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शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

पाकिस्तान और इमरान खान

क्या इमरान पाकिस्तान के पीएम रहते हुए अपना कार्यकाल पूरा कर पाएंगे?

इमरान खान ने 18 अगस्त को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के पद की शपथ लिया. शपथ लेने के साथ ही इमरान पाकिस्तान के अधिकारिक रूप से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बन गए. सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वे अपना कार्यकाल पूरा कर पाएंगे. पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास गवाह है कि आज तक कोई भी प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया है. अभी हालिया उदाहरण हमारे सामने  नवाज शरीफ के रूप में है. जिन्हें पनामा पेपर लीक मामले में पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने उनकी उम्मीदवारी को अयोग्य घोषित कर दिया है. उम्मीदवारी अयोग्य घोषित होने के साथ ही उन्हें प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा और 14 साल की सजा हो गई.

नवाज शरीफ के साथ कोई यह पहली बार नहीं हुआ है. साल 1993 में नवाज शरीफ सरकार को तत्कालीन राष्ट्रपति गुलाम खान ने बर्खास्त कर दिया. यह मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा और सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सरकार को बहाल कर दिया. मामला यही नहीं थमा बल्कि राष्ट्रपति गुलाम खान ने फिर से उन्हें पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 58-2b के तहत फिर से बर्खास्त करने का प्रयास किया गया. मामला फिर से सुप्रीम कोर्ट गया और शरीफ ने मामले पर समझौता करते हुए इस्तीफा दे दिया. सरकार केवल 2 साल 7 महीने तक चली.

इसके बाद 1997 में नवाज शरीफ ने फिर से सरकार बनाई. इस बार भी काली परछाइयों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा. जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ उस समय सेना प्रमुख थे. साल 1999 में परवेज़ मुशर्रफ़ ने नवाज शरीफ की सरकार को हटाकर मार्शल लॉ लगा दिया. फिर से नवाज सरकार अपना कार्यकाल पूरा करने में नाकाम रही. मुशर्रफ़ ने देश पर 1999 से लेकर 2001 तक तानाशाह के रूप में शासन किया.  साल 2001 में परवेज़ मुशर्रफ़ राष्ट्रपति बन गया. राष्ट्रपति के रूप में उसने देश में 2001 से 2008 तक शासन किया.

परवेज़ के राष्ट्रपति के रूप में रहते हुए चार प्रधानमंत्री हुए. जिनमें से किसी ने भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया. कोई तीन साल तो कोई दो महीने के लिए प्रधानमंत्री बना. मुशर्रफ़ के राष्ट्रपति रहते हुए युसूफ़ रजा गिलानी ही एकमात्र प्रधानमंत्री थे जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा करने से करीब 10 महीने से चूक गए. उन्होंने 4 साल 2 महीने का कार्यकाल पूरा किया. युसूफ़ को न्यायालय की अवमानना के मामले में उनकी सीट को 2012 में अयोग्य घोषित कर दिया. शेष बचा हुआ कार्यकाल परेवज़ अशरफ़ ने पूरा किया.

पाकिस्तान के इतिहास में यह पहली बार नहीं था कि किसी सेना प्रमुख ने प्रधानमंत्री को उसके पद से हटाने के बाद सत्ता की बागड़ोर अपने हाथ में ले ली हो. इससे पहले 1958 में फ़िरोज खान नून की सरकार को तत्कालीन राष्ट्रपति शकंदर मिर्जा ने बर्खास्त करते हुए मार्शल लॉ लागू कर दिया. इस काम में उनका साथ अयूब़ खान ने दिया जो तत्कालीन सेना प्रमुख थे. नून सरकार ने अपना हनीमून पीरियड भी पूरा नहीं कर पाई. अयूब़ खान ने अपने दोस्त यानी शकंदर मिर्जा को भी नहीं बख्श़ा, हिरासत में ले लिया. बाद में शकंदर को देश से निकाल दिया जिनकी बाद में ब्रिटेन में मृत्यु हो गई. अब पाकिस्तान पर अयूब़ खान का राज था. अयूब़ खान ने 1958 से 1969 तक राष्ट्रपति के रूप में राज किया.  

अयूब़ खान के बाद देश के राष्ट्रपति याह्या खान बने. याह्या खान 1969 लेकर 1971 तक देश के राष्ट्रपति रहे. पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में 1958 से लेकर 1971 तक कोई भी प्रधानमंत्री नहीं रहा. याह्या खान के राष्ट्रपति रहते हुए नुरुल अमीन मात्र 13 दिनों के लिए प्रधानमंत्री बने.

वर्ष 1971 में बंगलादेश युद्ध हुआ. जुल्फिकार अली भुट्टो 1971 से 1973 तक राष्ट्रपति रहे. इस दौरान कोई भी प्रधानमंत्री नहीं बना. साल 1973 में जब जुल्फिकार अली भुट्टो देश के प्रधानमंत्री बने. जुल्फिकार के प्रधानमंत्री रहते हुए 1977 में सेना प्रमुख जिआ-उल-हक को नियुक्त किया गया. जैसे ही जिआ-उल-हक सेना प्रमुख बने उसी वर्ष जुल्फिकार सरकार को हटाकर मार्शल लॉ लगा दिया. साल 1978 में जिआ-उल-हक खुद ही राष्ट्रपति बन गया. पाकिस्तान पर 1978 से लेकर 1988 तक राष्ट्रपति रहे. जिआ के काल में केवल एक बार चुनाव हुए. वर्ष 1985 में हुए इस चुनाव में मोहम्मद खान जूनेजो प्रधानमंत्री बने. इस चुनाव की सबसे बड़ी बात यह थी कि यह निष्पक्ष चुनाव नहीं था. यह पार्टी बेस्ड चुनाव न होकर स्वतंत्र चुनाव था. जूनेजो 1985 से लेकर 1988 तक प्रधानमंत्री रहे.

साल 1988 में फिर से पाकिस्तान में चुनाव हुए. इन चुनावों पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की जीत हुई. बेनजीर भुट्टो  पाकिस्तान की  पहली महिला प्रधानमंत्री बनी. बेनजीर, जुल्फिकार अली भुट्टो की बेटी थी. यह सरकार भी ज्यादा दिनों तक नहीं चली.  पाकिस्तान में फिर से 1990 में चुनाव हुए जिसमें नवाज शरीफ चुनकर आए. इन्हें मार्शल लॉ के जरिए हटा दिया गया.

पाकिस्तान वैसे तो एक लोकतांत्रिक देश है लेकिन उसका पूरा नाम इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान है. क्रिकेट से राजनीति की दुनिया में आए इमरान खान पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में कुछ नया करने के लिए आए. भले ही उन्हें चुनावों में पूर्ण बहुमत न मिला हो लेकिन वे जनता के मुद्दों को उठाने में सफल रहे हैं. इमरान ने पाकिस्तान के चार बड़े मुद्दों पर खुलकर आवाज बुलंद की जिनमें बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, पाकिस्तान की चरमराती अर्थव्यवस्था और आतंकवाद है.

राजनीति में आने के बाद इमरान ने हमेशा ऐसे मुद्दों को अपनी आवाज दी है जो जनता को प्रभावित करते हैं। नवाज शरीफ, आसफ अली जरदारी जैसे राजनेताओं को कड़ी टक्कर दी। पाकिस्तान की दो सबसे बड़ी पार्टियां मुस्लिम लीग और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को इमरान की नवांकुर पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ ने चुनौती दी है। आम चुनाव 2018 में तो दोनों पार्टियां घुटने टेकते हुए नज़र आईं। भारत के विषय में इमरान ने हमेशा सधी टिप्पणी की है। क्रिकेटर यह बात अच्छे से समझता है कि किस गेंद पर चौका और किस गेंद पर छक्का लगाना है.

अभी तक इमरान तीन शादियां कर चुके हैं. तीसरी पत्नी बुशरा मानेका ने उन्हें एक बार कहा था कि यदि आप प्रधानमंत्री बनना चाहते हो तो आपको तीसरी शादी करनी होगी. बुशरा मानेका एक पीरनी है, उन्हें पिंकी पीर के नाम  से भी जाना जाता है. अब देखना होगा कि बुशरा बीबी की भविष्यवाणी किस हद तक सही होगी और कब तक इमरान को पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनाकर रखेंगी।

यही दौर पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में चलता रहा है. आगे क्या होगा यह तो समय ही बताएगा. इमरान की सरकार शायद अपनी सरकार के पांच साल पूरा करने में कामयाब हो.

📃BY_vinaykushwaha

शनिवार, 9 जून 2018

भारतीय वास्तुकला (श्रृंखला-चार)


भारतीय वास्तुकला में विदेशियों का भी योगदान है यहां बहुत सी ऐसी स्थापत्य कला हमें देखने के मिलती है जिसे मुस्लिम स्थापत्य कला के रूप में जानते है। जब मुस्लिम स्थापत्य कला का भारत में प्रवेश हुआ तो यह हिंदु-मुस्लिम स्थापत्य कला या इंडो-इस्लामिक स्थापत्य कला हो गई। मुस्लिम धर्म में मूर्ति पूजा वर्जित है जिसके कारण मुस्लिम शासकों के द्वारा तैयार किए गए स्मारकों, मस्जिदों,मकबरों,भवनों या किसी भी संरचना में मूर्ति देखने को नहीं मिलती है। मूर्तियों की जगह फूल-पत्ती, मेहराब, गुंबद, मीनार, बुर्ज, जाली आदि ने लियी। इनके उपयोग से भारत में नए-नए स्थापत्य कला का विकास हुआ।

मुस्लिम शासकों ने अपने शासन में सर्वाधिक जोर मस्जिद बनाने में दिया। मस्जिगों में मीनार, गुंबद, मेहराब पर दिया गया। जहां मंदिरों में शिखर हुआ करते थे वही मस्जिदों में उनकी जगह गुंबद ने ली। भारत का सबसे बड़ा गुंबद कर्नाटक के बीजापुर में स्थित है। यह अपने आप में कारीगरी का बेमिसाल उदाहरण है। यह बीजापुर के शासक ने बनवाया था। यह बलुआ पत्थर से तैयार किया गया है। गुंबद बनाने गोलाकार या यूं कहे कि उल्टा कटोरा होता है। उत्तर भारत और दक्षिण भारत दोनों में सामग्री के इस्तेमाल में विभिन्न पाई गई है। मुगलों समय जहां उत्तर भारत में लाल पत्थर का उपयोग किया वही दक्षिण भारत में ग्रेनाइट और बलुआ पत्थर का उपयोग किया गया।

मीनार, मुस्लिम स्थापत्य कला का अभिन्न हिस्सा हैजिसे सामान्यतया हर मस्जिद देखा जा सकता है। मस्जिद में अजान के लिए इन मीनारों का उपयोग किया जाता था। भारत की सबसे ऊंची मीनार कुतुब मीनार है जो विश्व विरासत स्थल में शामिल है। इसका निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक ने करवाया था जिसे पूरा कराने का श्रेय इल्तुतमिश हो जाता है। इन मीनार का निर्माण भी स्थान विशेष पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर किया जा जाता था। कही लाल पत्थर,तो कही बलुआ पत्थर तो कही बेसाल्ट का उपयोग किया जाता था। मीनारों को कलात्मक बनाया जाता था जिसमें नक्काशी की जाती थी।


मीनार के शिखर पर जाने के लिए सीढ़ियां बनाई जाती थी। कई बार यह सीढ़ियों अंदर से होती थी और कई बार बाहर से। जैसे कुतुब मीनार में सीढ़ियां मीनार के अंदर से बनाई गई जबकि जूनागढ़ के बहाउद्दीन के मकबरे में मीनार के बाहर से बनाई गई है। इन मीनारों की कलात्मकता देखते ही बनती है। मीनारों को इस प्रकार भी बनाया जाता था कि यह मुख्य संरचना को कोई नुकसान न पहुंचाए। यदि कभी भूकंप वगैरह आए तो मीनार बाहर की ओर या मुख्य संरचना से विपरीत गिरें। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ताजमहल है जिसमें मीनारों को इस प्रकार बनाया है कि मीनारें बाहर की ओर गिरे।

किसी भी संरचना को सुंदर बनाने के लिए बड़ी-बड़ी मीनारों के अलावा छोटी-छोटी मीनारों का उपयोग किया जाता था। ताजमहल में इस प्रकार की संरचना देखने को मिलती है।

मुगलकाल और बाद दरवाजें बनवाने का प्रचलन चला। अकबर ने गुजरात विजय पर भारत का सबसे ऊंचा दरवाजें का निर्माण करवाया। जिसका नाम फतेहपुर सीकरी का बुलंद दरवाजा है। इसका निर्माण लाल पत्थर से किया गया है। इसके अलावा लखनऊ, जयपुर, मांडू, भोपाल, अहमदाबाद  आदि जगह दरवाजा परम्परा देखने को मिलती है। दरवाजों को सुंदर और कलात्मक के साथ-साथ भव्य बनाया जाता था। इसका कारण यह था कि जो पड़ोसी राज्य है उसके राज्य की वैभव-विलासता को पहचान सके। दरवाजों का वर्णन हमें प्राचीन समय से सुनने को मिलता है लेकिन यहां बात इस्लामिक संरचना पर बने दरवाजों की हो रही है।


इस्लामिक स्थापत्य कला में एक विशेष प्रकार की सामग्री का उपयोग किया गया। वह सामग्री है संगमरमर। इसकी सबसे बड़ी मिसाल ताजमहल है। ताजमहल, संगमरमर से बनी पहली इमारत नहीं है बल्कि आगरा में ही बनी ऐतमाद्दौला का मकबरा है। पूर्ण रूप से संगमरमर से बनी यह पहली इमारत थी। इन दोनों इमारत को बनाने में मकराना के संगमरमर का उपयोग किया गया है। मुगलों के काल में राजस्थान से संगमरमर के साथ-साथ लाल पत्थर का भी निर्यात किया जाता था।

भारत में विदेश से कई प्रकार की कला का आगमन हुआ जिसमें पेट्राडोरा या पित्रादुरा कहते है। पेट्राडोरा एक कला है जिसका आगमन ईरान से हुआ है। यह कला संगमरमर के पत्थर पर विभिन्न प्रकार को रत्नों को खोदकर सजाया जाता है। विभिन्न प्रकार के आकार और आकृति के पत्थर पर अलग-अलग सजावट के साथ बनाया जाता है। इसमें पेड़- पौधे, फूल, पत्ती, विभिन्न प्रकार की आकृतियों को उकेरकर उसमें विभिन्न रंगों जैसे लाल, पीला, हरा, नीला, गुलाबी, फिरोजी आदि रंगों का उपयोग किया जाता है।


इस्लामिक स्थापत्य कला में एक और कला सामने आती है। जाली, इस्लामिक स्थापत्य कला में एक अहम स्थान रखती है। चाहे मकबरा हो या मस्जिद हो या दरगाह हो या किला हो या महल हो या छतरी हो मुगलकाल से जाली का महत्व बढ़ गया। अहमदाबाद में   निर्मित जामा मस्जिद या जुम्मा मस्जिद में हिन्दु स्थापत्य कला या भारतीय स्थापत्य कला या मंदिर स्थापत्य कला  की छाप आसानी से देखने को मिलती है। यहां आसानी कई ऐसी आकृतियां देखने को मिलता  है भारतीय संस्कृति और संस्कार को दर्शाती हैं। इसके अलावा हैदराबाद की चार मीनार भी शानदार नमूना है। यह एक दरवाजे की तरह है जिसमें चार मीनार है। मध्यप्रदेश के मांडू में बने अनेक महल इस्लामिक स्थापत्य कला को दर्शाते हैं। इन महलों या संरचना में जहाज की आकृति के तरह बना जहाज महल, गुजरी महल, होशंगशाह का मकबरा, अशर्फी महल  आदि सभी एक प्रतीक है।

दिल्ली और आगरा का लाल किला, हुमाऊं का मकबरा, सिकंदरा मकबरा, हौज खास, कशमीरी गेट, फतेहपुर सीकरी, भोपाल की ताज-उल-मस्जिद, हैदराबाद की मोती मस्जिद, गोलकुंडा का किला, बीजापुर का गोल गुबंद आदि इस्लामिक स्थापत्य कला के नमूने हैं। इस्लामिक स्थापत्य कला में आगरा स्थित ताजमहल को बेमिसाल प्रतीक माना जाता है। लखनऊ का बड़ा इमामबाड़ा, छोटा इमामबाड़ा, बुरहानपुर की ऐतिहासिक इमारत इसी स्थापत्य कला का नमूना। बुरहानपुर में स्थित कुंडी भंडारा जल व्यवस्था का अद्वितीय उदाहरण है। वही कुछ बदसूरत इमारत भी भारत में देखने को मिलता है। ऑरंगजेब द्वारा बनवाया गया बीबी मकबरा ताजमहल की फूहड नकल मात्र है।


भारत में इस्लामिक स्थापत्य कला में इमारत ही नहीं बल्कि एक और संरचना दिखाई देती है। यह संरचना "चार बाग" है। चार बाग एक प्रकार से गार्डन ही है। यह संरचना मुगलकाल से सामने आया या शुरु हुआ। इसमें एक गार्डन बनाया जाता है जिसे समकोण पर काटती दो सड़क द्वारा गार्डन को चार भाग में विभक्त कर दिया जाता है। चार बाग के साथ एक संरचना और जुड़ी हुई है जिसका नाम फव्वारा है। फव्वारा के कारण इमारत की सुंदरता बढ़ जाती है।

📃BY_vinaykushwaha






शुक्रवार, 11 मई 2018

विराट गुरुकुल सम्मेलन

भारत का पहला विराट गुरुकुल सम्मेलन मध्यप्रदेश की आध्यात्मिक नगरी उज्जैन में 28-30अप्रैल को आयोजित किया गया। असलियत में इस आयोजन का पूरा नाम अंतरराष्ट्रीय गुरुकुल सम्मेलन था। इसका आयोजन भारतीय शिक्षण मंडल और मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग के सहयोग से संपन्न हुआ। आखिर उज्जैन में ही क्यों इसका आयोजन किया गया? इसके पीछे सबसे बड़ा कारण रहा है, ऋषि सांदीपनि का आश्रम। यह वही ऋषि है जिन्होंने भगवान श्रीकृष्ण और बलराम को शिक्षा-दीक्षा दी थी।

यह विराट गुरुकुल सम्मेलन में भारत समेत विश्व के सात देशों के गुरुकुल या उनके प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इनमें  नेपाल, भूटान, म्यानमार, थाईलैंड, जापान, इंडोनेशिया और कतर जैसे देश थे। भारत की इस धरा पर इस प्रकार का यह प्रथम आयोजन था।

इस आयोजन को करने के पीछे उद्देश्य क्या था? गुरुकुल परंपरा को बचाना या परपंरा को समृद्धि बनाना। इस परपंरा को भारत की पहचान कही जाए तो अतिश्योक्ति न होगी। जहां शिक्षा पद्धति बिना किसी लोभ के दी जाती है और बच्चों के सर्वांगीण विकास की बात की जाती है तो इस परपंरा को बचाना हमारा कर्त्तव्य बनता है। इस सम्मेलन में भारत के हर कोने से गुरुकुल में सम्मिलित होने के लिए लोगों का आगमन हुआ। लगभग 3000 प्रतिनिधियों ने इस आयोजन में हिस्सा लिया।

इस आयोजन का मूल गुरुकुल शिक्षा पद्धति को बढ़ावा देना और आधुनिक शिक्षा पद्धति को कैसे गुरुकुल शिक्षा पद्धति के माध्यम से सरल बनाया जा सकता है? इस पर देश के कोने-कोने से प्रबुद्ध और विद्वतजनों ने चर्चा की। गुरुकुल केवल वेदपाठ या संस्कृत का अध्ययन नहीं कराता बल्कि यह तो बौद्धिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, तकनीकी, तार्किक और शारीरिक शिक्षा देता है। लोगों के मन में भ्रम रहता है कि गुरुकुलों में केवल संस्कृत और वेद -उपनिषद् जैसे विषयों का ही ज्ञान दिया जाता है। इसी भावना को तोड़ने के लिए और लोगों को गुरुकुल से जोड़ने के लिए इस प्रकार का भव्य आयोजन किया गया।

गुरुकुल सम्मेलन भारत और विदेशी गुरुकुलों का आपसी मिलन भी था। इस सम्मेलन के माध्यम से एक गुरुकुल ने दूसरे गुरुकुल को जानने की कोशिश की। यही नहीं उनकी शिक्षा पद्धति को आवश्यक रुप से समृद्ध करने की कोशिश की। आज विश्वभर में गुरुकुल परपंरा को अपनाने की बात चल रही है। इसका एक ही कारण है प्राचीन भारतीय ज्ञान परपंरा के साथ-साथ आधुनिक विषयों का अध्ययन-अध्यापन करना।

सम्मेलन में विभिन्न वक्ताओं के द्वारा भारतीय ज्ञान परपंरा और शिक्षा पद्धति को जानने का मौका मिला। कार्यशालाओं का आयोजन किया गया जिसमें भारतीय ज्ञान परपंरा जिसमें आयुर्वेद, ज्योतिष, वैदिक गणित, गणित पर गहन चर्चा हुई। इसके साथ ही भारतीय और विदेशों से आए प्रतिनिधियों के साथ संवाद चर्चा का भी आयोजन किया गया। पाकशाला, गौशाला जैसी कार्यशाला का आयोजन किया गया, जिसमें माता-पिता, गुरु और बच्चों की बीच भावनात्मक जुड़ाव पर गंभीरता से चर्चा की गई।

कार्यशाला के आयोजन के अलावा सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया गया। इसमें बौद्धिक, शारीरिक और नृत्य आदि का मंचन किया गया। मंच से कत्थक, भरतनाट्यम, कालबेलिया जैसे नृत्यों की प्रस्तुति हुई तो वही भारतीय मार्शल आर्ट कलियारीपयाट्टू, मलखंभ, रोपमलखंभ का आयोजन किया गया। वही मंच से वैदिक गणित जैसे साश्वत विषय पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

प्रदर्शनी का आयोजन भी किया गया जिसमें केवल वस्तुओं की प्रदर्शनी ही नहीं बल्कि स्वदेशी को प्रोत्साहित करती हुई प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। इसमें कॉटन के कपड़ा से लेकर लकड़े के सामान तक इस प्रकार के स्टॉल को लगाकर इस प्रदर्शनी को चार-चांद लगाए गए। पुराने सिक्कों का संग्रहण हो या भारतीयता को दर्शाता पुस्तकों हो सभी प्रदर्शनी जान नजर आ रही थी।

इस आयोजन की सबसे बड़ी बात श्रोत यज्ञ का आयोजन था। यह यज्ञ विश्व के कल्याण के लिए आयोजित किया गया था। इस यज्ञ का उद्देश्य और पूर्णाहूति "सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया" की भावना से किया गया था।

मंगलवार, 17 अप्रैल 2018

विश्व धरोहर दिवस


विश्व धरोहर दिवस जिसे इंग्लिश भाषा में world heritage day के नाम से जाना जाता है। यह प्रतिवर्ष 18 अप्रैल को मनाया जाता है। 1982 से प्रतिवर्ष यह मनाया जा रहा है। इस दिन को विश्व विरासत स्थल के लिए समर्पित किया गया है। यह दिवस केवल विश्व धरोहर को सहेजने के लिए ही नहीं बल्कि इसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए भी है। विश्व में कुल 1052 विश्व विरासत स्थल है। इन धरोहरों में से भारत में कुल 35 विश्व धरोहर है।  विश्व धरोहर स्थल की घोषणा यूनेस्को के द्वारा किया जाता है जो कि संयुक्त राष्ट्र का ही अंग है।

यह तो हुई सामान्य जानकारी कि क्याें? कैसे? कब? हमें सर्वप्रथम यह जानना चाहिए कि विश्व विरासत दिवस क्यों मनाना चाहिए? जब यह तय हुआ कि विश्व विरासत दिवस मनाया जाएगा तो उसका उद्देश्य था कि विश्व विरासत स्थल के संरक्षण और समृद्धि के लिए इस दिवस को मनाया जाएगा। लेकिन हम यह भूल गए कि जो स्मारक विश्व विरासत स्थल की सूची में शामिल नहीं है क्या उनका संरक्षण, रखरखाव और समृद्ध करना हमारा कर्तव्य नहीं बनता। आखिरकार यही स्मारक आगे जाकर विश्व विरासत स्थल बनेंगे।

यूनेस्को विश्व विरासत स्थल को तीन भागों में बांटा है पहला सांस्कृतिक, दूसरा प्राकृतिक और तीसरा मिश्रित। तीनों का अपना-अपना महत्व है। लेकिन जैसा कि मैं मानता हूं कि हमें सभी को उतना ही महत्व देना चाहिए जितना कि हम ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को देते है। यदि प्रकृति को बचा लेते है तो बाकी की धरोहरों का अपने आप ही संरक्षण हो जाएगा। बायो डायवर्सिटी रिजर्व हो या नेशनल पार्क या अभ्यारण्य हो या सामान्य वन क्षेत्र इनके अलावा भी भूमि, जल, पर्वत आदि का संरक्षण शामिल है।

अब बात आती है कि विश्व विरासत स्थल क्यों? विश्व धरोहर स्थल की वास्तविकता में जरुरत है क्योंकि इनके होने से इन स्मारकों के संरक्षण की गारंटी बढ़ जाती है। केवल संरक्षण ही नहीं यह स्मारक कमाऊ भी बन जाते है। जितनी विश्व विरासत स्थल है आज कमाऊ होने से उनके रखरखाव में आसानी हुई है। इससे देश, व्यक्ति और स्मारक सभी को लाभ मिलता है।

भारत में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, पुरातात्विक महत्व की स्मारकों की संख्या में कमी नहीं है। यहां के हर शहर में इसकी झलक आसानी से देखने को मिल जाती है। पक्षपात पूर्ण रवैए के चलते भारत को प्रतिनिधित्व का मौका कम मिल पाया है। भारत से ज्यादा स्मारकों को  विश्व विरासत का नाम इटली, फ्रांस, चीन, स्पेन की स्मारकों को मिला है। यह कहां तक न्यायसंगत है। भारत का केवल एकमात्र शहर विश्व विरासत शहर है अहमदाबाद। इसे भी 2017 में स्वीकारा गया था।

हमें तो केवल इतना ध्यान रखना है कि अपने इतिहास को संजोकर रखना है।

📃BY_vinaykushwaha


सोमवार, 26 मार्च 2018

शिखण्डी : पुस्तक समीक्षा


ऋष्यश्रृंग:जिसने कभी किसी स्त्री को नहीं देखा, भागीरथी: जिसे दो औरतों ने मिलकर जन्म दिया, मान्धाता: जिसे पुरुष ने जन्म दिया, चुडाला: अपने पति को ज्ञान देने के लिए पुरुष बन गई, शिखण्डी: जो न तो नर था ना ही मादा और बहुचर: जो अपनी पत्नी को खुश नहीं कर सका जैसी प्राचीन भारतीय इतिहास की कहानियों को संजोए एक किताब 'शिखंडी और कुछ अनसुनी कहानियां'। यह किताब भारत के महान पौराणिक कहानी लेखक देवदत्त पट्टनायक ने लिखी है जिसका प्रकाशन राजपाल एण्ड सन्स ने किया है।

भारतीय इतिहास की कई ऐसी कहानियां जो कि आम नागरिकों के बीच प्रचलित नहीं है। ऐसी कहानियों को संजोकर एक पुस्तक के माध्यम से प्रकाशित किया गया है। लेखक ने विभिन्न स्त्रोतों से कहानियों को लिया है जिसमें महाभारत, रामायण, उडिया रामायण, तमिल लोककथा, पुराण आदि। इसमें सम्मिलित कहानियां सामाजिक सरोकार से जुड़ी हुई है। इसमें 30 कहानियों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय सांस्कृतिक परिदृश्य के महान पात्रों को कहानी के माध्यम से बताने का प्रयास किया है जिनकी गूढ़ बातों से लोग अवगत नहीं है। इसमें जिस भी पात्र के बारे में कहानी बताई गई है  और साथ-साथ में कारण और संदर्भ भी दिया गया है।

आज के दौर में जिन विषयों पर चर्चा करना भी पाप माना जाता है और उनकी कल्पना या उपस्थिति को अपराध समझा जाता है ऐसे सभी क्रियाकलाप अतीत में उपस्थित थे। किन्नर, समलैंगिकता, असामान्य यौन प्रवृत्ति, असामयिक यौन प्रवृत्ति आदि की बातों को सहजता के साथ प्रस्तुत किया गया है। राम जिन्होंने हिजड़ों को भी अपने राज्य में शामिल किया, विष्णु जिन्होंने असुरों को सबक सिखाने के लिए मोहनी का रूप लिया, काली जिन्होंने गोपियों के साथ नृत्य करने के लिए कृष्ण रूप धारण किया जैसी चमत्कारिक कहानियों का एक विशाल सागर है।

पुस्तक में कहानी की शुरुआत शिखण्डी नामक अतिपरिचित पात्र के साथ शुरू होती है। महाभारत का यह पात्र न तो स्त्री था न पुरुष। पुस्तक खुली मानसिकता के साथ वीर्य, कामुकता, यौन आचरण के विषय में चर्चा होती है परंतु किसी भी प्रकार की अश्लीलता का प्रदर्शन नहीं होता है। जीवन में अनेकों उतार-चढ़ाव आते है और उनके साथ कैसे निबाह करना है यह इसमें अच्छी तरह बताया गया है। यह पुस्तक शानदार और रोचक कहानियों से भरी हुई है जिसका रसास्वादन जरूर लेना चाहिए।


रविवार, 25 मार्च 2018

यूपी की फिज़ा


दूर-दूर तक फैला पठारी इलाका जिसमें पेड़ों की संख्या न तो बहुत ज्यादा है न ही बहुत कम। जमीन भी ऐसी कि कही थोड़े उंचे पहाड़ है तो कही समतल जमीन है। जहां समतल जमीन वहां जमीन के अंदर से स्वयंभू शिव की तरह निकली हुई चिमनियां है जिनसे धुआं तो नहीं निकल रहा लेकिन नीचे भट्टी में ईंट पक रही है। विन्ध्य की महक आने लगी है। बेशक यह यूपी है। मध्यप्रदेश के उत्तरी भाग को पार करते ही यूपी का दक्षिणी छोर कुछ इसी प्रकार दिखाई देता है। यह गंगा का मैदान का दक्षिणी भाग भी है।

यूपी कहे या उत्तरप्रदेश या उत्तमप्रदेश सभी तो श्रेष्ठ है। यदि ऐसा कहा जाए कि राज्यों में सर्वश्रेष्ठ या यूं कहे राज्यों का राजा। मैंने उत्तर प्रदेश  की यात्रा कई बार की है और हर बार मैंने यहां कुछ नया ही पाया है। हवा में घुली पेडे की मिठास हो या अध्यात्म की हवन वेदी से उठती खुशबू हो सभी कुछ तन-मन को उत्साहित कर देती है। इलाहाबाद की धरा पर कदम रखने का सौभाग्य कई बार मिला परंतु पहले उस फिज़ा में घुली ताज़गी का आनंद नहीं लिया जो इस बार मिला है। इलाहाबाद कोई आम जगह नहीं है यह तो सभी जानते है।

पूर्वांचल का सबसे प्रमुख शहर जिसके बिना पूर्वांचल की कल्पना पूरी नहीं हो सकती है। गंगा और यमुना का संगम तो पहले भी कई बार देखा है लेकिन इस इसमें कुछ नयापन देखने को मिला। यमुना नदी का श्याम जल हो या गंगा नदी का हरित जल इस बार इसमें कुछ नयापन है। हिमालय से मां गंगा और यमुना के द्वारा लाई गई रेत एक नए संसार का निर्माण कर रही है। संगम के जल में जाते हाथ केवल कंकण स्नान के लिए ही नहीं बल्कि अर्घ्य के लिए भी उठते है। तेज बहाव वाली गंगा हो या शांत यमुना दोनों श्रद्धालुओं को उतना ही मौका दे रही है जितना वे चाहते हैं।

श्रद्धा के दीपक आज कुछ अलग ही छटा बिखेर रहे हैं। फूलों की लड़ी हो या नावों का जमावड़ा सब कुछ देखा हुआ है फिर भी अनोखा है। बरसों पहले जब पहली बार आया था तब भी किले की दीवार यूं ही सीना ताने खड़ी थी और आज भी लेकिन इनकी रंगत में चटकपन-सा आ गया है। लाई बताशा की सजी दुकाने हो या फूलों से सजे दौने, पंडों की मडई हो या गोताखोरी की टोली नया न होते हुए भी कुछ अलग है। पानी की लहरों पर गोता खाते गोताखोर हो या पानी में उतरते नौसिखिया सब पहले भी तो देखा है लेकिन इस बार अंदाज अलग लग रहा है।

नाव का कालिंदी की लहरों के साथ कलाबाजियां करना हो या मछलियों का पैरों को छूकर जाना पहले भी देखा है लेकिन ऐसी अनुभूति पहली बार हुई है। संगम के जल को छूकर तन को छूती पवन से पहले भी कई बार सुखमय अनुभूति हुई है लेकिन इस बार इसमें कुछ शीतलता ज्यादा ही है। रेत के टीले पर दूर-दूर तक आशा का दीपक पहले भी दीप्तमान थे आज भी हैं। साइबेरियन गल्स होवर की उड़ान और पानी में खेल तो कई देखा है परंतु इनकी अठखेलियां में कुछ आज अनोखा पन है।

इलाहाबाद कोई मुसाफिरों का शहर नहीं है बल्कि यह तो शांति से अपने अंदाज में जीने वालों का शहर है। इस शहर को पहले भी कई बार देखा है लेकिन इसमें नयापन पहली बार देखा है।

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शनिवार, 17 मार्च 2018

अनुभूति : गांव चलें हम (तृतीय दिवस)


अनुभूति : गांव चलें हम कार्यक्रम हिवरखेड़ी में तीसरे  दिन की शुरुआत बड़ी जोरदार हुई। अन्य दो दिन की तरह यह तीसरा दिन भी रोमांचित और शिक्षित करने वाला है। तीसरे दिन की शुरुआत योग और प्राणायाम से हुई। माननीय अभिषेक पांडेय और मुकेश चौरासे सर के निर्देशन में यह संभव हुआ। प्राणायाम एवं योग के बाद  कुछ समय का विराम लिया गया। सुबह प्राणायाम और योग के बाद बौद्धिक हुआ।

बौद्धिक के माध्यम से टीम को प्रोत्साहित किया गया। बौद्धिक के पश्चात् थोड़ा विराम लिया गया। बौद्धिक के पश्चात् सायंकाल में नुक्कड़ नाटक का आयोजन किया गया। नुक्कड़ नाटक के माध्यम से गांव में शिक्षा को प्रोत्साहन की बात किया गया। गांव में गली-गली जाकर नुक्कड़ नाटक के माध्यम से लोगों को जागरुक किया ।

नुक्कड़ नाटक के पश्चात् भोजनावकाश टीम के सदस्यों के बीच अनुभव को साझा किया गया। दिन भर में हुई सारी गतिविधियों के अनुभव एक-दूसरे से साझा किए गए। इसी तरह तीसरे दिन की समाप्ति हुई।


शुक्रवार, 16 मार्च 2018

अनुभूति : गांव चलें हम (द्वितीय दिवस)


16 मार्च दिन शुक्रवार को अनुभूति : गांव चलें हम का दूसरा दिवस शुरु हुआ। दूसरे दिवस की शुरुआत सुबह प्रभातफेरी से शुरु हुई। प्रभातफेरी में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविधालय भोपाल की बालक वर्ग की टीम ने हिवरखेड़ी गांव का भ्रमण किया। प्रभातफेरी में टीम ने सारे गांव में भ्रमण कर गांव में अपने गीत के स्वर से समां को गुंजायमान कर दिया। प्रभातफेरी के बाद बौद्धिक के माध्यम से टीम को विभिन्न विषयों पर जागरुक किया गया।

बौद्धिक के बाद टीम ने गांव का दौरा किया जिसमें घर-घर जाकर विभिन्न मुद्दों पर बात की। इन मुद्दों में रहन-सहन, सामाजिक-आर्थिक परिस्थिति, सरकारी योजनाओं, सांस्कृतिक विषयों पर राय ली गई। गरीबों और अमीरों में भेद न करते हुए सभी से उनकी दैनिक दिनचर्या से लेकर शैक्षिक और राजनैतिक विषय पर राय लिया गया

गांव भ्रमण के बाद टीम ने हिवरखेड़ी के समीप स्थित गांव चौकी का भ्रमण किया। हिवरखेड़ी से चौकी तक पैदल चलकर गांव के वातावरण को महसूस किया गया। चौकी गांव पहुंचकर वहां के लोगों के बारे में जाना  और वहां की शैक्षिक, आर्थिक, सामाजिक, व्यासायिक, सांस्कृतिक संबंधी आंकड़ों को इकट्ठा किया गया।

दिन के अंतर्गत में अनुभव साझा करने के बाद इस कार्यक्रम का समापन किया गया।


गुरुवार, 15 मार्च 2018

अनुभूति : गांव चलें हम


शहरी विद्यार्थियों को गांव की जीवन शैली से अवगत कराने के लिए विकासार्थ विद्यार्थी द्वारा एक कार्यक्रम का आयोजन कराया जा रहा है जिसका नाम है अनुभूति : गांव चलें हम। इस कार्यक्रम में कॉलेज और विश्वविधालय में अध्ययनरत विद्यार्थियों को गांवों का दर्शन कराया जाना है। इसका मुख्य उद्देश्य  ग्रामीण दर्शन है। यह कार्यक्रम 15-18 मार्च 2018 को मध्यप्रदेश के विभिन्न जिलों के गांवों में आयोजित किए जा रहा है। विद्यार्थियों को ऐसे गांव में ले जाया जा रहा है जो उनके जिले का ना हो।

इस कार्यक्रम का उद्देश्य केवल ग्रामीण व्यवस्था से अवगत कराना ही नहीं बल्कि वहां के लोग को जानना भी है। इसके तहत गांव के लोगों से मिलना, वहां की परिस्थितियां से अवगत होना और साथ ही वहां के पारिस्थितिकी के बारे में जानना भी है। कॉलेज या विश्वविधालय से विद्यार्थियों की टीम किसी गांव जाएंगी और विभिन्न प्रकार की गतिविधियों में भाग लेगी। इन गतिविधियों में सांस्कृतिक, सर्वेक्षण, प्रभात फेरी, बौद्धिक आदि शामिल है।

ऐसा ही एक कार्यक्रम बैतूल जिले के गांव भडूस और हिवरखेड़ी में सम्पन्न होने जा रहा है। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविधालय भोपाल की दो टीम बालक और बालिका का चयन हुआ। बालकों की टीम का यह कार्यक्रम हिवरखेड़ी में शुरु हुआ। इस कार्यक्रम की शुरुआत 15 मार्च को परिचय से शुरू हुआ और संध्याकाल में बौद्धिक के साथ सम्पन्न हुआ। यह कार्यक्रम 15-18 मार्च तक होगा।


रविवार, 4 मार्च 2018

अंबेडकर और संघ


मैं जानता हूं कि वामपंथी संसदीय लोकतंत्र पर विश्वास नहीं करते यह मेरा नहीं बल्कि बाबासाहब भीमराव अंबेडकर का कहना है। अंबेडकर जी अपनी तमाम उम्र उन कुरीतियों से लड़ते रहे जिन्हें इस समाज और देश में होना ही नहीं चाहिए था। वे हमेशा एकता, अखंडता, समरसता, भेदभाव और छुआछूत से रहित समाज की कामना करते थे। उन्होंने अपने देश के प्रति सदा समर्पण का भाव रखा। भारत की क्षति को अपनी क्षति स्वीकार किया है। वे तब भी आहत हुए थे जब भारत का विभाजन किया जा रहा था और तब जब इस देश में छुआछूत और भेदभाव जैसे से असामाजिक मुद्दे व्याप्त थे।

अंबेडकर एक प्रतिभावान, कुशाग्र बुद्धि के धनी थे वे चाहते तो आसानी से किसी उच्च पद नौकरी करते परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया सदैव अपने समाज,धर्म और इस देश के लिए आंदोलन किया ताकि देश की आन-बान-शान को नुकसान न पहुंचे।डॉ. अंबेडकर संपूर्ण वांग्मय के खंड 5 में लिखा है, 'डॉ. अंबेडकर का दृढ़ मत था कि मैं हिंदुस्तान से प्रेम करता हूं। मैं जीऊंगा तो हिंदुस्तान के लिए और मरूंगा तो हिंदुस्तान के लिए। मेरे शरीर का प्रत्येक कण और मेरे जीवन का प्रत्येक क्षण हिंदुस्तान के काम आए, इसलिए मेरा जन्म हुआ है।

अंबेडकर जी हमेशा से कुरीतियों जिनमें छुआछूत और भेदभाव था इसके खिलाफ थे जो हिन्दु धर्म को कलुषित कर रहा था। वे हमेशा से ही दलित के लिए संघर्ष में इस बात को उठाते रहे कि उन्हें सार्वजनिक पेयजल स्त्रोतों पर जाने की स्वतंत्रता हो, मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति हो। संघ भी इसी विषय पर कार्य कर रहा है 'एक मंदिर, एक कुंआ, एक श्मशान'। इस विचारधारा के साथ समाज को सदैव आगे बढ़ाया जा सकता है साथ ही साथ समरसता की भावना को समाज में बनाया जा सकता है।

आज से लगभग 70 साल पहले अंबेडकर जी ने अनुच्छेद 370 को हटाने की बात कही थी परंतु किसी ने भी उनकी इस विषय पर ध्यान नहीं दिया। वे चाहते थे कि यह देश अखंड रहे ताकि इस देश के सभी नागरिक सुरक्षित रहे। आज 2018 में भी इसी बात को लेकर बहस जारी है कि हमें 370 को हटाना चाहिए। संघ भी देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए इस प्रकार की कामना करता है।

सीधे-सीधे तौर पर देखा जाए तो संघ और अंबेडकर जी के बीच में एक समानता जरूर दिखाई देती है। छुआछूत, भेदभाव और जाति व्यवस्था को खत्म करना। जिस प्रकार संघ किसी प्रकार से जाति को मानने से इंकार करता है ठीक उसी प्रकार अंबेडकर जी जातिप्रथा के विरोधी थे। वे हिन्दु धर्म के किसी भी प्रकार से विरोधी नहीं थे। यदि वे हिंदु धर्म के विरोधी होते तो वे बौद्ध धर्म को क्यों चुनते जबकि उनके सामने इसाइयत और मुस्लिम धर्म के विकल्प खुले थे। उन्होंने अपने जितने भी आंदोलन किए सभी असामाजिक मुद्दों को लेकर किए गए थे।

संविधान में एक समान सिविल संहिता की बात कही गई है जिसमें सभी नागरिकों समान अधिकारों दिए जाने का वादा है। यह सब संभव हो सका है डॉ अंबेडकर के कारण वे चाहते थे कि देश के हर वर्ग तक अधिकार पहुंचे। इसी कारण उन्होंने समाज के पिछड़े लोगों को बढ़ावा देने के लिए विशेष प्रावधान की बात कही है। संघ भी यूनिफार्म सिविल कोड की बात करता है।

आज संस्कृत का लोहा पूरा विश्व मान रहा। संस्कृत के विषय में नई-नई रिसर्च सामने आ रही है किसी संस्कृत को कम्प्यूटर की सरलतम भाषा के रूप में बताया है तो कोई इस भाषा सर्वाधिक वैज्ञानिक बताता है। बाबासाहब को भी संस्कृत से लगाव था।10 सितंबर 1949 को डॉ. बीवी केस्कर और नजीरूद्दीन अहमद के साथ मिलकर बाबा साहब ने संस्कृत को राजभाषा बनाने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन वह पारित न हो सका। यह तो हमारे देश की विडंबना है कि सारी भाषाओं की जननी का ही सम्मान नहीं हो रहा है। संघ भी चाहता है कि हमारे देश की भाषा संस्कृत हो जो हमें और ज्यादा सुसंस्कृत कर सके।

                            ।।जय हिंद।।

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शनिवार, 3 मार्च 2018

अंबेडकर और बौद्ध धर्म

          

दीक्षाभूमि नागपुर गवाह है कि कैसे? डॉ भीमराव अंबेडकर जी ने अपने लगभग 5 लाख अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। यह दुनिया का सबसे बड़ा धर्म परिवर्तन कहा जाता है क्योंकि इससे पहले इतिहास में कभी इतनी संख्या में किसी ने एक साथ धर्म परिवर्तन नहीं किया था। 14 अक्टूबर 1956 को हिन्दु धर्म छोड़ते हुए बौद्ध धर्म अपना लिया। यह धर्म परिवर्तन कोई दबाव में की गई प्रक्रिया नहीं थी बल्कि यह तो अव्यवस्था को लेकर किया गया एक समूह निर्णीत एक कार्य था जिसका प्रतिनिधित्व डॉ भीमराव अंबेडकर ने किया था।

अंबेडकर महार जाति में जन्में एक महान व्यक्तिव्य थे।  जन्म से ही छुआछूत और भेदभाव का दंश झेला था। यद्यपि उनके माता-पिता या परिवार में कोई हिन्दु धर्म के खिलाफ नहीं थे बल्कि उनके माता-पिता तो सदैव उन्हें धार्मिक पुस्तकों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते थे। इसी कारण अंबेडकर जी ने बचपन में महाभारत, रामायण आदि समेत धर्म ग्रंथों का अध्ययन कर लिया था। अंबेडकर कभी भी हिन्दु धर्म या इसके पद्धति के खिलाफ नहीं थे बल्कि वे तो ब्राह्मणवाद और उनके द्वारा की जा रही कुरीतियों के सख्त खिलाफ थे। डॉ अंबेडकर एक प्रतिभावान व्यक्ति थे उन्होने लगभग 51 पुस्तकें लिखी। वे भारत के पहले व्यक्ति है जिन्होंने अपनी पीएचडी इकोनोमिक्स से पूरी की थी।

अंबेडकर का धर्म परिवर्तन एकाएक हुई कोई घटना नहीं है बल्कि यह सतत् सामाजिक प्रक्रिया की देन है।बचपन में जहां उन्हें सामान्य बच्चों के साथ कक्षा में बैठने की अनुमति नहीं थी, पानी या पानी के पात्र को छूने की अनुमति नहीं थी। वही जब वे थोड़े आगे बढ़े और बडौदा रियासत में नौकरी किया करते थे तो प्यून उन्हें फाइलें फेंककर देते थे। यह सब देखकर उनका मन विचलित हो गया था। सबसे बड़ी घटना तो तब हुई जब वे आंदोलन करते हुए खानदेश पहुंचे और वहां उन्हें दलित होने के कारण तांगें वाले ने बैठाने से ही मना कर दिया। यह सब धर्म परिवर्तन का कारण बना।

हिन्दु धर्म में इस छुआछूत और भेदभाव को मिटाने के लिए अंबेडकर ने कई प्रयास किए। महाड सत्याग्रह जैसे प्रयासों को नहीं भुलाया जा सकता है। कालेराम मंदिर, नासिक में कई हजार समर्थकों के साथ प्रवेश किया जो केवल कुरीतियों को तोड़ने वाला ही था। उनके जीवन की एक घटना जब उनकी पत्नी ने कहा कि वे पंढ़रपुर जाना चाहती है लेकिन उन्होंने यह कहते हुए मना कर दिया कि वहां दलितों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता है। यही इच्छा उनकी पत्नी की आखिरी इच्छा बनी जो कभी पूरी नहीं हो सकी थी।

हिंदु धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाने से पूर्व उन्होंने हर धर्म का गहन अध्ययन किया था। मुस्लिम धर्म की ओर आकर्षित हुए परंतु जब उन्होंने वहां व्याप्त कुरीतियों को देखा तो उनका मोहभंग हो गया। यहां भी ऊंची जातियों के द्वारा नीची जातियों से दुर्व्यवहार किया जाता था। मुस्लिम धर्म में सबसे बड़ी बात जो अंबेडकर को नगबार गुजरी वह थी कि स्त्रियों की कोई भूमिका और सम्मान न होना। फिर कुछ समय बाद उन्होंने सिक्ख धर्म का रुख किया लेकिन यहां भी उन्हें कुरीतियां दिखाई दी। यहां दलितों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता था। जिसके कारण उन्होंने सिक्ख धर्म को अपनाने की बात टाल दी। अंत में बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित हुए और इसका अध्ययन किया । इसी कारण उन्होंने कई किताबें बुद्ध और धम्म के विषय में लिखी थी।

अन्त्वोगत्वा उन्होंने बुद्धं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया।

                        ।।जय हिन्द।।

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रविवार, 25 फ़रवरी 2018

चलते-चलते(श्रृंखला 11)


होली का त्यौहार कई युगों से मनाया जा रहा है। होली को कहते है कि बुराईयों को भुलाकर दुशमनों को गले लगाने वाला त्यौहार है। लाल,पीला, नीला, हरा रंगों में सराबोर होकर झूमने का पर्व है। अबीर, गुलाल, रंगों से सजे इस त्यौहार को सतरंगी त्यौहार कहा जाए तो सही होगा। केवल रंग ही नहीं मीठा-मिठास को फैलाने वाला है। रसगुल्ला, गुलाबजामुन, कुसली, खुरमी, गुझिया आदि इस मिठास को और ज्यादा बढ़ा देती है। सबसे जरूरी बात होली में भांग का रंग न पड़े तो फिर होली का का रंग निखर कर सामने नहीं आता है। गांव से लेकर शहर तक होली के नए-नए रंग देखने को मिलते हैं। कीचड़ होली हो या गुलाल होली, लट्ठमार होली हो या फूलों की होली हो, रंगों की होली हो या टमाटर की होली, देशी फाग पर होने वाली होली हो या डीजे की तेज धुन पर होने वाली होली सभी होली के कई रंग दिखाते हैं।

भारत में होली एक ऐसा त्यौहार है जो एक बड़ा माइग्रेशन होता है। देश के कोने-कोने से लोग अपने घर की ओर चलते है। बस, ट्रेन, फ्लाइट सभी यात्रियों से भरी होती है। 28 फरवरी 2018 का दिन मुझे हमेशा याद रहेगा जब मुझे घर जाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। हबीबगंज से अपने शहर कटनी जाने के लिए स्पेशल ट्रेन को चुना जिसने एक नए अनुभव को दिया। भीड़ का सैलाब और ट्रेन की दस घंटे की देरी ने मजे के साथ सजा भी दे दिया। हम इस भीड़ को केवल भीड़ के तरह ही न ले यह तो भारतीय है या यूं कहे कि सच्चे देशी भारतीय हैं। तरह-तरह की भाषा, खान-पान, शोर-शराबा सब कुछ एक नया अनुभव। हबीबगंज पर आती-जाती हर ट्रेन भीड़ नहीं भारतीय है। स्लीपर हो या जनरल, एसी हो या सेकेंड सीटिंग हर तरफ हूजूम दिखाई देता है।

ट्रेनों को भारत की आत्मा कहा जाए तो इसमें कोई गलती नहीं होगी। परिवार को मिलाने की बात कहे या संस्कृति को मिलाने की बात हो, दूरियां मिटाने की बात हो या मेल मिलाप कराने वाली एक लिंक है यह ट्रेन। ट्रेन एक राज्य से चलकर दूसरे राज्य तक केवल यात्रियों को अपने डेस्टिनेशन तक नहीं पहुंचाती बल्कि अपने साथ संस्कृति, भाषा, बोली, रंग-ढ़ंग, वेशभूषा, रहन-सहन, खान-पान लेकर जाती है। भारतीय रेल्वे को एक ही तरीके से नहीं देखा जा सकता है। यह तो देश की पावन भूमि का दर्शन करवाती है। कही पहाड़ तो कही पठार, कही नदी तो कही समुद्र, कही जंगल तो कही खाई, कही निर्जन तो कही सजन जगहों को दिखाती यह ट्रेन भारत के असली दर्शन करवाती है।

भारतीय ट्रेन एक वर्ग विशेष के लिए नहीं है यह तो भारत के समस्त नागरिकों को समाहित करती है। अमीर हो या गरीब, विद्यार्थी हो या प्रोफेशनल्स, बेरोजगार हो या रोजगार, किसान हो या जवान सभी को अपना आश्रय देती है भारतीय ट्रेन। कोई पहली बार सफर करने वाला भी होता है  तो कोई बार-बार सफर करने वाला होता है। कोई एसी क्लास से सफर करने वाला होता है तो कोई स्लीपर में सफर करने वाला होता है। कोई कॉउंटर से टिकिट लेकर सफर करने वाला होता है तो कोई ऑनलाइन टिकिट पर सफर करने वाला होता है। ट्रेन किसी के साथ भेदभाव नहीं करती है। अपने निजी जिंदगी में कोई कितना ही अमीर हो या गरीब सभी को एक समान सुविधा देती है।

भारतीय रेल का स्वरुप बदला है। भाप से डीजल, डीजल से इलेक्ट्रिक, और आज हाइड्रोजन इंजन का कॉन्सेप्ट भारतीय रेल लेकर आई है। पहले जहां रेल का उद्देश्य केवल यात्रियों को एक जगह से दूसरे जगह पहुंचाना था जो आज बदलकर सुख-सुविधा आदि का जरिया भी बन गया है। देरी का पर्याय रहने वाली ट्रेन आज समय की पाबंद हो गई है। जहां पहले साधारण सी ट्रेन होती थी आज ट्राम, मोनोरेल, मेट्रोरेल, बुलेटट्रेन, अब तो और आगे भारत में हाइपरलूप ट्रेन आ रही है। ट्रेन और भारतीय का मिलन कभी भी अधूरा नहीं हो सकता है। भारत और भारतीयता को जोड़ने वाला कोई और नहीं है वो भारतीय रेल ही है।

                           ।।जय हिंद।।

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बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

ईरान और भारत

       

अमेरिका के बार-बार मना करने पर भी ईरान परमाणु बमों का परीक्षण कर रहा था। जिसके कारण अमेरिका और  तमाम दूसरे देशों ने उस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए। लेकिन एक देश अब भी ऐसा था जिसने ऐसा नहीं किया और ईरान का अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन करता रहा वो देश है भारत। भारत के ईरान के साथ रिश्तें कोई 200-400 साल पुराना नहीं है। यह रिश्ता तो लगभग 2000 साल से भी ज्यादा पुराना है। मौर्य काल हो या बाद के काल दोनों देशों के बीच अच्छे संबंध रहे हैं। भारत भी कई सभ्यताओं के बाद जन्मा एक महान राष्ट्र है। ईरान में भी बेबीलोन जैसी सभ्यता ने जन्म लिया।

ईरान का पुराना नाम पर्सिया है। पर्सिया होने के पीछे परसियन साम्राज्य का होना है। यह वही देश है जहां पारसी धर्म का प्रादुर्भाव हुआ था। पारसी धर्म एक शांति प्रिय धर्म है जिसनेे जुल्म और सितम सहें। पारसी धर्म को हिंदु धर्म की तरह देखा जाता है। इस धर्म में भी अग्नि और जल को एक पवित्र तत्व माना गया है। पारसी धर्म विश्व के सबसे पुराने धर्मों में से एक है। जब ईरान में पारसी धर्म के मतावलम्बियों को कष्ट हुआ तो वे अपनी जन्मभूमि को छोड़कर भारत की ओर रुख कर लिया। मुंबई और गुजरात में साफ-साफ साक्ष्य मौजूद है। आज भी इन्हीं जगहों पर सर्वाधिक पारसी रहते हैं।

भारत और ईरान एक मित्र राष्ट्र के रुप में एक-दूसरे से व्यवहार करते है। ईरान कब शिया मुस्लिम बहुल राष्ट्र बन गया यह तो सर्वविद्यित है। जरुरत समाज की एक आवश्यकता है।  भारत और ईरान को भी एक-दूसरे की जरुरत है क्योंकि विश्व रुपी समाज में सभी देशों को एक-दूसरे की जरुरत है। ईरान के पास कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस, और भौगोलिक स्थिति है। इन्हीं सारी चीजों की भारत को जरुरत है।

भारत आने वाले समय की महाशक्ति है। भारत की जरुरत को पूर्ण करने में कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस की आवश्यकता है। भारत अपनी जरुरत का 75 प्रतिशत तेल और गैस आयात करता है। भारत सस्ती और आसानी से उपलब्ध तेल और गैस की तलाश में है। ईरान पर जब आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए थे तब भी  भारत ही था जिसने ईरान से व्यापार जारी रखा और तेल का आयात करता रहा। आज के दौर में किसी भी देश के लिए तेल, गैस और भौगोलिक स्थिति (geographical position) के बहुत मायने है। हसन रुहानी भारत आए तो यही तीन मुद्दे हावी रहे। इसमें सर्वाधिक चर्चित मुद्दा चाबहार पोर्ट रहा।

चाबहार पोर्ट ईरान का एक पोर्ट है जो अरब सागर में स्थित है। यह पोर्ट ग्वादर पोर्ट के निकट है। यह वही ग्वादर पोर्ट है जो पाकिस्तान और चीन की संयुक्त परियोजना है जो कि ओबीओआर का भाग है। चीन आज के समय में दूसरे देश की जमीन का उपयोग करके अपने लिए एक बैकअप बनाने और उसके पड़ोसी देश को घेरने की तैयार करने की कोशिश कर रहा है। भारत भी अब चीन को चीन की तरह से ही घेरने की कोशिश में है। चाबहार पोर्ट एक रास्ता है जो भारत की पहुंच को मध्य एशिया तक आसान बनाएगा।

खासतौर पर पाकिस्तान, अफगानिस्तान में भारत की एंट्री नहीं होने देना चाहता। भारत ने पाकिस्तान के सामने एक प्रस्ताव रखा था कि अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत एक सड़क परियोजना से जुड़े लेकिन पाकिस्तान ने मना कर दिया। इस मनाही का विकल्प चाबहार के रूप में निकला। भारत ने एक तीर से कई सारे निशाने साधे हैं। पहला कि भारत को मध्य एशिया तक पहुंचने के लिए आसान और छोटा रास्ता मिल गया। दूसरा अफगानिस्तान पहुंचने के लिए अब तक केवल हवाई मार्ग से ही सीधे पहुंचा जा सकता था जो कि आयात-निर्यात के लिए उपयुक्त माध्यम नहीं है।चाबहार के बन जाने के बाद इस समस्या का लगभग निराकरण हो जाएगा। तीसरा पाकिस्तान में हो रही गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है। चौथा, इस क्षेत्र में बढ़ रहे चीन के प्रभाव को कम करने और संतुलन स्थापित करने में महत्वपूर्ण है।

भारत और ईरान सदा का साथ है और बना रहेगा। ईरान, भारत से अपनापन जताता है और भारत, ईरान से। भौगोलिक दूरियों को कम किया जा सकता है।

                           ।।जय हिन्द।।

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रविवार, 18 फ़रवरी 2018

अंबेडकर अभी जिंदा है!


बात उन दिनों की है जब सयाजी गायकवाड़ बडौदा रियासत के महाराज हुआ करते थे। डॉ भीमराव अंबेडकर जी ने आवश्यक शिक्षा प्राप्त कर ली थी और उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए विदेश जाना चाहते थे। सयाजी गायकवाड़ ने डॉ अंबेडकर की मदद की और उन्हें ब्रिटेन भेज दिया। जब अंबेडकर अपनी पढ़ाई करके वापस आए तो उन्हें एक नौकरी की सख्त जरुरत थी क्योंकि उनके घर की आर्थिक परिस्थितियां दयनीय थी। जब यह महाराजा सयाजी को पता चला तो उन्होंने बडौदा में ही क्लर्क की नौकरी दे दी जिससे उनका जीवन यापन होने लगा। जब उनके ऑफिस में ही उनके साथ सामान्य जाति के नौकरों के द्वारा दुर्व्यवहार किया जाने लगा जिसमें घंटों तक उनको प्यासा रहना पड़ता था, नौकर उनकी टेबिल को छूते भी नहीं थे। फाइलों को हाथ में न देकर फाइलों को फेंककर दिया जाता था। यह सब देखकर वे बहुत दु:खी हुए और नौकरी छोड़ने का मन बना लिया।

अंबेडकर को मां-बहन की गाली देने वालों क्या तुम्हारी आत्मा तुम्हें ऐसा करने के लिए एक बार भी मना नहीं करती? तुम्हें अंबेडकर को गाली देने से क्या मिलेगा? अंबेडकर ने जिस दंश को झेला है, उसी का सबसे बड़ा कारण संविधान में आरक्षण का प्रावधान है। अंबेडकर महाराष्ट्र की उस महार जाति से आते है जिसे उस सामान्य कुएं से पानी पीने पर प्रतिबंध था। जब वह रास्ते पर निकलता था तो उसकी कमर पर झाडू और मुहं के पास एक पात्र होता था। जब तक इस समाज में भेदभाव और छुआछूत की भावना रहेगी तब तक "अंबेडकर जिंदा रहेगा"।

मैंने भी छुआछूत का दंश झेला है और महसूस किया है कि कितना विध्वंसक है। भारत मेरा देश है जहां कुछ दो कौड़ी के लोग है जो गालियां देने में अपना जीवन बिताते हैं। कुछ अंबेडकर को गाली देते है और कहते है कि साला, आरक्षण लागू करके चला गया? ये तो उनके लिए सामान्य से शब्द हैं। इतने घटिया शब्दों का उपयोग किया जाता है कि मैं यहां चाहते हुए भी नहीं लिख सकता। गाली देने वाला सभी को गाली देता है, यहां तक की भगवान को भी। वर्तमान समय में लोग नरेन्द्र मोदी को भी गाली देते हैं। इससे यह सिद्ध तो नहीं होता कि नरेन्द्र मोदी घटिया व्यक्तिव्य के व्यक्ति है। नुक्स निकालना तो हर व्यक्ति का काम है लोगों ने तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आतंकवादी तक की संज्ञा दे दी। मैं तो केवल इतना जानता हूं कि ऐसे लोगों के मनोरंजन का यह विषय बन चुका है। इंसान अच्छा अपने कर्मों से होता है।

मेरी हमेशा ही आरक्षण को लेकर बहस होती रहती है। जो सामान्य वर्ग के व्यक्ति है वह चाहते है कि आरक्षण लाकर अंबेडकर ने गलत किया है। बोलते हैं कि आरक्षण से कभी अनुसूचित जाति(sc) और अनुसूचित जनजाति(st) का कभी भला नहीं हो सकता। मैं तो कहता हूं कि आरक्षण भला करने के लिए नहीं है बल्कि प्रोत्साहित करने के लिए था और है। पूना पैक्ट की बात करते है और कहते है कि किस प्रकार अंबेडकर गांधी के सामने अड़ गए थे। जरा जाकर सच्चाई तलाशों फिर आकर बात करना।

जब तक इस देश में छुआछूत, भेदभाव, जातिगत अत्याचार व्याप्त है तब तक अंबेडकर जिंदा रहेगा। जब तक कुछ सामान्य और सवर्ण जाति के लोग अपनी मानसिकता बदलकर पिछड़ों को अगड़े बनाने में मदद नहीं करते तब तक अंबेडकर जिंदा रहेगा। जब तक सामाजिक बुराइयों से समाज उलझा रहेगा तब तक अंबेडकर जिंदा रहेगा। मैं किसी व्यक्ति विशेष का पैरोकार नहीं हूं। मैं तो बस सच्चाई सामने रखने की कोशिश कर रहा हूं। मैं तो सभी का सम्मान करने वाले व्यक्ति में से एक हूं। मुझे स्कूल में तो यही सिखाया गया है। मैं उस व्यक्ति की बिल्कुल भी इज्जत नहीं करता जो देश विरोधी बात करते है, किसी भी प्रकार से देश को तोड़ने की बात करते हैं, सामाज में बुराइयां फैलाते है।

संविधान निर्माण का कार्य किसी एक व्यक्ति का काम नहीं था। प्रारुप समिति का अध्यक्ष डॉ भीमराव अंबेडकर को बनाया गया। जब प्रारुप संसद में पेश किया गया तब संसद सदस्यों ने इसे पास कर दिया और यह संविधान बन गया। इसी प्रारुप में आरक्षण का प्रावधान था। जिसे संसद सदस्यों ने पास किया। डॉ अंबेडकर का आरक्षण लागू कराने में कितना रोल है? यह सब जानते हैं, फिर भी फालतू की बहस करते है। अच्छा, एक बड़ी बात यह भी है कि कई ऐसे भी लोग है जिन्हें संविधान स्वीकार्य नहीं है। यही लोग अपने आप को बड़ा देश भक्त बताते हैं।

आरक्षण कोई मनोरंजन का विषय नहीं है। आरक्षण केवल उन पद दलित लोगों के लिए है जो समाज की तेज रफ्तार दौड़ में कहीं पीछे छूट गए। जिनकी एक भी पीढ़ी राजनीति, अर्थनीति, शास्त्रों, सांस्कृतिक व्यवहार आदि से परिचित नहीं है। आरक्षण उनके लिए है जिन्हें सामाजिक सहारे की जरुरत है जो समाज के जीवन से अनभिज्ञ हैं। आरक्षण उनके लिए नहीं है जो आरक्षण का उपयोग करके डॉक्टर, इंजीनियर, सांसद, विधायक बनकर लंबी-लंबी कारों में घूमें और अपनी आने वाली पीढ़ी को आरक्षण का लाभ दें। अन्य पिछड़ा वर्ग के व्यक्ति को आय के आधार पर आरक्षण मिलता है इसी प्रकार एससी और एसटी के लिए भी होना चाहिए ताकि नए लोगों को मौका मिल सकें। सरकार को इस प्रकार की व्यवस्था करनी चाहिए कि जिन्हें आरक्षण का लाभ नहीं चाहिए वे इसका त्याग कर सकें।

मैं तो केवल इतना जानता हूं कि मेरे प्यारे भारत देश में छुआछूत, भेदभाव, जातिगत अत्याचार नहीं होना चाहिए। जब तक सभी लोग मिलकर समभाव की भावना नहीं रखते तब तक भारत महान कैसे बनेगा।आपको तो अंबेडकर से ज्यादा अंग्रेजों को गाली देनी चाहिए जिन्होंने भारत को सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, वैचारिक, बौद्धिक आदि अनेक रुप से कमजोर किया है। जिसका परिणाम हम आज तक भुगत रहे हैं। मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार लाकर जो अंग्रेजों ने किया है हमें तो उसे गाली देनी चाहिए। जातिवाद वर्जित है और वर्जित ही रहना चाहिए।

                          ।।जय हिंद।।

📃BY _vinaykushwaha