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गुरुवार, 13 अगस्त 2020

चलते - चलते ( श्रृंखला 5 )

यायावरी का अपना ही मजा होता है , कहाँ जाना है ? क्या करना हैं ? कुछ जानकारी नहीं होती हैं । रास्ता चाहे धूल से भरा हो , चाहे उबड़ खाबड़ , चाहे चिकना सपाट हो , बस चलते जाना है । चाहे बारिश का मौसम हो या बादलों से घिरा आसमां , बस घूमना ही उद्देश्य होता है । दोस्तों का साथ हो या ना हो बस घूमना ,घूमना , घूमना ....
                                    जब दोस्त भी यायावर मिल जाये तो फिर क्या पता काफिला कहा रुकेगा , किसी को भी नहीं पता । मनोरंजन , अल्हडपन , रोमांच , मौज - मजा , मस्ती सब कुछ होता है । यहां ज्ञान की बात करना मना होता है क्योकि ज्ञान यायावरी में दाल में कंकड़ की तरह होता है । चाय की चुस्की हो या पेटीस का स्वाद सब कुछ निराला लगता । बारिश की बौछार किसानों से लेकर सरकार तक को खुश कर देती है और यायावरों के लिए तो मानो सोने पर सुहागा हो ।
                                                              जिंदगी एक यात्रा की तरह है जिसमें सदैव चलते जाना ही काम है रुके तो समझो कुछ खो दिया । यायावरी भी कोह-ए- फिजा से शुरु होती हैं और दिलखुशाबाग होते हुए अशोका गार्डन पहुँच जाती है । मैं जिस यायावरी की बात कर रहा हूँ उसमें सिद्धार्थ , इंद्रभूषण और विनय शामिल हैं । जाना कहां है ? किसी को कुछ नहीं पता ,  केवल तीनों इतना जानते हैं कि घूमना है । सफर की शुरुआत एमपी नगर की चाय से होते हुए बड़ी झील के किनारे - किनारे चलते हुए वन विहार पहुंच जाती है। वन विहार के गेट पर ताले को देखकर हमें पता चल गया कि हमारी ठौर यहां नहीं है , अभी और उड़ना है ।
                                                                जाना था डीबी मॉल और हो लिये भोजपुर मंदिर के लिए । माता मंदिर होते हुए हमारा काफिला होशंगाबाद रोड़ पर चलता गया ग्यारह मील होते हुए चौराहे पर जाकर अटक गया मतलब प्लान चेंज । अब चले हम भीमबेटिका की ओर । मंडीदीप की धुंआ उगलती चिमनियों को पीछे छोड़ते हुए हम औबेदुल्लागंज होते हुए भीमबेटिका रॉक शेल्टर पहुंचे । यहां पहुंचने पर पता चला कि गेट बंद हो चुके है मतलब शटर डाउन । यहां आने पर पता चला कि बाघ नामक जीव होता है जिसे देखने पर इंसान भागता है इसलिए हमने " भागों बाघ आया " नारा बना दिया ।
                                       यायावरों का सफर इतनी जल्दी कैसे खत्म हो सकता है , हमने तय किया कि हम भोजपुर चलेगें । औबेदुल्लागंज होते हुए गौहरगंज के रास्ते हमारा सफर मुरुम और अधबनी सड़क पर चलते हुए हम भोजपुर जा पहुंचे। यहां अँधेरी रात उतनी ही भयावह लग रही थी जितना की सपने में ऊँचाई से गिरना । भले ही यायावर कही रुके या नहीं परंतु काफिला थोड़ा विराम तो लेता ही है और रचना नगर में डिनर के बाद प्रभात चौराहे पर अलविदा हुए कि फिर मिलते है । 

              यही तो यायावरी है ।                     
         

पुस्तक समीक्षा : मैं भारत हूं

        


        सप्त सुरों का बहता सरगम
                           पाञ्चजन्य का घोष हूं।
        अखिल विश्व का कल्याण करती
                          मां भगवतगीता का उद्घोष हूं।
         मैं भारत हूं , भाग्य विधाता हूं।।

यह पंक्तियां है "मैं भारत हूं" नामक काव्य संग्रह की है। इस कविता संग्रह को लोकेन्द्र सिंह जी ने लिखा है। प्रकाशन का कार्य संदर्भ प्रकाशन ने किया है। यह काव्य संग्रह केवल कविताओं का ही नहीं बल्कि भावनाओं, संवेदनाओं और अभिव्यक्ति का भी संग्रह है। कुल 42 कविताओं को इस संग्रह में शामिल किया गया है। इस काव्य संग्रह में विभिन्न मुद्दों पर लिखी कविताओं का संकलन है।

देशभक्ति,जनचेतना, देश प्रेम जैसे विषयों पर भी कविताओं को प्रमुखता दी गई हैं। कुछ विषयों पर यहां उदाहरण प्रस्तुत है। महान भारत के बारे में एक सुंदर कविता लिखी है जिसकी कुछ यहां पंक्तियां प्रस्तुत है:-

नक्सलवाद से छलनी/देखा है ह्रदय उसका
स्वसंतान के कारण उठे प्रश्नों में उलझते देखा है।
फिर भी, प्रति क्षण उसकी चमकती आंखों में
विश्व गुरु बनने का सपना भी देखा है
परम पूजनीयता के साथ
देखा है उसे प्रशस्त कर्मपथ पर बढ़ते हुए।

देह को झकझोर देने वाली देशभक्ति परक कविता के अलावा कवि ने सामाजिक ताने-बाने पर भी कविता लिखी है जिसमें मां पर लिखी कविता के अंश यहां लिख रहा हूं:-

लुका-छिपी के खेल में
जब तू छिप जाती है।
हवा में घुली तेरी खुशबू
मुझको तेरा पता बताती है।
मां तू जादू की पुड़िया है।
तेरा प्यार सबसे बढ़िया है।

मां जैसे मार्मिक विषय पर कविता लिखने के अलावा कवि ने अपने काव्य संग्रह में सामाजिक अन्याय जैसे भ्रूण हत्या पर भी कविता को शामिल किया है। जिसके अंश यहां प्रस्तुत है:-

सृष्टि की निरंतरता हेतु रणचण्डी बनकर
काल के क्रूर पंजों से मां मुझे बचा लो।

कवि ने यहां समाज में हो रहे अन्याय को उजगार करने की कोशिश की है जो कविता के माध्यम से साफ-साफ झलकता है। ऐसा कम ही होता है कि कोई अपने काव्य संग्रह में पिता को जगह दे लेकिन इस संग्रह में पिता जगह प्राप्त करने में सफल रहे है। पिता विषय पर कविता के कुछ भाग प्रस्तुत है:-

पिता पेड़ है बरगद का
सुकून मिलता है उसकी
छांव में
मुसीबत की भले बारिश हो
कोई डर नहीं , वो छत है
घर में।

पिता के अलावा इस कविता संग्रह में विभिन्न विषयों पर आधारित कविताओं का संग्रह है। सामाजिक बुराई जैसे भ्रष्टाचार जैसे गंभीर मुद्दों पर भी कविता लिखी है। गांव से लेकर शहर तक , रिश्तों से लेकर दोस्ती तक हर विषय पर कविता लिखकर अपने विचार प्रस्तुत किए है। चाहे प्रकृति हो या भारत माता का वर्णन करना हो सभी नपे-तुले शब्दों में कविता के माध्यम से वर्णन किया गया है।

काव्य संग्रह की भाषा की बात करें तो भाषा सरल,सहज है। कविता को सूक्ष्मता के साथ परोसा गया है। कविता की तारतम्यता बनी रहती है जो कि पाठक को आनंद प्रदान करती है। इस संग्रह में हिंदी के अलावा उर्दू, देशज, इंग्लिश आदि शब्दों को आसानी से पढ़ा जा सकता है। कही-कही कठिन शब्दों का प्रयोग किया गया है परंतु शब्दों को समझने में कोई कठिनाई नहीं आती है। वीर,करुण,रौद्र,वात्सल्य आदि रसों को प्रधानता दी गई है।

सभी विषयों को एक माला में पिरोता हुआ यह काव्य संग्रह बहुत ही आनंददायक है । एक बार जरूर पढ़ना चाहिए।

📃BY_vinaykushwaha


वैशाली


26 जनवरी 2018 को भारत अपना 69 वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। गणतंत्र दिवस का यह त्यौहार 25 जनवरी की शाम राष्ट्रपति का देश के नाम संबोधन से शुरु होकर 26 जनवरी को राजपथ की परेड से होता हुआ 28 जनवरी की शाम विजय चौक पर बीटिंग द रिट्रीट के माध्यम से खत्म होता है। गणतंत्र दिवस एक राष्ट्रीय दिवस है जिसे हम बड़ी धूमधाम से मनाते है। यह गणतंत्र दिवस हमें यह याद दिलाता है कि हम भारत गणराज्य के नागरिक है।

किसी भी राष्ट्र की शासन एवं प्रशासन व्यवस्था चलाने के लिए उस राष्ट्र को एक पद्धति अपनानी पड़ती है। जो पद्धति हिटलर ने जर्मनी में अपनाई थी वो है तानाशाही। ऐसी राज्य व्यवस्था जहां केवल एक ही व्यक्ति की सत्ता कायम रहे उसे सर्वसत्तावाद (Totalitarianism) कहते है जिसमें हमें जोसेफ स्टालिन, हिटलर, मुसोलिनी जैसे शासक ध्यान में आते हैं। संघीय व्यवस्था(federalism) जिसमें राज्यों से मिलकर संघ या देश का निर्माण होता है जैसे संयुक्त राष्ट्र अमेरिका(USA)। जहां किसी देश में वहां के नागरिकों द्वारा देश की सरकार चुनी जाती है तो उसे लोकतंत्र (democracy) कहते है जैसे भारत। कई ऐसे देश भी है जहां लोकतंत्र तो है परंतु गणतंत्र नहीं है अर्थात् देश का आम नागरिक चुनाव के माध्यम से देश की सर्वोच्च पद को प्राप्त नहीं करता है। जैसे इंग्लैण्ड , यहां सर्वोच्च पद पर राजशाही परिवार का कोई व्यक्ति होता है। कई ऐसे देश भी है जहां एक ही परिवार के सदस्य मिलकर देश की शासन व्यवस्था को संभालते है इसे राजतंत्र (monarchy) कहते है। यह राजतंत्र व्यवस्था सउदी अरेबिया,कुवैत,ब्रुनई,कतर आदि देश है।

लोकतंत्र(democracy) एक ऐसा तंत्र है जिसमें देश के नागरिक देश की सरकार को चुनते है। लोकतंत्र एक प्राचीन व्यवस्था से आया है राजतंत्र जिसकी प्राथमिक सीढ़ी थी। लोकतंत्र कई प्रकार से होता है दो पार्टी या मल्टीपार्टी सिस्टम। केन्द्र सरकार का अलग चुनाव और राज्य सरकार का अलग चुनाव। कई ऐसे भी देश होते है जहां एक पार्टी पद्धति(single party system) है, जैसे चीन। भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य (democratic republic) है। भारत के अलावा अमेरिका आदि देश है। 26 जनवरी 1950 को भारत को गणराज्य के रुप में स्वीकारा गया। लेकिन आज से लगभग 3500 वर्ष पूर्व जब महाजनपद व्यवस्था थी। तब वज्जि महाजनपद में गणशासन व्यवस्था थी।

सोलह महाजनपद के समय वज्जि एक शक्तिशाली महाजनपद था। यह आज के समय में देखा जाए तो बिहार का हाजीपुर, वैशाली जिले आदि वाला भाग है। वैशाली को दुनिया का सबसे पुराना गणराज्य कहा जाता है। यहां जो राजा चुना जाता था उसे जनता में से ही चुना जाता था। वैशाली नगर वासियों का एक अहम योगदान था सरकार चुनने में। वैशाली , वज्जि महाजनपद की राजधानी थी। यह मात्र राजधानी ही नहीं बल्कि सत्ता का केन्द्र बिंदु था। ज्ञात स्त्रोतों के अनुसार वैशाली में लगभग 7707 सांसद चुने जाते थे जो कि अपना मुख्य सर्वेसर्वा चुनते थे। दुनिया का सबसे पुराना गणराज्य यदि भारत को कहा जाए तो इसमें कोई बहस नहीं होना चाहिए।

                          ।।जय हिंद।।

📃BY_vinaykushwaha


चलते-चलते (श्रृंखला 9)


तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध के बाद पेशवाओं को निष्कासित होकर बिठुर जाना पड़ा। महाराष्ट्र से उत्तर भारत जाना उनकी इच्छा नहीं थी बल्कि उन्हें मजबूरी में ऐसा करना पड़ा। पेशवाओं की इस हालत के पीछे सबसे बड़ा कारण यह था कि आपसी सामंजस्य न होना था। बडौदा में गायकवाड़, महेश्वर और इंदौर में होलकर, नागपुर में भोंसले और ग्वालियर में सिंधिया का अलग होकर शासन चलाना ही था। शासन चलाना तो ठीक था लेकिन अंग्रेजों की नीतियों का समर्थन करना साथ ही उनकी गलत नीतियों और कार्यों का जमकर समर्थन भी किया गया।होलकर,सिंधिया,भोंसले और गायकवाड़ में कुछ राजा या रानी तो बहुत अच्छे हुए जिन्होंने जनता के हित और देश को सर्वोपरि समझा। तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध , कई युद्धों का परिणाम था। जिनमें से एक युद्ध था 'भीमा-कोरेगांव युद्ध'।

भीमा-कोरेगांव युद्ध भीमा नदी के तट  पर हुआ बहुत ही छोटा युद्ध था। यह युद्ध अंग्रेजों और पेशवाओं के बीच हुआ था जबकि यह अधूरा सत्य है। अंग्रेजों के तरफ से यह युद्ध महार जाति की ओर से लड़ा गया और पेशवाओं की ओर से अरबी लड़ाकों ने इस युद्ध को लड़ा। इतिहासकार यह कहते है कि इस युद्ध में अंग्रेजों की विजय हुई और आज तक इसी बात को सत्य माना जाता है। इसी विजय के उपलक्ष्य में महार जाति के लोग मराठाओं पर अपनी विजय को शान के रुप में दिखाते और प्रत्येक वर्ष सालगिरह के रुप में मनाते हैं।

मैं नहीं मानता कि भीमा-कोरेगांव युद्ध अंग्रेजों ने जीता था जिसके पीछे एक अंग्रेज अफसर का कथन बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है। माउंटस्टुआर्ट एलफिंस्टन ने इस युद्ध के बारे में कहा कि यह मराठाओं की अंग्रेजी शासन के विरुद्ध छोटी-सी जीत है। इस कथन का क्या पर्याय निकाला जा सकता है। जब कोरेगांव का युद्ध हुआ तब पेशवाओं के ओर 5000 सैनिकों और एक तोप ने हिस्सा लिया जबकि अंग्रेजों के ओर से 700 सैनिकों और 5 तोपों ने हिस्सा लिया। यह आंकड़ा गलत भी है या सही भी  है क्योंकि इसका सही-सही आंकड़ा तत्कालीन ब्रिटिश गजेटियर में भी नहीं है।

एक बात है जिसमें अंग्रेज हुकूमत सफल हो गई वह यह कि उन्होंने निम्न जाति के लोगों को रियायत और शह देकर महार और मराठो के बीच विद्रोह करा दिया। यह बात अलग है कि मराठाओं ने महारों के साथ सभ्य व्यवहार नहीं किया। महार जाति के लोग जब बाजार में निकलते थे तो कमर पर झाडू और मुहं के पास बर्तन बांधकर निकलना पड़ता। उनकी जिंदगी दुरुह थी।

1857 की क्रांति में जब महार जाति ने जमकर देश के समर्थन में युद्ध किया तो अंग्रेजों ने इनका तिरस्कार करना शुरु कर दिया और सेना में केवल सैनिक पद तक ही सीमित कर दिया। महार रेजिमेंट आज भारतीय सेना में एक महत्वपूर्ण रेजिमेंट है जो कि उन देश भक्तों के कारण है जो कि ब्रिटिश हुकूमत के सामने नहीं झुके।अंग्रेजों ने महारों का उपयोग उन्हीं के बंधुओं को मारने के लिए किया। इससे यह सिद्ध तो होता है कि अंग्रेज केवल फूट पैदा करना चाहते थे। यह युद्ध तो जाति ने जीता न अंग्रेजों ने ना ही मराठों ने।


हिंदी या बिंदी

        

कुछ दिनों पहले लोकसभा में हमारे देश की विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज और कांग्रेस के जाने-माने नेता शशि थरुर के बीच इस बात को लेकर बहस हो गई कि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ में अधिकारिक भाषा बनाना चाहिए कि नहीं। 2014 में जब एनडीए नीत  नरेन्द्र मोदी सरकार आई तो निर्णय लिया कि सरकार विदेशी मंचों पर हिंदी भाषा का प्रयोग करेगी और जहां तक संभव होगा सरकारी कामकाज में भी हिंदी भाषा का उपयोग करेगी। संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को अधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने के लिए एनडीए सरकार ने भरसक प्रयास किया है और कर रही है। इस पूरी प्रक्रिया में एक सबसे बड़ी समस्या है कि अधिकारिक भाषा के लिए सभी सदस्य देशों को लागत वहन करना पड़ता है। इसी बात के कारण पेंच अटका हुआ है।

लागत वहन करना ही नहीं भाषा आधारित बोझ बढ़ना भी एक बहुत बड़ी समस्या है जिसके कारण कई देश इस प्रक्रिया को पूर्ण नहीं होने देना चाहते। रुस जो हमारा मित्र देश कहा जाता है उसने भी संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में यह स्वीकार किया है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में अधिकारिक भाषा बढ़ने से कार्य बढ़ जाएगा। परिषद में भाषा-रुपांतर का कार्य भी बढ़ जाएगा साथ ही लागत वहन भी। भाषा को उनकी संख्या के आधार पर अधिकारिक भाषा घोषित नहीं किया गया बल्कि प्रभाव के आधार पर। अभी संयुक्त राष्ट्र संघ में छह भाषाएं इंग्लिश, फ्रेंच, अरेबिक, रसियन, मंडारिन,और स्पेनिच है लेकिन इंग्लिश और फ्रेंच ही सभी अधिकारिक कार्य किए जाते है। यदि संख्या के लिहाज से कहा जाए तो हिंदी विश्व की चौथी सबसे बड़ी भाषा है और रसियन,फ्रेंच और अरेबिक से भी बड़ी भाषा है।

भारत में भी हिंदी को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। 2010 में गुजरात हाईकोर्ट ने हिंदी भाषा के विषय में एक याचिका पर सुनवाई करते हुए, यह निर्णय दिया कि  हिंदी भारत की अधिकारिक भाषा नहीं है। इसका इस्तेमाल सरकारी कामकाज के रुप में किया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 343 में राजभाषा का दर्जा दिया है और हिंदी और इंग्लिश को सरकारी भाषा में उपयोग करने की बात कही गई है। राज्यों को अपनी अधिकारिक और सरकारी कामकाज करने के लिए स्वयं भाषा चुनने का अधिकार है। हिंदी न केवल भारत में बल्कि नेपाल, यूएसए, यूके, फिजी, गुएना, त्रिनिदाद, सूरीनाम, मॉरिशस आदि देशों में बोली जाती है। हिंदुस्तानी के रुप में हिंदी तो अफगानिस्तान, पाकिस्तान, मालद्वीप आदि देशों में समझी और बोली जाती है। विश्व में हिन्दी बोलने वालों  की कुल संख्या लगभग 292 मिलियन है। फिजी, गुएना, सूरीनाम, मॉरिशस में तो हिंदी को अधिकारिक भाषा के रुप में स्वीकारा गया है।

शशि थरुर जी ने सदन में यह कहा कि यदि भविष्य कोई व्यक्ति यदि दक्षिण भारत से प्रधानमंत्री बनेगा तो वह अपनी मातृभाषा में संवाद करेगा। शशि जी बहुत विद्वान व्यक्ति है मैं उनकी बात को नहीं काट सकता। लेकिन मैं शशि जी को यह बताना चाहता हूं वर्तमान प्रधानमंत्री गुजरात से है और उनकी मातृभाषा गुजराती है। फिर भी वे भारत और विदेशी मंचों पर संवाद के लिए हिंदी भाषा का उपयोग करते है। वैसे प्रधानमंत्री भारत के किसी भी कोने से बने उसे संवाद करने लिए इंग्लिश या हिंदी को ही चुनना पड़ेगा चाहे उनकी मातृभाषा कुछ भी हो। भारत की लगभग 50 करोड़ आबादी हिंदी लिखती, पढ़ती और बोलती है।

हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की अधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने के लिए बहुत कार्य करने होगें। सर्वप्रथम उन देशों को मनाना पड़ेगा जो सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्य देश है। चीन और रुस को खासकर क्योंकि चीन भारत का विश्व मंच पर सबसे बड़ा विरोधी देश है और रुस को इसलिए भी क्योंकि भारत जब से अमेरिका के करीबी मित्रों में शुमार हो गया है तब से रुस के दोस्ताने में परिवर्तन आ गया है। दूसरा, हमें उन देशों को एक मत करना होगा जिन देशों में हिंदी आम बोलचाल या अधिकारिक रुप से उपयोग की जाती है और लागत वहन करने पर एकजुट करना। तीसरा, सभी संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों को हिंदी को अधिकारिक भाषा बनाने के लिए एक मंच पर लेकर आना और जहां तक संभव हो कूटनीतिक ताकत का सहारा लेना।

हिंदी , संस्कृत भाषा से बनी एक प्यारी सी भाषा जिसे बचाए रखना और अगली पीढ़ी तक पहुंचाना जरुरी है। 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस घोषित करने या मनाने से हिंदी की सार्थकता पूर्ण नहीं होती है।

                           ।।जय हिंद।।

📃BY_vinaykushwaha


चलते-चलते (श्रृंखला 8)

         

एक रेस्टॉरेंट में मां अपने बच्चे से कहती है कि बेटा गिलास में वाटर है जल्दी पिओ। वही उसके दूसरे दिन एक टीचर अपने छात्रों से कहती है कि talk in English otherwise I will punish all of you. यह सब क्या हो रहा है। माना कि इंग्लिश बहुत जरुरी है परंतु मजबूरी तो नही है। बच्चे की प्रथम पाठशाला बच्चे की मां होती है। यदि मां ही अपने बच्चे को बचपन से ही अंग्रेजीनुमा हिंदी सिखाएंगी तो क्या होगा उस बच्चे के विवेक का? वह तो केवल अंग्रेजी की चकाचौंध में गुम हो जाएगा और हिंदी को भुलाता जाएगा। धीरे-धीरे वह हिंदी को तुच्छ भाषा के रूप में समझने लगेगा। प्रथम पाठशाला से लेकर आखिरी पाठशाला जब सभी इंग्लिश से युक्त हो जाएगें तब निष्कर्ष आपको पता है।

हमारी मानसिकता आज इंग्लिश वाली हो गई है जो केवल इंग्लिश में  सोचने, बोलने और लिखने के लिए विवश करती है। आज का बच्चा प्राथमिक से ही या कहे तो प्ले स्कूल से ही इंग्लिश के माहौल में धकेल दिया जाता है या चला जाता है और घर में भी माहौल इंग्लिश वाला ही रहता है। समाचारपत्र, टीवी चैनल, किताबें, मैग्जीन, रेडियो चैनल आदि सबकुछ इंग्लिशमय हो गया है। इंग्लिश आज भारतीय मानसिकता में इस तरह घर कर गई है कि बिना इसके कुछ संभव ही न हो। मानाकि आज का दौर इंग्लिश वाला है। इंग्लिश एक अंतर्राष्ट्रीय भाषा बन चुकी है। चाहे व्यापार हो, शिक्षा हो, मनोरंजन हो आदि सभी जगह इंग्लिश ने अपने पैर पसार लिए है या हम यूं कह सकते है कि इंग्लिश अन्य भाषाओं के लिए बाधक बन गई है।

मैं तो केवल इतनी बात अच्छी तरह जानता हूं कि वही देश तरक्की कर सकता है जो अपनी मातृभाषा का सम्मान करता है। हम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसके कई उदाहरण देख सकते है। इजरायल ने हिब्रू को अपनी राष्ट्रभाषा स्वीकार की और आज अपनी भाषा को ताकत बनाकर बुलंदियों के शिखर पर काबिज है। इजरायल की तरह रूस, जर्मनी, जापान, फ्रांस आदि देशों ने भाषा के बल पर विकास किया जाता है,यह सिद्ध कर दिखाया है। चीन आज दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। मंडारिन भाषा को चीन ने अपनी पहचान बना ली और मंडारिन आज दुनिया की सबसे बड़ी सांकेतिक भाषा है। हिंदी दुनिया की चौथी सर्वाधिक बोले जाने वाली भाषा है, इस पर हमें गर्व होना चाहिए। विश्व में हिन्दी बोलने वालों की संख्या लगभग 70 करोड़ है। हिन्दी भारत में ही नहीं मॉरिशस, गुएना, सेशेल्स आदि देशों में प्रमुखता से बोली जाती है। यूएन में आधिकारिक भाषा के रूप में हिन्दी को दर्ज कराने का प्रयास जारी है।

मानाकि भारत भाषाओं का देश है लेकिन हिंदी माध्यम भाषा की भूमिका अदा करती है। हिंदी की लिपि देवनागरी कई अन्य भाषाओं जैसे गुजराती, मराठी आदि में प्रयोग हो रही है। हिंदी एक समृद्ध भाषा होने के पीछे एक सतत् प्रक्रिया है जिसमें हमें आज की हिंदी दिखाई देती है।

समृद्ध हिन्दी को स्वीकार करने में क्या परेशानी है? आज यदि हम अपनी भावी पीढ़ी को हिन्दी और अपनी मातृभाषा के प्रति जागरुक नहीं करते है तो वे उस ज्ञान से वंचित हो जाएंगे। हिन्दी के जागरुकता के साथ-साथ प्रचार-प्रसार की जरुरत भी है। देश के सभी नागरिक की यह जिम्मेदारी बनती है कि हम अपनी मातृभाषा के प्रति सजग और जिज्ञासु बनें।

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मध्यप्रदेश


1 नबम्वर 1956 को जब एक राज्य अस्तित्व में आया जिसका नाम पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 'मध्यप्रदेश' रखा। सी पी और बरार से मध्यप्रदेश बन गया। आठ जिले महाराष्ट्र राज्य को दे दिया गया और सुनैल टप्पा तहसील  राजस्थान को दे दिया गया और सिरोंज तहसील को मध्यप्रदेश में मिला लिया गया और बन गया मध्यप्रदेश। मध्यप्रदेश का एक बार फिर से गठन किया गया और 1नबम्वर 2000 को मध्यप्रदेश के बरार वाले हिस्से को अलग करके एक नया राज्य बना दिया गया जिसका नाम था 'छत्तीसगढ'। कभी मध्यप्रदेश की गिनती सबसे बड़े राज्य में होती थी और आज दूसरे सबसे बड़े राज्य के रूप में होती है।

मध्यप्रदेश भारत के दिल में बसा हुआ है जो भारत के लिए धड़कता है। मध्यप्रदेश का कण-कण भारत के निर्माण में निस्वार्थ भाव से लगा हुआ है। मध्यप्रदेश के जन-जन की यही भावना है कि 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' और 'एक मध्यप्रदेश, श्रेष्ठ मध्यप्रदेश'। प्राकृतिक संपदा से परिपूर्ण यह राज्य भारत को और भी ज्यादा खूबसूरत बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। विन्ध्याचल, सतपुडा , मैैकल आदि पर्वतश्रृंखलाएं भारत की इस धरा को सम्पन्न करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। मध्यप्रदेश की वन संपदा जो भारत में सर्वाधिक है, भारत की सुंदरता में चार चांद लगा रही है।

मध्यप्रदेश को नदियों का मायका कहा जाता है। भारत में सर्वाधिक नदियों का उद्गम स्थल मध्यप्रदेश में है। मध्यप्रदेश की लगभग 350 नदियां लगभग भारत की 15 करोड़ आबादी को पोषित कर रहीं है। भारत की सबसे पवित्र नदी और शिवतनया, शांकरी , मैकलसुता, रेवा, नामोदास आदि नामों से विख्यात नर्मदा करोड़ो लोगों को पोषित भी कर रही है और मां की तरह दुलार भी दे रही है। नर्मदा, चंबल, सोन, बेतवा, ताप्ती, माही, केन आदि नदियां पर बने बांध करोड़ो लोगों की आशा का सफलता सूचकांक है। गांधीसागर, ओंकारेश्वर, इंदिरासागर, हलाली, मांधाता, राजघाट, बाणसागर बांध मध्यप्रदेश के साथ-साथ देश के अनेक राज्यों को जगमग कर रहे हैं और साथ ही साथ खेतों को सिंचित भी कर रहे हैं।

मध्यप्रदेश का इतिहास कोई हजार साल पुराना नहीं है यह तो लगभग एक लाख साल पुराना है। यह तो भीमबेटिका के शैलाश्रय स्वयं ही प्रमाणित करते है। भारत में इंसान के अस्तित्व की सर्वप्रथम प्रमाणिकता भी मध्यप्रदेश में नर्मदा तट में ही देखने मिलती है। बुद्ध के उपदेश और उनकी शिक्षा की जानकारी हमें सांची, भरहुत(सतना), कसरावद के स्तूपों से मिलती है। भारत की सबसे पवित्र और पुरातन नगरी में से एक उज्जैन अपने वैभव से आज तक भारत को पल्लवित कर रहा है। महाकाल की नगरी उज्जैयिनी आज भी भस्म की भीनीं सुगंध से सुरभित हो रही है। बेतवा नदी के तट पर स्थित ओरछा अपने एकमात्र राम को राजा के रुप में समर्पित मंदिर को रुप में विख्यात है। खजुराहों को कौन नहीं जानता जिसकी स्थापत्य कला का आजतक कोई तोड़ नहीं है। धुंआधार जलप्रपात जिसका कोई सानी ही नहीं है। महेश्वर, ओंकारेश्वर, चंदेरी, मांडू, अमरकंटक, मैहर, उदयगिरि, भोजपुर, बाघ की गुफाएं आदि अनेक स्थान मध्यप्रदेश को श्रेष्ठ बना रहे है।

रुपनाथ(कटनी) और गुर्जरा(दतिया)आज सम्राट अशोक की गवाही देता है। मध्यप्रदेश के इतिहास में कई राजा रजवाड़ों का हाथ रहा है। मौर्य, गुप्त, शुंग, राष्ट्रकूट, पल्लव, चंदेल, चौहान, कल्चुरी, गौंड, मराठा, सिंधिया, होल्कर और मुगलों का योगदान रहा हैं। कई शहरों को बसाया तो कई स्मारक बनाई । अलग-अलग शैली की स्थापत्य कला की सहायता से संरचनाओं में जान फूंकने की कोशिश की है।

मध्यप्रदेश की धरा भारत के लिए है और इसका एक-एक कण मातृभूमि के लिए समर्पित है।
जय मध्यप्रदेश, जय भारत

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