या योजना में नाम बदलकर नया नाम रखना हो। कांग्रेस जब तक सत्ता में रही उसने खूब नामकरण किया अपने नेताओं को सम्मान देने के बहाने से योजनाओं, इमारतों, सड़क और बाग-बगीचों के नामकरण में कोई कमी नहीं छोड़ी है। जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी आदि का जमकर इस्तेमाल किया। सरकारी योजनाओं के नाम पर अपने नेताओं का प्रमोशन करते रहे हैं। एयरपोर्ट हो या बस अड्डा सभी को राजनीतिक रंग में रंगने की पुरजोर कोशिश की है।

यह तो अच्छी बात है कि 2016 में एक नियम लागू किया गया कि अब से किसी भी एयरपोर्ट का नाम किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं होगा। एयरपोर्ट के नामकरण के मामले में बीजेपी कही पीछे छूट गई। कांग्रेस ने यहां भी झंड़े गाड़े हैं। साल 2016 में लागू नियम में एक पेंच है जिसमें यह कहा गया है कि किसी भी एयरपोर्ट का नाम किसी भी व्यक्ति विशेष पर नहीं हो सकता लेकिन उसके टर्मिनल का नाम व्यक्ति विशेष पर हो सकता है। यह राजनीति का असली खेल होता है।

मोदी सरकार 2014 में आने के बाद उसने कई योजनाओं, रेलवे स्टेशन, सड़कों के अलावा बीजेपी ने शहरों तक के नाम बदल ड़ाले। बैंगलोर को बंगलुरू, मैसूर को मैसूरू, गुड़गांव को गुरूग्राम कर दिया गया। बीजेपी की सबसे ज्यादा किरकिरी गुड़गांव को गुरूग्राम करने पर ही हुई थी। उड़ीसा का नाम ओडिशा हो गया। सबसे ज्यादा विवादित रहा मुगलसराय जंक्शन का नाम बदलना। बीजेपी का कहना था कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय का देहांत इसी जगह हुआ था। इस कारण स्टेशन का नाम बदलकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन कर दिया गया है। वजह जो भी हो नाम तो बदल चुका है।

इस मामले में क्षेत्रीय पार्टियां भी पीछे नहीं रही हैं। शिवसेना ने मुंबई का नाम बॉम्बे और बम्बई से मुंबई कराकर ही दम लिया। इसके अलावा केरल की राजधानी त्रिवेन्द्रम से तिरूवनंतपुरम और कोचीन , कोच्चि हो गया। तमिलनाडु में आते हैं तो आज की राजधानी चेन्नई का पहले नाम मद्रास हुआ करता था। पश्चिम बंगाल की राजधानी 2001 में नाम बदलकर कलकत्ता से कोलकाता कर दिया गया। इसके पीछे कारण यह था कि यह बंगाली में इसका उच्चारण कोलकाता है। ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की सत्ता में आने के बाद पश्चिम बंगाल का नाम हिंदी, इंग्लिश और बंगाली में अलग-अलग रखने की कोशिश की। इसके लिए ममता ने केन्द्र को प्रस्ताव भी भेजा गया लेकिन केन्द्र सरकार ने मना कर दिया।

बसपा सुप्रीमो और उत्तरप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने तो सबसे आगे जाते हुए कई पांसे चल दिए। उन्होंने उत्तर प्रदेश को तीन बांटने का प्रस्ताव केन्द्र सरकार को भेजा था जिसे सरकार ने इंकार कर दिया था। इसके अलावा उन्होंने कई जिलों का निर्माण किया जिनका कांशीराम नगर, संत कबीर नगर, अंबेडकर नगर आदि नाम रखा गया।

हमारे देश की राजनीति में एक और काम पूरी श्रद्धाभाव से किया जाता है। नेताओं की समाधि का निर्माण कार्य। जवाहर लाल नेहरू से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक जिस तरह समाधि निर्माण किया गया उससे यही प्रतीत होता है कि यह महिमा मंडन ही है। आजादी के बाद 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी का निधन हुआ तो उनके आदर्शों और संस्कारों के साथ उनका समाधि निर्माण रामघाट नाम से किया गया। इसके पीछे कारण था कि वे अंतिम समय में भी भगवान राम का नाम ले रहे थे।

दुनिया में सबसे बड़ी समाधि के रुप में लेनिनग्राड में बनी है। लेनिन की समाधि को माना जाता है। समाधि एक आस्था हो सकती है लेकिन उत्सव नहीं। डॉ बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर की समाधि को जहां बनाया गया उसे दीक्षा भूमि नाम दिया गया। लोगों में दीक्षा भूमि के प्रति आस्था है। सादगी पसंद भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को भी विजय घाट के नाम से जगह दी गई। इस सभी के प्रश्न यह उठता है कि क्या कभी लाल बहादुर शास्त्री यह उम्मीद करते। बाल ठाकरे के निधन के बाद भी शिवसेना ने खूब राजनीति की थी। पहले तो आजाद मैदान में ही बाल ठाकरे का अंतिम संस्कार किया गया और फिर वही समाधि बना दी। समाधि बनाने की रोक के बावजूद ऐसा किया गया। नियमों में सख्ती के कारण शिवसेना वहां से समाधि हटाना ही पड़ी।
 
इंदिरा गांधी और राजीव की हत्या के बाद उनका दाह संस्कार क्रमश: शक्ति स्थल और वीरभूमि में किया गया। नेता के निधन के बाद राजनीति और महिमा मंडन करने की परंपरा केवल राष्ट्रीय राजनीति में ही नहीं बल्कि क्षेत्रीय राजनीति में भी है। चेन्नई का मेरीना बीच अपने सुंदर समुद्री तट के अलावा नेताओं की समाधि के लिए भी जाना है। जहां एमजी रामचंद्रन, जे जयललिता और एम करूणानिधि की समाधियां हैं। इनमें से करुणानिधि के निधन के वक्त राजनीति हुई। हुआ यह कि एआईएडीएमके ने एक नियम बनाकर मेरीना बीच में नेताओं की समाधि बनाने पर बैन लगा दिया। जिसका डीएमके ने विरोध किया। विरोध बढ़ता देख एआईएडीएमके ने करुणानिधि की समाधि बनाने की छूट दे दी।

अटल बिहारी वाजपेयी अपने समय के कद्दावर नेताओं में गिने जाते थे। भारत रत्न मिलने की बात सुनकर मुस्कुरा देने वाले अटल इस बात को गहराई से जानते थे कि उन्हें यह क्यों मिल रहा है। आपातकाल के बाद सूरजकुंड में बीजेपी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हो रही थी। अटल बिहारी वाजपेयी बैठक की बजाय पटना के अगमकुआं में जयप्रकाश नारायण से मिलने गए थे। जेपी से जैसे ही मिलकर बाहर निकले तो रिपोर्टरों ने पूछा क्या बातचीत हुई? इस पर उन्होंने कहा उधर कुंड इधर कुंआ बीच में धुआं ही धुआं। इस प्रकार के विचार रखने अटल ने कभी यह नहीं सोचा होगा उनका इस तरह महिमा मंडन किया जाएगा।

अटल बिहारी वाजपेयी जी का दाह संस्कार राष्ट्रीय स्मृति स्थल पर किया गया। यह कोई आम अंतिम संस्कार नहीं बकायदा इसके लिए नियम बदले गए। इसके बाद उन्हें दो पूर्व प्रधानमंत्री के बीच‌ स्थान प्रदान किया गया। इससे पहले नियम था कि इस क्षेत्र में किसी भी नेता का अंतिम संस्कार नहीं किया जाएगा। इस नियम को अटल बिहारी वाजपेयी जी के लिए बदला गया। इसके बाद भी उनकी अस्थियों को देशभर की 100 बड़ी नदियों में विसर्जित किया जाएगा। देशभर में शांति सभा का आयोजन किया जाएगा।

इसके बाद कई ऐसे निर्णय लिए गए जो शायद न भी होता तो चलता। छत्तीसगढ़ सरकार ने नया रायपुर का नाम अटल नगर करने की घोषणा की। मध्यप्रदेश सरकार ने प्रदेश में बन रही सात स्मार्ट सिटी में लाइब्रेरी का नाम अटल बिहारी वाजपेयी जी नाम पर किए जाने की घोषणा कर दी। उत्तर प्रदेश सरकार ने लखनऊ का प्रसिद्ध चौराहा हज़रत गंज से बदलकर अटल चौक करने की घोषणा की है।

यह सब आपकी और मेरी नजर का फेर है बाकि तो प्रेम और श्रद्धा है। आज अटल सोच रहे होंगे कि इस अटल बिहारी वाजपेयी को महाअटल बना दिया है।

📃BY_vinaykushwaha