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बुधवार, 14 सितंबर 2022

हिंदी दिवस स्पेशल : संस्कृत से हिंदी तक बनने में एक लंबा सफर लगा, आज व्यौहार राजेंद्र सिंह के जन्मदिवस पर हिंदी दिवस मनाया जाता है

हिंदी भाषा की जननी संस्कृत को कहा जाता है जबकि ऐसा नहीं है। हिंदी को हिंदी बनने में बहुत लंबा समय लगा है। सबसे पहले संस्कृत भाषा आई फिर प्राकृत फिर अर्द्धमागधी फिर अपभ्रंश फिर अवहट्ट अंतत: हिंदी भाषा का जन्म हो गया। हिंदी उपरोक्त भाषाओं से ताकतवर भाषा बन गई है क्योंकि हिंदी ने बहुत से शब्द भंड़ार बाहर से ग्रहण किए है जिनमें संस्कृत सबसे अहम है। 

तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशी शब्दों का उपयोग करके हिंदी एक समृद्ध भाषा के रूप में विकसित हुई है। हिंदी भाषा की एक और ताकत है उसकी बोलियां जिसमें भोजपुरी, शौरसेनी अपभ्रंश, बघेली, छत्तीसगढ़ी, हडौती, ढूढांणी,मेवाती, मारवाडी, मालवी, निमाड़ी, ब्रज, अवधी, हरियाणवी, कुमायुनी आदि हैं। हिंदी भाषा को लिखने के लिए देवनागरी लिपि का प्रयोग किया जाता है।

प्रतिवर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 343(1) के तहत इसे राजभाषा का दर्जा दिया गया। हिंदी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त है न कि राष्ट्रभाषा का क्योंकि हमारे संविधान में किसी भी भाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में चिन्हित नहीं किया गया है। हिंदी को संविधान की  आठवी अनुसूची में शामिल किया गया है। स्वतंत्रता पश्चात् सरकारी कामकाज और जनसामान्य में व्यवहार करने के लिए एक भाषा की जरुरत पड़ी। 

तत्कालीन भारत बिखरा हुआ था जिसमें आज की तरह राज्य नहीं थे। देश की भाषा के रूप में कई भाषा के लिए जनप्रतिनिधियों और आमजन ने तमिल, बंगाली, असमिया, हिंदुस्तानी जैसी भाषा का नाम आगे किया। संविधान सभा की भाषा समिति ने सभी से राय लेते हुए और देश की बहुसंख्यक आबादी की बोलने वाली भाषा के रूप में हिंदी को राजभाषा स्वीकार किया गया। हिंदी के साथ-साथ इंग्लिश को पन्द्रह वर्षों के लिए सरकारी भाषा के रूप में स्वीकार किया गया।

व्यौहार राजेन्द्र सिंह का जन्म 14 सितंबर 1916 को हुआ और जन्मदिवस की 50वीं वर्षगांठ अर्थात् 14 सितंबर 1949 को भारत सरकार ने हिंदी को राजभाषा घोषित कर दिया। इसी दिन को 'हिंदी दिवस' के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। यह बहुत कम लोग जानते है कि हिंदी को राजभाषा के रूप में स्थापित करने का श्रेय व्यौहार राजेन्द्र सिंह को जाता है। 

जबलपुर की जागीरदार के घर जन्मे राजेन्द्र सिंह गांधीवादी विचारधारा के व्यक्ति थे। समाजसेवी और साहित्यकार भी थे। व्यौहार राजेन्द्र सिंह ने मैथिली शरण गुप्त, काका कालेलकर, सेठ गोविंददास और हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसी महान हस्तियों के साथ मिलकर दक्षिण भारत में हिंदी को राजभाषा के रूप में घोषित कराने के लिए अभियान चलाया। अमेरिका में सपन्न हुए पहले हिंदी सम्मेलन का सफल आयोजन कर भारतीय तिरंगा झंड़ा फहराया।

भक्ति काल में हिंदी ने जनसामान्य में जगह बनाने की शुरुआत की इसमें बड़े-बड़े कवियों ने रचनाओं का सृजन कर हिंदी को समृद्ध किया। मीरा, कबीर, तुलसीदास, सूरदास, बिहारी, केशवदास, दादू , रहीम, भूषण आदि रचनाकार है जिन्होंने हिंदी साहित्य को समृद्ध बनाने की नींव रखी। आचार्य रामचंद्र शुक्ल, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, फणीश्वरनाथ रेणु, राही मासूम रज़ा, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, मैथिली शरण गुप्त, सुमित्रानंदन पंत, गजानन माधव मुक्तिबोध, गणेश शंकर विधार्थी, देवकीनंदन खत्री, माखनलाल चतुर्वेदी, भवानी प्रसाद मिश्र जैसे साहित्य के अग्रदूतों ने विशेष योगदान दिया।

हिंदी आज के समय में एक ऐसी भाषा बन चुकी है जिसका लोहा पूरी दुनिया मानती है। भाषाविद् हिंदी को भारोपीय श्रेणी में रखते है। हिंदी दुनिया की चौथी सर्वाधिक बोले जाने वाली भाषा बन चुकी है जिसके भारत समेत विश्व में लगभग 615 मिलियन बोलने वाले लोग है। हिंदी भारत में ही नहीं कई और देशों में बोली जाती है जिनमें गुएना, मॉरिशस, सिशेल्स, त्रिनिदाद और टुबैगो, फिजी आदि। फिजी की अधिकारिक भाषा फिजी हिंदी है। भारत के अलावा नेपाल, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, श्रीलंका, भूटान और मालद्वीप में हिंदी को समझने वाले आसानी से मिल जाते हैं।

इंटरनेट और सोशल साइट पर जहां इंग्लिश का एकछत्र राज था जिसे हिंदी ने खत्म करने में सफलता पाई है। आज इंटरनेट पर लगभग सभी जानकारी हिंदी में उपलब्ध है। सोशल मीडिया में धडल्ले से हिंदी का उपयोग किया जा रहा है। बड़ी-बड़ी सर्विस प्रोवाइडर कंपनियां और वेबसाइट्स हिंदी को महत्ता प्रदान कर रही है क्योंकि हिंदी आज विश्व में एक नवीन ताकत के रूप में उभर कर सामने आई है। जहां पहले उच्च शिक्षा बिना इंग्लिश माध्यम के सम्पन्न नहीं हो पाती थी वही आज भारत से लेकर विदेश तक उच्च शिक्षा के लिए हिंदी विश्वविधालय खुल रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र में पहली बार हिंदी में भाषण देने वाले प्रथम प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई हुए। आज पीएम नरेन्द्र मोदी अपने प्रत्येक कार्यक्रम में हिंदी ही भाषण देते है चाहे वे देश में हो या विदेश में। यह सब हिंदी भाषा को विश्व में गरिमामय उपस्थिति दर्ज कराने के लिए किया जा रहा है। हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की कामकाज की भाषा बनाने के लिए भारत प्रयासरत है।

हिंदी को किसी भाषा से डर नहीं परंतु कुछ लोग कुंठित मानसिकता के फलस्वरुप हिंदी भाषी और गैर हिंदी भाषी के बीच द्वंद कराने से नहीं चूकते है।

हिंदी तो सबकी है, हिंदी का प्रयोग करें।
हिंदी को बिंदी न बनाए।

📃विनय कुशवाहा

शुक्रवार, 9 सितंबर 2022

बुक रिव्यू : 'डार्क हॉर्स' सफलता और असफलता की एक ऐसी कहानी कहती है जो सिविल सेवा परीक्षा के बारे में आपकी आंखें खोल देगी!!!

लेखक - नीलोत्पल मृणाल
प्रकाशक - हिंदी युग्म प्रकाशन 

सिविल सेवा का नाम जब सामने आता है तो सबसे पहले एक शहर सबसे पहले कौंधता है दिल्ली। दिल्ली का मुखर्जी नगर इसके लिए गढ़ माना जाता है। सिविल सेवक बनने के लिए लाखों-लाख लोग आते हैं कई को सफलता मिलती है और कई को असफलता हाथ लगती है। दिल्ली के मुखर्जी नगर की एक पूरी की पूरी फिल्म दिखाती किताब है 'डार्क हॉर्स'। 

आज हम 'डार्क हॉर्स' किताब का बुक रिव्यू करने जा रहे हैं...इसके लेखक हैं नीलोत्पल मृणाल। 

डार्क हॉर्स कहानी कहती है उन ढेर सारे उम्मीदवारों की जो भारत की सबसे प्रतिष्ठित सेवा आईएएस, आईपीएस आदि बनने अलग-अलग राज्यों से दिल्ली आते हैं। दिल्ली में कुछ के सपने साकार होते हैं और कुछ के नहीं। कोई इस दिल्ली नामक चकाचौंध में भ्रमित हो जाता है तो कोई तमाम कोशिश के बाद भी सफल नहीं हो पाता है।

कहानी संतोष, मनोहर, रायसाहब उर्फ कृपाशंकर, विमलेंदु , गुरु, मयूराक्षी, जावेद, पायल और विदिशा के चारों ओर घूमती है। रायसाहब हैं जो सबसे बुजुर्ग हैं कई बार परीक्षा दे चुके हैं फिर भी कुछ नहीं हुआ। लेकिन जहां लकड़ी देखी वहीं अपनी बिसात जमाना शुरू कर देते हैं। जहां मुंह मारते हैं वहीं धोखा मिलता है।

बिहारी नौजवान मनोहर जो नए नवेले अंदाज में रहता है। मॉडर्न लुक रखता है। बाकायदा सिर से लेकर पैर तक और कपड़ों से लेकर परफ्यूम तक का ध्यान रखता है। सिविल सेवा के अखाड़ा में इनकी पहलवानी जमी नहीं। लेकिन महिला मित्र बनाने में अव्वल रहा और दोस्तों को जोड़ने का काम किया।

गुरु जो पढ़ाई में अव्वल रहा और साक्षात्कार तक पहुंचने वाले लोगों में से एक है। गुरु को पढाई के साथ-साथ सामाजिक दुनिया का ज्ञान है जो अपने लंबे-चौड़े भाषण में यदा-कदा देता रहता है। वहीं विमलेंदु, गुरु का दोस्त है और वह भी साक्षात्कार दे चुका है।

इस उपन्यास की कहानी शुरू होती है संतोष के सफर से जो बिहार के भागलपुर से ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद दिल्ली का रुख करता है। भागलपुर से दिल्ली तक का सफर संतोष के लिए खट्टे-मीठे अनुभव लिए रहता है। संतोष दिल्ली पहुंचते ही रायसाहब के रुम पर रुकता है। फिर उसकी मुलाकात होती है बाकी दोस्तों मतलब मनोहर, गुरु, विमलेंदु, भरत, पायल और विदिशा से। 

पायल और विदिशा दोनों दोस्त हैं जो खुले विचार वाली हैं। जहां पायल के लिए कोई बंदिश की सीमा नहीं है जो हर बार नया प्रयोग करके देखना चाहती है। उसने कई बार प्रयोग किए। वहीं विदिशा मर्यादा के बंधन में बंधी लड़की है जो हमेशा नपे-तुले अंदाज में रहती है।

संतोष के लिए कोचिंग का अनुभव भी खास न रहा। कोचिंग के मोहजाल में न चाहते हुए भी फंस गया। कोचिंग के पाखंड से बच न सका। लेकिन कोचिंग की रिसेप्शनिस्ट को दिल दे बैठने वाले संतोष को सारी कोचिंग के सामने जलील होना पड़ा। यही से छरका संतोष संभल गया।

इस किताब में लव स्टोरी आपको ढूंढने से भी नहीं मिलेगी। जो हैं भी वो क्षणिक है। गुरु और मयूराक्षी का प्रेम भी शक के कारण परवान न चढ़ सका। वहीं मनोहर, पायल के प्रयोग से सहम कर उससे किनारा कर लिया।

उपन्यास में असफलता के कई सारे किस्से हैं लेकिन सफलता की भी चर्चा कम न रही। विमलेंदु और मयूराक्षी को सफलता मिली। जिन्हें नहीं मिली उन्होंने भाग्य को कोसा। 

किताब में रुलाने वाला और भयंकर पीड़ा देने वाला किस्सा है जावेद का। पिता की मृत्यु के बाद जावेद अपनी बीमार मां को घर पर छोड़कर दिल्ली तैयारी करने जाता है। मां की बीमारी में गांव की जमीन बिक जाती है। मां का एक सपना रहता है बेटा अधिकारी बने। एक चाचा है जो इस हालत में भी शोषण करने से बाज नहीं आता। जावेद की मुसीबत यही कम नहीं होती है सिविल सेवा परीक्षा पास नहीं कर पाता वहीं गांव से फोन आता है कि मां की तबीयत खराब है। गांव पहुंचता है तो दर्द कम होने की जगह बढ़ जाता है। मां का देहांत हो जाता है। लेकिन इस बीच उसे पता चलता है कि बिहार पब्लिक सर्विस कमीशन की परीक्षा पास कर लेता है।

वहीं संतोष की बात करें जो इस उपन्यास का मुख्य पात्र है। जब दो बार सिविल सेवा परीक्षा पास नहीं कर पाया तो उसने सबसे किनारा कर लिया। और "डार्क हॉर्स" बनकर निकला। डार्क हॉर्स का मतलब जिस व्यक्ति के बारे में किसी ने परीक्षा पास करने के बारे में सोचा नहीं वही व्यक्ति सफल होकर निकला। इसलिए इस किताब का नाम डार्क हॉर्स रखा गया। एक ऐसा घोड़ा जिस पर कोई दांव नहीं लगाता। वही घोड़ा रेस जीत जाता है।

किताब का सार यही है कि दिल्ली में आते तो बहुत हैं तैयारी करने वाले। जो दिल्ली की चकाचौंध, माया-मोहिनी के चक्कर में नहीं फंसता वही सफल होता है। 

जय हो!!!

BY_VINAYKUSHWAHA

रविवार, 4 सितंबर 2022

शहडार जंगल : इतना घना जंगल जहां सूरज की रोशनी भी जमीन तक नहीं पहुंचती, कटनी का ये जंगल आपको कर देगा दंग!!!

 


कटनी शहर से 40 किमी दूर शहडार जंगल है। ये जगह नेचर लवर्स के लिए स्वर्ग से कम नहीं है। घना जंगल जहां सूरज की रोशनी जमीन तक नहीं पहुंचती। आसमान को छूते पेड़ और कई स्तरों पर पेड़ों और लताओं की कतार नजर आती है। शहडार का ये जंगल कटनी वन मंडल के अंतर्गत आता है। इस जंगल में कई तरह के पशु-पक्षी रहते हैं। इनमें तेंदुआ, भालू, चीतल, हिरण, जंगली सुअर, सियार, जंगली कुत्ता, नीलगाय आदि हैं। कई तरह के सांप जैसे करैत, डबल करैत, धामन, गडैता, बफ स्ट्रिप्ड कीलबेक भी मिलते हैं। किंगफिशर, मोर और विभिन्न प्रकार के पक्षी भी पाए जाते हैं। ये जंगल वन विभाग के अंतर्गत आता है तो यहां पर किसी भी प्रकार से वन और वन्य जीवों को हानि पहुंचाना गैर-कानूनी है। 


शहडार का ये जंगल उष्णकटिबंधीय अर्द्धपर्णपाती वन (TROPICAL WET DECIDUOUS FOREST) के  अंतर्गत आता है क्योंकि इस क्षेत्र में 100 से लेकर 200 सेमी के बीच बारिश होती है। यहां सागवान, साल, सखुआ, खैर आदि पेड़ पाए जाते हैं जो आर्थिक रूप से काफी महत्त्वपूर्ण हैं। इसके अलावा बरगद, पीपल, हर्रा, बहेड़ा, नीम, बबूल, अर्जुन, महुआ, सप्तपर्णी, गुलमोहर, बेर आदि के पेड़ बहुतायत में दिखाई देते हैं। 


इस जंगल के अनेक रूप दिखाई देते हैं। बारिश के समय तो मानो यहां हरी चादर सी बिछ जाती है। बारिश के मौसम में जंगल की जमीन से लेकर पेड़ों के शिखर तक सबकुछ हरा ही हरा नजर आता है। कोपल जैसे नए जीवन के प्रतीक तरह दिखाई देती है। हरे जंगल के बीच से गुजरती काली सड़क काली नागिन तरह लगती है। 


बारिश का अतिरिक्त पानी सड़क के किनारे से जब गुजरता है तो लगता है मानो नदी साथ-साथ चल रही है। यही पानी इकट्ठा होकर कहीं-कहीं मैदान में जमा हो जाता है तो कहीं छोटे झरने का रूप ले लेता है। शहडार के जंगल की इन खासियस के अलावा जंगल के बीच-बीच में मैदान का होना जो कई सारे जानवरों की जगह होती है। 


ठंड के मौसम में ये जंगल अपने अलग ही अंदाज में दिखाई देता है। ठंड में शहडार के जंगल में सूरज की रोशनी कुछ इस आती हुई लगती है मानो किसी ने छन्नी लगा दी हो। घास जमा ओंस की बूंद सूरज की रोशनी से चमकने लगती है और ऐसी दिखती हैं जैसे कई सारे घास के पत्तियों पर हीरे लगा दिए हों। ठंड में जितनी प्यारी धूप इंसानों को लगती है उतनी जानवरों को भी लगती है। शहडार के जंगल में हिरण, चीतल, नीलगाय आदि जानवार चहलकदमी करते नजर आते हैं। तेंदुए जैसे जानवर शिकार करते नजर आते हैं।


ठंड के मौसम के बाद नमी को सुखा देने वाली गर्मी का मौसम आता है। हरी घास सूखकर सुनहरी हो जाती है। बड़े-बड़े पेड़ के पत्ते भी सुनहरे हो जाते हैं और आखिरकार शाख को छोड़ देते हैं। कुछ पेड़ बचते हैं जिनके सैनिक की तरह पत्ते अंत तक लड़ाई लड़ते हैं। शिरीष, गुलमोहर, पलाश, अमलताश के सफेद , लाल और पीले फूले से धहकता शहडार का जंगल भी रंग-बिरंगा नजर आता है। गर्मी के इस मौसम में आलस पसर जाता है। जंगल का कोना-कोना बारिश के इंतजार में आस लगाए बैठा होता है। 


शहडार का जंगल मुख्य रूप मध्यप्रदेश के कटनी जिले में स्थित है। इस जंगल की सीमा उमरिया और जबलपुर जिलों से भी लगती है। शहडार के जंगल के पास ही भारत का केंद्र बिंदु (CENTRE POINT) करौंदी है। शहडार जंगल, बांधवगढ़ नेशनल पार्क के नजदीक स्थित है। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के नजदीक होने के कारण शहडार का जंगल बफर जोन में आता है। यहां टाइगर का मूवमेंट भी देखने को मिल जाता है। 


नजदीकी पर्यटन स्थल 

(NEAREST TOURIST ATTRACTION)


शहडार के जंगल के पास कई सारे टूरिस्ट प्लेस हैं जिनमें रुपनाथ शिलालेख, बांधवगढ़ नेशनल पार्क, धुंआधार फॉल जबलपुर, चौंसठ योगिनी मंदिर जबलपुर, पनपठा सेंक्चुरी, भारत का सेंटर प्वॉइंट 'करौंदी', शारदा देवी मंदिर मैहर आदि। 


कब जाएं

(BEST TO VISIT)


शहडार के जंगल घूमने का सबसे अच्छा मौसम जुलाई से फरवरी है। बारिश के मौसम में जंगल हरा-भरा हो जाता है नेचर लवर के लिए स्वर्ग से कम होता है। वहीं ठंड के मौसम में आपको बड़ी संख्या में जंगली जानवरों की चहलकदमी नजर आती है। 


कैसे पहुंचे

(HOW TO REACH)


शहडार के जंगल पहुंचने के लिए एयर, रेल और बस तीनों माध्यम उपलब्ध हैं।


एयरपोर्ट - शहडार के जंगल से नजदीकी एयरपोर्ट जबलपुर है जो लगभग 90 किमी है। यहां से आप टैक्सी कर सकते हैं।


रेल - शहडार से नजदीकी सबसे बड़ा रेलवे स्टेशन कटनी है जो 40 किमी दूर स्थित है। यहां से आप टैक्सी किराये पर ले सकते हैं।


बस - कटनी बस स्टैंड नजदीक है जहां से  छोटे-बड़े शहरों के लिए बस उपलब्ध है।

बुधवार, 24 अगस्त 2022

बुक रिव्यू : 'आनंदमठ' की बात जाए तो दो ही बातें सबसे पहले ध्यान में आती है पहली 'वंदे मातरम' और दूसरी संन्यासी विद्रोह


आपने सन्यासी विद्रोह के बारे में तो सुना ही होगा...लगभग 200 साल पहले अंग्रेजों के विरुद्ध सन्यासियों द्वारा किया गया विद्रोह था...इस विद्रोह का जिक्र

सबसे पहले बंकिमचंद्र चट्टोपध्याय की किताब 'आनंदमठ' में मिलता है...आज हम इसी किताब का बुक रिव्यू करने जा रहे हैं...

ये किताब बात करती है आजादी के पहले के भारत की जब अंग्रेज अपने शासन की नींव रख रहे थे...लोगों का गुस्सा जहां लगान वसूल करने वाले मुस्लिम शासकों से तो था ही इसके साथ-साथ अंग्रेजों को लोग मलिच्छ समझा करते थे। मुस्लिमों और अंग्रेजों को सबक सिखाने के लिए कुछ लोगों ने सन्यासी का वेश धारण किया। किताब इन्हीं सन्यासियों की बात करती है जो दिन में तो सन्यासी के वेश में भीख मांगते हैं और रात होते ही क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम देते हैं।

आनंदमठ की कहानी कई सारे किरदार हैं। इसमें सत्यानंद, जीवानंद, भावानंद, महेंद्र, शांति और कल्याणी हैं और कहानी इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती है। सत्यानंद सन्यासियों द्वारा की जा रही क्रांतिकारी गतिविधियों के कर्ता-धर्ता हैं। इन्हीं के द्वारा आनंदमठ में सन्यासी को क्रांतिकारी बनाया जाता है। किताब का टाइटल आनंदमठ है जो क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र रहता है। आनंदमठ शहर से दूर घने जंगल के बीचों-बीच स्थित होता है।
किताब में सन्यासी कौन होते हैं इस बात का जिक्र किया गया है जिसमें घर

 को छोड़ने वाला, शाकाहार अपनाने वाला, पत्नी का त्याग करने वाला, वैष्णव धर्म का कड़ा पालन करने वाला होना चाहिए। सन्यासी यदि इन बातों का उल्लंघन करता है तो उसे प्रायश्चित के रूप में अपने प्राणों की बलि देनी होती है। 

किताब के अन्य किरदारों की बात करें तो महेंद्र और कल्याणी तो दोनों पति-पत्नी हैं। लंबे सूखे से परेशान होकर शहर को छोड़कर चले जाते हैं। रास्ते में दोनों के रास्ते जुदा हो जाते हैं। कल्याणी फिर से शहर पहुंच जाती है और पति महेंद्र सन्यासी बन जाता है। जीवानंद और शांति दोनों पति-पत्नी होते हैं लेकिन शादी के कुछ दिनों बाद ही जीवानंद सन्यासी बन जाता है। वहीं शांति हथियार चलाने और पढ़ाई-लिखाई में कुशाग्र होती है।

लेखक ने किताब में जितना पुरुष के शौर्य की चर्चा होती है वहीं महिला की ताकत का बखान भी किया गया है। शांति से नवीनानंद तक कहानी भी रोचक है जो किसी प्रेरणा से कम नहीं है। लड़ाई लड़ने से लेकर वाकपटुता, वेद-पुराण, व्याकरण के ज्ञान में अव्वल है। सत्यानंद भी इन्हीं खूबियों के कारण उसे आनंदमठ में प्रवेश करने न रोक सके। शांति के आनंदमठ में प्रवेश से पहले तक महिला सन्यासी नहीं बन सकती थीं। वहीं कल्याणी कोमल ह्रदय और ममता के समुंदर वाली औरत है जिसके दिल में परिवार और देश के लिए मर मिटने की ख्वाहिश हमेशा रहती है।



इस किताब का करेक्टर जीवानंद पराक्रमी योद्धा है जिसका मन तो देश के लिए क्रांति करने में लगा रहता है लेकिन दिल में आज भी उसके शांति ही होती है। जब शांति नवीनानंद बनकर आनंदमठ आ जाती है तो जीवानंद भी चौंक जाता है। लेकिन जीवानंद के दिमाग में प्रायश्चित बात घूमने लगती है क्योंकि सन्यासी रहते हुए जीवानंद शांति से मिलने गया था।

किताब में लेखक ने सन्यासी के बारे में जो बताया है वो कुछ इस तरह है कि सन्यासी गेरुआ कपड़े पहनते हैं वे किसी साधु की तरह दिखाई देते हैं। वैष्णव धर्म का पालन करते हैं। लेकिन देश के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। अंग्रेजों के लिए काल का काम करते हैं। ये सन्यासी लूटपाट करते है खासकर अंग्रेजी खजाने को और जरुरत पड़ने पर हत्या करने से भी नहीं हिचकते। इसलिए अंग्रेज इन्हें अपना दुश्मन मानते हैं।

इसी किताब का अंत होता है एक जोरदार लड़ाई  से जो सन्यासी और अंग्रेजों के बीच होती है। इस लड़ाई में जहां अंग्रेजों की ओर से देसी-विदेशी मुट्ठीभर सैनिक लड़े वहीं सन्यासियों की ओर से दसों हजार सैनिकों ने हिस्सा लिया। इस लड़ाई में महेंद्र ने जहां तोपें बनाकर लड़ाई का रुख सन्यासी की ओर किया तो वहीं जीवानंद, धीरानंद का लड़ाई के मैदान में जौहर कमाल का था। इस लड़ाई में सन्यासियों की जीत होती है।

आनंदमठ की बात जाए और वंदे मातरम का नाम आए ऐसा कैसे हो सकता है? इसी उपन्यास से वंदे मातरम गीत लिया गया है। पूरे उपन्यास में वंदे मातरम जोश जगाने वाला गीत था। जो मातृभूमि के प्रति समर्पण जाहिर करने का तरीका है। वंदे मातरम का गान युद्ध की भूमि से लेकर पूजा करने तक शामिल है। वंदे मातरम गीत भारतीय स्वतंत्रता का गीत बना जो बाद में हमारे देश का राष्ट्रीय गीत बना।

किताब की बात की जाए तो बेहद ही शानदार है जो हमारे इतिहास और कल्चर के बारे में बताती है। जरूर इस किताब को पढ़ना चाहिेए। जय हिंद!!!

सोमवार, 24 मई 2021

बकस्वाहा जंगल : सवा दो लाख पेड़ों की कीमत पर हीरे की चमक फीकी हो जाएगी

  



2,15,875 लाख पेड़ काटे जाएंगे। शायद ये आंकड़ा इससे भी ज्यादा हो या बहुत ज्यादा हो। मैं कहूंगा कि ये पेड़ नहीं काटे जाएंगे बल्कि पर्यावरण की हत्या होगी। जिस बुंदेलखंड में लोग पानी के लिए तरसते हैं। जहां खेती के नाम पर साल का आधा समय वीरान रहता है वहां इस तरह की हरकत बड़े विनाश को जन्म देगी। बुंदेलखंड संस्कृति और सभ्यता का गढ़ रहा है। इसमें कोई दोराय नहीं की बुंदेलखंड खनिज के मामले में अग्रणी है। खासकर मध्यप्रदेश वाले जिले।


भारत में मध्यप्रदेश का पन्ना जिला अकेला ऐसा जिला है जहां हीरा का उत्खनन होता है। अनुमान के मुताबिक पन्ना में कुल 22 लाख कैरेट हीरा था जिसमें से आजतक 13 लाख हीरा का उत्खनन किया जा चुका है। इसका मतलब है कि आने वाले वर्षों में पन्ना की खदानों में हीरा खत्म हो जाएगा। मध्यप्रदेश इस गौरव को कैसे जाने दे सकता है। एकमात्र हीरा उत्पादक राज्य - मध्यप्रदेश।

अभी कुछ समय से एक जगह का नाम सोशल मीडिया में जोर शोर से लिया जा रहा है 'बकस्वाहा'। मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले में बकस्वाहा जिले में हीरे के नए भंडार की खोज हुई है। छतरपुर बुंदेलखंड का ही जिला है जो पन्ना जिले का पड़ोसी है। छतरपुर से ज्यादा इसकी एक जगह जो विश्व भर में प्रसिद्ध है वो है खजुराहो को लोग जानते हैं। बकस्वाहा विंध्याचल पर्वत श्रेणी पर स्थित है जिसे भूगर्भशास्त्री अपशिष्ट पर्वत भी कहते हैं जो हिमालय से भी पुराना पर्वत है।

बकस्वाहा, पन्ना नेशनल पार्क के पास स्थित है। यदि इस जगह को कोई नुकसान होता है तो यहां के पूरे इकोलॉजिकल सिस्टम पर प्रभाव पड़ेगा। पन्ना नेशनल पार्क में टाइगर रिजर्व भी है। जिस पहाड़ी पर बकस्वाहा स्थित है उसी से केन नदी का उद्गम भी है। पन्ना और छतरपुर के कुछ हिस्से मिलकर बायो डायवर्सिटी बनाते हैं जिसमें पन्ना नेशनल पार्क भी शामिल है। हीरा कितनी पर हम उत्खनित करेंगे। बायो डायवर्सिटी कोई आम बात नहीं है, यूनेस्को द्वारा घोषित भारत में केवल 18 बायो डायवर्सिटी हैं जिसमें पन्ना भी शामिल है।

जिस हीरे के लिए पेड़ों को काटा जाएगा वो कभी जंगल थे। आप तो जानते ही होंगे कि कार्बन के दो अपरूप होते हैं जिसमें ग्रेफाइट और हीरा शामिल हैं। हीरा मात्र कार्बन है। शुरुआत कहां से हुई? मध्यप्रदेश शासन ने विश्व की सबसे बड़ी उत्खनन कंपनी रियो टिंटो को हीरा खोजने का काम दिया। कंपनी साल 2007 से लेकर 2010 तक सर्वे किया। इस सर्वे में कंपनी ने बताया कि छतरपुर के पास बकस्वाहा में लगभग 3.42 करोड़ कैरेट का हीरा है। इस बात से सरकार के मन में आशा की नई किरण आई क्योंकि सरकार को राजस्व का एक बड़ा हिस्सा दिखाई दिया।

कंपनी ने सरकार के सामने बड़े प्लान रखे जिसमें लगभग 11 लाख पेड़ कटने थे। बात जमी नहीं ऐसा कहा जाता है कि सरकार और कंपनी के बीच अनबन हो गई और कंपनी ने बोरिया बिस्तर बांधा और चलती बनी। साल 2019 में फिर से सरकार ने हीरे के उत्खनन के लिए नीलामी शुरुआत की। इस नीलामी में दो कंपनियां सबसे आगे रहीं जिसमें बिरला और अडाणी थी। इस डील को बिरला ने जीत लिया।

इस नीलामी की बोली लगी 55 हजार करोड़ की। सरकार को इस डील में से मिलेंगे लगभग 23 हजार करोड़ रुपये। बस इस डील का फायदा केवल इतना है कि पेड़ काटे जाएंगे 2.15 लाख। दया के नाम पर पेड़ों की संख्या घटा दी ताकि लोगों को इस उत्खनन के प्रति सहानुभूति हो। जिंस देश में लोगों को स्वच्छ हवा और पानी नहीं मिलता हो वहां इतने सारे पेड़ काटना तो मूर्खतापूर्ण ही है। डील यहीं तक नहीं है। कंपनी सरकार से लगभग 62 हेक्टेयर जमीन उत्खनन के लिए मांगी है। इसके अलावा लगभग 382 हेक्टेयर जमीन की मांग और की गई है ताकि इंडस्ट्री स्थापित की जा सके। ये इंडस्ट्री हीरे की कटिंग और पॉलिशिंग से संबंधित होगी।

बेशक इंडस्ट्री की जरूरत है लेकिन पर्यावरण को ताक पर रखकर तो बिल्कुल नहीं। इस हीरे के उत्खनन के लिए जितने पेड़ों को काटा जाएगा उतने पेड़ों को दोबारा लगाया जा सकेगा। यदि एक बार को इसे हां में मान भी लिया जाए तो उतनी विविधता के पेड़ लगाए जा सकेंगे जो आज जंगल में मौजूद हैें। पेड़ों के नाम एक ही तरह के पेड़ लगाए जाएंगे या तो यूकेलिप्टस या बांस या कोई और। यूकेलिप्टस को तो इकोलॉजी का शत्रु कहा जाता है।

नई डील के मुताबिक ये कहा गया है कि बकस्वाहा वाले भाग में कोई भी जैव विविधता नहीं है। वहीं पांच साल पहले हुए एक सर्वे में ये बताया है कि यहां हिरण, चीतल, जंगली भैंसा, बाघ के मूवमेेंट मिले हैं। पता नहीं ये कैसे हो जाता है कि कुछ ही सालों में सबकुछ बदल जाता है और सबकुछ नया हो जाता है। क्या कहीं .ऐसा होता है कि किसी नेशनल पार्क या बायो डायवर्सिटी के पास वाले इलाके में कोई जैव विविधता नहीं होगी। ये सुनकर और पढ़कर तो केवल हंसी आती है।

पता नहीं क्या होगा? मेरी ये आशा है कि जो भी हो अच्छा हो। जंगल हमारे लिए प्राथमिकता होने चाहिए। हीरा हमारे लिए प्राथमिकता की श्रेणी में नहीं होने चाहिए। जंगल हमें वो देते हैं जो हीरा कभी नहीं दे सकता है। हीरे के लिए हीरे को हमें नहीं खोना चाहिए।

BY_vinaykushwaha


(फोटो इंटरनेट से डाउनलोड की गई है)

मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

कोरोना 2.0 बच्चों के लिए काल बनकर आया है!

 


देश में अबतक 12 करोड़ लोगों को वैक्सीन लग चुकी है। ये 12 करोड़ लोग कुल जनसंख्या का लगभग 9 फीसदी बैठता है। जहां भारत में 45 साल से ऊपर वालों को वैक्सीन ड्राइव चलाई जा रही है वहीं यूएस में 16 साल से अधिक उम्र के लोगों का टीकाकरण किया जा रहा है।भारत में कोरोना की पहली लहर में जहां बच्चे  काफी हद तक सुरक्षित थे, वहीं कोरोना की दूसरी लहर में बच्चों पर प्रभाव दिखना शुरू हो गया है। कई मीडिया रिपोर्टस में सामने आया है कि कोरोना की दूसरी लहर में बच्चे ज्यादा शिकार हो रहे हैं। भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से बच्चों में किसी भी प्रकार के घातक प्रभाव के बारे में कोई जानकारी पब्लिक डोमेन में नहीं आई है।

कोरोना की दूसरी लहर जिसे इंडियन म्यूटेंट भी कहा जा रहा है। हेल्थ एक्सपर्ट  का कहना है कि ये डबल म्यूटेंट वायरस है जो पहले की अपेक्षा ज्यादा खतरनाक है। वायरोलॉजिस्ट का कहना है कि भारत में ये डबल म्यूटेंट वायरस यूके और ब्राजील से भारत में आया। यूके और ब्राजील वेरियेंट ने भारत में आकर अधिक तबाही मचाई है।  विश्व स्वास्थ्य संगठन कहना है कि कोरोना से बच्चे ज्यादा संक्रमित नहीं होते बल्कि वे इसके वाहक होते हैं। भारत में अब वयस्कों के साथ-साथ बच्चे भी इसका शिकार बन रहे हैं। 

ब्राजील में अबतक कोरोना की वजह से   1300 बच्चे काल के गाल में समा गए हैं। दक्षिण अमेरिका के इस देश ने सबको चौंका दिया है क्योंकि ब्राजील की स्वास्थ्य प्रणाली विश्व की  बेहतरीन थी। लेकिन चूक कहा हुई एक्सपर्ट का कहना है कि ब्राजील में कोविड 19 के टेस्ट बहुत ही कम हो रहे हैं। ऐसी भी खबर सामने आ रही है कि टेस्ट न होने की वजह से रोगी का सही ट्रीटमेंट नहीं हो पा रहा है और कोरोना के कारण उसकी मृत्यु हो जा रही है। भारत में बच्चों में कोरोना के लक्षण सामने आने का एक कारण ये भी हो सकता है कि लोग बच्चों का कोरोना टेस्ट करा रहे हैं। 

भारत में कोरोना की  पहली लहर में सबकुछ बंद था। कोई भी गतिविधि नहीं हो रही थी। ट्रेन, बस, एयरपोर्ट सब बंद थे। मॉल, स्कूल-कॉलेज, यूनिवर्सिटी, बाजार, सरकारी ऑफिस भी बंद था। लोग घरों में कैद हो गए हो गए थे। बच्चों का घरों से बाहर निकलना बंद हो गया था। बच्चों ने हाइजिन की नई परिभाषा सीख ली थी। मास्क, सैनिटाइजर और दो गज की दूरी रखना बच्चों ने सीख लिया था। भारत में जैसे ही धीरे-धीरे अनलॉक होने लगा तो बच्चों में ये आदतें धीरे-धीरे जाती रही। लोग बच्चों को लेकर शादी, सोशल प्रोग्राम, नई-नई जगह घूमने जाने लगे जिसका नतीजा नए स्ट्रेन ने बच्चों को भी अपनी गिरफ्त लेना शुरू कर दिया ।

इसमें कोई दोराय नहीं है कि कोरोना का दूसरी लहर ने लोगों को परेशान किया है। आईसीएमआर(ICMR), नीति आयोग और एम्स के डायरेक्टर रणदीप गुलेरिया की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में कुछ मुख्य आंकड़ें दिए गए। इन आंकड़ों में कहा गया है कि भारत के कुल संक्रमितों में 0 से 19 आयु वर्ग वाले बच्चों का हिस्सा मात्र 5.8 फीसदी है। यह आंकड़ा पिछली लहर से मात्र 1.8 फीसदी ज्यादा है जो पिछली बार 4.2 फीसदी था। दूसरी लहर में कोरोना से संक्रमित होने वाले सबसे ज्यादा लोगों में 40 से अधिक आयु वर्ग वाले लोगों का है। 

बच्चों की चिंता सबको है क्योंकि वे देश का भविष्य हैं। कोरोना इस दुनिया के लिए अभिशाप है। लोगों को धैर्य से काम रखना होगा। बच्चों में कोई लक्षण दिखाई दे तो टेस्ट कराएं। टेस्ट कराने के बाद सबकुछ सामने आता है। बेवजह न घबराएं। मास्क, सैनिटाइजर और दो गज की दूरी का पालन करवायें। यही एक उपाय है।  

 BY_vinaykushwaha 

रविवार, 18 अप्रैल 2021

कोरोना की भयंकर लहर में किसान आंदोलन की कितनी जरुरत है?

 


भारत में कोविड 19 के अब 2 लाख से ज्यादा केस रोजाना मिलने लगे हैं। विश्व में भारत फिर से रोजाना कोविड 19 के रोजाना केस के मामले में सबसे आगे बढ़ने की होड़ में है। हर रोज कोरोना काल बनकर 800 लोगों को लील रहा है।  कोविड की दूसरी लहर जानलेवा है...नहीं-नहीं....भयानक महाविनाश है। लोगों को समझ आ गया है कि करना क्या है। आज लोगों को मास्क और सैनिटाइजर की अहमियत समझ आ गई है। कुछ लोग है कि मानते ही नहीं। उन्हें न तो अपनी चिंता है न औरों की । वो तो केवल अपने तथाकथित अधिकारों की बात कर रहे हैं।

किसान आंदोलन इस कोरोना की भयानक लहर में भी जारी है। दिल्ली की बॉर्डर पर बैठे ये किसान अपने अधिकारों की बात कर रहे हैं। तीन कृषि कानून को वापस लेने के लिए सरकार के आगे दृढ़निश्चय होकर संकल्प लेकर बैठ गए हैं। किसानों का कहना है कि जब तक मांग पूरी नहीं होगी तब तक दिल्ली बॉर्डर से हिलेंगे तक नहीं। मुझे समझ नहीं आता कि ये किस तरह का विरोध प्रदर्शन है जहां एक ओर सारा देश कोरोना से जंग लड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर ये किसान अपनी मांगों को लेकर अड़िग हैं।

इन किसानों ने गर्मी का सारा इंतजाम कर लिया है। एयर कंडीशनर वाली हट या झोपड़ी तैयार हो गई हैं। सबकुछ इंतजाम हो गया है। किसानों को लग रहा है कि उनका भी वही हाल न हो जाए जो शाहीनबाग का हुआ था। कोरोना के कारण शाहीन बाग से प्रदर्शनकारियों को हटाया गया था। किसानों को समझना चाहिए ये समय लड़ाई का नहीं समन्वय का है। आंदोलन तो सबकुछ सामान्य होने के बाद भी जारी रख सकते हैं। भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) के अध्यक्ष राकेश टिकैत का कहना है कि हमारे मांगें पूरी होंगी तभी यहां से हटेंगे।

एक निजी चैनल को इंटरव्यू देते हुए कहा कि क्या हमारे आंदोलन खत्म करने से देश में कोरोना खत्म हो जाएगा? बंगाल के चुनाव में भी किसान आंदोलन की बयार चल रही है। किसानों के मुद्दों को किसान संगठन बंगाल के कोने-कोने तक फैला रहे हैं। दबी खबर तो ये है कि सरकार किसान  आंदोलन को खत्म करने पर विचार कर रही हैं। कई मीडिया रिपोर्टस कह रही हैं कि केंद्र सरकार ने हरियाणा सरकार को किसानों को दिल्ली बॉर्डर से हटाने की जिम्मेदारी दी है। केंद्र सरकार हवाई सर्वेक्षण करवाकर अर्ध्दसैनिकों के व्दारा किसानों को सिंघु और टीकरी बॉर्डर से हटवाना चाहती है।

कोरोना के चलते लॉकडाउन और किसान आंदोलन के चलते रास्ते बंद होना लोगों के लिए सिर दर्द बन गया है। परेशान लोग अब किसी नतीजे का इंतजार कर रहे हैं। खबर है कि लोगों ने यूपी सरकार उच्च अधिकारियों के जरिये सीएम योगी आदित्यनाथ तक रास्ते की सिरदर्दी वाली खबर पहुंचाई है। लोगों को भी आशा है कि ये आंदोलन खत्म हो तो हमें राहत की सांस लेने मिले।

किसानों को अपनी और दूसरों की चिंता होनी चाहिए। दिल्ली में कोरोना के रोजाना  मामले 20 हजार को पार कर गए हैं। वहीं यूपी में 26 हजार और 7 हजार से ज्यादा रोजाना कोरोना के केस सामने आ रहे हैं। दिल्ली सीएम अरविंद केजरीवाल ने वीकेंड लॉकडाउन लगा दिया है। दिल्ली में कभी संपूर्ण लॉकडाउन लग सकता है। यूपी में पंचायत चुनाव खत्म होने वाले हैं तो इसके बाद तो यूपी में भी लॉकडाउन लगना तय है। किसान चारों ओर से फंस जाएंगे फिर उन्हें अपनी ही बात अंधेरे में तीर मारने जैसे लगने लगेगी।


📖 BY_vinaykushwaha 

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2020

चलते-चलते (सीरीज - 18)


बड़े-बुजुर्ग कहते हैं कि सुबह उठना सेहत के लिए लाभदायक है और सुबह उठने से ढेर सारे काम हो जाते हैं। सुबह की ठंडी हवा तन-मन को तरो-ताजा कर देती है। गुनगुनी धूप आपको विटामिन डी देती है और आपको सेहतमंद बनाती है। ये बातें सुनने में जितनी कानों को जितनी अच्छी लगती हैं, उतनी अच्छी तरीके से इन्हें फॉलो करना आसान नहीं है। कम से कम मेरे लिए तो बिल्कुल नहीं क्योंकि मैं उल्लू हूं। मैं ढेर सारे काम रात में ही निपटाया करता हूं। पढ़ना हो, वेब सर्फिंग, एक्सप्लोरिंग हो या ब्लॉग लिखना। मेरे लिए तो ये सब एक साधारण काम की तरह है। कॉफी का कप हो या चाय का कप और खाने के लिए स्नैक हो। रात में जागना मेरे लिए संजीवनी है।                         
ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि मुझे सुबह बिल्कुल पसंद नहीं है। सुबह मुझे तो मखमली लगती है। गुनगुनी धूप में बैठना, सैर पर जाना, चाय की चुस्की लेना और अखबार पढ़ना ये सब सुबह के अभिन्न अंग हैं। ठंड की धूप के क्या कहने...वाह...वाह... किया जा सकता है। ठंड का मौसम मेरे लिए अमृत है। मेरा सबसे पंसदीदा मौसम । मुझे तो  कभी-कभी ऐसा लगता है कि बारह महीने ठंड का मौसम हो और मैं इसी तरह ठंड का लुत्फ उठाते रहूं। ठंड का मौसम होता है सुबह-सुबह गुनगुनी धूप में बैठकर चाय की चुस्की लेने का, अखबार पढ़ने का और गरमा-गर्म नाश्ता करने का। रेवड़ी, गजक, चिक्की, लइया खाने का। गन्ना, सीताफल, सिंघाड़ा का आनंद लेना है तो ठंड बहुत जरूरी है।

ठंड में बिस्तर का क्या कहना? इस बिस्तर से निकलने का जी चाहता ही नहीं है।  रजाई, कंबल और स्वेटर, जैकिट की सजावट जी को ललचाती रहती है। शॉल की गर्मी शरीर को आराम में चार चांद लगा देती है। बिस्तर का मोह त्यागना आसान नहीं होता है। ब़ड़े सोचने-विचारने के बाद बिस्तर को टाटा, बाय-बाय, सायोनारा कहना पड़ता है। पानी तो मानो इस तरह लगता है कि जैसे हिमालय से सप्लाई हो रहा है। पानी को आग पर तपा कर उसे गर्माहट दी जाती है ताकि छूने पर दांत न किटकिटाएं। फिर भी  ठंड में कुछ इस तरह लगता है कि हम केवल बस यूं ही वक्त बिताएं। 

जब मैं सर्दियों के मौसम में अपने गांव जाता था तो चाय पीने के बाद सीधे खेत की तरफ दौड़ लगाता था। हमारे बघेलखंड में इस मौसम में गेहूं, चना, अरहर, सरसों जैसी फसल बोईं जाती हैं। पहले इतना ज्ञान तो था नहीं फिर भी खेल-खेल में समझते थे। खेत की बारी में जाकर बिही(जिसे अमरूद भी कहा जाता है) खाते थे। सीताफल तोड़कर खाते थे। खेतों में सरपट दौड़ लगाते थे। भले फिर चाहे दादी डंडा लेकर दौड़ लगाएं। ये तो हुई सुबह की बात। दोपहर को हम नदी किनारे पहुंच जाया करते थे। तैरना तो आता नहीं था तो किनारे ही  बैठकर थोड़े से पानी में नहाकर वहीं कपड़े पहनकर आन टोला (जिसे दूसरा मोहल्ला कहा जाता है) चले जाते थे। वहां सूरजमुखी और बेर का जायजा लेकर आते थे। 

शाम को लौटते हुए खेत से हरी और ताजा सब्जी तोड़कर ले जाते थे। रात का खाना मतलब चूल्हे की गरमा-गरम रोटी और सब्जी जीभ को तृप्त कर देती थी। मिट्टी के तेल (कैरोसिन) से बनी चिमनी(लैंप) के सामने बैठकर खाना खाया करते थे। खाने का मजा तब और बढ़ जाया करता था जब गक्कड़ और भरता खाया करते थे। रात में गप्पे लगाते थे और पैरा(पराली) से बने गद्दे में सोया करते थे। रात में नीले और साफ आकाश में ढेर सारे तारे दिखाई देते थे। गांव की रात शांत और गंभीर हुआ करती थी। इस गंभीरता को तोड़ते थे झींगुर और टिटहरी(रात में बोलने वाला पक्षी)। झींगुर फिर भी रहम खाकर बीच-बीच में चुप हो जाया करते थे लेकिन टिटहरी रात शोर मचाती थी और कभी-कभी तो सुबह तक। 

सूरज की लालिमा आसमान में छिटकने से पहले ही मुर्गियों की बांग सुनना और गाय-भैंस के अम्मा की वाली चिर-परिचित आवाज सुनने मिलती। दूर-दूर तक कोहरे की चादर और कोहरे के बीच बुत से खड़े पेड़ होते। घेरे में बैठकर गांव के बड़े लोगों का आग  तापना और बच्चों की भांप प्रतियोगिता यानी मुंह से कौन कितनी भांप निकालता है।  सूरज के क्षितिज पर आते ही वो चू्ल्हे वाली चाय का स्वाद आज भी याद है। चाय का सौंधापन मुंह में रच-बस जाया करता था। 

ठंड के मौसम में यात्रा करने का अपना ही मजा है। ट्रेन, बस और हवाई जहाज तीनों का अपना ही अलग मजा है। कोहरे को चीरती ट्रेन मानो इस तरह लगती है कि जैसे कोई दिव्यात्मा प्रकट हो गई हो। ट्रेन की ठंडक भरी यात्रा चाय की चुस्की आपको अलग ही आनंद देती है। दूर तक फैले खेत, पहाड़, मैदानों में कोहरे की चादर को झीना करती सूरज की किरण दिखाई देती है। हवाई जहाज से पूरा शहर ही दिखाई देता है कि कैसे कोहरे की चादर शहर को लपेटे रहती है। ऊपर से सबकुछ धुंधला दिखाई देता है लेकिन बहुत प्यारा दिखाई देता है।  

सर्दी के मौसम में मकर संक्रांति का पर्व मुझे सबसे शानदार लगता है। गजक, रेवड़ी, तरह-तरह के लड्डू, मुंगौंड़ी खूब पसंद है। तिल के लड्डू, बेसन के लड्डू, चावल के आटे के लड्डू, गुड़ के लड्डू, मखाने के लड्डू, गेहूं के आटे के लड्डू मानो अंतहीन श्रृंखला यूं ही चलते रहे। मुझे तो लगता है कि साल में मकर संक्रांति पचास बार आए। हरी सब्जी वाली खिचड़ी और ऊपर से टमाटर की चटनी मिलाकर खाना ठंड के असली मजे हैं।

ठंड की महानगाथा है मैंने तो बहुत कुछ जोड़ दिया बाकि आपके लिए। ठंड सदैव रहे....। 

📃BY_vinaykushwaha

सोमवार, 28 सितंबर 2020

मेरा दो दिनों वाला वीक ऑफ





भारत में पांच दिनों के वर्किंग कल्चर वाला माहौल कम देखने को मिलता है लेकिन मेरा सौभाग्य था कि मुझे मिला। पहली फुलटाइम नौकरी में दो दिनों का वीक ऑफ बड़े किस्मत वालों को मिलता है। एबीपी न्यूज में नौकरी करने के दौरान दो दिनों वाला वीक ऑफ का आनंद मैंने जमकर उठाया। घूमने का शौक था और जीवन में नौकरी के अलावा और भी बहुत कुछ करना था इसलिए मैंने इन दिनों को जीभर के जीया। शिफ्ट खत्म करके जल्दी से घर आना और फिर ट्रेन, बस या प्लेन पकड़कर घूमने निकल जाना। 


घूमना मेरे लिए हमेशा से नई ऊर्जा देने वाला रहा है। घर से पढ़ाई करने के दौरान भी मैं घूमने निकल जाता था। कभी जंगलों को देखने, कभी नदी को निहारने, कभी ऐतिहासिक जगहों पर, कभी मंदिरों को देखने, कभी शहर की नब्ज टटोलने, कभी अपने पूर्वजों को देखने निकल पड़ता था। घूमने के बाद में मुझे जो सुकून मिलता है वो और किसी एक्टिविटी से नहीं मिलता। साल 2018 में दिल्ली आने के बाद घूमने का मतलब मेरे लिए केवल खंभा छूकर आना नहीं था। हमारे बघेलखंड में एक कहावत है "खंभा छूकर आना" इसका मतलब है जल्दबाजी करना। दिल्ली आने के बाद मैं घूमने का मतलब ट्रैवलिंग और ट्रैवलॉग में बदल गया। 


मीडिया में काम करने वाले जानते हैं कि सभी एम्प्लाई को वीक ऑफ एक साथ नहीं मिलता है। वो बड़े किस्मत वाले होते हैं जिन्हें वीक ऑफ शनिवार और रविवार को मिलता है। मुझे तो वीक ऑफ सोमवार से शुक्रवार के बीच ही मिलता था। इन दो दिनों को मैंने खूब जिया और जीभर के जिया। दिल्ली में रहने का एक फायदा ये होता है कि यहां से देश के किसी भी कोने में जाने के लिए ट्रेन, बस और फ्लाइट आसानी से मिल जाती है। इसका ये फायदा होता है कि आपका ढेर सारा समय बचता है। दिल्ली के आसापास घूमने के लिए ढेर सारे ऑप्शन भी हैं। जिंदगी जीने के लिए आप जो भी करें लेकिन मेरा मानना है कि आप घूमने जरूर निकलें।


राजस्थान, बिहार, यूपी, एमपी, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, हिमाचल, छत्तीसगढ़, जम्मू कश्मीर में खूब घूमा। कई बार लोग मुझसे पूछते हैं कि इतना घूम कैसे लेते हो? मेरा केवल एक ही जवाब होता है कि बस घूम लेता हूं। मुझे पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम की एक बात हमेशा याद आती है कि "सपने वो नहीं होते जो आप सोने के बाद देखते हैं, सपने वो होते हैं जो आपको सोने नहीं देते''। घूमने के लिए मेरा इतना ज्यादा उत्साह है कि गहरी नींद से उठकर भी घूमने के लिए तैयार हूं। कॉलेज में उन लोगों में से एक था जो घूमने का प्लान बनाते थे और घूमने के लिए सबसे पहले हामी भरते थे।


कॉलेज में पढ़ाई के दौरान घूमने का समय ही समय था लेकिन पैसों की कमी होती थी। आज जब सारे दोस्त नौकरी कर रहे हैं तो पैसा तो है लेकिन टाइम नहीं है। खैर मैं तो ठहरा अल्हड़ आदमी। सभी जगह अकेले ही निकल पड़ता हूं। दिल्ली के चांदनी चौक जाकर गली कूचों में घूमना हो या जयपुर में बड़ी चौपड़ में घूमने, राजस्थान की रेत के धोरे देखना हो या उत्तराखंड, हिमाचल के पहाड़ देखना। सबकुछ मेरे लिए रोमांच से भर देने वाला है। सोलो ट्रेवलिंग का भूत कोरोना काल में बड़े मुश्किल से उतरा। खुद को बहुत समझना पड़ा कि विनय बाहर खतरा बहुत है जरा संभलकर। कोरोना की वजह से मैंने घूमना-फिरना बिल्कुल बंद कर दिया है। मार्च से सितंबर तक 6 महीने हो चुके हैं नोएडा से बाहर नहीं निकला हूं। कभी-कभी लगता है कि किसी काल कोठरी में कैद हो गया हूं। 


कोरोना का ये दौर जल्दी से गुजर जाए। मुझ जैसे कितने ही परिंदे पिंजड़े में फड़फड़ा रहे होंगे। दो दिनों के वीक ऑफ में घूमने इतना आसान भी नहीं था। पहले से टिकट करना, होटल बुक करना, कैब बुक करना, कोई हॉली डे तो नहीं ये देखना, ऑफिस का ओवर टाइम, बॉस का वीक ऑफ ही कैंसिल कर देना और भी बहुत कुछ। कई बार तो मैं नाइट शिफ्ट पूरी करके दिन में ही निकल पड़ता था घूमने। अपनी नींद ट्रेन और बस में ही पूरी करता था। कई बार दिन की शिफ्ट पूरी करता और नाइट को ट्रैवल करता था। इसकी सबसे बड़ी वजह होती टाइम सेविंग। इस तरह मैं घूमने के लिए ज्यादा से ज्यादा समय बचा पाता था। 


जहां मैं घूमने जाता था उसके बारे में सारी जानकारी पहले से ही जुटा लेता हूं। मैं कुछ चुनिंदा जगहों को चुनता हूं और उसका इतिहास, भूगोल और वर्तमान सबका छानबीन लेता हूं। कम खर्च हो उसके लिए मैं शहर में टूरिस्ट प्वॉइंट जाने के लिए पैदल सफर करता हूं। कम किराए वाले होटल चुनता हूं। रेस्त्रां भी इस तरह चुनता हूं कि महंगें ना हों, खरीददारी नहीं करता हूं क्योंकि टूरिस्ट प्लेस चीजें सबसे महंगी बिकती हैं। कोशिश करता हूं कि ऑनलाइन पेमेंट करूं ताकि समय और पैसे दोनों बचा सकूं। म्यूजियम और दूसरी जगहों पर लगने वाले टिकट को पहले से ही संभव हो तो ऑनलाइन बुक कर लेता हूं। पानी की बोतल साथ लेकर चलता हूं ताकि बार-बार पानी की बोतल नहीं खरीदना पड़े। 


ठंड में सबसे ज्यादा घूमने की कोशिश करता हूं। इसके दो फायदे हैं पहला ट्रेन, बस और फ्लाइट में टिकट जल्दी और आसानी से मिल जाती है, दूसरा भीड़-भाड़ से मुक्ति मिलती है। गर्मियों के दिनों में घूमने वालों की भीड़ बढ़ जाती है। बच्चों की स्कूल की छूट्टी के कारण लोग बड़ी संख्या में घरों से बाहर निकलते हैं। बारिश में घूमना आपको कष्ट दे सकता है। बारिश आपके घूमने के प्लान को कभी भी मिट्टी पलीत कर सकती है। हां, आप किसी ऐसी जगह जा रहे हैं जहां बारिश में ही मजा है तो बात अलग है। मुझे जब भी मानसून में घूमने जाना पड़ता है तो दो-चार दिनों का वेदर अपडेट साथ रखता हूं। देख लेता हूं कि जब मैं घूमने जा रहा हूं तब एक्स्ट्रीम वेदर तो नहीं है ना।  

घूमना आसान नहीं है लेकिन दुनिया का सबसे रोमांचित करने वाला शौक  है। 

मंगलवार, 8 सितंबर 2020

चलते-चलते (सीरीज - 17 ) : मेरा अंतर्मुखी होेना मेरे लिए कैसे कष्टदायक साबित हुआ

 

आज मुझे नोएडा में रहते हुए 2 साल से भी ज्यादा हो गए हैं। कभी सोचा भी नहीं था कि दिल्ली-एनसीआर में रहूंगा और एबीपी जैसे बड़े न्यूज चैनल में काम करने का मौका मिलेगा। साल 2018 में जब मेरा कैंपस सिलेक्शन हुआ तो मुझे ज्यादा खुशी नहीं हुई थी क्योंकि मन में कुछ और ही था। मन में जो था उसका यहां जिक्र नहीं करूंगा लेकिन कुछ-कुछ बातें जरूर कहूंगा। मुझे कैंपस सिलेक्शन से भले ही खुश नहीं थी लेकिन दुखी भी नहीं था। मेरा मन तो उन लोगों के लिग दुखी था जो आस लगाए बैठे थे कि एबीपी न्यूज आएगा और हमारा सिलेक्शन होगा। मेरे कुछ दोस्त तो इसके लिए वाकई लायक थे। कई के पास एक्सपीरियंस था तो कई टेक्नोलॉजी में आगे थे तो कई तेज-तर्रार थे। मैं अपने आपको रेस में कहीं भी नहीं गिनता ही नहीं था। 


जब मेरा एबीपी न्यूज में सिलेक्शन हुआ तो कुछ की सोच ऐसी थी कि इसका कैसे हो गया। ये है कौन ? इससे अच्छा तो वो था फिर भी उसका सिलेक्शन नहीं हुआ। मेरे बारे में तरह-तरह के विचार गढ़े जाते थे। मैं जानता था ऐसा होना लाजिमी था। इसका सबसे बड़ा कारण था मेरा अंतर्मुखी होना जिसे अंग्रेजी में Introvert कहते है। मैं ज्यादा लोगों से बात नहीं करता था। मुझे नए लोगों से मेलमिलाप में कठिनाई होती है। मैं थोड़ा रिजर्व तरह का इंसान हूं। मैं किसी से ज्यादा बात नहीं करता लेकिन जब मेरा कोई दोस्त बन जाता है तो मैं उससे खूब बातें करता हूं। यूनिवर्सिटी में जब मैंने एडमिशन लिया था तब मैं क्लास लेता था और सीधे अपने रूम पर चला जाता था। न किसी से मिलना, न किसी से बातचीत करना और न ही किसी को हैलो-हाय करना। जीवन में मुझे बहुत कुछ मिला है। 

जिसकी मैंने इच्छा भी नहीं की वो भी मुझे बड़े आराम से मिला। मैंने पहले सेमेस्टर में मैंने शायद ही किसी से बात की हो, हां ये जरूर है कि जरूरत पड़ने पर मैंने लोगों से बात की है। दूसरे सेमेस्टर में मेरा दायरा बढ़ा, मैंने लोगों से दोस्ती की। मेरी दोस्ती क्लास तक ही सीमित थी। वहीं तब तक मेरे क्लासमेट के फ्रेंड यूनिवर्सिटी के दूसरे डिपार्टमेंट के भी बन चुके थे। इसका सबसे बड़ा कारण ये हो सकता है कि मैं बहुत अकडू और अक्खड़ स्वभाव का था। मैं किसी से सीधे मुंह बात नहीं करता था। लोगों का मजाक मुझे पसंद नहीं था। धीरे-धीरे ये स्वभाव गुम होता चला गया और मेरे दोस्तों का दायरा बढ़ता चला गया। फर्स्ट सेमेस्टर की अपेक्षा सेकेंड सेमेस्टर में मेरे दोस्तों का दायरा बढ़ा। मैं उन लोगों के करीब आता गया जो मेरे टाइप के नहीं थे। जीवन बहुत कुछ सिखाता है।


तीसरे सेमेस्टर में वो सारी गतिविधियां होने लगीं जो मुझे अनैतिक लगती थीं। चाय की दुकान पर घंटों तक बैठना, कैंटीन में बैठकर गप्पे मारना, कॉलेज में फालतू बैठना, शॉपिंग मॉल जाना, घूमने जाना और रात में देर तक घूमना। सब कुछ धीरे-धीरे अच्छा लगने लगा। कभी-कभी तो मन करता था कि ये मैं नहीं हूं। मैं कभी भी इस तरह से अपने आपको नहीं पाया था। चौथे सेमेस्टर तक यूनिवर्सिटी से इतना लगाव हो गया मन में केवल यूनिवर्सिटी समा गई। जीवन को सरल और सीधा देखने वाला इंसान आज इतना ज्यादा कॉम्प्लेक्स हो गया कि कई बार मैं अपने आपको देखकर सोचता था कि क्या ये सही है। कई बार तो ये भी होता था कि मैं और मेरे दोस्त रात में घूमने के लिए उज्जैन निकल जाते थे। भोपाल से रात 10 बजे निकलना और रात को 3 से 4 बजे तक पहुंचना फिर राम घाट में नहाना और फिर महाकाल मंदिर में जाकर दर्शन करना फिर दिन में भोपाल लौटना सबकुछ अलग अनुभव होता था। 


मैं खुद ट्रैवल लवर हूं। मुझे ट्रैवल करना पसंद है और ट्रेवलॉग लिखना पसंद है। कॉलेज में पढ़ाई के दौरान भी मैं कहीं ना कहीं चले जाता था। घूमने का मतलब ये नहीं कि मैं चार लोगों को साथ लेकर जाऊं ऐसा नहीं होता था। मैं सोलो ट्रैवल पसंद करता था। उस यात्रा की व्याख्या अपने ब्लॉग से करना मुझे पसंद था। आज भी ये सिलसिला जारी है और रहेगा शायद। आज मुझे घर से बाहर रहते हुए 6 साल से ज्यादा हो गया है। इन 6 सालों में मैंने जितना जिया और जितना सीखा है, उतना शायद पहले कभी नहीं। मेरे 6 साल कभी न भूलने वाले रहेंगे क्योंकि इन 6 सालों में मैंने कई राज्यों और ढेर सारे शहरों की यात्राएं की। यात्राएं हमेशा सबक देती हैं और कुछ करने के लिए कहती हैं। मैंने इन यात्राओं से सीखा अलग-अलग जगहों पर जाने से भाषा, बोली और ट्रैवल एक्सपीरियंस को बहुत संजीदा तरीके से लिया है। 


आज मैंने Introvert वाली दीवार को तोड़ी है लेकिन एक पतली झिल्ली मुझे तुरंत रिएक्ट करने से रोकती है। मेरी झिझक मुझे एकदम से कुछ करने से रोक देती है। ये झिझक मुझे लोगों से दूर ले जाती है और मुझे कुछ सीखने से रोकती है। आज झिझक को अलग करना चाहता हूं क्योंकि ये मेरे आगे बढ़ने में बाधक है। इस झिझक में मुझे वर्कप्लेस पर काम करने से रोका और नया कुछ सीखने से रोका। एबीपी न्यूज में काम करने के दौरान मैंने सीखा की लोग बहुत निर्दयी होते है। आपको जीवन जीने के लिए इस निर्दयी दुनिया में हमें जीवित रहने के लिए लड़ना बहुत जरूरी है।

 

BY_vinaykushwaha   

रविवार, 6 सितंबर 2020

पुस्तक समीक्षा : दलाई लामा की आत्मकथा "मेरा देश निकाला" (FREEDOM IN EXILE : THE AUTOBIOGRAPHY OF THE DALAI LAMA)


तिब्बत के बारे में आपने पहले भी सुना होगा। आज भले ही तिब्बत चीन का हिस्सा है लेकिन एक समय था जब तिब्बत एक स्वतंत्र देश था। तिब्बत के कई देश के साथ राजनीतिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंध थे। तिब्बत, चीन के दक्षिण में स्थित है जिसकी सीमा भारत, नेपाल और भूटान से लगती है। साल 1959 से पहले तक तिब्बत की अपनी सभ्यता और संस्कृति थी। यहां बौद्ध धर्म का अलग ही रंग देखने को मिलता था। चौदहवें दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो ने अपनी किताब "मेरा देश निकाला" में बताया है कि चीन ने कैसे सांस्कृतिक क्रांति के नाम पर तिब्बत पर कब्जा कर लिया।

किताब "मेरा देश निकाला" चौदहवें दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो की आत्मकथा है। ये किताब अंग्रेजी में लिखी गई Freedom in exile : The Autobiography of the Dalai Lama का हिंदी अनुवाद है। इस किताब में दलाई लामा ने अपने दलाई लामा बनने, तिब्बत पर चीन ने कैसे कब्जा किया, बातचीत का लंबा दौर, निष्कासन और भारत में शरण कैसे मिली इसके में बारे में सारी जानकारी दी है। किताब केवल और केवल दलाई लामा को नहीं बताती बल्कि तिब्बत की संस्कृति, तिब्बत के रहन-सहन और खान-पान, वहां के लोगों के बारे में जानकारी देती है। मठ, मंदिर और ऊंचे-ऊंचे हिमालय के बारे में भी जानकारी देती है। किताब भाषा से लेकर राजधानी ल्हासा और तिब्बत की खूबसूरती के बारे में दिलचस्प जानकारी देती है। पहले तिब्बत में किसी भी देश का आम नागरिक जा सकता था लेकिन आज चीन का कब्जा होने के बाद ऐसा करना मुश्किल है क्योंकि वहां टूरिस्ट पर कई तरह की पाबंदियां लगाई जाती है। 

दलाई लामा ने किताब में लिखा है कि तिब्बत के कई राज्य थे। इन्हीं में से एक राज्य था आमदो। इसी राज्य में चौदहवें दलाई लामा का जन्म हुआ था। तिब्बत में दलाई लामा को चिन्हित करने की परंपरा है जिसमें पूर्व के दलाई लामा अगले दलाई लामा के बारे में जानकारी देते थे। तेरहवें दलाई लामा थुबतेन ग्यात्सो ने ही तेनजिन ग्यात्सो का नाम सुझाया था। तेरहवें दलाई लामा की मृत्यु के बाद चौदहवें की खोज की गई उन्हें ल्हासा लाया गया। ल्हासा में ही उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई। ल्हासा के विशाल और भव्य पोटाला हाउस में रहते हुए तेनजिन ग्यात्सो ने अपनी सारी परिक्षाएं पास की थीं। 

जो लोग तिब्बत के विषय में जानना चाहते हैं और उत्सुक हैं उनको जरूर "मेरा देश निकाला" पढ़ना चाहिए। किताब  में तिब्बत के बारे में  ढेर सारी रोचक जानकारी दी गई हैं। कैसे तिब्बत में त्योहार मनाए जाते हैं? सबसे बड़ी जानकारी तो ये है कि दलाई लामा कैसे रहते है? क्या करते हैं? अपना समय कैसे व्यतीत करते हैं? सब कुछ है इस किताब में। बर्फ से ढंके पर्वत पर बसा तिब्बत बेहद शानदार देश था। दलाई लामा किताब में बताते हैं कि कैसे ठंड मौसम में पोटाला हाउस और गर्मियों के दिनों में नोबुलिंग्का हाउस में दलाई लामा दिन बिताते थे। किताब में दलाई लामा बताते हैं कि दलाई लामा के पास कोई दैवीय शक्ति (Super power) नहीं होती है। दलाई लामा भी आम इंसान की तरह होता है लेकिन लोगों की आस्था उसे बड़ा बनाती है। तिब्बतियों के लिए दलाई लामा सर्वोपरि हैं वे दलाई लामा को पहला व्यक्ति मानते हैं। चौहदवें दलाई लामा किताब में लिखते हैं कि तेरहवें दलाई लामा भविष्य के बारे में योजनाएं बनाते थे और आधुनिक वस्तुओं में यकीन रखते थे। 

किताब में दलाई लामा लिखते हैं कि चीन ने तिब्बत को सांस्कृतिक क्रांति के नाम पर तबाह कर दिया। लाल क्रांति को सांस्कृतिक क्रांति का नाम देकर तिब्बत के मूल्यों (Value)को तोड़ा और तिब्बत के लोगों ने इसका विरोध किया तो उन पर अत्याचार किया गया। चीन ने तिब्बत को अंधेरे में रखकर 17 सूत्रीय योजना को लागू किया। तिब्बत सरकार की अनुमति के बिना नियमों को लागू किया गया। धीरे-धीरे तिब्बत में चीनी आर्मी को तैनात किया गया। चीनी आर्मी के अलावा चीनी लोगों को लाकर तिब्बत में बसाया गया। दलाई लामा लिखते हैं कि जब में बीजिंग दौरे पर गया तो मेरी मुलाकात सुप्रीम लीडर माओ से हुई। जब मैंने उनसे तिब्बत के बारे में बताया तो उन्होंने कहा कि तिब्बत की अनुमति के बिना कुछ भी नहीं होगा। जब माओ से विदा ली तो उसने कहा कि धर्म जहर है। 

तिब्बत की अनुमति के बिना काम होते रहे। दलाई लामा आगे बताते हैं कि तिब्बत की राजनीतिक नीतियों, सांस्कृतिक कार्यों में और धार्मिक कार्यों में दखल दी जाने लगी। विकास के नाम तेजी से तिब्बत में सड़क और पुल बनाए जाने लगे। दलाई लामा का कहना है कि ये पुल और सड़कें तिब्बत के विकास के लिए नहीं बल्कि चीन की सेना के सामान की आसान पहुंच के लिए बनाया गया था। जब तिब्बत में चीन का दखल बहुत अधिक हो गया तो दलाई लामा ने भारत समेत कई देशों से मदद मांगी लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। 

दलाई लामा आगे कहते है कि भगवान बुद्ध की 2500वीं जयंती के अवसर वे जब गया आए तो भारत सरकार से उन्होंने शरण मांगी जिसे भारत सरकार ने अस्वीकार कर दिया। भारत की इस इंकार का वे कारण बताते हैं कि साल 1954 में चीन और भारत के बीच एक समझौता हुआ था जिसे पंचशील सिद्धांत के नाम से जाना जाता है। भारत ने इस सिद्धांत के वजह से चीन के किसी भी मामले में दखल नहीं दी। जब साल 1959 को तिब्बत से भागकर दलाई लामा भारत आए तो प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें शरण दी। तब केवल दलाई लामा को ही नहीं बल्कि लगभग 60 हजार लोगों को भारत में शरण दी। तिब्बतियों को शरण देने के साथ-साथ भारत सरकार ने शरणार्थियों को कामकाज की सुविधा भी मुहैया करवाई। 

तिब्बत पर चीन ने कैसे कब्जा किया? तिब्बत के लोगों पर अत्याचार करके तिब्बत में तिब्बतियों को ही अल्पसंख्यक बना दिया। यदि आप तिब्बत के बारे में, दलाई लामा के बारे में और चीन की कुचाल के बारे में जानना चाहते हैं तो आपको जरूर इस किताब से बहुत कुछ मिलेगा। 


BY_vianykushwaha 

गुरुवार, 13 अगस्त 2020

शौर्य का स्मारक

भारत की रज का कण-कण भी  भारत माता की जय बोलता हैं जिसका साक्षात उदाहरण भोपाल में नवनिर्मित शौर्य स्मारक हैं । शौर्य स्मारक भारत  के उन सपूतों के लिए हैं जिन्होंने अपने प्राण भारत की आन, बान और शान की बलि वेदी पर न्यौछावर कर दिये । शौर्य स्मारक का निर्माण केवल सैनिक का जीवन दिखाने के लिए नहीं है बल्कि यह आमजन को भी जोडता हैं ।
                            शौर्य स्मारक का निर्माण अरेरा हिल्स पर किया गया है, जिसकी लागत लगभग41करोड़ हैं जो लगभग 13 एकड़ भूमि पर फैला हुआ है । यह स्मारक भारत का एकमात्र सैनिकों को समर्पित स्मारक है । इस स्मारक में कई संरचनायें  हैं जो अदभुत एवम्  अद्वितीय हैं ।
                 सबसे पहले मुख्य प्रवेश द्वार के बायें ओर खुला रंगमंच तथा कैफ़ेटेरिया है तथा दाईं ओर मुख्य संरचना हैं । मुख्य संरचना में  सर्वप्रथम शौर्य वीथी में प्रवेश करते हैं,जिसकी शुरूआत एक गैलरी से होती हैं ,जिसके एक ओर दीवार पर भारत का इतिहास है जो हमें  महाभारत काल से लेकर आजादी  प्राप्त होने तक के दर्शन करा रही है तथा दूसरी ओर की दीवार पर राष्ट्रभक्ति की कवितायें पढ़ने मिलती हैं  । शौर्य वीथी में आगे जाने पर हमें अपने ध्वज का स्वरूप देखने मिलता है कि कैसे और कितने बदलाव आये जिनकी प्रदर्शनी देखने योग्य हैं । तीनों सेनाओं के प्रमुख अर्थात भारत के प्रथम व्यक्ति राष्ट्रपति के  चित्रों की प्रदर्शनी शोभायमान हैं जिसमें डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद से लेकर वर्तमान राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी है । थोड़ा आगे बढ़ने पर तीनों सेनाओं नौसेना, थलसेना और वायुसेना  तीनों के प्रमुखों के चित्रों की प्रदर्शनी लगी है ।
                         शौर्य वीथी में रणक्षेत्र को भी दर्शाया गया है जहाँ आसमान में हेलीकाप्टर और लड़ाकू विमानों को उडते हुए दिखाया गया है, वही रेगिस्तान में टैंको को अभ्यास करता दिखाया गया और समुद्र में जहाजों और एयरक्राफ्ट कैरियर को रणक्षेत्र में तरते हुए दिखाया गया है । शौर्य वीथी में शून्य डिग्री रूम भी है जो हमें सियाचिन में सैनिकों के योगदान को ध्यान दिलाता है । शौर्य वीथी में सबसे अनोखी बात यह थी कि मध्यप्रदेश के शहीद जवानो के गाँवों से मिट्टी को एक पात्र में इकटठा किया गया है जिसके कण - कण को शहीद के समान माना गया है ।
                          शौर्य वीथी से बाहर आने पर हम जीवन(LIFE) नामक संरचना में प्रवेश करते है, जिसका वातावरण बेहद ही शांत है । यह संरचना चौकोर बनी हुई है जिसमें चारों ओर सीढ़ियां बनी हुई हैं जो जीवन उतार -चढ़ाव को दर्शाती हैं । हरी घास सुख के पलो को और बहता हुआ जल सदैव आगे बढ़ने का मार्ग दिखलाता है । इसी प्रकार का जीवन सैनिक का भी है और आमजन का भी ।
                                     जीवन(LIFE) नामक संरचना से आगे बढ़ने पर युद्ध का मंच ( THEATRE OF WAR ) नामक संरचना आती है जोकि सैनिकों के जीवन में आई शत्रु चुनौतियों को दिखलाता हैं । इस संरचना को गोलाकार बनाया गया है तथा प्राकृतिक वस्तुओं का प्रयोग किया गया है । इस संरचना में लाल प्रकाश का प्रयोग किया गया है जो युद्ध की विभीषिका को प्रदर्शित करता हैं ।
                                           युद्ध पर विजय पाने वालों को बहादुर तथा युद्ध करते - करते प्राण न्यौछावर करने वाले को शहीद कहा जाता है, इसी से जुड़ी है अगली संरचना जिसका नाम है मृत्यु (DEATH ) । मृत्यु सभी व्यक्तियों की अंतिम सीढ़ी है । मृत्यु पर विजय वही व्यक्ति पा सकता है जिसने देश के लिए कुछ किया हो जैसे सैनिक इनका जीवन मृत्यु पर विजय पा लेता है जिसे संरचना के माध्यम से दर्शाया जिसमें जलता हुई ट्यूब को आकाश की ओर दिखाया गया ।
       शौर्य स्मारक में इन संरचनाओं के अलावा बगीचा भी जिसमें भाँति -भाँति के पेड़ पौधे हैं । एक स्मारक है जिसे एक ओर से देखने पर रक्त की बूँद तथा दूसरी ओर से देखने पर बंदर दिखाई देता है । गुलाबों के बगीचे से होकर आगे जाने पर सामने आता है 62 फुट लंबा स्मारक जिसके आधार पर पानी भरा हुआ है जिसे नौसेना की संज्ञा दी गई है । काले ग्रेनाइट को थलसेना तथा सफेद ग्रेनाइट को वायुसेना की संज्ञा दी गई है । स्मारक के बिल्कुल सामने अमर जवान ज्योति जल रही हैं जिसे  अत्याधुनिक तकनीक होलोग्राफिक से जलाया जा रहा है । स्मारक के बाई ओर उल्टी बंदूकों पर टोपियाँ रखी हुई हैं तथा दाई ओर बूट और पीछे ग्लास प्लास्क पर मध्यप्रदेश के शहीद जवानों के नाम लिखें हुए हैं ।
                      यहीं  हैं हमारा पहला शौर्य स्मारक ।

जीवन और सिध्दांत

कहा से शुरू करूँ , ठीक है समाज में विषमतायें विद्यमान हैं परंतु व्यक्ति दूसरो की भावनाओ को भी तो समझें । जीवन में मोड़ अनेक हैं जिन्हें सकारात्मक लेना हमारी जिम्मेदारी हैं और उसे रचनात्मक कार्यो में परिणित करना और अधिक जरूरी है क्योकिं केवल सकारात्मक सोच से सारी उपलब्धियों को प्राप्त करना आसान नहीं हैं।
    व्यक्ति विशेष के अपने सिध्दांत होते हैं और वह जहाँ तक संभव हो सके तो निभाने की कोशिश करता हैं , परंतु आज व्यक्ति अपने आप को समझाने की जगह वह दूसरों पर अपने विचार थोपनें , सिध्दांतों को लादने और अपने आप को सामने वाले से अधिक श्रेष्ठ जताने की
कोशिश करता हैं ।
                      बड़ो का सम्मान करना अति आवश्यक हैं क्योंकि वे घर की शान होते हैं । बड़े बूढ़ो के आदर्श ,नियम - कायदे ,आचार- विचार, व्यवहार करने के तरीके होते हैं । इसलिए कहा भी गया हैं कि -

अभिवादन शीलस्य नित्यम् वृध्दोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्ध्दन्ते आर्युविद्यायशोबलम्।।

अर्थात् बड़ो का आशीर्वाद प्राप्त करने से आयु ,विद्या ,यश और बल में वृध्दि होती हैं । बड़ो से कुछ न कुछ हमेशा सीखने के लिए मिलता हैं ।
जीवन के मूल्य को हम उन्हीं से सीख सकते है जो हमारे मार्गदर्शक हो अर्थात् हमारे बडे़ । संस्कार भी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचते हैं जिसमें बड़े बूढ़ो का विशेष योगदान होता हैं ।
अनुशासन कभी भी विरासत में नहीं मिलता परंतु उसे सिखाया या पालन करवाया जा सकता हैं ।जीवन में  संस्कार एवं अनुशासन दोनों का महत्व है पर हमारे अग्रजो के बिना संभव नहीं है ।
           बड़ो का कार्य प्रमुखता से मार्गदर्शन हैजो वे करते है पर कभी कभी अति मार्गदर्शन भी गंभीर होता हैं क्योकि व्यक्ति अपनी शक्तियों को भूलकर केवल दिखाये गये मार्ग पर चलता है और अपने प्रयासों को करना भूल जाता है । सिध्दांतो का प्रयोग आजकल हथियार के रूप में किया जानें लगा हैं ।अपनी बात को मनवाने के लिए सिध्दांतो का हवाला दिया जाता हैं।
                                                   
"जीवन एक नदी हैं ,जो सदैव आगे बढ़ता हैं।"