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गुरुवार, 18 अक्टूबर 2018

इलाहाबाद और भी हैं...

भारत एक शानदार देश है। इसकी महानता इसकी विशालता और विविधता से दिखाई पड़ती है। भारत कोई एक झटके में बनने वाला देश नहीं है। इसने कई उतार-चढ़ाव देखें हैं। भारत का नाम शकुंतला के पुत्र भरत के नाम पड़ा। भारत को और भी अनेक नामों से जाना जाता था और है। इन नामों में आर्यावर्त, जम्बूद्वीप जैसे नाम हैं। भारत को भारत आज कितने लोग बोलते हैं? यह सवाल  नहीं बल्कि भारत सरकार के लिए एक बड़ा सवाल है। अंग्रेजों के आने के बाद भारत इंडिया बन गया। वास्कोडिगामा ने भारत की खोज नहीं की थी बल्कि इंडिया की खोज की। भारत को उसके बाद से इंडिया नाम से नाम भी जाना जाने लगा। आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत इंडिया है न कि भारत। यह हमारी बिडंबना है कि भारत, भारत में है और भारत से बाहर इंडिया। हमारे देश के कुछ अंग्रेजीदां लोग भी भारत की एवज में इंडिया ही बोलते हैं।

नामकरण संस्कार सोलह संस्कारों में से एक महत्वपूर्ण संस्कार है। जब बच्चा बड़ा होने लगता है तो उसे नाम की जरूरत होती है। नामकरण संस्कार इसी का कारण किया जाता है। इसी तरह किसी देश, राज्य और शहरों का नामकरण किया जाता है। किसी भी जगह का नामकरण उसके इतिहास, भूगोल, राजनैतिक कारण, व्यक्तिगत योगदान आदि पर निर्भर करता है। ताजा विवाद इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज रखने को लेकर है। इलाहाबाद उत्तरप्रदेश का एक महत्वपूर्ण शहर है।  इसका इतिहास कई दशकों का नहीं बल्कि कई युगों का है। यहां मनु के वंशज पुरुरवा एल का उल्लेख मिलता है। उत्तर प्रदेश सरकार ने यह कहते हुए नाम बदल दिया कि इलाहाबाद का पुरातन काल से नाम प्रयागराज ही था। एक और कारण बताया कि क्या आपका(मनुष्य) एक बार नामकरण करने बाद नाम बदला जाता है? नहीं बदलते तो फिर शहर का नाम क्यों? इसके अलावा इलाहाबाद का इतिहास भी हवा में तैर गया कि इसका नाम अकबर ने इलाहाबाद में बदल दिया था। इलाहाबाद का अर्थ निकाला गया कि अल्लाह का आबाद किया हुआ।

आज मैं एक लेख पढ़ रहा था जिसमें इलाहाबाद का नाम प्रयागराज करने को लेकर कटाक्ष किया गया था कि इलाहाबाद का अर्थ अल्लाह का आबाद शहर नहीं है। इसका कुछ और ही अर्थ होता है। उस लेख में इलाहाबाद का संबंध मनु की बेटी इला से जोड़ा गया। उसमें यह बताया गया कि इलाहाबाद का पहले नाम इलावास था। इलावास बाद में इलाहाबाद बन गया।

नाम बदलने की परंपरा कोई नहीं है। इसमें राजनीतिक प्रभाव ज्यादा रहा है। भारत में शहरों से लेकर राज्यों तक के नामों को बदला गया है। अंग्रेजों के समय मुंबई का नाम बॉम्बे था जो बाद में बंबई हो गया और आखिरी में मुंबई रखा गया। मुंबई रखने पीछे कारण दिया गया मुंबा देवी। मुंबा देवी के नाम पर मुंबई का नामकरण किया गया। केवल मुंबई ही नहीं और भी कई ऐसे शहर है जिनके नाम बदले गए। लोगों की भावना को बरकरार रखने के लिए तुष्टिकरण के लिए आदि। कोलकाता का पुराना नाम कलकत्ता था। कलकत्ता नाम अंग्रेज उपयोग किया करते थे। मद्रास का नाम चेन्नई किया गया। बंगलौर से बंगलुरू हो गया, त्रिवेंद्रम से तिरूवनंतपुरम हो गया, मैसूर , मैसूरू हो गया, पूना से पुणे हो गया। यह सब कुछ एक रात में नहीं हुआ। इन सबके पीछे बात यह थी कि अंग्रेजों की सोच को पीछे छोड़ना चाहते थे। लेकिन हमारे साथ दिक्कत है कि हम भावनाओं में बह जाते हैं।

इससे पहले गुड़गांव का नाम गुरुग्राम करने पर खूब विवाद हुआ लेकिन आखिरकार नाम बदल दिया गया। अब सवाल यह उठता है कि क्या बाकि शहरों का नाम भी बदला जाएगा। मथुरा को मधुपुर कहा जाएगा? कानपुर को कर्णनगरी? लखनऊ को लक्ष्मणावती? कर दिया जाएगा? इस सारे विवाद में वे शहर भी शामिल हैं जो अपने पुराने नामों से पहचाने जाने चाहिए। अजमेर को अजयमेरु, जैसलमेर को जैसलमेरु, अहमदाबाद को कर्णावती, भोपाल को भोजपाल, हैदराबाद को भाग्यनगर, इंदौर को इंदुर, भुवनेश्वर को बिंदु सरोवर, मेरठ को मयराष्ट्र, जबलपुर को जबआलीपुरम, दमोह को तुंडीकेर कर देना चाहिए। क्या यह संभव है? परंपरा और पुरातन व्यवस्था के आधार पर नाम बदलना कहां तक उचित है। क्या सरकार में हिम्मत है कि वह दिल्ली का नाम इंद्रप्रस्थ और पटना का पाटिलीपुत्र करके दिखाए।

राज्यों का नाम भी समय-समय पर बदला गया। उत्तरांचल को उत्तराखंड कर दिया। उड़ीसा को ओडिशा कर दिया। क्या असम का नाम भी प्रागज्योतिष रखा जाएगा? महाभारत में असम का उल्लेख प्रागज्योतिष‌ के नाम से मिलता है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ का रामायण में दंडकारण्य के नाम से उल्लेख मिलता है।

सरकार को नाम बदलने से बढ़िया है कि काम करें। लोगों का हित देखे। लोगों के जीवन में समृद्धि आए ऐसे काम करें। नाम बदलना सरकार काम नहीं है। जब जनता चाहेगी तब नाम बदल जाएगा। सरकार को नामकरण को ट्रेंड नहीं बना लेना चाहिए। छत्तीसगढ़ सरकार की तरह नया रायपुर का बदलकर अटल नगर कर दिया। इतिहास गवाह है कि सत्ता जिसके हाथ में रही है उसने अपने पूर्व की सत्ता की बातों को पलटा है। 

पुराने समय से लेकर आज तक इतिहास उठाकर देखिए एक शहर कितने नामों से जाना गया है। एक शहर के कम से कम दो नाम जरुर मिलेंगे। जब मुस्लिम आक्रमणकारी आए तो उन्होंने अरबी और फारसी वाले खूब नामकरण किए। लगभग सारे बाद वाले शहर इन्हीं की देन है। मुगलों के बाद अंग्रेज,डच, फ्रांसीसी, पुर्तगाली आए तो इन्होंने अपनी भाषा में शहर का नाम रखा। इसके बाद सुविधानुसार शहर का नाम बदलते गए और शहर भी।

📃BY_vinaykushwaha

रविवार, 25 मार्च 2018

यूपी की फिज़ा


दूर-दूर तक फैला पठारी इलाका जिसमें पेड़ों की संख्या न तो बहुत ज्यादा है न ही बहुत कम। जमीन भी ऐसी कि कही थोड़े उंचे पहाड़ है तो कही समतल जमीन है। जहां समतल जमीन वहां जमीन के अंदर से स्वयंभू शिव की तरह निकली हुई चिमनियां है जिनसे धुआं तो नहीं निकल रहा लेकिन नीचे भट्टी में ईंट पक रही है। विन्ध्य की महक आने लगी है। बेशक यह यूपी है। मध्यप्रदेश के उत्तरी भाग को पार करते ही यूपी का दक्षिणी छोर कुछ इसी प्रकार दिखाई देता है। यह गंगा का मैदान का दक्षिणी भाग भी है।

यूपी कहे या उत्तरप्रदेश या उत्तमप्रदेश सभी तो श्रेष्ठ है। यदि ऐसा कहा जाए कि राज्यों में सर्वश्रेष्ठ या यूं कहे राज्यों का राजा। मैंने उत्तर प्रदेश  की यात्रा कई बार की है और हर बार मैंने यहां कुछ नया ही पाया है। हवा में घुली पेडे की मिठास हो या अध्यात्म की हवन वेदी से उठती खुशबू हो सभी कुछ तन-मन को उत्साहित कर देती है। इलाहाबाद की धरा पर कदम रखने का सौभाग्य कई बार मिला परंतु पहले उस फिज़ा में घुली ताज़गी का आनंद नहीं लिया जो इस बार मिला है। इलाहाबाद कोई आम जगह नहीं है यह तो सभी जानते है।

पूर्वांचल का सबसे प्रमुख शहर जिसके बिना पूर्वांचल की कल्पना पूरी नहीं हो सकती है। गंगा और यमुना का संगम तो पहले भी कई बार देखा है लेकिन इस इसमें कुछ नयापन देखने को मिला। यमुना नदी का श्याम जल हो या गंगा नदी का हरित जल इस बार इसमें कुछ नयापन है। हिमालय से मां गंगा और यमुना के द्वारा लाई गई रेत एक नए संसार का निर्माण कर रही है। संगम के जल में जाते हाथ केवल कंकण स्नान के लिए ही नहीं बल्कि अर्घ्य के लिए भी उठते है। तेज बहाव वाली गंगा हो या शांत यमुना दोनों श्रद्धालुओं को उतना ही मौका दे रही है जितना वे चाहते हैं।

श्रद्धा के दीपक आज कुछ अलग ही छटा बिखेर रहे हैं। फूलों की लड़ी हो या नावों का जमावड़ा सब कुछ देखा हुआ है फिर भी अनोखा है। बरसों पहले जब पहली बार आया था तब भी किले की दीवार यूं ही सीना ताने खड़ी थी और आज भी लेकिन इनकी रंगत में चटकपन-सा आ गया है। लाई बताशा की सजी दुकाने हो या फूलों से सजे दौने, पंडों की मडई हो या गोताखोरी की टोली नया न होते हुए भी कुछ अलग है। पानी की लहरों पर गोता खाते गोताखोर हो या पानी में उतरते नौसिखिया सब पहले भी तो देखा है लेकिन इस बार अंदाज अलग लग रहा है।

नाव का कालिंदी की लहरों के साथ कलाबाजियां करना हो या मछलियों का पैरों को छूकर जाना पहले भी देखा है लेकिन ऐसी अनुभूति पहली बार हुई है। संगम के जल को छूकर तन को छूती पवन से पहले भी कई बार सुखमय अनुभूति हुई है लेकिन इस बार इसमें कुछ शीतलता ज्यादा ही है। रेत के टीले पर दूर-दूर तक आशा का दीपक पहले भी दीप्तमान थे आज भी हैं। साइबेरियन गल्स होवर की उड़ान और पानी में खेल तो कई देखा है परंतु इनकी अठखेलियां में कुछ आज अनोखा पन है।

इलाहाबाद कोई मुसाफिरों का शहर नहीं है बल्कि यह तो शांति से अपने अंदाज में जीने वालों का शहर है। इस शहर को पहले भी कई बार देखा है लेकिन इसमें नयापन पहली बार देखा है।

📃BY_vinaykushwaha