भारत की रज का कण-कण भी भारत माता की जय बोलता हैं जिसका साक्षात उदाहरण भोपाल में नवनिर्मित शौर्य स्मारक हैं । शौर्य स्मारक भारत के उन सपूतों के लिए हैं जिन्होंने अपने प्राण भारत की आन, बान और शान की बलि वेदी पर न्यौछावर कर दिये । शौर्य स्मारक का निर्माण केवल सैनिक का जीवन दिखाने के लिए नहीं है बल्कि यह आमजन को भी जोडता हैं ।
शौर्य स्मारक का निर्माण अरेरा हिल्स पर किया गया है, जिसकी लागत लगभग41करोड़ हैं जो लगभग 13 एकड़ भूमि पर फैला हुआ है । यह स्मारक भारत का एकमात्र सैनिकों को समर्पित स्मारक है । इस स्मारक में कई संरचनायें हैं जो अदभुत एवम् अद्वितीय हैं ।
सबसे पहले मुख्य प्रवेश द्वार के बायें ओर खुला रंगमंच तथा कैफ़ेटेरिया है तथा दाईं ओर मुख्य संरचना हैं । मुख्य संरचना में सर्वप्रथम शौर्य वीथी में प्रवेश करते हैं,जिसकी शुरूआत एक गैलरी से होती हैं ,जिसके एक ओर दीवार पर भारत का इतिहास है जो हमें महाभारत काल से लेकर आजादी प्राप्त होने तक के दर्शन करा रही है तथा दूसरी ओर की दीवार पर राष्ट्रभक्ति की कवितायें पढ़ने मिलती हैं । शौर्य वीथी में आगे जाने पर हमें अपने ध्वज का स्वरूप देखने मिलता है कि कैसे और कितने बदलाव आये जिनकी प्रदर्शनी देखने योग्य हैं । तीनों सेनाओं के प्रमुख अर्थात भारत के प्रथम व्यक्ति राष्ट्रपति के चित्रों की प्रदर्शनी शोभायमान हैं जिसमें डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद से लेकर वर्तमान राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी है । थोड़ा आगे बढ़ने पर तीनों सेनाओं नौसेना, थलसेना और वायुसेना तीनों के प्रमुखों के चित्रों की प्रदर्शनी लगी है ।
शौर्य वीथी में रणक्षेत्र को भी दर्शाया गया है जहाँ आसमान में हेलीकाप्टर और लड़ाकू विमानों को उडते हुए दिखाया गया है, वही रेगिस्तान में टैंको को अभ्यास करता दिखाया गया और समुद्र में जहाजों और एयरक्राफ्ट कैरियर को रणक्षेत्र में तरते हुए दिखाया गया है । शौर्य वीथी में शून्य डिग्री रूम भी है जो हमें सियाचिन में सैनिकों के योगदान को ध्यान दिलाता है । शौर्य वीथी में सबसे अनोखी बात यह थी कि मध्यप्रदेश के शहीद जवानो के गाँवों से मिट्टी को एक पात्र में इकटठा किया गया है जिसके कण - कण को शहीद के समान माना गया है ।
शौर्य वीथी से बाहर आने पर हम जीवन(LIFE) नामक संरचना में प्रवेश करते है, जिसका वातावरण बेहद ही शांत है । यह संरचना चौकोर बनी हुई है जिसमें चारों ओर सीढ़ियां बनी हुई हैं जो जीवन उतार -चढ़ाव को दर्शाती हैं । हरी घास सुख के पलो को और बहता हुआ जल सदैव आगे बढ़ने का मार्ग दिखलाता है । इसी प्रकार का जीवन सैनिक का भी है और आमजन का भी ।
जीवन(LIFE) नामक संरचना से आगे बढ़ने पर युद्ध का मंच ( THEATRE OF WAR ) नामक संरचना आती है जोकि सैनिकों के जीवन में आई शत्रु चुनौतियों को दिखलाता हैं । इस संरचना को गोलाकार बनाया गया है तथा प्राकृतिक वस्तुओं का प्रयोग किया गया है । इस संरचना में लाल प्रकाश का प्रयोग किया गया है जो युद्ध की विभीषिका को प्रदर्शित करता हैं ।
युद्ध पर विजय पाने वालों को बहादुर तथा युद्ध करते - करते प्राण न्यौछावर करने वाले को शहीद कहा जाता है, इसी से जुड़ी है अगली संरचना जिसका नाम है मृत्यु (DEATH ) । मृत्यु सभी व्यक्तियों की अंतिम सीढ़ी है । मृत्यु पर विजय वही व्यक्ति पा सकता है जिसने देश के लिए कुछ किया हो जैसे सैनिक इनका जीवन मृत्यु पर विजय पा लेता है जिसे संरचना के माध्यम से दर्शाया जिसमें जलता हुई ट्यूब को आकाश की ओर दिखाया गया ।
शौर्य स्मारक में इन संरचनाओं के अलावा बगीचा भी जिसमें भाँति -भाँति के पेड़ पौधे हैं । एक स्मारक है जिसे एक ओर से देखने पर रक्त की बूँद तथा दूसरी ओर से देखने पर बंदर दिखाई देता है । गुलाबों के बगीचे से होकर आगे जाने पर सामने आता है 62 फुट लंबा स्मारक जिसके आधार पर पानी भरा हुआ है जिसे नौसेना की संज्ञा दी गई है । काले ग्रेनाइट को थलसेना तथा सफेद ग्रेनाइट को वायुसेना की संज्ञा दी गई है । स्मारक के बिल्कुल सामने अमर जवान ज्योति जल रही हैं जिसे अत्याधुनिक तकनीक होलोग्राफिक से जलाया जा रहा है । स्मारक के बाई ओर उल्टी बंदूकों पर टोपियाँ रखी हुई हैं तथा दाई ओर बूट और पीछे ग्लास प्लास्क पर मध्यप्रदेश के शहीद जवानों के नाम लिखें हुए हैं ।
यहीं हैं हमारा पहला शौर्य स्मारक ।
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गुरुवार, 13 अगस्त 2020
शौर्य का स्मारक
चलते - चलते ( श्रृंखला 5 )
यायावरी का अपना ही मजा होता है , कहाँ जाना है ? क्या करना हैं ? कुछ जानकारी नहीं होती हैं । रास्ता चाहे धूल से भरा हो , चाहे उबड़ खाबड़ , चाहे चिकना सपाट हो , बस चलते जाना है । चाहे बारिश का मौसम हो या बादलों से घिरा आसमां , बस घूमना ही उद्देश्य होता है । दोस्तों का साथ हो या ना हो बस घूमना ,घूमना , घूमना ....
जब दोस्त भी यायावर मिल जाये तो फिर क्या पता काफिला कहा रुकेगा , किसी को भी नहीं पता । मनोरंजन , अल्हडपन , रोमांच , मौज - मजा , मस्ती सब कुछ होता है । यहां ज्ञान की बात करना मना होता है क्योकि ज्ञान यायावरी में दाल में कंकड़ की तरह होता है । चाय की चुस्की हो या पेटीस का स्वाद सब कुछ निराला लगता । बारिश की बौछार किसानों से लेकर सरकार तक को खुश कर देती है और यायावरों के लिए तो मानो सोने पर सुहागा हो ।
जिंदगी एक यात्रा की तरह है जिसमें सदैव चलते जाना ही काम है रुके तो समझो कुछ खो दिया । यायावरी भी कोह-ए- फिजा से शुरु होती हैं और दिलखुशाबाग होते हुए अशोका गार्डन पहुँच जाती है । मैं जिस यायावरी की बात कर रहा हूँ उसमें सिद्धार्थ , इंद्रभूषण और विनय शामिल हैं । जाना कहां है ? किसी को कुछ नहीं पता , केवल तीनों इतना जानते हैं कि घूमना है । सफर की शुरुआत एमपी नगर की चाय से होते हुए बड़ी झील के किनारे - किनारे चलते हुए वन विहार पहुंच जाती है। वन विहार के गेट पर ताले को देखकर हमें पता चल गया कि हमारी ठौर यहां नहीं है , अभी और उड़ना है ।
जाना था डीबी मॉल और हो लिये भोजपुर मंदिर के लिए । माता मंदिर होते हुए हमारा काफिला होशंगाबाद रोड़ पर चलता गया ग्यारह मील होते हुए चौराहे पर जाकर अटक गया मतलब प्लान चेंज । अब चले हम भीमबेटिका की ओर । मंडीदीप की धुंआ उगलती चिमनियों को पीछे छोड़ते हुए हम औबेदुल्लागंज होते हुए भीमबेटिका रॉक शेल्टर पहुंचे । यहां पहुंचने पर पता चला कि गेट बंद हो चुके है मतलब शटर डाउन । यहां आने पर पता चला कि बाघ नामक जीव होता है जिसे देखने पर इंसान भागता है इसलिए हमने " भागों बाघ आया " नारा बना दिया ।
यायावरों का सफर इतनी जल्दी कैसे खत्म हो सकता है , हमने तय किया कि हम भोजपुर चलेगें । औबेदुल्लागंज होते हुए गौहरगंज के रास्ते हमारा सफर मुरुम और अधबनी सड़क पर चलते हुए हम भोजपुर जा पहुंचे। यहां अँधेरी रात उतनी ही भयावह लग रही थी जितना की सपने में ऊँचाई से गिरना । भले ही यायावर कही रुके या नहीं परंतु काफिला थोड़ा विराम तो लेता ही है और रचना नगर में डिनर के बाद प्रभात चौराहे पर अलविदा हुए कि फिर मिलते है ।
यही तो यायावरी है ।