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गुरुवार, 25 जून 2020

मैं और किताब

तारीख तो याद नहीं लेकिन साल अच्छी तरह याद है वह था 2014 । शहर था इंदौर जिसे मिनी मुंबई के नाम से जाना जाता है। इंदौर के बापट चौराहे से मुश्किल 200 किमी दूर स्थित आनंद मोहन माथुर सभागार में पंडित विजयशंकर मेहता का सुना तो लगा मानो कुछ नया सुनने को मिला। कपड़े देखकर लगता है कि मानो कोई व्यक्ति धर्मोपदेश देने वाला है लेकिन उसने मैनेजमेंट की गुर बताने शुरू किए। वो उपाय इतने सरल की जीवन में उतारना बेहद आसान। पहली बार मैंने अकेले किसी व्यक्ति को सुनने का इतना साहस किया। साहस ऐसा कि अब तो कुछ बातें मन में घर कर गईं। 

उस सभागार में बैठे कुलीन लोगों में शायद कमतर नहीं था लेकिन उनकी तरह इस तरह के व्याख्यानों के लिए आदि भी नहीं था। उन कुलीन लोगों में अफ्रीका और यूरोप से पहुंचे लोग भी थे जो फर्राटेदार हिंदी बोल रहे थे और अंग्रेजी को हिंदीयत बता रहे थे। उस समय मैं इंदौर में रहकर राज्य सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहा था। मन में ढेर सारे सपने थे क्योंकि इससे पहले केवल मैंने सपने बुने थे, संजोए थे, देखे थे परंतु जीये नहीं थे। जीवन में तरह-तरह के लोगों को देखा नहीं था, कम से कम अकेले तो नहीं। 

हां तो मैं बात कर रहा था पंडित विजयशंकर मेहता की बातें की। बैंक की सरकारी नौकरी छोड़ी, पत्रकारिता में हाथ जमाया लेकिन फिर आध्यात्म की ओर मुड़ गए। आध्यात्म से फिर कुछ इस तरह लगाव हो गया कि भगवान हनुमान को मैनेजमेंट गुरु बना लिया। हमारे हनुमान को वे इस तरह से मानते है कि सारी समस्याओं का समाधान भगवान हनुमान के पास है। जिस दिन मैंने उन्हें सुना उसी दिन उन्होंने एक किताब का जिक्र किया जिसका नाम था 'मेरा प्रबंधक मैं'। पहले तो मैंने सोचा इस किताब को पढ़ा जाएगा लेकिन मेरा मन हमेशा की तरह जांच पड़ताल वाला रहा है। मैंने पंडित के बारे में जानना शुरू किया पता चला कि मेरा दोस्त उन्हीं का शिष्य है। फिर मैंने ढेर सारी बातें पूछ डाली लेकिन जिज्ञासा फिर भी शांत नहीं हुई। मुझे लगा शिष्य है भला गुरु के बारे में गलत क्यों बोलेगा। 

मेरी खोज इंटरनेट पर शुरू हुई यहां ज्यादा कुछ तो नहीं लेकिन किताबें जरूर मिलीं। इन किताबों में मेरा प्रबंधक मैं जरूर मिली। बहुत बार मिली। कई बार मिली। स्टेशन के स्टॉल पर मिली। किताबों की दुकान पर मिली। लोगों के हाथ में मिली। ई-कॉमर्स वेबसाइट में भी मिली। साल बीतते गए। एक फिर दो फिर तीन.... ऐसे करते हुए छह साल हो गए। मैं भी जगह और शहर बदलता गया। इंदौर से नोएडा आ गया। दिल्ली अब दूर नहीं का नारा शायद साल 2020 में ही पूरा होना था। इंटरनेशनल बुक फेयर 2020 में जब ये किताब मिली तो लगा अब बस मुझे इसे खरीद ही लेना चाहिए। किताब तो खरीद ली लेकिन जॉब वाली लाइफ में और ऊपर से मुझ जैसा आवारा। कैसे इतनी जल्दी किताब पूरी कर पाता। पूरे पांच महीने 15 दिन बाद किताब आखिरकार पढ़ ही ली। 

शुरुआत में किताब अन्य साधारण किताब की तरह लगी। लगा छोड़ दूं लेकिन धीरे-धीरे पढ़ता गया और किताब को मात्र आधे घंटे में खत्म कर दी। मात्र 58 पेज की ये किताब जरूर बहुत छोटी है लेकिन साधारण तो बिल्कुल नहीं। मुझे ऐसा लगता है कि यदि हम किसी व्यक्ति पर भरोसा नहीं करते तो ना करें लेकिन हम उसके लिखे हुए को पढ़ तो सकते हैं। पंडित विजयशंकर मेहता कैसे व्यक्ति हैं मुझे नहीं मालूम। मैं उनसे व्यक्तिगत तौर पर जरूर मिला हूं परंतु नहीं कह सकता कैसे हैं? किताब मेरा प्रबंधक मैं आपको राह दिखाती है। मोटिवेट करती है। नकारात्मक से सकारात्मक की ओर ले जाती है। आपको ब्राइट से ब्राइटर बनाने के गुर बताती है। 

परिवार, दोस्त और स्वयं का मूल्य बताने वाली ये किताब हमें स्वयं से जरूर मिलवाती। टाइम मैनेजमेंट कैसे किया जाता है ये किताब बताती है। निजी, पारिवारिक, सामाजिक और व्यावसायिक क्रम को व्यवस्थित रखना सिखाती है। किताब आपको पढ़ना है या नहीं ये आपको तय करना है लेकिन किताब कैसे पढ़ना है ये भी आपको तय करना है। जीवन के आयाम बताने वाली इस किताब को मैंने आखिरकार पढ़ ही लिया। 

शुक्रवार, 29 मई 2020

चलते-चलते (सीरीज -16)

बचपन बड़ा ही मासूम होता है। कुछ सोचकर भी समझने की कोशिश अलग ही अंदाज में करता है। जब मैंने पहली महामारी का नाम सुना था तब शायद मेरी उम्र 9-10 साल रही होगी। उस समय तो केवल इतना ही पता था महामारी कोई बीमारी है। लेकिन ये क्या बला है? इसका अंदाजा उस उम्र में नहीं था। उस समय तो एक-दो बार मैंने महामारी को महाबीमारी तक लिख दिया। अब तो उस बात को सोचता हूं तो हंसी आती है। वो प्यारा बचपन जिसमें कोई भी संकट आ जाए सब झेलने की भावना थी क्योंकि संकट का पता ही नहीं होता था कहते किसे हैं। 

जब धीरे-धीरे बड़े हुए तब मालूम हुआ कि महामारी किस बला का नाम है। महामारी यानी इंग्लिश में एपिडैमिक। जब बीमारी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में बड़ी तेजी से फैलती है और एक बड़े हिस्से को प्रभावित करती है तो इसे महामारी कहते है। बचपन से लेकर दिसंबर 2019 तक मेरा सामना किसी बीमारी से नहीं हुआ। जब कोरोना वायरस जैसी महामारी का पता चला तो जीवन में बहुत से बदलाव आ गए। किताबों, टीवी और बड़े लोगों से केवल सुनते थे कि चेचक, हैजा जैसी महामारी का प्रकोप कभी भारत में हुआ था। 

आज की स्वास्थ्य व्यवस्था को देखकर लगता है कि उस समय स्थिति कितनी भयावह रही होगी। कोरोना वायरस ने आज वही स्थिति पैदा कर दी है जो आज से कई साल पहले थी। 
डब्ल्यूएचओ ने कोरोना को महामारी नहीं बल्कि विश्वमारी घोषित किया है। इस विश्वमारी इंग्लिश में पेनडैमिक कहते हैं। इसने विश्व के सभी देशों को प्रभावित किया है। अमेरिका से लेकर जापान और रूस से लेकर ऑस्ट्रेलिया सभी देश आज इसकी चपेट में हैं। महामारी की विभीषिका कितनी भयानक होती है आज देखने को मिल रहा है। हमें अलेक्जेंडर फ्लेमिंग का शुक्रगुजार होना चाहिए कि एंटीबायोटिक की खोजकर उन्होंने मानवजाति को वरदान दिया है। 

चीन से पनपा ये वायरस आज भारत के गांव तक पहुंच गया है। जीवन में दहशत का एक नया अध्याय जोड़ दिया है इस कोरोना वायरस ने। आज मुझे जब मालूम हुआ कि मेरे सेक्टर में फिर से कोरोना वायरस की दस्तक हुई है तो शुरू में मन शांत था लेकिन मन की लहर तीव्र गति से अशांति की जाने लगी। कभी-कभी लगता है कि ये बीमारी कब खत्म होगी? होगी भी या नहीं। दुनिया के कई सारे देश वैक्सीन बनाने में जुटे हैं। क्या होगा यदि वैक्सीन शत-प्रतिशत सही नहीं हुई तो? जीवन का अंत ऐसे में करीब नजर आने लगता है। आज डॉक्टर कोरोना से पीड़ित जिन मरीजों का इलाज कर रहे हैं। डॉक्टर इलाज नहीं कर रहे बल्कि अंधेरे में तीर चला रहे हैं। कोई एचआईवी एड्स की दवा, कोई मलेरिया की दवा तो कोई फ्लू में काम आने वाली दवा उपयोग कर रहा है। पता नहीं क्या होगा? 

कोरोना वायरस जिसे कोविड 19 के नाम से भी जाना जाता है इसलिए भी खतरनाक है क्योंकि आजतक इसका सोर्स पता नहीं चल पाया है। वुहान वायरोलॉजिस्ट की वैज्ञानिक जिसे आज लोग बैट वूमेन के नाम से जानते हैं उसने कहा कि ये तो मात्र एक वायरस है जो चमगादड़ में पाया जाता है ऐसे कई वायरस है जो पूरी दुनिया को परेशान कर सकते हैं। कोविड 19 कोई पहला वायरस नहीं है जो जानवर से इंसानों में आया। इससे पहले सॉर्स, मर्स, इबोला जैसी बीमारियों की लंबी सूची है। 

लोगों ने कई सारे प्लान बनाए थे जो कोरोना की वजह से धराशायी हो गए। मैंने भी प्लान बनाए थे। घुमक्कड़ी का शौक रखने वाला मैं, घूमने के लिए कई सारे डेस्टिनेशन खोज लिए थे। गर्मी इस बार पहाड़ों पर बिताऊंगा ऐसा सोचा था लेकिन किस्मत इस बार कोरोना के साथ थी। साल 2020 सभी के लिए काला रहा है। त्योहार, पर्व, इवेंट, शादी, प्लान की बलि चढ़ गई। कई लोगों की नौकरी चली गई तो कई लोग काल के गाल में समा गए। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट इस बार निगेटिव रखी है। इससे भयानक और क्या हो सकता है। जब तक इस कोरोना से पीछा नहीं छूटता सब भयानक है भयावह है। 

मंगलवार, 19 मई 2020

चलते-चलते (सीरीज-15)



पहले लॉकडाउन आया,इसके बाद लॉकडाउन 2.0 आया फिर लॉकडाउन 3.0, इसके बाद लॉकडाउन 4.0 पता नहीं आगे क्या होने वाला है। क्या फिर से लॉकडाउन बढ़ेगा या फिर लॉकडाउन  को खत्म कर हमारी जिंदगी फिर से सामान्य हो जाएगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर तमाम मेडिकल से जुड़े व्यक्तियों का कहना है कि कोरोना वायरस अब हमारे साथ रहेगा। इसका मतलब है कि आने वाले समय कोरोना आम फ्लू की तरह हो जाएगा। इस फ्लू के साथ हम जीवन बिताएंगे। लेकिन ये कब तक होगा? किसी को इस बात की जानकारी नहीं।

वैज्ञानिक वैक्सीन की खोज में डटे हुए हैं। दुनियाभर के देशों में कोरोना के खिलाफ जंग जारी है। बांग्लादेश के वैज्ञानिकों का कहना है कि पशुओं में कीड़े मारने वाली दवा आईवरमेक्टिन और डॉक्सीसायक्लिन का कॉम्बिनेशन बनाया। इस कॉम्बिनेशन से कोरोना के इलाज में मदद मिलेगी। ये तो समय ही बता पाएगा  कि क्या इलाज के लिए बेहतर है क्या नहीं? कुछ समय पहले तक हाइड्रोक्सीक्लोरीक्वीन के लिए पूरी दुनिया में शोर मच रहा था। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने तो हाइड्रोक्सीक्लोरीक्वीन के लिए भारत को धमकी तक दे डाली थी। हांलाकि भारत ने एशिया से लेकर अमेरिका तक हाइड्रोक्सीक्लोरीक्वीन बांटी। ट्रंप से उलट अमेरिका के कई वैज्ञानिकों ने इस दवा के प्रभाव को नकार दिया और यहां तक कहा कि भारत से आने वाली ये दवा घटिया क्वालिटी की है।

हाइड्रोक्सीक्लोरीक्वीन दवा मुख्य रूप से मलेरिया में उपयोग होने वाली दवा है। भारत इस दवा का सबसे बड़े उत्पादक देश में से है। भारत की महानता तो देखिए कि कोरोना से लड़ाई कोई देश ना हारे इसलिए पाकिस्तान को भी मेडिकल सप्लाई दी। पाकिस्तान में इस बात का विरोध हुआ कि हम दुश्मन देश से मेडिकल सप्लाई कैसे ले सकते हैं। वहां पीएम इमरान खान ने जांच कमेटी बैठा दी। वाह रे! राजनीति क्या-क्या करवा देती है। जब हम चीन से घटिया मास्क और पीपीई किट ले सकते हैं तो हमने तो पाक को अच्छी क्वालिटी का सामान दिया था।

कई देशों में रेमडेसिवर दवा का इस्तेमाल किया जा रहा है। रेमडेसिवर दवा इबोला के लिए विकसित की गई थी लेकिन उपयोगी सिद्ध होने से कोरोना के काम आ रही है। भारत में फेविपीरावीर नामक दवा का ड्रग ट्रायल शुरू किया जाएगा। ये दवा चीन और जापान में फ्लू के लिए इस्तेमाल की जाती है। इसके पहले भारत में दूसरी दवाओं के साथ प्रयोग देखा गया है। इन दवाओं में एड्स की दवा भी शामिल है। जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल में डॉक्टरों ने इस दवा का उपयोग किया था जो कहीं हद तक सफल रहा था। कई जगह खांसी-जुकाम में काम आने वाली पैरासिटामॉल के साथ भी प्रयोग देखा गया।

कोरोना पर कौनसी दवा का असर होगा? किस दवा का असर नहीं होगा? समय ही बता पाएगा। कोरोना ने जीवन को माफ कीजिएगा दैनिक जीवन को बदल दिया है। मास्क के बिना अब जीवन अधूरा सा लगता है। ऐसा लगता है मानो कुछ छूट गया हो। जब पीएम ने कहा है कि गमछा भी कारगर है तभी से हम भी गमछामैन बन गए। इस भंयकर महामारी के बीच भी ऑफिस जाते है और बहुत सारे जतन करके जाते हैं। सैनिटाइजर और सोशल डिस्टेंस अब जरूरी हो गया है। बिना मास्क के आपके साथ बुरा व्यवहार हो सकता है या फिर आपको मास्क पहनने के लिए बाध्य किया जा सकता है।

मैं पत्रकार हूं। जिसे रोजाना ऑफिस जाना होता है और कोरोना की भयावह खबरों से दो-चार होना पड़ता है। कोरोना के बढ़ते मामले देश के लिए विश्व के लिए खतरनाक है। दुनिया पर जितना सितम कोरोना ने किया है उतना शायद ही किसी और किया हो। लॉकडाउन से स्थिति में बहुत हद तक सुधार हुआ है। एक स्टडी कहती है कि यदि लॉकडाउन नहीं होता तो भारत में आज कोरोना वायरस  से संक्रमितों की संख्या 53 लाख होती। लॉकडाउन डबलिंग रेट 4 दिन था जो आज 13 दिन हो गया है और रिकवरी रेट भी बढ़ गया है। लॉकडाउन की महिमा अपरंपार है।

इस लॉकडाउन की वजह से प्रकृति सास ले रही है। पुख्ता तौर पर तो नहीं कह सकता लेकिन इस लॉकडाउन की वजह से अभी तक सबसे कम गर्मी पड़ी। अप्रैल 2020 तक मौसम विभाग का कहना है कि भारत में 12 साल में सबसे कम गर्मी हुई। रुक-रुककर बारिश होना और तेज आंधी-तूफान इस प्रकृति जनित हो सकता है लेकिन ये सुहावना रहा। मैं इस मौसम को पहली इंज्वाय कर रहा हूं। मौसम विभाग ने भविष्यवाणी किया है कि इस साल मानसून पांच दिन देरी आएगा। ये देरी किसानों के साथ-साथ भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। मूडीज ने भारत की अर्थव्यवस्था के बारे में संभावना जताई है कि भारत में इतिहास की सबसे बड़ी मंदी आएगी।

अर्थव्यवस्था को झटका तो लगने वाला है। देशभर में इस लॉकडाउन की वजह कई कंपनियां बंद हुई हैं। लोग बेरोजगार हुए हैं। मजदूर वर्ग इस लॉकडाउन से सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। मजदूरों का पलायन जारी है। काम नहीं है, खाना नहीं मिल रहा है, पैसा नहीं है, जमापूंजी खत्म हो रही है, मजदूर अपने घर से पैसे मंगवाकर जीवनयापन कर रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार अबतक 22 लाख मजदूर अपने घर लौटे हैं। राज्य सरकार दूसरे राज्यों से लगने वाली सीमा तक मजदूरों को बसों के जरिए छोड़ रही है बाकी मजदूरों की जिंदगी भगवान के भरोसे। खाना के पता नहीं, घरों तक कैसे पहुंचेंगे पता नहीं, शौचालय नहीं है, कैंपों में पर्याप्त व्यवस्था नहीं।

देशभर से पलायन जारी है। दक्षिण भारत और महाराष्ट्र, गुजरात से पलायन करने वाला मजदूर एमपी गुजरकर अपने घरों तक जा रहा है। एमपी सरकार इतनी सक्षम नहीं की सारा बोझ झेल ले। एमपी में एनएच 3 और एनएच 7 पलायन का सबसे बड़ा जरिया बना है जो दक्षिण को उत्तर से जोड़ता है। इन पर लाखों मजदूर चल रहे हैं। मैं तो यही सोचता हूं कि कोई अनहोनी ना हो। सरकार ने श्रमिक स्पेशल ट्रेन और राजधानी जैसे ट्रेन चलाई लेकिन इनमें सवार होना भी बहुत मुश्किल है। बिहार और यूपी जाने वाली ट्रेनों के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ रही है।

कोरोना ने लोगों को वो दौर दिखाया है जो सबके लिए आसान नहीं है। महाराष्ट्र के 1000 से ज्यादा पुलिसकर्मी कोरोना संक्रमित पाए गए। जब सुरक्षा में सेंध लग जाए तो क्या होगा? मैंने लोगों को जागरूक होते देखा है। सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क, हैंड वॉश करना और हेल्दी खाने की आदत में बदलते देखा है। मैंने अपनी जिंदगी में इतनी रोटी नहीं बनाई जितनी की इस लॉकडाउन पीरियड में बनाई है। मेरा घूमना बंद है। इतने समय तक कभी किसी एक ही शहर में नहीं गुजारा। अब तो जिंदगी ऑफिस से घर और घर से ऑफिस हो गई है। फ्लैट की बालकनी से दूर दिखती हरियाली और बिल्डिंग को निहारना अच्छा अनुभव है। देखो बाकी क्या होगा। जो होगा सब अच्छा होगा।

📃BY_vinaykushwaha

बुधवार, 29 अप्रैल 2020

कोरोना के संकटकाल में खाने का कैसे प्रबंध करें...


रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए ना ऊबरै , मोती, मानस, चून ।। रहीम ने आज से लगभग 500 साल पहले बताया था कि पानी का क्या महत्व है। पानी के बिना जीवन कितना अधूरा है। पानी को सहेजना होगा क्योंकि मानव (Human) से लेकर मोती (Pearl) तक सबकुछ पानी से ही है। पानी ही सबकुछ है लेकिन कोरोना के संकटकाल में लोगों को पता चल गया कि केवल पानी ही सबकुछ नहीं है। जीवन जीने के लिए और जीवित रहने के लिए हमें सूखे खाने को भी इकट्ठा करने की जरूरत है।

इतिहास बताता है कि आक्रमणकारी कई दिनों की यात्रा करके एक स्थान से दूसरे स्थान जाया करते थे। इनकी विशाल सेना में हाथी, घोड़े, शस्त्र-अस्त्र के अलावा ढेर सारा खाना भी होता था। वे ऐसा खाना लेकर चलते थे जो आसानी से खाया जा सके। जब किसी जगह पडाव होता था तो वहां के स्थानीय फसल और शिकार का इस्तेमाल किया जाता था। ये आक्रमणकारी अपने साथ फल, सूखे मेवे जैसे खाने के सामान लेकर चलते थे। इतना ही नहीं ये लोग अपने साथ मसाले भी ले जाया करते थे।

भारतीय पाक कला हजारों साल पुरानी है। इसमें कोई संदेह  नहीं है कि आज से लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों से चावल के प्रमाण मिले हैं जो ये बताता है कि वे केवल पशुपालन पर निर्भर नहीं थे। सिंधु घाटी सभ्यता के समय भारत का व्यापार मिस्त्र (Egypt), मेसोपोटामिया जैसी सभ्यताओं से रहा था। भारतीय व्यापारी इन सभ्यताओं को अनाज और कपास निर्यात करते थे बदले में ये सभ्याताएं मसाले और रत्न, कीमती धातु देते थे। धीरे-धीरे व्यापार का स्वरूप बदलता गया। मौर्य साम्राज्य के समय यूनान (Greece) के साथ व्यापारिक संबंध अच्छे थे।

ग्रीस मौर्य दरबार में अपने राजदूत नियुक्त करते थे। इसके बदले में भारत को सूखे मेवे जैसे खूबानी और इसके अलावा शराब आयात की जाती थी। व्यापारी जब एक जगह से दूसरी जगह जाते थे तो कई दिनों का सफर तय करते थे। इन कई दिनों के सफर में ऐसा खाना ले जाते थे जो हल्का हो जिससे वजन ना बढ़े और जल्दी खराब ना हो। गुजरात और राजस्थान के व्यापारियों में इस तरह के प्रमाण मिलते है कि वे अपने साथ बेसन से बने खाद्य पदार्थ के अलावा अचार भी ले जाया करते थे।

आज भी दोनों राज्यों के खानपान पर बेसन का प्रभाव साफ-साफ दिखाई देता है। गुजरात के व्यापारियों के खाने से लेकर अचार तक में शक्कर का इस्तेमाल किया जाता था। इसके पीछे एक  कारण था कि शरीर में ग्लूकोज की मात्रा में कमी ना हो। शक्कर खाने में होने से व्यापारियों को अलग से मीठे खाद्य पदार्थ लेने की आवश्यकता ही नहीं थी। राजस्थान में तो इसके उलट खाने में लाल मिर्च का इस्तेमाल किया जाता है। राजस्थान के व्यंजनों में लाल मिर्च डालने का सबसे बड़ा कारण शरीर से विषाक्तता निकलना। लाल मिर्च का सेवन करने से पसीना आता था और इससे शरीर से अनावश्यक पदार्थ बाहर निकल जाते थे।

भारत में हर क्षेत्र की अपनी एक विशेषता है। यही विशेषता खाने में साफ-साफ दिखाई देती है। दक्षिण भारत में चावल की अधिक  पैदावार होती है जो वहां के खाने में दिखाई देती है। इडली, डोसा, पुतरेकू, अवियल जैसे खाने तो सामान्य तौर पर खाते ही हैं लेकिन चावल से बने सूखे पदार्थ को लंबे समय तक खाने के लिए रखा जाता है। दक्षिण भारत में जून से सितंबर तक भारत की सबसे ज्यादा बारिश वाला समय होता है तब ये काम आता है।

मैं मध्यप्रदेश का रहने वाला हूं जहां हर मौसम की एक फसल होती है। यहां बारिश का मौसम तेज बरसात वाला और लंबा होता है जिस कारण हरी सब्जियां मिलना मुश्किल होता है। बरसात के मौसम में खाने में बड़ी (बरी) और बिजौरे का होता है। ठंड के समय कद्दू और उड़द की दाल से बनी बरी और तिल के साथ बनने वाले बिजौरे काम आते हैं। एमपी में सोयाबीन की पैदावार अच्छी होने के कारण यहां सोयाबीन की बरी खाने का प्रचलन है। सूखे खाद्य पदार्थ जो ऐसे समय काम आते हैं जब आपको हरी सब्जियां उपलब्ध नहीं होती हैं।

भारत में ठंड का मौसम हरी सब्जियों वाला होता है। इस मौसम में सब्जियां बहुतायत में पैदा होती हैं। मेथी (Fenugreek), पालक (Spinach) जैसी हरे पत्तेदार सब्जियां होती हैं। इन्हें सुखाकर बरसात के समय खाने में इस्तेमाल किया जाता है। पहाड़ी इलाकों में राजमा, चने, चौले, मटर जैसी सब्जियां होती है  जो सालभर खाने में सब्जी के रूप में इस्तेमाल की जाती है। खाना समुचित पोषक तत्व से भरपूर हो इसके लिए भारत में हमेशा से इसका ध्यान रखा जाता है। ठंड के समय तिल, राजगीर, लाई, गुड के लड्डू बनाए जाते हैं जो पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। पूर्वी एमपी और छत्तीसगढ़ में चावल की पैदावार जमकर होती है यही चावल ठंड के समय लड्डू बनाने के काम भी आता है।

जम्मू कश्मीर में आए दिन लॉकडाउन और बंद का सामना करना पड़ता है। लॉकडाउन और बंद के अलावा यहां सर्दियां कटीली और कष्टदायक होती है। इसी वजह से यहां सूखे खाद्य पदार्थ को इकट्ठा करने की विशेषता रही है। यहां राजमा, काबुली चने, सूखे मेवे का इस्तेमाल किया जाता है। ठंड के समय में चाय बनाने के लिए समोवार का इस्तेमाल किया जाता है जिसमें चायपत्ती की जगह गुलदाउदी की पत्ती, केसर, मेवे और नमक का इस्तेमाल किया जाता है। यहां समोवार में बनने वाली चाय मीठी नहीं नमकीन होती है। इसी तरह उत्तराखण्ड और हिमाचल में आलू की पैदावार अच्छी होती है जो यहां के खाने में सालभर दिखाई देता है।

कोविड-19 की वजह से भारत में लॉकडाउन के 36 दिन पूरे हो चुके हैं। करोड़ों लोग को सरकार और समाजसेवी संगठन राशन और सब्जियां उपलब्ध करा रहे हैं। भारत के उन इलाकों जहां सरकार और समाजसेवी संगठन की पहुंच नहीं वहां हाल क्या है ये वही बता सकता है जो भुक्तभोगी है। भारत और भारतीयों के लिए सीख है कि हमें अपने आप से सीखना होगा कि कैसे किसी विपदा से तैयार रहे हैं। जमाखोरी नहीं करना है बल्कि इसका दूसरा विकल्प खोजना है। इस विकल्प में ऐसे खाद्य पदार्थ एकत्रित करना है जो आसान से ही हमारे लिए उपलब्ध है। जैसे चाय बनाने के लिए चाय पत्ती ना हो तो आप सेवंती के फूल या गुलदाउदी के फूल को सुखा कर चायपत्ती के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। यदि ऐसा संभव ना हो पाए तो घर के गमलों का इस्तेमाल करें एक गमले में अगिया घास लगाएं जो चायपत्ती के जगह इस्तेमाल किया जा सकता है।

विपदा के समय घर के गमले काम आ सकते हैं। इन गमले में केवल फूल और शो पत्ती ना उगाएं। इनका इस्तेमाल हरी सब्जी उगाने के लिए इस्तेमाल करें। किचन गार्डन में केवल गार्डन ना हो फल और सब्जियां उगाएं। गमलों में आप हरी धनिया, हरी मिर्च, लौकी, करेला, गिलकी, सेम, पुदीना, करी पत्ता, आलू, टमाटर जैसी सब्जी उगा सकते हैं। जब आपके घर में खाद्य तेल (edible oil) खत्म हो जाए तो उसका क्या विकल्प है? इसका विकल्प ये है कि दूध से घी बनाना सीखें जो आपका सालभर साथ देगा।

ये छोटी-छोटी चीज हैं जो भारत को विपदा में बचा सकती है। लोग अपने आप को सुरक्षित और जीवन में खुशहाली ला सकते हैं। 

📃BY_vinaykushwaha🙂

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

चलते-चलते (सीरीज 14)

ये लॉकडाउन भी बड़ी अजीब चीज है। इस लॉकडाउन ने या यूं कहें कि कोरोना वायरस ने सारी दुनिया को ही लॉक कर दिया। सड़कें, पार्क, मार्केट को खाली करा दिया। उड़ते हुए मशीनी पक्षी को जमीन पर लैंड करा दिया, ट्रेनों की रफ्तार को विराम दे दिया और बसों के पहिए थाम दिए। लॉकडाउन बड़ी चीज है। मैं  भी इस लॉकडाउन का हिस्सा बन गया हूं। इक्कीस दिन के इस लॉकडाउन ने जीवन जीने का और देखने का नजरिया ही बदल दिया। मैं इस तरह भी कह सकता हूं कि बहुत कुछ बदल गया है।
लोग घरों में कैद हो चुके हैं। कैद भी इस तरह की घरों से बाहर निकलना भी डरावना लगता है। सोशल डिस्टेंसिंग ने तो लोगों के बीच और दूरियाँ बढ़ा दी हैं। पहले जहां छोटी दूरियां थीं और बड़ी-बड़ी हो गई हैं। इस लॉकडाउन में जीवन बड़ा-सा लगने लगा है। दोपहर के दिन वीरान और रात बहुत काली लगने लगी है। दिन की दुपहरिया में तपता गांव आज का शहर बन चुका है। सूरज की रोशनी से तपती सड़कें और उस पर चलते इक्का-दुक्का लोग जीवन तलाशते हुए आगे बढ़ते हैं।

इस लॉकडाउन ने कुछ अच्छी चीज भी दी है जिसमें ये नीला आकाश भी शामिल है। आमतौर पर ये नीला आकाश कहां देखने को मिलता है। आकाश को काले धुएं से भरने वाली ये चिमनियों ने भी जहर उगलना अब बंद कर दिया है। अब आसमान में सफेद बादल और उनके बीच उड़ते पक्षी बचपन वाले दौर की याद दिलाते हैं। अब तो पक्षियों की आवाज भी सुनाई देती है क्योंकि गाड़ियों का शोर कम हो गया है। उजाला सब कुछ बयां करता है, सबकुछ। दिन में आज भी शोर होता है लेकिन ये प्रकृति का शोर है। अब तो केवल दिन में पुलिस और एंबुलेंस की चहलकदमी नजर आती है।

रात भले ही भयानक सी लगने लगी हो लेकिन इस रात में अब वो दम वापस आ गया जो शायद छिन गया था। अनंत तक फैला ये आकाश कहता है कि विशालता मेरा ही दूसरा पर्याय है। तारों को अपनी गोद में खिलाता ये आकाश अब ज्यादा सुनहरा लगता  है जो पहले कहीं गुम हो गया था। बचपन वाले तारे, ढेर सारे तारे और चांद की चमक भी कुछ ज्यादा ही है। अब तो मैं नोएडा के आकाश में सप्तर्षि, कालपुरुष, शर्मिष्ठा, ध्रुव तारे को आसानी से देख पा रहा हूं। शुक्र का चमकीला अंदाज भी मैं देख पा रहा हूं। सुबह का उगता सूरज और डूबता सूरज नारंगी की तरह साफ-साफ दिखाई देता है।

इस लॉकडाउन में प्रकृति ने अपना अलग ही रंग बिखेर दिया है। ऐसा लगता है मानो प्रकृति इंसानी चलुंग से आजाद है और आजाद होकर स्वच्छंद होकर श्वास ले रही है। फूलों को अब कोई छेड़ता नहीं, पत्तियों को अब कोई तोड़ता नहीं, टहनियों को कोई अब खींचता नहीं और पेड़ों को अब झकझोरता नहीं। अब धीरे-धीरे लगने लगा है कि प्रकृति का अलग ही जलवा है। घास फिर अपने मनमाफिक बढ़ने लगी है क्योंकि अब उसे विरोध नहीं झेलना पड़ता। अब सूरज की किरणें भी प्रदूषण की चादर से छनकर नहीं आती, सीधे 15 करोड़ किमी की दूरी तय करके नन्हीं पत्तियों तक पहुंचती है।

पक्षियों ने फिर चहकना शुरू कर दिया है। नीले आकाश में ऊंची उड़ान भरना शुरू कर दिया है। अब केवल कबूतर ही नहीं आकाश में चील, कौआ, कोयल, गौरैया जैसे पक्षी दिखाई देते हैं लेकिन पहले की तरह अब भी रात में चमगादड़ दिखाई देते हैं। नीलगाय को मॉल के पास घूमते देखना हो या बारहसिंगा का हरिद्वार की बस्ती में घूमना एक अलग ही अनुभव है। अब सोसायटी के कुत्ते भी भौंक कर पूछते हैं तुम कौन हो बे?

इस लॉकडाउन ने कई लोगों को मुसीबत में डाला है तो कुछ अच्छा काम भी किया है। प्रदूषण का स्तर उस दर्जे का कम हुआ है जो लोग सपने में सोचते थे कि ऐसा यहां कभी हो सकता है। हां, अब मेरी छत से सुपरनोवा टॉवर, सेक्टर 18 और 16 की बिल्डिंग आसानी से दिख जाती है।

ये आसान नहीं है फिर आसान है। 

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2020

चलते-चलते (श्रृंखला 13)

ट्रेन का सफर सबक और लोगों को समझने का मौका होता है। ट्रेनों में लोग पैसेंजर बनकर सफर ही नहीं करते है बल्कि गांव-घर से लेकर देश की राजनीति की बात भी करते हैं। कभी-कभी तो ये बातचीत इतनी भयानक मोड़ ले लेती है कि नौबत बहस से आगे पहुंच जाती है। खासकर वो बातें और रोमांचक होती हैं। दिसंबर की बात थी मैं दिल्ली से कटनी जा रहा था। कई लोग अपने बच्चों की मानसिक क्षमता का प्रदर्शन कर रहे थे। ये समझ लीजिए कि दो गुट बन गए थे एक सवाल पूछता और दूसरा जवाब देता। सवाल और जवाब की प्रतियोगिता में कई सवाल और जवाब बड़े रोमांचित कर देने वाले थे। 

एक गुट ने दूसरे से पूछा कि देश का राष्ट्रपति कौन? सामने से जवाब आया नरेंद्र मोदी। फिर सामने वाले गुट ने सही जवाब बताते हुए कहा रामनाथ कोविंद। फिर सवाल आया देश का प्रधानमंत्री कौन? जवाब आया अमित शाह। सही जवाब देते हुए दूसरे गुट ने कहा अमित शाह नहीं नरेंद्र मोदी। मैंने अपना माथा पीट लिया। जिन लोगों को देश का प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति का नाम मालूम ना हो वे क्या करेंगे? 

मुझे इन सबके बीच वो वीडियो याद आ गया जिसमें दो बच्चियां नरेंद्र मोदी और अमित शाह को अपशब्द कहते हुए दिखाई देती हैं। वो कहती हैं कि दोनों मुसलमानों को भारत में नहीं रहने देना चाहता। फिर इन्हीं दो बच्चियों से आजादी वाले नारे लगवाए जाते हैं। क्या इन्हें पता है कि वे क्या कर रहीं हैं? अपशब्दों से किसका भला हुआ है? आजादी वाले नारे लगाने से क्या होगा? क्या वे जानती हैं कि वे जाने-अनजाने जहर बोने वालों को और सबल दे रही हैं। बच्चियों के मन में इतना जहर किसने घोला? जहर घोलने वाले लोग हमारे बीच में से ही कोई है जो आने वाली पीढ़ी को सच से वाकिफ नहीं करवाना चाहती। 

सड़कों पर उतरे ये लोग बच्चों की आड़ में गलत बात कहकर बचना चाहते हैं। भ्रम फैलाकर लोगों को गुमराह करना चाहते है। सोशल मीडिया से लेकर वास्तविक दुनिया तक वाहवाही लूटना चाहते हैं। बच्चे तो गीली मिट्टी होती है जिसे जो आकार दिया जाए वो पा लेता है। यदि हम बच्चों को सच नहीं बताएंगे और झूठ के सहारे उन्हें बड़ा करेंगे तो उनका जीवन देश के लिए नासूर बन जाएगा। 

मंगलवार, 12 नवंबर 2019

चलते-चलते(श्रृंखला 12)

ये दूसरा साल है जब मैं दीपावली पर घर नहीं गया। मम्मी और पापा को आस थी कि मैं इस बार उनका बेटा जरूर आएगा। मैंने उनकी आस को तोड़ते हुए कहा कि मैं अब देवउठनी एकादशी पर आऊंगा। हमारे यहां देवउठनी एकादशी को ग्यारस भी कहा जाता है। कई लोग इसे छोटी दीवाली या देव दीपावली भी कहते हैं। दीवाली से ग्यारहवें दिन देवउठनी एकादशी होती है। यह त्यौहार हमारे घर पर बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इसी पर्व के साथ दीपावली के त्यौहार का समापन हो जाता है। 

इस साल एकादशी 8 नवंबर को थी। मैंने बॉस को पहले ही इत्तिला कर दिया था कि मुझे 8 नवंबर से 18 नवंबर तक छुट्टी चाहिए। मुझे जाने की इजाजत भी मिल गई थी। मैंने जाने और आने का थर्ड एसी का टिकट करा लिया था। जबसे नौकरी लगी है तबसे थर्ड एसी से नीचे टिकट नहीं ली भले सफर तीन घंटे का ही क्यों ना हो। यहां तो 16 घंटों की बात थी। घर जाने की उत्सुकता मन में संजोए मैं रोज कुछ नया सोचता रहा था। कभी सोचता घर जाकर ये करूंगा या घर जाकर वो करूंगा। मम्मी-पापा ने भी कई तरीके से सोचकर रखा था कि बेटा घर आ रहा है तो अच्छा है। 

इन सबके बीच मेरी मम्मी को सबसे ज्यादा उत्सुकता मेरे घर आने की थी और क्यों ना होती? मैं सात महीने बाद घर जा रहा था। मैं पिछली बार घर होली पर गया था। उसके बाद अब जाने का समय मिला था। जीवन में कई बार कुछ अनोखे काम होते हैं। मैं उन बच्चों में से था जो मां-बाप से कभी अलग नहीं रहा लेकिन आज मुझे घर से बाहर रहते हुए 6 साल हो गए हैं। इन 6 सालों में मुझे अलग-अलग अनुभव मिले। जीवन कैसे जिया जाता इन्ही 6 सालों में पता चला। जीवन में किरदार किस तरह के होते हैं इन्ही 6 सालों में पता चला। दोस्त क्या होते हैं? नशा क्या होता है? गाली क्या होती है? सबकुछ इन्हीं 6 सालों में पता चला। जिंदगी में एक बार ज्ञान जरूर मिलता है मुझे इन 6 सालों के हर एक दिन ज्ञान मिला। 

एक कहावत है कि "समय बड़ा बलवान" । मेरे साथ भी समय ने बड़ा खेल खेला। कई सम्मिलित कारणों की वजह से मेरी छुट्टी रद्द हो गई। ये पहली बार था कि जब मेरी छुट्टियों पर ग्रहण लगा। मैं पहली बार बहुत मायूस रहा ना तो मैंने उस दिन नाश्ता किया ना ही उस दिन में खाना खाया। मुझे अभी भी आशा किरण घोर अंधेरे में जलती हुई लौ की तरह दिखाई दे रही थी। कुछ हो ना सका। अब लग रहा था कि धरती फट जाए तो मैं उसमें समा जाऊं। मुझे सबसे ज्यादा चिंता मम्मी-पापा की थी कि मैं उन्हें किस तरह बताऊंगा कि मैं नहीं आ रहा। लेकिन जैसे-तैसे उनको समझाया और बताया कि मैं क्यों नहीं आ रहा। 

मैं छुट्टी लेने के बारे में ज्यादा नहीं सोचता लेकिन ये पहली बार था जब मुझे घर के लिए आस थी। मैंने बॉस को कई तरीके से मनाने की कोशिश की। इतना दुख तो मुझे टिकट कैंसिल करते समय एक हजार रुपये की बलि चढ़ाते वक्त भी नहीं हुआ। मैं जब इंदौर में रहा या भोपाल में रहा तब कई बार 15 दिनों से ज्यादा घर पर छुट्टियां मना चुका हूं। लेकिन अब ऑफिस में ऐसे स्वर्णिम पल कहां हैं? अब तो बमुश्किल 10 दिनों की छुट्टियां मिल जाएं तो बड़ी बात है। इस पोस्ट का मतलब यही है कि "समय बड़ा बलवान"। 

📃BY_vinaykushwaha


सोमवार, 1 अप्रैल 2019

जाति का विनाश कितना जरूरी है?

जात-पात तोड़ दो, तिलक-दहेज छोड़ दो।समाज के प्रवाह को नयी दिशा में मोड़ दो। यह उद्बोधन जेपी ने अपने आंदोलन के समय दिया था। जात-पात तोड़ दो, यह बात सबको आकर्षित करती है क्योंकि भारत में निम्न जाति के लोगों ने कभी न कभी जातिवाद का दंश झेला ही है। मैंने कुछ समय पहले एक किताब पढ़ी थी जिसका नाम "जाति का विनाश" है। यह किताब "Annihilation of caste" का हिंदी रूपांतरण है। इस किताब को बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने लिखी है। दरअसल यह एक किताब की शक्ल में भाषण का संकलन है। इस किताब में उसी भाषण का जिक्र किया गया है जिसे जात-पात तोड़क मंडल ने उन्हें देने नहीं दिया। जात-पात तोड़क मंडल का कहना था कि आंबेडकर जी का भाषण जाति व्यवस्था के बहिष्कार से ज्यादा हिंदू धर्म का अपमान है। जब कार्यक्रम रद्द हो गया तो आंबेडकर ने अपने भाषण को किताब की रूपरेखा में ढ़ाल  दिया। उन्होंने बताया कि उन्हें क्यों भाषण देने नहीं दिया गया? उनका कहना था कि जब मुझे अपने शब्दों को कहने की आजादी नहीं है तो मैं भाषण देने क्यों जाऊं?

जाति का विनाश किताब में बताया गया है कि कैसे जाति और जाति व्यवस्था हिंदू धर्म और मानने वाले लोगों के लिए अभिशाप है। उच्च जाति के लोग किस तरह निम्न जाति के लोगों पर कहर बरपाते हैं। आंबेडकर ने अपनी किताब में बताया कि कैसे जाति व्यवस्था भारत में आया और अब जड़ों तक समा चुका है। वैदिक सभ्यता के समय इस तरह के साक्ष्यों को पहली बार देखा गया था। उत्तर वैदिक काल में निम्न जाति को वेद आदि पढ़ने की अनुमति नहीं थी। जहां ऋग्वैदिक काल में व्यक्ति अपनी सुविधानुसार अपनी जाति बदल सकता था वहीं उत्तर वैदिक काल में यह व्यवस्था बदल गई। वैदिक काल में चार वर्णों वाली व्यवस्था अस्तित्व में आई थी उसने और विकराल रूप धारण कर लिया। वैदिक काल के बाद धीरे-धीरे जातीयता अन्य मुद्दों पर हावी होने लगी। ब्राह्मणवाद का विस्तार हिन्दू धर्म की नींव का हिलाने वाला था। किताब मैं बताया गया है कि वर्ण व्यवस्था में तिरस्कार केवल शूद्र को ही उठाना पड़ा है। किताब में महार जाति के बारे में बताया गया है कि कैसे उनके साथ गलत व्यवहार किया जाता था? जब महार जाति का कोई व्यक्ति  सड़क से निकलता था तो उसे कमर में झाड़ू बांधने और गले में एक मटका बांधने की सख्त हिदायत दी जाती थी। इस तरह की हिदायत देने का मतलब यह था कि सड़क गंदगी न हो। लेकिन इन सबके पीछे मुख्य कारण अपने वर्ण को सर्वश्रेष्ठ साबित करना था।

आंबेडकर ने अपनी आपबीती बताते हुए लिखा है कि कैसे  उनके साथ बचपन से लेकर नौकरी के समय तक छुआछूत किया जाता था। जहां बचपन में उन्हें स्कूल में अन्य बच्चों के साथ बैठने नहीं दिया जाता था और दिनभर उन्हें प्यासा रखा जाता था। जब उनकी नौकरी वडोदरा में लगी तो वहां नौकर उन्हें फाइल्स फेंक कर देता था और दिनभर प्यासा रखा जाता था। किताब में उन्होंने विभिन्न प्रकार के आंदोलन का जिक्र किया जिसमें सबसे महत्वपूर्ण महाड़ सत्याग्रह था। इसमें उन्होंने गांव के शूद्र जाति के लोगों के साथ जाकर तालाब के पानी को पिया और आचमन किया। किताब में एक मंदिर, एक कुंआ की बात लिखी हुई है। यह बात दर्शाती है कि कैसे निम्न जाति के लोगों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता था।

किताब में केवल जाति व्यवस्था जैसी कुरीति पर जमकर कटाक्ष किया गया है। इस किताब में पूना पैक्ट 1932 के बारे में जिक्र किया गया है। यह समझौता महात्मा गांधी और आंबेडकर के बीच हुआ था। इस समझौते में आंबेडकर ने महात्मा गांधी की बात मानी और "Depressed class" (दमित वर्ग) को चुनाव में दिए जाने वाले आरक्षण को वापस ले लिया। इससे आंबेडकर दुखी हुए क्योंकि वे दलितों को उनका हक दिलाना चाहते थे। इस किताब में कई संदर्भ दिए गए हैं जब आंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच तीखी बहस होती थी। महात्मा गांधी  अपने समाचार पत्र हरिजन में जाति व्यवस्था पर लेख लिखते थे। इन्हीं लेखों की आलोचना आंबेडकर पत्र व्यवहार के माध्यम से करते थे। इस पत्र का जवाब महात्मा गांधी भी मूकनायक में प्रकाशित लेख को आधार बनाकर देते थे। आंबेडकर अनुसूचित जाति वर्ग के लोगों को "Depressed class" कहते थे जबकि महात्मा गांधी हरिजन शब्द का उपयोग किया करते थे। इस किताब से स्पष्ट होता है कि कहीं न कहीं अनुसूचित जाति को अधिकार प्राप्त न होने के पीछे महात्मा गांधी को जिम्मेदार मानते थे।

आंबेडकर ने जहां अपनी किताब में आर्य समाज और स्वामी दयानंद सरस्वती की तारीफ की है। इसके अलावा उन्होंने राजा राममोहन राय की तारीफ की है क्योंकि उन्होंने समाज को कुरीतियों से मुक्त कराने लिए बहुत से काम किए। आंबेडकर ने दूसरी ओर हिन्दू धर्म में व्याप्त कुरीतियों छुआछूत, बाल-विवाह, सती प्रथा, अंतर जातीय विवाह पर प्रतिबंध के मामले पर जमकर लताड़ लगाई। किताब में डॉ आंबेडकर ने तो यहां तक लिख दिया कि हिन्दू धर्म की जाति व्यवस्था की वजह से भारत में अन्य धर्मों में जाति व्यवस्था के बीज फूट पड़े हैं। किताब में एक जगह यह भी लिखा है कि जातिवाद और वर्ण व्यवस्था का आरोप मनु पर नहीं लगा सकते हैं क्योंकि उसने तो जाति की एक व्यवस्था तैयार की थी

अपनी किताब में डॉ आंबेडकर ने विदेशी लोगों को भी नहीं छोड़ा उन्होंने उनकी भी जमकर खिंचाई की। रंगभेद में उनसे आगे कोई नहीं है। वे काले और गोरे में भेद करते हैं। ऐसा कहना था डॉ बाबासाहेब आंबेडकर का।
आपत्ति:- डॉ आंबेडकर ने जाति व्यवस्था जैसी कुरीति को केवल हिन्दू धर्म के साथ जोड़ा जबकि यह आधा सत्य है। अन्य धर्मों में भी जाति और वर्गों की प्रधानता है। ईसाई धर्म कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट, एवनजीलक, आर्थोडॉक्स आदि शाखाओं में बंटा हुआ है। इन सभी के अलग-अलग चर्च होते हैं और ये एक-दूसरे के चर्च में नहीं जाते। यही हाल मुस्लिम धर्म का भी है। बौद्ध धर्म भी मुख्यतया दो भागों में विभाजित है हीनयान और महायान। जातिवाद का सारा दोष हिन्दू धर्म पर मढ़ना गलत है। 
एक बार जरूर इस किताब को पढ़ें और निष्कर्ष पर पहुंचें।
BY_vinaykushwaha

रविवार, 11 नवंबर 2018

"अवनी" पर राजनीति क्यों?

"कोई बाघ आदमखोर खुद से नहीं बनता है बल्कि उसे मजबूरी में आदमखोर बनना पड़ता है।" यह पंक्ति है मशहूर बाघ संरक्षक जिम कार्बेट की। जिम कार्बेट को बाघों का संरक्षक कहा जाता है। जिम के साथ एक विरोधाभास जुड़ा हुआ है कि उन्होंने 33 बाघ-बाघिन को मारा था। इनमें मैन ईटर ऑफ कुमाऊं भी शामिल है। इस मैन ईटर ने 435 आदमियों को मारा था। अपनी किताब मैन ईटर ऑफ कुमाऊं में उन्होंने इस बात का जिक्र किया था। जिम की छवि एक अच्छे व्यक्ति के रुप में है क्योंकि उन्होंने आदमखोरों के आतंक से मुक्ति दिलाई थी। लेकिन बाद में उन्होंने बंदूक की जगह कलम को उठा लिया था। वे इस बात से वाकिफ थे कि हिमालय में बाघों की संख्या कम होने का मतलब है कि पारिस्थितिकी तंत्र में गड़बड़ी होना है। जिम कार्बेट लेखक और दार्शनिक भी रहे हैं। उन्हीं के नाम पर उत्तराखंड के राष्ट्रीय पार्क का नाम जिम कार्बेट नेशनल पार्क है। इसी नेशनल पार्क से प्रोजेक्ट टाइगर मिशन की शुरुआत की गई थी।

तारीख 2 नवंबर 2018 सभी को वैसे तो पता होगी लेकिन यह एक ऐसा दिन जिस दिन से सभी को पशुओं के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया है। लोग अब यह भी सोचने लगे हैं कि जानवरों को क्यों मारा जा रहा है। मैं बात कर रहा हूं बाघिन 'अवनि' की। कई लोग बाघिन अवनि को अवनी लिख रहे हैं। इस बाघिन का अाधिकारिक नाम टी-1 है। बाघिन अवनी को मार दिया गया। अवनी पर आरोप था कि उसने दो सालों में 14 लोगों की जान ली है। अवनी को मारने के लिए बकायदा वन विभाग से 100 लोगों की टीम को तैयार किया गया। पांढरकवड़ा के जंगल में बाघिन को खोजने के लिए गोल्फर ज्योति रंधावा के खोजी कुत्तों को बुलाया गया। पेड़ों आदि पर कैमरों का कड़ा पहरा लगा दिया गया। बाघिन को चारा देने के नाम पर नकली भेड़-बकरियों को बांधा गया। अमेरिकी से विशेष प्रकार का इत्र मंगाया गया ताकि बाघिन आकर्षित होकर जल्द से जल्द घने जंगलों से निकलकर खुले मैदान में आ जाए।

सारे जाल बिछा दिए गए बस अब बाघिन का फंसना बाकी  था। बाघिन आई और जाल में फंस गई। हैदराबाद से शार्प शूटर शाफत अली खान को बुलाया गया था। शाफत के पास एक लंबा अनुभव था कि कैसे जानवर को मारा जाता है। उनके दादा भी यही काम करते थे। वन विभाग के अनुसार शाफत को मुख्य रुप से बाघिन को ट्रैंकुलाइज  करने के लिए बुलाया गया था। अवनी जैसे ही थोड़े खुले हिस्से में आई तो उसे पहले ट्रैंकुलाइज गन से टैंकुलाइज्ड किया गया फिर उसे 10 मीटर दूर से पिछले हिस्से में गोली मार दी गई। आखिरकार आदमखोर बाघिन का अंत हो गया। यह बाघिन अवनी की दुखद अंत की कहानी है।

असली कहानी तो अवनी की मौत के बाद शुरू होती है। अवनी की मौत के बाद कई पशुप्रेमी और राजनेता सामने आए और उन्होंने जमकर इस बात का विरोध किया की अवनी की हत्या की गई है। अवनी की मौत से पहले कई पशु प्रेमियों और एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका देकर अवनी पर दया दिखाकर जीवनदान की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने दया याचिका को यह कहते हुए नकार दिया था कि चीफ लाइफ वार्डन ने यह स्वीकार किया है कि अवनी पर कार्रवाई जरुरी है। अब आते हैं राजनीति पर। केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने महाराष्ट्र के सीएम देवेन्द्र फडणवीस को पत्र लिखकर महाराष्ट्र के वन मंत्री सुधीर मुनगंटीवार को बर्खास्त करने की मांग की। आपको यहां बताते चलें कि मेनका गांधी की छवि एक पशु प्रेमी की है, वे कई सालों से पशुओं के संरक्षण में काम  रही हैं। मेनका गांधी शायद भूल गई थी कि केन्द्र में उनकी सरकार और महाराष्ट्र में एनडीए नीत सरकार फिर पत्र की औपचारिकता क्यों? इसके बाद सुधीर मुनगंटीवार ने उल्टा मेनका गांधी पर आरोप लगाते हुए कहा कि वे भी तो फर्जी बाबा के पास जाती हैं। मुझे नहीं लगता है कि इतने संवेदनशील मुद्दे पर ऐसी बात उछालने की जरूरत थी।

बात यदि महाराष्ट्र की हो और शिवसेना का जिक्र ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता। शिवसेना ने सरकार पर आरोप मढ़ दिया की सरकार ने अवनी की हत्या की है। मनसे भी कहां पीछे रहने वाली थी। राज ठाकरे ने अवनी पर बयान दे दिया। सबसे आखिर में एंट्री हुई कांग्रेस की। मुंबई से पूर्व सांसद संजय निरुपम ने इस सारे मामले को हगणदारी प्रथा से जोड़ दिया। हगणदारी प्रथा, महाराष्ट्र में खुले में शौच मुक्त करने के अभियान से जुड़ा है। संजय निरुपम ने हगणदारी प्रथा का जिक्र इसलिए किया क्योंकि वे बताना चाहते थे कि चंद्रपुर में जंगल में शौच करने गई महिला को बाघ ने मार दिया। अब बात अवनी की मौत से हगणदारी तक पहुंच गई। इस पर महाराष्ट्र के वन मंत्री सुधीर मुनगंटीवार कहते हैं कि अवनी की मौत पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। अरे साहब असली राजनीति की शुरुआत तो आपने ही की थी।

11 नवंबर को 168 संस्थाओं ने कैंडल मार्च निकालकर बाघिन अवनी की मौत का विरोध किया। यह कैंडल मार्च मात्र दिखावा नहीं बने। इस बात की बेहद अहमियत है कि पर्दे के पीछे की सच्चाई क्या है? बात यह है कि बाघिन को मारने के बाद उसे नागपुर ले जाया गया जहां उसे डॉक्टर ने मृत घोषित कर दिया। पोस्टमार्टम में यह पता चला कि उसके पिछले भाग पर गोली मारी गई थी। ऑटोप्सी करने के बाद पता चला कि अवनी ने 4-5 दिनों से कुछ खाया ही नहीं था क्योंकि उसके पेट में गैस और तरल पदार्थ भरा हुआ था। इसके अलावा उसके शरीर में नमी की कमी पाई गई और इंसानी मांस का कहीं कोई जिक्र नहीं हुआ। अवनी तो चली गई लेकिन अपने कई राज छोड़ गई।

बाघ और जंगली जानवर इतने आक्रामक क्यों रहे हैं? इसका सीधा सटीक कारण है अतिक्रमण। इंसान अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए वन्य जीवों के क्षेत्र में अतिक्रमण कर रहा है। खेती और आवास के लिए जंगलों का सफाया किया जा रहा है। नेशनल पार्क और अभ्यारण्यों में वन्यजीवों के आवास को छेड़ा जा रहा है। इन सबसे वन्यजीवों की इंसानी बस्ती में चहलकदमी बढ़ गई है। इन सबका नतीजा सबके सामने है। हमारे संविधान के भाग-4 में राज्य के नीति निर्देशक तत्वों का जिक्र किया है। अनुच्छेद 48(क) में जिक्र है कि पर्यावरण और वन्यजीवों का राज्यों द्वारा संरक्षण और संवर्धन किया जाएगा। मैं राज्यों से पूछना चाहता हूं कि अवनी की तरह? यह हमारा भी व्यक्तिगत दायित्व बनता है कि हम अपने पर्यावरण और वन्यजीवों को संरक्षित और संवर्धित करें।

अब सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे देश का कानून क्या कहता है? क्या अवनी को मारना सही है? महाराष्ट्र वन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार बताया गया कि उन्हें राष्ट्रीय व्याघ्र संरक्षण प्राधिकरण से अवनी पर कार्रवाई की इजाजत प्राप्त थी। भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अनुसार बाघिन अवनी की हत्या नहीं हुई है। उसे मारना सही है। अधिनियम कहता है कि यदि कोई बाघ आदमखोर हो चुका है, गंभीर बीमारी से ग्रस्त है या किसी अन्य कारण को लेकर चीफ लाइफ वार्डन तय कर सकता है कि बाघ को मारा जाए या नहीं। चीफ लाइफ वार्डन ही तय करता है कि उसे बेहोश किया जाए, स्थानांतरित किया जाए या गोली मार दी जाए। हमारा कानून यह भी कहता है कि आत्मरक्षा के लिए आप बाघ को मार सकते है और इसके साथ ही यदि वह सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है तो उसे मारा जा सकता है। यह है हमारा कानून। वन विभाग की टीम ने आत्मरक्षा का तर्क देते हुए बाघिन पर गोली चलाई थी। कई पशु प्रेमियों का कहना है कि यह गलत है कि उस पर गोली चलाई गई यदि आत्मरक्षा के लिए गोली चलाई गई होती तो गोली बाघिन के पिछले हिस्से की जगह अगले हिस्से में लगती।

अवनी चली गई। अपने पीछे कई सवाल छोड़ गई और बहस के लिए विषय भी। अवनी अपने पीछे दो नन्हें बच्चे भी छोड़ गई जिनका ध्यान रखना हमारा दायित्व है।

📃BY_vinaykushwaha