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सोमवार, 15 जुलाई 2019

बारिश का जल 'वरदान'

तारीख 4 जुलाई 2019, जगह - गुरुग्राम, हरियाणा ; शहर को बारिश ने तरबतर कर दिया था। लगातार तीन घंटों की बारिश ने अव्यवस्था और बिना योजना के बनाए गए शहर की पोल खोल दी। गुरुग्राम से लेकर नोएडा तक पूरे एनसीआर का यही हाल है। बारिश के बाद रोड़ पर नाव चलाने जैसी हालत हो जाती है। भारत में औधोगिक दुनिया में धाक जमाने वाले ये शहर बारिश के आगे बेदम हो जाते है। बारिश में पानी-पानी होने वाले ये शहर छोटे-छोटे शहरों के लोगों को आकर्षित करते हैं क्योंकि ये रोजी-रोटी के लिए ये भारत के महत्वपूर्ण शहर हैं। लोगों की बढ़ती आबादी शहरों की कमर तोड़ रही है और जल व्यवस्था में कमी का कारण भी यही भीड़ है। लेकिन हम जल व्यवस्था में कमी को पूरी तरह से भीड़ और जनसंख्या वृद्धि से नहीं जोड़ सकते हैं। इस मामले में प्रशासन(Administration) को पाक-साफ नहीं कहा जा सकता। शासन और प्रशासन(government and administration) की असफल नीतियों का नतीजा ही है कि बारिश के समय शहरों में जलभराव  होता है।

आपने हर साल देखा होगा कि मुंबई में बारिश होती है और सड़कें तालाब बन जाती हैं। मानसून में करोड़ों लीटर पानी बह जाता है। घरों की छत से पानी छोटी नालियों और फिर नालों से होता हुआ सागर में समा जाता है। बारिश के इसी पानी को बचाने की जरूरत है। मैं इस लेख में दो मुद्दों पर बात करूंगा पहला स्वच्छ जल की आपूर्ति और जल भराव(water logging) का मुद्दा। बारिश के पानी से जलभराव के कई कारण हैं जिनमें नाले-नालियों की समय पर साफ-सफाई ना होना, रोड पर पानी निकासी की जगह ना होना, ड्रेनेज सिस्टम ना होना, रोड का डिजाइन सही ना होना, लोगों का जागरुक ना होना, सीवर सिस्टम का सही ना होना, अत्याधिक बारिश भी जलभराव का एक महत्वपूर्ण कारण है।

अत्याधिक बारिश से बाढ़ आती है ये तो सभी को मालूम है। सामान्य बारिश होने पर बारिश का पानी छतों से होता हुआ नालियों में बह जाता है और गंदा हो जाता है। बारिश के पानी को सहेजा जा सकता है। कई तरीकों से बारिश के पानी को सहेजकर हम सूखे की स्थिति को काफी हद तक कम कर सकते  हैं। ठंड का मौसम आने तक भारत के राजस्थान, मराठवाड़ा, विदर्भ, बुंदेलखंड, कच्छ में पानी के लिए मची चीख-पुकार सुनाई देने लगती है। गर्मियों के आने पर तस्वीर और भी ज्यादा भयावह हो जाती है। साल 2018 में शिमला के जलसंकट के बारे में सुनने को मिला जहां कुछ दिनों के लिए पानी बचा हुआ था। शिमला के आसपास के जलाशय सूख जाने से पानी की आपूर्ति(supply) में बहुत ज्यादा कमी आ गई। पर्यटकों को शिमला ना आने की हिदायत दी गई और निवासियों से कम से कम पानी के उपयोग के लिए प्रशासन ने गुजारिश की। साल 2019 में भी ऐसा ही एक और शहर हमारे सामने आया। उसका नाम था चेन्नई। चेन्नई शहर में लगभग 88 लाख लोग रहते हैं। पानी की कमी के कारण लोगों को भारी कष्ट उठाना पड़ा। लोगों को चेन्नई ना आने की हिदायत दी गई, रेस्टोरेंट में खाना परोसने के लिए पत्तल का उपयोग किया जाने लगा। चेन्नई में जलसंकट इतना बढ़ गया था कि एक ड्रम पानी की कीमत 2-3 हजार रुपये तक पहुंच गई थी। चेन्नई के लिए यह दुर्भाग्य की बात है कि पहली बार कोई रेलगाड़ी पानी लेकर चेन्नई पहुंची। लोगों ने तो चेन्नई को भारत का केप टाउन कहना शुरू कर दिया था।

केप टाउन दक्षिण अफ्रीका का शहर है। यह दक्षिण अफ्रीका की राजधानी भी है। इस शहर को 2018 में जीरो सिटी घोषित कर दिया गया था। जीरो सिटी से मतलब होता है कि जिस शहर में पानी बचा ही ना हो। केप टाउन में पीने के लिए भी पानी की किल्लत हो गई थी। दूसरे शहरों से पानी की कमी को पूरा किया गया। केप टाउन ने लीकेज की समस्या को दूर करके जलसंकट को 40 फीसदी तक कम कर दिया। यही बात भारतीय शहरों को  भी सीखना होगा। एक रिपोर्ट के अनुसार 2020 तक भारत के बीस शहरों का ग्राउंड वॉटर लेवल जीरो हो जाएगा। यदि यह सच हुआ तो हमारे लिए खतरे की घंटी है।

नरेंद्र मोदी ने दोबारा भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। मोदी सरकार 2 में एक नए मंत्रालय का गठन किया गया जिसका नाम  जल शक्ति मंत्रालय है। जल शक्ति मंत्रालय के गठन के पीछे मोदी सरकार की नीति जल संरक्षण और जलापूर्ति पर विशेष तौर पर है। संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी ने 2024 तक हर घर नल-हर घर जल की बात कही। इसके बाद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी बजट के दौरान 2024 तक हर घर नल-हर घर जल की बात को दोहराया। मुझे लगता है कि यह सब तो जरूरी है कि लोगों को साफ पानी मिले लेकिन कैसे? हमारी नदियां, तालाब, ग्राउंड वॉटर सूख रहा है तो जलापूर्ति कैसे होगी?

सरकार को सबसे पहला अपने जल स्त्रोतों को बचाना होगा।  नमामि गंगे जैसी योजना केवल गंगा तक सीमित नहीं रखना चाहिए बल्कि देश की अन्य नदियों के लिए भी इसी प्रकार की योजना लागू करना चाहिए। दक्षिण की दो सबसे बड़ी नदियां गोदावरी और कावेरी का गर्मियों में क्या हाल हुआ सब जानते हैं। तालाबों को पाटकर इमारतें बनाई जा रही हैं, कुओं को और ज्यादा गहरा करने की जगह उन्हें डस्टबिन बनाया जा रहा है। बावड़ियों को साफ ना करके उन्हें कचरे के ढेर में तब्दील किया जा रहा है। समय आ गया है कि हम आसपास के जल स्त्रोतों को बचाएं। कुओं की साफ-सफाई करवाकर गहरीकरण करवाया जाए, तालाबों का गहरीकरण किया जाए, बावड़ियों को  उनके पुराने स्वरूप में लाया जाए, नदियों को जोड़ने का काम जल्द से जल्द पूरा किया जाए, बड़े डैम की जगह छोटे डैम को तबज्जो दी जाए।

सबसे आखिर में बारिश के पानी का संग्रह किया जाए। रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को उपयोग में लाया जाए। नालियों में बारिश के पानी को बहने से रोका जाए। बारिश के पानी का ट्रीटमेंट करके पीने योग्य बनाया जाए। बारिश का पानी केवल बॉलीवुड के गानों की तरह भीगने पर मजा नहीं देता बल्कि इसके संग्रह से यह आपको कई महीनों तक के लिए जलापूर्ति करता है।