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मंगलवार, 8 सितंबर 2020

चलते-चलते (सीरीज - 17 ) : मेरा अंतर्मुखी होेना मेरे लिए कैसे कष्टदायक साबित हुआ

 

आज मुझे नोएडा में रहते हुए 2 साल से भी ज्यादा हो गए हैं। कभी सोचा भी नहीं था कि दिल्ली-एनसीआर में रहूंगा और एबीपी जैसे बड़े न्यूज चैनल में काम करने का मौका मिलेगा। साल 2018 में जब मेरा कैंपस सिलेक्शन हुआ तो मुझे ज्यादा खुशी नहीं हुई थी क्योंकि मन में कुछ और ही था। मन में जो था उसका यहां जिक्र नहीं करूंगा लेकिन कुछ-कुछ बातें जरूर कहूंगा। मुझे कैंपस सिलेक्शन से भले ही खुश नहीं थी लेकिन दुखी भी नहीं था। मेरा मन तो उन लोगों के लिग दुखी था जो आस लगाए बैठे थे कि एबीपी न्यूज आएगा और हमारा सिलेक्शन होगा। मेरे कुछ दोस्त तो इसके लिए वाकई लायक थे। कई के पास एक्सपीरियंस था तो कई टेक्नोलॉजी में आगे थे तो कई तेज-तर्रार थे। मैं अपने आपको रेस में कहीं भी नहीं गिनता ही नहीं था। 


जब मेरा एबीपी न्यूज में सिलेक्शन हुआ तो कुछ की सोच ऐसी थी कि इसका कैसे हो गया। ये है कौन ? इससे अच्छा तो वो था फिर भी उसका सिलेक्शन नहीं हुआ। मेरे बारे में तरह-तरह के विचार गढ़े जाते थे। मैं जानता था ऐसा होना लाजिमी था। इसका सबसे बड़ा कारण था मेरा अंतर्मुखी होना जिसे अंग्रेजी में Introvert कहते है। मैं ज्यादा लोगों से बात नहीं करता था। मुझे नए लोगों से मेलमिलाप में कठिनाई होती है। मैं थोड़ा रिजर्व तरह का इंसान हूं। मैं किसी से ज्यादा बात नहीं करता लेकिन जब मेरा कोई दोस्त बन जाता है तो मैं उससे खूब बातें करता हूं। यूनिवर्सिटी में जब मैंने एडमिशन लिया था तब मैं क्लास लेता था और सीधे अपने रूम पर चला जाता था। न किसी से मिलना, न किसी से बातचीत करना और न ही किसी को हैलो-हाय करना। जीवन में मुझे बहुत कुछ मिला है। 

जिसकी मैंने इच्छा भी नहीं की वो भी मुझे बड़े आराम से मिला। मैंने पहले सेमेस्टर में मैंने शायद ही किसी से बात की हो, हां ये जरूर है कि जरूरत पड़ने पर मैंने लोगों से बात की है। दूसरे सेमेस्टर में मेरा दायरा बढ़ा, मैंने लोगों से दोस्ती की। मेरी दोस्ती क्लास तक ही सीमित थी। वहीं तब तक मेरे क्लासमेट के फ्रेंड यूनिवर्सिटी के दूसरे डिपार्टमेंट के भी बन चुके थे। इसका सबसे बड़ा कारण ये हो सकता है कि मैं बहुत अकडू और अक्खड़ स्वभाव का था। मैं किसी से सीधे मुंह बात नहीं करता था। लोगों का मजाक मुझे पसंद नहीं था। धीरे-धीरे ये स्वभाव गुम होता चला गया और मेरे दोस्तों का दायरा बढ़ता चला गया। फर्स्ट सेमेस्टर की अपेक्षा सेकेंड सेमेस्टर में मेरे दोस्तों का दायरा बढ़ा। मैं उन लोगों के करीब आता गया जो मेरे टाइप के नहीं थे। जीवन बहुत कुछ सिखाता है।


तीसरे सेमेस्टर में वो सारी गतिविधियां होने लगीं जो मुझे अनैतिक लगती थीं। चाय की दुकान पर घंटों तक बैठना, कैंटीन में बैठकर गप्पे मारना, कॉलेज में फालतू बैठना, शॉपिंग मॉल जाना, घूमने जाना और रात में देर तक घूमना। सब कुछ धीरे-धीरे अच्छा लगने लगा। कभी-कभी तो मन करता था कि ये मैं नहीं हूं। मैं कभी भी इस तरह से अपने आपको नहीं पाया था। चौथे सेमेस्टर तक यूनिवर्सिटी से इतना लगाव हो गया मन में केवल यूनिवर्सिटी समा गई। जीवन को सरल और सीधा देखने वाला इंसान आज इतना ज्यादा कॉम्प्लेक्स हो गया कि कई बार मैं अपने आपको देखकर सोचता था कि क्या ये सही है। कई बार तो ये भी होता था कि मैं और मेरे दोस्त रात में घूमने के लिए उज्जैन निकल जाते थे। भोपाल से रात 10 बजे निकलना और रात को 3 से 4 बजे तक पहुंचना फिर राम घाट में नहाना और फिर महाकाल मंदिर में जाकर दर्शन करना फिर दिन में भोपाल लौटना सबकुछ अलग अनुभव होता था। 


मैं खुद ट्रैवल लवर हूं। मुझे ट्रैवल करना पसंद है और ट्रेवलॉग लिखना पसंद है। कॉलेज में पढ़ाई के दौरान भी मैं कहीं ना कहीं चले जाता था। घूमने का मतलब ये नहीं कि मैं चार लोगों को साथ लेकर जाऊं ऐसा नहीं होता था। मैं सोलो ट्रैवल पसंद करता था। उस यात्रा की व्याख्या अपने ब्लॉग से करना मुझे पसंद था। आज भी ये सिलसिला जारी है और रहेगा शायद। आज मुझे घर से बाहर रहते हुए 6 साल से ज्यादा हो गया है। इन 6 सालों में मैंने जितना जिया और जितना सीखा है, उतना शायद पहले कभी नहीं। मेरे 6 साल कभी न भूलने वाले रहेंगे क्योंकि इन 6 सालों में मैंने कई राज्यों और ढेर सारे शहरों की यात्राएं की। यात्राएं हमेशा सबक देती हैं और कुछ करने के लिए कहती हैं। मैंने इन यात्राओं से सीखा अलग-अलग जगहों पर जाने से भाषा, बोली और ट्रैवल एक्सपीरियंस को बहुत संजीदा तरीके से लिया है। 


आज मैंने Introvert वाली दीवार को तोड़ी है लेकिन एक पतली झिल्ली मुझे तुरंत रिएक्ट करने से रोकती है। मेरी झिझक मुझे एकदम से कुछ करने से रोक देती है। ये झिझक मुझे लोगों से दूर ले जाती है और मुझे कुछ सीखने से रोकती है। आज झिझक को अलग करना चाहता हूं क्योंकि ये मेरे आगे बढ़ने में बाधक है। इस झिझक में मुझे वर्कप्लेस पर काम करने से रोका और नया कुछ सीखने से रोका। एबीपी न्यूज में काम करने के दौरान मैंने सीखा की लोग बहुत निर्दयी होते है। आपको जीवन जीने के लिए इस निर्दयी दुनिया में हमें जीवित रहने के लिए लड़ना बहुत जरूरी है।

 

BY_vinaykushwaha   

बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

चलते-चलते (श्रृंखला 10)


फिल्में समाज को सीख देती है। समाज को सामाजिक, धार्मिक,सांस्कृतिक,वैचारिक रुप से सुदृढ़ रखने में मदद करती हैं। सौह्यार्द्र की भावना को कायम करने में मदद करती है। फिल्मकारों के बीच फिल्मों को समाज का दर्पण कहा जाता है। दर्पण कहना सही भी है क्योंकि व्यक्ति समाज में रहकर सीखता है और अपनी जिंदगी में वही उतारता है। फिल्मकारों का यह कहना कि समाज में जो हो रहा है हम वही दिखा रहे है, यह बिल्कुल गलत है। समाज केवल व्यक्ति विशेष की सोच से नहीं चलता। समाज चलता है विचारों या यूं कहे कि सुविचारों से। आजकल कुछ फिल्मकार फिल्म को प्रसिद्धि दिलाने के लिए अव्यवहारिक बातों को बढ़ावा देते हैं।

हाल ही में रिलीज हुई  फिल्म पद्मावत पर हुए विवाद से यही बताया जा सकता है। समाज और देश की जनता के बीच इतना क्रोध एक फिल्म के प्रति कभी नहीं देखा गया। आप किसी भी वर्ग विशेष की भावना को ठेस पहुंचाकर फिल्म बना तो सकते है परंतु फिल्म को रिलीज करवाना आपके गले की फांस बन जाएगा। पद्मावत का विवाद कोई आम विवाद नहीं था। यह सरासर इतिहास के साथ छेड़छाड़ थी। इतिहास से छेड़छाड़ मतलब कि लोगों की भावनाओं से खिलवाड़। समाज केवल क,ख, ग,घ से नहीं चलता बल्कि यह तो प्रेम और भावनाओं के विश्वास से भी चलता है। पद्मावती का नाम पद्मावत होने तक इस फिल्म ने कई विवादों को जन्म दिया गया। मलिक मोहम्मद जायसी रचित पद्मावत एक महान महाकाव्य जिसकी फिल्म निर्माता ने छवि बिगाड़ने की कोशिश की है।

भारत की फिल्म इंडस्ट्री में कई महत्वपूर्ण फिल्मों का निर्माण हुआ है। इस इंडस्ट्री ने कई महान फिल्मों को जन्म दिया है। मदर इंडिया, मुगल-ए-आजम, पाथेर पांचाली, अंकुर, डॉ कोटनिस की कहानी जैसी फिल्मों ने समाज को बहुत कुछ दिया है। इन फिल्मों के माध्यम से दर्शक दीर्घा तालियां बजाने के साथ-साथ खुद को फिल्म से जोड़े बिना नहीं रह पाया। लेकिन हालिया कुछ फिल्मों ने इस छवि को मिट्टी पलीत कर दिया मतलब नाम मिट्टी में मिला दिया। फिल्म के नाम से लेकर स्टोरी तक आजकल एक क्रिएटिविटी नहीं बल्कि एक सोच को अंजाम देना या फिर कहे कि जानबूझकर तंग(tease) किया जा रहा है।

दक्षिण भारत में निर्मित फिल्में एक बड़ा परिदृश्य लेकर लोगों के सामने आती है। कई फिल्में है जिन्होंने सीख दी है साथ-साथ टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में अहम भूमिका अदा की है। कई फिल्में ऐसी है  जिनमें सीन को इस तरह फिल्माया जाता है जो बेहद आपत्तिजनक लगते है। फिल्मकार यह बोलकर अपना तल्ला छुड़ाना चाहते है कि यह समाज की जरुरत है। परंतु यह फिल्में समाज की जरुरत नहीं बल्कि सेक्स उत्सुकता बढ़ाने के अलावा कुछ नहीं करती है। दक्षिण ही क्यों बॉलीवुड से लेकर भोजपुरी सिनेमा तक जमकर अश्लीलता परोसी जा रही है।

भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां हमें वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त है। सभी को कहने, बोलने की आजादी के साथ-साथ किसी भी कृति को व्यक्त करने की आजादी है। इसी बात का फायदा उठाकर कई फिल्मकार धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाकर अपनी फिल्म रिलीज करते हैं। कई ऐसी फिल्में बनी है जिन्होंने किसी धर्म विशेष पर हमला करते हुए लोगों की भावनाओं को बहुत ठेस पहुंचाया है। हिन्दुओं की भावना को विशेष रुप से  ठेस पहुंचाया है। ऐसा किसी देश में नहीं है कि  वहां कि बहुलता वाली आबादी को टारगेट किया जाए। लेकिन ऐसा भारत में सहज ही होता है।

फिल्मकारों और समाज एवं दर्शकों  को यह समझना होगा कि यह क्या हो रहा है?