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शुक्रवार, 4 दिसंबर 2020

चलते-चलते (सीरीज - 18)


बड़े-बुजुर्ग कहते हैं कि सुबह उठना सेहत के लिए लाभदायक है और सुबह उठने से ढेर सारे काम हो जाते हैं। सुबह की ठंडी हवा तन-मन को तरो-ताजा कर देती है। गुनगुनी धूप आपको विटामिन डी देती है और आपको सेहतमंद बनाती है। ये बातें सुनने में जितनी कानों को जितनी अच्छी लगती हैं, उतनी अच्छी तरीके से इन्हें फॉलो करना आसान नहीं है। कम से कम मेरे लिए तो बिल्कुल नहीं क्योंकि मैं उल्लू हूं। मैं ढेर सारे काम रात में ही निपटाया करता हूं। पढ़ना हो, वेब सर्फिंग, एक्सप्लोरिंग हो या ब्लॉग लिखना। मेरे लिए तो ये सब एक साधारण काम की तरह है। कॉफी का कप हो या चाय का कप और खाने के लिए स्नैक हो। रात में जागना मेरे लिए संजीवनी है।                         
ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि मुझे सुबह बिल्कुल पसंद नहीं है। सुबह मुझे तो मखमली लगती है। गुनगुनी धूप में बैठना, सैर पर जाना, चाय की चुस्की लेना और अखबार पढ़ना ये सब सुबह के अभिन्न अंग हैं। ठंड की धूप के क्या कहने...वाह...वाह... किया जा सकता है। ठंड का मौसम मेरे लिए अमृत है। मेरा सबसे पंसदीदा मौसम । मुझे तो  कभी-कभी ऐसा लगता है कि बारह महीने ठंड का मौसम हो और मैं इसी तरह ठंड का लुत्फ उठाते रहूं। ठंड का मौसम होता है सुबह-सुबह गुनगुनी धूप में बैठकर चाय की चुस्की लेने का, अखबार पढ़ने का और गरमा-गर्म नाश्ता करने का। रेवड़ी, गजक, चिक्की, लइया खाने का। गन्ना, सीताफल, सिंघाड़ा का आनंद लेना है तो ठंड बहुत जरूरी है।

ठंड में बिस्तर का क्या कहना? इस बिस्तर से निकलने का जी चाहता ही नहीं है।  रजाई, कंबल और स्वेटर, जैकिट की सजावट जी को ललचाती रहती है। शॉल की गर्मी शरीर को आराम में चार चांद लगा देती है। बिस्तर का मोह त्यागना आसान नहीं होता है। ब़ड़े सोचने-विचारने के बाद बिस्तर को टाटा, बाय-बाय, सायोनारा कहना पड़ता है। पानी तो मानो इस तरह लगता है कि जैसे हिमालय से सप्लाई हो रहा है। पानी को आग पर तपा कर उसे गर्माहट दी जाती है ताकि छूने पर दांत न किटकिटाएं। फिर भी  ठंड में कुछ इस तरह लगता है कि हम केवल बस यूं ही वक्त बिताएं। 

जब मैं सर्दियों के मौसम में अपने गांव जाता था तो चाय पीने के बाद सीधे खेत की तरफ दौड़ लगाता था। हमारे बघेलखंड में इस मौसम में गेहूं, चना, अरहर, सरसों जैसी फसल बोईं जाती हैं। पहले इतना ज्ञान तो था नहीं फिर भी खेल-खेल में समझते थे। खेत की बारी में जाकर बिही(जिसे अमरूद भी कहा जाता है) खाते थे। सीताफल तोड़कर खाते थे। खेतों में सरपट दौड़ लगाते थे। भले फिर चाहे दादी डंडा लेकर दौड़ लगाएं। ये तो हुई सुबह की बात। दोपहर को हम नदी किनारे पहुंच जाया करते थे। तैरना तो आता नहीं था तो किनारे ही  बैठकर थोड़े से पानी में नहाकर वहीं कपड़े पहनकर आन टोला (जिसे दूसरा मोहल्ला कहा जाता है) चले जाते थे। वहां सूरजमुखी और बेर का जायजा लेकर आते थे। 

शाम को लौटते हुए खेत से हरी और ताजा सब्जी तोड़कर ले जाते थे। रात का खाना मतलब चूल्हे की गरमा-गरम रोटी और सब्जी जीभ को तृप्त कर देती थी। मिट्टी के तेल (कैरोसिन) से बनी चिमनी(लैंप) के सामने बैठकर खाना खाया करते थे। खाने का मजा तब और बढ़ जाया करता था जब गक्कड़ और भरता खाया करते थे। रात में गप्पे लगाते थे और पैरा(पराली) से बने गद्दे में सोया करते थे। रात में नीले और साफ आकाश में ढेर सारे तारे दिखाई देते थे। गांव की रात शांत और गंभीर हुआ करती थी। इस गंभीरता को तोड़ते थे झींगुर और टिटहरी(रात में बोलने वाला पक्षी)। झींगुर फिर भी रहम खाकर बीच-बीच में चुप हो जाया करते थे लेकिन टिटहरी रात शोर मचाती थी और कभी-कभी तो सुबह तक। 

सूरज की लालिमा आसमान में छिटकने से पहले ही मुर्गियों की बांग सुनना और गाय-भैंस के अम्मा की वाली चिर-परिचित आवाज सुनने मिलती। दूर-दूर तक कोहरे की चादर और कोहरे के बीच बुत से खड़े पेड़ होते। घेरे में बैठकर गांव के बड़े लोगों का आग  तापना और बच्चों की भांप प्रतियोगिता यानी मुंह से कौन कितनी भांप निकालता है।  सूरज के क्षितिज पर आते ही वो चू्ल्हे वाली चाय का स्वाद आज भी याद है। चाय का सौंधापन मुंह में रच-बस जाया करता था। 

ठंड के मौसम में यात्रा करने का अपना ही मजा है। ट्रेन, बस और हवाई जहाज तीनों का अपना ही अलग मजा है। कोहरे को चीरती ट्रेन मानो इस तरह लगती है कि जैसे कोई दिव्यात्मा प्रकट हो गई हो। ट्रेन की ठंडक भरी यात्रा चाय की चुस्की आपको अलग ही आनंद देती है। दूर तक फैले खेत, पहाड़, मैदानों में कोहरे की चादर को झीना करती सूरज की किरण दिखाई देती है। हवाई जहाज से पूरा शहर ही दिखाई देता है कि कैसे कोहरे की चादर शहर को लपेटे रहती है। ऊपर से सबकुछ धुंधला दिखाई देता है लेकिन बहुत प्यारा दिखाई देता है।  

सर्दी के मौसम में मकर संक्रांति का पर्व मुझे सबसे शानदार लगता है। गजक, रेवड़ी, तरह-तरह के लड्डू, मुंगौंड़ी खूब पसंद है। तिल के लड्डू, बेसन के लड्डू, चावल के आटे के लड्डू, गुड़ के लड्डू, मखाने के लड्डू, गेहूं के आटे के लड्डू मानो अंतहीन श्रृंखला यूं ही चलते रहे। मुझे तो लगता है कि साल में मकर संक्रांति पचास बार आए। हरी सब्जी वाली खिचड़ी और ऊपर से टमाटर की चटनी मिलाकर खाना ठंड के असली मजे हैं।

ठंड की महानगाथा है मैंने तो बहुत कुछ जोड़ दिया बाकि आपके लिए। ठंड सदैव रहे....। 

📃BY_vinaykushwaha

सोमवार, 28 सितंबर 2020

मेरा दो दिनों वाला वीक ऑफ





भारत में पांच दिनों के वर्किंग कल्चर वाला माहौल कम देखने को मिलता है लेकिन मेरा सौभाग्य था कि मुझे मिला। पहली फुलटाइम नौकरी में दो दिनों का वीक ऑफ बड़े किस्मत वालों को मिलता है। एबीपी न्यूज में नौकरी करने के दौरान दो दिनों वाला वीक ऑफ का आनंद मैंने जमकर उठाया। घूमने का शौक था और जीवन में नौकरी के अलावा और भी बहुत कुछ करना था इसलिए मैंने इन दिनों को जीभर के जीया। शिफ्ट खत्म करके जल्दी से घर आना और फिर ट्रेन, बस या प्लेन पकड़कर घूमने निकल जाना। 


घूमना मेरे लिए हमेशा से नई ऊर्जा देने वाला रहा है। घर से पढ़ाई करने के दौरान भी मैं घूमने निकल जाता था। कभी जंगलों को देखने, कभी नदी को निहारने, कभी ऐतिहासिक जगहों पर, कभी मंदिरों को देखने, कभी शहर की नब्ज टटोलने, कभी अपने पूर्वजों को देखने निकल पड़ता था। घूमने के बाद में मुझे जो सुकून मिलता है वो और किसी एक्टिविटी से नहीं मिलता। साल 2018 में दिल्ली आने के बाद घूमने का मतलब मेरे लिए केवल खंभा छूकर आना नहीं था। हमारे बघेलखंड में एक कहावत है "खंभा छूकर आना" इसका मतलब है जल्दबाजी करना। दिल्ली आने के बाद मैं घूमने का मतलब ट्रैवलिंग और ट्रैवलॉग में बदल गया। 


मीडिया में काम करने वाले जानते हैं कि सभी एम्प्लाई को वीक ऑफ एक साथ नहीं मिलता है। वो बड़े किस्मत वाले होते हैं जिन्हें वीक ऑफ शनिवार और रविवार को मिलता है। मुझे तो वीक ऑफ सोमवार से शुक्रवार के बीच ही मिलता था। इन दो दिनों को मैंने खूब जिया और जीभर के जिया। दिल्ली में रहने का एक फायदा ये होता है कि यहां से देश के किसी भी कोने में जाने के लिए ट्रेन, बस और फ्लाइट आसानी से मिल जाती है। इसका ये फायदा होता है कि आपका ढेर सारा समय बचता है। दिल्ली के आसापास घूमने के लिए ढेर सारे ऑप्शन भी हैं। जिंदगी जीने के लिए आप जो भी करें लेकिन मेरा मानना है कि आप घूमने जरूर निकलें।


राजस्थान, बिहार, यूपी, एमपी, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, हिमाचल, छत्तीसगढ़, जम्मू कश्मीर में खूब घूमा। कई बार लोग मुझसे पूछते हैं कि इतना घूम कैसे लेते हो? मेरा केवल एक ही जवाब होता है कि बस घूम लेता हूं। मुझे पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम की एक बात हमेशा याद आती है कि "सपने वो नहीं होते जो आप सोने के बाद देखते हैं, सपने वो होते हैं जो आपको सोने नहीं देते''। घूमने के लिए मेरा इतना ज्यादा उत्साह है कि गहरी नींद से उठकर भी घूमने के लिए तैयार हूं। कॉलेज में उन लोगों में से एक था जो घूमने का प्लान बनाते थे और घूमने के लिए सबसे पहले हामी भरते थे।


कॉलेज में पढ़ाई के दौरान घूमने का समय ही समय था लेकिन पैसों की कमी होती थी। आज जब सारे दोस्त नौकरी कर रहे हैं तो पैसा तो है लेकिन टाइम नहीं है। खैर मैं तो ठहरा अल्हड़ आदमी। सभी जगह अकेले ही निकल पड़ता हूं। दिल्ली के चांदनी चौक जाकर गली कूचों में घूमना हो या जयपुर में बड़ी चौपड़ में घूमने, राजस्थान की रेत के धोरे देखना हो या उत्तराखंड, हिमाचल के पहाड़ देखना। सबकुछ मेरे लिए रोमांच से भर देने वाला है। सोलो ट्रेवलिंग का भूत कोरोना काल में बड़े मुश्किल से उतरा। खुद को बहुत समझना पड़ा कि विनय बाहर खतरा बहुत है जरा संभलकर। कोरोना की वजह से मैंने घूमना-फिरना बिल्कुल बंद कर दिया है। मार्च से सितंबर तक 6 महीने हो चुके हैं नोएडा से बाहर नहीं निकला हूं। कभी-कभी लगता है कि किसी काल कोठरी में कैद हो गया हूं। 


कोरोना का ये दौर जल्दी से गुजर जाए। मुझ जैसे कितने ही परिंदे पिंजड़े में फड़फड़ा रहे होंगे। दो दिनों के वीक ऑफ में घूमने इतना आसान भी नहीं था। पहले से टिकट करना, होटल बुक करना, कैब बुक करना, कोई हॉली डे तो नहीं ये देखना, ऑफिस का ओवर टाइम, बॉस का वीक ऑफ ही कैंसिल कर देना और भी बहुत कुछ। कई बार तो मैं नाइट शिफ्ट पूरी करके दिन में ही निकल पड़ता था घूमने। अपनी नींद ट्रेन और बस में ही पूरी करता था। कई बार दिन की शिफ्ट पूरी करता और नाइट को ट्रैवल करता था। इसकी सबसे बड़ी वजह होती टाइम सेविंग। इस तरह मैं घूमने के लिए ज्यादा से ज्यादा समय बचा पाता था। 


जहां मैं घूमने जाता था उसके बारे में सारी जानकारी पहले से ही जुटा लेता हूं। मैं कुछ चुनिंदा जगहों को चुनता हूं और उसका इतिहास, भूगोल और वर्तमान सबका छानबीन लेता हूं। कम खर्च हो उसके लिए मैं शहर में टूरिस्ट प्वॉइंट जाने के लिए पैदल सफर करता हूं। कम किराए वाले होटल चुनता हूं। रेस्त्रां भी इस तरह चुनता हूं कि महंगें ना हों, खरीददारी नहीं करता हूं क्योंकि टूरिस्ट प्लेस चीजें सबसे महंगी बिकती हैं। कोशिश करता हूं कि ऑनलाइन पेमेंट करूं ताकि समय और पैसे दोनों बचा सकूं। म्यूजियम और दूसरी जगहों पर लगने वाले टिकट को पहले से ही संभव हो तो ऑनलाइन बुक कर लेता हूं। पानी की बोतल साथ लेकर चलता हूं ताकि बार-बार पानी की बोतल नहीं खरीदना पड़े। 


ठंड में सबसे ज्यादा घूमने की कोशिश करता हूं। इसके दो फायदे हैं पहला ट्रेन, बस और फ्लाइट में टिकट जल्दी और आसानी से मिल जाती है, दूसरा भीड़-भाड़ से मुक्ति मिलती है। गर्मियों के दिनों में घूमने वालों की भीड़ बढ़ जाती है। बच्चों की स्कूल की छूट्टी के कारण लोग बड़ी संख्या में घरों से बाहर निकलते हैं। बारिश में घूमना आपको कष्ट दे सकता है। बारिश आपके घूमने के प्लान को कभी भी मिट्टी पलीत कर सकती है। हां, आप किसी ऐसी जगह जा रहे हैं जहां बारिश में ही मजा है तो बात अलग है। मुझे जब भी मानसून में घूमने जाना पड़ता है तो दो-चार दिनों का वेदर अपडेट साथ रखता हूं। देख लेता हूं कि जब मैं घूमने जा रहा हूं तब एक्स्ट्रीम वेदर तो नहीं है ना।  

घूमना आसान नहीं है लेकिन दुनिया का सबसे रोमांचित करने वाला शौक  है। 

मंगलवार, 8 सितंबर 2020

चलते-चलते (सीरीज - 17 ) : मेरा अंतर्मुखी होेना मेरे लिए कैसे कष्टदायक साबित हुआ

 

आज मुझे नोएडा में रहते हुए 2 साल से भी ज्यादा हो गए हैं। कभी सोचा भी नहीं था कि दिल्ली-एनसीआर में रहूंगा और एबीपी जैसे बड़े न्यूज चैनल में काम करने का मौका मिलेगा। साल 2018 में जब मेरा कैंपस सिलेक्शन हुआ तो मुझे ज्यादा खुशी नहीं हुई थी क्योंकि मन में कुछ और ही था। मन में जो था उसका यहां जिक्र नहीं करूंगा लेकिन कुछ-कुछ बातें जरूर कहूंगा। मुझे कैंपस सिलेक्शन से भले ही खुश नहीं थी लेकिन दुखी भी नहीं था। मेरा मन तो उन लोगों के लिग दुखी था जो आस लगाए बैठे थे कि एबीपी न्यूज आएगा और हमारा सिलेक्शन होगा। मेरे कुछ दोस्त तो इसके लिए वाकई लायक थे। कई के पास एक्सपीरियंस था तो कई टेक्नोलॉजी में आगे थे तो कई तेज-तर्रार थे। मैं अपने आपको रेस में कहीं भी नहीं गिनता ही नहीं था। 


जब मेरा एबीपी न्यूज में सिलेक्शन हुआ तो कुछ की सोच ऐसी थी कि इसका कैसे हो गया। ये है कौन ? इससे अच्छा तो वो था फिर भी उसका सिलेक्शन नहीं हुआ। मेरे बारे में तरह-तरह के विचार गढ़े जाते थे। मैं जानता था ऐसा होना लाजिमी था। इसका सबसे बड़ा कारण था मेरा अंतर्मुखी होना जिसे अंग्रेजी में Introvert कहते है। मैं ज्यादा लोगों से बात नहीं करता था। मुझे नए लोगों से मेलमिलाप में कठिनाई होती है। मैं थोड़ा रिजर्व तरह का इंसान हूं। मैं किसी से ज्यादा बात नहीं करता लेकिन जब मेरा कोई दोस्त बन जाता है तो मैं उससे खूब बातें करता हूं। यूनिवर्सिटी में जब मैंने एडमिशन लिया था तब मैं क्लास लेता था और सीधे अपने रूम पर चला जाता था। न किसी से मिलना, न किसी से बातचीत करना और न ही किसी को हैलो-हाय करना। जीवन में मुझे बहुत कुछ मिला है। 

जिसकी मैंने इच्छा भी नहीं की वो भी मुझे बड़े आराम से मिला। मैंने पहले सेमेस्टर में मैंने शायद ही किसी से बात की हो, हां ये जरूर है कि जरूरत पड़ने पर मैंने लोगों से बात की है। दूसरे सेमेस्टर में मेरा दायरा बढ़ा, मैंने लोगों से दोस्ती की। मेरी दोस्ती क्लास तक ही सीमित थी। वहीं तब तक मेरे क्लासमेट के फ्रेंड यूनिवर्सिटी के दूसरे डिपार्टमेंट के भी बन चुके थे। इसका सबसे बड़ा कारण ये हो सकता है कि मैं बहुत अकडू और अक्खड़ स्वभाव का था। मैं किसी से सीधे मुंह बात नहीं करता था। लोगों का मजाक मुझे पसंद नहीं था। धीरे-धीरे ये स्वभाव गुम होता चला गया और मेरे दोस्तों का दायरा बढ़ता चला गया। फर्स्ट सेमेस्टर की अपेक्षा सेकेंड सेमेस्टर में मेरे दोस्तों का दायरा बढ़ा। मैं उन लोगों के करीब आता गया जो मेरे टाइप के नहीं थे। जीवन बहुत कुछ सिखाता है।


तीसरे सेमेस्टर में वो सारी गतिविधियां होने लगीं जो मुझे अनैतिक लगती थीं। चाय की दुकान पर घंटों तक बैठना, कैंटीन में बैठकर गप्पे मारना, कॉलेज में फालतू बैठना, शॉपिंग मॉल जाना, घूमने जाना और रात में देर तक घूमना। सब कुछ धीरे-धीरे अच्छा लगने लगा। कभी-कभी तो मन करता था कि ये मैं नहीं हूं। मैं कभी भी इस तरह से अपने आपको नहीं पाया था। चौथे सेमेस्टर तक यूनिवर्सिटी से इतना लगाव हो गया मन में केवल यूनिवर्सिटी समा गई। जीवन को सरल और सीधा देखने वाला इंसान आज इतना ज्यादा कॉम्प्लेक्स हो गया कि कई बार मैं अपने आपको देखकर सोचता था कि क्या ये सही है। कई बार तो ये भी होता था कि मैं और मेरे दोस्त रात में घूमने के लिए उज्जैन निकल जाते थे। भोपाल से रात 10 बजे निकलना और रात को 3 से 4 बजे तक पहुंचना फिर राम घाट में नहाना और फिर महाकाल मंदिर में जाकर दर्शन करना फिर दिन में भोपाल लौटना सबकुछ अलग अनुभव होता था। 


मैं खुद ट्रैवल लवर हूं। मुझे ट्रैवल करना पसंद है और ट्रेवलॉग लिखना पसंद है। कॉलेज में पढ़ाई के दौरान भी मैं कहीं ना कहीं चले जाता था। घूमने का मतलब ये नहीं कि मैं चार लोगों को साथ लेकर जाऊं ऐसा नहीं होता था। मैं सोलो ट्रैवल पसंद करता था। उस यात्रा की व्याख्या अपने ब्लॉग से करना मुझे पसंद था। आज भी ये सिलसिला जारी है और रहेगा शायद। आज मुझे घर से बाहर रहते हुए 6 साल से ज्यादा हो गया है। इन 6 सालों में मैंने जितना जिया और जितना सीखा है, उतना शायद पहले कभी नहीं। मेरे 6 साल कभी न भूलने वाले रहेंगे क्योंकि इन 6 सालों में मैंने कई राज्यों और ढेर सारे शहरों की यात्राएं की। यात्राएं हमेशा सबक देती हैं और कुछ करने के लिए कहती हैं। मैंने इन यात्राओं से सीखा अलग-अलग जगहों पर जाने से भाषा, बोली और ट्रैवल एक्सपीरियंस को बहुत संजीदा तरीके से लिया है। 


आज मैंने Introvert वाली दीवार को तोड़ी है लेकिन एक पतली झिल्ली मुझे तुरंत रिएक्ट करने से रोकती है। मेरी झिझक मुझे एकदम से कुछ करने से रोक देती है। ये झिझक मुझे लोगों से दूर ले जाती है और मुझे कुछ सीखने से रोकती है। आज झिझक को अलग करना चाहता हूं क्योंकि ये मेरे आगे बढ़ने में बाधक है। इस झिझक में मुझे वर्कप्लेस पर काम करने से रोका और नया कुछ सीखने से रोका। एबीपी न्यूज में काम करने के दौरान मैंने सीखा की लोग बहुत निर्दयी होते है। आपको जीवन जीने के लिए इस निर्दयी दुनिया में हमें जीवित रहने के लिए लड़ना बहुत जरूरी है।

 

BY_vinaykushwaha   

रविवार, 6 सितंबर 2020

पुस्तक समीक्षा : दलाई लामा की आत्मकथा "मेरा देश निकाला" (FREEDOM IN EXILE : THE AUTOBIOGRAPHY OF THE DALAI LAMA)


तिब्बत के बारे में आपने पहले भी सुना होगा। आज भले ही तिब्बत चीन का हिस्सा है लेकिन एक समय था जब तिब्बत एक स्वतंत्र देश था। तिब्बत के कई देश के साथ राजनीतिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंध थे। तिब्बत, चीन के दक्षिण में स्थित है जिसकी सीमा भारत, नेपाल और भूटान से लगती है। साल 1959 से पहले तक तिब्बत की अपनी सभ्यता और संस्कृति थी। यहां बौद्ध धर्म का अलग ही रंग देखने को मिलता था। चौदहवें दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो ने अपनी किताब "मेरा देश निकाला" में बताया है कि चीन ने कैसे सांस्कृतिक क्रांति के नाम पर तिब्बत पर कब्जा कर लिया।

किताब "मेरा देश निकाला" चौदहवें दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो की आत्मकथा है। ये किताब अंग्रेजी में लिखी गई Freedom in exile : The Autobiography of the Dalai Lama का हिंदी अनुवाद है। इस किताब में दलाई लामा ने अपने दलाई लामा बनने, तिब्बत पर चीन ने कैसे कब्जा किया, बातचीत का लंबा दौर, निष्कासन और भारत में शरण कैसे मिली इसके में बारे में सारी जानकारी दी है। किताब केवल और केवल दलाई लामा को नहीं बताती बल्कि तिब्बत की संस्कृति, तिब्बत के रहन-सहन और खान-पान, वहां के लोगों के बारे में जानकारी देती है। मठ, मंदिर और ऊंचे-ऊंचे हिमालय के बारे में भी जानकारी देती है। किताब भाषा से लेकर राजधानी ल्हासा और तिब्बत की खूबसूरती के बारे में दिलचस्प जानकारी देती है। पहले तिब्बत में किसी भी देश का आम नागरिक जा सकता था लेकिन आज चीन का कब्जा होने के बाद ऐसा करना मुश्किल है क्योंकि वहां टूरिस्ट पर कई तरह की पाबंदियां लगाई जाती है। 

दलाई लामा ने किताब में लिखा है कि तिब्बत के कई राज्य थे। इन्हीं में से एक राज्य था आमदो। इसी राज्य में चौदहवें दलाई लामा का जन्म हुआ था। तिब्बत में दलाई लामा को चिन्हित करने की परंपरा है जिसमें पूर्व के दलाई लामा अगले दलाई लामा के बारे में जानकारी देते थे। तेरहवें दलाई लामा थुबतेन ग्यात्सो ने ही तेनजिन ग्यात्सो का नाम सुझाया था। तेरहवें दलाई लामा की मृत्यु के बाद चौदहवें की खोज की गई उन्हें ल्हासा लाया गया। ल्हासा में ही उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई। ल्हासा के विशाल और भव्य पोटाला हाउस में रहते हुए तेनजिन ग्यात्सो ने अपनी सारी परिक्षाएं पास की थीं। 

जो लोग तिब्बत के विषय में जानना चाहते हैं और उत्सुक हैं उनको जरूर "मेरा देश निकाला" पढ़ना चाहिए। किताब  में तिब्बत के बारे में  ढेर सारी रोचक जानकारी दी गई हैं। कैसे तिब्बत में त्योहार मनाए जाते हैं? सबसे बड़ी जानकारी तो ये है कि दलाई लामा कैसे रहते है? क्या करते हैं? अपना समय कैसे व्यतीत करते हैं? सब कुछ है इस किताब में। बर्फ से ढंके पर्वत पर बसा तिब्बत बेहद शानदार देश था। दलाई लामा किताब में बताते हैं कि कैसे ठंड मौसम में पोटाला हाउस और गर्मियों के दिनों में नोबुलिंग्का हाउस में दलाई लामा दिन बिताते थे। किताब में दलाई लामा बताते हैं कि दलाई लामा के पास कोई दैवीय शक्ति (Super power) नहीं होती है। दलाई लामा भी आम इंसान की तरह होता है लेकिन लोगों की आस्था उसे बड़ा बनाती है। तिब्बतियों के लिए दलाई लामा सर्वोपरि हैं वे दलाई लामा को पहला व्यक्ति मानते हैं। चौहदवें दलाई लामा किताब में लिखते हैं कि तेरहवें दलाई लामा भविष्य के बारे में योजनाएं बनाते थे और आधुनिक वस्तुओं में यकीन रखते थे। 

किताब में दलाई लामा लिखते हैं कि चीन ने तिब्बत को सांस्कृतिक क्रांति के नाम पर तबाह कर दिया। लाल क्रांति को सांस्कृतिक क्रांति का नाम देकर तिब्बत के मूल्यों (Value)को तोड़ा और तिब्बत के लोगों ने इसका विरोध किया तो उन पर अत्याचार किया गया। चीन ने तिब्बत को अंधेरे में रखकर 17 सूत्रीय योजना को लागू किया। तिब्बत सरकार की अनुमति के बिना नियमों को लागू किया गया। धीरे-धीरे तिब्बत में चीनी आर्मी को तैनात किया गया। चीनी आर्मी के अलावा चीनी लोगों को लाकर तिब्बत में बसाया गया। दलाई लामा लिखते हैं कि जब में बीजिंग दौरे पर गया तो मेरी मुलाकात सुप्रीम लीडर माओ से हुई। जब मैंने उनसे तिब्बत के बारे में बताया तो उन्होंने कहा कि तिब्बत की अनुमति के बिना कुछ भी नहीं होगा। जब माओ से विदा ली तो उसने कहा कि धर्म जहर है। 

तिब्बत की अनुमति के बिना काम होते रहे। दलाई लामा आगे बताते हैं कि तिब्बत की राजनीतिक नीतियों, सांस्कृतिक कार्यों में और धार्मिक कार्यों में दखल दी जाने लगी। विकास के नाम तेजी से तिब्बत में सड़क और पुल बनाए जाने लगे। दलाई लामा का कहना है कि ये पुल और सड़कें तिब्बत के विकास के लिए नहीं बल्कि चीन की सेना के सामान की आसान पहुंच के लिए बनाया गया था। जब तिब्बत में चीन का दखल बहुत अधिक हो गया तो दलाई लामा ने भारत समेत कई देशों से मदद मांगी लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। 

दलाई लामा आगे कहते है कि भगवान बुद्ध की 2500वीं जयंती के अवसर वे जब गया आए तो भारत सरकार से उन्होंने शरण मांगी जिसे भारत सरकार ने अस्वीकार कर दिया। भारत की इस इंकार का वे कारण बताते हैं कि साल 1954 में चीन और भारत के बीच एक समझौता हुआ था जिसे पंचशील सिद्धांत के नाम से जाना जाता है। भारत ने इस सिद्धांत के वजह से चीन के किसी भी मामले में दखल नहीं दी। जब साल 1959 को तिब्बत से भागकर दलाई लामा भारत आए तो प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें शरण दी। तब केवल दलाई लामा को ही नहीं बल्कि लगभग 60 हजार लोगों को भारत में शरण दी। तिब्बतियों को शरण देने के साथ-साथ भारत सरकार ने शरणार्थियों को कामकाज की सुविधा भी मुहैया करवाई। 

तिब्बत पर चीन ने कैसे कब्जा किया? तिब्बत के लोगों पर अत्याचार करके तिब्बत में तिब्बतियों को ही अल्पसंख्यक बना दिया। यदि आप तिब्बत के बारे में, दलाई लामा के बारे में और चीन की कुचाल के बारे में जानना चाहते हैं तो आपको जरूर इस किताब से बहुत कुछ मिलेगा। 


BY_vianykushwaha 

गुरुवार, 13 अगस्त 2020

शौर्य का स्मारक

भारत की रज का कण-कण भी  भारत माता की जय बोलता हैं जिसका साक्षात उदाहरण भोपाल में नवनिर्मित शौर्य स्मारक हैं । शौर्य स्मारक भारत  के उन सपूतों के लिए हैं जिन्होंने अपने प्राण भारत की आन, बान और शान की बलि वेदी पर न्यौछावर कर दिये । शौर्य स्मारक का निर्माण केवल सैनिक का जीवन दिखाने के लिए नहीं है बल्कि यह आमजन को भी जोडता हैं ।
                            शौर्य स्मारक का निर्माण अरेरा हिल्स पर किया गया है, जिसकी लागत लगभग41करोड़ हैं जो लगभग 13 एकड़ भूमि पर फैला हुआ है । यह स्मारक भारत का एकमात्र सैनिकों को समर्पित स्मारक है । इस स्मारक में कई संरचनायें  हैं जो अदभुत एवम्  अद्वितीय हैं ।
                 सबसे पहले मुख्य प्रवेश द्वार के बायें ओर खुला रंगमंच तथा कैफ़ेटेरिया है तथा दाईं ओर मुख्य संरचना हैं । मुख्य संरचना में  सर्वप्रथम शौर्य वीथी में प्रवेश करते हैं,जिसकी शुरूआत एक गैलरी से होती हैं ,जिसके एक ओर दीवार पर भारत का इतिहास है जो हमें  महाभारत काल से लेकर आजादी  प्राप्त होने तक के दर्शन करा रही है तथा दूसरी ओर की दीवार पर राष्ट्रभक्ति की कवितायें पढ़ने मिलती हैं  । शौर्य वीथी में आगे जाने पर हमें अपने ध्वज का स्वरूप देखने मिलता है कि कैसे और कितने बदलाव आये जिनकी प्रदर्शनी देखने योग्य हैं । तीनों सेनाओं के प्रमुख अर्थात भारत के प्रथम व्यक्ति राष्ट्रपति के  चित्रों की प्रदर्शनी शोभायमान हैं जिसमें डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद से लेकर वर्तमान राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी है । थोड़ा आगे बढ़ने पर तीनों सेनाओं नौसेना, थलसेना और वायुसेना  तीनों के प्रमुखों के चित्रों की प्रदर्शनी लगी है ।
                         शौर्य वीथी में रणक्षेत्र को भी दर्शाया गया है जहाँ आसमान में हेलीकाप्टर और लड़ाकू विमानों को उडते हुए दिखाया गया है, वही रेगिस्तान में टैंको को अभ्यास करता दिखाया गया और समुद्र में जहाजों और एयरक्राफ्ट कैरियर को रणक्षेत्र में तरते हुए दिखाया गया है । शौर्य वीथी में शून्य डिग्री रूम भी है जो हमें सियाचिन में सैनिकों के योगदान को ध्यान दिलाता है । शौर्य वीथी में सबसे अनोखी बात यह थी कि मध्यप्रदेश के शहीद जवानो के गाँवों से मिट्टी को एक पात्र में इकटठा किया गया है जिसके कण - कण को शहीद के समान माना गया है ।
                          शौर्य वीथी से बाहर आने पर हम जीवन(LIFE) नामक संरचना में प्रवेश करते है, जिसका वातावरण बेहद ही शांत है । यह संरचना चौकोर बनी हुई है जिसमें चारों ओर सीढ़ियां बनी हुई हैं जो जीवन उतार -चढ़ाव को दर्शाती हैं । हरी घास सुख के पलो को और बहता हुआ जल सदैव आगे बढ़ने का मार्ग दिखलाता है । इसी प्रकार का जीवन सैनिक का भी है और आमजन का भी ।
                                     जीवन(LIFE) नामक संरचना से आगे बढ़ने पर युद्ध का मंच ( THEATRE OF WAR ) नामक संरचना आती है जोकि सैनिकों के जीवन में आई शत्रु चुनौतियों को दिखलाता हैं । इस संरचना को गोलाकार बनाया गया है तथा प्राकृतिक वस्तुओं का प्रयोग किया गया है । इस संरचना में लाल प्रकाश का प्रयोग किया गया है जो युद्ध की विभीषिका को प्रदर्शित करता हैं ।
                                           युद्ध पर विजय पाने वालों को बहादुर तथा युद्ध करते - करते प्राण न्यौछावर करने वाले को शहीद कहा जाता है, इसी से जुड़ी है अगली संरचना जिसका नाम है मृत्यु (DEATH ) । मृत्यु सभी व्यक्तियों की अंतिम सीढ़ी है । मृत्यु पर विजय वही व्यक्ति पा सकता है जिसने देश के लिए कुछ किया हो जैसे सैनिक इनका जीवन मृत्यु पर विजय पा लेता है जिसे संरचना के माध्यम से दर्शाया जिसमें जलता हुई ट्यूब को आकाश की ओर दिखाया गया ।
       शौर्य स्मारक में इन संरचनाओं के अलावा बगीचा भी जिसमें भाँति -भाँति के पेड़ पौधे हैं । एक स्मारक है जिसे एक ओर से देखने पर रक्त की बूँद तथा दूसरी ओर से देखने पर बंदर दिखाई देता है । गुलाबों के बगीचे से होकर आगे जाने पर सामने आता है 62 फुट लंबा स्मारक जिसके आधार पर पानी भरा हुआ है जिसे नौसेना की संज्ञा दी गई है । काले ग्रेनाइट को थलसेना तथा सफेद ग्रेनाइट को वायुसेना की संज्ञा दी गई है । स्मारक के बिल्कुल सामने अमर जवान ज्योति जल रही हैं जिसे  अत्याधुनिक तकनीक होलोग्राफिक से जलाया जा रहा है । स्मारक के बाई ओर उल्टी बंदूकों पर टोपियाँ रखी हुई हैं तथा दाई ओर बूट और पीछे ग्लास प्लास्क पर मध्यप्रदेश के शहीद जवानों के नाम लिखें हुए हैं ।
                      यहीं  हैं हमारा पहला शौर्य स्मारक ।

जीवन और सिध्दांत

कहा से शुरू करूँ , ठीक है समाज में विषमतायें विद्यमान हैं परंतु व्यक्ति दूसरो की भावनाओ को भी तो समझें । जीवन में मोड़ अनेक हैं जिन्हें सकारात्मक लेना हमारी जिम्मेदारी हैं और उसे रचनात्मक कार्यो में परिणित करना और अधिक जरूरी है क्योकिं केवल सकारात्मक सोच से सारी उपलब्धियों को प्राप्त करना आसान नहीं हैं।
    व्यक्ति विशेष के अपने सिध्दांत होते हैं और वह जहाँ तक संभव हो सके तो निभाने की कोशिश करता हैं , परंतु आज व्यक्ति अपने आप को समझाने की जगह वह दूसरों पर अपने विचार थोपनें , सिध्दांतों को लादने और अपने आप को सामने वाले से अधिक श्रेष्ठ जताने की
कोशिश करता हैं ।
                      बड़ो का सम्मान करना अति आवश्यक हैं क्योंकि वे घर की शान होते हैं । बड़े बूढ़ो के आदर्श ,नियम - कायदे ,आचार- विचार, व्यवहार करने के तरीके होते हैं । इसलिए कहा भी गया हैं कि -

अभिवादन शीलस्य नित्यम् वृध्दोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्ध्दन्ते आर्युविद्यायशोबलम्।।

अर्थात् बड़ो का आशीर्वाद प्राप्त करने से आयु ,विद्या ,यश और बल में वृध्दि होती हैं । बड़ो से कुछ न कुछ हमेशा सीखने के लिए मिलता हैं ।
जीवन के मूल्य को हम उन्हीं से सीख सकते है जो हमारे मार्गदर्शक हो अर्थात् हमारे बडे़ । संस्कार भी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचते हैं जिसमें बड़े बूढ़ो का विशेष योगदान होता हैं ।
अनुशासन कभी भी विरासत में नहीं मिलता परंतु उसे सिखाया या पालन करवाया जा सकता हैं ।जीवन में  संस्कार एवं अनुशासन दोनों का महत्व है पर हमारे अग्रजो के बिना संभव नहीं है ।
           बड़ो का कार्य प्रमुखता से मार्गदर्शन हैजो वे करते है पर कभी कभी अति मार्गदर्शन भी गंभीर होता हैं क्योकि व्यक्ति अपनी शक्तियों को भूलकर केवल दिखाये गये मार्ग पर चलता है और अपने प्रयासों को करना भूल जाता है । सिध्दांतो का प्रयोग आजकल हथियार के रूप में किया जानें लगा हैं ।अपनी बात को मनवाने के लिए सिध्दांतो का हवाला दिया जाता हैं।
                                                   
"जीवन एक नदी हैं ,जो सदैव आगे बढ़ता हैं।"

धूप

धूप सहारा देती है, धूप किनारा देती है |
अविरल निर्झर झरने सी धूप सुहानी गिरती है |
मानव को मानवता के लिए सदैव अग्रसर करती है|धूप सहारा.....

तिमिर को भक्ष लेती है,दीपक को धन्यवाद करती है|
महान मानव निश्चिंत भाव से निज कर्म को पूर्ण करते है| क्योकिं धूप सहारा....

धूप का अपना स्व नहीं हैं ,परोपकार हैऔर ध्येय यही हैं|
जीवन में आशा भरती हैं, निराशा दूर करती हैं| क्योंकि धूप सहारा....