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सोमवार, 19 मार्च 2018

गांव चलें हम


शहर में रहकर गांवों की कल्पना करना बेमानी ही है। मैं तो यह मानता हूं कि जिस प्रकार एक घर छोटी-छोटी ईंटों से मिलकर बनता है ठीक उसी प्रकार एक देश गांवों से मिलकर बनता है। गांव और शहर को अलग-अलग इकाईयां कहना सही नहीं होगा क्योंकि गांव से ही शहर का निर्माण होता है। दोनों मिलकर देश का निर्माण करते हैं। जिन्होंने कभी गांव नहीं देखा उन्हें यह देखना जरूरी है कि जीवन को दूसरे तरीकों से कैसे जीया जाता है। शहर की भागदौड़ भरी जिंदगी में कही वह पल खो जाता है जो ग्रामीण परिवेश में लोग खुलकर जीते हैं।

मेरा अपना अनुभव यह रहा है कि गांव जैसा बेहतर कोई स्थान नहीं होता है। जहां पारिवारिक मूल्य को समझा जाता जिसके कारण संयुक्त परिवार का उदाहरण आज भी देखने को मिलता है। जीवन को जीने की कला समस्याएं होने के बाद भी तनाव और विषाद से मुक्त होकर मस्त रहना। गांव में प्रदूषण से मुक्त वातावरण में रहकर जिस प्रकार की आप अनुभूति आप प्राप्त करते हैं शहर में तो इसकी कल्पना करना भी असंभव है। मिलावट नाम के शब्द की गांवों में कोई जगह नहीं है चाहे सबंधों की बात करें या दैनिक संसाधनों की। सभी कुछ शुद्ध रहता है। गांव ही वो जगह है जहां मंदिरों की परम्परा आज भी जीवित है।

बैतूल जिले के हिवरखेड़ी गांव में रहकर मैं इतना तो बता ही सकता हूं कि ग्रामीण परिवेश शहरी परिवेश से सर्वश्रेष्ठ है। गांव के परिवेश ने मेरा तो मन मोह लिया। जीवन के असली संघर्ष को देखना है तो गांव के दर्शन के बिना संभव नहीं है। चौपाए का चलते-चलते धूल उड़ाना सूर्य के प्रकाश में ऐसा लगता है कि किसी ने  सोने के चूर्ण को हवा में फेंक दिया हो। गांव की सुबह की तुलना तो परमआनंद के साथ ही हो सकती है। सूर्यास्त से पूर्व क्षितिज में छाई लालिमा और पक्षियों का चहचहाना सुबह को शानदार बना देता है। रास्ते पर खेलते नन्हें मुन्ने बचपन सड़क के सूनेपन को खत्म कर देता है। साइकिल के घूमते पहिए मानो ऐसा लगता है कि विश्व को घुमाने वाले हो। ट्रेक्टर की घड़घड़ाती  आवाज अच्छी तो नहीं परंतु गांव का फील देती है।

हल्की धुंध भरी सुबह जिसमें मनमोहक खुशबू और ज्यादा रोमांचक बना देती है। खप्पर और कबेलु वाले घर से निकलता चूल्हें का धुआं संकेत देता है कि खाना पक रहा है। चूल्हें में लकड़ी और कंडे की आंच पर पके खाने की बात ही क्या कहना यदि उस पर गुड़ वाली चाय मिल जाए तो सोने पर सुहागा हो जाता है। घी में डूबी रोटी या गक्कड़ को गुड़ के साथ खाने का अपना अलग ही मजा है। शुद्ध गन्ने का रस हो या गन्ने के रस से बनी खीर हो सब कुछ लाजबाव है। गांव की एक थाली शहर की सौ थाली के बराबर होती है कम से कम मेरा स्वाद तो यही कहता है।

महुआ की खुशबू हो या धूप तापते महुआ दोनों की अपनी ही चमक है। कच्ची कैरी का हरापन हो या पकी इमली का खट्टापन दोनों मुंह में पानी ला देने वाला ही है। गन्ना की मिठास हो या हरे चने का हल्का खट्टापन भूक को बढ़ाने वाले है। खेत में लहलहाती सोने जैसी गेहूं की बालियां अपनी ओर आकर्षित करती हैं। गगनचुम्बी पेड़ हो या भुट्टे के छोटे पौधे हो मन को मोह लेने वाले हैं।

ग्रामीण जीवन की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि यहां सभी लोग मिलकर रहते है। सुख-दु:ख का बंटवारा करते हैं। व्यवहार की बात की जाए तो गांव वाले इस मामले में अव्वल नज़र आते हैं। पड़ोसी से लेकर बाहरी व्यक्ति से ठीक उसी प्रकार बोलचाल, खान-पान , रहन-सहन होता है जिस प्रकार घर वालों के साथ होता है। असलियत में अतिथि देवो भव को गांव वाले ही सार्थक करते है। आवभगत में इनका कोई सानी नहीं है। भले ही आपकी भाषा को कम जानते हो परंतु वे आपकी मदद करने के लिए तत्पर रहते है। जब बात आती है भोजन की तो वे पहले अतिथि के लिए भोजन की व्यवस्था करते हैं फिर स्वयं की पेट पूजा करते हैं। यदि गांवों में पीने के लिए पानी भी दिया जाता है तो इतने सम्मान से दिया जाता है कि उस पानी में भी शरबत का स्वाद आता है।

गोबर से लिपे-पुते घरों में भले ही आधुनिकता प्रवेश कर गई हो परंतु अभी भी शहरी और ग्रामीण जीवन में लाख गुने का अंतर है। छुई की किनारी और गोबर से लिपे फर्श की जगह भले ही सीमेंट से बने फर्श ने ले ली हो परंतु अभी भी शीतलता का आनंद बरकरार है। पटौंहा की जगह भले ही रैक ने ले ली हो फिर भी राहत बरकरार है। भले ही छानी वाली छत की जगह सीमेंटेड छत ने ले ली हो परंतु अभी भी वो छाया बरकरार है। मांडना का आकार छोटा हो गया हो या रंगोली की आकृति में बदलाव आया हो परंतु सुंदरता बरकरार है। शहनाई की आवाज अभी भी सुनाई देती है क्योंकि यह गांव है।

कपड़ों की शालीनता तो गांव से सीखना चाहिए उनकी तो मजबूरी है फटे कपड़े पहनना जो शहरों में फैशन बन गया है। संस्कृति के सच्चे वाहक तो गांव वाले ही है जो कि संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाते हैं। कुएं का शीतल जल हो या छूले के नारंगी फूल अतिअनांद देने वाले है। बारी में लगी सब्जियां हो या मिश्रित फसल का दृश्य अनोखा होता है। दूर-दूर तक फैले खेत को देखकर मानों ऐसा लगता है जैसे बस निहारते रहो। धन्य हो गांव, धन्य।

📃BY_vinaykushwa