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रविवार, 11 नवंबर 2018

"अवनी" पर राजनीति क्यों?

"कोई बाघ आदमखोर खुद से नहीं बनता है बल्कि उसे मजबूरी में आदमखोर बनना पड़ता है।" यह पंक्ति है मशहूर बाघ संरक्षक जिम कार्बेट की। जिम कार्बेट को बाघों का संरक्षक कहा जाता है। जिम के साथ एक विरोधाभास जुड़ा हुआ है कि उन्होंने 33 बाघ-बाघिन को मारा था। इनमें मैन ईटर ऑफ कुमाऊं भी शामिल है। इस मैन ईटर ने 435 आदमियों को मारा था। अपनी किताब मैन ईटर ऑफ कुमाऊं में उन्होंने इस बात का जिक्र किया था। जिम की छवि एक अच्छे व्यक्ति के रुप में है क्योंकि उन्होंने आदमखोरों के आतंक से मुक्ति दिलाई थी। लेकिन बाद में उन्होंने बंदूक की जगह कलम को उठा लिया था। वे इस बात से वाकिफ थे कि हिमालय में बाघों की संख्या कम होने का मतलब है कि पारिस्थितिकी तंत्र में गड़बड़ी होना है। जिम कार्बेट लेखक और दार्शनिक भी रहे हैं। उन्हीं के नाम पर उत्तराखंड के राष्ट्रीय पार्क का नाम जिम कार्बेट नेशनल पार्क है। इसी नेशनल पार्क से प्रोजेक्ट टाइगर मिशन की शुरुआत की गई थी।

तारीख 2 नवंबर 2018 सभी को वैसे तो पता होगी लेकिन यह एक ऐसा दिन जिस दिन से सभी को पशुओं के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया है। लोग अब यह भी सोचने लगे हैं कि जानवरों को क्यों मारा जा रहा है। मैं बात कर रहा हूं बाघिन 'अवनि' की। कई लोग बाघिन अवनि को अवनी लिख रहे हैं। इस बाघिन का अाधिकारिक नाम टी-1 है। बाघिन अवनी को मार दिया गया। अवनी पर आरोप था कि उसने दो सालों में 14 लोगों की जान ली है। अवनी को मारने के लिए बकायदा वन विभाग से 100 लोगों की टीम को तैयार किया गया। पांढरकवड़ा के जंगल में बाघिन को खोजने के लिए गोल्फर ज्योति रंधावा के खोजी कुत्तों को बुलाया गया। पेड़ों आदि पर कैमरों का कड़ा पहरा लगा दिया गया। बाघिन को चारा देने के नाम पर नकली भेड़-बकरियों को बांधा गया। अमेरिकी से विशेष प्रकार का इत्र मंगाया गया ताकि बाघिन आकर्षित होकर जल्द से जल्द घने जंगलों से निकलकर खुले मैदान में आ जाए।

सारे जाल बिछा दिए गए बस अब बाघिन का फंसना बाकी  था। बाघिन आई और जाल में फंस गई। हैदराबाद से शार्प शूटर शाफत अली खान को बुलाया गया था। शाफत के पास एक लंबा अनुभव था कि कैसे जानवर को मारा जाता है। उनके दादा भी यही काम करते थे। वन विभाग के अनुसार शाफत को मुख्य रुप से बाघिन को ट्रैंकुलाइज  करने के लिए बुलाया गया था। अवनी जैसे ही थोड़े खुले हिस्से में आई तो उसे पहले ट्रैंकुलाइज गन से टैंकुलाइज्ड किया गया फिर उसे 10 मीटर दूर से पिछले हिस्से में गोली मार दी गई। आखिरकार आदमखोर बाघिन का अंत हो गया। यह बाघिन अवनी की दुखद अंत की कहानी है।

असली कहानी तो अवनी की मौत के बाद शुरू होती है। अवनी की मौत के बाद कई पशुप्रेमी और राजनेता सामने आए और उन्होंने जमकर इस बात का विरोध किया की अवनी की हत्या की गई है। अवनी की मौत से पहले कई पशु प्रेमियों और एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका देकर अवनी पर दया दिखाकर जीवनदान की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने दया याचिका को यह कहते हुए नकार दिया था कि चीफ लाइफ वार्डन ने यह स्वीकार किया है कि अवनी पर कार्रवाई जरुरी है। अब आते हैं राजनीति पर। केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने महाराष्ट्र के सीएम देवेन्द्र फडणवीस को पत्र लिखकर महाराष्ट्र के वन मंत्री सुधीर मुनगंटीवार को बर्खास्त करने की मांग की। आपको यहां बताते चलें कि मेनका गांधी की छवि एक पशु प्रेमी की है, वे कई सालों से पशुओं के संरक्षण में काम  रही हैं। मेनका गांधी शायद भूल गई थी कि केन्द्र में उनकी सरकार और महाराष्ट्र में एनडीए नीत सरकार फिर पत्र की औपचारिकता क्यों? इसके बाद सुधीर मुनगंटीवार ने उल्टा मेनका गांधी पर आरोप लगाते हुए कहा कि वे भी तो फर्जी बाबा के पास जाती हैं। मुझे नहीं लगता है कि इतने संवेदनशील मुद्दे पर ऐसी बात उछालने की जरूरत थी।

बात यदि महाराष्ट्र की हो और शिवसेना का जिक्र ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता। शिवसेना ने सरकार पर आरोप मढ़ दिया की सरकार ने अवनी की हत्या की है। मनसे भी कहां पीछे रहने वाली थी। राज ठाकरे ने अवनी पर बयान दे दिया। सबसे आखिर में एंट्री हुई कांग्रेस की। मुंबई से पूर्व सांसद संजय निरुपम ने इस सारे मामले को हगणदारी प्रथा से जोड़ दिया। हगणदारी प्रथा, महाराष्ट्र में खुले में शौच मुक्त करने के अभियान से जुड़ा है। संजय निरुपम ने हगणदारी प्रथा का जिक्र इसलिए किया क्योंकि वे बताना चाहते थे कि चंद्रपुर में जंगल में शौच करने गई महिला को बाघ ने मार दिया। अब बात अवनी की मौत से हगणदारी तक पहुंच गई। इस पर महाराष्ट्र के वन मंत्री सुधीर मुनगंटीवार कहते हैं कि अवनी की मौत पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। अरे साहब असली राजनीति की शुरुआत तो आपने ही की थी।

11 नवंबर को 168 संस्थाओं ने कैंडल मार्च निकालकर बाघिन अवनी की मौत का विरोध किया। यह कैंडल मार्च मात्र दिखावा नहीं बने। इस बात की बेहद अहमियत है कि पर्दे के पीछे की सच्चाई क्या है? बात यह है कि बाघिन को मारने के बाद उसे नागपुर ले जाया गया जहां उसे डॉक्टर ने मृत घोषित कर दिया। पोस्टमार्टम में यह पता चला कि उसके पिछले भाग पर गोली मारी गई थी। ऑटोप्सी करने के बाद पता चला कि अवनी ने 4-5 दिनों से कुछ खाया ही नहीं था क्योंकि उसके पेट में गैस और तरल पदार्थ भरा हुआ था। इसके अलावा उसके शरीर में नमी की कमी पाई गई और इंसानी मांस का कहीं कोई जिक्र नहीं हुआ। अवनी तो चली गई लेकिन अपने कई राज छोड़ गई।

बाघ और जंगली जानवर इतने आक्रामक क्यों रहे हैं? इसका सीधा सटीक कारण है अतिक्रमण। इंसान अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए वन्य जीवों के क्षेत्र में अतिक्रमण कर रहा है। खेती और आवास के लिए जंगलों का सफाया किया जा रहा है। नेशनल पार्क और अभ्यारण्यों में वन्यजीवों के आवास को छेड़ा जा रहा है। इन सबसे वन्यजीवों की इंसानी बस्ती में चहलकदमी बढ़ गई है। इन सबका नतीजा सबके सामने है। हमारे संविधान के भाग-4 में राज्य के नीति निर्देशक तत्वों का जिक्र किया है। अनुच्छेद 48(क) में जिक्र है कि पर्यावरण और वन्यजीवों का राज्यों द्वारा संरक्षण और संवर्धन किया जाएगा। मैं राज्यों से पूछना चाहता हूं कि अवनी की तरह? यह हमारा भी व्यक्तिगत दायित्व बनता है कि हम अपने पर्यावरण और वन्यजीवों को संरक्षित और संवर्धित करें।

अब सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे देश का कानून क्या कहता है? क्या अवनी को मारना सही है? महाराष्ट्र वन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार बताया गया कि उन्हें राष्ट्रीय व्याघ्र संरक्षण प्राधिकरण से अवनी पर कार्रवाई की इजाजत प्राप्त थी। भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अनुसार बाघिन अवनी की हत्या नहीं हुई है। उसे मारना सही है। अधिनियम कहता है कि यदि कोई बाघ आदमखोर हो चुका है, गंभीर बीमारी से ग्रस्त है या किसी अन्य कारण को लेकर चीफ लाइफ वार्डन तय कर सकता है कि बाघ को मारा जाए या नहीं। चीफ लाइफ वार्डन ही तय करता है कि उसे बेहोश किया जाए, स्थानांतरित किया जाए या गोली मार दी जाए। हमारा कानून यह भी कहता है कि आत्मरक्षा के लिए आप बाघ को मार सकते है और इसके साथ ही यदि वह सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है तो उसे मारा जा सकता है। यह है हमारा कानून। वन विभाग की टीम ने आत्मरक्षा का तर्क देते हुए बाघिन पर गोली चलाई थी। कई पशु प्रेमियों का कहना है कि यह गलत है कि उस पर गोली चलाई गई यदि आत्मरक्षा के लिए गोली चलाई गई होती तो गोली बाघिन के पिछले हिस्से की जगह अगले हिस्से में लगती।

अवनी चली गई। अपने पीछे कई सवाल छोड़ गई और बहस के लिए विषय भी। अवनी अपने पीछे दो नन्हें बच्चे भी छोड़ गई जिनका ध्यान रखना हमारा दायित्व है।

📃BY_vinaykushwaha

रविवार, 28 अक्टूबर 2018

बात केवल जमाल खाशोगी की नहीं है....



प्राचीनकाल में एक राजा अपना संदेश  दूसरे राजा  तक पहुंचाने के लिए अपना दूत भेजता था। दोनों राजाओं में भले ही कितनी भी शत्रुता हो लेकिन दूत को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुंचाई जाती थी। किसी भी प्रकार से दूत को नुकसान नहीं पहुंचाया जाता था। दूत को संदेशवाहक या मैसेंजर के रूप में देखना ठीक होगा। ये मैसेंजर समाचार और जानकारी को एक राज्य से दूसरे राज्य तक पहुंचाते थे। सामान्य जानकारी से लेकर युद्ध जैसी विध्वंस जानकारी भी पहुंचाई जाती थी। आज के दौर में दूत पत्रकार का रूप धारण कर चुके हैं। पत्रकार एक ऐसा प्राणी होता है जो कि दुनिया के सामने खबर को लेकर आता है।

पत्रकार का काम केवल खबरों को सबके सामने लेकर आना बस नहीं है। जो खबर वह लेकर आता है उसका विश्लेषण करना है और नफा-नुकसान के बारे में लोगों को अगाह करना है। पहले जहां पत्रकार स्वतंत्र होकर अपनी पत्रकारिता को अंजाम देते थे वही आज विभिन्न संगठनों से जुड़कर समाचारों का आदान-प्रदान किया जाता है। इस समय खबरों का दायरा बढ़ गया है और विविधता भी आई है। इसी कारण पत्रकारिता करने के तौर-तरीके भी बदले हैं। जहां पहले पत्रकारिता केवल समाचारपत्रों तक सीमित थी वही आज इसका दायरा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रिंट मीडिया, डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया तक फैल चुका है। एक बात जो पुराने समय से आजतक नहीं बदली है वह जान का खतरा।

पुराने समय में जहां लेख लिखने पर सरकार आपको जेल में डाल देती थी क्योंकि उसमें सरकार और उनके नेताओं की आलोचना होती थी। आपातकाल के समय सरकार ने कुछ इसी तरह का काम किया था। प्रेस सेंसरशिप लागू कर दी थी‌। पत्रकारों को सरकार के अनुरूप लिखना पड़ा था। जिन पत्रकारों ने इसके खिलाफ आवाज उठाई उनकी कलम की नोंक को तोड़ दिया गया। साल 1977 की तुलना वर्नाकुलर प्रेस एक्ट से करना बाजिव होगा। अंग्रेजी हुकूमत ने अखबारों को केवल इंग्लिश में लिखने की इजाजत दी थी। इंग्लिश में लिखने की इजाजत मतलब यह था कि किसी अन्य भारतीय भाषा में लिखने से आपको गैर-कानूनी समझा जाता था। इस पूरे वर्नाकुलर प्रेस एक्ट का सार यह था कि तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत ने पत्रकारिता में अन्य भाषाओं पर बैन इसलिए लगाया था ताकि वे ब्रिटिश सरकार के खिलाफ छापी जा खबरों पर नियंत्रण लगाया जा सके। इंग्लिश में लिखने से किसी भी गंभीरता को जल्दी से पकड़ा जा सकता था।

इसी एक्ट के कारण कई अखबारों ने खुद को रातों-रात स्थानीय भाषा से इंग्लिश में बदल लिया। इन अखबारों में बंगाल का अमृतबाजार पत्रिका शामिल है। अमृतबाजार पत्रिका ने इंग्लिश में लिखने के बावजूद आलोचना करना नहीं छोड़ा।  दो सम्पादकीय  'टु हूम डज इण्डिया बिलांग?'  और 'अरेस्ट ऑफ मिस्टर गांधी : मोर आउटरेजेज? इंग्लिश में छपे। इन्हीं सम्पादकीय के कारण समाचार पत्र की सम्पादकीय फीस जब्त कर ली गई। इस तरह पत्रकारिता ने अपना जीवन जिया है। इस घुटन भरे समय में पत्रकारिता करना दुष्कर था पता चलता है। 1878 और 1977 में 99 साल का अंतर है लेकिन बात वहीं की वहीं है। तब भी सत्ता डरती थी और आज भी डरती है। साल 1878 में किसी तरह का कोई तंत्र नहीं था लेकिन 1977 में लोकतंत्र होने के बावजूद पत्रकारिता राजतंत्र में जी रही थी।

भारत में आपातकाल लागू हुए 41 साल हो चुके हैं और आज भी पत्रकारिता का भय काल बनकर सत्ता को डराता है। आज भी कई ऐसे मामले सुनने में आते हैं जो कि डरा देने वाले होते हैं। पत्रकारों को जान से मारा जा रहा है। राजदेव रंजन हत्याकांड एक बेहद ही चौंका देने वाला हत्याकांड रहा है। इसने न केवल पत्रकारिता का गला नहीं घोंटा बल्कि पत्रकारिता को तिल-तिलकर मरने पर मजबूर किया। समाचार का सार न बताने पर इस तरह मारना वीभत्सता है। इन सबमें सबसे बड़ी बात यह है कि राजनेताओं का इन सब में हाथ होना है। इसी साल की खबर है जब जून 2018 में  शुजात बुखारी की हत्या कर दी गई। शुजात अंग्रेजी अखबार 'राइजिंग कश्मीर' के प्रधान संपादक थे। उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई। वे कश्मीर में स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा देने और शांति बहाल करने में लगे हुए थे। इस बात से किसको दिक्कत होगी कि वे इस तरह का एक शानदार काम रहे थे।

पत्रकारों की जमात में कुछ जयचंद भी होते है जो आसमान में कलंक की तरह होते हैं। शासन और प्रशासन की चाटुकारिता में तल्लीन होते हैं ताकि अपनी साख बनाए रखें और लंबी पारी खेल सकें। कुछ पत्रकार अडिग होते जो किसी लालच के बिना काम करते हैं। इन्हीं पत्रकारों पर सबसे ज्यादा मुसीबतें आती है। पत्रकारों का काम केवल अब खबरों का प्रकाशन मात्र नहीं रह गया है। इन सबसे आगे खबरों पर चर्चा और विश्लेषण एक बड़ा भाग बन चुका है। इसमें भी सरकार को समस्या है। इसी समस्या के कारण कुछ टीवी चैनलों को परेशान किया जा रहा है। पत्रकारों और संपादक को चैनल से बाहर निकलवाया जा रहा है। चैनलों पर एक अजीब तरह की सेंसरशिप लगी हुई है जिसमें लोग काम कर रहे हैं। जीवन जीने का माध्यम बन चुकी पत्रकारिता अब भी जीवंत है। सरकार के मन मुताबिक काम न करने पर चैनल को ब्लैक आउट करने की परंपरा बन गई है। यह कितना सही है और गलत यह समझने में किसी को देर नहीं लगेगी।

जर्मनी की एक प्रसिद्ध पत्रिका 'शार्ली एब्दो' पर आतंकियों ने 2015 में हमला कर दिया। इस हमले ने 12 लोगों की जान ले ली। इल्जाम लगा अलकायदा पर। पत्रिका की गलती केवल इतनी थी कि उसने व्यंग्य के लिए मोहम्मद साहब का कार्टून बना दिया। इससे घबराए लोगों ने पत्रिका के ऑफिस हमला बोल दिया। यह कितना सही है कि आपको जो अच्छा न लगे उसे हटा दें। विकल्प हमेशा मौजूद हैं। पाकिस्तान में ईशनिंदा के नाम पर जाने कितने पत्रकार भेंट चढ़ गए। कुछ साल पहले बांग्लादेश में ब्लॉगर्स का कत्ल-ए-आम चल रहा था। इस कत्ल-ए-आम में उन ब्लॉगर्स को निशाना बनाया गया जो कि सरकार के खिलाफ लिख रहे थे। इन ब्लॉगर्स को अपनी जान देकर पत्रकारिता का धर्म निभाना पड़ा।

दुनिया भर में इस तरह के किस्से हैं। चीन एक ऐसा देश है जहां सरकार तय करती है कि मीडिया में किस तरह का कंटेंट जाएगा। एक बार बीजिंग एयरपोर्ट पर एक बम ब्लास्ट हुआ जिसकी खबर कई घंटों तक मीडिया में नहीं आ पाई उसका कारण यह था कि यदि यह खबर मीडिया में आ जाती तो सरकार पर सुरक्षा लिहाज से अंगुली उठती। इसके अलावा चीन में केवल मेनस्ट्रीम मीडिया पर ही नहीं बल्कि सोशल मीडिया और माइक्रोब्लॉगिंग साइट पर भी कड़े प्रतिबंध लगाकर रखें गए हैं। इन प्रतिबंधों का कारण है कि लोगों पर निगरानी रखना है। चीन के पश्चिमी प्रांत शिंजियांग में उइगुर मुस्लिमों पर अत्याचार के किस्से जगजाहिर है। इसी साल चीन ने चार पत्रकारों को चीन का वीजा नहीं दिया। वीजा न देने का कारण था वे शिंजियांग प्रांत जाकर वहां की ग्राउंड रिपोर्ट करना चाहते थे। इन चार पत्रकारों में भारतीय मूल की अमेरिकी पत्रकार मेघा राजगोपालन भी थी।

मिस्त्र की क्रांति के समय कई पत्रकारों को इजिप्ट आने से रोक दिया गया था। इन पत्रकारों में सबसे कड़वा अनुभव अल-जजीरा का है। इसका कारण यह था कि अल-जजीरा ने कई सच को उजागर किया था। अल-जजीरा हमेशा से निशाने पर रहा है। चाहे अमेरिका हो या मध्य-पूर्व उसे सभी ने हाथोंहाथ लिया है। अल-जजीरा को तो अपना अमेरिका स्थित ब्यूरो ऑफिस ही बंद करना पड़ा। कतर का यह चैनल दुनिया भर में मशहूर है कारण साफ है पत्रकारिता की धार। कतर पर 2017 में छह मध्य पूर्व के देशों ने प्रतिबंध लगाए थे और राजनयिक संबंधों को तोड़ने के साथ-साथ अल-जजीरा पर भी प्रतिबंध लगा दिया था।

पत्रकारिता जगत को इस साल की सबसे बड़ी दुर्घटना का सामना करना पड़ा। जमाल खाशोगी की हत्या। जमाल सउदी अरब मूल के अमेरिकी पत्रकार थे। उन्हें केवल इसलिए मरवा दिया गया क्योंकि वे शाही परिवार की आलोचना कर रहे थे। परिवार के गलत निर्णयों के खिलाफ लिख रहे थे। लिखने की सजा उन्हें जान गवांकर  देनी पड़ी। सबसे बड़ी बात यह है कि उनकी हत्या न तो अमेरिका में हुई और न तो सउदी अरब में हुई। उनकी हत्या तुर्की में सउदी अरब के दूतावास में हुई। उनकी हत्या से पत्रकारिता जगत स्तब्ध है। सउदी अरब और तुर्की दोनों हत्या पर राजनीति कर रहे हैं। हत्या का इल्जाम सउदी अरब पर जा रहा है क्योंकि जब जमाल ने सउदी दूतावास के अंदर गए तो दुबारा नहीं लौटे। यहां तक उनका शव भी नहीं मिला। ऐसा तो कभी हो नहीं सकता कि तुर्की को इस हत्या के बारे में जानकारी न हो। उसके देश में दो प्राइवेट प्लेन से हत्यारे आते हैं और हत्या करके चले जाते हैं। इसका पता तुर्की को न हो ऐसा तो हो ही नहीं सकता ।

अब यह मुद्दा केवल जांच का नहीं रह गया है। यह मुद्दा पत्रकारिता और पत्रकारों को बचाने का भी है। आने वाला समय किसने देखा है परंतु पत्रकारिता जीवित रहे यह मेरी आस है।

📃BY_vinay Kushwaha

गुरुवार, 18 अक्टूबर 2018

इलाहाबाद और भी हैं...

भारत एक शानदार देश है। इसकी महानता इसकी विशालता और विविधता से दिखाई पड़ती है। भारत कोई एक झटके में बनने वाला देश नहीं है। इसने कई उतार-चढ़ाव देखें हैं। भारत का नाम शकुंतला के पुत्र भरत के नाम पड़ा। भारत को और भी अनेक नामों से जाना जाता था और है। इन नामों में आर्यावर्त, जम्बूद्वीप जैसे नाम हैं। भारत को भारत आज कितने लोग बोलते हैं? यह सवाल  नहीं बल्कि भारत सरकार के लिए एक बड़ा सवाल है। अंग्रेजों के आने के बाद भारत इंडिया बन गया। वास्कोडिगामा ने भारत की खोज नहीं की थी बल्कि इंडिया की खोज की। भारत को उसके बाद से इंडिया नाम से नाम भी जाना जाने लगा। आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत इंडिया है न कि भारत। यह हमारी बिडंबना है कि भारत, भारत में है और भारत से बाहर इंडिया। हमारे देश के कुछ अंग्रेजीदां लोग भी भारत की एवज में इंडिया ही बोलते हैं।

नामकरण संस्कार सोलह संस्कारों में से एक महत्वपूर्ण संस्कार है। जब बच्चा बड़ा होने लगता है तो उसे नाम की जरूरत होती है। नामकरण संस्कार इसी का कारण किया जाता है। इसी तरह किसी देश, राज्य और शहरों का नामकरण किया जाता है। किसी भी जगह का नामकरण उसके इतिहास, भूगोल, राजनैतिक कारण, व्यक्तिगत योगदान आदि पर निर्भर करता है। ताजा विवाद इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज रखने को लेकर है। इलाहाबाद उत्तरप्रदेश का एक महत्वपूर्ण शहर है।  इसका इतिहास कई दशकों का नहीं बल्कि कई युगों का है। यहां मनु के वंशज पुरुरवा एल का उल्लेख मिलता है। उत्तर प्रदेश सरकार ने यह कहते हुए नाम बदल दिया कि इलाहाबाद का पुरातन काल से नाम प्रयागराज ही था। एक और कारण बताया कि क्या आपका(मनुष्य) एक बार नामकरण करने बाद नाम बदला जाता है? नहीं बदलते तो फिर शहर का नाम क्यों? इसके अलावा इलाहाबाद का इतिहास भी हवा में तैर गया कि इसका नाम अकबर ने इलाहाबाद में बदल दिया था। इलाहाबाद का अर्थ निकाला गया कि अल्लाह का आबाद किया हुआ।

आज मैं एक लेख पढ़ रहा था जिसमें इलाहाबाद का नाम प्रयागराज करने को लेकर कटाक्ष किया गया था कि इलाहाबाद का अर्थ अल्लाह का आबाद शहर नहीं है। इसका कुछ और ही अर्थ होता है। उस लेख में इलाहाबाद का संबंध मनु की बेटी इला से जोड़ा गया। उसमें यह बताया गया कि इलाहाबाद का पहले नाम इलावास था। इलावास बाद में इलाहाबाद बन गया।

नाम बदलने की परंपरा कोई नहीं है। इसमें राजनीतिक प्रभाव ज्यादा रहा है। भारत में शहरों से लेकर राज्यों तक के नामों को बदला गया है। अंग्रेजों के समय मुंबई का नाम बॉम्बे था जो बाद में बंबई हो गया और आखिरी में मुंबई रखा गया। मुंबई रखने पीछे कारण दिया गया मुंबा देवी। मुंबा देवी के नाम पर मुंबई का नामकरण किया गया। केवल मुंबई ही नहीं और भी कई ऐसे शहर है जिनके नाम बदले गए। लोगों की भावना को बरकरार रखने के लिए तुष्टिकरण के लिए आदि। कोलकाता का पुराना नाम कलकत्ता था। कलकत्ता नाम अंग्रेज उपयोग किया करते थे। मद्रास का नाम चेन्नई किया गया। बंगलौर से बंगलुरू हो गया, त्रिवेंद्रम से तिरूवनंतपुरम हो गया, मैसूर , मैसूरू हो गया, पूना से पुणे हो गया। यह सब कुछ एक रात में नहीं हुआ। इन सबके पीछे बात यह थी कि अंग्रेजों की सोच को पीछे छोड़ना चाहते थे। लेकिन हमारे साथ दिक्कत है कि हम भावनाओं में बह जाते हैं।

इससे पहले गुड़गांव का नाम गुरुग्राम करने पर खूब विवाद हुआ लेकिन आखिरकार नाम बदल दिया गया। अब सवाल यह उठता है कि क्या बाकि शहरों का नाम भी बदला जाएगा। मथुरा को मधुपुर कहा जाएगा? कानपुर को कर्णनगरी? लखनऊ को लक्ष्मणावती? कर दिया जाएगा? इस सारे विवाद में वे शहर भी शामिल हैं जो अपने पुराने नामों से पहचाने जाने चाहिए। अजमेर को अजयमेरु, जैसलमेर को जैसलमेरु, अहमदाबाद को कर्णावती, भोपाल को भोजपाल, हैदराबाद को भाग्यनगर, इंदौर को इंदुर, भुवनेश्वर को बिंदु सरोवर, मेरठ को मयराष्ट्र, जबलपुर को जबआलीपुरम, दमोह को तुंडीकेर कर देना चाहिए। क्या यह संभव है? परंपरा और पुरातन व्यवस्था के आधार पर नाम बदलना कहां तक उचित है। क्या सरकार में हिम्मत है कि वह दिल्ली का नाम इंद्रप्रस्थ और पटना का पाटिलीपुत्र करके दिखाए।

राज्यों का नाम भी समय-समय पर बदला गया। उत्तरांचल को उत्तराखंड कर दिया। उड़ीसा को ओडिशा कर दिया। क्या असम का नाम भी प्रागज्योतिष रखा जाएगा? महाभारत में असम का उल्लेख प्रागज्योतिष‌ के नाम से मिलता है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ का रामायण में दंडकारण्य के नाम से उल्लेख मिलता है।

सरकार को नाम बदलने से बढ़िया है कि काम करें। लोगों का हित देखे। लोगों के जीवन में समृद्धि आए ऐसे काम करें। नाम बदलना सरकार काम नहीं है। जब जनता चाहेगी तब नाम बदल जाएगा। सरकार को नामकरण को ट्रेंड नहीं बना लेना चाहिए। छत्तीसगढ़ सरकार की तरह नया रायपुर का बदलकर अटल नगर कर दिया। इतिहास गवाह है कि सत्ता जिसके हाथ में रही है उसने अपने पूर्व की सत्ता की बातों को पलटा है। 

पुराने समय से लेकर आज तक इतिहास उठाकर देखिए एक शहर कितने नामों से जाना गया है। एक शहर के कम से कम दो नाम जरुर मिलेंगे। जब मुस्लिम आक्रमणकारी आए तो उन्होंने अरबी और फारसी वाले खूब नामकरण किए। लगभग सारे बाद वाले शहर इन्हीं की देन है। मुगलों के बाद अंग्रेज,डच, फ्रांसीसी, पुर्तगाली आए तो इन्होंने अपनी भाषा में शहर का नाम रखा। इसके बाद सुविधानुसार शहर का नाम बदलते गए और शहर भी।

📃BY_vinaykushwaha

शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

अटल सोचते होंगे



  

भारतीय राजनीति में सत्ता पाना मात्र लक्ष्य नहीं होता बल्कि उस सत्ता का किस तरह अच्छी तरह उपयोग करें, इसका ज्यादा मतलब होता है। गन्ने का रस बेचने वाला गन्ने को मशीन में तब तक ड़ालता है जब तक कि उसका सारा रस न निकल जाए। नेता भी कुछ इसी तरह के होते हैं वे सत्ता पाने के बाद उन सभी दांव-पेंच का उपयोग करते हैं जो उन्हें दुबारा सत्ता में लाने के लिए काफी हो। सत्तासीन नेतागण यह भी देखते हैं कि सत्ता का इस्तेमाल करने से वे किसी मामले में पीछे न रह जाएं। भारत की राजनीति में अनेक ऐसे उदाहरण देखने को मिलते हैं जहां सत्ता का दोहन इस हद तक किया गया कि राजनीति भी कराहने लगी।

सत्ता में आने वाली सरकार अपने पिछली सरकार से आगे निकलने की होड़ में रहती है। हमेशा ऐसा लगता सरकार जनता के बारे में चिंतामणि बनी हुई है। सरकार नई-नई योजनाओं को लेकर आती है ताकि लोगों को राहत और सहूलियत दी जा सके। इन सबके विपरीत चलता कुछ और ही है। सत्ता में आई सरकार ऑक्टोपस की तरह हो जाती है जो छद्म भेष धारण करने में माहिर होती है। पुरानी सरकार की योजनाओं को नए नाम के साथ पेश किया जाता है। जैसे बासी चावल को जीरा और प्याज का छौंक लगाकर परोस दिया गया हो। भारत में एक बड़ी समस्या नामकरण भी है।

नामकरण, जी हां। नया ब्रिज हो या सरकारी इमारत, नया हॉस्पिटल हो या सड़क सभी नामकरण की राजनीति का शिकार हुए हैं। सड़क का नाम बदलकर किसी नए नाम के साथ जोड़ देना हो या योजना में नाम बदलकर नया नाम रखना हो। कांग्रेस जब तक सत्ता में रही उसने खूब नामकरण किया अपने नेताओं को सम्मान देने के बहाने से योजनाओं, इमारतों, सड़क और बाग-बगीचों के नामकरण में कोई कमी नहीं छोड़ी है। जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी आदि का जमकर इस्तेमाल किया। सरकारी योजनाओं के नाम पर अपने नेताओं का प्रमोशन करते रहे हैं। एयरपोर्ट हो या बस अड्डा सभी को राजनीतिक रंग में रंगने की पुरजोर कोशिश की है।

यह तो अच्छी बात है कि 2016 में एक नियम लागू किया गया कि अब से किसी भी एयरपोर्ट का नाम किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं होगा। एयरपोर्ट के नामकरण के मामले में बीजेपी कही पीछे छूट गई। कांग्रेस ने यहां भी झंड़े गाड़े हैं। साल 2016 में लागू नियम में एक पेंच है जिसमें यह कहा गया है कि किसी भी एयरपोर्ट का नाम किसी भी व्यक्ति विशेष पर नहीं हो सकता लेकिन उसके टर्मिनल का नाम व्यक्ति विशेष पर हो सकता है। यह राजनीति का असली खेल होता है।

मोदी सरकार 2014 में आने के बाद उसने कई योजनाओं, रेलवे स्टेशन, सड़कों के अलावा बीजेपी ने शहरों तक के नाम बदल ड़ाले। बैंगलोर को बंगलुरू, मैसूर को मैसूरू, गुड़गांव को गुरूग्राम कर दिया गया। बीजेपी की सबसे ज्यादा किरकिरी गुड़गांव को गुरूग्राम करने पर ही हुई थी। उड़ीसा का नाम ओडिशा हो गया। सबसे ज्यादा विवादित रहा मुगलसराय जंक्शन का नाम बदलना। बीजेपी का कहना था कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय का देहांत इसी जगह हुआ था। इस कारण स्टेशन का नाम बदलकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन कर दिया गया है। वजह जो भी हो नाम तो बदल चुका है।

इस मामले में क्षेत्रीय पार्टियां भी पीछे नहीं रही हैं। शिवसेना ने मुंबई का नाम बॉम्बे और बम्बई से मुंबई कराकर ही दम लिया। इसके अलावा केरल की राजधानी त्रिवेन्द्रम से तिरूवनंतपुरम और कोचीन , कोच्चि हो गया। तमिलनाडु में आते हैं तो आज की राजधानी चेन्नई का पहले नाम मद्रास हुआ करता था। पश्चिम बंगाल की राजधानी 2001 में नाम बदलकर कलकत्ता से कोलकाता कर दिया गया। इसके पीछे कारण यह था कि यह बंगाली में इसका उच्चारण कोलकाता है। ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की सत्ता में आने के बाद पश्चिम बंगाल का नाम हिंदी, इंग्लिश और बंगाली में अलग-अलग रखने की कोशिश की। इसके लिए ममता ने केन्द्र को प्रस्ताव भी भेजा गया लेकिन केन्द्र सरकार ने मना कर दिया।

बसपा सुप्रीमो और उत्तरप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने तो सबसे आगे जाते हुए कई पांसे चल दिए। उन्होंने उत्तर प्रदेश को तीन बांटने का प्रस्ताव केन्द्र सरकार को भेजा था जिसे सरकार ने इंकार कर दिया था। इसके अलावा उन्होंने कई जिलों का निर्माण किया जिनका कांशीराम नगर, संत कबीर नगर, अंबेडकर नगर आदि नाम रखा गया।

हमारे देश की राजनीति में एक और काम पूरी श्रद्धाभाव से किया जाता है। नेताओं की समाधि का निर्माण कार्य। जवाहर लाल नेहरू से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक जिस तरह समाधि निर्माण किया गया उससे यही प्रतीत होता है कि यह महिमा मंडन ही है। आजादी के बाद 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी का निधन हुआ तो उनके आदर्शों और संस्कारों के साथ उनका समाधि निर्माण रामघाट नाम से किया गया। इसके पीछे कारण था कि वे अंतिम समय में भी भगवान राम का नाम ले रहे थे।

दुनिया में सबसे बड़ी समाधि के रुप में लेनिनग्राड में बनी है। लेनिन की समाधि को माना जाता है। समाधि एक आस्था हो सकती है लेकिन उत्सव नहीं। डॉ बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर की समाधि को जहां बनाया गया उसे दीक्षा भूमि नाम दिया गया। लोगों में दीक्षा भूमि के प्रति आस्था है। सादगी पसंद भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को भी विजय घाट के नाम से जगह दी गई। इस सभी के प्रश्न यह उठता है कि क्या कभी लाल बहादुर शास्त्री यह उम्मीद करते। बाल ठाकरे के निधन के बाद भी शिवसेना ने खूब राजनीति की थी। पहले तो आजाद मैदान में ही बाल ठाकरे का अंतिम संस्कार किया गया और फिर वही समाधि बना दी। समाधि बनाने की रोक के बावजूद ऐसा किया गया। नियमों में सख्ती के कारण शिवसेना वहां से समाधि हटाना ही पड़ी।
 
इंदिरा गांधी और राजीव की हत्या के बाद उनका दाह संस्कार क्रमश: शक्ति स्थल और वीरभूमि में किया गया। नेता के निधन के बाद राजनीति और महिमा मंडन करने की परंपरा केवल राष्ट्रीय राजनीति में ही नहीं बल्कि क्षेत्रीय राजनीति में भी है। चेन्नई का मेरीना बीच अपने सुंदर समुद्री तट के अलावा नेताओं की समाधि के लिए भी जाना है। जहां एमजी रामचंद्रन, जे जयललिता और एम करूणानिधि की समाधियां हैं। इनमें से करुणानिधि के निधन के वक्त राजनीति हुई। हुआ यह कि एआईएडीएमके ने एक नियम बनाकर मेरीना बीच में नेताओं की समाधि बनाने पर बैन लगा दिया। जिसका डीएमके ने विरोध किया। विरोध बढ़ता देख एआईएडीएमके ने करुणानिधि की समाधि बनाने की छूट दे दी।

अटल बिहारी वाजपेयी अपने समय के कद्दावर नेताओं में गिने जाते थे। भारत रत्न मिलने की बात सुनकर मुस्कुरा देने वाले अटल इस बात को गहराई से जानते थे कि उन्हें यह क्यों मिल रहा है। आपातकाल के बाद सूरजकुंड में बीजेपी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हो रही थी। अटल बिहारी वाजपेयी बैठक की बजाय पटना के अगमकुआं में जयप्रकाश नारायण से मिलने गए थे। जेपी से जैसे ही मिलकर बाहर निकले तो रिपोर्टरों ने पूछा क्या बातचीत हुई? इस पर उन्होंने कहा उधर कुंड इधर कुंआ बीच में धुआं ही धुआं। इस प्रकार के विचार रखने अटल ने कभी यह नहीं सोचा होगा उनका इस तरह महिमा मंडन किया जाएगा।

अटल बिहारी वाजपेयी जी का दाह संस्कार राष्ट्रीय स्मृति स्थल पर किया गया। यह कोई आम अंतिम संस्कार नहीं बकायदा इसके लिए नियम बदले गए। इसके बाद उन्हें दो पूर्व प्रधानमंत्री के बीच‌ स्थान प्रदान किया गया। इससे पहले नियम था कि इस क्षेत्र में किसी भी नेता का अंतिम संस्कार नहीं किया जाएगा। इस नियम को अटल बिहारी वाजपेयी जी के लिए बदला गया। इसके बाद भी उनकी अस्थियों को देशभर की 100 बड़ी नदियों में विसर्जित किया जाएगा। देशभर में शांति सभा का आयोजन किया जाएगा।

इसके बाद कई ऐसे निर्णय लिए गए जो शायद न भी होता तो चलता। छत्तीसगढ़ सरकार ने नया रायपुर का नाम अटल नगर करने की घोषणा की। मध्यप्रदेश सरकार ने प्रदेश में बन रही सात स्मार्ट सिटी में लाइब्रेरी का नाम अटल बिहारी वाजपेयी जी नाम पर किए जाने की घोषणा कर दी। उत्तर प्रदेश सरकार ने लखनऊ का प्रसिद्ध चौराहा हज़रत गंज से बदलकर अटल चौक करने की घोषणा की है।

यह सब आपकी और मेरी नजर का फेर है बाकि तो प्रेम और श्रद्धा है। आज अटल सोच रहे होंगे कि इस अटल बिहारी वाजपेयी को महाअटल बना दिया है।

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शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

पाकिस्तान और इमरान खान

क्या इमरान पाकिस्तान के पीएम रहते हुए अपना कार्यकाल पूरा कर पाएंगे?

इमरान खान ने 18 अगस्त को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के पद की शपथ लिया. शपथ लेने के साथ ही इमरान पाकिस्तान के अधिकारिक रूप से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बन गए. सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वे अपना कार्यकाल पूरा कर पाएंगे. पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास गवाह है कि आज तक कोई भी प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया है. अभी हालिया उदाहरण हमारे सामने  नवाज शरीफ के रूप में है. जिन्हें पनामा पेपर लीक मामले में पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने उनकी उम्मीदवारी को अयोग्य घोषित कर दिया है. उम्मीदवारी अयोग्य घोषित होने के साथ ही उन्हें प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा और 14 साल की सजा हो गई.

नवाज शरीफ के साथ कोई यह पहली बार नहीं हुआ है. साल 1993 में नवाज शरीफ सरकार को तत्कालीन राष्ट्रपति गुलाम खान ने बर्खास्त कर दिया. यह मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा और सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सरकार को बहाल कर दिया. मामला यही नहीं थमा बल्कि राष्ट्रपति गुलाम खान ने फिर से उन्हें पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 58-2b के तहत फिर से बर्खास्त करने का प्रयास किया गया. मामला फिर से सुप्रीम कोर्ट गया और शरीफ ने मामले पर समझौता करते हुए इस्तीफा दे दिया. सरकार केवल 2 साल 7 महीने तक चली.

इसके बाद 1997 में नवाज शरीफ ने फिर से सरकार बनाई. इस बार भी काली परछाइयों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा. जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ उस समय सेना प्रमुख थे. साल 1999 में परवेज़ मुशर्रफ़ ने नवाज शरीफ की सरकार को हटाकर मार्शल लॉ लगा दिया. फिर से नवाज सरकार अपना कार्यकाल पूरा करने में नाकाम रही. मुशर्रफ़ ने देश पर 1999 से लेकर 2001 तक तानाशाह के रूप में शासन किया.  साल 2001 में परवेज़ मुशर्रफ़ राष्ट्रपति बन गया. राष्ट्रपति के रूप में उसने देश में 2001 से 2008 तक शासन किया.

परवेज़ के राष्ट्रपति के रूप में रहते हुए चार प्रधानमंत्री हुए. जिनमें से किसी ने भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया. कोई तीन साल तो कोई दो महीने के लिए प्रधानमंत्री बना. मुशर्रफ़ के राष्ट्रपति रहते हुए युसूफ़ रजा गिलानी ही एकमात्र प्रधानमंत्री थे जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा करने से करीब 10 महीने से चूक गए. उन्होंने 4 साल 2 महीने का कार्यकाल पूरा किया. युसूफ़ को न्यायालय की अवमानना के मामले में उनकी सीट को 2012 में अयोग्य घोषित कर दिया. शेष बचा हुआ कार्यकाल परेवज़ अशरफ़ ने पूरा किया.

पाकिस्तान के इतिहास में यह पहली बार नहीं था कि किसी सेना प्रमुख ने प्रधानमंत्री को उसके पद से हटाने के बाद सत्ता की बागड़ोर अपने हाथ में ले ली हो. इससे पहले 1958 में फ़िरोज खान नून की सरकार को तत्कालीन राष्ट्रपति शकंदर मिर्जा ने बर्खास्त करते हुए मार्शल लॉ लागू कर दिया. इस काम में उनका साथ अयूब़ खान ने दिया जो तत्कालीन सेना प्रमुख थे. नून सरकार ने अपना हनीमून पीरियड भी पूरा नहीं कर पाई. अयूब़ खान ने अपने दोस्त यानी शकंदर मिर्जा को भी नहीं बख्श़ा, हिरासत में ले लिया. बाद में शकंदर को देश से निकाल दिया जिनकी बाद में ब्रिटेन में मृत्यु हो गई. अब पाकिस्तान पर अयूब़ खान का राज था. अयूब़ खान ने 1958 से 1969 तक राष्ट्रपति के रूप में राज किया.  

अयूब़ खान के बाद देश के राष्ट्रपति याह्या खान बने. याह्या खान 1969 लेकर 1971 तक देश के राष्ट्रपति रहे. पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में 1958 से लेकर 1971 तक कोई भी प्रधानमंत्री नहीं रहा. याह्या खान के राष्ट्रपति रहते हुए नुरुल अमीन मात्र 13 दिनों के लिए प्रधानमंत्री बने.

वर्ष 1971 में बंगलादेश युद्ध हुआ. जुल्फिकार अली भुट्टो 1971 से 1973 तक राष्ट्रपति रहे. इस दौरान कोई भी प्रधानमंत्री नहीं बना. साल 1973 में जब जुल्फिकार अली भुट्टो देश के प्रधानमंत्री बने. जुल्फिकार के प्रधानमंत्री रहते हुए 1977 में सेना प्रमुख जिआ-उल-हक को नियुक्त किया गया. जैसे ही जिआ-उल-हक सेना प्रमुख बने उसी वर्ष जुल्फिकार सरकार को हटाकर मार्शल लॉ लगा दिया. साल 1978 में जिआ-उल-हक खुद ही राष्ट्रपति बन गया. पाकिस्तान पर 1978 से लेकर 1988 तक राष्ट्रपति रहे. जिआ के काल में केवल एक बार चुनाव हुए. वर्ष 1985 में हुए इस चुनाव में मोहम्मद खान जूनेजो प्रधानमंत्री बने. इस चुनाव की सबसे बड़ी बात यह थी कि यह निष्पक्ष चुनाव नहीं था. यह पार्टी बेस्ड चुनाव न होकर स्वतंत्र चुनाव था. जूनेजो 1985 से लेकर 1988 तक प्रधानमंत्री रहे.

साल 1988 में फिर से पाकिस्तान में चुनाव हुए. इन चुनावों पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की जीत हुई. बेनजीर भुट्टो  पाकिस्तान की  पहली महिला प्रधानमंत्री बनी. बेनजीर, जुल्फिकार अली भुट्टो की बेटी थी. यह सरकार भी ज्यादा दिनों तक नहीं चली.  पाकिस्तान में फिर से 1990 में चुनाव हुए जिसमें नवाज शरीफ चुनकर आए. इन्हें मार्शल लॉ के जरिए हटा दिया गया.

पाकिस्तान वैसे तो एक लोकतांत्रिक देश है लेकिन उसका पूरा नाम इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान है. क्रिकेट से राजनीति की दुनिया में आए इमरान खान पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में कुछ नया करने के लिए आए. भले ही उन्हें चुनावों में पूर्ण बहुमत न मिला हो लेकिन वे जनता के मुद्दों को उठाने में सफल रहे हैं. इमरान ने पाकिस्तान के चार बड़े मुद्दों पर खुलकर आवाज बुलंद की जिनमें बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, पाकिस्तान की चरमराती अर्थव्यवस्था और आतंकवाद है.

राजनीति में आने के बाद इमरान ने हमेशा ऐसे मुद्दों को अपनी आवाज दी है जो जनता को प्रभावित करते हैं। नवाज शरीफ, आसफ अली जरदारी जैसे राजनेताओं को कड़ी टक्कर दी। पाकिस्तान की दो सबसे बड़ी पार्टियां मुस्लिम लीग और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को इमरान की नवांकुर पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ ने चुनौती दी है। आम चुनाव 2018 में तो दोनों पार्टियां घुटने टेकते हुए नज़र आईं। भारत के विषय में इमरान ने हमेशा सधी टिप्पणी की है। क्रिकेटर यह बात अच्छे से समझता है कि किस गेंद पर चौका और किस गेंद पर छक्का लगाना है.

अभी तक इमरान तीन शादियां कर चुके हैं. तीसरी पत्नी बुशरा मानेका ने उन्हें एक बार कहा था कि यदि आप प्रधानमंत्री बनना चाहते हो तो आपको तीसरी शादी करनी होगी. बुशरा मानेका एक पीरनी है, उन्हें पिंकी पीर के नाम  से भी जाना जाता है. अब देखना होगा कि बुशरा बीबी की भविष्यवाणी किस हद तक सही होगी और कब तक इमरान को पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनाकर रखेंगी।

यही दौर पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में चलता रहा है. आगे क्या होगा यह तो समय ही बताएगा. इमरान की सरकार शायद अपनी सरकार के पांच साल पूरा करने में कामयाब हो.

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शनिवार, 9 जून 2018

भारतीय वास्तुकला (श्रृंखला-चार)


भारतीय वास्तुकला में विदेशियों का भी योगदान है यहां बहुत सी ऐसी स्थापत्य कला हमें देखने के मिलती है जिसे मुस्लिम स्थापत्य कला के रूप में जानते है। जब मुस्लिम स्थापत्य कला का भारत में प्रवेश हुआ तो यह हिंदु-मुस्लिम स्थापत्य कला या इंडो-इस्लामिक स्थापत्य कला हो गई। मुस्लिम धर्म में मूर्ति पूजा वर्जित है जिसके कारण मुस्लिम शासकों के द्वारा तैयार किए गए स्मारकों, मस्जिदों,मकबरों,भवनों या किसी भी संरचना में मूर्ति देखने को नहीं मिलती है। मूर्तियों की जगह फूल-पत्ती, मेहराब, गुंबद, मीनार, बुर्ज, जाली आदि ने लियी। इनके उपयोग से भारत में नए-नए स्थापत्य कला का विकास हुआ।

मुस्लिम शासकों ने अपने शासन में सर्वाधिक जोर मस्जिद बनाने में दिया। मस्जिगों में मीनार, गुंबद, मेहराब पर दिया गया। जहां मंदिरों में शिखर हुआ करते थे वही मस्जिदों में उनकी जगह गुंबद ने ली। भारत का सबसे बड़ा गुंबद कर्नाटक के बीजापुर में स्थित है। यह अपने आप में कारीगरी का बेमिसाल उदाहरण है। यह बीजापुर के शासक ने बनवाया था। यह बलुआ पत्थर से तैयार किया गया है। गुंबद बनाने गोलाकार या यूं कहे कि उल्टा कटोरा होता है। उत्तर भारत और दक्षिण भारत दोनों में सामग्री के इस्तेमाल में विभिन्न पाई गई है। मुगलों समय जहां उत्तर भारत में लाल पत्थर का उपयोग किया वही दक्षिण भारत में ग्रेनाइट और बलुआ पत्थर का उपयोग किया गया।

मीनार, मुस्लिम स्थापत्य कला का अभिन्न हिस्सा हैजिसे सामान्यतया हर मस्जिद देखा जा सकता है। मस्जिद में अजान के लिए इन मीनारों का उपयोग किया जाता था। भारत की सबसे ऊंची मीनार कुतुब मीनार है जो विश्व विरासत स्थल में शामिल है। इसका निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक ने करवाया था जिसे पूरा कराने का श्रेय इल्तुतमिश हो जाता है। इन मीनार का निर्माण भी स्थान विशेष पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर किया जा जाता था। कही लाल पत्थर,तो कही बलुआ पत्थर तो कही बेसाल्ट का उपयोग किया जाता था। मीनारों को कलात्मक बनाया जाता था जिसमें नक्काशी की जाती थी।


मीनार के शिखर पर जाने के लिए सीढ़ियां बनाई जाती थी। कई बार यह सीढ़ियों अंदर से होती थी और कई बार बाहर से। जैसे कुतुब मीनार में सीढ़ियां मीनार के अंदर से बनाई गई जबकि जूनागढ़ के बहाउद्दीन के मकबरे में मीनार के बाहर से बनाई गई है। इन मीनारों की कलात्मकता देखते ही बनती है। मीनारों को इस प्रकार भी बनाया जाता था कि यह मुख्य संरचना को कोई नुकसान न पहुंचाए। यदि कभी भूकंप वगैरह आए तो मीनार बाहर की ओर या मुख्य संरचना से विपरीत गिरें। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ताजमहल है जिसमें मीनारों को इस प्रकार बनाया है कि मीनारें बाहर की ओर गिरे।

किसी भी संरचना को सुंदर बनाने के लिए बड़ी-बड़ी मीनारों के अलावा छोटी-छोटी मीनारों का उपयोग किया जाता था। ताजमहल में इस प्रकार की संरचना देखने को मिलती है।

मुगलकाल और बाद दरवाजें बनवाने का प्रचलन चला। अकबर ने गुजरात विजय पर भारत का सबसे ऊंचा दरवाजें का निर्माण करवाया। जिसका नाम फतेहपुर सीकरी का बुलंद दरवाजा है। इसका निर्माण लाल पत्थर से किया गया है। इसके अलावा लखनऊ, जयपुर, मांडू, भोपाल, अहमदाबाद  आदि जगह दरवाजा परम्परा देखने को मिलती है। दरवाजों को सुंदर और कलात्मक के साथ-साथ भव्य बनाया जाता था। इसका कारण यह था कि जो पड़ोसी राज्य है उसके राज्य की वैभव-विलासता को पहचान सके। दरवाजों का वर्णन हमें प्राचीन समय से सुनने को मिलता है लेकिन यहां बात इस्लामिक संरचना पर बने दरवाजों की हो रही है।


इस्लामिक स्थापत्य कला में एक विशेष प्रकार की सामग्री का उपयोग किया गया। वह सामग्री है संगमरमर। इसकी सबसे बड़ी मिसाल ताजमहल है। ताजमहल, संगमरमर से बनी पहली इमारत नहीं है बल्कि आगरा में ही बनी ऐतमाद्दौला का मकबरा है। पूर्ण रूप से संगमरमर से बनी यह पहली इमारत थी। इन दोनों इमारत को बनाने में मकराना के संगमरमर का उपयोग किया गया है। मुगलों के काल में राजस्थान से संगमरमर के साथ-साथ लाल पत्थर का भी निर्यात किया जाता था।

भारत में विदेश से कई प्रकार की कला का आगमन हुआ जिसमें पेट्राडोरा या पित्रादुरा कहते है। पेट्राडोरा एक कला है जिसका आगमन ईरान से हुआ है। यह कला संगमरमर के पत्थर पर विभिन्न प्रकार को रत्नों को खोदकर सजाया जाता है। विभिन्न प्रकार के आकार और आकृति के पत्थर पर अलग-अलग सजावट के साथ बनाया जाता है। इसमें पेड़- पौधे, फूल, पत्ती, विभिन्न प्रकार की आकृतियों को उकेरकर उसमें विभिन्न रंगों जैसे लाल, पीला, हरा, नीला, गुलाबी, फिरोजी आदि रंगों का उपयोग किया जाता है।


इस्लामिक स्थापत्य कला में एक और कला सामने आती है। जाली, इस्लामिक स्थापत्य कला में एक अहम स्थान रखती है। चाहे मकबरा हो या मस्जिद हो या दरगाह हो या किला हो या महल हो या छतरी हो मुगलकाल से जाली का महत्व बढ़ गया। अहमदाबाद में   निर्मित जामा मस्जिद या जुम्मा मस्जिद में हिन्दु स्थापत्य कला या भारतीय स्थापत्य कला या मंदिर स्थापत्य कला  की छाप आसानी से देखने को मिलती है। यहां आसानी कई ऐसी आकृतियां देखने को मिलता  है भारतीय संस्कृति और संस्कार को दर्शाती हैं। इसके अलावा हैदराबाद की चार मीनार भी शानदार नमूना है। यह एक दरवाजे की तरह है जिसमें चार मीनार है। मध्यप्रदेश के मांडू में बने अनेक महल इस्लामिक स्थापत्य कला को दर्शाते हैं। इन महलों या संरचना में जहाज की आकृति के तरह बना जहाज महल, गुजरी महल, होशंगशाह का मकबरा, अशर्फी महल  आदि सभी एक प्रतीक है।

दिल्ली और आगरा का लाल किला, हुमाऊं का मकबरा, सिकंदरा मकबरा, हौज खास, कशमीरी गेट, फतेहपुर सीकरी, भोपाल की ताज-उल-मस्जिद, हैदराबाद की मोती मस्जिद, गोलकुंडा का किला, बीजापुर का गोल गुबंद आदि इस्लामिक स्थापत्य कला के नमूने हैं। इस्लामिक स्थापत्य कला में आगरा स्थित ताजमहल को बेमिसाल प्रतीक माना जाता है। लखनऊ का बड़ा इमामबाड़ा, छोटा इमामबाड़ा, बुरहानपुर की ऐतिहासिक इमारत इसी स्थापत्य कला का नमूना। बुरहानपुर में स्थित कुंडी भंडारा जल व्यवस्था का अद्वितीय उदाहरण है। वही कुछ बदसूरत इमारत भी भारत में देखने को मिलता है। ऑरंगजेब द्वारा बनवाया गया बीबी मकबरा ताजमहल की फूहड नकल मात्र है।


भारत में इस्लामिक स्थापत्य कला में इमारत ही नहीं बल्कि एक और संरचना दिखाई देती है। यह संरचना "चार बाग" है। चार बाग एक प्रकार से गार्डन ही है। यह संरचना मुगलकाल से सामने आया या शुरु हुआ। इसमें एक गार्डन बनाया जाता है जिसे समकोण पर काटती दो सड़क द्वारा गार्डन को चार भाग में विभक्त कर दिया जाता है। चार बाग के साथ एक संरचना और जुड़ी हुई है जिसका नाम फव्वारा है। फव्वारा के कारण इमारत की सुंदरता बढ़ जाती है।

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शुक्रवार, 8 जून 2018

पुस्तक समीक्षा: हम असहिष्णु लोग


आप तो मां सरस्वती के पुत्र हो तर्क के आधार पर सरकार को कठघरे में खड़े कीजिए। वरना समाज तो यही कहेगा कि आप साहित्य को राजनीति में घसीट रहे हैं। इन्हीं तथ्यपरक बातों के साथ देश में फैली अराजकता पर कटाक्ष करती एक पुस्तक 'हम असहिष्णु लोग'। अर्चना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक लोकेन्द्र सिंह ने लिखी है। इस पुस्तक में देश में हो रहे कथित आंदोलनों और मुहिमों पर कड़ा तमाचा जड़ा है। लेखक ने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित अपने लेखों के संग्रह को एक पुस्तक की शक्ल दी है।

पुस्तक के शीर्षक को देखें तो एक बार ऐसा लगता है कि यह किसी अराजकता की बात कह रहा है लेकिन ऐसा नहीं है। इस पुस्तक का शीर्षक 'हम असहिष्णु लोग' रखने के पीछे लेखक का देश में हो रही गतिविधियों से हैं जिसमें कुछ लोग स्वयं अराजकता फैला रहे है और समाज व देश की भोली-भाली जनता को बरगलाने की कोशिश कर रहे हैं साथ ही अव्यवस्था का ठीकरा किसी और फोड़ रहे हैं। यह पुस्तक उन अनैतिक गतिविधियों की गवाह है जिन्हें देश में बड़े जोर-शोर से चलाया जाता रहा। अवॉर्ड वापसी, यह एक ऐसा अभियान था जिसमें लेखक, साहित्यकार आदि में अपने अवॉर्ड वापस करने की होड़ मची थी। इस मुहिम को लेखक ने अवॉर्ड वापसी गैंग का नाम दिया है। सच ही है कि यह एक गैंग है जिसने असहिष्णुता के नाम पर अवॉर्ड वापसी की मुहिम चलाकर लोगों को बरगलाया गया। चाहे नयनतारा सहगल हो या अशोक बाजपेयी हो ने अपने अवॉर्ड वापस किए और तर्क भी ऐसे दिए कि जिनका मेल दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। एक साहित्यकार ने तो तर्क दिया कि सिक्ख दंगों के वजह से मैं अपना अवॉर्ड वापस कर रहा हूं। इसी मुहिम के खिलाफ लेखक ने जमकर लताड़ लगाई है।

इस पुस्तक में अवॉर्ड वापसी के अलावा असहिष्णुता के मुद्दे पर देश भर में फैलाई जा रही भ्रांतियों के बारे में लिखा है कि कैसे एक अभिनेता अपनी असुरक्षा के बारे में बात करता है और उनकी पत्नी कहती है कि यदि ऐसा ही माहौल रहा तो हमें देश छोड़ना होगा। देश में अव्यवस्था फैलाने  वाले ऐसे लोगों पर तर्क सहित अपनी बातें रखी हैं। चाहे मामला गोमांस भक्षण का हो या किसी वर्ग विशेष को प्रोत्साहन देने की इन विषयों पर लेखक ने अपनी बात को बेबाकी से रखा है। सारे आम गोमांस खाकर हिन्दु धर्म के लोगों को चिढ़ाया जा रहा है और इसे बीफ पार्टी का नाम दिया जा रहा है। केरल जैसे राज्य जहां साक्षतरता दर सर्वाधिक है वहां सार्वजनिक स्थलों पर बीफ पार्टी का आयोजन किया जा रहा है। इसी विषय को किताब में जगह दी गई है और तर्कों के साथ बताया है कि किस प्रकार कुछ मुट्ठी भर लोग समाज में अव्यवस्था और साम्प्रदायिकता  फैलाने का कार्य कर रहे हैं।

इन सबके अलावा पुस्तक में देश विरोधी अभियान और देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में हुई देश विरोधी गतिविधियों को भी शामिल किया गया है। जहां जेएनयू जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारे सुनाई दिए वही देश के अन्य विश्वविद्यालयों में देश और समाज को बांटने वाली गतिविधियों के तार्किक विश्लेषण को लेखक ने अपनी किताब में जगह दी है। यहां तक की विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय आस्था की केन्द्र भारतमाता और हिन्दु धर्म की बेइज्जती के मामले में भी लेखक ने बड़ी सटीकता के साथ लिखा है। अफजल गुरु और याकूब मेनन को महिमामंडित करके उनके पक्ष में नारे लगाकर देश की न्यायव्यवस्था को धता बताया गया, जिस पर लेखक ने अपनी पुस्तक में कटाक्ष किया है।

रास्ते के नाम बदलने की बात हो या  पूर्व उपराष्ट्रपति  हामिद अंसारी की कर्त्तव्यपरायणता की बात हो सभी मुद्दों को लेखक ने जगह दी। कुछ वर्ग विशेष के द्वारा केन्द्र सरकार के उस फैसले पर रोष जताया जिसमें ऑरंगजेब रोड का नाम बदलकर कलाम रोड किया गया। लेखक ने इसका तथ्यपरक विश्लेषण करके अपनी किताब में लिखा कि कैसे कुछ लोग अभी भी उस व्यक्ति को याद करना चाहते है जिसने देश को लूटा, अत्याचार किया, मानवता को तार-तार किया। इसके अलावा पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के उन गतिविधियों पर करारा प्रहार किया जिसमें उनके द्वारा सेना को सलामी न देना, राष्ट्रीय ध्वज को सलामी न देना और हिन्दु-मुस्लिम राजनीति की बात करना जैसे मुद्दे शामिल है।

हम असहिष्णु लोग पुस्तक देश में हो रही देश विरोधी गतिविधियों का एक प्रमाण है जिसमें उन अराजक ताकतों के बारे में लिखा है जो देश को बांटने का काम कर रही है। इस पुस्तक में  सभी मुद्दों को  तथ्यों और तार्किक के साथ बड़ी सटीकता से लिखा गया है। एक बार जरूर पढ़े 'हम असहिष्णु लोग'।

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