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शुक्रवार, 9 सितंबर 2022
बुक रिव्यू : 'डार्क हॉर्स' सफलता और असफलता की एक ऐसी कहानी कहती है जो सिविल सेवा परीक्षा के बारे में आपकी आंखें खोल देगी!!!
बुधवार, 24 अगस्त 2022
बुक रिव्यू : 'आनंदमठ' की बात जाए तो दो ही बातें सबसे पहले ध्यान में आती है पहली 'वंदे मातरम' और दूसरी संन्यासी विद्रोह
सबसे पहले बंकिमचंद्र चट्टोपध्याय की किताब 'आनंदमठ' में मिलता है...आज हम इसी किताब का बुक रिव्यू करने जा रहे हैं...
ये किताब बात करती है आजादी के पहले के भारत की जब अंग्रेज अपने शासन की नींव रख रहे थे...लोगों का गुस्सा जहां लगान वसूल करने वाले मुस्लिम शासकों से तो था ही इसके साथ-साथ अंग्रेजों को लोग मलिच्छ समझा करते थे। मुस्लिमों और अंग्रेजों को सबक सिखाने के लिए कुछ लोगों ने सन्यासी का वेश धारण किया। किताब इन्हीं सन्यासियों की बात करती है जो दिन में तो सन्यासी के वेश में भीख मांगते हैं और रात होते ही क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम देते हैं।
आनंदमठ की कहानी कई सारे किरदार हैं। इसमें सत्यानंद, जीवानंद, भावानंद, महेंद्र, शांति और कल्याणी हैं और कहानी इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती है। सत्यानंद सन्यासियों द्वारा की जा रही क्रांतिकारी गतिविधियों के कर्ता-धर्ता हैं। इन्हीं के द्वारा आनंदमठ में सन्यासी को क्रांतिकारी बनाया जाता है। किताब का टाइटल आनंदमठ है जो क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र रहता है। आनंदमठ शहर से दूर घने जंगल के बीचों-बीच स्थित होता है।
किताब में सन्यासी कौन होते हैं इस बात का जिक्र किया गया है जिसमें घर
लेखक ने किताब में जितना पुरुष के शौर्य की चर्चा होती है वहीं महिला की ताकत का बखान भी किया गया है। शांति से नवीनानंद तक कहानी भी रोचक है जो किसी प्रेरणा से कम नहीं है। लड़ाई लड़ने से लेकर वाकपटुता, वेद-पुराण, व्याकरण के ज्ञान में अव्वल है। सत्यानंद भी इन्हीं खूबियों के कारण उसे आनंदमठ में प्रवेश करने न रोक सके। शांति के आनंदमठ में प्रवेश से पहले तक महिला सन्यासी नहीं बन सकती थीं। वहीं कल्याणी कोमल ह्रदय और ममता के समुंदर वाली औरत है जिसके दिल में परिवार और देश के लिए मर मिटने की ख्वाहिश हमेशा रहती है।
इस किताब का करेक्टर जीवानंद पराक्रमी योद्धा है जिसका मन तो देश के लिए क्रांति करने में लगा रहता है लेकिन दिल में आज भी उसके शांति ही होती है। जब शांति नवीनानंद बनकर आनंदमठ आ जाती है तो जीवानंद भी चौंक जाता है। लेकिन जीवानंद के दिमाग में प्रायश्चित बात घूमने लगती है क्योंकि सन्यासी रहते हुए जीवानंद शांति से मिलने गया था।
किताब में लेखक ने सन्यासी के बारे में जो बताया है वो कुछ इस तरह है कि सन्यासी गेरुआ कपड़े पहनते हैं वे किसी साधु की तरह दिखाई देते हैं। वैष्णव धर्म का पालन करते हैं। लेकिन देश के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। अंग्रेजों के लिए काल का काम करते हैं। ये सन्यासी लूटपाट करते है खासकर अंग्रेजी खजाने को और जरुरत पड़ने पर हत्या करने से भी नहीं हिचकते। इसलिए अंग्रेज इन्हें अपना दुश्मन मानते हैं।
इसी किताब का अंत होता है एक जोरदार लड़ाई से जो सन्यासी और अंग्रेजों के बीच होती है। इस लड़ाई में जहां अंग्रेजों की ओर से देसी-विदेशी मुट्ठीभर सैनिक लड़े वहीं सन्यासियों की ओर से दसों हजार सैनिकों ने हिस्सा लिया। इस लड़ाई में महेंद्र ने जहां तोपें बनाकर लड़ाई का रुख सन्यासी की ओर किया तो वहीं जीवानंद, धीरानंद का लड़ाई के मैदान में जौहर कमाल का था। इस लड़ाई में सन्यासियों की जीत होती है।
आनंदमठ की बात जाए और वंदे मातरम का नाम आए ऐसा कैसे हो सकता है? इसी उपन्यास से वंदे मातरम गीत लिया गया है। पूरे उपन्यास में वंदे मातरम जोश जगाने वाला गीत था। जो मातृभूमि के प्रति समर्पण जाहिर करने का तरीका है। वंदे मातरम का गान युद्ध की भूमि से लेकर पूजा करने तक शामिल है। वंदे मातरम गीत भारतीय स्वतंत्रता का गीत बना जो बाद में हमारे देश का राष्ट्रीय गीत बना।
किताब की बात की जाए तो बेहद ही शानदार है जो हमारे इतिहास और कल्चर के बारे में बताती है। जरूर इस किताब को पढ़ना चाहिेए। जय हिंद!!!
सोमवार, 4 मई 2020
राजा रवि वर्मा : एक ऐसा चित्रकार जिसने चित्रों में भगवान को जीवित कर दिया
रविवर्मा भातखण्डे भाग्यचन्द्रः स भूपतिः
कलावंतश्च विख्याताः स्मरणीया निरन्तरम्॥
इस संस्कृत के श्लोक में उन लोगों के नाम हैं जिन्होंने कला को भारत में सर्वोच्च स्थान दिया। चाहे चित्रकला हो, संगीत हो, नृत्य हो भारत में एक अलग ही स्थान पर स्थापित करवाया। आज हम देवी लक्ष्मी, देवी सरस्वती, महाराणा प्रताप, शंकुतला, जटायु वध, अर्जुन-सुभद्रा, सैरंध्री, कार्तिकेय जैसे जो चित्र देखते हैं जो मानव रूप में दिखाई देते हैं। इन चित्रों में जान फूंकने का काम किया है भारत के महान चित्रकार राजा रविवर्मा ने। रविवर्मा ने भारतीय चित्रकला को वो आयाम दिया जिससे भारत में कला की क्रांति आ गई।
ऐसा बिल्कुल नहीं है कि राजा रवि वर्मा से पहले भारत में चित्रकला नहीं होती थी। मध्यप्रदेश के रायसेन जिले में स्थित भीमबेटका में तो ईसा से हजारों साल पहले की चित्रकारी देख सकते हैं। यही नहीं महाराष्ट्र की अजंता गुफाओं, एमपी की बाघ की गुफाओं, लेपाक्षी मंदिर और तंजौर के मंदिर में मानवीय रूप में चित्रकारी की गई। यह सिलसिला चलता रहा और बाद में कई क्षेत्रीय कला में इसे प्रोत्साहन मिलता चला गया। रवि वर्मा ने केवल चित्रकारी ही नहीं की बल्कि प्रयोग किए हैं।
केरल के किलिमानूर में जन्मे रवि वर्मा बचपन से ही चित्रकारी में धनी रहे हैं। केरल में एक प्रथा थी जिसमें विवाह करने के बाद पति अपनी पत्नी के घर पर ही रहता था। रवि वर्मा के माता-पिता ने भी इसी प्रथा को मानते हुए रवि वर्मा के मामा राजा राज वर्मा के घर रूके। रवि वर्मा को बचपन में लोग प्यार से कोच्चू के नाम से पुकारते थे। एक बार कोच्चू और उनकी बहन मंदिर के बगल में स्थित बगीचे में खेल रहे थे। उन्होंने अपनी बहन से बोला कि मैं मंदिर की दीवार पर घोड़े की आकृति बनाता हूं। उनकी बहन ने बोला जी भइया। बहन ने कोच्चू को कोयला का टुकड़ा उठाकर दिया। इसी कोयले के टुकड़े से कोच्चू ने मंदिर की दीवार पर एक शानदार छलांग भरता हुआ घोड़ा बनाया।
मंदिर की दीवार पर घोड़े की आकृति देखकर माली ने बच्चों से कहा कि मैं तुम दोनों की शिकायत राजा से करता हूं। माली ने बच्चों की शिकायत राजा से की। राजा राज वर्मा ने माली से कहा कि वो चित्रकारी कहां है मुझे भी देखना है। जैसे ही राजा राज वर्मा उस दीवार के पास पहुंचे तो उनके मुंह से चित्रकारी की तारीफ के अलावा कुछ नहीं निकला। माली ने राजा राज वर्मा से कहा कि इन बच्चों ने मंदिर की दीवार गंदी कर दी और आप तारीफ कर रहे हैं। राजा राज वर्मा ने माली से कहा कि कोच्चू ने वाकई अच्छी चित्रकारी की है। कोच्चू के मामा स्वयं भी एक चित्रकार थे। कोच्चू अर्थात रवि वर्मा के शुरुआती गुरु उनके मामा ही थे।
कई लोग कहते हैं कि रवि वर्मा को प्रारंभिक चित्रकारी उनके चाचा ने सिखाई थी। राजा राज वर्मा ने किलीमानूर में रवि वर्मा को चित्रकारी वॉटर कलर से करना सिखाया। रवि वर्मा कुशाग्र बुद्धि के धनी व्यक्ति थे। रवि वर्मा ने मात्र 18 वर्ष की उम्र में तमिल, मलयालम भाषा का ज्ञान, संगीत, वादन और कथकली नृत्य सीख लिया था। पहले तिरुवनंतपुरम को त्रिवेंद्रम के नाम से भी जाना जाता था। त्रिवेंद्रम के राजा तिरुनल ने राजा राज वर्मा को बुलावा भेजा और संदेश दिया कि वे राजधानी त्रिवेंद्रम आएं और साथ में एक ऐसे बालक को लेकर आएं जिसकी आयु विवाह योग्य हो। राजा राज वर्मा अपने साथ तरुण रवि वर्मा को ले गए। राज वर्मा ने जब राजा तिरुनल से रवि वर्मा के बारे में बताया तो तिरुनल आश्चर्यचकित रह गया। राजा राज वर्मा ने आग्रह किया कि रवि वर्मा किलीमानूर में जितनी शिक्षा ग्रहण कर सकता था कर चुका है। यदि आप चाहें तो रवि वर्मा त्रिवेंद्रम में रहकर आगे कुछ सीख सकता है। राजा तिरुनल ने इस आग्रह को तुरंत स्वीकार कर लिया।
कोच्चू अब राजा रवि वर्मा बनने की दिशा में पैर रख चुका था। एक ऐसी दिशा जहां उसे संघर्ष, हुनर, इज्जत, शोहरत और बेइज्जती मिलने वाली थी। अब कोच्चू त्रिवेंद्रम में रहने लगा। राजा तिरुनल ने उस समय के प्रसिद्ध चित्रकार रामास्वामी नायकर को कोच्चू के शिक्षक के रूप में नियुक्त कर दिया। रामास्वामी नायकर को जब मालूम चला कि रंगों की कूची चलाने में कोच्चू मुझसे ज्यादा माहिर है तो वह सिखाने में टालमटोल करने लगा। हां, कोच्चू ने नायकर से कुछ सीखा हो या नहीं एक अच्छी शुरुआत जरूर हुई वो थी ऑयल पेंटिंग। जब राजा तिरुनल को पता चला कि नायकर कोच्चू को चित्रकारी नहीं सिखा रहा तब राजा ने कोच्चू को पुराने चित्र देकर अभ्यास करने के लिए कहा। यही अभ्यास कोच्चू को आगे तक ले गए।
इसी समय नीदरलैंड्स का प्रसिद्ध चित्रकार थियोडोर जेंसन राज दरबार में आया हुआ था। राजपरिवार ने जेंसन को पोट्रेट बनवाने के लिए बुलवाया था। राजा तिरुनल ने तय किया कि कोच्चू चित्रकार थियोडोर जेंसन से पोट्रेट बनाने और ऑयल पेंटिंग के गुर सीखेगा। जेंसन को जब मालूम चला कि राजा इस बारे में सोच रहे हैं तो उसने कोच्चू को सिखाने से मना कर दिया। इस बात पर राजा नाराज हो गया और कहा कि हमें पोट्रेट नहीं बनवाना है। इसके बाद थियोडोर जेंसन ने कोच्चू को पोट्रेट बनाना सिखाया क्योंकि वो ऐसा ना करता तो उसे मोटी रकम और इज्जत गंवानी पड़ती। रवि वर्मा ने जैसे-तैसे पोट्रेट बनाना सीख ही लिया। जो रवि वर्मा के जीवन में बड़ा काम आया। पोट्रेट, चित्रकारी की विधा है जिसमें चित्रकार सामने बैठे किसी व्यक्ति की चित्रकारी कैनवास पर उतारता है।
रवि वर्मा ने आगे की शिक्षा मैसूर और बडौदा में हासिल की। रवि वर्मा ने देशभर के चक्कर लगाए। भारतीय संस्कृति को समझने में रवि वर्मा को भारत यात्रा बहुत काम आई। इन्हीं यात्राओं के बाद रवि वर्मा ने अपनी चित्रकारी की जादूगरी बिखेरी। भारत यात्रा से पहले भी रवि वर्मा ने कई चित्र बनाए थे लेकिन उन्हें अब समझ आ गया था कि उन्हें करना क्या है? भारतीय संस्कृति के नायकों और देवी-देवताओं की ऑयल पेटिंग बनाना शुरू कर दी। देवी लक्ष्मी, देवी सरस्वती, भगवान कार्तिकेय, राधा-कृष्ण, सीता हरण, जटायु वध, अष्टसिद्धि, भीष्म प्रतिज्ञा, अर्जुन-सुभद्रा, शांतनु-मत्स्यगंधा, कण्व ऋषि और ऋषि कन्या, राम की वरुण विजय जैसी शानदार ऑयल पेंटिंग रवि वर्मा ने बनाई। शुरुआत में रवि वर्मा पेंटिंग में तंजौर कला का उपयोग करते थे लेकिन समय के साथ-साथ एक मिश्रित कला में बदल गई।
देवी-देवताओं के चित्र के अलावा राजा रवि वर्मा ने महाराणा प्रताप, अप्सरा-रंभा, फल के साथ महिला, ग्वालिन,नायर जाति की स्त्री, विचारमग्न युवती शामिल हैं। यहां तक की रवि वर्मा ने अपनी बहू का पोट्रेट भी बनाया। रवि वर्मा की सर्वश्रेष्ठ कलाकृति रही शकुंतला। पत्र लिखती शकुंतला, बगीचे में सखियों के साथ पीछे मुड़कर देखती शकुंतला, राजा के सम्मुख खड़ी शकुंतला जैसे अनेक चित्र बनाए। महाकवि कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तलम् पर आधारित ये चित्र इतने प्रसिद्ध रहे की विदेश में भी इसकी चर्चा हुई। इसी समय सर मोनियर विलियम्स ने अभिज्ञानशाकुन्तलम् का अंग्रेजी अनुवाद किया और पुस्तक के प्रथम पृष्ठ पर रवि वर्मा से प्रेम पत्र लिखती शकुंतला का चित्र छापने का आग्रह किया। इस आग्रह को रवि वर्मा ने स्वीकार कर लिया।
रवि वर्मा से चित्र और पोट्रेट बनवाने की मानो होड़ सी लग गई। अंग्रेज अफसरों से लेकर राजा-महाराजाओं ने रवि वर्मा से चित्र और पोट्रेट बनवाए। एक बार इसी काम के लिए उन्हें मैसूर राजघराने ने उन्हें दो हाथी तोहफे में दिए। एक बार रिचर्ड टैंपल-ग्रेनविले भारत आए तो उनका स्वागत त्रावणकोर के महाराज और उनके छोटे भाई ने किया। इस पेंटिंग की अंग्रेजों के बीच बहुत तारीफ हुई और इसकी नीलामी 1.2 मिलियन डॉलर में हुई। रवि वर्मा ने मुंबई में लिथोग्राफिक प्रेस भी खेला। इस प्रेस से उन्होंने बहुत धन कमाया और इज्जत भी। धन और इज्जत कई लोगों को हजम नहीं होती। रवि वर्मा पर यह कहते हुए आरोप लगाया कि वे नग्न तस्वीर बनाते हैं और मुंबई स्थित प्रेस पर कई लोगों ने हमला कर दिया। प्रेस को जला दिया गया जिससे कई सारी पेंटिंग जलकर स्वाहा हो गईं।
राजा रवि वर्मा की मुझे 'गैलेक्सी ऑफ म्युजिसियन्स' नामक की पेंटिंग सबसे अच्छी लगी। इस पेंटिंग विभिन्न परिधानों में 11 महिलाएं हैं जो भारत को प्रस्तुत कर रही हैं। कोई महिला वायलिन बजा रही है तो कोई तानपुरा सभी के चेहरे पर शांत और गंभीर भाव देखने मिल रहा है। पेंटिंग का भाव महिला केंद्रित है जिसमें ये बताया गया है कि महिला ही इस ब्रह्मांड की जननी है।
लोगों ने रवि वर्मा की प्रेस को तो जला दिया लेकिन हुनर अभी भी जिंदा था जो ताउम्र उनके साथ रहा। अबनीन्द्रनाथ टैगोर जैसे चित्रकार ने तो रवि वर्मा को भारतीय चित्रकार होने पर ही प्रश्न खड़ा कर दिया। उनका कहना था कि रवि वर्मा पेंटिंग बनाने के लिए विदेशी तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। अंग्रेजों ने उन्हें कैसर-ए-हिंद सम्मान से नवाजा। राजा की उपाधि भी मिली और वे बन गए राजा रवि वर्मा। साल 1906 में मात्र 58 साल की उम्र में राजा रवि वर्मा का देहांत हो गया। शरीर भले ही नश्वर हो लेकिन उनकी कलाकृति आज भी जीवित है। सच में वे चित्रकारों में राजा थे राजा। आज भी उनके बनाए गए चित्र बडौदा के लक्ष्मी विलास पैलेस म्यूजियम में देखने को मिल जाएंगे।
📃BY_vinaykushwaha
(नोट :- राजा रवि वर्मा की पेंटिंग्स के सभी चित्र इंटरनेट से डाउनलोड किए गए हैं।)
सोमवार, 15 जुलाई 2019
बारिश का जल 'वरदान'
शुक्रवार, 31 मई 2019
सिर्फ और सिर्फ नरेंद्र
सबसे पहले मैं बात करूंगा नरेंद्र मोदी की छवि की। मोदी की छवि के कारण कहीं ना कहीं बीजेपी को फायदा मिला है। 2014 के बाद मोदी और बड़ी छवि बनकर उभरे हैं। आज के समय में कहा जाए तो मोदी से बड़ा नेता देश में कोई दूसरा नहीं है। केंद्र में सरकार बनाने के बाद नरेंद्र मोदी ने कई ऐसे काम किए जिसने मोदी की छवि बदलने का काम किया। मोदी के इन कामों में सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक, अभिनंदन की रिहाई, मसूद अजहर को ग्लोबल आंतकी घोषित करवाना, स्वच्छ भारत अभियान, 21 जून को योग दिवस घोषित करवाना जैसे मुद्दे शामिल हैं। इन कामों ने मोदी की छवि को बड़े से और बड़ा कर दिया। नरेंद्र मोदी की बोलने की कला और भाषण के दौरान लोगों से जुड़ने की कला, मोदी को लोगों के नजदीक लेकर गई। मोदी देश के जिस भी हिस्से में जाते हैं वहां की भाषा के शब्दों को अपने भाषण में शामिल करते हैं। पीएम नरेंद्र मोदी ने 5 साल के दौरान हर महीने के आखिरी रविवार को मन की बात करते हुए लोगों से उन्होंने जुड़ाव बनाए रखा। इसके अलावा शिक्षक दिवस के दिन छात्रों से बात करते थे।
नरेंद्र मोदी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में 146 रैलियां की। पूरब से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण तक पीएम ने रैलियां की। मेरठ से अपनी चुनावी सभा की शुरूआत करके एमपी के खरगोन में अपनी चुनावी अभियान को विराम दिया। कांग्रेस का 'चौकीदार चोर है' वाले बयान को लेकर पीएम ने अपनी हर रैली में कांग्रेस पर चौकीदार नाम का बम फोड़ा। ट्विटर पर अपने नाम के आगे चौकीदार लगाकर चौकीदार वर्ग का वोट समेट लिया। कांग्रेस के साथ-साथ महागठबंधन और टीएमसी को इस चुनाव में मोदी ने आड़े हाथों लिया। जहां महागठबंधन को महामिलावट कहा तो वहीं ममता बनर्जी को स्पीड ब्रेकर कहा। इन सब में सबसे बड़ी बात यह रही की इस बार बीजेपी कांग्रेस से भी ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ रही थी। बीजेपी ने 2019 का आम चुनाव 435 सीटों पर लड़ा। बीजेपी ने भले ही 435 सीटों पर चुनाव लड़ी लेकिन प्रत्याशी केवल एक ही था वो है 'मोदी'। बीजेपी ने पिछला आम चुनाव मोदी लहर के नाम पर लड़ा था लेकिन यह चुनाव बीजेपी ने मोदी के नाम पर लड़ा। बीजेपी नेता कहते भी थे कि पिछले चुनाव में मोदी लहर थी तो इस बार मोदी की सुनामी है।
विपक्ष हमेशा कहता था कि पीएम मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करते, इंटरव्यू नहीं देते, पीएम हमेशा वन-वे कम्यूनिकेशन करते हैं। पीएम नरेंद्र मोदी ने इस चुनाव में इंटरव्यू के साथ-साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टीवी से लेकर प्रिंट तक सभी को इंटरव्यू दिया। आखिरी चरण के चुनाव प्रचार के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की। इस बार प्रधानमंत्री मोदी ने पॉलिटिकल इंटरव्यू के साथ-साथ नॉन-पॉलिटिकल इंटरव्यू भी दिया। इसके अलावा मोदी ने कई रोड शो भी किए जिसमें काशी में किया रोड शो भव्य था।
बीजेपी की इस शानदार जीत के पीछे एक बहुत बड़ा कारण है मोदी-शाह की जोड़ी। पिछले आम चुनाव की तरह इस चुनाव में भी मोदी-शाह की जोड़ी ने कमाल कर दिखाया। पॉलिटिकल पंडित कहते थे कि बीजेपी को सरकार बनाने के लिए दूसरे दलों की जरुरत पड़ेगी। दोनों की जोड़ी ने इस बात को नकार दिया। अमित शाह को बीजेपी का चाणक्य कहा जाता है। अमित शाह ने शिवसेना को मनाने का काम किया, जेडीयू को फिर से एनडीए में लाने का श्रेय भी अमित शाह को जाता है। अमित शाह ने नरेंद्र मोदी से 17 रैलियां ज्यादा करके लोगों तक पहुंच बनाई। बूथ मैनेजमेंट और लोगों को बीजेपी से जोड़ने का काम अमित शाह ने किया। नरेंद्र मोदी की बिजनेस मैन, फिल्मी सितारों के साथ बैठक आदि भी अमित शाह के दिमाग की उपज है। बीजेपी ने राजस्थान, बिहार, उत्तरप्रदेश, झारखंड, तमिलनाडु, महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों से गठबंधन किया। तमिलनाडु को यदि छोड़ दिया तो बाकी राज्यों में बीजेपी ने अच्छा प्रदर्शन किया। अमित शाह की रणनीति के काऱण आज बंगाल में बीजेपी 18 सीटें लाने में सफल रही है। इस चुनाव में बीजेपी का फोकस यूपी और बिहार ना होकर पश्चिम बंगाल और ओडिशा था। इन दोनों राज्यों में बीजेपी ने अच्छा प्रदर्शन किया। बीजेपी अध्यक्ष होने के नाते अमित शाह ने बीजेपी को सशक्त बनाया बल्कि एनडीए को भी और ज्यादा मजबूत किया। बीजेपी की इस धुंआधार जीत के पीछे प्रचार-प्रसार का अहम योगदान रहा। इसमें कोई शक नहीं है कि बीजेपी ने इस चुनाव में प्रचार में सबसे ज्यादा पैसे खर्च किए हैं। सोशल मीडिया से लेकर ग्राउंड जीरो तक बीजेपी ने खूब पैसे बहाए। इस चुनाव में बीजेपी का चुनाव प्रचार विवाद का विषय रहा। नमो टीवी को लेकर विपक्ष बहुत आक्रामक रहा। व्हाट्सएप ग्रुप से लेकर फेसबुक और व्यक्तिगत रूप से फोन करके लोगों को बीजेपी के पक्ष में लाने का प्रयास बीजेपी ने किया। बीजेपी के साथ अपार जनसमर्थन जुड़ने के पीछे एक कारण और भी है।
सरकार की योजनाओं को घर-घर तक पहुंचाना और उनका प्रचार-प्रसार करना। उज्ज्वला योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, स्वच्छ भारत अभियान के तहत शौचालय का निर्माण करवाना। जिन परिवारों के पास ये सारी सुविधाएं नहीं थी यदि उऩको यह सब मिलता है तो व्यक्ति-व्यक्ति का लाभ पहुंचाने वालों को ही जाएगा।
विपक्ष ने मेहनत की या नहीं की इसका कोई मतलब नहीं क्योंकि बीजेपी ने बाजी मार ली है। नरेंद्र मोदी में एक बात बहुत खास है कि वे विपक्ष के मुद्दे को कैच कर लेते हैं। 2017 के गुजरात चुनाव में मणिशंकर अय्यर ने पीएम मोदी को नीच कहा था। इस बयान को पीएम मोदी ने इतना प्रचार किया कि कांग्रेस को इसका भुगतान भुगतना पड़ा। 2019 के आम चुनाव में राहुल गांधी ने चौकीदार चोर है नारा लगवाया तो नरेंद्र मोदी ने ट्विटर हैंडल पर अपना बदल कर चौकीदार नरेंद्र मोदी कर दिया। राहुल गांधी के द्वारा उठाए गए भष्ट्राचार के मुद्दे को पलटकर बोफोर्स तक ले गए। सैम पित्रोदा के सिख दंगों पर दिए हुआ तो हुआ वाले बयान पर पीएम ने आधी जंग ही जीत ली।
कहते हैं कि चुनाव में जातीय समीकरण मायने रखते हैं। पार्टियां अपने उम्मीदवारों को जातीय आधार पर उतारती है। इस चुनावी में सारे जातीय समीकरण लोधी-कुर्मी, एम-वाय, सवर्ण-दलित सभी समीकरण फेल हो गए। इस बार राष्ट्रवाद का मुद्दा हावी रहा। राष्ट्रवाद के साथ-साथ आतंकवाद का मुद्दा हावी रहा। सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक ने इसे और हवा दी।
जिस तरह सुनामी में सब कुछ तबाह हो जाता है ठीक उसी तरह मोदी नाम की सुनामी में 2019 में विपक्ष बह गया।
सोमवार, 20 मई 2019
आम और ये मैंगो पीपुल!
आज जब मैं यह पोस्ट लिख रहा हूं तो 2019 का आम चुनाव खत्म हो चुका है। आम चुनाव खत्म होने के साथ ही देश भर में चुनाव प्रचार का शोर थम चुका है। अब सबकी नजर 23 मई को आने चुनाव के नतीजे पर हैं। यह पोस्ट नॉन पॉलिटिकल है जिस तरह प्रधानमंत्री का इंटरव्यू नॉन पॉलिटिकल था। अभिनेता अक्षय कुमार के सवाल का जवाब देते पीएम बड़े ही मासूम नजर आ रहे थे। आम की कहानी तो उन्होंने इस तरह बताई की मुझे अपने बचपन के दिन ध्यान आ गए क्योंकि हम भी लग्जरी में पले-बढ़े नहीं हैं। पत्रकार रवीश कुमार को तो बाकायदा प्राइम टाइम ही आम करना पड़ा। आम सफेदा हो या लंगड़ा, बादाम हो या दशहरी यही बताना पड़ा। गर्मी के मौसम में आम और आम से बने जूस आदि का आनंद हर व्यक्ति उठाता है। मैंने बचपन से लेकर आजतक बादाम, केसरी, तोतापरी, नीलम, लंगड़ा, दशहरी, चौसा, मोती, कल्मी, गोविंदगढ़ का आम खाया है। बचपन में हमने भी आम तोड़कर खाया है। हम भी प्रधानमंत्री बने तो कोई हमसे पूछे कि क्या आप भी आम खाते हैं? मेरा जवाब तैयार होगा हां, हमारी फैमिली में ऐसी कोई लक्जरी तो नहीं कि हम आम खरीद कर खा पाएं।
मैं नहीं जानता कितने लोगों ने अपनी जिंदगी गांव में बिताई है या गांव में रहकर गांव के जीवन को करीब से देखा है। मेरे पिताजी गांव से निकलकर शहर में नौकरी करने चले गए। शहर का जीवन मैंने जीया है लेकिन गांव को मैंने करीब से देखा है। गर्मी में स्कूल के छुट्टी के दरम्यान हम (हम मतलब मम्मी, भइया और मैं) गांव का रुख करते थे। सीधी-सीधी बात कहूं तो गांव का जीवन चले जाते थे। चूल्हे पर पकी चाय का सौंधापन क्या शानदार लगता था। मैंने चाय बेची नहीं है। हंडी में पकी दाल और हाथों से पोई रोटी का स्वाद जो गांव के खाने में था आज मैं याद करता हूं। उस खाने को भुलाया नहीं जा सकता है। आकाश तले रात गुजारना और दिन में बिजली आने का इंतजार करना दोनों का एक सुखद अनुभव था। गर्मी के दिनों में खाट पर सोना और कुत्तों के भौंकने की तेज आवाज आज भी याद आती है। खेत के किनारे खाट डालकर सोने का अनुभव तो और भी शानदार था। रात में फसल को छूकर आने वाली हवा गर्मी की उजाले वाली रात को और भी ठंडा कर देती थी।
मेरे गांव के घर में एक बारी थी। जो लोग बारी के बारे में कुछ नहीं जानते तो उनको बताता चलूं कि बारी एक ऐसी जगह होती है जिसे हम छोटा-सा बगीचा कह सकते हैं। गांव वाली बारी में एक छोटा-सा घर था जिसमें दादा-दादी रहते थे। इसी घर से दो कदम की दूरी पर एक बड़ा-सा कुंआ था। गर्मियों में इसी कुंए से पानी निकालकर हम ठंडा-ठंडा पानी पिया करते थे। गांव की बारी में कटहल (jack fruit), करौंदा, नींबू, सीताफल (custard apple) और आम के पेड़ थे। हम जब भी गांव जाते थे तो आम के पेड़ पर चढ़कर आम खाते थे क्योंकि हमारे पास कोई लक्जरी तो थी नहीं। दादी अक्सर खटिया पर अमावट बनाती थी। अमावट को शायद ही आजकल के लोग जानते हों। अमावट पके हुए आम का गूदा निकालकर उसे खटिया में चादर बिछाकर एक परतदार के रूप में आकार दिया जाता है। मैं बघेली हूं और हमारे यहां आम और आम से बनीं चीजों का बहुत इस्तेमाल किया जाता है। आम चाहे कच्चा हो या पका दोनों का इस्तेमाल बराबर होता है।
मैं जब छोटा था तो मई-जून के महीने में तूफान बारिश होने पर कैरियां गिर जाती थीं। मैं और मेरे दोस्त कैरियां अपनी टी-शर्ट में भरकर घर ले जाते थे। कई बार तो पत्थर मारकर,बांस की लग्गी बनाकर कैरी तोड़ी हैं क्योंकि हमारे पास कोई लक्जरी तो थी नहीं। कैरी बड़े काम का फल है। बघेली लोग कैरी की सब्जी, कैरी की कढ़ी, कैरी की चटनी, कैरी का पना, कैरी से आचार, कैरी को सुखाकर अमचूर बनाते हैं। कैरी से बने कई सारे पाकवान के बारे में लोग जानते हैं लेकिन डिश जो बघेली बड़े चाव से खाते हैं वो है 'बगजा'। बगजा, कैरी से बनता है। कैरियों को उबाला जाता है। कैरी का गूदा निकाला जाता है। इस गूदे में गुड़ मिलाया जाता है इसके साथ नमक,भुना जीरा मिलाया जाता है। इसके बाद बेसन का घोल तैयार करके सेंव बनाया जाता है। गूदे को सरसों के तेल में खड़ी लाल मिर्च, जीरा, खड़े मसाले के साथ छौंक लगाया जाता है। इस छौंक में सेंव को मिलाया जाता है, इसे कहते हैं 'बगजा'। बघेली इस डिश को बड़े चाव से खाते हैं और मैं भी क्योंकि हमारे पास कोई लक्जरी तो थी नहीं।
जैसे-जैसे बड़े होते गए तो आम खाने का तरीका बदलता गया। पहले तो हमें केवल रीवा के गोविंदगढ़ का आम और दशहरी पता था। जैसे-जैसे बड़े होते गए वैसे-वैसे आम के नए-नए नाम भी पता चलते गए। मैं मध्यप्रदेश से हूं। एमपी से यूपी तक आते-आते आम का राजा भी बदल गया। एमपी में जहां बादाम आम का राजा था तो वहीं यूपी आने के बाद आम का राजा सफेदा हो गया। आम रस तो बचपन में भी पीते थे। आमरस के साथ दाल की रोटी खाने का आनंद तो सच्चा बघेली ही जान सकता है। बचपन में आम का रस निकालकर हम उसमें काजू,किशमिश,बादाम, दूध और थोड़ी शक्कर मिलाकर फ्रिज में जमने के लिए रख देते थे। यही हमारे लिए आइसक्रीम थी। अब तो केवल दुकानों में ही मैंगो फ्लेवर वाली आइसक्रीम खाना होता है। आम रस के नाम पर बाजार में दस-पांच रुपये में मिल रहे मैंगो जूस को पीकर अपने आप को तृप्त करते हैं।
आम को फलों का राजा कहा जाता है। आम सच में फलों का राजा होने लायक है भी क्योंकि आम खाने के लिए किसी प्रकार की लक्जरी की जरूरत नहीं है। एक आम इंसान से लेकर अमीर तक आम को खाता है। मैंने आज तक आम खाने के लिए किसी व्यक्ति को कहते हुए नहीं सुना कि हमारे पास लक्जरी तो थी नहीं, सिवाय एक के। आम के लिए अब तो एक मौसम विशेष तक रुकने की जरुरत भी नहीं है क्योंकि अब आम बारहमासी हो गया है। जब मन करे आम खरीदो और खाओ। आम की टक्कर आज कीवी, ड्रेगन फ्रूट, आवोकाडो से हो गई है। मेरे लिए तो आम ही 'द बेस्ट' है जिसके लिए लक्जरी की जरुरत नहीं पड़ती है। हां मैंने आज तक मैंगो लस्सी का स्वाद नहीं चखा है। मैंगो लस्सी का स्वाद तो मैं कभी चख लूंगा लेकिन इसके लिए मैं लक्जरी को दोष नहीं दूंगा। मैंगो लस्सी के एवज में मैंने मैंगो फ्लेवर वाली टॉफी जरूर खाई है। पता नहीं और क्या बाकी है और क्या नहीं लेकिन मेरे हिसाब भारत का कोई भी वर्ग हो उसे आम खाने के लिए लक्जरी की जरुरत नहीं है। आम की तरह हम भी तो मैंगो पीपुल(mango people) हैं।
सोमवार, 1 अप्रैल 2019
जाति का विनाश कितना जरूरी है?
रविवार, 11 नवंबर 2018
"अवनी" पर राजनीति क्यों?
"कोई बाघ आदमखोर खुद से नहीं बनता है बल्कि उसे मजबूरी में आदमखोर बनना पड़ता है।" यह पंक्ति है मशहूर बाघ संरक्षक जिम कार्बेट की। जिम कार्बेट को बाघों का संरक्षक कहा जाता है। जिम के साथ एक विरोधाभास जुड़ा हुआ है कि उन्होंने 33 बाघ-बाघिन को मारा था। इनमें मैन ईटर ऑफ कुमाऊं भी शामिल है। इस मैन ईटर ने 435 आदमियों को मारा था। अपनी किताब मैन ईटर ऑफ कुमाऊं में उन्होंने इस बात का जिक्र किया था। जिम की छवि एक अच्छे व्यक्ति के रुप में है क्योंकि उन्होंने आदमखोरों के आतंक से मुक्ति दिलाई थी। लेकिन बाद में उन्होंने बंदूक की जगह कलम को उठा लिया था। वे इस बात से वाकिफ थे कि हिमालय में बाघों की संख्या कम होने का मतलब है कि पारिस्थितिकी तंत्र में गड़बड़ी होना है। जिम कार्बेट लेखक और दार्शनिक भी रहे हैं। उन्हीं के नाम पर उत्तराखंड के राष्ट्रीय पार्क का नाम जिम कार्बेट नेशनल पार्क है। इसी नेशनल पार्क से प्रोजेक्ट टाइगर मिशन की शुरुआत की गई थी।
तारीख 2 नवंबर 2018 सभी को वैसे तो पता होगी लेकिन यह एक ऐसा दिन जिस दिन से सभी को पशुओं के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया है। लोग अब यह भी सोचने लगे हैं कि जानवरों को क्यों मारा जा रहा है। मैं बात कर रहा हूं बाघिन 'अवनि' की। कई लोग बाघिन अवनि को अवनी लिख रहे हैं। इस बाघिन का अाधिकारिक नाम टी-1 है। बाघिन अवनी को मार दिया गया। अवनी पर आरोप था कि उसने दो सालों में 14 लोगों की जान ली है। अवनी को मारने के लिए बकायदा वन विभाग से 100 लोगों की टीम को तैयार किया गया। पांढरकवड़ा के जंगल में बाघिन को खोजने के लिए गोल्फर ज्योति रंधावा के खोजी कुत्तों को बुलाया गया। पेड़ों आदि पर कैमरों का कड़ा पहरा लगा दिया गया। बाघिन को चारा देने के नाम पर नकली भेड़-बकरियों को बांधा गया। अमेरिकी से विशेष प्रकार का इत्र मंगाया गया ताकि बाघिन आकर्षित होकर जल्द से जल्द घने जंगलों से निकलकर खुले मैदान में आ जाए।
सारे जाल बिछा दिए गए बस अब बाघिन का फंसना बाकी था। बाघिन आई और जाल में फंस गई। हैदराबाद से शार्प शूटर शाफत अली खान को बुलाया गया था। शाफत के पास एक लंबा अनुभव था कि कैसे जानवर को मारा जाता है। उनके दादा भी यही काम करते थे। वन विभाग के अनुसार शाफत को मुख्य रुप से बाघिन को ट्रैंकुलाइज करने के लिए बुलाया गया था। अवनी जैसे ही थोड़े खुले हिस्से में आई तो उसे पहले ट्रैंकुलाइज गन से टैंकुलाइज्ड किया गया फिर उसे 10 मीटर दूर से पिछले हिस्से में गोली मार दी गई। आखिरकार आदमखोर बाघिन का अंत हो गया। यह बाघिन अवनी की दुखद अंत की कहानी है।
असली कहानी तो अवनी की मौत के बाद शुरू होती है। अवनी की मौत के बाद कई पशुप्रेमी और राजनेता सामने आए और उन्होंने जमकर इस बात का विरोध किया की अवनी की हत्या की गई है। अवनी की मौत से पहले कई पशु प्रेमियों और एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका देकर अवनी पर दया दिखाकर जीवनदान की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने दया याचिका को यह कहते हुए नकार दिया था कि चीफ लाइफ वार्डन ने यह स्वीकार किया है कि अवनी पर कार्रवाई जरुरी है। अब आते हैं राजनीति पर। केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने महाराष्ट्र के सीएम देवेन्द्र फडणवीस को पत्र लिखकर महाराष्ट्र के वन मंत्री सुधीर मुनगंटीवार को बर्खास्त करने की मांग की। आपको यहां बताते चलें कि मेनका गांधी की छवि एक पशु प्रेमी की है, वे कई सालों से पशुओं के संरक्षण में काम रही हैं। मेनका गांधी शायद भूल गई थी कि केन्द्र में उनकी सरकार और महाराष्ट्र में एनडीए नीत सरकार फिर पत्र की औपचारिकता क्यों? इसके बाद सुधीर मुनगंटीवार ने उल्टा मेनका गांधी पर आरोप लगाते हुए कहा कि वे भी तो फर्जी बाबा के पास जाती हैं। मुझे नहीं लगता है कि इतने संवेदनशील मुद्दे पर ऐसी बात उछालने की जरूरत थी।
बात यदि महाराष्ट्र की हो और शिवसेना का जिक्र ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता। शिवसेना ने सरकार पर आरोप मढ़ दिया की सरकार ने अवनी की हत्या की है। मनसे भी कहां पीछे रहने वाली थी। राज ठाकरे ने अवनी पर बयान दे दिया। सबसे आखिर में एंट्री हुई कांग्रेस की। मुंबई से पूर्व सांसद संजय निरुपम ने इस सारे मामले को हगणदारी प्रथा से जोड़ दिया। हगणदारी प्रथा, महाराष्ट्र में खुले में शौच मुक्त करने के अभियान से जुड़ा है। संजय निरुपम ने हगणदारी प्रथा का जिक्र इसलिए किया क्योंकि वे बताना चाहते थे कि चंद्रपुर में जंगल में शौच करने गई महिला को बाघ ने मार दिया। अब बात अवनी की मौत से हगणदारी तक पहुंच गई। इस पर महाराष्ट्र के वन मंत्री सुधीर मुनगंटीवार कहते हैं कि अवनी की मौत पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। अरे साहब असली राजनीति की शुरुआत तो आपने ही की थी।
11 नवंबर को 168 संस्थाओं ने कैंडल मार्च निकालकर बाघिन अवनी की मौत का विरोध किया। यह कैंडल मार्च मात्र दिखावा नहीं बने। इस बात की बेहद अहमियत है कि पर्दे के पीछे की सच्चाई क्या है? बात यह है कि बाघिन को मारने के बाद उसे नागपुर ले जाया गया जहां उसे डॉक्टर ने मृत घोषित कर दिया। पोस्टमार्टम में यह पता चला कि उसके पिछले भाग पर गोली मारी गई थी। ऑटोप्सी करने के बाद पता चला कि अवनी ने 4-5 दिनों से कुछ खाया ही नहीं था क्योंकि उसके पेट में गैस और तरल पदार्थ भरा हुआ था। इसके अलावा उसके शरीर में नमी की कमी पाई गई और इंसानी मांस का कहीं कोई जिक्र नहीं हुआ। अवनी तो चली गई लेकिन अपने कई राज छोड़ गई।
बाघ और जंगली जानवर इतने आक्रामक क्यों रहे हैं? इसका सीधा सटीक कारण है अतिक्रमण। इंसान अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए वन्य जीवों के क्षेत्र में अतिक्रमण कर रहा है। खेती और आवास के लिए जंगलों का सफाया किया जा रहा है। नेशनल पार्क और अभ्यारण्यों में वन्यजीवों के आवास को छेड़ा जा रहा है। इन सबसे वन्यजीवों की इंसानी बस्ती में चहलकदमी बढ़ गई है। इन सबका नतीजा सबके सामने है। हमारे संविधान के भाग-4 में राज्य के नीति निर्देशक तत्वों का जिक्र किया है। अनुच्छेद 48(क) में जिक्र है कि पर्यावरण और वन्यजीवों का राज्यों द्वारा संरक्षण और संवर्धन किया जाएगा। मैं राज्यों से पूछना चाहता हूं कि अवनी की तरह? यह हमारा भी व्यक्तिगत दायित्व बनता है कि हम अपने पर्यावरण और वन्यजीवों को संरक्षित और संवर्धित करें।
अब सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे देश का कानून क्या कहता है? क्या अवनी को मारना सही है? महाराष्ट्र वन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार बताया गया कि उन्हें राष्ट्रीय व्याघ्र संरक्षण प्राधिकरण से अवनी पर कार्रवाई की इजाजत प्राप्त थी। भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अनुसार बाघिन अवनी की हत्या नहीं हुई है। उसे मारना सही है। अधिनियम कहता है कि यदि कोई बाघ आदमखोर हो चुका है, गंभीर बीमारी से ग्रस्त है या किसी अन्य कारण को लेकर चीफ लाइफ वार्डन तय कर सकता है कि बाघ को मारा जाए या नहीं। चीफ लाइफ वार्डन ही तय करता है कि उसे बेहोश किया जाए, स्थानांतरित किया जाए या गोली मार दी जाए। हमारा कानून यह भी कहता है कि आत्मरक्षा के लिए आप बाघ को मार सकते है और इसके साथ ही यदि वह सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है तो उसे मारा जा सकता है। यह है हमारा कानून। वन विभाग की टीम ने आत्मरक्षा का तर्क देते हुए बाघिन पर गोली चलाई थी। कई पशु प्रेमियों का कहना है कि यह गलत है कि उस पर गोली चलाई गई यदि आत्मरक्षा के लिए गोली चलाई गई होती तो गोली बाघिन के पिछले हिस्से की जगह अगले हिस्से में लगती।
अवनी चली गई। अपने पीछे कई सवाल छोड़ गई और बहस के लिए विषय भी। अवनी अपने पीछे दो नन्हें बच्चे भी छोड़ गई जिनका ध्यान रखना हमारा दायित्व है।
📃BY_vinaykushwaha
रविवार, 28 अक्टूबर 2018
बात केवल जमाल खाशोगी की नहीं है....
गुरुवार, 18 अक्टूबर 2018
इलाहाबाद और भी हैं...
भारत एक शानदार देश है। इसकी महानता इसकी विशालता और विविधता से दिखाई पड़ती है। भारत कोई एक झटके में बनने वाला देश नहीं है। इसने कई उतार-चढ़ाव देखें हैं। भारत का नाम शकुंतला के पुत्र भरत के नाम पड़ा। भारत को और भी अनेक नामों से जाना जाता था और है। इन नामों में आर्यावर्त, जम्बूद्वीप जैसे नाम हैं। भारत को भारत आज कितने लोग बोलते हैं? यह सवाल नहीं बल्कि भारत सरकार के लिए एक बड़ा सवाल है। अंग्रेजों के आने के बाद भारत इंडिया बन गया। वास्कोडिगामा ने भारत की खोज नहीं की थी बल्कि इंडिया की खोज की। भारत को उसके बाद से इंडिया नाम से नाम भी जाना जाने लगा। आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत इंडिया है न कि भारत। यह हमारी बिडंबना है कि भारत, भारत में है और भारत से बाहर इंडिया। हमारे देश के कुछ अंग्रेजीदां लोग भी भारत की एवज में इंडिया ही बोलते हैं।
नामकरण संस्कार सोलह संस्कारों में से एक महत्वपूर्ण संस्कार है। जब बच्चा बड़ा होने लगता है तो उसे नाम की जरूरत होती है। नामकरण संस्कार इसी का कारण किया जाता है। इसी तरह किसी देश, राज्य और शहरों का नामकरण किया जाता है। किसी भी जगह का नामकरण उसके इतिहास, भूगोल, राजनैतिक कारण, व्यक्तिगत योगदान आदि पर निर्भर करता है। ताजा विवाद इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज रखने को लेकर है। इलाहाबाद उत्तरप्रदेश का एक महत्वपूर्ण शहर है। इसका इतिहास कई दशकों का नहीं बल्कि कई युगों का है। यहां मनु के वंशज पुरुरवा एल का उल्लेख मिलता है। उत्तर प्रदेश सरकार ने यह कहते हुए नाम बदल दिया कि इलाहाबाद का पुरातन काल से नाम प्रयागराज ही था। एक और कारण बताया कि क्या आपका(मनुष्य) एक बार नामकरण करने बाद नाम बदला जाता है? नहीं बदलते तो फिर शहर का नाम क्यों? इसके अलावा इलाहाबाद का इतिहास भी हवा में तैर गया कि इसका नाम अकबर ने इलाहाबाद में बदल दिया था। इलाहाबाद का अर्थ निकाला गया कि अल्लाह का आबाद किया हुआ।
आज मैं एक लेख पढ़ रहा था जिसमें इलाहाबाद का नाम प्रयागराज करने को लेकर कटाक्ष किया गया था कि इलाहाबाद का अर्थ अल्लाह का आबाद शहर नहीं है। इसका कुछ और ही अर्थ होता है। उस लेख में इलाहाबाद का संबंध मनु की बेटी इला से जोड़ा गया। उसमें यह बताया गया कि इलाहाबाद का पहले नाम इलावास था। इलावास बाद में इलाहाबाद बन गया।
नाम बदलने की परंपरा कोई नहीं है। इसमें राजनीतिक प्रभाव ज्यादा रहा है। भारत में शहरों से लेकर राज्यों तक के नामों को बदला गया है। अंग्रेजों के समय मुंबई का नाम बॉम्बे था जो बाद में बंबई हो गया और आखिरी में मुंबई रखा गया। मुंबई रखने पीछे कारण दिया गया मुंबा देवी। मुंबा देवी के नाम पर मुंबई का नामकरण किया गया। केवल मुंबई ही नहीं और भी कई ऐसे शहर है जिनके नाम बदले गए। लोगों की भावना को बरकरार रखने के लिए तुष्टिकरण के लिए आदि। कोलकाता का पुराना नाम कलकत्ता था। कलकत्ता नाम अंग्रेज उपयोग किया करते थे। मद्रास का नाम चेन्नई किया गया। बंगलौर से बंगलुरू हो गया, त्रिवेंद्रम से तिरूवनंतपुरम हो गया, मैसूर , मैसूरू हो गया, पूना से पुणे हो गया। यह सब कुछ एक रात में नहीं हुआ। इन सबके पीछे बात यह थी कि अंग्रेजों की सोच को पीछे छोड़ना चाहते थे। लेकिन हमारे साथ दिक्कत है कि हम भावनाओं में बह जाते हैं।
इससे पहले गुड़गांव का नाम गुरुग्राम करने पर खूब विवाद हुआ लेकिन आखिरकार नाम बदल दिया गया। अब सवाल यह उठता है कि क्या बाकि शहरों का नाम भी बदला जाएगा। मथुरा को मधुपुर कहा जाएगा? कानपुर को कर्णनगरी? लखनऊ को लक्ष्मणावती? कर दिया जाएगा? इस सारे विवाद में वे शहर भी शामिल हैं जो अपने पुराने नामों से पहचाने जाने चाहिए। अजमेर को अजयमेरु, जैसलमेर को जैसलमेरु, अहमदाबाद को कर्णावती, भोपाल को भोजपाल, हैदराबाद को भाग्यनगर, इंदौर को इंदुर, भुवनेश्वर को बिंदु सरोवर, मेरठ को मयराष्ट्र, जबलपुर को जबआलीपुरम, दमोह को तुंडीकेर कर देना चाहिए। क्या यह संभव है? परंपरा और पुरातन व्यवस्था के आधार पर नाम बदलना कहां तक उचित है। क्या सरकार में हिम्मत है कि वह दिल्ली का नाम इंद्रप्रस्थ और पटना का पाटिलीपुत्र करके दिखाए।
राज्यों का नाम भी समय-समय पर बदला गया। उत्तरांचल को उत्तराखंड कर दिया। उड़ीसा को ओडिशा कर दिया। क्या असम का नाम भी प्रागज्योतिष रखा जाएगा? महाभारत में असम का उल्लेख प्रागज्योतिष के नाम से मिलता है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ का रामायण में दंडकारण्य के नाम से उल्लेख मिलता है।
सरकार को नाम बदलने से बढ़िया है कि काम करें। लोगों का हित देखे। लोगों के जीवन में समृद्धि आए ऐसे काम करें। नाम बदलना सरकार काम नहीं है। जब जनता चाहेगी तब नाम बदल जाएगा। सरकार को नामकरण को ट्रेंड नहीं बना लेना चाहिए। छत्तीसगढ़ सरकार की तरह नया रायपुर का बदलकर अटल नगर कर दिया। इतिहास गवाह है कि सत्ता जिसके हाथ में रही है उसने अपने पूर्व की सत्ता की बातों को पलटा है।
पुराने समय से लेकर आज तक इतिहास उठाकर देखिए एक शहर कितने नामों से जाना गया है। एक शहर के कम से कम दो नाम जरुर मिलेंगे। जब मुस्लिम आक्रमणकारी आए तो उन्होंने अरबी और फारसी वाले खूब नामकरण किए। लगभग सारे बाद वाले शहर इन्हीं की देन है। मुगलों के बाद अंग्रेज,डच, फ्रांसीसी, पुर्तगाली आए तो इन्होंने अपनी भाषा में शहर का नाम रखा। इसके बाद सुविधानुसार शहर का नाम बदलते गए और शहर भी।
📃BY_vinaykushwaha
शुक्रवार, 14 सितंबर 2018
अटल सोचते होंगे

शुक्रवार, 24 अगस्त 2018
पाकिस्तान और इमरान खान
क्या इमरान पाकिस्तान के पीएम रहते हुए अपना कार्यकाल पूरा कर पाएंगे?
इमरान खान ने 18 अगस्त को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के पद की शपथ लिया. शपथ लेने के साथ ही इमरान पाकिस्तान के अधिकारिक रूप से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बन गए. सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वे अपना कार्यकाल पूरा कर पाएंगे. पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास गवाह है कि आज तक कोई भी प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया है. अभी हालिया उदाहरण हमारे सामने नवाज शरीफ के रूप में है. जिन्हें पनामा पेपर लीक मामले में पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने उनकी उम्मीदवारी को अयोग्य घोषित कर दिया है. उम्मीदवारी अयोग्य घोषित होने के साथ ही उन्हें प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा और 14 साल की सजा हो गई.
नवाज शरीफ के साथ कोई यह पहली बार नहीं हुआ है. साल 1993 में नवाज शरीफ सरकार को तत्कालीन राष्ट्रपति गुलाम खान ने बर्खास्त कर दिया. यह मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा और सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सरकार को बहाल कर दिया. मामला यही नहीं थमा बल्कि राष्ट्रपति गुलाम खान ने फिर से उन्हें पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 58-2b के तहत फिर से बर्खास्त करने का प्रयास किया गया. मामला फिर से सुप्रीम कोर्ट गया और शरीफ ने मामले पर समझौता करते हुए इस्तीफा दे दिया. सरकार केवल 2 साल 7 महीने तक चली.
इसके बाद 1997 में नवाज शरीफ ने फिर से सरकार बनाई. इस बार भी काली परछाइयों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा. जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ उस समय सेना प्रमुख थे. साल 1999 में परवेज़ मुशर्रफ़ ने नवाज शरीफ की सरकार को हटाकर मार्शल लॉ लगा दिया. फिर से नवाज सरकार अपना कार्यकाल पूरा करने में नाकाम रही. मुशर्रफ़ ने देश पर 1999 से लेकर 2001 तक तानाशाह के रूप में शासन किया. साल 2001 में परवेज़ मुशर्रफ़ राष्ट्रपति बन गया. राष्ट्रपति के रूप में उसने देश में 2001 से 2008 तक शासन किया.
परवेज़ के राष्ट्रपति के रूप में रहते हुए चार प्रधानमंत्री हुए. जिनमें से किसी ने भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया. कोई तीन साल तो कोई दो महीने के लिए प्रधानमंत्री बना. मुशर्रफ़ के राष्ट्रपति रहते हुए युसूफ़ रजा गिलानी ही एकमात्र प्रधानमंत्री थे जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा करने से करीब 10 महीने से चूक गए. उन्होंने 4 साल 2 महीने का कार्यकाल पूरा किया. युसूफ़ को न्यायालय की अवमानना के मामले में उनकी सीट को 2012 में अयोग्य घोषित कर दिया. शेष बचा हुआ कार्यकाल परेवज़ अशरफ़ ने पूरा किया.
पाकिस्तान के इतिहास में यह पहली बार नहीं था कि किसी सेना प्रमुख ने प्रधानमंत्री को उसके पद से हटाने के बाद सत्ता की बागड़ोर अपने हाथ में ले ली हो. इससे पहले 1958 में फ़िरोज खान नून की सरकार को तत्कालीन राष्ट्रपति शकंदर मिर्जा ने बर्खास्त करते हुए मार्शल लॉ लागू कर दिया. इस काम में उनका साथ अयूब़ खान ने दिया जो तत्कालीन सेना प्रमुख थे. नून सरकार ने अपना हनीमून पीरियड भी पूरा नहीं कर पाई. अयूब़ खान ने अपने दोस्त यानी शकंदर मिर्जा को भी नहीं बख्श़ा, हिरासत में ले लिया. बाद में शकंदर को देश से निकाल दिया जिनकी बाद में ब्रिटेन में मृत्यु हो गई. अब पाकिस्तान पर अयूब़ खान का राज था. अयूब़ खान ने 1958 से 1969 तक राष्ट्रपति के रूप में राज किया.
अयूब़ खान के बाद देश के राष्ट्रपति याह्या खान बने. याह्या खान 1969 लेकर 1971 तक देश के राष्ट्रपति रहे. पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में 1958 से लेकर 1971 तक कोई भी प्रधानमंत्री नहीं रहा. याह्या खान के राष्ट्रपति रहते हुए नुरुल अमीन मात्र 13 दिनों के लिए प्रधानमंत्री बने.
वर्ष 1971 में बंगलादेश युद्ध हुआ. जुल्फिकार अली भुट्टो 1971 से 1973 तक राष्ट्रपति रहे. इस दौरान कोई भी प्रधानमंत्री नहीं बना. साल 1973 में जब जुल्फिकार अली भुट्टो देश के प्रधानमंत्री बने. जुल्फिकार के प्रधानमंत्री रहते हुए 1977 में सेना प्रमुख जिआ-उल-हक को नियुक्त किया गया. जैसे ही जिआ-उल-हक सेना प्रमुख बने उसी वर्ष जुल्फिकार सरकार को हटाकर मार्शल लॉ लगा दिया. साल 1978 में जिआ-उल-हक खुद ही राष्ट्रपति बन गया. पाकिस्तान पर 1978 से लेकर 1988 तक राष्ट्रपति रहे. जिआ के काल में केवल एक बार चुनाव हुए. वर्ष 1985 में हुए इस चुनाव में मोहम्मद खान जूनेजो प्रधानमंत्री बने. इस चुनाव की सबसे बड़ी बात यह थी कि यह निष्पक्ष चुनाव नहीं था. यह पार्टी बेस्ड चुनाव न होकर स्वतंत्र चुनाव था. जूनेजो 1985 से लेकर 1988 तक प्रधानमंत्री रहे.
साल 1988 में फिर से पाकिस्तान में चुनाव हुए. इन चुनावों पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की जीत हुई. बेनजीर भुट्टो पाकिस्तान की पहली महिला प्रधानमंत्री बनी. बेनजीर, जुल्फिकार अली भुट्टो की बेटी थी. यह सरकार भी ज्यादा दिनों तक नहीं चली. पाकिस्तान में फिर से 1990 में चुनाव हुए जिसमें नवाज शरीफ चुनकर आए. इन्हें मार्शल लॉ के जरिए हटा दिया गया.
पाकिस्तान वैसे तो एक लोकतांत्रिक देश है लेकिन उसका पूरा नाम इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान है. क्रिकेट से राजनीति की दुनिया में आए इमरान खान पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में कुछ नया करने के लिए आए. भले ही उन्हें चुनावों में पूर्ण बहुमत न मिला हो लेकिन वे जनता के मुद्दों को उठाने में सफल रहे हैं. इमरान ने पाकिस्तान के चार बड़े मुद्दों पर खुलकर आवाज बुलंद की जिनमें बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, पाकिस्तान की चरमराती अर्थव्यवस्था और आतंकवाद है.
राजनीति में आने के बाद इमरान ने हमेशा ऐसे मुद्दों को अपनी आवाज दी है जो जनता को प्रभावित करते हैं। नवाज शरीफ, आसफ अली जरदारी जैसे राजनेताओं को कड़ी टक्कर दी। पाकिस्तान की दो सबसे बड़ी पार्टियां मुस्लिम लीग और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को इमरान की नवांकुर पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ ने चुनौती दी है। आम चुनाव 2018 में तो दोनों पार्टियां घुटने टेकते हुए नज़र आईं। भारत के विषय में इमरान ने हमेशा सधी टिप्पणी की है। क्रिकेटर यह बात अच्छे से समझता है कि किस गेंद पर चौका और किस गेंद पर छक्का लगाना है.
अभी तक इमरान तीन शादियां कर चुके हैं. तीसरी पत्नी बुशरा मानेका ने उन्हें एक बार कहा था कि यदि आप प्रधानमंत्री बनना चाहते हो तो आपको तीसरी शादी करनी होगी. बुशरा मानेका एक पीरनी है, उन्हें पिंकी पीर के नाम से भी जाना जाता है. अब देखना होगा कि बुशरा बीबी की भविष्यवाणी किस हद तक सही होगी और कब तक इमरान को पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनाकर रखेंगी।
यही दौर पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में चलता रहा है. आगे क्या होगा यह तो समय ही बताएगा. इमरान की सरकार शायद अपनी सरकार के पांच साल पूरा करने में कामयाब हो.
📃BY_vinaykushwaha



