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मंगलवार, 17 अप्रैल 2018

विश्व धरोहर दिवस


विश्व धरोहर दिवस जिसे इंग्लिश भाषा में world heritage day के नाम से जाना जाता है। यह प्रतिवर्ष 18 अप्रैल को मनाया जाता है। 1982 से प्रतिवर्ष यह मनाया जा रहा है। इस दिन को विश्व विरासत स्थल के लिए समर्पित किया गया है। यह दिवस केवल विश्व धरोहर को सहेजने के लिए ही नहीं बल्कि इसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए भी है। विश्व में कुल 1052 विश्व विरासत स्थल है। इन धरोहरों में से भारत में कुल 35 विश्व धरोहर है।  विश्व धरोहर स्थल की घोषणा यूनेस्को के द्वारा किया जाता है जो कि संयुक्त राष्ट्र का ही अंग है।

यह तो हुई सामान्य जानकारी कि क्याें? कैसे? कब? हमें सर्वप्रथम यह जानना चाहिए कि विश्व विरासत दिवस क्यों मनाना चाहिए? जब यह तय हुआ कि विश्व विरासत दिवस मनाया जाएगा तो उसका उद्देश्य था कि विश्व विरासत स्थल के संरक्षण और समृद्धि के लिए इस दिवस को मनाया जाएगा। लेकिन हम यह भूल गए कि जो स्मारक विश्व विरासत स्थल की सूची में शामिल नहीं है क्या उनका संरक्षण, रखरखाव और समृद्ध करना हमारा कर्तव्य नहीं बनता। आखिरकार यही स्मारक आगे जाकर विश्व विरासत स्थल बनेंगे।

यूनेस्को विश्व विरासत स्थल को तीन भागों में बांटा है पहला सांस्कृतिक, दूसरा प्राकृतिक और तीसरा मिश्रित। तीनों का अपना-अपना महत्व है। लेकिन जैसा कि मैं मानता हूं कि हमें सभी को उतना ही महत्व देना चाहिए जितना कि हम ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को देते है। यदि प्रकृति को बचा लेते है तो बाकी की धरोहरों का अपने आप ही संरक्षण हो जाएगा। बायो डायवर्सिटी रिजर्व हो या नेशनल पार्क या अभ्यारण्य हो या सामान्य वन क्षेत्र इनके अलावा भी भूमि, जल, पर्वत आदि का संरक्षण शामिल है।

अब बात आती है कि विश्व विरासत स्थल क्यों? विश्व धरोहर स्थल की वास्तविकता में जरुरत है क्योंकि इनके होने से इन स्मारकों के संरक्षण की गारंटी बढ़ जाती है। केवल संरक्षण ही नहीं यह स्मारक कमाऊ भी बन जाते है। जितनी विश्व विरासत स्थल है आज कमाऊ होने से उनके रखरखाव में आसानी हुई है। इससे देश, व्यक्ति और स्मारक सभी को लाभ मिलता है।

भारत में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, पुरातात्विक महत्व की स्मारकों की संख्या में कमी नहीं है। यहां के हर शहर में इसकी झलक आसानी से देखने को मिल जाती है। पक्षपात पूर्ण रवैए के चलते भारत को प्रतिनिधित्व का मौका कम मिल पाया है। भारत से ज्यादा स्मारकों को  विश्व विरासत का नाम इटली, फ्रांस, चीन, स्पेन की स्मारकों को मिला है। यह कहां तक न्यायसंगत है। भारत का केवल एकमात्र शहर विश्व विरासत शहर है अहमदाबाद। इसे भी 2017 में स्वीकारा गया था।

हमें तो केवल इतना ध्यान रखना है कि अपने इतिहास को संजोकर रखना है।

📃BY_vinaykushwaha


सोमवार, 26 मार्च 2018

शिखण्डी : पुस्तक समीक्षा


ऋष्यश्रृंग:जिसने कभी किसी स्त्री को नहीं देखा, भागीरथी: जिसे दो औरतों ने मिलकर जन्म दिया, मान्धाता: जिसे पुरुष ने जन्म दिया, चुडाला: अपने पति को ज्ञान देने के लिए पुरुष बन गई, शिखण्डी: जो न तो नर था ना ही मादा और बहुचर: जो अपनी पत्नी को खुश नहीं कर सका जैसी प्राचीन भारतीय इतिहास की कहानियों को संजोए एक किताब 'शिखंडी और कुछ अनसुनी कहानियां'। यह किताब भारत के महान पौराणिक कहानी लेखक देवदत्त पट्टनायक ने लिखी है जिसका प्रकाशन राजपाल एण्ड सन्स ने किया है।

भारतीय इतिहास की कई ऐसी कहानियां जो कि आम नागरिकों के बीच प्रचलित नहीं है। ऐसी कहानियों को संजोकर एक पुस्तक के माध्यम से प्रकाशित किया गया है। लेखक ने विभिन्न स्त्रोतों से कहानियों को लिया है जिसमें महाभारत, रामायण, उडिया रामायण, तमिल लोककथा, पुराण आदि। इसमें सम्मिलित कहानियां सामाजिक सरोकार से जुड़ी हुई है। इसमें 30 कहानियों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय सांस्कृतिक परिदृश्य के महान पात्रों को कहानी के माध्यम से बताने का प्रयास किया है जिनकी गूढ़ बातों से लोग अवगत नहीं है। इसमें जिस भी पात्र के बारे में कहानी बताई गई है  और साथ-साथ में कारण और संदर्भ भी दिया गया है।

आज के दौर में जिन विषयों पर चर्चा करना भी पाप माना जाता है और उनकी कल्पना या उपस्थिति को अपराध समझा जाता है ऐसे सभी क्रियाकलाप अतीत में उपस्थित थे। किन्नर, समलैंगिकता, असामान्य यौन प्रवृत्ति, असामयिक यौन प्रवृत्ति आदि की बातों को सहजता के साथ प्रस्तुत किया गया है। राम जिन्होंने हिजड़ों को भी अपने राज्य में शामिल किया, विष्णु जिन्होंने असुरों को सबक सिखाने के लिए मोहनी का रूप लिया, काली जिन्होंने गोपियों के साथ नृत्य करने के लिए कृष्ण रूप धारण किया जैसी चमत्कारिक कहानियों का एक विशाल सागर है।

पुस्तक में कहानी की शुरुआत शिखण्डी नामक अतिपरिचित पात्र के साथ शुरू होती है। महाभारत का यह पात्र न तो स्त्री था न पुरुष। पुस्तक खुली मानसिकता के साथ वीर्य, कामुकता, यौन आचरण के विषय में चर्चा होती है परंतु किसी भी प्रकार की अश्लीलता का प्रदर्शन नहीं होता है। जीवन में अनेकों उतार-चढ़ाव आते है और उनके साथ कैसे निबाह करना है यह इसमें अच्छी तरह बताया गया है। यह पुस्तक शानदार और रोचक कहानियों से भरी हुई है जिसका रसास्वादन जरूर लेना चाहिए।


रविवार, 25 मार्च 2018

यूपी की फिज़ा


दूर-दूर तक फैला पठारी इलाका जिसमें पेड़ों की संख्या न तो बहुत ज्यादा है न ही बहुत कम। जमीन भी ऐसी कि कही थोड़े उंचे पहाड़ है तो कही समतल जमीन है। जहां समतल जमीन वहां जमीन के अंदर से स्वयंभू शिव की तरह निकली हुई चिमनियां है जिनसे धुआं तो नहीं निकल रहा लेकिन नीचे भट्टी में ईंट पक रही है। विन्ध्य की महक आने लगी है। बेशक यह यूपी है। मध्यप्रदेश के उत्तरी भाग को पार करते ही यूपी का दक्षिणी छोर कुछ इसी प्रकार दिखाई देता है। यह गंगा का मैदान का दक्षिणी भाग भी है।

यूपी कहे या उत्तरप्रदेश या उत्तमप्रदेश सभी तो श्रेष्ठ है। यदि ऐसा कहा जाए कि राज्यों में सर्वश्रेष्ठ या यूं कहे राज्यों का राजा। मैंने उत्तर प्रदेश  की यात्रा कई बार की है और हर बार मैंने यहां कुछ नया ही पाया है। हवा में घुली पेडे की मिठास हो या अध्यात्म की हवन वेदी से उठती खुशबू हो सभी कुछ तन-मन को उत्साहित कर देती है। इलाहाबाद की धरा पर कदम रखने का सौभाग्य कई बार मिला परंतु पहले उस फिज़ा में घुली ताज़गी का आनंद नहीं लिया जो इस बार मिला है। इलाहाबाद कोई आम जगह नहीं है यह तो सभी जानते है।

पूर्वांचल का सबसे प्रमुख शहर जिसके बिना पूर्वांचल की कल्पना पूरी नहीं हो सकती है। गंगा और यमुना का संगम तो पहले भी कई बार देखा है लेकिन इस इसमें कुछ नयापन देखने को मिला। यमुना नदी का श्याम जल हो या गंगा नदी का हरित जल इस बार इसमें कुछ नयापन है। हिमालय से मां गंगा और यमुना के द्वारा लाई गई रेत एक नए संसार का निर्माण कर रही है। संगम के जल में जाते हाथ केवल कंकण स्नान के लिए ही नहीं बल्कि अर्घ्य के लिए भी उठते है। तेज बहाव वाली गंगा हो या शांत यमुना दोनों श्रद्धालुओं को उतना ही मौका दे रही है जितना वे चाहते हैं।

श्रद्धा के दीपक आज कुछ अलग ही छटा बिखेर रहे हैं। फूलों की लड़ी हो या नावों का जमावड़ा सब कुछ देखा हुआ है फिर भी अनोखा है। बरसों पहले जब पहली बार आया था तब भी किले की दीवार यूं ही सीना ताने खड़ी थी और आज भी लेकिन इनकी रंगत में चटकपन-सा आ गया है। लाई बताशा की सजी दुकाने हो या फूलों से सजे दौने, पंडों की मडई हो या गोताखोरी की टोली नया न होते हुए भी कुछ अलग है। पानी की लहरों पर गोता खाते गोताखोर हो या पानी में उतरते नौसिखिया सब पहले भी तो देखा है लेकिन इस बार अंदाज अलग लग रहा है।

नाव का कालिंदी की लहरों के साथ कलाबाजियां करना हो या मछलियों का पैरों को छूकर जाना पहले भी देखा है लेकिन ऐसी अनुभूति पहली बार हुई है। संगम के जल को छूकर तन को छूती पवन से पहले भी कई बार सुखमय अनुभूति हुई है लेकिन इस बार इसमें कुछ शीतलता ज्यादा ही है। रेत के टीले पर दूर-दूर तक आशा का दीपक पहले भी दीप्तमान थे आज भी हैं। साइबेरियन गल्स होवर की उड़ान और पानी में खेल तो कई देखा है परंतु इनकी अठखेलियां में कुछ आज अनोखा पन है।

इलाहाबाद कोई मुसाफिरों का शहर नहीं है बल्कि यह तो शांति से अपने अंदाज में जीने वालों का शहर है। इस शहर को पहले भी कई बार देखा है लेकिन इसमें नयापन पहली बार देखा है।

📃BY_vinaykushwaha


सोमवार, 19 मार्च 2018

गांव चलें हम


शहर में रहकर गांवों की कल्पना करना बेमानी ही है। मैं तो यह मानता हूं कि जिस प्रकार एक घर छोटी-छोटी ईंटों से मिलकर बनता है ठीक उसी प्रकार एक देश गांवों से मिलकर बनता है। गांव और शहर को अलग-अलग इकाईयां कहना सही नहीं होगा क्योंकि गांव से ही शहर का निर्माण होता है। दोनों मिलकर देश का निर्माण करते हैं। जिन्होंने कभी गांव नहीं देखा उन्हें यह देखना जरूरी है कि जीवन को दूसरे तरीकों से कैसे जीया जाता है। शहर की भागदौड़ भरी जिंदगी में कही वह पल खो जाता है जो ग्रामीण परिवेश में लोग खुलकर जीते हैं।

मेरा अपना अनुभव यह रहा है कि गांव जैसा बेहतर कोई स्थान नहीं होता है। जहां पारिवारिक मूल्य को समझा जाता जिसके कारण संयुक्त परिवार का उदाहरण आज भी देखने को मिलता है। जीवन को जीने की कला समस्याएं होने के बाद भी तनाव और विषाद से मुक्त होकर मस्त रहना। गांव में प्रदूषण से मुक्त वातावरण में रहकर जिस प्रकार की आप अनुभूति आप प्राप्त करते हैं शहर में तो इसकी कल्पना करना भी असंभव है। मिलावट नाम के शब्द की गांवों में कोई जगह नहीं है चाहे सबंधों की बात करें या दैनिक संसाधनों की। सभी कुछ शुद्ध रहता है। गांव ही वो जगह है जहां मंदिरों की परम्परा आज भी जीवित है।

बैतूल जिले के हिवरखेड़ी गांव में रहकर मैं इतना तो बता ही सकता हूं कि ग्रामीण परिवेश शहरी परिवेश से सर्वश्रेष्ठ है। गांव के परिवेश ने मेरा तो मन मोह लिया। जीवन के असली संघर्ष को देखना है तो गांव के दर्शन के बिना संभव नहीं है। चौपाए का चलते-चलते धूल उड़ाना सूर्य के प्रकाश में ऐसा लगता है कि किसी ने  सोने के चूर्ण को हवा में फेंक दिया हो। गांव की सुबह की तुलना तो परमआनंद के साथ ही हो सकती है। सूर्यास्त से पूर्व क्षितिज में छाई लालिमा और पक्षियों का चहचहाना सुबह को शानदार बना देता है। रास्ते पर खेलते नन्हें मुन्ने बचपन सड़क के सूनेपन को खत्म कर देता है। साइकिल के घूमते पहिए मानो ऐसा लगता है कि विश्व को घुमाने वाले हो। ट्रेक्टर की घड़घड़ाती  आवाज अच्छी तो नहीं परंतु गांव का फील देती है।

हल्की धुंध भरी सुबह जिसमें मनमोहक खुशबू और ज्यादा रोमांचक बना देती है। खप्पर और कबेलु वाले घर से निकलता चूल्हें का धुआं संकेत देता है कि खाना पक रहा है। चूल्हें में लकड़ी और कंडे की आंच पर पके खाने की बात ही क्या कहना यदि उस पर गुड़ वाली चाय मिल जाए तो सोने पर सुहागा हो जाता है। घी में डूबी रोटी या गक्कड़ को गुड़ के साथ खाने का अपना अलग ही मजा है। शुद्ध गन्ने का रस हो या गन्ने के रस से बनी खीर हो सब कुछ लाजबाव है। गांव की एक थाली शहर की सौ थाली के बराबर होती है कम से कम मेरा स्वाद तो यही कहता है।

महुआ की खुशबू हो या धूप तापते महुआ दोनों की अपनी ही चमक है। कच्ची कैरी का हरापन हो या पकी इमली का खट्टापन दोनों मुंह में पानी ला देने वाला ही है। गन्ना की मिठास हो या हरे चने का हल्का खट्टापन भूक को बढ़ाने वाले है। खेत में लहलहाती सोने जैसी गेहूं की बालियां अपनी ओर आकर्षित करती हैं। गगनचुम्बी पेड़ हो या भुट्टे के छोटे पौधे हो मन को मोह लेने वाले हैं।

ग्रामीण जीवन की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि यहां सभी लोग मिलकर रहते है। सुख-दु:ख का बंटवारा करते हैं। व्यवहार की बात की जाए तो गांव वाले इस मामले में अव्वल नज़र आते हैं। पड़ोसी से लेकर बाहरी व्यक्ति से ठीक उसी प्रकार बोलचाल, खान-पान , रहन-सहन होता है जिस प्रकार घर वालों के साथ होता है। असलियत में अतिथि देवो भव को गांव वाले ही सार्थक करते है। आवभगत में इनका कोई सानी नहीं है। भले ही आपकी भाषा को कम जानते हो परंतु वे आपकी मदद करने के लिए तत्पर रहते है। जब बात आती है भोजन की तो वे पहले अतिथि के लिए भोजन की व्यवस्था करते हैं फिर स्वयं की पेट पूजा करते हैं। यदि गांवों में पीने के लिए पानी भी दिया जाता है तो इतने सम्मान से दिया जाता है कि उस पानी में भी शरबत का स्वाद आता है।

गोबर से लिपे-पुते घरों में भले ही आधुनिकता प्रवेश कर गई हो परंतु अभी भी शहरी और ग्रामीण जीवन में लाख गुने का अंतर है। छुई की किनारी और गोबर से लिपे फर्श की जगह भले ही सीमेंट से बने फर्श ने ले ली हो परंतु अभी भी शीतलता का आनंद बरकरार है। पटौंहा की जगह भले ही रैक ने ले ली हो फिर भी राहत बरकरार है। भले ही छानी वाली छत की जगह सीमेंटेड छत ने ले ली हो परंतु अभी भी वो छाया बरकरार है। मांडना का आकार छोटा हो गया हो या रंगोली की आकृति में बदलाव आया हो परंतु सुंदरता बरकरार है। शहनाई की आवाज अभी भी सुनाई देती है क्योंकि यह गांव है।

कपड़ों की शालीनता तो गांव से सीखना चाहिए उनकी तो मजबूरी है फटे कपड़े पहनना जो शहरों में फैशन बन गया है। संस्कृति के सच्चे वाहक तो गांव वाले ही है जो कि संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाते हैं। कुएं का शीतल जल हो या छूले के नारंगी फूल अतिअनांद देने वाले है। बारी में लगी सब्जियां हो या मिश्रित फसल का दृश्य अनोखा होता है। दूर-दूर तक फैले खेत को देखकर मानों ऐसा लगता है जैसे बस निहारते रहो। धन्य हो गांव, धन्य।

📃BY_vinaykushwa


शनिवार, 17 मार्च 2018

अनुभूति : गांव चलें हम (तृतीय दिवस)


अनुभूति : गांव चलें हम कार्यक्रम हिवरखेड़ी में तीसरे  दिन की शुरुआत बड़ी जोरदार हुई। अन्य दो दिन की तरह यह तीसरा दिन भी रोमांचित और शिक्षित करने वाला है। तीसरे दिन की शुरुआत योग और प्राणायाम से हुई। माननीय अभिषेक पांडेय और मुकेश चौरासे सर के निर्देशन में यह संभव हुआ। प्राणायाम एवं योग के बाद  कुछ समय का विराम लिया गया। सुबह प्राणायाम और योग के बाद बौद्धिक हुआ।

बौद्धिक के माध्यम से टीम को प्रोत्साहित किया गया। बौद्धिक के पश्चात् थोड़ा विराम लिया गया। बौद्धिक के पश्चात् सायंकाल में नुक्कड़ नाटक का आयोजन किया गया। नुक्कड़ नाटक के माध्यम से गांव में शिक्षा को प्रोत्साहन की बात किया गया। गांव में गली-गली जाकर नुक्कड़ नाटक के माध्यम से लोगों को जागरुक किया ।

नुक्कड़ नाटक के पश्चात् भोजनावकाश टीम के सदस्यों के बीच अनुभव को साझा किया गया। दिन भर में हुई सारी गतिविधियों के अनुभव एक-दूसरे से साझा किए गए। इसी तरह तीसरे दिन की समाप्ति हुई।


शुक्रवार, 16 मार्च 2018

अनुभूति : गांव चलें हम (द्वितीय दिवस)


16 मार्च दिन शुक्रवार को अनुभूति : गांव चलें हम का दूसरा दिवस शुरु हुआ। दूसरे दिवस की शुरुआत सुबह प्रभातफेरी से शुरु हुई। प्रभातफेरी में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविधालय भोपाल की बालक वर्ग की टीम ने हिवरखेड़ी गांव का भ्रमण किया। प्रभातफेरी में टीम ने सारे गांव में भ्रमण कर गांव में अपने गीत के स्वर से समां को गुंजायमान कर दिया। प्रभातफेरी के बाद बौद्धिक के माध्यम से टीम को विभिन्न विषयों पर जागरुक किया गया।

बौद्धिक के बाद टीम ने गांव का दौरा किया जिसमें घर-घर जाकर विभिन्न मुद्दों पर बात की। इन मुद्दों में रहन-सहन, सामाजिक-आर्थिक परिस्थिति, सरकारी योजनाओं, सांस्कृतिक विषयों पर राय ली गई। गरीबों और अमीरों में भेद न करते हुए सभी से उनकी दैनिक दिनचर्या से लेकर शैक्षिक और राजनैतिक विषय पर राय लिया गया

गांव भ्रमण के बाद टीम ने हिवरखेड़ी के समीप स्थित गांव चौकी का भ्रमण किया। हिवरखेड़ी से चौकी तक पैदल चलकर गांव के वातावरण को महसूस किया गया। चौकी गांव पहुंचकर वहां के लोगों के बारे में जाना  और वहां की शैक्षिक, आर्थिक, सामाजिक, व्यासायिक, सांस्कृतिक संबंधी आंकड़ों को इकट्ठा किया गया।

दिन के अंतर्गत में अनुभव साझा करने के बाद इस कार्यक्रम का समापन किया गया।


गुरुवार, 15 मार्च 2018

अनुभूति : गांव चलें हम


शहरी विद्यार्थियों को गांव की जीवन शैली से अवगत कराने के लिए विकासार्थ विद्यार्थी द्वारा एक कार्यक्रम का आयोजन कराया जा रहा है जिसका नाम है अनुभूति : गांव चलें हम। इस कार्यक्रम में कॉलेज और विश्वविधालय में अध्ययनरत विद्यार्थियों को गांवों का दर्शन कराया जाना है। इसका मुख्य उद्देश्य  ग्रामीण दर्शन है। यह कार्यक्रम 15-18 मार्च 2018 को मध्यप्रदेश के विभिन्न जिलों के गांवों में आयोजित किए जा रहा है। विद्यार्थियों को ऐसे गांव में ले जाया जा रहा है जो उनके जिले का ना हो।

इस कार्यक्रम का उद्देश्य केवल ग्रामीण व्यवस्था से अवगत कराना ही नहीं बल्कि वहां के लोग को जानना भी है। इसके तहत गांव के लोगों से मिलना, वहां की परिस्थितियां से अवगत होना और साथ ही वहां के पारिस्थितिकी के बारे में जानना भी है। कॉलेज या विश्वविधालय से विद्यार्थियों की टीम किसी गांव जाएंगी और विभिन्न प्रकार की गतिविधियों में भाग लेगी। इन गतिविधियों में सांस्कृतिक, सर्वेक्षण, प्रभात फेरी, बौद्धिक आदि शामिल है।

ऐसा ही एक कार्यक्रम बैतूल जिले के गांव भडूस और हिवरखेड़ी में सम्पन्न होने जा रहा है। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविधालय भोपाल की दो टीम बालक और बालिका का चयन हुआ। बालकों की टीम का यह कार्यक्रम हिवरखेड़ी में शुरु हुआ। इस कार्यक्रम की शुरुआत 15 मार्च को परिचय से शुरू हुआ और संध्याकाल में बौद्धिक के साथ सम्पन्न हुआ। यह कार्यक्रम 15-18 मार्च तक होगा।