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सोमवार, 28 सितंबर 2020

मेरा दो दिनों वाला वीक ऑफ





भारत में पांच दिनों के वर्किंग कल्चर वाला माहौल कम देखने को मिलता है लेकिन मेरा सौभाग्य था कि मुझे मिला। पहली फुलटाइम नौकरी में दो दिनों का वीक ऑफ बड़े किस्मत वालों को मिलता है। एबीपी न्यूज में नौकरी करने के दौरान दो दिनों वाला वीक ऑफ का आनंद मैंने जमकर उठाया। घूमने का शौक था और जीवन में नौकरी के अलावा और भी बहुत कुछ करना था इसलिए मैंने इन दिनों को जीभर के जीया। शिफ्ट खत्म करके जल्दी से घर आना और फिर ट्रेन, बस या प्लेन पकड़कर घूमने निकल जाना। 


घूमना मेरे लिए हमेशा से नई ऊर्जा देने वाला रहा है। घर से पढ़ाई करने के दौरान भी मैं घूमने निकल जाता था। कभी जंगलों को देखने, कभी नदी को निहारने, कभी ऐतिहासिक जगहों पर, कभी मंदिरों को देखने, कभी शहर की नब्ज टटोलने, कभी अपने पूर्वजों को देखने निकल पड़ता था। घूमने के बाद में मुझे जो सुकून मिलता है वो और किसी एक्टिविटी से नहीं मिलता। साल 2018 में दिल्ली आने के बाद घूमने का मतलब मेरे लिए केवल खंभा छूकर आना नहीं था। हमारे बघेलखंड में एक कहावत है "खंभा छूकर आना" इसका मतलब है जल्दबाजी करना। दिल्ली आने के बाद मैं घूमने का मतलब ट्रैवलिंग और ट्रैवलॉग में बदल गया। 


मीडिया में काम करने वाले जानते हैं कि सभी एम्प्लाई को वीक ऑफ एक साथ नहीं मिलता है। वो बड़े किस्मत वाले होते हैं जिन्हें वीक ऑफ शनिवार और रविवार को मिलता है। मुझे तो वीक ऑफ सोमवार से शुक्रवार के बीच ही मिलता था। इन दो दिनों को मैंने खूब जिया और जीभर के जिया। दिल्ली में रहने का एक फायदा ये होता है कि यहां से देश के किसी भी कोने में जाने के लिए ट्रेन, बस और फ्लाइट आसानी से मिल जाती है। इसका ये फायदा होता है कि आपका ढेर सारा समय बचता है। दिल्ली के आसापास घूमने के लिए ढेर सारे ऑप्शन भी हैं। जिंदगी जीने के लिए आप जो भी करें लेकिन मेरा मानना है कि आप घूमने जरूर निकलें।


राजस्थान, बिहार, यूपी, एमपी, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, हिमाचल, छत्तीसगढ़, जम्मू कश्मीर में खूब घूमा। कई बार लोग मुझसे पूछते हैं कि इतना घूम कैसे लेते हो? मेरा केवल एक ही जवाब होता है कि बस घूम लेता हूं। मुझे पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम की एक बात हमेशा याद आती है कि "सपने वो नहीं होते जो आप सोने के बाद देखते हैं, सपने वो होते हैं जो आपको सोने नहीं देते''। घूमने के लिए मेरा इतना ज्यादा उत्साह है कि गहरी नींद से उठकर भी घूमने के लिए तैयार हूं। कॉलेज में उन लोगों में से एक था जो घूमने का प्लान बनाते थे और घूमने के लिए सबसे पहले हामी भरते थे।


कॉलेज में पढ़ाई के दौरान घूमने का समय ही समय था लेकिन पैसों की कमी होती थी। आज जब सारे दोस्त नौकरी कर रहे हैं तो पैसा तो है लेकिन टाइम नहीं है। खैर मैं तो ठहरा अल्हड़ आदमी। सभी जगह अकेले ही निकल पड़ता हूं। दिल्ली के चांदनी चौक जाकर गली कूचों में घूमना हो या जयपुर में बड़ी चौपड़ में घूमने, राजस्थान की रेत के धोरे देखना हो या उत्तराखंड, हिमाचल के पहाड़ देखना। सबकुछ मेरे लिए रोमांच से भर देने वाला है। सोलो ट्रेवलिंग का भूत कोरोना काल में बड़े मुश्किल से उतरा। खुद को बहुत समझना पड़ा कि विनय बाहर खतरा बहुत है जरा संभलकर। कोरोना की वजह से मैंने घूमना-फिरना बिल्कुल बंद कर दिया है। मार्च से सितंबर तक 6 महीने हो चुके हैं नोएडा से बाहर नहीं निकला हूं। कभी-कभी लगता है कि किसी काल कोठरी में कैद हो गया हूं। 


कोरोना का ये दौर जल्दी से गुजर जाए। मुझ जैसे कितने ही परिंदे पिंजड़े में फड़फड़ा रहे होंगे। दो दिनों के वीक ऑफ में घूमने इतना आसान भी नहीं था। पहले से टिकट करना, होटल बुक करना, कैब बुक करना, कोई हॉली डे तो नहीं ये देखना, ऑफिस का ओवर टाइम, बॉस का वीक ऑफ ही कैंसिल कर देना और भी बहुत कुछ। कई बार तो मैं नाइट शिफ्ट पूरी करके दिन में ही निकल पड़ता था घूमने। अपनी नींद ट्रेन और बस में ही पूरी करता था। कई बार दिन की शिफ्ट पूरी करता और नाइट को ट्रैवल करता था। इसकी सबसे बड़ी वजह होती टाइम सेविंग। इस तरह मैं घूमने के लिए ज्यादा से ज्यादा समय बचा पाता था। 


जहां मैं घूमने जाता था उसके बारे में सारी जानकारी पहले से ही जुटा लेता हूं। मैं कुछ चुनिंदा जगहों को चुनता हूं और उसका इतिहास, भूगोल और वर्तमान सबका छानबीन लेता हूं। कम खर्च हो उसके लिए मैं शहर में टूरिस्ट प्वॉइंट जाने के लिए पैदल सफर करता हूं। कम किराए वाले होटल चुनता हूं। रेस्त्रां भी इस तरह चुनता हूं कि महंगें ना हों, खरीददारी नहीं करता हूं क्योंकि टूरिस्ट प्लेस चीजें सबसे महंगी बिकती हैं। कोशिश करता हूं कि ऑनलाइन पेमेंट करूं ताकि समय और पैसे दोनों बचा सकूं। म्यूजियम और दूसरी जगहों पर लगने वाले टिकट को पहले से ही संभव हो तो ऑनलाइन बुक कर लेता हूं। पानी की बोतल साथ लेकर चलता हूं ताकि बार-बार पानी की बोतल नहीं खरीदना पड़े। 


ठंड में सबसे ज्यादा घूमने की कोशिश करता हूं। इसके दो फायदे हैं पहला ट्रेन, बस और फ्लाइट में टिकट जल्दी और आसानी से मिल जाती है, दूसरा भीड़-भाड़ से मुक्ति मिलती है। गर्मियों के दिनों में घूमने वालों की भीड़ बढ़ जाती है। बच्चों की स्कूल की छूट्टी के कारण लोग बड़ी संख्या में घरों से बाहर निकलते हैं। बारिश में घूमना आपको कष्ट दे सकता है। बारिश आपके घूमने के प्लान को कभी भी मिट्टी पलीत कर सकती है। हां, आप किसी ऐसी जगह जा रहे हैं जहां बारिश में ही मजा है तो बात अलग है। मुझे जब भी मानसून में घूमने जाना पड़ता है तो दो-चार दिनों का वेदर अपडेट साथ रखता हूं। देख लेता हूं कि जब मैं घूमने जा रहा हूं तब एक्स्ट्रीम वेदर तो नहीं है ना।  

घूमना आसान नहीं है लेकिन दुनिया का सबसे रोमांचित करने वाला शौक  है। 

मंगलवार, 8 सितंबर 2020

चलते-चलते (सीरीज - 17 ) : मेरा अंतर्मुखी होेना मेरे लिए कैसे कष्टदायक साबित हुआ

 

आज मुझे नोएडा में रहते हुए 2 साल से भी ज्यादा हो गए हैं। कभी सोचा भी नहीं था कि दिल्ली-एनसीआर में रहूंगा और एबीपी जैसे बड़े न्यूज चैनल में काम करने का मौका मिलेगा। साल 2018 में जब मेरा कैंपस सिलेक्शन हुआ तो मुझे ज्यादा खुशी नहीं हुई थी क्योंकि मन में कुछ और ही था। मन में जो था उसका यहां जिक्र नहीं करूंगा लेकिन कुछ-कुछ बातें जरूर कहूंगा। मुझे कैंपस सिलेक्शन से भले ही खुश नहीं थी लेकिन दुखी भी नहीं था। मेरा मन तो उन लोगों के लिग दुखी था जो आस लगाए बैठे थे कि एबीपी न्यूज आएगा और हमारा सिलेक्शन होगा। मेरे कुछ दोस्त तो इसके लिए वाकई लायक थे। कई के पास एक्सपीरियंस था तो कई टेक्नोलॉजी में आगे थे तो कई तेज-तर्रार थे। मैं अपने आपको रेस में कहीं भी नहीं गिनता ही नहीं था। 


जब मेरा एबीपी न्यूज में सिलेक्शन हुआ तो कुछ की सोच ऐसी थी कि इसका कैसे हो गया। ये है कौन ? इससे अच्छा तो वो था फिर भी उसका सिलेक्शन नहीं हुआ। मेरे बारे में तरह-तरह के विचार गढ़े जाते थे। मैं जानता था ऐसा होना लाजिमी था। इसका सबसे बड़ा कारण था मेरा अंतर्मुखी होना जिसे अंग्रेजी में Introvert कहते है। मैं ज्यादा लोगों से बात नहीं करता था। मुझे नए लोगों से मेलमिलाप में कठिनाई होती है। मैं थोड़ा रिजर्व तरह का इंसान हूं। मैं किसी से ज्यादा बात नहीं करता लेकिन जब मेरा कोई दोस्त बन जाता है तो मैं उससे खूब बातें करता हूं। यूनिवर्सिटी में जब मैंने एडमिशन लिया था तब मैं क्लास लेता था और सीधे अपने रूम पर चला जाता था। न किसी से मिलना, न किसी से बातचीत करना और न ही किसी को हैलो-हाय करना। जीवन में मुझे बहुत कुछ मिला है। 

जिसकी मैंने इच्छा भी नहीं की वो भी मुझे बड़े आराम से मिला। मैंने पहले सेमेस्टर में मैंने शायद ही किसी से बात की हो, हां ये जरूर है कि जरूरत पड़ने पर मैंने लोगों से बात की है। दूसरे सेमेस्टर में मेरा दायरा बढ़ा, मैंने लोगों से दोस्ती की। मेरी दोस्ती क्लास तक ही सीमित थी। वहीं तब तक मेरे क्लासमेट के फ्रेंड यूनिवर्सिटी के दूसरे डिपार्टमेंट के भी बन चुके थे। इसका सबसे बड़ा कारण ये हो सकता है कि मैं बहुत अकडू और अक्खड़ स्वभाव का था। मैं किसी से सीधे मुंह बात नहीं करता था। लोगों का मजाक मुझे पसंद नहीं था। धीरे-धीरे ये स्वभाव गुम होता चला गया और मेरे दोस्तों का दायरा बढ़ता चला गया। फर्स्ट सेमेस्टर की अपेक्षा सेकेंड सेमेस्टर में मेरे दोस्तों का दायरा बढ़ा। मैं उन लोगों के करीब आता गया जो मेरे टाइप के नहीं थे। जीवन बहुत कुछ सिखाता है।


तीसरे सेमेस्टर में वो सारी गतिविधियां होने लगीं जो मुझे अनैतिक लगती थीं। चाय की दुकान पर घंटों तक बैठना, कैंटीन में बैठकर गप्पे मारना, कॉलेज में फालतू बैठना, शॉपिंग मॉल जाना, घूमने जाना और रात में देर तक घूमना। सब कुछ धीरे-धीरे अच्छा लगने लगा। कभी-कभी तो मन करता था कि ये मैं नहीं हूं। मैं कभी भी इस तरह से अपने आपको नहीं पाया था। चौथे सेमेस्टर तक यूनिवर्सिटी से इतना लगाव हो गया मन में केवल यूनिवर्सिटी समा गई। जीवन को सरल और सीधा देखने वाला इंसान आज इतना ज्यादा कॉम्प्लेक्स हो गया कि कई बार मैं अपने आपको देखकर सोचता था कि क्या ये सही है। कई बार तो ये भी होता था कि मैं और मेरे दोस्त रात में घूमने के लिए उज्जैन निकल जाते थे। भोपाल से रात 10 बजे निकलना और रात को 3 से 4 बजे तक पहुंचना फिर राम घाट में नहाना और फिर महाकाल मंदिर में जाकर दर्शन करना फिर दिन में भोपाल लौटना सबकुछ अलग अनुभव होता था। 


मैं खुद ट्रैवल लवर हूं। मुझे ट्रैवल करना पसंद है और ट्रेवलॉग लिखना पसंद है। कॉलेज में पढ़ाई के दौरान भी मैं कहीं ना कहीं चले जाता था। घूमने का मतलब ये नहीं कि मैं चार लोगों को साथ लेकर जाऊं ऐसा नहीं होता था। मैं सोलो ट्रैवल पसंद करता था। उस यात्रा की व्याख्या अपने ब्लॉग से करना मुझे पसंद था। आज भी ये सिलसिला जारी है और रहेगा शायद। आज मुझे घर से बाहर रहते हुए 6 साल से ज्यादा हो गया है। इन 6 सालों में मैंने जितना जिया और जितना सीखा है, उतना शायद पहले कभी नहीं। मेरे 6 साल कभी न भूलने वाले रहेंगे क्योंकि इन 6 सालों में मैंने कई राज्यों और ढेर सारे शहरों की यात्राएं की। यात्राएं हमेशा सबक देती हैं और कुछ करने के लिए कहती हैं। मैंने इन यात्राओं से सीखा अलग-अलग जगहों पर जाने से भाषा, बोली और ट्रैवल एक्सपीरियंस को बहुत संजीदा तरीके से लिया है। 


आज मैंने Introvert वाली दीवार को तोड़ी है लेकिन एक पतली झिल्ली मुझे तुरंत रिएक्ट करने से रोकती है। मेरी झिझक मुझे एकदम से कुछ करने से रोक देती है। ये झिझक मुझे लोगों से दूर ले जाती है और मुझे कुछ सीखने से रोकती है। आज झिझक को अलग करना चाहता हूं क्योंकि ये मेरे आगे बढ़ने में बाधक है। इस झिझक में मुझे वर्कप्लेस पर काम करने से रोका और नया कुछ सीखने से रोका। एबीपी न्यूज में काम करने के दौरान मैंने सीखा की लोग बहुत निर्दयी होते है। आपको जीवन जीने के लिए इस निर्दयी दुनिया में हमें जीवित रहने के लिए लड़ना बहुत जरूरी है।

 

BY_vinaykushwaha   

गुरुवार, 25 जून 2020

मैं और किताब

तारीख तो याद नहीं लेकिन साल अच्छी तरह याद है वह था 2014 । शहर था इंदौर जिसे मिनी मुंबई के नाम से जाना जाता है। इंदौर के बापट चौराहे से मुश्किल 200 किमी दूर स्थित आनंद मोहन माथुर सभागार में पंडित विजयशंकर मेहता का सुना तो लगा मानो कुछ नया सुनने को मिला। कपड़े देखकर लगता है कि मानो कोई व्यक्ति धर्मोपदेश देने वाला है लेकिन उसने मैनेजमेंट की गुर बताने शुरू किए। वो उपाय इतने सरल की जीवन में उतारना बेहद आसान। पहली बार मैंने अकेले किसी व्यक्ति को सुनने का इतना साहस किया। साहस ऐसा कि अब तो कुछ बातें मन में घर कर गईं। 

उस सभागार में बैठे कुलीन लोगों में शायद कमतर नहीं था लेकिन उनकी तरह इस तरह के व्याख्यानों के लिए आदि भी नहीं था। उन कुलीन लोगों में अफ्रीका और यूरोप से पहुंचे लोग भी थे जो फर्राटेदार हिंदी बोल रहे थे और अंग्रेजी को हिंदीयत बता रहे थे। उस समय मैं इंदौर में रहकर राज्य सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहा था। मन में ढेर सारे सपने थे क्योंकि इससे पहले केवल मैंने सपने बुने थे, संजोए थे, देखे थे परंतु जीये नहीं थे। जीवन में तरह-तरह के लोगों को देखा नहीं था, कम से कम अकेले तो नहीं। 

हां तो मैं बात कर रहा था पंडित विजयशंकर मेहता की बातें की। बैंक की सरकारी नौकरी छोड़ी, पत्रकारिता में हाथ जमाया लेकिन फिर आध्यात्म की ओर मुड़ गए। आध्यात्म से फिर कुछ इस तरह लगाव हो गया कि भगवान हनुमान को मैनेजमेंट गुरु बना लिया। हमारे हनुमान को वे इस तरह से मानते है कि सारी समस्याओं का समाधान भगवान हनुमान के पास है। जिस दिन मैंने उन्हें सुना उसी दिन उन्होंने एक किताब का जिक्र किया जिसका नाम था 'मेरा प्रबंधक मैं'। पहले तो मैंने सोचा इस किताब को पढ़ा जाएगा लेकिन मेरा मन हमेशा की तरह जांच पड़ताल वाला रहा है। मैंने पंडित के बारे में जानना शुरू किया पता चला कि मेरा दोस्त उन्हीं का शिष्य है। फिर मैंने ढेर सारी बातें पूछ डाली लेकिन जिज्ञासा फिर भी शांत नहीं हुई। मुझे लगा शिष्य है भला गुरु के बारे में गलत क्यों बोलेगा। 

मेरी खोज इंटरनेट पर शुरू हुई यहां ज्यादा कुछ तो नहीं लेकिन किताबें जरूर मिलीं। इन किताबों में मेरा प्रबंधक मैं जरूर मिली। बहुत बार मिली। कई बार मिली। स्टेशन के स्टॉल पर मिली। किताबों की दुकान पर मिली। लोगों के हाथ में मिली। ई-कॉमर्स वेबसाइट में भी मिली। साल बीतते गए। एक फिर दो फिर तीन.... ऐसे करते हुए छह साल हो गए। मैं भी जगह और शहर बदलता गया। इंदौर से नोएडा आ गया। दिल्ली अब दूर नहीं का नारा शायद साल 2020 में ही पूरा होना था। इंटरनेशनल बुक फेयर 2020 में जब ये किताब मिली तो लगा अब बस मुझे इसे खरीद ही लेना चाहिए। किताब तो खरीद ली लेकिन जॉब वाली लाइफ में और ऊपर से मुझ जैसा आवारा। कैसे इतनी जल्दी किताब पूरी कर पाता। पूरे पांच महीने 15 दिन बाद किताब आखिरकार पढ़ ही ली। 

शुरुआत में किताब अन्य साधारण किताब की तरह लगी। लगा छोड़ दूं लेकिन धीरे-धीरे पढ़ता गया और किताब को मात्र आधे घंटे में खत्म कर दी। मात्र 58 पेज की ये किताब जरूर बहुत छोटी है लेकिन साधारण तो बिल्कुल नहीं। मुझे ऐसा लगता है कि यदि हम किसी व्यक्ति पर भरोसा नहीं करते तो ना करें लेकिन हम उसके लिखे हुए को पढ़ तो सकते हैं। पंडित विजयशंकर मेहता कैसे व्यक्ति हैं मुझे नहीं मालूम। मैं उनसे व्यक्तिगत तौर पर जरूर मिला हूं परंतु नहीं कह सकता कैसे हैं? किताब मेरा प्रबंधक मैं आपको राह दिखाती है। मोटिवेट करती है। नकारात्मक से सकारात्मक की ओर ले जाती है। आपको ब्राइट से ब्राइटर बनाने के गुर बताती है। 

परिवार, दोस्त और स्वयं का मूल्य बताने वाली ये किताब हमें स्वयं से जरूर मिलवाती। टाइम मैनेजमेंट कैसे किया जाता है ये किताब बताती है। निजी, पारिवारिक, सामाजिक और व्यावसायिक क्रम को व्यवस्थित रखना सिखाती है। किताब आपको पढ़ना है या नहीं ये आपको तय करना है लेकिन किताब कैसे पढ़ना है ये भी आपको तय करना है। जीवन के आयाम बताने वाली इस किताब को मैंने आखिरकार पढ़ ही लिया। 

शुक्रवार, 29 मई 2020

चलते-चलते (सीरीज -16)

बचपन बड़ा ही मासूम होता है। कुछ सोचकर भी समझने की कोशिश अलग ही अंदाज में करता है। जब मैंने पहली महामारी का नाम सुना था तब शायद मेरी उम्र 9-10 साल रही होगी। उस समय तो केवल इतना ही पता था महामारी कोई बीमारी है। लेकिन ये क्या बला है? इसका अंदाजा उस उम्र में नहीं था। उस समय तो एक-दो बार मैंने महामारी को महाबीमारी तक लिख दिया। अब तो उस बात को सोचता हूं तो हंसी आती है। वो प्यारा बचपन जिसमें कोई भी संकट आ जाए सब झेलने की भावना थी क्योंकि संकट का पता ही नहीं होता था कहते किसे हैं। 

जब धीरे-धीरे बड़े हुए तब मालूम हुआ कि महामारी किस बला का नाम है। महामारी यानी इंग्लिश में एपिडैमिक। जब बीमारी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में बड़ी तेजी से फैलती है और एक बड़े हिस्से को प्रभावित करती है तो इसे महामारी कहते है। बचपन से लेकर दिसंबर 2019 तक मेरा सामना किसी बीमारी से नहीं हुआ। जब कोरोना वायरस जैसी महामारी का पता चला तो जीवन में बहुत से बदलाव आ गए। किताबों, टीवी और बड़े लोगों से केवल सुनते थे कि चेचक, हैजा जैसी महामारी का प्रकोप कभी भारत में हुआ था। 

आज की स्वास्थ्य व्यवस्था को देखकर लगता है कि उस समय स्थिति कितनी भयावह रही होगी। कोरोना वायरस ने आज वही स्थिति पैदा कर दी है जो आज से कई साल पहले थी। 
डब्ल्यूएचओ ने कोरोना को महामारी नहीं बल्कि विश्वमारी घोषित किया है। इस विश्वमारी इंग्लिश में पेनडैमिक कहते हैं। इसने विश्व के सभी देशों को प्रभावित किया है। अमेरिका से लेकर जापान और रूस से लेकर ऑस्ट्रेलिया सभी देश आज इसकी चपेट में हैं। महामारी की विभीषिका कितनी भयानक होती है आज देखने को मिल रहा है। हमें अलेक्जेंडर फ्लेमिंग का शुक्रगुजार होना चाहिए कि एंटीबायोटिक की खोजकर उन्होंने मानवजाति को वरदान दिया है। 

चीन से पनपा ये वायरस आज भारत के गांव तक पहुंच गया है। जीवन में दहशत का एक नया अध्याय जोड़ दिया है इस कोरोना वायरस ने। आज मुझे जब मालूम हुआ कि मेरे सेक्टर में फिर से कोरोना वायरस की दस्तक हुई है तो शुरू में मन शांत था लेकिन मन की लहर तीव्र गति से अशांति की जाने लगी। कभी-कभी लगता है कि ये बीमारी कब खत्म होगी? होगी भी या नहीं। दुनिया के कई सारे देश वैक्सीन बनाने में जुटे हैं। क्या होगा यदि वैक्सीन शत-प्रतिशत सही नहीं हुई तो? जीवन का अंत ऐसे में करीब नजर आने लगता है। आज डॉक्टर कोरोना से पीड़ित जिन मरीजों का इलाज कर रहे हैं। डॉक्टर इलाज नहीं कर रहे बल्कि अंधेरे में तीर चला रहे हैं। कोई एचआईवी एड्स की दवा, कोई मलेरिया की दवा तो कोई फ्लू में काम आने वाली दवा उपयोग कर रहा है। पता नहीं क्या होगा? 

कोरोना वायरस जिसे कोविड 19 के नाम से भी जाना जाता है इसलिए भी खतरनाक है क्योंकि आजतक इसका सोर्स पता नहीं चल पाया है। वुहान वायरोलॉजिस्ट की वैज्ञानिक जिसे आज लोग बैट वूमेन के नाम से जानते हैं उसने कहा कि ये तो मात्र एक वायरस है जो चमगादड़ में पाया जाता है ऐसे कई वायरस है जो पूरी दुनिया को परेशान कर सकते हैं। कोविड 19 कोई पहला वायरस नहीं है जो जानवर से इंसानों में आया। इससे पहले सॉर्स, मर्स, इबोला जैसी बीमारियों की लंबी सूची है। 

लोगों ने कई सारे प्लान बनाए थे जो कोरोना की वजह से धराशायी हो गए। मैंने भी प्लान बनाए थे। घुमक्कड़ी का शौक रखने वाला मैं, घूमने के लिए कई सारे डेस्टिनेशन खोज लिए थे। गर्मी इस बार पहाड़ों पर बिताऊंगा ऐसा सोचा था लेकिन किस्मत इस बार कोरोना के साथ थी। साल 2020 सभी के लिए काला रहा है। त्योहार, पर्व, इवेंट, शादी, प्लान की बलि चढ़ गई। कई लोगों की नौकरी चली गई तो कई लोग काल के गाल में समा गए। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट इस बार निगेटिव रखी है। इससे भयानक और क्या हो सकता है। जब तक इस कोरोना से पीछा नहीं छूटता सब भयानक है भयावह है। 

मंगलवार, 19 मई 2020

चलते-चलते (सीरीज-15)



पहले लॉकडाउन आया,इसके बाद लॉकडाउन 2.0 आया फिर लॉकडाउन 3.0, इसके बाद लॉकडाउन 4.0 पता नहीं आगे क्या होने वाला है। क्या फिर से लॉकडाउन बढ़ेगा या फिर लॉकडाउन  को खत्म कर हमारी जिंदगी फिर से सामान्य हो जाएगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर तमाम मेडिकल से जुड़े व्यक्तियों का कहना है कि कोरोना वायरस अब हमारे साथ रहेगा। इसका मतलब है कि आने वाले समय कोरोना आम फ्लू की तरह हो जाएगा। इस फ्लू के साथ हम जीवन बिताएंगे। लेकिन ये कब तक होगा? किसी को इस बात की जानकारी नहीं।

वैज्ञानिक वैक्सीन की खोज में डटे हुए हैं। दुनियाभर के देशों में कोरोना के खिलाफ जंग जारी है। बांग्लादेश के वैज्ञानिकों का कहना है कि पशुओं में कीड़े मारने वाली दवा आईवरमेक्टिन और डॉक्सीसायक्लिन का कॉम्बिनेशन बनाया। इस कॉम्बिनेशन से कोरोना के इलाज में मदद मिलेगी। ये तो समय ही बता पाएगा  कि क्या इलाज के लिए बेहतर है क्या नहीं? कुछ समय पहले तक हाइड्रोक्सीक्लोरीक्वीन के लिए पूरी दुनिया में शोर मच रहा था। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने तो हाइड्रोक्सीक्लोरीक्वीन के लिए भारत को धमकी तक दे डाली थी। हांलाकि भारत ने एशिया से लेकर अमेरिका तक हाइड्रोक्सीक्लोरीक्वीन बांटी। ट्रंप से उलट अमेरिका के कई वैज्ञानिकों ने इस दवा के प्रभाव को नकार दिया और यहां तक कहा कि भारत से आने वाली ये दवा घटिया क्वालिटी की है।

हाइड्रोक्सीक्लोरीक्वीन दवा मुख्य रूप से मलेरिया में उपयोग होने वाली दवा है। भारत इस दवा का सबसे बड़े उत्पादक देश में से है। भारत की महानता तो देखिए कि कोरोना से लड़ाई कोई देश ना हारे इसलिए पाकिस्तान को भी मेडिकल सप्लाई दी। पाकिस्तान में इस बात का विरोध हुआ कि हम दुश्मन देश से मेडिकल सप्लाई कैसे ले सकते हैं। वहां पीएम इमरान खान ने जांच कमेटी बैठा दी। वाह रे! राजनीति क्या-क्या करवा देती है। जब हम चीन से घटिया मास्क और पीपीई किट ले सकते हैं तो हमने तो पाक को अच्छी क्वालिटी का सामान दिया था।

कई देशों में रेमडेसिवर दवा का इस्तेमाल किया जा रहा है। रेमडेसिवर दवा इबोला के लिए विकसित की गई थी लेकिन उपयोगी सिद्ध होने से कोरोना के काम आ रही है। भारत में फेविपीरावीर नामक दवा का ड्रग ट्रायल शुरू किया जाएगा। ये दवा चीन और जापान में फ्लू के लिए इस्तेमाल की जाती है। इसके पहले भारत में दूसरी दवाओं के साथ प्रयोग देखा गया है। इन दवाओं में एड्स की दवा भी शामिल है। जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल में डॉक्टरों ने इस दवा का उपयोग किया था जो कहीं हद तक सफल रहा था। कई जगह खांसी-जुकाम में काम आने वाली पैरासिटामॉल के साथ भी प्रयोग देखा गया।

कोरोना पर कौनसी दवा का असर होगा? किस दवा का असर नहीं होगा? समय ही बता पाएगा। कोरोना ने जीवन को माफ कीजिएगा दैनिक जीवन को बदल दिया है। मास्क के बिना अब जीवन अधूरा सा लगता है। ऐसा लगता है मानो कुछ छूट गया हो। जब पीएम ने कहा है कि गमछा भी कारगर है तभी से हम भी गमछामैन बन गए। इस भंयकर महामारी के बीच भी ऑफिस जाते है और बहुत सारे जतन करके जाते हैं। सैनिटाइजर और सोशल डिस्टेंस अब जरूरी हो गया है। बिना मास्क के आपके साथ बुरा व्यवहार हो सकता है या फिर आपको मास्क पहनने के लिए बाध्य किया जा सकता है।

मैं पत्रकार हूं। जिसे रोजाना ऑफिस जाना होता है और कोरोना की भयावह खबरों से दो-चार होना पड़ता है। कोरोना के बढ़ते मामले देश के लिए विश्व के लिए खतरनाक है। दुनिया पर जितना सितम कोरोना ने किया है उतना शायद ही किसी और किया हो। लॉकडाउन से स्थिति में बहुत हद तक सुधार हुआ है। एक स्टडी कहती है कि यदि लॉकडाउन नहीं होता तो भारत में आज कोरोना वायरस  से संक्रमितों की संख्या 53 लाख होती। लॉकडाउन डबलिंग रेट 4 दिन था जो आज 13 दिन हो गया है और रिकवरी रेट भी बढ़ गया है। लॉकडाउन की महिमा अपरंपार है।

इस लॉकडाउन की वजह से प्रकृति सास ले रही है। पुख्ता तौर पर तो नहीं कह सकता लेकिन इस लॉकडाउन की वजह से अभी तक सबसे कम गर्मी पड़ी। अप्रैल 2020 तक मौसम विभाग का कहना है कि भारत में 12 साल में सबसे कम गर्मी हुई। रुक-रुककर बारिश होना और तेज आंधी-तूफान इस प्रकृति जनित हो सकता है लेकिन ये सुहावना रहा। मैं इस मौसम को पहली इंज्वाय कर रहा हूं। मौसम विभाग ने भविष्यवाणी किया है कि इस साल मानसून पांच दिन देरी आएगा। ये देरी किसानों के साथ-साथ भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। मूडीज ने भारत की अर्थव्यवस्था के बारे में संभावना जताई है कि भारत में इतिहास की सबसे बड़ी मंदी आएगी।

अर्थव्यवस्था को झटका तो लगने वाला है। देशभर में इस लॉकडाउन की वजह कई कंपनियां बंद हुई हैं। लोग बेरोजगार हुए हैं। मजदूर वर्ग इस लॉकडाउन से सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। मजदूरों का पलायन जारी है। काम नहीं है, खाना नहीं मिल रहा है, पैसा नहीं है, जमापूंजी खत्म हो रही है, मजदूर अपने घर से पैसे मंगवाकर जीवनयापन कर रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार अबतक 22 लाख मजदूर अपने घर लौटे हैं। राज्य सरकार दूसरे राज्यों से लगने वाली सीमा तक मजदूरों को बसों के जरिए छोड़ रही है बाकी मजदूरों की जिंदगी भगवान के भरोसे। खाना के पता नहीं, घरों तक कैसे पहुंचेंगे पता नहीं, शौचालय नहीं है, कैंपों में पर्याप्त व्यवस्था नहीं।

देशभर से पलायन जारी है। दक्षिण भारत और महाराष्ट्र, गुजरात से पलायन करने वाला मजदूर एमपी गुजरकर अपने घरों तक जा रहा है। एमपी सरकार इतनी सक्षम नहीं की सारा बोझ झेल ले। एमपी में एनएच 3 और एनएच 7 पलायन का सबसे बड़ा जरिया बना है जो दक्षिण को उत्तर से जोड़ता है। इन पर लाखों मजदूर चल रहे हैं। मैं तो यही सोचता हूं कि कोई अनहोनी ना हो। सरकार ने श्रमिक स्पेशल ट्रेन और राजधानी जैसे ट्रेन चलाई लेकिन इनमें सवार होना भी बहुत मुश्किल है। बिहार और यूपी जाने वाली ट्रेनों के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ रही है।

कोरोना ने लोगों को वो दौर दिखाया है जो सबके लिए आसान नहीं है। महाराष्ट्र के 1000 से ज्यादा पुलिसकर्मी कोरोना संक्रमित पाए गए। जब सुरक्षा में सेंध लग जाए तो क्या होगा? मैंने लोगों को जागरूक होते देखा है। सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क, हैंड वॉश करना और हेल्दी खाने की आदत में बदलते देखा है। मैंने अपनी जिंदगी में इतनी रोटी नहीं बनाई जितनी की इस लॉकडाउन पीरियड में बनाई है। मेरा घूमना बंद है। इतने समय तक कभी किसी एक ही शहर में नहीं गुजारा। अब तो जिंदगी ऑफिस से घर और घर से ऑफिस हो गई है। फ्लैट की बालकनी से दूर दिखती हरियाली और बिल्डिंग को निहारना अच्छा अनुभव है। देखो बाकी क्या होगा। जो होगा सब अच्छा होगा।

📃BY_vinaykushwaha

बुधवार, 29 अप्रैल 2020

कोरोना के संकटकाल में खाने का कैसे प्रबंध करें...


रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए ना ऊबरै , मोती, मानस, चून ।। रहीम ने आज से लगभग 500 साल पहले बताया था कि पानी का क्या महत्व है। पानी के बिना जीवन कितना अधूरा है। पानी को सहेजना होगा क्योंकि मानव (Human) से लेकर मोती (Pearl) तक सबकुछ पानी से ही है। पानी ही सबकुछ है लेकिन कोरोना के संकटकाल में लोगों को पता चल गया कि केवल पानी ही सबकुछ नहीं है। जीवन जीने के लिए और जीवित रहने के लिए हमें सूखे खाने को भी इकट्ठा करने की जरूरत है।

इतिहास बताता है कि आक्रमणकारी कई दिनों की यात्रा करके एक स्थान से दूसरे स्थान जाया करते थे। इनकी विशाल सेना में हाथी, घोड़े, शस्त्र-अस्त्र के अलावा ढेर सारा खाना भी होता था। वे ऐसा खाना लेकर चलते थे जो आसानी से खाया जा सके। जब किसी जगह पडाव होता था तो वहां के स्थानीय फसल और शिकार का इस्तेमाल किया जाता था। ये आक्रमणकारी अपने साथ फल, सूखे मेवे जैसे खाने के सामान लेकर चलते थे। इतना ही नहीं ये लोग अपने साथ मसाले भी ले जाया करते थे।

भारतीय पाक कला हजारों साल पुरानी है। इसमें कोई संदेह  नहीं है कि आज से लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों से चावल के प्रमाण मिले हैं जो ये बताता है कि वे केवल पशुपालन पर निर्भर नहीं थे। सिंधु घाटी सभ्यता के समय भारत का व्यापार मिस्त्र (Egypt), मेसोपोटामिया जैसी सभ्यताओं से रहा था। भारतीय व्यापारी इन सभ्यताओं को अनाज और कपास निर्यात करते थे बदले में ये सभ्याताएं मसाले और रत्न, कीमती धातु देते थे। धीरे-धीरे व्यापार का स्वरूप बदलता गया। मौर्य साम्राज्य के समय यूनान (Greece) के साथ व्यापारिक संबंध अच्छे थे।

ग्रीस मौर्य दरबार में अपने राजदूत नियुक्त करते थे। इसके बदले में भारत को सूखे मेवे जैसे खूबानी और इसके अलावा शराब आयात की जाती थी। व्यापारी जब एक जगह से दूसरी जगह जाते थे तो कई दिनों का सफर तय करते थे। इन कई दिनों के सफर में ऐसा खाना ले जाते थे जो हल्का हो जिससे वजन ना बढ़े और जल्दी खराब ना हो। गुजरात और राजस्थान के व्यापारियों में इस तरह के प्रमाण मिलते है कि वे अपने साथ बेसन से बने खाद्य पदार्थ के अलावा अचार भी ले जाया करते थे।

आज भी दोनों राज्यों के खानपान पर बेसन का प्रभाव साफ-साफ दिखाई देता है। गुजरात के व्यापारियों के खाने से लेकर अचार तक में शक्कर का इस्तेमाल किया जाता था। इसके पीछे एक  कारण था कि शरीर में ग्लूकोज की मात्रा में कमी ना हो। शक्कर खाने में होने से व्यापारियों को अलग से मीठे खाद्य पदार्थ लेने की आवश्यकता ही नहीं थी। राजस्थान में तो इसके उलट खाने में लाल मिर्च का इस्तेमाल किया जाता है। राजस्थान के व्यंजनों में लाल मिर्च डालने का सबसे बड़ा कारण शरीर से विषाक्तता निकलना। लाल मिर्च का सेवन करने से पसीना आता था और इससे शरीर से अनावश्यक पदार्थ बाहर निकल जाते थे।

भारत में हर क्षेत्र की अपनी एक विशेषता है। यही विशेषता खाने में साफ-साफ दिखाई देती है। दक्षिण भारत में चावल की अधिक  पैदावार होती है जो वहां के खाने में दिखाई देती है। इडली, डोसा, पुतरेकू, अवियल जैसे खाने तो सामान्य तौर पर खाते ही हैं लेकिन चावल से बने सूखे पदार्थ को लंबे समय तक खाने के लिए रखा जाता है। दक्षिण भारत में जून से सितंबर तक भारत की सबसे ज्यादा बारिश वाला समय होता है तब ये काम आता है।

मैं मध्यप्रदेश का रहने वाला हूं जहां हर मौसम की एक फसल होती है। यहां बारिश का मौसम तेज बरसात वाला और लंबा होता है जिस कारण हरी सब्जियां मिलना मुश्किल होता है। बरसात के मौसम में खाने में बड़ी (बरी) और बिजौरे का होता है। ठंड के समय कद्दू और उड़द की दाल से बनी बरी और तिल के साथ बनने वाले बिजौरे काम आते हैं। एमपी में सोयाबीन की पैदावार अच्छी होने के कारण यहां सोयाबीन की बरी खाने का प्रचलन है। सूखे खाद्य पदार्थ जो ऐसे समय काम आते हैं जब आपको हरी सब्जियां उपलब्ध नहीं होती हैं।

भारत में ठंड का मौसम हरी सब्जियों वाला होता है। इस मौसम में सब्जियां बहुतायत में पैदा होती हैं। मेथी (Fenugreek), पालक (Spinach) जैसी हरे पत्तेदार सब्जियां होती हैं। इन्हें सुखाकर बरसात के समय खाने में इस्तेमाल किया जाता है। पहाड़ी इलाकों में राजमा, चने, चौले, मटर जैसी सब्जियां होती है  जो सालभर खाने में सब्जी के रूप में इस्तेमाल की जाती है। खाना समुचित पोषक तत्व से भरपूर हो इसके लिए भारत में हमेशा से इसका ध्यान रखा जाता है। ठंड के समय तिल, राजगीर, लाई, गुड के लड्डू बनाए जाते हैं जो पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। पूर्वी एमपी और छत्तीसगढ़ में चावल की पैदावार जमकर होती है यही चावल ठंड के समय लड्डू बनाने के काम भी आता है।

जम्मू कश्मीर में आए दिन लॉकडाउन और बंद का सामना करना पड़ता है। लॉकडाउन और बंद के अलावा यहां सर्दियां कटीली और कष्टदायक होती है। इसी वजह से यहां सूखे खाद्य पदार्थ को इकट्ठा करने की विशेषता रही है। यहां राजमा, काबुली चने, सूखे मेवे का इस्तेमाल किया जाता है। ठंड के समय में चाय बनाने के लिए समोवार का इस्तेमाल किया जाता है जिसमें चायपत्ती की जगह गुलदाउदी की पत्ती, केसर, मेवे और नमक का इस्तेमाल किया जाता है। यहां समोवार में बनने वाली चाय मीठी नहीं नमकीन होती है। इसी तरह उत्तराखण्ड और हिमाचल में आलू की पैदावार अच्छी होती है जो यहां के खाने में सालभर दिखाई देता है।

कोविड-19 की वजह से भारत में लॉकडाउन के 36 दिन पूरे हो चुके हैं। करोड़ों लोग को सरकार और समाजसेवी संगठन राशन और सब्जियां उपलब्ध करा रहे हैं। भारत के उन इलाकों जहां सरकार और समाजसेवी संगठन की पहुंच नहीं वहां हाल क्या है ये वही बता सकता है जो भुक्तभोगी है। भारत और भारतीयों के लिए सीख है कि हमें अपने आप से सीखना होगा कि कैसे किसी विपदा से तैयार रहे हैं। जमाखोरी नहीं करना है बल्कि इसका दूसरा विकल्प खोजना है। इस विकल्प में ऐसे खाद्य पदार्थ एकत्रित करना है जो आसान से ही हमारे लिए उपलब्ध है। जैसे चाय बनाने के लिए चाय पत्ती ना हो तो आप सेवंती के फूल या गुलदाउदी के फूल को सुखा कर चायपत्ती के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। यदि ऐसा संभव ना हो पाए तो घर के गमलों का इस्तेमाल करें एक गमले में अगिया घास लगाएं जो चायपत्ती के जगह इस्तेमाल किया जा सकता है।

विपदा के समय घर के गमले काम आ सकते हैं। इन गमले में केवल फूल और शो पत्ती ना उगाएं। इनका इस्तेमाल हरी सब्जी उगाने के लिए इस्तेमाल करें। किचन गार्डन में केवल गार्डन ना हो फल और सब्जियां उगाएं। गमलों में आप हरी धनिया, हरी मिर्च, लौकी, करेला, गिलकी, सेम, पुदीना, करी पत्ता, आलू, टमाटर जैसी सब्जी उगा सकते हैं। जब आपके घर में खाद्य तेल (edible oil) खत्म हो जाए तो उसका क्या विकल्प है? इसका विकल्प ये है कि दूध से घी बनाना सीखें जो आपका सालभर साथ देगा।

ये छोटी-छोटी चीज हैं जो भारत को विपदा में बचा सकती है। लोग अपने आप को सुरक्षित और जीवन में खुशहाली ला सकते हैं। 

📃BY_vinaykushwaha🙂

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

चलते-चलते (सीरीज 14)

ये लॉकडाउन भी बड़ी अजीब चीज है। इस लॉकडाउन ने या यूं कहें कि कोरोना वायरस ने सारी दुनिया को ही लॉक कर दिया। सड़कें, पार्क, मार्केट को खाली करा दिया। उड़ते हुए मशीनी पक्षी को जमीन पर लैंड करा दिया, ट्रेनों की रफ्तार को विराम दे दिया और बसों के पहिए थाम दिए। लॉकडाउन बड़ी चीज है। मैं  भी इस लॉकडाउन का हिस्सा बन गया हूं। इक्कीस दिन के इस लॉकडाउन ने जीवन जीने का और देखने का नजरिया ही बदल दिया। मैं इस तरह भी कह सकता हूं कि बहुत कुछ बदल गया है।
लोग घरों में कैद हो चुके हैं। कैद भी इस तरह की घरों से बाहर निकलना भी डरावना लगता है। सोशल डिस्टेंसिंग ने तो लोगों के बीच और दूरियाँ बढ़ा दी हैं। पहले जहां छोटी दूरियां थीं और बड़ी-बड़ी हो गई हैं। इस लॉकडाउन में जीवन बड़ा-सा लगने लगा है। दोपहर के दिन वीरान और रात बहुत काली लगने लगी है। दिन की दुपहरिया में तपता गांव आज का शहर बन चुका है। सूरज की रोशनी से तपती सड़कें और उस पर चलते इक्का-दुक्का लोग जीवन तलाशते हुए आगे बढ़ते हैं।

इस लॉकडाउन ने कुछ अच्छी चीज भी दी है जिसमें ये नीला आकाश भी शामिल है। आमतौर पर ये नीला आकाश कहां देखने को मिलता है। आकाश को काले धुएं से भरने वाली ये चिमनियों ने भी जहर उगलना अब बंद कर दिया है। अब आसमान में सफेद बादल और उनके बीच उड़ते पक्षी बचपन वाले दौर की याद दिलाते हैं। अब तो पक्षियों की आवाज भी सुनाई देती है क्योंकि गाड़ियों का शोर कम हो गया है। उजाला सब कुछ बयां करता है, सबकुछ। दिन में आज भी शोर होता है लेकिन ये प्रकृति का शोर है। अब तो केवल दिन में पुलिस और एंबुलेंस की चहलकदमी नजर आती है।

रात भले ही भयानक सी लगने लगी हो लेकिन इस रात में अब वो दम वापस आ गया जो शायद छिन गया था। अनंत तक फैला ये आकाश कहता है कि विशालता मेरा ही दूसरा पर्याय है। तारों को अपनी गोद में खिलाता ये आकाश अब ज्यादा सुनहरा लगता  है जो पहले कहीं गुम हो गया था। बचपन वाले तारे, ढेर सारे तारे और चांद की चमक भी कुछ ज्यादा ही है। अब तो मैं नोएडा के आकाश में सप्तर्षि, कालपुरुष, शर्मिष्ठा, ध्रुव तारे को आसानी से देख पा रहा हूं। शुक्र का चमकीला अंदाज भी मैं देख पा रहा हूं। सुबह का उगता सूरज और डूबता सूरज नारंगी की तरह साफ-साफ दिखाई देता है।

इस लॉकडाउन में प्रकृति ने अपना अलग ही रंग बिखेर दिया है। ऐसा लगता है मानो प्रकृति इंसानी चलुंग से आजाद है और आजाद होकर स्वच्छंद होकर श्वास ले रही है। फूलों को अब कोई छेड़ता नहीं, पत्तियों को अब कोई तोड़ता नहीं, टहनियों को कोई अब खींचता नहीं और पेड़ों को अब झकझोरता नहीं। अब धीरे-धीरे लगने लगा है कि प्रकृति का अलग ही जलवा है। घास फिर अपने मनमाफिक बढ़ने लगी है क्योंकि अब उसे विरोध नहीं झेलना पड़ता। अब सूरज की किरणें भी प्रदूषण की चादर से छनकर नहीं आती, सीधे 15 करोड़ किमी की दूरी तय करके नन्हीं पत्तियों तक पहुंचती है।

पक्षियों ने फिर चहकना शुरू कर दिया है। नीले आकाश में ऊंची उड़ान भरना शुरू कर दिया है। अब केवल कबूतर ही नहीं आकाश में चील, कौआ, कोयल, गौरैया जैसे पक्षी दिखाई देते हैं लेकिन पहले की तरह अब भी रात में चमगादड़ दिखाई देते हैं। नीलगाय को मॉल के पास घूमते देखना हो या बारहसिंगा का हरिद्वार की बस्ती में घूमना एक अलग ही अनुभव है। अब सोसायटी के कुत्ते भी भौंक कर पूछते हैं तुम कौन हो बे?

इस लॉकडाउन ने कई लोगों को मुसीबत में डाला है तो कुछ अच्छा काम भी किया है। प्रदूषण का स्तर उस दर्जे का कम हुआ है जो लोग सपने में सोचते थे कि ऐसा यहां कभी हो सकता है। हां, अब मेरी छत से सुपरनोवा टॉवर, सेक्टर 18 और 16 की बिल्डिंग आसानी से दिख जाती है।

ये आसान नहीं है फिर आसान है। 

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2020

चलते-चलते (श्रृंखला 13)

ट्रेन का सफर सबक और लोगों को समझने का मौका होता है। ट्रेनों में लोग पैसेंजर बनकर सफर ही नहीं करते है बल्कि गांव-घर से लेकर देश की राजनीति की बात भी करते हैं। कभी-कभी तो ये बातचीत इतनी भयानक मोड़ ले लेती है कि नौबत बहस से आगे पहुंच जाती है। खासकर वो बातें और रोमांचक होती हैं। दिसंबर की बात थी मैं दिल्ली से कटनी जा रहा था। कई लोग अपने बच्चों की मानसिक क्षमता का प्रदर्शन कर रहे थे। ये समझ लीजिए कि दो गुट बन गए थे एक सवाल पूछता और दूसरा जवाब देता। सवाल और जवाब की प्रतियोगिता में कई सवाल और जवाब बड़े रोमांचित कर देने वाले थे। 

एक गुट ने दूसरे से पूछा कि देश का राष्ट्रपति कौन? सामने से जवाब आया नरेंद्र मोदी। फिर सामने वाले गुट ने सही जवाब बताते हुए कहा रामनाथ कोविंद। फिर सवाल आया देश का प्रधानमंत्री कौन? जवाब आया अमित शाह। सही जवाब देते हुए दूसरे गुट ने कहा अमित शाह नहीं नरेंद्र मोदी। मैंने अपना माथा पीट लिया। जिन लोगों को देश का प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति का नाम मालूम ना हो वे क्या करेंगे? 

मुझे इन सबके बीच वो वीडियो याद आ गया जिसमें दो बच्चियां नरेंद्र मोदी और अमित शाह को अपशब्द कहते हुए दिखाई देती हैं। वो कहती हैं कि दोनों मुसलमानों को भारत में नहीं रहने देना चाहता। फिर इन्हीं दो बच्चियों से आजादी वाले नारे लगवाए जाते हैं। क्या इन्हें पता है कि वे क्या कर रहीं हैं? अपशब्दों से किसका भला हुआ है? आजादी वाले नारे लगाने से क्या होगा? क्या वे जानती हैं कि वे जाने-अनजाने जहर बोने वालों को और सबल दे रही हैं। बच्चियों के मन में इतना जहर किसने घोला? जहर घोलने वाले लोग हमारे बीच में से ही कोई है जो आने वाली पीढ़ी को सच से वाकिफ नहीं करवाना चाहती। 

सड़कों पर उतरे ये लोग बच्चों की आड़ में गलत बात कहकर बचना चाहते हैं। भ्रम फैलाकर लोगों को गुमराह करना चाहते है। सोशल मीडिया से लेकर वास्तविक दुनिया तक वाहवाही लूटना चाहते हैं। बच्चे तो गीली मिट्टी होती है जिसे जो आकार दिया जाए वो पा लेता है। यदि हम बच्चों को सच नहीं बताएंगे और झूठ के सहारे उन्हें बड़ा करेंगे तो उनका जीवन देश के लिए नासूर बन जाएगा। 

मंगलवार, 12 नवंबर 2019

चलते-चलते(श्रृंखला 12)

ये दूसरा साल है जब मैं दीपावली पर घर नहीं गया। मम्मी और पापा को आस थी कि मैं इस बार उनका बेटा जरूर आएगा। मैंने उनकी आस को तोड़ते हुए कहा कि मैं अब देवउठनी एकादशी पर आऊंगा। हमारे यहां देवउठनी एकादशी को ग्यारस भी कहा जाता है। कई लोग इसे छोटी दीवाली या देव दीपावली भी कहते हैं। दीवाली से ग्यारहवें दिन देवउठनी एकादशी होती है। यह त्यौहार हमारे घर पर बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इसी पर्व के साथ दीपावली के त्यौहार का समापन हो जाता है। 

इस साल एकादशी 8 नवंबर को थी। मैंने बॉस को पहले ही इत्तिला कर दिया था कि मुझे 8 नवंबर से 18 नवंबर तक छुट्टी चाहिए। मुझे जाने की इजाजत भी मिल गई थी। मैंने जाने और आने का थर्ड एसी का टिकट करा लिया था। जबसे नौकरी लगी है तबसे थर्ड एसी से नीचे टिकट नहीं ली भले सफर तीन घंटे का ही क्यों ना हो। यहां तो 16 घंटों की बात थी। घर जाने की उत्सुकता मन में संजोए मैं रोज कुछ नया सोचता रहा था। कभी सोचता घर जाकर ये करूंगा या घर जाकर वो करूंगा। मम्मी-पापा ने भी कई तरीके से सोचकर रखा था कि बेटा घर आ रहा है तो अच्छा है। 

इन सबके बीच मेरी मम्मी को सबसे ज्यादा उत्सुकता मेरे घर आने की थी और क्यों ना होती? मैं सात महीने बाद घर जा रहा था। मैं पिछली बार घर होली पर गया था। उसके बाद अब जाने का समय मिला था। जीवन में कई बार कुछ अनोखे काम होते हैं। मैं उन बच्चों में से था जो मां-बाप से कभी अलग नहीं रहा लेकिन आज मुझे घर से बाहर रहते हुए 6 साल हो गए हैं। इन 6 सालों में मुझे अलग-अलग अनुभव मिले। जीवन कैसे जिया जाता इन्ही 6 सालों में पता चला। जीवन में किरदार किस तरह के होते हैं इन्ही 6 सालों में पता चला। दोस्त क्या होते हैं? नशा क्या होता है? गाली क्या होती है? सबकुछ इन्हीं 6 सालों में पता चला। जिंदगी में एक बार ज्ञान जरूर मिलता है मुझे इन 6 सालों के हर एक दिन ज्ञान मिला। 

एक कहावत है कि "समय बड़ा बलवान" । मेरे साथ भी समय ने बड़ा खेल खेला। कई सम्मिलित कारणों की वजह से मेरी छुट्टी रद्द हो गई। ये पहली बार था कि जब मेरी छुट्टियों पर ग्रहण लगा। मैं पहली बार बहुत मायूस रहा ना तो मैंने उस दिन नाश्ता किया ना ही उस दिन में खाना खाया। मुझे अभी भी आशा किरण घोर अंधेरे में जलती हुई लौ की तरह दिखाई दे रही थी। कुछ हो ना सका। अब लग रहा था कि धरती फट जाए तो मैं उसमें समा जाऊं। मुझे सबसे ज्यादा चिंता मम्मी-पापा की थी कि मैं उन्हें किस तरह बताऊंगा कि मैं नहीं आ रहा। लेकिन जैसे-तैसे उनको समझाया और बताया कि मैं क्यों नहीं आ रहा। 

मैं छुट्टी लेने के बारे में ज्यादा नहीं सोचता लेकिन ये पहली बार था जब मुझे घर के लिए आस थी। मैंने बॉस को कई तरीके से मनाने की कोशिश की। इतना दुख तो मुझे टिकट कैंसिल करते समय एक हजार रुपये की बलि चढ़ाते वक्त भी नहीं हुआ। मैं जब इंदौर में रहा या भोपाल में रहा तब कई बार 15 दिनों से ज्यादा घर पर छुट्टियां मना चुका हूं। लेकिन अब ऑफिस में ऐसे स्वर्णिम पल कहां हैं? अब तो बमुश्किल 10 दिनों की छुट्टियां मिल जाएं तो बड़ी बात है। इस पोस्ट का मतलब यही है कि "समय बड़ा बलवान"। 

📃BY_vinaykushwaha


रविवार, 11 नवंबर 2018

"अवनी" पर राजनीति क्यों?

"कोई बाघ आदमखोर खुद से नहीं बनता है बल्कि उसे मजबूरी में आदमखोर बनना पड़ता है।" यह पंक्ति है मशहूर बाघ संरक्षक जिम कार्बेट की। जिम कार्बेट को बाघों का संरक्षक कहा जाता है। जिम के साथ एक विरोधाभास जुड़ा हुआ है कि उन्होंने 33 बाघ-बाघिन को मारा था। इनमें मैन ईटर ऑफ कुमाऊं भी शामिल है। इस मैन ईटर ने 435 आदमियों को मारा था। अपनी किताब मैन ईटर ऑफ कुमाऊं में उन्होंने इस बात का जिक्र किया था। जिम की छवि एक अच्छे व्यक्ति के रुप में है क्योंकि उन्होंने आदमखोरों के आतंक से मुक्ति दिलाई थी। लेकिन बाद में उन्होंने बंदूक की जगह कलम को उठा लिया था। वे इस बात से वाकिफ थे कि हिमालय में बाघों की संख्या कम होने का मतलब है कि पारिस्थितिकी तंत्र में गड़बड़ी होना है। जिम कार्बेट लेखक और दार्शनिक भी रहे हैं। उन्हीं के नाम पर उत्तराखंड के राष्ट्रीय पार्क का नाम जिम कार्बेट नेशनल पार्क है। इसी नेशनल पार्क से प्रोजेक्ट टाइगर मिशन की शुरुआत की गई थी।

तारीख 2 नवंबर 2018 सभी को वैसे तो पता होगी लेकिन यह एक ऐसा दिन जिस दिन से सभी को पशुओं के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया है। लोग अब यह भी सोचने लगे हैं कि जानवरों को क्यों मारा जा रहा है। मैं बात कर रहा हूं बाघिन 'अवनि' की। कई लोग बाघिन अवनि को अवनी लिख रहे हैं। इस बाघिन का अाधिकारिक नाम टी-1 है। बाघिन अवनी को मार दिया गया। अवनी पर आरोप था कि उसने दो सालों में 14 लोगों की जान ली है। अवनी को मारने के लिए बकायदा वन विभाग से 100 लोगों की टीम को तैयार किया गया। पांढरकवड़ा के जंगल में बाघिन को खोजने के लिए गोल्फर ज्योति रंधावा के खोजी कुत्तों को बुलाया गया। पेड़ों आदि पर कैमरों का कड़ा पहरा लगा दिया गया। बाघिन को चारा देने के नाम पर नकली भेड़-बकरियों को बांधा गया। अमेरिकी से विशेष प्रकार का इत्र मंगाया गया ताकि बाघिन आकर्षित होकर जल्द से जल्द घने जंगलों से निकलकर खुले मैदान में आ जाए।

सारे जाल बिछा दिए गए बस अब बाघिन का फंसना बाकी  था। बाघिन आई और जाल में फंस गई। हैदराबाद से शार्प शूटर शाफत अली खान को बुलाया गया था। शाफत के पास एक लंबा अनुभव था कि कैसे जानवर को मारा जाता है। उनके दादा भी यही काम करते थे। वन विभाग के अनुसार शाफत को मुख्य रुप से बाघिन को ट्रैंकुलाइज  करने के लिए बुलाया गया था। अवनी जैसे ही थोड़े खुले हिस्से में आई तो उसे पहले ट्रैंकुलाइज गन से टैंकुलाइज्ड किया गया फिर उसे 10 मीटर दूर से पिछले हिस्से में गोली मार दी गई। आखिरकार आदमखोर बाघिन का अंत हो गया। यह बाघिन अवनी की दुखद अंत की कहानी है।

असली कहानी तो अवनी की मौत के बाद शुरू होती है। अवनी की मौत के बाद कई पशुप्रेमी और राजनेता सामने आए और उन्होंने जमकर इस बात का विरोध किया की अवनी की हत्या की गई है। अवनी की मौत से पहले कई पशु प्रेमियों और एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका देकर अवनी पर दया दिखाकर जीवनदान की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने दया याचिका को यह कहते हुए नकार दिया था कि चीफ लाइफ वार्डन ने यह स्वीकार किया है कि अवनी पर कार्रवाई जरुरी है। अब आते हैं राजनीति पर। केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने महाराष्ट्र के सीएम देवेन्द्र फडणवीस को पत्र लिखकर महाराष्ट्र के वन मंत्री सुधीर मुनगंटीवार को बर्खास्त करने की मांग की। आपको यहां बताते चलें कि मेनका गांधी की छवि एक पशु प्रेमी की है, वे कई सालों से पशुओं के संरक्षण में काम  रही हैं। मेनका गांधी शायद भूल गई थी कि केन्द्र में उनकी सरकार और महाराष्ट्र में एनडीए नीत सरकार फिर पत्र की औपचारिकता क्यों? इसके बाद सुधीर मुनगंटीवार ने उल्टा मेनका गांधी पर आरोप लगाते हुए कहा कि वे भी तो फर्जी बाबा के पास जाती हैं। मुझे नहीं लगता है कि इतने संवेदनशील मुद्दे पर ऐसी बात उछालने की जरूरत थी।

बात यदि महाराष्ट्र की हो और शिवसेना का जिक्र ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता। शिवसेना ने सरकार पर आरोप मढ़ दिया की सरकार ने अवनी की हत्या की है। मनसे भी कहां पीछे रहने वाली थी। राज ठाकरे ने अवनी पर बयान दे दिया। सबसे आखिर में एंट्री हुई कांग्रेस की। मुंबई से पूर्व सांसद संजय निरुपम ने इस सारे मामले को हगणदारी प्रथा से जोड़ दिया। हगणदारी प्रथा, महाराष्ट्र में खुले में शौच मुक्त करने के अभियान से जुड़ा है। संजय निरुपम ने हगणदारी प्रथा का जिक्र इसलिए किया क्योंकि वे बताना चाहते थे कि चंद्रपुर में जंगल में शौच करने गई महिला को बाघ ने मार दिया। अब बात अवनी की मौत से हगणदारी तक पहुंच गई। इस पर महाराष्ट्र के वन मंत्री सुधीर मुनगंटीवार कहते हैं कि अवनी की मौत पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। अरे साहब असली राजनीति की शुरुआत तो आपने ही की थी।

11 नवंबर को 168 संस्थाओं ने कैंडल मार्च निकालकर बाघिन अवनी की मौत का विरोध किया। यह कैंडल मार्च मात्र दिखावा नहीं बने। इस बात की बेहद अहमियत है कि पर्दे के पीछे की सच्चाई क्या है? बात यह है कि बाघिन को मारने के बाद उसे नागपुर ले जाया गया जहां उसे डॉक्टर ने मृत घोषित कर दिया। पोस्टमार्टम में यह पता चला कि उसके पिछले भाग पर गोली मारी गई थी। ऑटोप्सी करने के बाद पता चला कि अवनी ने 4-5 दिनों से कुछ खाया ही नहीं था क्योंकि उसके पेट में गैस और तरल पदार्थ भरा हुआ था। इसके अलावा उसके शरीर में नमी की कमी पाई गई और इंसानी मांस का कहीं कोई जिक्र नहीं हुआ। अवनी तो चली गई लेकिन अपने कई राज छोड़ गई।

बाघ और जंगली जानवर इतने आक्रामक क्यों रहे हैं? इसका सीधा सटीक कारण है अतिक्रमण। इंसान अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए वन्य जीवों के क्षेत्र में अतिक्रमण कर रहा है। खेती और आवास के लिए जंगलों का सफाया किया जा रहा है। नेशनल पार्क और अभ्यारण्यों में वन्यजीवों के आवास को छेड़ा जा रहा है। इन सबसे वन्यजीवों की इंसानी बस्ती में चहलकदमी बढ़ गई है। इन सबका नतीजा सबके सामने है। हमारे संविधान के भाग-4 में राज्य के नीति निर्देशक तत्वों का जिक्र किया है। अनुच्छेद 48(क) में जिक्र है कि पर्यावरण और वन्यजीवों का राज्यों द्वारा संरक्षण और संवर्धन किया जाएगा। मैं राज्यों से पूछना चाहता हूं कि अवनी की तरह? यह हमारा भी व्यक्तिगत दायित्व बनता है कि हम अपने पर्यावरण और वन्यजीवों को संरक्षित और संवर्धित करें।

अब सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे देश का कानून क्या कहता है? क्या अवनी को मारना सही है? महाराष्ट्र वन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार बताया गया कि उन्हें राष्ट्रीय व्याघ्र संरक्षण प्राधिकरण से अवनी पर कार्रवाई की इजाजत प्राप्त थी। भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अनुसार बाघिन अवनी की हत्या नहीं हुई है। उसे मारना सही है। अधिनियम कहता है कि यदि कोई बाघ आदमखोर हो चुका है, गंभीर बीमारी से ग्रस्त है या किसी अन्य कारण को लेकर चीफ लाइफ वार्डन तय कर सकता है कि बाघ को मारा जाए या नहीं। चीफ लाइफ वार्डन ही तय करता है कि उसे बेहोश किया जाए, स्थानांतरित किया जाए या गोली मार दी जाए। हमारा कानून यह भी कहता है कि आत्मरक्षा के लिए आप बाघ को मार सकते है और इसके साथ ही यदि वह सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है तो उसे मारा जा सकता है। यह है हमारा कानून। वन विभाग की टीम ने आत्मरक्षा का तर्क देते हुए बाघिन पर गोली चलाई थी। कई पशु प्रेमियों का कहना है कि यह गलत है कि उस पर गोली चलाई गई यदि आत्मरक्षा के लिए गोली चलाई गई होती तो गोली बाघिन के पिछले हिस्से की जगह अगले हिस्से में लगती।

अवनी चली गई। अपने पीछे कई सवाल छोड़ गई और बहस के लिए विषय भी। अवनी अपने पीछे दो नन्हें बच्चे भी छोड़ गई जिनका ध्यान रखना हमारा दायित्व है।

📃BY_vinaykushwaha

शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

पाकिस्तान और इमरान खान

क्या इमरान पाकिस्तान के पीएम रहते हुए अपना कार्यकाल पूरा कर पाएंगे?

इमरान खान ने 18 अगस्त को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के पद की शपथ लिया. शपथ लेने के साथ ही इमरान पाकिस्तान के अधिकारिक रूप से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बन गए. सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वे अपना कार्यकाल पूरा कर पाएंगे. पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास गवाह है कि आज तक कोई भी प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया है. अभी हालिया उदाहरण हमारे सामने  नवाज शरीफ के रूप में है. जिन्हें पनामा पेपर लीक मामले में पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने उनकी उम्मीदवारी को अयोग्य घोषित कर दिया है. उम्मीदवारी अयोग्य घोषित होने के साथ ही उन्हें प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा और 14 साल की सजा हो गई.

नवाज शरीफ के साथ कोई यह पहली बार नहीं हुआ है. साल 1993 में नवाज शरीफ सरकार को तत्कालीन राष्ट्रपति गुलाम खान ने बर्खास्त कर दिया. यह मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा और सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सरकार को बहाल कर दिया. मामला यही नहीं थमा बल्कि राष्ट्रपति गुलाम खान ने फिर से उन्हें पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 58-2b के तहत फिर से बर्खास्त करने का प्रयास किया गया. मामला फिर से सुप्रीम कोर्ट गया और शरीफ ने मामले पर समझौता करते हुए इस्तीफा दे दिया. सरकार केवल 2 साल 7 महीने तक चली.

इसके बाद 1997 में नवाज शरीफ ने फिर से सरकार बनाई. इस बार भी काली परछाइयों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा. जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ उस समय सेना प्रमुख थे. साल 1999 में परवेज़ मुशर्रफ़ ने नवाज शरीफ की सरकार को हटाकर मार्शल लॉ लगा दिया. फिर से नवाज सरकार अपना कार्यकाल पूरा करने में नाकाम रही. मुशर्रफ़ ने देश पर 1999 से लेकर 2001 तक तानाशाह के रूप में शासन किया.  साल 2001 में परवेज़ मुशर्रफ़ राष्ट्रपति बन गया. राष्ट्रपति के रूप में उसने देश में 2001 से 2008 तक शासन किया.

परवेज़ के राष्ट्रपति के रूप में रहते हुए चार प्रधानमंत्री हुए. जिनमें से किसी ने भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया. कोई तीन साल तो कोई दो महीने के लिए प्रधानमंत्री बना. मुशर्रफ़ के राष्ट्रपति रहते हुए युसूफ़ रजा गिलानी ही एकमात्र प्रधानमंत्री थे जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा करने से करीब 10 महीने से चूक गए. उन्होंने 4 साल 2 महीने का कार्यकाल पूरा किया. युसूफ़ को न्यायालय की अवमानना के मामले में उनकी सीट को 2012 में अयोग्य घोषित कर दिया. शेष बचा हुआ कार्यकाल परेवज़ अशरफ़ ने पूरा किया.

पाकिस्तान के इतिहास में यह पहली बार नहीं था कि किसी सेना प्रमुख ने प्रधानमंत्री को उसके पद से हटाने के बाद सत्ता की बागड़ोर अपने हाथ में ले ली हो. इससे पहले 1958 में फ़िरोज खान नून की सरकार को तत्कालीन राष्ट्रपति शकंदर मिर्जा ने बर्खास्त करते हुए मार्शल लॉ लागू कर दिया. इस काम में उनका साथ अयूब़ खान ने दिया जो तत्कालीन सेना प्रमुख थे. नून सरकार ने अपना हनीमून पीरियड भी पूरा नहीं कर पाई. अयूब़ खान ने अपने दोस्त यानी शकंदर मिर्जा को भी नहीं बख्श़ा, हिरासत में ले लिया. बाद में शकंदर को देश से निकाल दिया जिनकी बाद में ब्रिटेन में मृत्यु हो गई. अब पाकिस्तान पर अयूब़ खान का राज था. अयूब़ खान ने 1958 से 1969 तक राष्ट्रपति के रूप में राज किया.  

अयूब़ खान के बाद देश के राष्ट्रपति याह्या खान बने. याह्या खान 1969 लेकर 1971 तक देश के राष्ट्रपति रहे. पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में 1958 से लेकर 1971 तक कोई भी प्रधानमंत्री नहीं रहा. याह्या खान के राष्ट्रपति रहते हुए नुरुल अमीन मात्र 13 दिनों के लिए प्रधानमंत्री बने.

वर्ष 1971 में बंगलादेश युद्ध हुआ. जुल्फिकार अली भुट्टो 1971 से 1973 तक राष्ट्रपति रहे. इस दौरान कोई भी प्रधानमंत्री नहीं बना. साल 1973 में जब जुल्फिकार अली भुट्टो देश के प्रधानमंत्री बने. जुल्फिकार के प्रधानमंत्री रहते हुए 1977 में सेना प्रमुख जिआ-उल-हक को नियुक्त किया गया. जैसे ही जिआ-उल-हक सेना प्रमुख बने उसी वर्ष जुल्फिकार सरकार को हटाकर मार्शल लॉ लगा दिया. साल 1978 में जिआ-उल-हक खुद ही राष्ट्रपति बन गया. पाकिस्तान पर 1978 से लेकर 1988 तक राष्ट्रपति रहे. जिआ के काल में केवल एक बार चुनाव हुए. वर्ष 1985 में हुए इस चुनाव में मोहम्मद खान जूनेजो प्रधानमंत्री बने. इस चुनाव की सबसे बड़ी बात यह थी कि यह निष्पक्ष चुनाव नहीं था. यह पार्टी बेस्ड चुनाव न होकर स्वतंत्र चुनाव था. जूनेजो 1985 से लेकर 1988 तक प्रधानमंत्री रहे.

साल 1988 में फिर से पाकिस्तान में चुनाव हुए. इन चुनावों पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की जीत हुई. बेनजीर भुट्टो  पाकिस्तान की  पहली महिला प्रधानमंत्री बनी. बेनजीर, जुल्फिकार अली भुट्टो की बेटी थी. यह सरकार भी ज्यादा दिनों तक नहीं चली.  पाकिस्तान में फिर से 1990 में चुनाव हुए जिसमें नवाज शरीफ चुनकर आए. इन्हें मार्शल लॉ के जरिए हटा दिया गया.

पाकिस्तान वैसे तो एक लोकतांत्रिक देश है लेकिन उसका पूरा नाम इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान है. क्रिकेट से राजनीति की दुनिया में आए इमरान खान पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में कुछ नया करने के लिए आए. भले ही उन्हें चुनावों में पूर्ण बहुमत न मिला हो लेकिन वे जनता के मुद्दों को उठाने में सफल रहे हैं. इमरान ने पाकिस्तान के चार बड़े मुद्दों पर खुलकर आवाज बुलंद की जिनमें बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, पाकिस्तान की चरमराती अर्थव्यवस्था और आतंकवाद है.

राजनीति में आने के बाद इमरान ने हमेशा ऐसे मुद्दों को अपनी आवाज दी है जो जनता को प्रभावित करते हैं। नवाज शरीफ, आसफ अली जरदारी जैसे राजनेताओं को कड़ी टक्कर दी। पाकिस्तान की दो सबसे बड़ी पार्टियां मुस्लिम लीग और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को इमरान की नवांकुर पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ ने चुनौती दी है। आम चुनाव 2018 में तो दोनों पार्टियां घुटने टेकते हुए नज़र आईं। भारत के विषय में इमरान ने हमेशा सधी टिप्पणी की है। क्रिकेटर यह बात अच्छे से समझता है कि किस गेंद पर चौका और किस गेंद पर छक्का लगाना है.

अभी तक इमरान तीन शादियां कर चुके हैं. तीसरी पत्नी बुशरा मानेका ने उन्हें एक बार कहा था कि यदि आप प्रधानमंत्री बनना चाहते हो तो आपको तीसरी शादी करनी होगी. बुशरा मानेका एक पीरनी है, उन्हें पिंकी पीर के नाम  से भी जाना जाता है. अब देखना होगा कि बुशरा बीबी की भविष्यवाणी किस हद तक सही होगी और कब तक इमरान को पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनाकर रखेंगी।

यही दौर पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में चलता रहा है. आगे क्या होगा यह तो समय ही बताएगा. इमरान की सरकार शायद अपनी सरकार के पांच साल पूरा करने में कामयाब हो.

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शनिवार, 9 जून 2018

भारतीय वास्तुकला (श्रृंखला-चार)


भारतीय वास्तुकला में विदेशियों का भी योगदान है यहां बहुत सी ऐसी स्थापत्य कला हमें देखने के मिलती है जिसे मुस्लिम स्थापत्य कला के रूप में जानते है। जब मुस्लिम स्थापत्य कला का भारत में प्रवेश हुआ तो यह हिंदु-मुस्लिम स्थापत्य कला या इंडो-इस्लामिक स्थापत्य कला हो गई। मुस्लिम धर्म में मूर्ति पूजा वर्जित है जिसके कारण मुस्लिम शासकों के द्वारा तैयार किए गए स्मारकों, मस्जिदों,मकबरों,भवनों या किसी भी संरचना में मूर्ति देखने को नहीं मिलती है। मूर्तियों की जगह फूल-पत्ती, मेहराब, गुंबद, मीनार, बुर्ज, जाली आदि ने लियी। इनके उपयोग से भारत में नए-नए स्थापत्य कला का विकास हुआ।

मुस्लिम शासकों ने अपने शासन में सर्वाधिक जोर मस्जिद बनाने में दिया। मस्जिगों में मीनार, गुंबद, मेहराब पर दिया गया। जहां मंदिरों में शिखर हुआ करते थे वही मस्जिदों में उनकी जगह गुंबद ने ली। भारत का सबसे बड़ा गुंबद कर्नाटक के बीजापुर में स्थित है। यह अपने आप में कारीगरी का बेमिसाल उदाहरण है। यह बीजापुर के शासक ने बनवाया था। यह बलुआ पत्थर से तैयार किया गया है। गुंबद बनाने गोलाकार या यूं कहे कि उल्टा कटोरा होता है। उत्तर भारत और दक्षिण भारत दोनों में सामग्री के इस्तेमाल में विभिन्न पाई गई है। मुगलों समय जहां उत्तर भारत में लाल पत्थर का उपयोग किया वही दक्षिण भारत में ग्रेनाइट और बलुआ पत्थर का उपयोग किया गया।

मीनार, मुस्लिम स्थापत्य कला का अभिन्न हिस्सा हैजिसे सामान्यतया हर मस्जिद देखा जा सकता है। मस्जिद में अजान के लिए इन मीनारों का उपयोग किया जाता था। भारत की सबसे ऊंची मीनार कुतुब मीनार है जो विश्व विरासत स्थल में शामिल है। इसका निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक ने करवाया था जिसे पूरा कराने का श्रेय इल्तुतमिश हो जाता है। इन मीनार का निर्माण भी स्थान विशेष पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर किया जा जाता था। कही लाल पत्थर,तो कही बलुआ पत्थर तो कही बेसाल्ट का उपयोग किया जाता था। मीनारों को कलात्मक बनाया जाता था जिसमें नक्काशी की जाती थी।


मीनार के शिखर पर जाने के लिए सीढ़ियां बनाई जाती थी। कई बार यह सीढ़ियों अंदर से होती थी और कई बार बाहर से। जैसे कुतुब मीनार में सीढ़ियां मीनार के अंदर से बनाई गई जबकि जूनागढ़ के बहाउद्दीन के मकबरे में मीनार के बाहर से बनाई गई है। इन मीनारों की कलात्मकता देखते ही बनती है। मीनारों को इस प्रकार भी बनाया जाता था कि यह मुख्य संरचना को कोई नुकसान न पहुंचाए। यदि कभी भूकंप वगैरह आए तो मीनार बाहर की ओर या मुख्य संरचना से विपरीत गिरें। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ताजमहल है जिसमें मीनारों को इस प्रकार बनाया है कि मीनारें बाहर की ओर गिरे।

किसी भी संरचना को सुंदर बनाने के लिए बड़ी-बड़ी मीनारों के अलावा छोटी-छोटी मीनारों का उपयोग किया जाता था। ताजमहल में इस प्रकार की संरचना देखने को मिलती है।

मुगलकाल और बाद दरवाजें बनवाने का प्रचलन चला। अकबर ने गुजरात विजय पर भारत का सबसे ऊंचा दरवाजें का निर्माण करवाया। जिसका नाम फतेहपुर सीकरी का बुलंद दरवाजा है। इसका निर्माण लाल पत्थर से किया गया है। इसके अलावा लखनऊ, जयपुर, मांडू, भोपाल, अहमदाबाद  आदि जगह दरवाजा परम्परा देखने को मिलती है। दरवाजों को सुंदर और कलात्मक के साथ-साथ भव्य बनाया जाता था। इसका कारण यह था कि जो पड़ोसी राज्य है उसके राज्य की वैभव-विलासता को पहचान सके। दरवाजों का वर्णन हमें प्राचीन समय से सुनने को मिलता है लेकिन यहां बात इस्लामिक संरचना पर बने दरवाजों की हो रही है।


इस्लामिक स्थापत्य कला में एक विशेष प्रकार की सामग्री का उपयोग किया गया। वह सामग्री है संगमरमर। इसकी सबसे बड़ी मिसाल ताजमहल है। ताजमहल, संगमरमर से बनी पहली इमारत नहीं है बल्कि आगरा में ही बनी ऐतमाद्दौला का मकबरा है। पूर्ण रूप से संगमरमर से बनी यह पहली इमारत थी। इन दोनों इमारत को बनाने में मकराना के संगमरमर का उपयोग किया गया है। मुगलों के काल में राजस्थान से संगमरमर के साथ-साथ लाल पत्थर का भी निर्यात किया जाता था।

भारत में विदेश से कई प्रकार की कला का आगमन हुआ जिसमें पेट्राडोरा या पित्रादुरा कहते है। पेट्राडोरा एक कला है जिसका आगमन ईरान से हुआ है। यह कला संगमरमर के पत्थर पर विभिन्न प्रकार को रत्नों को खोदकर सजाया जाता है। विभिन्न प्रकार के आकार और आकृति के पत्थर पर अलग-अलग सजावट के साथ बनाया जाता है। इसमें पेड़- पौधे, फूल, पत्ती, विभिन्न प्रकार की आकृतियों को उकेरकर उसमें विभिन्न रंगों जैसे लाल, पीला, हरा, नीला, गुलाबी, फिरोजी आदि रंगों का उपयोग किया जाता है।


इस्लामिक स्थापत्य कला में एक और कला सामने आती है। जाली, इस्लामिक स्थापत्य कला में एक अहम स्थान रखती है। चाहे मकबरा हो या मस्जिद हो या दरगाह हो या किला हो या महल हो या छतरी हो मुगलकाल से जाली का महत्व बढ़ गया। अहमदाबाद में   निर्मित जामा मस्जिद या जुम्मा मस्जिद में हिन्दु स्थापत्य कला या भारतीय स्थापत्य कला या मंदिर स्थापत्य कला  की छाप आसानी से देखने को मिलती है। यहां आसानी कई ऐसी आकृतियां देखने को मिलता  है भारतीय संस्कृति और संस्कार को दर्शाती हैं। इसके अलावा हैदराबाद की चार मीनार भी शानदार नमूना है। यह एक दरवाजे की तरह है जिसमें चार मीनार है। मध्यप्रदेश के मांडू में बने अनेक महल इस्लामिक स्थापत्य कला को दर्शाते हैं। इन महलों या संरचना में जहाज की आकृति के तरह बना जहाज महल, गुजरी महल, होशंगशाह का मकबरा, अशर्फी महल  आदि सभी एक प्रतीक है।

दिल्ली और आगरा का लाल किला, हुमाऊं का मकबरा, सिकंदरा मकबरा, हौज खास, कशमीरी गेट, फतेहपुर सीकरी, भोपाल की ताज-उल-मस्जिद, हैदराबाद की मोती मस्जिद, गोलकुंडा का किला, बीजापुर का गोल गुबंद आदि इस्लामिक स्थापत्य कला के नमूने हैं। इस्लामिक स्थापत्य कला में आगरा स्थित ताजमहल को बेमिसाल प्रतीक माना जाता है। लखनऊ का बड़ा इमामबाड़ा, छोटा इमामबाड़ा, बुरहानपुर की ऐतिहासिक इमारत इसी स्थापत्य कला का नमूना। बुरहानपुर में स्थित कुंडी भंडारा जल व्यवस्था का अद्वितीय उदाहरण है। वही कुछ बदसूरत इमारत भी भारत में देखने को मिलता है। ऑरंगजेब द्वारा बनवाया गया बीबी मकबरा ताजमहल की फूहड नकल मात्र है।


भारत में इस्लामिक स्थापत्य कला में इमारत ही नहीं बल्कि एक और संरचना दिखाई देती है। यह संरचना "चार बाग" है। चार बाग एक प्रकार से गार्डन ही है। यह संरचना मुगलकाल से सामने आया या शुरु हुआ। इसमें एक गार्डन बनाया जाता है जिसे समकोण पर काटती दो सड़क द्वारा गार्डन को चार भाग में विभक्त कर दिया जाता है। चार बाग के साथ एक संरचना और जुड़ी हुई है जिसका नाम फव्वारा है। फव्वारा के कारण इमारत की सुंदरता बढ़ जाती है।

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बुधवार, 16 मई 2018

कर्नाटक चुनाव विश्लेषण


भारत में ऐसा बहुत कम होता है कि ओपिनियन पोल, एक्जिट पोल और चुनाव का नतीजा बिल्कुल एक जैसा हो। इस बार कर्नाटक के परिप्रेक्ष्य में यह सही साबित हुआ। सभी नतीजों में बीजेपी को सबसे बड़ी पार्टी के रूप में दिखाया जा रहा था वही कांग्रेस को दूसरे नंबर पर और जेडीएस को तीसरे नंबर पर दिखाया जा रहा था। लेकिन इन सब के बीच किसी पार्टी को बहुमत नहीं दिया जा रहा था जो अन्त्वोगत्वा सही निकला। इस चुनाव भले ही बीजेपी को सबसे बड़ी पार्टी के रूप में दिखाया जा रहा हो लेकिन वह इस हालत में नहीं है कि वह कर्नाटक में सरकार बना सके। बीजेपी ने इस चुनाव 104 सीटों विजय हासिल की। वही कांग्रेस ने 77, जेडीएस ने 37 और अन्य को 3 सीटें मिली।

एक चौंका देने वाली बात यह है कि बहुजन समाज पार्टी को भी एक सीट मिली। दक्षिण भारत के राज्य बीएसपी का चुनाव जीतना चौंका सकता है लेकिन यह पहला मौका नहीं है जब बहुजन समाज पार्टी कर्नाटक में चुनाव लड़ रही है। 2013 में भी बीएसपी ने चुनाव लड़ा था और लगभग 1.5 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किए थे।  इस बार सबसे बड़ी बात यह है कि बीएसपी का वोट शेयर घटा हैं जो 0.3 प्रतिशत तक जा पहुंचा हैं। इसके बावजूद बीएसपी को एक सीट पर कब्जा करने में कामयाबी मिली है।

इस चुनाव में बीएसपी और मायावती की चर्चा हो रही है। पहला कारण तो बीएसपी का एक सीट पर कब्जा करना और दूसरा कारण मायावती की पार्टी बीएसपी का पूर्व प्रधानमंत्री एच डी दैवेगौडा की जेडीएस की पार्टी का गठबंधन। यह गठबंधन चुनाव पूर्व किया गया था। मायावती का जेडीएस की चुनावी रैली में दिखना आम बात थी। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण मायावती का दैवेगौडा का फोन करके कांग्रेस के साथ कर्नाटक में  सरकार बनाने की बात कहना। क्या यह कहा जा सकता है कि मायावती के कहने पर दैवेगौडा, कांग्रेस के साथ कर्नाटक में सरकार बनाने के लिए राजी हुए हैं।

कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला के सामने सरकार बनाने का प्रस्ताव रखा है। कांग्रेस ने एच डी दैवेगौडा के सुपुत्र कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार किया है। कांग्रेस और जेडीएस (77+37=114) के जादूई आंकडें को छू लिया है। इन सबके अलावा यह सवाल करना सही रहेगा कि क्या यह सरकार कितने दिनों तक काबिज रहेगी? अभी बगावती सुर बुलंद हो गए हैं। वोक्कालिंगा, लिंगायत और कुरबा अलग-अलग जातियों से आने वाले विधायकों ने अपनी-अपनी को विरोध के रूप में कहने का प्रयास किया है। जेडीएस के कुछ विधायक सिद्धारमैया को स्वीकार नहीं करना चाहते क्योंकि वे कुरबा जाति से आते है।

एक और बात सामने आती है कि क्या दैवेगौडा सिद्धारमैया को सरकार में स्वीकार करेंगे? यह वही सिद्धारमैया है जिन्होंने बगावत करते हुए जनता दल (एस) को तोड़ने की कोशिश की थी। सबसे बड़ी बात तो यह है कि क्या दैवेगौडा, सिद्धारमैया को अपने से ऊपर देखना चाहेंगे क्योंकि सिद्धारमैया कभी दैवेगौडा के शिष्य रह चुके हैं। उन्हीं के सानिध्य में सिद्धारमैया ने राजनीतिक गुर सीखें हैं। कर्नाटक की सरकार में मुख्यमंत्री के रूप में रहते हुए सिद्धारमैया पर कई आरोप लगे जिनमें मंहगी वस्तुओं का उपयोग करना, भ्रष्टाचार और सबसे बड़ा आरोप है कि लिंगायत समाज को एक अलग धर्म के रूप में मान्यता देना। सिद्धारमैया को इसका खामियाजा सरकार की बलि देकर चुकाना पड़ा।

इस चुनाव सर्वाधिक वोट प्रतिशत कांग्रेस का 37.9 प्रतिशत रहा जबकि सर्वाधिक सीट लाने बीजेपी का वोट प्रतिशत 36 प्रतिशत रहा। सीटों की बात कही जाए तो बीजेपी ने तटीय कर्नाटक में शानदार प्रदर्शन किया में 21 में से 18 जीतकर कांग्रेस को तीन सीटों पर समेट दिया। बीजेपी उन जगह सबसे अच्छा प्रदर्शन किया जहां लिंगायत समुदाय जनसंख्या ज्यादा है। यह कांग्रेस की नाकामयाबी का नतीजा है जिसका फायदा बीजेपी ने उठाया है। बंगलुरू रीजन में भी बीजेपी का प्रदर्शन अच्छा रहा।

किसी पार्टी को बहुमत न मिलने से नतीजा त्रिशंकु आया।  देखना होगा कि कौन सरकार बनाने की रेस में पहले नंबर पर होगा। कही कांग्रेस का हाल मणिपुर और गोवा की तरह न हो जाए या ऐसा भी कह सकते है कि बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद भी सरकार न बना सके। कांग्रेस ने बीजेपी से सबक लेते हुए जल्दी से एक्शन लिया है। अपने दो कद्दावर नेता गुलाम नबी आजाद और अशोक गहलोत को बंगलुरू भेजकर सरकार बनाने की बात कही। वही सिद्धारमैया राज्यपाल से मिलने में देरी नहीं की। इसके साथ ही कुमारस्वामी ने भी राज्यपाल से मुलाकात की।

कांग्रेस ने बीजेपी से एक ज्ञान नहीं लिया कि कैसे सोशल इंजीनियरिंग की जाती है? गुजरात चुनाव की तरह कर्नाटक में कांग्रेस ने जनता से संपर्क साधना में देर कर दिया जिसका नतीजा उसे भुगतना पड़ा। संघ की बदौलत  आज बीजेपी इतनी उझल रही है यदि संघ का स्वयंसेवक जमीन पर न उतरता तो स्थिति कुछ और होती।

सरकार जिसकी भी बने स्थिर रहे। भ्रष्टाचार मुक्त रहे। कावेरी और महादयी जैसे मुद्दे सुलझाने में कामयाब रहे। भाषा को लेकर विरोध की राजनीति न हो।

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शनिवार, 12 मई 2018

गुरुकुल


गुरुकुल, भारतीय शिक्षा पद्धति का प्रतीक है। गुरुकुल सतयुग से लेकर  कलियुग तक विद्यमान है। गुरुकुल अर्थात् गुरु का कुल अर्थात् गुरु का कुटुम्ब या गुरु का परिवार । जब बच्चा अपने अभिभावक का घर छोड़कर गुरु के घर रहने  और  शिक्षा ग्रहण करने  चला जाता है । जहां  वह बच्चा  जाता है , उसे गुरुकुल कहा जाता है।

गुरुकुल की परपंरा युगों पुरानी है। त्रेतायुग में श्रीराम, द्वापरयुग में श्रीकृष्ण ने गुरुकुल में रहकर शिक्षा ग्रहण की थी। गुरुकुल एक ऐसा वातावरण तैयार करता है जिसमें बच्चा खेलता भी है और सीखता भी है। जीवन की छोटी-छोटी बातों को सीखता भी है। गुरुकुल में बच्चा एक नए अभिभावक को पाता है। माता-पिता के छोड़कर गुरुकुल जाने वाले बच्चों में सदा इस बात की ललक रहती है कि कैसे मस्ती के बहाने ढूंढे जाए लेकिन गुरुकुल का दूसरा नाम ही अनुशासन है।

गुरुकुल को जीवन जीने की कला कहा जाए तो सच्चे अर्थों में सही होगा। गुरुकुल कोई विद्यालय नहीं होता है बल्कि यह तो अपने जीवन को कैसे आयामित करना है यह सिखाने की पाठशाला है। यहां कोई किताबी ज्ञान नहीं दिया जाता है क्योंकि यहां किताबें मायने नहीं रखती बल्कि उनका सार ही महत्वपूर्ण होता है। वेद, उपनिषद्, जैसे महान कृतियों से अवगत कराया जाता है ताकि बच्चे भारतीय ज्ञान परपंरा से अवगत रहे हैं। वो ज्ञान परपंरा जिसे हमारे ऋषि-मुनियों ने कई वर्षों की तपस्या से संजोकर रखा है।

गुरुकुल में शिक्षा का मतलब वेद और उपनिषद् ही बल्कि उन्हें गणित, ज्योतिष, भूगोल, भाषाविज्ञान जैसे विषयों का ज्ञान कराना है। गुरुकुल में मूल रूप से शिक्षा पद्धति को दो भागों में बांटा गया है पहला शास्त्र ज्ञान और दूसरा शस्त्र ज्ञान। गुरुकुलों ने समय के अनुसार अपने आप को ढ़ालना सीख लिया है। पहले जहां केवल सीमित विषयों का ज्ञान दिया जाता था वही आज अंग्रेजी, विज्ञान, गणित ज्योतिष जैसे विषयों का अध्ययन-अध्यापन का कार्य किया जाता है। आजकल के लोगों के मन भ्रांति है कि गुरुकुल में केवल संस्कृत नीत विषयों को पढ़ाया जाता है और बच्चों को वेदपाठी बना दिया जाता है।

मेरा यह निजी अनुभव रहा है कि गुरुकुल में संस्कृत ही नहीं अंग्रेजी, हिन्दी, स्थानीय भाषाओं के अलावा विदेशी भाषाओं को भी सिखाया जाता है। इन गुरुकुलों में बच्चों को उच्च श्रेणी का ज्ञान दिया जाता है जहां अनुशासन में रहना सिखाया जाता है। नैतिक शिक्षा जैसे विषय पर ध्यान दिया जाता है जिससे बच्चे पारिवारिक मूल्यों को समझ सके और व्यक्ति व्यवहार कैसे करना है? इसका ज्ञान भी हो जाए। इन सभी के अलावा भारतीय गणित जिसे हम वैदिक गणित का ज्ञान भी दिया जाता है। वैदिक गणित कोई साधारण विषय नहीं बल्कि यह तो गणित को साधारण करने वाला विषय है।

मन को स्थिर रखने के लिए योग, प्राणायाम, व्यायाम , ध्यान आदि का सहारा लिया जाता है। यदि मन स्थिर नहीं रहेगा तो फिर कैसे इंसान बाकी कार्यों पर ध्यान लगा सकता है। गुरुकुल परंपरा में शस्त्र विद्या भी सिखाई जाती है। पहले जब राजा के पुत्र गुरुकुलों में पढ़ने जाया करते थे तो उन्हें केवल शास्त्र का ज्ञान नहीं दिया जाता है बल्कि उन्हें शस्त्र का ज्ञान भी दिया जाता था। इस शस्त्र ज्ञान में उन्हें धनुष-बाण चलाना, भाला-बरछा चलाना, तलवार चलाना जैसे शस्त्रों से अवगत कराया जाता था। शारीरिक शिक्षा भी दी जाती थी। जिसमें सूर्य नमस्कार, शरीर सौष्ठव, कुश्ती की शिक्षा दी जाती थी। प्राचीन काल के गुरुकुलों में मल्लयुद्ध की कला सिखाई जाती है।

आधुनिक गुरुकुलों में शस्त्र विद्या की जगह शारीरिक शिक्षा ने ले ली है लेकिन किसी-किसी गुरुकुलों में आजकल शस्त्र विद्या का ज्ञान दिया जाता है। लाठी चलाना, तलवार चलाना, भाला चलाना आदि शस्त्र विद्या दी जाती है। इन शस्त्रों के अलावा कुश्ती, मार्शल आर्ट, भारतीय खेलों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके अलावा भारत की प्राचीन मार्शल आर्ट जैसे केरल के कलियारीपयाट्टू को कही हद बचाने का श्रेय गुरुकुल को ही जाता है। गुरुकुल केवल एक विद्यालय ही नहीं है बल्कि यह जीवन निर्माण करने वाली संस्था है। गुरुकुल में भगवान श्रीकृष्ण ने 64 विद्या और 16 कलाओं की शिक्षा मात्र 64 दिनों में पूरा कर लिया था।

प्राचीन काल के गुरुकुलों में शिक्षक दो प्रकार के होते थे, पहले जो शास्त्र का ज्ञान देते थे और दूसरे जो शस्त्र का ज्ञान देते थे। आज के गुरुकुल आधुनिक हो गए हैं। आज प्रत्येक विषय के लिए अलग से शिक्षकों को अध्यापन कार्य के लिए रखा जाता है। आज का युग  तकनीकी का युग है। इसी तकनीकी युग में गुरुकुल भी तकनीकी हो गए हैं। गुरुकुलों में आज कम्प्यूटर ज्ञान दिया जाता है। इसी कारण गुरुकुल जीवित है क्योंकि गुरुकुलों ने समय के साथ बदलना सीख लिया है। भारत में ऐसे कई गुरुकुल है जो भारतीय ज्ञान परपंरा को आगे बढ़ाने में तत्पर हैं जिनमें हेमाचंद्राचार्य संस्कृत पाठशाला, ऋषि सांदीपनि वेद प्रतिष्ठा संस्थान, मैत्रेयी गुरुकुल, वीर लोंकाशाह संस्कृत ज्ञानपीठ जोधपुर आदि है।

भारत में आज भी ज्ञान परपंरा गुरुकुलों की वजह से बची हुई है क्योंकि यह हमारी शान हैं।

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शुक्रवार, 11 मई 2018

विराट गुरुकुल सम्मेलन

भारत का पहला विराट गुरुकुल सम्मेलन मध्यप्रदेश की आध्यात्मिक नगरी उज्जैन में 28-30अप्रैल को आयोजित किया गया। असलियत में इस आयोजन का पूरा नाम अंतरराष्ट्रीय गुरुकुल सम्मेलन था। इसका आयोजन भारतीय शिक्षण मंडल और मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग के सहयोग से संपन्न हुआ। आखिर उज्जैन में ही क्यों इसका आयोजन किया गया? इसके पीछे सबसे बड़ा कारण रहा है, ऋषि सांदीपनि का आश्रम। यह वही ऋषि है जिन्होंने भगवान श्रीकृष्ण और बलराम को शिक्षा-दीक्षा दी थी।

यह विराट गुरुकुल सम्मेलन में भारत समेत विश्व के सात देशों के गुरुकुल या उनके प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इनमें  नेपाल, भूटान, म्यानमार, थाईलैंड, जापान, इंडोनेशिया और कतर जैसे देश थे। भारत की इस धरा पर इस प्रकार का यह प्रथम आयोजन था।

इस आयोजन को करने के पीछे उद्देश्य क्या था? गुरुकुल परंपरा को बचाना या परपंरा को समृद्धि बनाना। इस परपंरा को भारत की पहचान कही जाए तो अतिश्योक्ति न होगी। जहां शिक्षा पद्धति बिना किसी लोभ के दी जाती है और बच्चों के सर्वांगीण विकास की बात की जाती है तो इस परपंरा को बचाना हमारा कर्त्तव्य बनता है। इस सम्मेलन में भारत के हर कोने से गुरुकुल में सम्मिलित होने के लिए लोगों का आगमन हुआ। लगभग 3000 प्रतिनिधियों ने इस आयोजन में हिस्सा लिया।

इस आयोजन का मूल गुरुकुल शिक्षा पद्धति को बढ़ावा देना और आधुनिक शिक्षा पद्धति को कैसे गुरुकुल शिक्षा पद्धति के माध्यम से सरल बनाया जा सकता है? इस पर देश के कोने-कोने से प्रबुद्ध और विद्वतजनों ने चर्चा की। गुरुकुल केवल वेदपाठ या संस्कृत का अध्ययन नहीं कराता बल्कि यह तो बौद्धिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, तकनीकी, तार्किक और शारीरिक शिक्षा देता है। लोगों के मन में भ्रम रहता है कि गुरुकुलों में केवल संस्कृत और वेद -उपनिषद् जैसे विषयों का ही ज्ञान दिया जाता है। इसी भावना को तोड़ने के लिए और लोगों को गुरुकुल से जोड़ने के लिए इस प्रकार का भव्य आयोजन किया गया।

गुरुकुल सम्मेलन भारत और विदेशी गुरुकुलों का आपसी मिलन भी था। इस सम्मेलन के माध्यम से एक गुरुकुल ने दूसरे गुरुकुल को जानने की कोशिश की। यही नहीं उनकी शिक्षा पद्धति को आवश्यक रुप से समृद्ध करने की कोशिश की। आज विश्वभर में गुरुकुल परपंरा को अपनाने की बात चल रही है। इसका एक ही कारण है प्राचीन भारतीय ज्ञान परपंरा के साथ-साथ आधुनिक विषयों का अध्ययन-अध्यापन करना।

सम्मेलन में विभिन्न वक्ताओं के द्वारा भारतीय ज्ञान परपंरा और शिक्षा पद्धति को जानने का मौका मिला। कार्यशालाओं का आयोजन किया गया जिसमें भारतीय ज्ञान परपंरा जिसमें आयुर्वेद, ज्योतिष, वैदिक गणित, गणित पर गहन चर्चा हुई। इसके साथ ही भारतीय और विदेशों से आए प्रतिनिधियों के साथ संवाद चर्चा का भी आयोजन किया गया। पाकशाला, गौशाला जैसी कार्यशाला का आयोजन किया गया, जिसमें माता-पिता, गुरु और बच्चों की बीच भावनात्मक जुड़ाव पर गंभीरता से चर्चा की गई।

कार्यशाला के आयोजन के अलावा सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया गया। इसमें बौद्धिक, शारीरिक और नृत्य आदि का मंचन किया गया। मंच से कत्थक, भरतनाट्यम, कालबेलिया जैसे नृत्यों की प्रस्तुति हुई तो वही भारतीय मार्शल आर्ट कलियारीपयाट्टू, मलखंभ, रोपमलखंभ का आयोजन किया गया। वही मंच से वैदिक गणित जैसे साश्वत विषय पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

प्रदर्शनी का आयोजन भी किया गया जिसमें केवल वस्तुओं की प्रदर्शनी ही नहीं बल्कि स्वदेशी को प्रोत्साहित करती हुई प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। इसमें कॉटन के कपड़ा से लेकर लकड़े के सामान तक इस प्रकार के स्टॉल को लगाकर इस प्रदर्शनी को चार-चांद लगाए गए। पुराने सिक्कों का संग्रहण हो या भारतीयता को दर्शाता पुस्तकों हो सभी प्रदर्शनी जान नजर आ रही थी।

इस आयोजन की सबसे बड़ी बात श्रोत यज्ञ का आयोजन था। यह यज्ञ विश्व के कल्याण के लिए आयोजित किया गया था। इस यज्ञ का उद्देश्य और पूर्णाहूति "सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया" की भावना से किया गया था।