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गुरुवार, 13 अगस्त 2020

भारतीय वास्तुकला (श्रृंखला - एक )

 भारत का इतिहास  लगभग 5000 वर्ष पुराना है। सिंधु घाटी की सभ्यता से लेकर आज तक कई प्रकार के बदलाव हो चुके हैं। खान-पान, वेशभूषा, रहन-सहन और स्थापत्य कला आदि सब कुछ बदल चुका है। स्थापत्य कला में सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर आज तक कई बदलाव हो चुके है। जहां सिंधु घाटी सभ्यता एक सुनियोजित नगरीय व्यवस्था थी वही वैदिक सभ्यता ग्रामीण व्यवस्था थी। कई दौर से गुजरते हुए स्थापत्य कला ने कई तरीके से विकास किया। हिंदु , मुस्लिम, मिश्रित, गोथिक आदि शैली में भवनों का निर्माण भारत में हुआ।

भारत में स्थापत्य कला का विकास  ईसा से 3500 वर्ष पूर्व शुरु हो गया था। सिंधु घाटी सभ्यता भारत की ही नहीं विश्व की सबसे प्राचीन और समृद्ध सभ्यताओं में से एक है। यह सभ्यता भारत के पश्चमोत्तर क्षेत्र में फैली थी। इस सभ्यता में लोगों के रोजगार का मुख्य स्त्रोत व्यापार था और यह व्यापार मिस्त्र, ईरान, मेसोपोटामिया आदि जगह अर्थात् पूरे विश्व में था। सबसे बड़ी बात तो यह थी कि नगरीय सभ्यता होने के कारण आज के जैसे जल निकास व्यवस्था, सड़कें, जल प्रबंधन, अन्नागार आदि थे।

सिंधु घाटी सभ्यता में नगर की स्थापना में एक मुख्य बात को ध्यान रखा जाता था संभ्रांत लोगों के रहने के लिए  और आमजन के रहने के लिए अलग-अलग स्थान तय थे। संभ्रांत लोग ऊंची पहाड़ी पर महल नुमा आकृति के घर में रहते थे जो चारों ओर दीवार से घिरा होता था। आमजन एक निचले क्षेत्र में रहते थे। इनके मकानों में भव्यता नहीं होती थी और इनका रहवासी क्षेत्र दीवार से घिरा नहीं होता था। कई स्थानों पर इस प्रकार की व्यवस्था भी थी कि संभ्रांत और आमजन दोनों के घर दीवार से युक्त थे। घर एक मंजिल और दो मंजिल तक के होते थे। नीचे वाली मंजिल से ऊपर जाने के लिए सीढ़ियां भी बनाई जाती थी। घरों का निर्माण पकी हुई ईंटों से किया जाता था।

घरों से निकलने वाले गंदे पानी के लिए नाली की व्यवस्था की गई थी। पेय जल की उत्तम व्यवस्था की गई थी। लोथल इसका शानदार उदाहरण है जहां आज भी उस समय के साक्ष्य मौजूद है। कुओं के माध्यम से पेय जल उपलब्ध कराया जाता था। उत्खनन (excavation) में एक विशाल स्नानागार का पता चला जो कि सामूहिक स्नान के लिए प्रयुक्त किया जाता होगा।

नगर विन्यास की सबसे अच्छी बात यह थी कि सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती है। छोटी सड़के बड़ी सड़को में आकर मिलती थी। घरों के दरवाजें मुख्य सड़क की ओर न खुलकर दूसरी तरफ खुलते थे। उत्खनन (excavation) से एक विशाल अन्नागार की खोज की गई जो अनाज आदि रखने के लिए प्रयुक्त होता था। व्यापार करने के लिए नदी-गोदी( rever port) का निर्माण किया था जो कि अपने आप में एक अद्वितीय उदाहरण है। सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान विभिन्न देवी-देवता के पूजन का उल्लेख मिलता है परंतु मंदिर का कोई नामोनिशान नहीं मिलता।

उपरोक्त वर्णन से हम समझ सकते है कि भारत की भवन निर्माण शैली कितनी समृद्ध और विकसित है। आज से  लगभग 5000 साल पहले भी इतना समृद्ध होना लाजबाव है।

इसी तरह पढ़ते रहिए भारत में स्थापत्य कला का विकास कैसे हुआ। आगे आने वाले पोस्ट में 

📃BY_ vinaykushwaha


सुप्रसिद्ध वक्ता : विजय अग्रवाल



'जिस काम में हमारी रुचि होती है उस काम को करने में हमें समय का पता नहीं चलता और जो काम हमें बोझ लगता है तो उसे पूर्ण करने में एक-एक सेकेण्ड बहुत भारी होता है।' यह कहना है डॉ विजय अग्रवाल का। आज भारत में डॉ विजय अग्रवाल का नाम कौन नहीं जानता एक प्रभावी वक्ता के रूप में उन्होंने सभी वर्ग के लोगों को प्रभावित किया है। छत्तीसगढ़ में जन्में विजय अग्रवाल बतौर एक दुकानदार के रूप में करियर की शुरुआत की और अपने अथक प्रयासों और परिश्रम से आईएएस बने। डॉ विजय अग्रवाल एक प्रभावी वक्ता है जिन्होंने जीवन प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण विषय पर किताबों और उद्बोधन के जरिए लोगों को समय का महत्व बताया है।

डॉ विजय अग्रवाल ने कई पुस्तकें लिखी जिनके माध्यम से उन्होने समाज को दर्पण दिखाने की बात कही है। 'समय आपकी मुट्ठी में', आप आईएएस कैसे बनेंगे आदि पुस्तकों ने लोगों के बीच जगह बनाई है। आप आईएएस कैसे बनेंगे जैसी पुस्तक ने सिविल सर्विस के प्रति रूझान रखने वाले लोगों के बीच महत्वपूर्ण जगह बनाई है। स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर विजय अग्रवाल ने भारत भ्रमण कर लोगो को और देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में समय प्रबंधन पर उद्बोधन देकर लोगों को जागरुक बनाने की कोशिश की है। 

'Manage yourself, time will be managed' कहना है डॉ विजय अग्रवाल का। यदि आप खुद को व्यवस्थित रखते है तो समय स्वयं ही प्रबंधित हो जाएगा। समय प्रबंधन करने का इससे बढ़िया तरीका कुछ भी नहीं हो सकता है। विजय अग्रवाल कहते है कि जब तक आप खुद नहीं चाहते तब तक आप समय प्रबंधन नहीं कर सकते हैं।

समय का विश्लेषण करना असंभव है क्योंकि अदृश्य चीजों के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त करना कठिन होता है। डॉ विजय अग्रवाल ने उज्जैन में स्थापित शिवलिंग को महाकाल क्यों कहा जाता है? यह प्रश्न उठाया और उसका जबाव देते हुए कहते है जो समय  से भी महान है, उसे महाकाल कहा जाता है। जिस प्रकार सूर्य प्रत्येक दिन उदय और अस्त होता है उसी प्रकार समय भी अग्रसर होता है ठहरता नहीं है।

समय प्रबंधन तभी सफल होगा जबकि आप किसी भी कार्य को समर्पण और पूरे तन-मन से काम करते हैं। आपको यह जरुरी है कि आप जिस भी काम को हाथ में ले उसे पूरा करने का प्रयास करें और उसे नई ऊंचाईयों तक ले जाना का प्रयास करें। जिस प्रकार सूर्य और पृथ्वी वही काम करते नही ऊबते ठीक उसी प्रकार हमें भी नहीं ऊबना चाहिए  और अपने कार्य के प्रति समर्पण और सम्मान रखते हुए काम अंजाम तक पहुंचाना चाहिए। यह कहना डॉ विजय अग्रवाल का। 

ज्ञान का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि मात्र 'जानना' ज्ञान का मतलब (knowledge should be apply) ज्ञान को किसी काम के लिए उपयोगी बनाया जाए वह ज्ञान है। समय रहते किस प्रकार ज्ञान का प्रयोग करें यही समय प्रबंधन है।

जिस प्रकार ज्ञानयोग,भक्तियोग और कर्मयोग से मिलकर समययोग बनता है। समययोग को सीधे सरल शब्दों में कहा जा सकता है 'beyond the time' अर्थात् जो समय से परे है वही 'समययोग' है।

(माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविधालय भोपाल के सत्रारंभ समारोह 2017 के दौरान डॉ विजय अग्रवाल के उद्बोधन का कुछ अंश )




  


 

अनथक कलमयोद्धा : मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के महान पत्रकार


कुछ दिनों पूर्व मैं एक किताब पढ़ रहा था। जिसमें पत्रकारों के वास्तविक जीवन के बारे में प्रकाश ड़ाला गया है। किस प्रकार आज के दौर के पत्रकार आजादी से पूर्व , तत्समय और आजादी के बाद वाले पत्रकार से कितने भिन्न थे। उनका तन-मन-धन सब कुछ देश के लिए समर्पित था। अपनी पत्रकारिता वे देश के नाम किया करते थे। देशभक्ति से सराबोर होकर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया करते थे। ब्रिटिश काल में जब पत्रकारिता पर तमाम तरह की पाबंदियां लगाई गई थी तब भी वे अपने घर-परिवार की चिंता न करते हुए समाचार पत्रों और मैग्जीन आदि का प्रकाशन किया और इसी कारण उन्हें जेल जाना पड़ा। कुछ ऐसे ही भारत के महान पत्रकारों के बारे में बताया गया है पुस्तक "अनथक कलमयोद्धा" में।

"अनथक कलमयोद्धा" पुस्तक का प्रकाशन विश्व संवाद केन्द्र भोपाल के द्वारा संपादक लोकेन्द्र सिंह जी  और मंयक चतुर्वेदी जी के मार्गदर्शन में हुआ। यह पुस्तक मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के विलक्षण प्रतिभा के धनी और पत्रकारिता में निपुण पत्रकारों को समर्पित है। आजादी की लड़ाई में आंदोलन के माध्यम से ही नहीं अपनी कलम के द्वारा अंग्रेजी हुकूमत को हिलाकर रख दिया। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के पत्रकारों ने केवल समाचार पत्रों और मैग्जीन के सहारे ही नहीं बल्कि देशभक्ति से ओतप्रोत साहित्य का सृजन करके लोगों के बीच जागरुकता फैलाई।

माखनलाल चतुर्वेदी जी के द्वारा लिखी गई 'पुष्प की अभिलाषा' कविता हो या कर्मवीर नामक राष्ट्रीय दैनिक का संपादन। कविता, लेख, समाचार पत्र के सहारे माखनलाल चतुर्वेदी ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ बिगुल फूंक दिया था। छत्तीसगढ़ के महान साहित्यकार पदुमलाल पन्नालाल बक्शी को कौन भुला सकता है जिन्होंने साहित्य के साथ-साथ पत्रकारिता को देश सेवा का जरिया बनाया। विन्ध्यप्रदेश की पत्रकारिता के पुरोधा लाल बल्देव सिंह की बात करें तो वे केवल एक महान पत्रकार ही नहीं थे बल्कि सच्चाई का साथ देने वाले रीवा राज्य के सेनापति थे। "भारतभ्राता" नाम से समाचार पत्र का प्रकाशन किया और जनता के मुद्दों के साथ-साथ देश-विदेश की खबरों को प्रमुखता दी। पत्रकारिता की मर्यादा को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपने राज्य के विरुद्ध खबरों को छापा जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा।

एक सच्चे पत्रकार का प्रथम कर्तव्य क्या होता है? कि वह सच को उजगार करें और निष्पक्षता के साथ खबरों को छापें। "अनथक कलमयोद्धा" इसी प्रकार के कर्तव्यपरायणता की परिचायक है। चाहे वे अब्दुल गनी हो या प्रदेश में पहले हिंदी दैनिक के संपादक मास्टर बल्देव प्रसाद हो या बनवारी लाल बजाज या पं. भगवतीधर बाजपेई सभी ने अपना शत-प्रतिशत योगदान देकर पत्रकारिता और लेखन को समृद्ध बनाया है। पत्रकारिता और साहित्य के ऋषि कहे जाने वाले पं. माधवराव सप्रे जी ने पत्रकारिता के क्षेत्र में नए कीर्तिमान गढ़े हैं।

आज के दौर के पत्रकारों को यह सीखना अत्यावश्यक है कि खबरों के साथ-साथ देश प्रथम है न कि पैसा। इस किताब से तो यही जानकारी मिलती है कि पत्रकारिता जीवन का दूसरा पर्याय देशभक्ति से है। पत्रकार को सदा अपने विचारों और खबरों से सच्चाई के साथ देशभक्ति परक शिक्षा देना चाहिए। "अनथक कलमयोद्धा" महान पत्रकारों के बारे में तो यही बताती है। जो पत्रकार है या पत्रकारिता के छात्र है उन्हें कम से कम एक बार यह किताब जरुर पढ़ना चाहिए।

                           ।।जय हिंद।।

📃BY_ vinaykushwaha


नोबेल पुरस्कार विजेता श्री कैलाश सत्यार्थी

मैं जब भी विदिशा से भोपाल के बीच ट्रेन से आता जाता था तो कभी टिकिट नहीं लेता था लेकिन समय के साथ सब कुछ बदल गया और मैं समझ गया ऐसा नहीं करना चाहिए। यह कहना है शांति का नोबेल पुरस्कार 2014 जीतने वाले श्री कैलाश सत्यार्थी का। कैलाश सत्यार्थी भले ही एक महान हस्ती बन चुके है परंतु आज भी वे ऐसे वर्ग के प्रति संवेदना रखते है जो समाज में दबा-कुचला और पिछड़ा है। आज कैलाश सत्यार्थी को कौन नहीं जानता जिन्होंने बाल मजदूरी जैसे गंभीर विषय को विश्व पटल पर रखकर इसके प्रति ध्यानाकर्षण किया और यूएन समेत विश्व के लगभग सभी देशों को कानून बनाने के लिए प्रेरित किया। मध्यप्रदेश के एक छोटे से शहर विदिशा में पले बढ़े और अपनी शिक्षा को पूरा किया लेकिन नियति तो कुछ और ही चाहती थी। अध्यापन का कार्य छोड़कर 'संघर्ष जारी रहेगा' नामक पत्रिका की शुरुआत की।

कैलाश सत्यार्थी कहते है कि 'जब तक बेटा-बेटी अपने आप को सुरक्षित महसूस नहीं करते तब तक असली मायनों में आजादी नहीं मिली है।' उनका कहना है कि आजादी तभी पूर्ण रूप से सही मानी जा सकती है जबकि भयमुक्त और सुरक्षित भारत न बन जाए। सत्यार्थी जी ने बताया कि उन्होने एक संघर्ष  करके 36 बेटियों और मांओं को ऐसे समूह से छुड़ाया जो उन्हें वेश्यावृत्ति जैसे भंवर में ढ़केल रहे थे। इस घटना के दौरान संघर्ष जारी रहेगा पत्रिका को छोड़कर उन्होने इस प्रकार की घटना के खिलाफ झंड़ा बुलंद कर लिया और आंदोलन को तेज और सतत् बना दिया। पूरे विश्व में इस कुकृत्य के खिलाफ आवाज उठाकर यूएन समेत पूरे विश्व में मानव तस्करी और वेश्यावृत्ति के खिलाफ कानून बनवाने में सफल रहे। कैलाश सत्यार्थी बलात्कार जैसे गंभीर विषय को समाज के लिए अभिशाप बताते है और कहते है कि ' दुनिया के सारे नेता और धर्म गुरु सही से काम कर रहे होते और मार्गदर्शन कर रहे होते तो समाज की यह दुर्दशा नहीं होती।'

बचपन बचाओ आंदोलन के माध्यम से बच्चों को स्कूल तक पहुंचाने में मदद की। कैलाश सत्यार्थी कहते है कि समाज में बाल मजदूरी जैसी मानवाधिकार हनन वाली घटनाएं नहीं होना चाहिए।

पत्रकारिता के बारे में सत्यार्थी कहते है कि ' सत्य को ही लिखना और बोलना चाहिए चाहे वह टीवी पर हो या चाहे अखबार या रेडियों पर हो। आजकल का मीडिया टीआरपी ड्रिवन हो गया है जो नहीं होना चाहिए। समाज के पिछड़े लोगों की बातों को छोड़कर अश्लीलता का प्रसारण किया जा रहा है। यह सब परोसना मीडिया का लक्षण नहीं है। फ्लोअप रिपोर्ट करके कैसे लोगों को अधिकार दिलाया जाए इसकी जानकारी होनी चाहिए।'

कैलाश सत्यार्थी ने बताया कि 'जब मैं एक बार दिल्ली के पास स्थित बुराड़ी गांव में एक बच्ची का प्रवेश कराने ले गया तो वहां उपस्थित शिक्षक ने मुझे बुरी तरह चिल्लाकर भगा दिया तो मैंने मन में ठान लिया कि शिक्षा को मौलिक अधिकार में शामिल कराके रहूंगा। मैंने एक आंदोलन की शुरुआत कन्याकुमारी से शुरु की और विभिन्न राज्यों से होती हुई दिल्ली पहुंची। मेरी इस पहल को सभी दलों के सांसद, विधायक और मंत्रियों ने मेरा साथ दिया। अंतत: चार महीनें के अंदर सारा कार्य समाप्त हो गया।' कैलाश जी आगे कहते है कि 'एक साधारण व्यक्ति की ताकत दुनिया के कई राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बराबर होती है।'

भारत बदल रहा है, इसका कारण है भारत के लोग देश के लिए परिदृश्य तैयार कर रहे है। बहुत से लोग सोचते हैं कि युवा देश के लिए समस्या है। युवा देश के लिए समस्या नहीं समाधान है। जो आदर्शवादिता हमारे युवाओं में है वो बड़े लोगों में नहीं होती है। कैलाश सत्यार्थी आगे कहते है कि सरलता में जो ताकत है वो बनावट में नहीं बनावट में तो क्षणिक आनंद मिलता है लेकिन सरलता में तो स्थाई आनंद की प्राप्ति होती है।

' ताली बजाने वाले कभी इतिहास नहीं लिखते , बुराई करने कभी इतिहास नहीं लिखते , इतिहास तो वो लिखता है जो रिंग में कूदकर कुछ करके दिखाता है।'

( माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविधालय भोपाल के सत्रारंभ 2017 में श्री कैलाश सत्यार्थी के उद्बोधन का कुछ अंश)


योग

21जून 2017 को तीसरा विश्व योग दिवस मनाया गया। भारत सरकार के अथक प्रयासों से इसे भारतीय सीमा के बाहर ले जाया गया । आज लगभग 180 देश विश्व योग दिवस मना रहे है। चाहे वह मुस्लिम देश हो या इसाई या यहूदी हो या बौद्ध सभी ने योग को स्वीकारा है । योग के सहारे भारत विश्व में सॉफ्ट पावर के रूप में  उभर रहा है ।योग के स्वास्थ्यवर्द्धक लाभ बताकर देशों को योग के छत्र के नीचे लाया गया है।

योग क्या है? सभी ने इसकी अलग-अलग परिभाषा दी है ।कई लोग तो केवल इसे आध्यात्मिकता से जोड़ते है । कई लोग  शारीरिक और मानसिक संतुलन के रूप में देखते हैं। कई लोग इसे केवल शारीरिक व्यायाम के रूप में देखते हैं । कई लोग इसे शारीरिक क्रिया के माध्यम से मानसिक शांति प्राप्त करना तथा मानसिक शांति प्राप्त होने के बाद मोक्ष को प्राप्त करना ।

योग का मतलब होता है 'जोड़ना'। जोड़ने से तात्पर्य है कि तन को मन से जोड़ना । योग क्रिया नहीं है यह तो साधना है ।
'योगः चित्त-वृत्ति निरोधः'
योग का एक व्यापक अर्थ है, जिसे सूक्ष्म रूप से समझने की जरुरत है । गीता में वर्णित यह पंक्तियां -
'योगः कर्मसु कौशलम् '
अर्थात् कर्मों के योग से कुशलता प्राप्त होती है ।
'योगस्थः कुरू कर्माणि'
अर्थात् योग में रत रहकर कर्म करना चाहिए।

योग की एक लंबी परम्परा है। जिसे समझने की जरुरत है ।भारत में योग का इतिहास लगभग 5000 साल पुराना माना जाता है । योग का प्रथम साक्ष्य सिंधु घाटी सभ्यता के उत्खनन से प्राप्त पत्थर पर पशुपतिनाथ नाथ की अंकित मूर्ति है। इसमें उन्हें योग करते हुए दिखाया गया है । योग का प्रथम लिखित साक्ष्य हिंदु धर्म की सबसे पुरानी किताब ऋग्वेद में मिलता है। योग ने लगभग हर सभ्यता में जगह बनाई । योग का उल्लेख श्रीमद्भागवतगीता में वृहद रूप से देखने को मिलता हैं। श्री कृष्ण  का कुरूक्षेत्र में अर्जुन को उपदेश दिया जिसमें भी योग छिपा हैं । पतजंलि के योगसूत्र को कौन नहीं जानता । योगसूत्र पहली पूर्णतः योग को समर्पित पुस्तक है।इसके अलावा सांख्यदर्शन,कठोपनिषद् ,यजुर्वेद , अथर्ववेद आदि में योग का उल्लेख मिलता हैं। हिंदु धर्म ग्रंथों के अलावा जैनों और बौद्धों के धर्म ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है ।

विभिन्न धर्मों में योग को अलग - अलग रूप में परिभाषित किया है । कोई योग को मोक्ष पाने का साधन मानते है । कोई भगवान की प्राप्ति का माध्यम । परंतु कैसे ? बौद्ध धर्म में अष्टांगिक मार्ग का उपयोग करके मध्यम मार्ग के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति बताई है । जैन धर्म में दस महाव्रतों (पांच अणुव्रत और पांच महाव्रतों ) के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति का उल्लेख मिलता है । योग मुख्यतः दो धर्मों में ज्यादा प्रासंगिक है , हिंदु और बौद्ध।

योग को लोगों ने कई भागों में बांटे है । मुख्यतः योग के तीन भाग है राजयोग , कर्मयोग और ज्ञानयोग । आजकल जिस योग का प्रचलन सर्वाधिक है उसे हठयोग के नाम से जाना जाता है । हठयोग , राजयोग का ही भाग है । पंतजलि ने राजयोग को अष्ठ+अंग+योग यानी अष्ठांग में बांटा हैं । ये अष्टांग इस प्रकार है यम,नियम, आसन, प्रणायाम,प्रत्याहार,ध्यान,
धारणा, समाधि ।तीनों प्रकार के अलावा भी कई प्रकार है जैसे    पाशुपत योग, शैवयोग, वैष्णव , हीनयान,महायान,महासांगिक,कपालिक आदि है । 

योग को आज सभी देश अपना रहे है जिसके पीछे सबसे बड़ा कारण स्वास्थ्य लाभ है । मुस्लमान ,इसाई और यहूदी जैसे धर्मों ने गैर - धार्मिक मानकर वहिष्कार किया था । आज योग पर अनुसंधान होने से और स्वास्थ्यपरक होने से सभी देश इसे अपना रहे हैं। योग केवल भौतिक रुप से स्वस्थ नहीं रखता। मानसिक और भावनात्मक रूप से शांति प्रदान करता है।डिप्रेशन,हाइपरटेंशन,बीपी,अस्थमा,ह्दय लोग,मधुमेह,माइग्रेन,उदररोग आदि को योग के सहारे दूर किया जा सकता है । 
"जिंदगी में योग लाये ,रोगों को दूर भगाये।"





चलते - चलते ( श्रृंखला 4 )

श्री तेंजिंग ग्यात्सो ने कहा है कि " यदि आप अपने आप को छोटा समझते है तो कभी एक मच्छर के साथ सो कर देखिए "अर्थात कभी भी अपने आप को छोटा मत समझिये क्योंकि कभी - कभी  छोटे भी बड़ा कमाल कर देते है । बड़े होने का सौभाग्य बहुत कम लोगों को मिलता है परंतु जिंदगी में एक पल आता है जब आप किसी व्यक्ति के अभिभावक बनते है जहां आप अपने नियम कायदे या कानून चलाते हैं । शिष्टाचार की नई परिभाषा को गढ़ते है और अपनी इच्छा से शासन चलाते हैं । अपने अनुजों पर आदेशों की बारिश करते हैं और  आदेश का पालन न होता देख  गरजते और बरसते भी है । 

                        जब छोटे आपसे रुठ जाते हैं तो यह आपका कर्त्तव्य है कि आप उनकी बातें सुने, उनकी शिकायतें सुने और किस कारण से रुठे हैं जानने का प्रयास करे । छोटे कभी - कभी  छोटी सी बात को लेकर भी विचलित हो जाते है, यह उनका अधिकार भी है और धर्म भी । एक जगह होती है जहां यह मर्यादा भंग नहीं होती हैं और उस मर्यादा के बाहर सहनशक्ति आती है । सहनशक्ति बड़ों से छोटों की ओर जाती है या सिखाया जाता है । जब किसी के बड़े भाई बनते है तो यह निश्चित करना जरुरी है कि आप छोटे भाई या बहन को कितनी छूट देते है । मर्यादा तब भंग हो जाती है जब आप अपने बनाये हुए नियमों पर ही नहीं चलते है । छोटों का कर्तव्य है बात मानना और बड़ों का अपनी वाक्पटुता दिखाना । कभी - कभी बड़ों को छोटों के शांत भावों को पढ़ते आना चाहिए या उन्हें सुनना चाहिए । 

बड़े भी कभी - कभी  नाराज हो जाते है तो यह छोटों का कर्तव्य है कि कैसे अपना धर्म निभाये । क्षमा बड़ो को चाहिए छोटों को उत्पात यही वह पंक्ति है जिस पर दुनिया के रिश्ते टिके रहते हैं । बड़े कभी मौन धारण कर लेता है क्योंकि उनके मौन में कई राज छिपें होते है जिन्हें छोटों को पढ़ना आना चाहिए । 


चलते - चलते (श्रृंखला 3)

19 नवंबर की काली रात कितनी भयावह होगी उसके बारे में सोचना पर भी रुह को कंपा देता है । इंदौर - राजेन्द्रनगर एक्सप्रेस के दुर्घटनाग्रस्त होने से लगभग 150 लोग काल के गाल में समा गये और न जाने कितने ही लोग घायल हो गये । जिनके अपने उन्हें छोड़कर गये हैं उन्हें कितना असहनीय कष्ट हो रहा होगा इसकी कल्पना भी दूभर है ।
         जब बच्चा अपनी माँ से कुछ समय के लिए अलग होता है तो रोते हुए उसकी नजरे अपनी माँ को तलाशती है कि मेरी माँ कहा है और जब तक उसे तलाश नहीं लेती तब तक उसे चैन नहीं मिलता । आज शाम मैं और मेरा दोस्त चाय पी रहे थे, तभी एक छोटी सी लड़की  भीख मांगते हुए हमारे पास आई और पैसे मांगने लगी तो मेरे दोस्त ने कहा कि मेरे पास खुल्ले पैसे नहीं है, आगे जाओ । तब उस छोटी सी लड़की ने सविनय प्रार्थना करते हुए पैर पड़ने लगी तो मेरे दोस्त ने कहा मेरे पैर मत पड़ । फिर मैने 1 रुपये देकर उसको विदा किया लेकिन जाते - जाते वह सवाल छोड़ गई । क्या वो अनाथ है?  या फिर वह माँ या परिवार से अत्यल्प समय के लिए दूर होकर भीख मांग रही है ।
   जीवन में अकेलापन बहुत ज्यादा भयानक होता है । सबसे अधिक अकेलेपन का सामना बुजुर्गो को ही करना पड़ता है । वे अपनी संतान से दूर किसी मकान के एक कमरे में बैठे रहते हैं जहाँ उनकी एक आँख आशा के मोती और दूसरी आँख निराशा के जल से लबालब होती है। सच में ऐसा जीवन अभिशप्त होता है ।
                                                जीवन एक गति है जिसमें बहुत से लोग आते हैं और बहुत से आकर जाते हैं । इनमें कुछ लोग अपरिचित बन जाते हैं और कुछ मित्र । हमारे जीवन में मित्र का विशेष स्थान है जिसके साथ मिलकर हम हँसी ठिठोली, सुख-दुःख का विनिमय और विछोह  भी होता है । विछोह सबसे ज्यादा दुःखद पल होता है । मुझे आज समझ आ रहा है कि मित्रों से बिछुड़ना क्या होता है । मेरा परम मित्र का भी मुझसे बिछोह हो रहा है परंतु मेरा मन आज रुदन का कर रहा है जो भी हो पर  यह नियति है इसे मुझे स्वीकार करना होगा क्योंकि हम उस नक्षत्र के समान नहीं है जो अपना स्थान नही बदलता