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बुधवार, 16 मई 2018

कर्नाटक चुनाव विश्लेषण


भारत में ऐसा बहुत कम होता है कि ओपिनियन पोल, एक्जिट पोल और चुनाव का नतीजा बिल्कुल एक जैसा हो। इस बार कर्नाटक के परिप्रेक्ष्य में यह सही साबित हुआ। सभी नतीजों में बीजेपी को सबसे बड़ी पार्टी के रूप में दिखाया जा रहा था वही कांग्रेस को दूसरे नंबर पर और जेडीएस को तीसरे नंबर पर दिखाया जा रहा था। लेकिन इन सब के बीच किसी पार्टी को बहुमत नहीं दिया जा रहा था जो अन्त्वोगत्वा सही निकला। इस चुनाव भले ही बीजेपी को सबसे बड़ी पार्टी के रूप में दिखाया जा रहा हो लेकिन वह इस हालत में नहीं है कि वह कर्नाटक में सरकार बना सके। बीजेपी ने इस चुनाव 104 सीटों विजय हासिल की। वही कांग्रेस ने 77, जेडीएस ने 37 और अन्य को 3 सीटें मिली।

एक चौंका देने वाली बात यह है कि बहुजन समाज पार्टी को भी एक सीट मिली। दक्षिण भारत के राज्य बीएसपी का चुनाव जीतना चौंका सकता है लेकिन यह पहला मौका नहीं है जब बहुजन समाज पार्टी कर्नाटक में चुनाव लड़ रही है। 2013 में भी बीएसपी ने चुनाव लड़ा था और लगभग 1.5 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किए थे।  इस बार सबसे बड़ी बात यह है कि बीएसपी का वोट शेयर घटा हैं जो 0.3 प्रतिशत तक जा पहुंचा हैं। इसके बावजूद बीएसपी को एक सीट पर कब्जा करने में कामयाबी मिली है।

इस चुनाव में बीएसपी और मायावती की चर्चा हो रही है। पहला कारण तो बीएसपी का एक सीट पर कब्जा करना और दूसरा कारण मायावती की पार्टी बीएसपी का पूर्व प्रधानमंत्री एच डी दैवेगौडा की जेडीएस की पार्टी का गठबंधन। यह गठबंधन चुनाव पूर्व किया गया था। मायावती का जेडीएस की चुनावी रैली में दिखना आम बात थी। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण मायावती का दैवेगौडा का फोन करके कांग्रेस के साथ कर्नाटक में  सरकार बनाने की बात कहना। क्या यह कहा जा सकता है कि मायावती के कहने पर दैवेगौडा, कांग्रेस के साथ कर्नाटक में सरकार बनाने के लिए राजी हुए हैं।

कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला के सामने सरकार बनाने का प्रस्ताव रखा है। कांग्रेस ने एच डी दैवेगौडा के सुपुत्र कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार किया है। कांग्रेस और जेडीएस (77+37=114) के जादूई आंकडें को छू लिया है। इन सबके अलावा यह सवाल करना सही रहेगा कि क्या यह सरकार कितने दिनों तक काबिज रहेगी? अभी बगावती सुर बुलंद हो गए हैं। वोक्कालिंगा, लिंगायत और कुरबा अलग-अलग जातियों से आने वाले विधायकों ने अपनी-अपनी को विरोध के रूप में कहने का प्रयास किया है। जेडीएस के कुछ विधायक सिद्धारमैया को स्वीकार नहीं करना चाहते क्योंकि वे कुरबा जाति से आते है।

एक और बात सामने आती है कि क्या दैवेगौडा सिद्धारमैया को सरकार में स्वीकार करेंगे? यह वही सिद्धारमैया है जिन्होंने बगावत करते हुए जनता दल (एस) को तोड़ने की कोशिश की थी। सबसे बड़ी बात तो यह है कि क्या दैवेगौडा, सिद्धारमैया को अपने से ऊपर देखना चाहेंगे क्योंकि सिद्धारमैया कभी दैवेगौडा के शिष्य रह चुके हैं। उन्हीं के सानिध्य में सिद्धारमैया ने राजनीतिक गुर सीखें हैं। कर्नाटक की सरकार में मुख्यमंत्री के रूप में रहते हुए सिद्धारमैया पर कई आरोप लगे जिनमें मंहगी वस्तुओं का उपयोग करना, भ्रष्टाचार और सबसे बड़ा आरोप है कि लिंगायत समाज को एक अलग धर्म के रूप में मान्यता देना। सिद्धारमैया को इसका खामियाजा सरकार की बलि देकर चुकाना पड़ा।

इस चुनाव सर्वाधिक वोट प्रतिशत कांग्रेस का 37.9 प्रतिशत रहा जबकि सर्वाधिक सीट लाने बीजेपी का वोट प्रतिशत 36 प्रतिशत रहा। सीटों की बात कही जाए तो बीजेपी ने तटीय कर्नाटक में शानदार प्रदर्शन किया में 21 में से 18 जीतकर कांग्रेस को तीन सीटों पर समेट दिया। बीजेपी उन जगह सबसे अच्छा प्रदर्शन किया जहां लिंगायत समुदाय जनसंख्या ज्यादा है। यह कांग्रेस की नाकामयाबी का नतीजा है जिसका फायदा बीजेपी ने उठाया है। बंगलुरू रीजन में भी बीजेपी का प्रदर्शन अच्छा रहा।

किसी पार्टी को बहुमत न मिलने से नतीजा त्रिशंकु आया।  देखना होगा कि कौन सरकार बनाने की रेस में पहले नंबर पर होगा। कही कांग्रेस का हाल मणिपुर और गोवा की तरह न हो जाए या ऐसा भी कह सकते है कि बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद भी सरकार न बना सके। कांग्रेस ने बीजेपी से सबक लेते हुए जल्दी से एक्शन लिया है। अपने दो कद्दावर नेता गुलाम नबी आजाद और अशोक गहलोत को बंगलुरू भेजकर सरकार बनाने की बात कही। वही सिद्धारमैया राज्यपाल से मिलने में देरी नहीं की। इसके साथ ही कुमारस्वामी ने भी राज्यपाल से मुलाकात की।

कांग्रेस ने बीजेपी से एक ज्ञान नहीं लिया कि कैसे सोशल इंजीनियरिंग की जाती है? गुजरात चुनाव की तरह कर्नाटक में कांग्रेस ने जनता से संपर्क साधना में देर कर दिया जिसका नतीजा उसे भुगतना पड़ा। संघ की बदौलत  आज बीजेपी इतनी उझल रही है यदि संघ का स्वयंसेवक जमीन पर न उतरता तो स्थिति कुछ और होती।

सरकार जिसकी भी बने स्थिर रहे। भ्रष्टाचार मुक्त रहे। कावेरी और महादयी जैसे मुद्दे सुलझाने में कामयाब रहे। भाषा को लेकर विरोध की राजनीति न हो।

📃BY_vinaykushwaha


शनिवार, 12 मई 2018

गुरुकुल


गुरुकुल, भारतीय शिक्षा पद्धति का प्रतीक है। गुरुकुल सतयुग से लेकर  कलियुग तक विद्यमान है। गुरुकुल अर्थात् गुरु का कुल अर्थात् गुरु का कुटुम्ब या गुरु का परिवार । जब बच्चा अपने अभिभावक का घर छोड़कर गुरु के घर रहने  और  शिक्षा ग्रहण करने  चला जाता है । जहां  वह बच्चा  जाता है , उसे गुरुकुल कहा जाता है।

गुरुकुल की परपंरा युगों पुरानी है। त्रेतायुग में श्रीराम, द्वापरयुग में श्रीकृष्ण ने गुरुकुल में रहकर शिक्षा ग्रहण की थी। गुरुकुल एक ऐसा वातावरण तैयार करता है जिसमें बच्चा खेलता भी है और सीखता भी है। जीवन की छोटी-छोटी बातों को सीखता भी है। गुरुकुल में बच्चा एक नए अभिभावक को पाता है। माता-पिता के छोड़कर गुरुकुल जाने वाले बच्चों में सदा इस बात की ललक रहती है कि कैसे मस्ती के बहाने ढूंढे जाए लेकिन गुरुकुल का दूसरा नाम ही अनुशासन है।

गुरुकुल को जीवन जीने की कला कहा जाए तो सच्चे अर्थों में सही होगा। गुरुकुल कोई विद्यालय नहीं होता है बल्कि यह तो अपने जीवन को कैसे आयामित करना है यह सिखाने की पाठशाला है। यहां कोई किताबी ज्ञान नहीं दिया जाता है क्योंकि यहां किताबें मायने नहीं रखती बल्कि उनका सार ही महत्वपूर्ण होता है। वेद, उपनिषद्, जैसे महान कृतियों से अवगत कराया जाता है ताकि बच्चे भारतीय ज्ञान परपंरा से अवगत रहे हैं। वो ज्ञान परपंरा जिसे हमारे ऋषि-मुनियों ने कई वर्षों की तपस्या से संजोकर रखा है।

गुरुकुल में शिक्षा का मतलब वेद और उपनिषद् ही बल्कि उन्हें गणित, ज्योतिष, भूगोल, भाषाविज्ञान जैसे विषयों का ज्ञान कराना है। गुरुकुल में मूल रूप से शिक्षा पद्धति को दो भागों में बांटा गया है पहला शास्त्र ज्ञान और दूसरा शस्त्र ज्ञान। गुरुकुलों ने समय के अनुसार अपने आप को ढ़ालना सीख लिया है। पहले जहां केवल सीमित विषयों का ज्ञान दिया जाता था वही आज अंग्रेजी, विज्ञान, गणित ज्योतिष जैसे विषयों का अध्ययन-अध्यापन का कार्य किया जाता है। आजकल के लोगों के मन भ्रांति है कि गुरुकुल में केवल संस्कृत नीत विषयों को पढ़ाया जाता है और बच्चों को वेदपाठी बना दिया जाता है।

मेरा यह निजी अनुभव रहा है कि गुरुकुल में संस्कृत ही नहीं अंग्रेजी, हिन्दी, स्थानीय भाषाओं के अलावा विदेशी भाषाओं को भी सिखाया जाता है। इन गुरुकुलों में बच्चों को उच्च श्रेणी का ज्ञान दिया जाता है जहां अनुशासन में रहना सिखाया जाता है। नैतिक शिक्षा जैसे विषय पर ध्यान दिया जाता है जिससे बच्चे पारिवारिक मूल्यों को समझ सके और व्यक्ति व्यवहार कैसे करना है? इसका ज्ञान भी हो जाए। इन सभी के अलावा भारतीय गणित जिसे हम वैदिक गणित का ज्ञान भी दिया जाता है। वैदिक गणित कोई साधारण विषय नहीं बल्कि यह तो गणित को साधारण करने वाला विषय है।

मन को स्थिर रखने के लिए योग, प्राणायाम, व्यायाम , ध्यान आदि का सहारा लिया जाता है। यदि मन स्थिर नहीं रहेगा तो फिर कैसे इंसान बाकी कार्यों पर ध्यान लगा सकता है। गुरुकुल परंपरा में शस्त्र विद्या भी सिखाई जाती है। पहले जब राजा के पुत्र गुरुकुलों में पढ़ने जाया करते थे तो उन्हें केवल शास्त्र का ज्ञान नहीं दिया जाता है बल्कि उन्हें शस्त्र का ज्ञान भी दिया जाता था। इस शस्त्र ज्ञान में उन्हें धनुष-बाण चलाना, भाला-बरछा चलाना, तलवार चलाना जैसे शस्त्रों से अवगत कराया जाता था। शारीरिक शिक्षा भी दी जाती थी। जिसमें सूर्य नमस्कार, शरीर सौष्ठव, कुश्ती की शिक्षा दी जाती थी। प्राचीन काल के गुरुकुलों में मल्लयुद्ध की कला सिखाई जाती है।

आधुनिक गुरुकुलों में शस्त्र विद्या की जगह शारीरिक शिक्षा ने ले ली है लेकिन किसी-किसी गुरुकुलों में आजकल शस्त्र विद्या का ज्ञान दिया जाता है। लाठी चलाना, तलवार चलाना, भाला चलाना आदि शस्त्र विद्या दी जाती है। इन शस्त्रों के अलावा कुश्ती, मार्शल आर्ट, भारतीय खेलों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके अलावा भारत की प्राचीन मार्शल आर्ट जैसे केरल के कलियारीपयाट्टू को कही हद बचाने का श्रेय गुरुकुल को ही जाता है। गुरुकुल केवल एक विद्यालय ही नहीं है बल्कि यह जीवन निर्माण करने वाली संस्था है। गुरुकुल में भगवान श्रीकृष्ण ने 64 विद्या और 16 कलाओं की शिक्षा मात्र 64 दिनों में पूरा कर लिया था।

प्राचीन काल के गुरुकुलों में शिक्षक दो प्रकार के होते थे, पहले जो शास्त्र का ज्ञान देते थे और दूसरे जो शस्त्र का ज्ञान देते थे। आज के गुरुकुल आधुनिक हो गए हैं। आज प्रत्येक विषय के लिए अलग से शिक्षकों को अध्यापन कार्य के लिए रखा जाता है। आज का युग  तकनीकी का युग है। इसी तकनीकी युग में गुरुकुल भी तकनीकी हो गए हैं। गुरुकुलों में आज कम्प्यूटर ज्ञान दिया जाता है। इसी कारण गुरुकुल जीवित है क्योंकि गुरुकुलों ने समय के साथ बदलना सीख लिया है। भारत में ऐसे कई गुरुकुल है जो भारतीय ज्ञान परपंरा को आगे बढ़ाने में तत्पर हैं जिनमें हेमाचंद्राचार्य संस्कृत पाठशाला, ऋषि सांदीपनि वेद प्रतिष्ठा संस्थान, मैत्रेयी गुरुकुल, वीर लोंकाशाह संस्कृत ज्ञानपीठ जोधपुर आदि है।

भारत में आज भी ज्ञान परपंरा गुरुकुलों की वजह से बची हुई है क्योंकि यह हमारी शान हैं।

📃BY_vinaykushwaha


शुक्रवार, 11 मई 2018

भारतीय वास्तुकला (श्रृंखला-पांच)

विराट गुरुकुल सम्मेलन

भारत का पहला विराट गुरुकुल सम्मेलन मध्यप्रदेश की आध्यात्मिक नगरी उज्जैन में 28-30अप्रैल को आयोजित किया गया। असलियत में इस आयोजन का पूरा नाम अंतरराष्ट्रीय गुरुकुल सम्मेलन था। इसका आयोजन भारतीय शिक्षण मंडल और मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग के सहयोग से संपन्न हुआ। आखिर उज्जैन में ही क्यों इसका आयोजन किया गया? इसके पीछे सबसे बड़ा कारण रहा है, ऋषि सांदीपनि का आश्रम। यह वही ऋषि है जिन्होंने भगवान श्रीकृष्ण और बलराम को शिक्षा-दीक्षा दी थी।

यह विराट गुरुकुल सम्मेलन में भारत समेत विश्व के सात देशों के गुरुकुल या उनके प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इनमें  नेपाल, भूटान, म्यानमार, थाईलैंड, जापान, इंडोनेशिया और कतर जैसे देश थे। भारत की इस धरा पर इस प्रकार का यह प्रथम आयोजन था।

इस आयोजन को करने के पीछे उद्देश्य क्या था? गुरुकुल परंपरा को बचाना या परपंरा को समृद्धि बनाना। इस परपंरा को भारत की पहचान कही जाए तो अतिश्योक्ति न होगी। जहां शिक्षा पद्धति बिना किसी लोभ के दी जाती है और बच्चों के सर्वांगीण विकास की बात की जाती है तो इस परपंरा को बचाना हमारा कर्त्तव्य बनता है। इस सम्मेलन में भारत के हर कोने से गुरुकुल में सम्मिलित होने के लिए लोगों का आगमन हुआ। लगभग 3000 प्रतिनिधियों ने इस आयोजन में हिस्सा लिया।

इस आयोजन का मूल गुरुकुल शिक्षा पद्धति को बढ़ावा देना और आधुनिक शिक्षा पद्धति को कैसे गुरुकुल शिक्षा पद्धति के माध्यम से सरल बनाया जा सकता है? इस पर देश के कोने-कोने से प्रबुद्ध और विद्वतजनों ने चर्चा की। गुरुकुल केवल वेदपाठ या संस्कृत का अध्ययन नहीं कराता बल्कि यह तो बौद्धिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, तकनीकी, तार्किक और शारीरिक शिक्षा देता है। लोगों के मन में भ्रम रहता है कि गुरुकुलों में केवल संस्कृत और वेद -उपनिषद् जैसे विषयों का ही ज्ञान दिया जाता है। इसी भावना को तोड़ने के लिए और लोगों को गुरुकुल से जोड़ने के लिए इस प्रकार का भव्य आयोजन किया गया।

गुरुकुल सम्मेलन भारत और विदेशी गुरुकुलों का आपसी मिलन भी था। इस सम्मेलन के माध्यम से एक गुरुकुल ने दूसरे गुरुकुल को जानने की कोशिश की। यही नहीं उनकी शिक्षा पद्धति को आवश्यक रुप से समृद्ध करने की कोशिश की। आज विश्वभर में गुरुकुल परपंरा को अपनाने की बात चल रही है। इसका एक ही कारण है प्राचीन भारतीय ज्ञान परपंरा के साथ-साथ आधुनिक विषयों का अध्ययन-अध्यापन करना।

सम्मेलन में विभिन्न वक्ताओं के द्वारा भारतीय ज्ञान परपंरा और शिक्षा पद्धति को जानने का मौका मिला। कार्यशालाओं का आयोजन किया गया जिसमें भारतीय ज्ञान परपंरा जिसमें आयुर्वेद, ज्योतिष, वैदिक गणित, गणित पर गहन चर्चा हुई। इसके साथ ही भारतीय और विदेशों से आए प्रतिनिधियों के साथ संवाद चर्चा का भी आयोजन किया गया। पाकशाला, गौशाला जैसी कार्यशाला का आयोजन किया गया, जिसमें माता-पिता, गुरु और बच्चों की बीच भावनात्मक जुड़ाव पर गंभीरता से चर्चा की गई।

कार्यशाला के आयोजन के अलावा सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया गया। इसमें बौद्धिक, शारीरिक और नृत्य आदि का मंचन किया गया। मंच से कत्थक, भरतनाट्यम, कालबेलिया जैसे नृत्यों की प्रस्तुति हुई तो वही भारतीय मार्शल आर्ट कलियारीपयाट्टू, मलखंभ, रोपमलखंभ का आयोजन किया गया। वही मंच से वैदिक गणित जैसे साश्वत विषय पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

प्रदर्शनी का आयोजन भी किया गया जिसमें केवल वस्तुओं की प्रदर्शनी ही नहीं बल्कि स्वदेशी को प्रोत्साहित करती हुई प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। इसमें कॉटन के कपड़ा से लेकर लकड़े के सामान तक इस प्रकार के स्टॉल को लगाकर इस प्रदर्शनी को चार-चांद लगाए गए। पुराने सिक्कों का संग्रहण हो या भारतीयता को दर्शाता पुस्तकों हो सभी प्रदर्शनी जान नजर आ रही थी।

इस आयोजन की सबसे बड़ी बात श्रोत यज्ञ का आयोजन था। यह यज्ञ विश्व के कल्याण के लिए आयोजित किया गया था। इस यज्ञ का उद्देश्य और पूर्णाहूति "सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया" की भावना से किया गया था।

मंगलवार, 17 अप्रैल 2018

विश्व धरोहर दिवस


विश्व धरोहर दिवस जिसे इंग्लिश भाषा में world heritage day के नाम से जाना जाता है। यह प्रतिवर्ष 18 अप्रैल को मनाया जाता है। 1982 से प्रतिवर्ष यह मनाया जा रहा है। इस दिन को विश्व विरासत स्थल के लिए समर्पित किया गया है। यह दिवस केवल विश्व धरोहर को सहेजने के लिए ही नहीं बल्कि इसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए भी है। विश्व में कुल 1052 विश्व विरासत स्थल है। इन धरोहरों में से भारत में कुल 35 विश्व धरोहर है।  विश्व धरोहर स्थल की घोषणा यूनेस्को के द्वारा किया जाता है जो कि संयुक्त राष्ट्र का ही अंग है।

यह तो हुई सामान्य जानकारी कि क्याें? कैसे? कब? हमें सर्वप्रथम यह जानना चाहिए कि विश्व विरासत दिवस क्यों मनाना चाहिए? जब यह तय हुआ कि विश्व विरासत दिवस मनाया जाएगा तो उसका उद्देश्य था कि विश्व विरासत स्थल के संरक्षण और समृद्धि के लिए इस दिवस को मनाया जाएगा। लेकिन हम यह भूल गए कि जो स्मारक विश्व विरासत स्थल की सूची में शामिल नहीं है क्या उनका संरक्षण, रखरखाव और समृद्ध करना हमारा कर्तव्य नहीं बनता। आखिरकार यही स्मारक आगे जाकर विश्व विरासत स्थल बनेंगे।

यूनेस्को विश्व विरासत स्थल को तीन भागों में बांटा है पहला सांस्कृतिक, दूसरा प्राकृतिक और तीसरा मिश्रित। तीनों का अपना-अपना महत्व है। लेकिन जैसा कि मैं मानता हूं कि हमें सभी को उतना ही महत्व देना चाहिए जितना कि हम ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को देते है। यदि प्रकृति को बचा लेते है तो बाकी की धरोहरों का अपने आप ही संरक्षण हो जाएगा। बायो डायवर्सिटी रिजर्व हो या नेशनल पार्क या अभ्यारण्य हो या सामान्य वन क्षेत्र इनके अलावा भी भूमि, जल, पर्वत आदि का संरक्षण शामिल है।

अब बात आती है कि विश्व विरासत स्थल क्यों? विश्व धरोहर स्थल की वास्तविकता में जरुरत है क्योंकि इनके होने से इन स्मारकों के संरक्षण की गारंटी बढ़ जाती है। केवल संरक्षण ही नहीं यह स्मारक कमाऊ भी बन जाते है। जितनी विश्व विरासत स्थल है आज कमाऊ होने से उनके रखरखाव में आसानी हुई है। इससे देश, व्यक्ति और स्मारक सभी को लाभ मिलता है।

भारत में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, पुरातात्विक महत्व की स्मारकों की संख्या में कमी नहीं है। यहां के हर शहर में इसकी झलक आसानी से देखने को मिल जाती है। पक्षपात पूर्ण रवैए के चलते भारत को प्रतिनिधित्व का मौका कम मिल पाया है। भारत से ज्यादा स्मारकों को  विश्व विरासत का नाम इटली, फ्रांस, चीन, स्पेन की स्मारकों को मिला है। यह कहां तक न्यायसंगत है। भारत का केवल एकमात्र शहर विश्व विरासत शहर है अहमदाबाद। इसे भी 2017 में स्वीकारा गया था।

हमें तो केवल इतना ध्यान रखना है कि अपने इतिहास को संजोकर रखना है।

📃BY_vinaykushwaha


सोमवार, 26 मार्च 2018

शिखण्डी : पुस्तक समीक्षा


ऋष्यश्रृंग:जिसने कभी किसी स्त्री को नहीं देखा, भागीरथी: जिसे दो औरतों ने मिलकर जन्म दिया, मान्धाता: जिसे पुरुष ने जन्म दिया, चुडाला: अपने पति को ज्ञान देने के लिए पुरुष बन गई, शिखण्डी: जो न तो नर था ना ही मादा और बहुचर: जो अपनी पत्नी को खुश नहीं कर सका जैसी प्राचीन भारतीय इतिहास की कहानियों को संजोए एक किताब 'शिखंडी और कुछ अनसुनी कहानियां'। यह किताब भारत के महान पौराणिक कहानी लेखक देवदत्त पट्टनायक ने लिखी है जिसका प्रकाशन राजपाल एण्ड सन्स ने किया है।

भारतीय इतिहास की कई ऐसी कहानियां जो कि आम नागरिकों के बीच प्रचलित नहीं है। ऐसी कहानियों को संजोकर एक पुस्तक के माध्यम से प्रकाशित किया गया है। लेखक ने विभिन्न स्त्रोतों से कहानियों को लिया है जिसमें महाभारत, रामायण, उडिया रामायण, तमिल लोककथा, पुराण आदि। इसमें सम्मिलित कहानियां सामाजिक सरोकार से जुड़ी हुई है। इसमें 30 कहानियों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय सांस्कृतिक परिदृश्य के महान पात्रों को कहानी के माध्यम से बताने का प्रयास किया है जिनकी गूढ़ बातों से लोग अवगत नहीं है। इसमें जिस भी पात्र के बारे में कहानी बताई गई है  और साथ-साथ में कारण और संदर्भ भी दिया गया है।

आज के दौर में जिन विषयों पर चर्चा करना भी पाप माना जाता है और उनकी कल्पना या उपस्थिति को अपराध समझा जाता है ऐसे सभी क्रियाकलाप अतीत में उपस्थित थे। किन्नर, समलैंगिकता, असामान्य यौन प्रवृत्ति, असामयिक यौन प्रवृत्ति आदि की बातों को सहजता के साथ प्रस्तुत किया गया है। राम जिन्होंने हिजड़ों को भी अपने राज्य में शामिल किया, विष्णु जिन्होंने असुरों को सबक सिखाने के लिए मोहनी का रूप लिया, काली जिन्होंने गोपियों के साथ नृत्य करने के लिए कृष्ण रूप धारण किया जैसी चमत्कारिक कहानियों का एक विशाल सागर है।

पुस्तक में कहानी की शुरुआत शिखण्डी नामक अतिपरिचित पात्र के साथ शुरू होती है। महाभारत का यह पात्र न तो स्त्री था न पुरुष। पुस्तक खुली मानसिकता के साथ वीर्य, कामुकता, यौन आचरण के विषय में चर्चा होती है परंतु किसी भी प्रकार की अश्लीलता का प्रदर्शन नहीं होता है। जीवन में अनेकों उतार-चढ़ाव आते है और उनके साथ कैसे निबाह करना है यह इसमें अच्छी तरह बताया गया है। यह पुस्तक शानदार और रोचक कहानियों से भरी हुई है जिसका रसास्वादन जरूर लेना चाहिए।


रविवार, 25 मार्च 2018

यूपी की फिज़ा


दूर-दूर तक फैला पठारी इलाका जिसमें पेड़ों की संख्या न तो बहुत ज्यादा है न ही बहुत कम। जमीन भी ऐसी कि कही थोड़े उंचे पहाड़ है तो कही समतल जमीन है। जहां समतल जमीन वहां जमीन के अंदर से स्वयंभू शिव की तरह निकली हुई चिमनियां है जिनसे धुआं तो नहीं निकल रहा लेकिन नीचे भट्टी में ईंट पक रही है। विन्ध्य की महक आने लगी है। बेशक यह यूपी है। मध्यप्रदेश के उत्तरी भाग को पार करते ही यूपी का दक्षिणी छोर कुछ इसी प्रकार दिखाई देता है। यह गंगा का मैदान का दक्षिणी भाग भी है।

यूपी कहे या उत्तरप्रदेश या उत्तमप्रदेश सभी तो श्रेष्ठ है। यदि ऐसा कहा जाए कि राज्यों में सर्वश्रेष्ठ या यूं कहे राज्यों का राजा। मैंने उत्तर प्रदेश  की यात्रा कई बार की है और हर बार मैंने यहां कुछ नया ही पाया है। हवा में घुली पेडे की मिठास हो या अध्यात्म की हवन वेदी से उठती खुशबू हो सभी कुछ तन-मन को उत्साहित कर देती है। इलाहाबाद की धरा पर कदम रखने का सौभाग्य कई बार मिला परंतु पहले उस फिज़ा में घुली ताज़गी का आनंद नहीं लिया जो इस बार मिला है। इलाहाबाद कोई आम जगह नहीं है यह तो सभी जानते है।

पूर्वांचल का सबसे प्रमुख शहर जिसके बिना पूर्वांचल की कल्पना पूरी नहीं हो सकती है। गंगा और यमुना का संगम तो पहले भी कई बार देखा है लेकिन इस इसमें कुछ नयापन देखने को मिला। यमुना नदी का श्याम जल हो या गंगा नदी का हरित जल इस बार इसमें कुछ नयापन है। हिमालय से मां गंगा और यमुना के द्वारा लाई गई रेत एक नए संसार का निर्माण कर रही है। संगम के जल में जाते हाथ केवल कंकण स्नान के लिए ही नहीं बल्कि अर्घ्य के लिए भी उठते है। तेज बहाव वाली गंगा हो या शांत यमुना दोनों श्रद्धालुओं को उतना ही मौका दे रही है जितना वे चाहते हैं।

श्रद्धा के दीपक आज कुछ अलग ही छटा बिखेर रहे हैं। फूलों की लड़ी हो या नावों का जमावड़ा सब कुछ देखा हुआ है फिर भी अनोखा है। बरसों पहले जब पहली बार आया था तब भी किले की दीवार यूं ही सीना ताने खड़ी थी और आज भी लेकिन इनकी रंगत में चटकपन-सा आ गया है। लाई बताशा की सजी दुकाने हो या फूलों से सजे दौने, पंडों की मडई हो या गोताखोरी की टोली नया न होते हुए भी कुछ अलग है। पानी की लहरों पर गोता खाते गोताखोर हो या पानी में उतरते नौसिखिया सब पहले भी तो देखा है लेकिन इस बार अंदाज अलग लग रहा है।

नाव का कालिंदी की लहरों के साथ कलाबाजियां करना हो या मछलियों का पैरों को छूकर जाना पहले भी देखा है लेकिन ऐसी अनुभूति पहली बार हुई है। संगम के जल को छूकर तन को छूती पवन से पहले भी कई बार सुखमय अनुभूति हुई है लेकिन इस बार इसमें कुछ शीतलता ज्यादा ही है। रेत के टीले पर दूर-दूर तक आशा का दीपक पहले भी दीप्तमान थे आज भी हैं। साइबेरियन गल्स होवर की उड़ान और पानी में खेल तो कई देखा है परंतु इनकी अठखेलियां में कुछ आज अनोखा पन है।

इलाहाबाद कोई मुसाफिरों का शहर नहीं है बल्कि यह तो शांति से अपने अंदाज में जीने वालों का शहर है। इस शहर को पहले भी कई बार देखा है लेकिन इसमें नयापन पहली बार देखा है।

📃BY_vinaykushwaha