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गुरुवार, 13 अगस्त 2020

चलते - चलते ( श्रृंखला 4 )

श्री तेंजिंग ग्यात्सो ने कहा है कि " यदि आप अपने आप को छोटा समझते है तो कभी एक मच्छर के साथ सो कर देखिए "अर्थात कभी भी अपने आप को छोटा मत समझिये क्योंकि कभी - कभी  छोटे भी बड़ा कमाल कर देते है । बड़े होने का सौभाग्य बहुत कम लोगों को मिलता है परंतु जिंदगी में एक पल आता है जब आप किसी व्यक्ति के अभिभावक बनते है जहां आप अपने नियम कायदे या कानून चलाते हैं । शिष्टाचार की नई परिभाषा को गढ़ते है और अपनी इच्छा से शासन चलाते हैं । अपने अनुजों पर आदेशों की बारिश करते हैं और  आदेश का पालन न होता देख  गरजते और बरसते भी है । 

                        जब छोटे आपसे रुठ जाते हैं तो यह आपका कर्त्तव्य है कि आप उनकी बातें सुने, उनकी शिकायतें सुने और किस कारण से रुठे हैं जानने का प्रयास करे । छोटे कभी - कभी  छोटी सी बात को लेकर भी विचलित हो जाते है, यह उनका अधिकार भी है और धर्म भी । एक जगह होती है जहां यह मर्यादा भंग नहीं होती हैं और उस मर्यादा के बाहर सहनशक्ति आती है । सहनशक्ति बड़ों से छोटों की ओर जाती है या सिखाया जाता है । जब किसी के बड़े भाई बनते है तो यह निश्चित करना जरुरी है कि आप छोटे भाई या बहन को कितनी छूट देते है । मर्यादा तब भंग हो जाती है जब आप अपने बनाये हुए नियमों पर ही नहीं चलते है । छोटों का कर्तव्य है बात मानना और बड़ों का अपनी वाक्पटुता दिखाना । कभी - कभी बड़ों को छोटों के शांत भावों को पढ़ते आना चाहिए या उन्हें सुनना चाहिए । 

बड़े भी कभी - कभी  नाराज हो जाते है तो यह छोटों का कर्तव्य है कि कैसे अपना धर्म निभाये । क्षमा बड़ो को चाहिए छोटों को उत्पात यही वह पंक्ति है जिस पर दुनिया के रिश्ते टिके रहते हैं । बड़े कभी मौन धारण कर लेता है क्योंकि उनके मौन में कई राज छिपें होते है जिन्हें छोटों को पढ़ना आना चाहिए । 


चलते - चलते (श्रृंखला 3)

19 नवंबर की काली रात कितनी भयावह होगी उसके बारे में सोचना पर भी रुह को कंपा देता है । इंदौर - राजेन्द्रनगर एक्सप्रेस के दुर्घटनाग्रस्त होने से लगभग 150 लोग काल के गाल में समा गये और न जाने कितने ही लोग घायल हो गये । जिनके अपने उन्हें छोड़कर गये हैं उन्हें कितना असहनीय कष्ट हो रहा होगा इसकी कल्पना भी दूभर है ।
         जब बच्चा अपनी माँ से कुछ समय के लिए अलग होता है तो रोते हुए उसकी नजरे अपनी माँ को तलाशती है कि मेरी माँ कहा है और जब तक उसे तलाश नहीं लेती तब तक उसे चैन नहीं मिलता । आज शाम मैं और मेरा दोस्त चाय पी रहे थे, तभी एक छोटी सी लड़की  भीख मांगते हुए हमारे पास आई और पैसे मांगने लगी तो मेरे दोस्त ने कहा कि मेरे पास खुल्ले पैसे नहीं है, आगे जाओ । तब उस छोटी सी लड़की ने सविनय प्रार्थना करते हुए पैर पड़ने लगी तो मेरे दोस्त ने कहा मेरे पैर मत पड़ । फिर मैने 1 रुपये देकर उसको विदा किया लेकिन जाते - जाते वह सवाल छोड़ गई । क्या वो अनाथ है?  या फिर वह माँ या परिवार से अत्यल्प समय के लिए दूर होकर भीख मांग रही है ।
   जीवन में अकेलापन बहुत ज्यादा भयानक होता है । सबसे अधिक अकेलेपन का सामना बुजुर्गो को ही करना पड़ता है । वे अपनी संतान से दूर किसी मकान के एक कमरे में बैठे रहते हैं जहाँ उनकी एक आँख आशा के मोती और दूसरी आँख निराशा के जल से लबालब होती है। सच में ऐसा जीवन अभिशप्त होता है ।
                                                जीवन एक गति है जिसमें बहुत से लोग आते हैं और बहुत से आकर जाते हैं । इनमें कुछ लोग अपरिचित बन जाते हैं और कुछ मित्र । हमारे जीवन में मित्र का विशेष स्थान है जिसके साथ मिलकर हम हँसी ठिठोली, सुख-दुःख का विनिमय और विछोह  भी होता है । विछोह सबसे ज्यादा दुःखद पल होता है । मुझे आज समझ आ रहा है कि मित्रों से बिछुड़ना क्या होता है । मेरा परम मित्र का भी मुझसे बिछोह हो रहा है परंतु मेरा मन आज रुदन का कर रहा है जो भी हो पर  यह नियति है इसे मुझे स्वीकार करना होगा क्योंकि हम उस नक्षत्र के समान नहीं है जो अपना स्थान नही बदलता ।

जय की ललिता

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता ।।

अर्थात जहाँ स्त्रियों का सम्मान होता है , वहाँ देवता निवास करते है ।
                           भारत एक ऐसा देश है, जहाँ स्त्रियों का सम्मान किया जाता है । स्त्रियों को ममता का प्रतीक तो माना ही जाता है और शक्ति का अवतार भी । भारत का नाम भले ही राजकुमार भरत से हो परंतु उसका लालन पालन विशाल ह्रदय वाली शकुंतला ने ही किया था । जिसके लालन - पालन ने भरत को  निर्भीक बनाया जो शेर के मुँह में हाथ डालने में सामर्थ्य प्राप्त कर सका।
                    प्राचीन भारत से लेकर आधुनिक भारत तक स्त्रियों का सम्मान भी हुआ है और उनकी  शक्तियों में चार चांद भी लगे है । सिंधु घाटी सभ्यता जहां मातृसत्तात्मक थी वही आज इस पितृसत्तात्मक समाज के बीच भारत के पूर्वोत्तर राज्यों मे मातृसत्तात्मक समाज देखने को मिलता है । हमारे समाज के निर्माण में महिलाओं का बेजोड़ योगदान हैं जिसके अंतर्गत महिलाओं ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया । देश का निर्माण हो या साहित्य का निर्माण महिलायें सदैव तत्पर रही है ।
                                    ऋग्वैदिक काल से लेकर नूतन समय तक साहित्य के निर्माण में  स्त्रियों का योगदान हैं फिर चाहे वेदो के निर्माण में योगदान देने वाली सिक्ता, अपाला,  लोपामुद्रा या विशाला हो ,चाहे आधुनिक साहित्य रचने वाली महादेवी वर्मा, सुभद्राकुमारी चौहान हो । इन्होंने अपना जीवन देश एवं समाज के निर्माण में समर्पित कर दिया ।
                  भारत हमेशा से ही प्रगतिशील रहा है जिसकी प्रगति मे स्त्रियों को भूलना दुरास्वप्न  है । सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर अभिनूतन काल तक स्त्रियों के बिना समाज की कल्पना असंभव है । भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जहाँ पुरुषों ने अपने प्राण देश के लिए न्यौछावर किये वही स्त्रियाँ भी कहाँ पीछे रहने वाली थी । रानी लक्ष्मीबाई, रानी दुर्गावती, रानी चेनम्मा आदि ने जहाँ अपने प्राण मातृभूमि को समर्पित कर दिए वही जीजाबाई जैसी महान स्त्री ने शिवाजी महान जैसे सूर का निर्माण किया ।
                                      भारतीय राजनीति दो तरह से कार्य करती है,  एक पर्दे के सामने वाली और दूसरी पर्दे के पीछे वाली । पर्दे के पीछे रहकर जहाँ स्त्रियों ने शासन चलाया वही पर्दे के सामने आने का भी साहस किया उसमे फिर चाहे नाम रजिया सुल्तान हो या रानी लक्ष्मीबाई दोनों को ही समाज ने स्वीकार्य किया परंतु लोभियों ने नहीं ।
                          आधुनिक राजनीति में जहाँ स्त्रियाँ राष्ट्रपति से लेकर मुख्यमंत्री के पद को शोभायमान किया । इसी कड़ी मे 21 वी सदी की राजनेत्रियाँ आती है फिर चाहे वे हेमा, रेखा, जया, सुषमा, सोनिया, माया, ममता हो । जयललिता दक्षिण भारत की महान नेत्री बनकर उभरी । जिन्होंने अपने सम्मान मे कभी भी दुर्भावना का दाग नहीं लगने दिया । तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने अफसरों को आजादी दी । लोगों को सस्ती से सस्ती सुविधाएं उपलब्ध कराई । विरोधियों के आक्षेप लगाने पर कीचड़ से कमल की तरह खिल कर दिखाया । यही है ललिता । इसलिए तो कहता हूँ कि जय की ललिता ।

सबकी अपनी अलग दुनिया

कबीरा खड़ा बाजार में लिए लकुटिया हाथ,
आपन घर जो फूंक दे चले हमारे साथ ।।

कबीर जी एक महान दार्शनिक एवं तत्वदर्शी थे । वे अपने दोहे के माध्यम से बताना चाहते हैं कि साधु का जीवन किसी भी तरह से बंधा नहीं है और साथ ही साथ कहते है कि जो अपने घर का त्याग कर दे वही सच्चा साधु है ।
                                        इस समस्त संसार में भाँति -भाँति के लोग निवास करते हैं । सभी लोग अपनी दुनिया में मस्त रहते है । सभी के सुख, दुःख, समस्या आदि अलग होता है । सभी इस वास्तविक दुनिया में रहते हुए भी अलग - अलग काल्पनिक दुनिया संजोए हुए होते है ।
                                                       सभी लोगों की अलग - अलग पसंद और नापसंद भी होती हैं । रहीम जी का दोहा तो यही बताता है -

समै समै सुंदर सबै रुप कुरुप न कोए,
जिन की रुचि जैती जिते तिन तैती रुचि होए
रहीम जी दोहे के माध्यम से बताते है कि सभी व्यक्तियों की सोच में समानता नहीं है।
                                               जल, जंगल और जमीन तीनों की दुनिया में बहुत अंतर है । इन तीनों में रहने वाले जीवों में केवल एक ही समानता है कि जीवित रहने के लिए श्वास लेते है और भूख लगने पर उदरपूर्ति करते हैं । इसके अलावा इनकी जिंदगी में सबकुछ अलग है सबकी अपनी जीवन शैली है । आहार श्रृंखला के माध्यम से जीवों के व्यवहार को समझने में हम सरलता पाते है कि मनुष्य सर्वाहारी जीव है और सर्वाधिक भूखा जीव है क्योंकि उसके समक्ष समस्त खाद्य पदार्थ होने पर भी प्रत्येक दिवस किसी नई वस्तु की मांग करता है ।
                         
मोर पेट हाऊ, मैं न देऊ काहू ।
बघेली बोली की यह कहावत मानव जाति पर सटीक बैठती है कि मानव जाति खाने के मामले में बहुत ज्यादा स्वार्थी है ।
येषां न विद्या, न तपो, न दानं,
ज्ञानं न,  न शीलम्, न गुणो, न धर्मः
ते मृत्युलोके भूमिभार्भूता
मनुष्य रुपेण मृगःश्चरंति ।।
जिस व्यक्ति के पास न विद्या है, न धर्म है, न गुण है, न शील है, न ही क्षमा करने की क्षमता है वह इस धरा पर मनुष्य रुप में होते हुए भी मृग के समान विचरण करता है । मनुष्य की अभिलाषायें कभी खत्म नहीं होती है उसमे हमेशा और अधिक की चाह बनी रहती है ।
                                     साधु, संत, महात्मा के पास अद्भुत शक्ति होती है जिससे वह समाज में आकर्षण का केंद्र बने रहते हैं । हमारे समाज में कहा जाता है कि वैवाहिक जीवन , जीवन को और भी ज्यादा सुखद बना देता है , परंतु जब इसी वैवाहिक जीवन में  विपत्ति आती है तो उसका समाधान भी उसी व्यक्ति के पास होता है जो उस समाज से भिन्न होते हुए भी भिन्न नहीं है ।
   व्यक्ति का जीवन कई मोड़ लेकर आगे बढ़ता है जिसे तुलसीदास जी ने इस प्रकार बताया -
धरा को यही प्रमान है तुलसी जो फरा,
सो झरा जो बरा सो बुतानो ।

हमारे धर्म ग्रंथ हमारे जीवन को कई भागों में बाँटकर बताते है कि जीवन के कितने स्तर होते है और उन स्तरों पर इंसानों को क्या करना चाहिए -
प्रथमं न अर्जिते विद्या, द्वितीयं न अर्जिते धनं।
तृतीयं न पुण्यं, चतुर्थं किं करिष्यति ।।

हिंदू धर्मग्रंथ के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के जीवन को शत वर्ष का मानकर उसे चार भागों में विभक्त किया गया है । 0-25 वर्ष तक की आयु तक ब्रह्मचर्य आश्रम होता है इसके अंतर्गत व्यक्ति विद्या ग्रहण करता है । 25-50 वर्ष तक गृहस्थाश्रम होता जिसके अंतर्गत व्यक्ति वैवाहिक जीवन व्यतीत करता है । 50-75 वर्ष तक वानप्रस्थाश्रम होता है जिसके व्यक्ति घर पर रह कर समस्त सांसारिक समस्याओं को त्याग देते है । 75-100 वर्ष तक संन्यासाश्रम होता है जिसमें व्यक्ति पूरी तरह गृह का त्याग कर देता है ।
बिनु पग चले, सुने बिनु काना ।
कर विधि करम, करे विधि नाना ।।
भूतों की भी अपनी अलग दुनिया होती है जिन्हें बनाने का श्रेय भगवान को ही जाता है । इंसान भी कई प्रकार के होते है और उनकी समझ भी । होनहार बिरवान के होत चीकने पात । इसी बात का उदाहरण हैं ।
                         राजा की अर्थात् अमीरों की अलग दुनिया होती है और रंक की अर्थात् गरीबों की अलग, तभी तो शायद यह कहावत बनी है कि - कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली ।
                                                   मेरी समझ से तो यही है "सबकी अपनी अलग दुनिया"।

चलते - चलते ( श्रृंखला 2 )

आज मैं चाय की दुकान पर चाय की चुस्कियाँ ले रहा था तभी मैने सफाई वाले को सड़क पर झाडू लगाते हुए देखा तो सोचा कि यह तो शिक्षक से महान कार्य कर रहा है लेकिन तभी मेरा अवचेतन मस्तिष्क चेतनावस्था में आया  और कहा नहीं दोनों अलग -अलग स्तर पर कार्य कर रहे हैं । समानता केवल इतनी ही है कि दोनों सफाई का काम कर रहे है, एक सड़क की तो दूसरा अज्ञान की ।
                      ज्ञान देना सरल होता है पर उसे स्वयं आत्मसात करना कठिन होता है । ज्ञान की परिपाटी पर महात्मा गांधी ने एक नई स्मृति निर्मित की । एक बार महात्मा गांधी ओडिशा के किसी गांव में गये तो उन्होंने देखा कि चहुँओर गंदगी व्याप्त है, तो उन्होने अपने साथियों से पूछा तो जबाब मिला कि गांव वाले ही गंदगी रखते हैं । इस कथन को सुनकर गाँधीजी आगे बढ़ गये और कुछ नहीं कहा । दूसरे दिन अलसुबह गांधी जी ने गंदगी अपने हाथों से साफ कर दी ।
         मित्र का अर्थ होता है कि आवश्यकता पड़ने पर अपने साथी की सहायता करना । मित्र उस दीपक के समान होता है जो स्वयं जलकर आसपास के वातावरण को प्रकाशित करता है ।  लेकिन मुझे मित्र की दूसरी ही परिभाषा देखने को मिली, यदि मैं मित्र बनने लायक नहीं हूँ परंतु आप तो मित्र के गुणों से परिपूर्ण हैं ।
                                             मैं यहाँ अपनी बात कर रहा हूँ और अपने कालेज के दोस्त कि, और उस दोस्त की जिसने मुझ से जैकेट माँगा था क्योंकि उसकी तबियत अच्छी नहीं थी और ठंड लग रही है परंतु मैने उसे जैकेट देने से मना कर दिया तब तो उसने सहजता से स्वीकार्य कर लिया । उस दिन हुये उस वाकये पर मुझे अफसोस है, पर आज उसने कहा कि मेरी मूर्खता थी कि मैने तुमसे जैकेट माँगी । इसका कारण जो भी हो शायद एक कारण यह भी हो सकता है कि पहले एक घटना हुई थी जिसमें उसके परम मित्र के साथ मेरी बहस का भुगतान मुझे भुगतना पड़ रहा हो ।
         क्या वस्तु ही सब कुछ है मित्रता मात्र नाम है । मैं नहीं जानता कि वे कितने समझदार और होशियार है और कितना मैं , परंतु शिवम् पोरवाल जी मुझसे और मेरे मित्र से ज्यादा श्रेष्ठ व्यवहार कुशल और संचार कुशल है । मुझे यह तो नहीं मालूम कि वे मुझे दोस्त मानते है या नहीं पर मैं उन्हें टक्कर वाला दोस्त मानता हूं । कई लोग दूसरों की बातों पर ज्यादा ध्यान देते हैं सुधर जाये तो ठीक रहेगा ।
                                जीवन ही सत् है और सत् ही जीवन । जितना जल्दी सभी इसे सीख ले सभी के लिए लाभदायक होगा साथ में मैं  भी ।