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गुरुवार, 13 अगस्त 2020

मध्यप्रदेश


1 नबम्वर 1956 को जब एक राज्य अस्तित्व में आया जिसका नाम पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 'मध्यप्रदेश' रखा। सी पी और बरार से मध्यप्रदेश बन गया। आठ जिले महाराष्ट्र राज्य को दे दिया गया और सुनैल टप्पा तहसील  राजस्थान को दे दिया गया और सिरोंज तहसील को मध्यप्रदेश में मिला लिया गया और बन गया मध्यप्रदेश। मध्यप्रदेश का एक बार फिर से गठन किया गया और 1नबम्वर 2000 को मध्यप्रदेश के बरार वाले हिस्से को अलग करके एक नया राज्य बना दिया गया जिसका नाम था 'छत्तीसगढ'। कभी मध्यप्रदेश की गिनती सबसे बड़े राज्य में होती थी और आज दूसरे सबसे बड़े राज्य के रूप में होती है।

मध्यप्रदेश भारत के दिल में बसा हुआ है जो भारत के लिए धड़कता है। मध्यप्रदेश का कण-कण भारत के निर्माण में निस्वार्थ भाव से लगा हुआ है। मध्यप्रदेश के जन-जन की यही भावना है कि 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' और 'एक मध्यप्रदेश, श्रेष्ठ मध्यप्रदेश'। प्राकृतिक संपदा से परिपूर्ण यह राज्य भारत को और भी ज्यादा खूबसूरत बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। विन्ध्याचल, सतपुडा , मैैकल आदि पर्वतश्रृंखलाएं भारत की इस धरा को सम्पन्न करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। मध्यप्रदेश की वन संपदा जो भारत में सर्वाधिक है, भारत की सुंदरता में चार चांद लगा रही है।

मध्यप्रदेश को नदियों का मायका कहा जाता है। भारत में सर्वाधिक नदियों का उद्गम स्थल मध्यप्रदेश में है। मध्यप्रदेश की लगभग 350 नदियां लगभग भारत की 15 करोड़ आबादी को पोषित कर रहीं है। भारत की सबसे पवित्र नदी और शिवतनया, शांकरी , मैकलसुता, रेवा, नामोदास आदि नामों से विख्यात नर्मदा करोड़ो लोगों को पोषित भी कर रही है और मां की तरह दुलार भी दे रही है। नर्मदा, चंबल, सोन, बेतवा, ताप्ती, माही, केन आदि नदियां पर बने बांध करोड़ो लोगों की आशा का सफलता सूचकांक है। गांधीसागर, ओंकारेश्वर, इंदिरासागर, हलाली, मांधाता, राजघाट, बाणसागर बांध मध्यप्रदेश के साथ-साथ देश के अनेक राज्यों को जगमग कर रहे हैं और साथ ही साथ खेतों को सिंचित भी कर रहे हैं।

मध्यप्रदेश का इतिहास कोई हजार साल पुराना नहीं है यह तो लगभग एक लाख साल पुराना है। यह तो भीमबेटिका के शैलाश्रय स्वयं ही प्रमाणित करते है। भारत में इंसान के अस्तित्व की सर्वप्रथम प्रमाणिकता भी मध्यप्रदेश में नर्मदा तट में ही देखने मिलती है। बुद्ध के उपदेश और उनकी शिक्षा की जानकारी हमें सांची, भरहुत(सतना), कसरावद के स्तूपों से मिलती है। भारत की सबसे पवित्र और पुरातन नगरी में से एक उज्जैन अपने वैभव से आज तक भारत को पल्लवित कर रहा है। महाकाल की नगरी उज्जैयिनी आज भी भस्म की भीनीं सुगंध से सुरभित हो रही है। बेतवा नदी के तट पर स्थित ओरछा अपने एकमात्र राम को राजा के रुप में समर्पित मंदिर को रुप में विख्यात है। खजुराहों को कौन नहीं जानता जिसकी स्थापत्य कला का आजतक कोई तोड़ नहीं है। धुंआधार जलप्रपात जिसका कोई सानी ही नहीं है। महेश्वर, ओंकारेश्वर, चंदेरी, मांडू, अमरकंटक, मैहर, उदयगिरि, भोजपुर, बाघ की गुफाएं आदि अनेक स्थान मध्यप्रदेश को श्रेष्ठ बना रहे है।

रुपनाथ(कटनी) और गुर्जरा(दतिया)आज सम्राट अशोक की गवाही देता है। मध्यप्रदेश के इतिहास में कई राजा रजवाड़ों का हाथ रहा है। मौर्य, गुप्त, शुंग, राष्ट्रकूट, पल्लव, चंदेल, चौहान, कल्चुरी, गौंड, मराठा, सिंधिया, होल्कर और मुगलों का योगदान रहा हैं। कई शहरों को बसाया तो कई स्मारक बनाई । अलग-अलग शैली की स्थापत्य कला की सहायता से संरचनाओं में जान फूंकने की कोशिश की है।

मध्यप्रदेश की धरा भारत के लिए है और इसका एक-एक कण मातृभूमि के लिए समर्पित है।
जय मध्यप्रदेश, जय भारत

📃BY_ vinaykushwaha


भारतीय वास्तुकला (श्रृंखला 3)


भारत प्राचीन काल से ही स्थापत्य कला में समृद्ध देश रहा है। भारत की समृद्ध विरासत की झलकियां आज भी देखने को मिलती है। पूर्व में हमने सिंधु घाटी की सभ्यता और वैदिक सभ्यता की स्थापत्य कला के बारे में जाना। अब हम और आगे बढ़ते हैं और चलते है मौर्य काल की ओर। मौर्य काल से पहले ही पक्के घरों का और अन्य महत्वपूर्ण संरचनाओं का निर्माण शुरू हो चुका था। मौर्य काल में भी इस परम्परा को आगे बढ़ाया और भारतीय स्थापत्य कला को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

मौर्यों से पहले नंद वंश था जिसके बारे में कहा जाता था कि उसकी सेना सिकंदर महान से बहुत बड़ी थी। यही कारण था कि सिकंदर की सेना ने आगे और युद्ध करने से मना कर दिया। घनानंद भले ही विलासता का आदि राजा रहा हो परंतु उसका राज्य सदा ही बहुत ही संपन्न रहा था। यदि घनानंद स्वभाव से भी अच्छा होता तो वह सम्पन्नता के शिखर के साथ-साथ लोगों के दिलों को भी छूता।

घनानंद के अत्याचारों से बचाने के लिए चंद्रगुप्त मौर्य ने घनानंद को मार दिया और मौर्य वंश की नींव डाली। मौर्य वंश में तीन सबसे प्रतापी राजा हुए चंद्रगुप्त मौर्य, बिंदुसार और सम्राट अशोक। मौर्य साम्राज्य इन तीनों के राज में वैभव के चरम सीमा पर पहुंच गया था। जनता अपना सुखी जीवन व्यतीत करती थी। सम्राट अशोक ने तो जनता से संचार के लिए शिलालेख का सहारा लिया ताकि राज्य की जनता उसकी बात को जान सके और समझ सके।

मौर्य के समय महल का निर्माण लकड़ी से किया जाता था। छत भी लकड़ी की बनाई जाती थी। छत को सहारा देने के लिए पत्थर के स्तंभ होते थे जो कलात्मक ढ़ंग से सजाए जाते थे। लकड़ी के महल में रहने का अधिकार केवल राजसी परिवार को था। रसोईघर, स्नान घर आदि की व्यवस्था की गई थी। राजा जहां दरबार लगाता था वह एक बड़ा सा हॉल होता था। लकड़ी के फर्श को ढ़कने के लिए शानदार कालीन का प्रयोग किया जाता था। दीवारों को सोने की परत से कलात्मकता के साथ मढ़ा जाता था।

भवन की आकृति चौकोर या आयताकार होती थी। महल में 2-3 मंजिल हुआ करती थी। अंदरूनी छत पर शानदार तरीके से सोने से सजावट की जाती थी।

महल के बाहर सुंदर बगीचों का निर्माण किया जाता था। जिसमें तरह-तरह के फलदार और फूल के पेड़-पौधे लगे होते थे। फव्वारों का प्रयोग बगीचों की सुंदरता बढ़ाने के लिए किया जाता था।

महल चारों ओर से दीवार से ढंका होता था जिसमें अंदर आने के लिए कई दरवाजें होते थे। दीवार के सहारे एक खाई का निर्माण किया जाता था जो कई सौ मीटर गहरी होती थी। यह खाई शत्रु को महल में आने से रोकने के लिए बनाई जाती थी। दरवाजें भी इस प्रकार हुआ करते थे कि उन्हें रस्सी के सहारे उठा लिया जाए। सैनिक गस्ती के लिए दीवार पर बुर्ज बनाए जाते थे। आज भी इसके साक्ष्य पटना के आस-पास मिलते है।

अशोक ने यही व्यवस्था अपनाई साथ ही साथ उसने बौद्ध भिक्षुओं के रहने के लिए पहाड़ियो को काटकर गुफाओं का निर्माण करवाया। जनता से संचार बनाने के लिए शिलालेख,गुहालेख लिखवाए। स्तूपों के निर्माण का श्रेय भी सम्राट अशोक को जाता है।  सुंदरता से स्तूप बनाकर उन्हें गौतम बुद्ध की याद में शामिल कर दिया। जिसका सबसे सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है 'सांची'।

यही है मौर्यकालीन वास्तु कला।

📃BY_vinaykushwaha


मैहर - जहां विराजे ज्ञान की देवी


सोने के लोटा गंगाजल पानी, माई दोई बिरिया।
अतर चढ़े दोई-दोई शीशियां, माई दोई बिरिया।
करें भगत हो आरती माई दोई बिरिया।।

मां के सम्मान में छोटी-सी भगत। भगतें बघेलखंड और बुंदेलखंड में मां के सम्मान गाए जाने वाले भजन है जो मुख्यतः बघेलखंड में गाया जाता है। उपरोक्त भगत मां शारदा के सम्मान में गाया गया है। मां शारदा को ज्ञान की देवी के रूप में पूजा जाता है।

नमस्ते शारदे देवी काश्मीरपुरवीसिनि ।
त्यामहं प्रार्थये नित्यमं विधाबुद्धि च देहि मे।।

उपरोक्त श्लोक मां सरस्वती को समर्पित है जिसमें मां सरस्वती को शारदा के रूप में संबोधित किया गया है। जिसमें विद्या और बुद्धि का वरदान मांगने की बात कही गई है।

भारत में वैसे तो मां शारदा के अनेकों मंदिर होगें परंतु मध्यप्रदेश के सतना जिले के मैहर में स्थित मां शारदा देवी का मंदिर अद्भुत, अनोखा और मन को शांति प्रदान करने वाला है। विन्ध्याचल पर्वत की गोद में बसा यह मंदिर प्राकृतिक छटा से परिपूर्ण है। विन्ध्याचल पर्वत की 600 फुट ऊंची त्रिकूट पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर सारे मनोरम को सिद्ध करने वाला है। यह एक शक्तिपीठ है।

इस मंदिर और मां शारदा देवी की यहां पर प्राण प्रतिष्ठा के पीछे  एक पौराणिक कहानी है। जब मां सती के विष्णु जी ने अपने सुदर्शन चक्र से 51 टुकड़े कर दिया तो जहां-जहां मां सती के शरीर के भाग गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ का निर्माण किया गया। मैहर शहर का नाम मां सती के हार गिरने से हुई। मै का तात्पर्य माई और हर का तात्पर्य हार से है, जिसका संपूर्ण तात्पर्य हुआ माई के गले का हार अर्थात् मैहर।

मंदिर में स्थित मूर्ति की विधिवत प्राणप्रतिष्ठा संवत् 599 में की गई थी। अक्जेण्डर कनिघंम ने इस मंदिर पर गहरा शोध कर यह भी बताया कि यहां पशु बलि नियमित रूप से दी जाती थी, जिसे बाद में बंद करवा दिया गया। इस मंदिर में आदिगुरू शंकराचार्य के द्वारा पूजा करने का भी उल्लेख मिलता है।

मां की ड्योढ़ी पर तो सभी शीश झुकाते है परंतु नियमित रूप से प्रथम अधिकार आल्हा का है। वास्तविक रूप से मंदिर स्थापित करने का श्रेय आल्हा और ऊदल को दिया जाता है जो दोनों भाई थे। दोनों ने मां की इस प्रतिमा को खोजा तथा आल्हा ने बारह वर्ष तक मां की तपस्या की। मां ने प्रसन्न होकर आल्हा को अमरत्व का वरदान दिया। आज भी आल्हा द्वारा समर्पित गुड़हल के फूल मंदिर के प्रथम बार कपाट खुलने पर दिखाई देते हैं।

मां का दरबार सालभर भक्तों की भीड़ से लबालब रहता है परंतु नवरात्रि के पावन अवसर पर यहां की अनोखी छटा देखने  लायक होती है।

📃BY_ vinaykushwaha


भारतीय वास्तुकला (श्रृंखला 4)


भारतीय संस्कृति में मूर्ति एक अभिन्न हिस्सा रही हैं। भारतीय स्थापत्य कला की बात की जाए और मूर्तियों के बारे में चर्चा न हो ऐसा हो ही नहीं सकता है। भारत का इतिहास उठाकर देखा जाए तो सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर आज तक मूर्ति का महत्व बना हुआ है। जहां सिंधु घाटी सभ्यता में उत्खनन में अनेकों मूर्ति मिली जिनमें एक पुरोहित की टेराकोटा की मूर्ति और नृत्य करती हुई कांसे से निर्मित नृतकी की मूर्ति सर्वाधिक प्रसिद्ध है। भारतीय मूर्तिकला में मूर्तियां बनाने में कई प्रकार की धातुएं जिनमें पीतल, तांबा, कांसा, फूला, सोना, चांदी,अष्टधातु , प्रस्तर(stone), मिट्टी आदि उपयोग किया जाता था और है। मूर्ति कला भारतीय स्थापत्य कला का अभिन्न हिस्सा है।

सिंधु घाटी की सभ्यता से बहुत पहले प्रौगेतिहासिक काल में मिट्टी से बने बहुत सी मूर्तियां प्राप्त हुई है जिनमें छोटे-छोटे विकृत रुप में कई आकृतियां प्राप्त होती हुई हैं। मिट्टी से मूर्तियां बनाना तब तक जारी रहा जब तक कि अन्य धातुओं से मूर्ति बनाने की तकनीक का ज्ञान नहीं हुआ था। मिट्टी से अभी भी मूर्तियां बनाई जाती है परंतु आज की मूर्तियों में और पहले मिट्टी से निर्मित मूर्तियों में जमीन आसमान का अंतर है। लेकिन प्रस्तर पर निर्मित मूर्तियां आज भी अद्वितीय है जिनकी बराबरी आज के कारीगरों द्वारा असंभव है। प्रस्तर निर्मित मूर्तिकला का बेमिसाल नमूना खजुराहों का मंदिर समूह है जो विभिन्न कहानी कहता हुआ प्रतीत होता है। प्रस्तर से निर्मित मूर्तियों के मामलों में भारतीय मंदिरों को देखा जा सकता है जिसमें कहानी को कहने के लिए मूर्तियों को मंदिर की दीवारों पर उकेरा जाता है। द्वारपाल आदि को उकेरा जाता है। कोणार्क का सूर्य मंदिर तो पूर्ण से कहा जाए तो एक मूर्ति ही है जिसे एक एक रथ का आकार दिया गया है। प्रस्तर पर मूर्ति कला के लिए द्रविड शैली में बने मंदिर के शिखर पर बने विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्ति अप्रतिम उदाहरण है।

मूर्ति कला भारत के विभिन्न हिस्सों में पहुंची तो उसी के अनुरुप ढ़ल गई। शारीरिक बनावट, रंग-रुप, अंलकार(रुपसज्जा, आभूषण, केशसज्जा, परिधान आदि), आस-पास का वातावरण का विवरण आदि। भारत में मूर्ति कला उत्तर भारत में अलग और दक्षिण भारत में अलग ही तरह से है जिसमें अंलकार, रुप-रंग आदि सबकुछ अलग-अलग है। यहां तक की देवी-देवताओं की मूर्तियों में अंतर स्पष्ट देखा जा सकता है। प्रस्तर की उपलब्धता भी मूर्ति कला में अहम योगदान देता है। उत्तर भारत में बलुआ पत्थर और दक्षिण भारत में बेसाल्ट की उपलब्धता प्रचुर मात्रा में है।जिसका उपयोग करके वहां मूर्ति बनाई जाती है। जब दक्षिण भारत से भारतीय संस्कृति इंडोनेशिया द्वीप समूह पहुंची तो मूर्तिओं में भारतीयता बनी रही परंतु रुप-रंग और वेशभूषा बदल गया।

इतिहास की बात करें तो विभिन्न काल समय में तरह-तरह की मूर्तियों के प्रमाण मिलते है। सिंधु घाटी सभ्यता में कई प्रकार की मूर्तियों का प्रमाण मिलता है जिनमें प्रकृति देवी की प्रतिमा, पुरोहित की प्रतिमा, नृतकी की प्रतिमा आदि है। सिंधु घाटी सभ्यता में पशु-पक्षियों को विशेष महत्व दिया जाता था उसमें भी बैल को। सिंधु घाटी सभ्यता के क्षेत्र के उत्खनन(excavation)से एक सील प्राप्त हुआ है जिसमें पशुपतिनाथ की आकृति को उकेरा गया है जिसमें पशुपतिनाथ के आस-पास गैंडा,भैंसा, हिरण, हाथी आदि को दिखाया गया है। सिंधु घाटी सभ्यता के क्षेत्र में उत्खनन(excavation) से लिंग और योनि की मिट्टी से बनी आकृतियां प्राप्त हुई हैं। यदि यह कहा जाए कि सिंधु घाटी सभ्यता में मूर्ति कला फल-फूल रही थी तो अतिश्योक्ति न होगी।

मौर्यकाल में मूर्तिकला ज्यादा प्रचलित तो नहीं हुई परंतु एक सीढ़ी और ऊपर चढ़ गई। परिष्कृत रुप में और ज्यादा निखर के सामने आई। अशोक स्तंभ जिसमें चार सिंहों की आकृति के नीचे अशोक चक्र और अशोक चक्र के एक ओर घोड़ा और दूसरी ओर बैल की आकृति बनी है और इसके नीचे उल्टा शतदल कमल बना हुआ है जिसे एक स्तंभ पर स्थापित किया गया था। सम्राट अशोक  के द्वारा बनवाए इस स्तंभ को भारत के विभिन्न हिस्सों में देखा जा सकता है जिनमें सांची, सारनाथ आदि अहम है। मौर्य कालीन इस बेमिसाल नमूने को भारत सरकार ने अपनी अधिकारिक मुहर के रुप में अपनाया है। सम्राट अशोक के समय एक और स्तंभ देखने को मिलता है जिसमें एक स्तंभ पर उल्टे शतदल कमल पर एक बैठा हुआ शेर दिखाई देता है। यद्यपि मौर्यकाल में स्तूपों, चैत्यों, गुफाओं का निर्माण कराया गया लेकिन मूर्तिकला पर ध्यान नहीं दिया।

गुप्तकाल को भारतीय स्थापत्य कला का स्वर्णयुग कहा जाता है। गुप्तकाल में मूर्तिकला खूब फली-फूली। मौर्यकाल में बौद्ध धर्म को ज्यादा प्रश्रय दिया वही गुप्तकाल में हिंदु धर्म के शैव,वैष्णव, शाक्त संप्रदाय,जैन धर्म और बौद्ध धर्म को अलग-अलग राजाओं ने मूर्ति के माध्यम से खूब बढ़ावा दिया। विष्णु, उमा-महेश्वर, ब्रह्मा, गंगा, यमुना, सरस्वती,जैन तीर्थंकर ( आदिनाथ, शांतिनाथ, पार्श्वनाथ,महावीर स्वामी आदि), महात्मा बुद्ध, यक्ष-यक्षिणी, अप्सरा, वराह अवतार, नारद,इंद्र, महिषासुरमर्दिनी, कंकाली देवी आदि की मूर्तियां स्पष्ट दिखाई देती हैं। गुप्तकालीन राजाओं के द्वारा निर्मित गुफाओं में हिंदु, जैन और बौद्ध धर्म की स्पष्ट झलक देखने को मिलती है जिनमें मध्यप्रदेश के विदिशा जिले में उदयगिरि की गुफा में इसका उदाहरण मौजूद है जिसमें एकलिंग प्रतिमा, वराह अवतार की तेरह फुट की मूर्ति, जैन तीर्थंकर की प्रतिमा दिखाई देता है। उदयगिरि के अलावा बाघ की गुफाओं में भी साफ-साफ सर्वधर्म समभाव की झलक देखने को मिलती है। जहां मौर्य काल में वृहद मात्रा में बलुआ पत्थर का उपयोग किया गया वही गुप्तकाल में बेसाल्ट,बलुआ पत्थर दोनों का उपयोग किया गया। गुप्तकाल में आग्नेय शैल (IGNEOUS ROCK) का ज्यादा उपयोग किया गया है।

मौर्य और गुप्तकाल के बीच के संक्रमण काल में शुंग आदि वंश की कामगारी को नहीं भुलाया जा सकता जिसमें सांची स्तूप के चारों दरवाजों पर उत्कीर्ण जातक कथाएं अद्वितीय है।

गुप्तकाल के बाद अनेक ऐसे शासनकाल आए जिन्होंने मूर्तिकला को बहुत ज्यादा बढ़ावा दिया। राष्ट्रकूट, पल्लव, चोल, चेर, होयसल, कल्चुरि, परमार, चंदेल, चौहान,  गांगेय, यादव आदि। अजंता-एलोरा, कान्हेरी, एलीफेन्टा,हाथीगुम्फा आदि गुफाएं बौद्ध मूर्तिकला का बेजोड़ उदाहरण है। परमार काल में राजा मुंज और राजा भोज ने विशेष योगदान दिया। राजा भोज ने मध्यप्रदेश के रायसेन के भोजपुर में एक भोजेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया। इस मंदिर में दुनिया की सबसे बड़ी  शिवलिंग स्थापित की गई है साथ ही गंगा, यमुना, अप्सरा, पार्वती,सरस्वती,लक्ष्मी,विष्णु की मूर्तियों को देखा जा सकता है। कल्चुरीकालीन राजाओं के द्वारा बहुत से मंदिर के निर्माण का कार्य किया गया लेकिन इनकी सबसे अनोखी दो बातें हैं पहली शाक्त परम्परा को बढ़ावा देना तथा वराह मूर्ति की स्थापना करना।

पूर्वी मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कल्चुरीकालीन मूर्तिकला को आसानी से देखा जा सकता है। अमरकंटक में जहां मंदिर समूहों में विभिन्न देवी-देवताओं जैसे कर्ण,सूर्य,लक्ष्मी,पातालेश्वर शिव मंदिर का निर्माण करवाया साथ ही साथ कलात्मक प्रतिमा स्थापित करवाई। जबलपुर में भेड़ाघाट के निकट कल्चुरी  शैली में निर्मित चौसठ योगिनी का मंदिर जिसमें एक गोलाकार मंदिर में चौसठ योगिनियों की प्रतिमा स्थापित की गई है साथ ही मंदिर के बीचोंबीच शिव-पार्वती का मंदिर है। मध्यप्रदेश में अनेकों जगह कल्चुरी शैली के कार्य की छाप देखने को मिलती है। मंदिरों के बाहर वराह की मूर्ति की झलक देखने को मिलती है। चंदेल शासकों की अनुपम धरोहर है खजुराहों के मंदिर समूह जिसमें लगभग हर देवी-देवताओं की मूर्ति देखना सुलभ है। खजुराहों की एक मूर्ति बहुत प्रसिद्ध है जिसमें एक लड़की अपने दोनों हाथों से बैठकर शेर के दोनों अगले पैरों को पकड़े हुए है। खजुराहों अपनी विशेष प्रकार की मूर्तिकला के लिए जाना जाता है कामुकता से परिपूर्ण नग्न मूर्तियां दिखाई देती है जो ऋषि वात्सायायन के कामसूत्र पर आधारित है।

दक्षिण भारत में राजराजा जैसे अनेकों राजा हुए है जिन्होंने मूर्तिकला को बढ़ावा दिया है। चोल राजाओं के समय में तो कांस्य(bronze) मूर्ति का निर्माण अपनी चरम सीमा पर था। नटराज की कांस्य प्रतिमा आज भी मू्र्तिकला में सर्वोच्च स्थान रखती है। दक्षिण भारत में मंदिरों में स्थापित मूर्तियां लगभग आग्नेय शैल(IGNEOUS ROCK)निर्मित है। मूर्तियों के श्रृंगार पर विशेष ध्यान दिया जाता है। बालाजी, स्वामी अयप्पा, मुरुगन, मीनाक्षी, विरुपाक्षी, शिवलिंग का श्रृंगार अनोखे तरीके से किया जाता है। कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में भगवान बाहुबली की सबसे ऊंची प्रतिमा स्थापित की गई है।

राजस्थान में लालपत्थर और संगमरमर की प्रचुरता होने से यहां मूर्ति कला बहुत तीव्र गति फला-फूला। मकराना का संगमरमर आज भी बहुत प्रसिद्ध है। जयपुर की एक गली का नाम तो मू्र्ति निर्माण के कारण खजाने वालों की गली रख दिया गया है। राजस्थान में राजाओं की कृपा से जैन धर्म अच्छी तरह फला फूला है जिसमें माउंट आबू का दिलवाड़ा मंदिर, रनकपुर का ऋषभदेव मंदिर आदि उदाहरण है। गुजरात में काले पत्थर का उपयोग मूर्तिकला में किया गया है।

भारत में हम जितना पूर्व की ओर जाते है तो वनों की सघनता उतनी बढ़ती जाती है। वनों की सघनता के कारण लकड़ी से बनने वाले सामान की मात्रा भी अधिक है। यहां लकड़ी से मूर्ति बनाने का काम भी सहज ही किया जाता है। चाहे हम ओडिशा से मणिपुर देखे तो लकड़ी की मूर्तियां दिखाई देती हैं। पुरी के जगन्नाथ जी की प्रतिमा हो या अन्य प्रतिमा लकड़ी से बनी हुई है।

भारत में वैसे तो कहा जाए तो मूर्तिकला तीन प्रकार से विभाजित किया है, गांधार,मथुरा और अमरावती शैली। गांधार शैली जिसे ग्रीको-रोमन,हिंद-यूनानी शैली भी कहा जाता है। इसे यह नाम देने के पीछे सीधा सा कारण है कि इसे बनाने की कला ग्रीस आई थी। इस शैली के बौद्ध प्रतिमा की यह खासियत है कि गौतम बुद्ध तपस्या में रत है साथ ही गहन मुद्राओं को धारण किए हुए है। उनके कपड़ों की सिलवट साफ-साफ देखी जा सकती है तथा आभूषण की मात्रा बिल्कुल कम है। इस शैली की मूर्तियां बनाने में बलुआ पत्थर और काले पत्थर का उपयोग किया जाता था। इस मूर्ति कला का प्रमुख क्षेत्र भारतीय सीमा से लेकर पश्चिमी पाकिस्तान और अफगानिस्तान का गांधार (कंधार)प्रदेश था।  मथुरा शैली पूर्णत: भारतीय मूर्तिकला का उदाहरण है। जिसे बलुआ पत्थर में निर्मित किया जाता था। इस शैली के बौद्ध प्रतिमा की खासियत यह है कि इसमें गौतम बुद्ध प्रसन्नचित्त अवस्था में दिखाई देते है जो कि अपनी विभिन्न मुद्राओं में पद्मासन में बैठे हुए दिखाई देते है। केश विन्यास खुला हुआ होता है जो कि उन्मुक्तता को प्रदर्शित करता है। अमरावती शैली दक्षिण भारत में विकसित हुए एक अनोखी शैली है। इस शैली के अंतर्गत मूर्ति बनाने में संगमरमर का उपयोग किया जाता है। इसमें जातक कथाओं के अनुसार गौतम बुद्ध की प्रतिमा को गढ़ा जाता है।

मुस्लिम आक्रमणकर्ताओं के आगमन के बाद भारतीय मूर्तिकला पर प्रतिबंध लग गया। भारत पर मुस्लिम शासकों ने लगभग 600 सालों तक शासन किया। इस्लाम में बुत अर्थात् मूर्ति परस्ती गैर-इस्लाम माना जाता है इसी कारण मुस्लिम शासकों के समय में अनेकों मूर्तियों के तोड़ा गया और किसी भी प्रकार की मूर्तिकला को बढ़ावा नहीं दिया गया। इसी कारण यह दौर भारतीय इतिहास में मूर्तिकला के लिए काला युग कहा जाता है। उसके बाद अंग्रेजों के 200 साल के शासन में भारतीय मूर्तिकला को ध्वस्त ही कर दिया क्योंकि भारतीय इस दौर में दो जून की रोटी के लिए तरसता था।

अंधेरा हमेशा के लिए नहीं होता है सूरज हर सुबह निकलता है। उसी तरह आज फिर से भारतीय मूर्तिकला उन्नति की राह पर अग्रसर हो रहा है।राजस्थान की संगमरमर से निर्मित मू्र्ति हो या ओडिशा की लकड़ी से निर्मित मू्र्ति या बस्तर में निर्मित पीतल की मूर्ति हो और कांसे से निर्मित मूर्ति हो या कर्नाटक की प्रस्तर मूर्तियां अपने शिखर पर हैं। भारतीय मूर्तिकला में फ्यूजन भी देखने को मिल रहा जिसमें भारतीय टच के साथ-साथ विदेशों से आयतित तकनीक का उपयोग कर मूर्ति कला को और समृद्ध बनाया जा रहा है।

                          ।।जय हिंद।।

📃BY_vinaykushwaha


कच्ची धूप

अचार की बरनी, रजाई, गद्दा और धूप सेंकते मानव शरीर सभी एक-दूसरे से बात कर रहे हैं ,धूप कच्ची है। ठंड की आवक वातावरण के साथ-साथ घर की दहलीज़ पर भी दस्तक देती है। धूप केवल धूप ही रह जाती है। ठंड के आने के साथ ही हवा में अलग ही तरह की ठंडक और मिठास घुल जाती है।ओस गिरने लगती है। ओस की बूंदें फूल की पखुंडियों पर एक नए तरीके की आकृतियां बनाती है, यही ओस की बूंदें पत्तियों पर से एक-एक बूंद मिलकर पानी की धार बनकर गिरती है। मकड़जाल को ओस तब और ज्यादा सुंदर बना देती है जब सूर्य की किरण मकड़जाल में गसी बूंदों में से होकर गुजरती है। रात के आगोश में ओस अपना खेल दिखाती है और सुबह की बेला में सूरज को किरणों को पीछे धकेलने का प्रयास करती है जिसके लिए साथ मिलता है धुंध का।

धुंध सूरज को एक ऐसे पारभासी चादर में समेट लेती जिसमें मानवजाति को लगता है कि सूरज का आभास होता है परंतु दिखाई नहीं देता। सूरज कोहरे की चादर में लिपटा हुआ संसार की सारी गतिविधियों को देखता रहता है। कोहरा, धुंध का बड़ा भाई है और भयावह रूप है। कभी-कभी सड़कों और रेल्वे ट्रेक पर अनहोनी का कारण बनता है। कोहरा सूरज को आसमान में आने से रोकने के लिए जीभर प्रयास करता है। कभी सफल हो जाता है तो दोपहर तक सूरज को अपना प्रकाश धरती पर नहीं आने देता और कोहरे के सामने सूरज बेबस नज़र आता है। कभी-कभी परिस्थितियां भिन्न होती जो सारी गतिविधियों को पलट देती है। सूरज कोहरे को किसी सुई की तरह भेदता हुआ अपनी किरणों से चहुंओर प्रकाशित कर देता है और कभी-कभी धीरे-धीरे कोहरे को चीरता हुआ अपनी लालिमा बिखेरता है। परंतु सूरज की किरणों में वो तीखापन नहीं होता जैसा शेष मौसम में होता है।

सुबह की रोशनी का फीकापन लिए सूरज दोपहर तक आसमान पर परवान चढ़ता है और अपने तेज से वातावरण को दीप्तमान करता है साथ ही गर्माहट भी। इस गर्माहट में वो ताकत नहीं होती जो हम सोचते हैं क्योंकि यह गर्माहट होती सर्दियों वाली धूप की। ठंड के मौसम में जीव और अजीव दोनों को धूप की जरुरत महसूस होती है। मगरमच्छ की तरह इंसान भी अपने शरीर को गर्म करने की कोशिश में लगे रहता ताकि विटीमिन डी की कमी न हो। धूप की जरुरत तो जीवों के लिए तो आसानी से समझ आती लेकिन यदि हम बारीकी से देखे तो अजीवों के लिए भी धूप का विशेष महत्व है। रेल की पटरियां ठंड के कारण सिकुड़ जाती है और धूप पाते ही अपनी वास्तविक अवस्था में आ जाती है, लेकिन धूप कच्ची होती है। पक्की वाली धूप का इंतजार कम से कम तीन महीनों का तो होता ही हैं। बरी, पापड़, चकली, बिजौरा के साथ-साथ विटीमिन डी पाने वालों के लिए धूप पर्याप्त होती है क्योंकि धूप कच्ची है।

जिस प्रकार हमारे जीवन में समय का महत्व होता है ठीक उसी प्रकार ठंड में धूप का होता है। ठंड की धूप एक निश्चित समय के लिए आती है फिर हमें लगता है कि आज दिन जल्दी ढ़ल गया। धूप कच्ची होती हुए भी कई सारे काम को अंजाम देती है। जैसे-जैसे सूरज आसमान में ऊपर चढ़ता जाता है वैसे-वैसे धूप मद्धम होती जाती है और अपना अस्तित्व खोती जाती है, अतत: दिन ढ़लने के बाद सूर्य के साथ-साथ धूप भी अस्त हो जाती है।

क्योंकि "धूप कच्ची" है।

📃BY_ vinaykushwaha

प्रेस दिवस



    खींचो न कमानों को, न तलवार निकालो। 
    जब तोप मुकाबिल हो, तो अखबार निकालो।।

आज हम ऐसे युग में है जहां सूचना का खुला प्रवाह हो रही है। आज प्रेस का मतलब केवल समाचार पत्र तक सीमित नहीं रह गया है। सूचना प्रौधोगिकी के इस युग में सूचना का संचार बहुत तेज गति से और विभिन्न रास्तों को तय करते हुए लोगों के बीच पहुंच रहा है। आज प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक के अलावा वेब मीडिया भी आ चुका है जो आज के लोगों का हथियार बन चुका है। इस प्रेस नामक हथियार का प्रयोग लोग अपने अधिकारों की रक्षा के लिए बड़ी सजगता से कर रहे हैं।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्व प्रेस दिवस 3 मई को मनाया जाता है जबकि यह भारत में 16 नंवबर को मनाया जाता है। 16 नंवबर को प्रेस दिवस मनाने के पीछे एक कारण है वह यह कि इसी दिन प्रेस कांसिल ऑफ इंडिया ने कार्य करना शुरु किया था। प्रेस कांसिल ऑफ इंडिया के स्थापना के पीछे प्रेस को स्वतंत्रता प्रदान करना था जिससे प्रेस स्वछंदता से कार्य कर सके।

आज हमारा समाज बहुत आगे निकल चुका है जिसने कई तरह की उपलब्धियों को हासिल कर लिया है। प्रेस की कल्पना अब केवल समाचार पत्र के माध्यम से नहीं की जा सकती है। समाचार पत्रों का स्वरूप भी बदल चुका है समाचार पत्र ई-पेपर के रूप में पाठक समक्ष मौजूद है। जिसे जब चाहे , जहां चाहे पढ़ा जा सकता है। भले ही आज न्यूज पेपर की सर्वाधिक ग्रोथ भारत में हो परंतु आज हम इलेक्ट्रॉनिक और वेब माध्यम को झुठला नहीं सकते है।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को समाचार पत्र के विकल्प के रूप में देखा जा रहा था परंतु वेब मीडिया ने उसका वो स्थान छीन लिया है। कुछ समय के लिए इलेक्ट्रॉनिक राजा के सिंहासन पर बैठा था परंतु यह समय अत्यल्प था। वेब मीडिया आज का ही नहीं आने वाले कल का माध्यम भी है। वेब मीडिया पर आज वो सबकुछ मौजूद है जो इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में उपलब्ध नहीं है। वेब मीडिया आज ताज को पहने हुए है।

वेब मीडिया आज भी कई लोगों की पहुंच से बाहर है। वेब मीडिया समाज के लगभग हर वर्ग तक पहुंच चुका है परंतु कुछ समस्याओं के चलते समानांतर मीडिया का विकल्प भी  आज खुला हुआ है। समानांतर मीडिया आज भले ही मुख्य धारा से अलग हो परंतु समाज में संचार करने के लिए उपयोगी है।

मीडिया या प्रेस का केवल तीन काम होता है to educate, to inform and to entertain । इन्हीं तीन कार्यों के इर्द-गिर्द सारा मीडिया कार्य करता है।

हमारे देश में प्रेस कांसिल ऑफ इंडिया एक स्वायत्त संस्था है जो कि प्रेस को दिग्भ्रमित होने से बचाने का कार्य करती है। नियम एवं कानून का सही तरीके से पालन करने के लिए प्रेस निर्देशित करती है। किसी भी प्रकार से पक्षपात रहित खबर बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहित करती है।

प्रेस दिवस मनाने के पीछे वास्तविकता से कहा जाए तो प्रेस की उपस्थिति समाज के लिए क्या है यह बताना है।

सर्वकामना सिद्ध करें मां नर्मदा


नमामि देवी नर्मदे .... के स्वर से अमरकंटक से भरुच तक का कण-कण गुंजायमान होता है। आदिगुरू शंकराचार्य जी जब अमरकंटक आए और यहां मां नर्मदा का सौंदर्य निहारा तो उनका मन-मतिष्क नर्मदा का महिमा गान करने से नहीं रोक पाया। उन्होंने नर्मदाष्टक की रचना कर दी। भारत की पवित्रतम नदी जो मेरे लिए तो मां से कम नहीं है क्योंकि जिसने दुनिया की सबसे पुरानी संस्कृति को जन्म दिया हो वो भला मां न हो तो क्या हो? जो लाखों-करोड़ों लोगों को अपना शीतल, मृदु , कंचन जल प्रदान करती हो वो भला मां न हो तो क्या हो? जो लाखों किसानों की मदद करते हुए धरती को शस्य-श्यामला बनाती हो तो वो भला मां न हो तो क्या हो? जो लाखों लोगों को रोजगार प्रदान करें वो भला मां न हो तो क्या हो? जो अपने दोनों पार्श्वों ( सतपुडा पर्वत और विन्ध्याचल पर्वत) को पोषित करती हो वो भला मां न हो तो क्या हो? भांति-भांति...

मां नर्मदा ने अपने कई रुप धारण किए हुए है लेकिन वो रुप जिसमें भारत की अन्य सरिता बहती है वो है कुवांरी। मां नर्मदा भी अन्य नदियों की तरह कुवांरी है जो सदा कल-कल की धारा के साथ प्रवाहित होती रहती है। अमरकंटक में मां नर्मदा अपने बचपन की अटखेलियां करती है। माई की बगिया में आप अपने बचपन के बचपनों को साकार रुप देती है। भूगोलशास्त्री (geographer) के अनुसार नदी की तीन अवस्था होती है युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था। लेकिन मेरे अनुसार तो मां नर्मदा की केवल एक ही अवस्था है युवावस्था। उछल-कूद करता हुआ पानी मैकल की पहाड़ियों से पश्चिम दिशा में आगे बढ़ता जाता है। घने जंगलों और एक के बाद एक जलप्रपात बनाते हुए नर्मदा आगे बढ़ती जाती है। अमरकंटक में दुग्धधारा और कपिलधारा जलप्रपात बनाते हुए अपनी सखी सहेली और दोस्त(सोन, जोहिला सोन) को पीछे छोड़ते हुए आगे सतपुडा और विन्ध्याचल के बीच कही जॉर्ज तो कही महाखड्ड तो कही रैविन बनाते हुए आगे बढ़ते जाती है। घने जंगलों से होकर कही लुप्त हो जाती है तो कही प्रकट होकर अपनी उपस्थिति दर्ज करा देती है।

कही मनोरम धुंआधार जलप्रपात बनाती है तो कही मार्बल रॉक के बीच से होकर गुजरते हुए मनभावन कलात्मक कारीगरी करती है तो कही सहस्त्र धाराओं में बंटकर सहस्त्रधारा जलप्रपात बनाती है। गुजरात में समुद्र में मिलने से पूर्व नर्मदा जलप्रपात का निर्माण करती है।

मां नर्मदा मनुष्यों को ही नहीं वन्यजीवों को भी जीवन प्रदान करती है। पेंच,कान्हा,सतपुडा जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय उद्यान के जीवों को जीवन देती है। भारत के सबसे पुराने वनों में से एक को जीवित रखती है। महाशीर से लेकर राजासॉरस नर्मदेन्सिस और जबलपुरसॉरस को भी जीवन दिया ऐसी है मां नर्मदा।

मां नर्मदा को शंकर भगवान की पुत्री कहा जाता है इसलिए इन्हें शांकरी भी कहा जाता है। नर्मदा जिसका अर्थ है कि सुख को देने वाली अर्थात् सुखदात्री मां। नर्मदा का हर पत्थर एक शिवलिंग के समान है क्योंकि भगवान शिव ने स्वयं मां नर्मदा को वरदान दिया था कि नदी एवं तुम्हारे तट पर स्थित हर पत्थर एक शिवलिंग है जिसे बिना प्राण-प्रतिष्ठा के स्थापित किया जा सकता है। मां नर्मदा की बात ही निराली क्योंकि इस सृष्टि का सर्वनाश होने पर भी मां नर्मदा सदा प्रवाहित होती रहेंगी। हमारे धर्म ग्रंथों में नर्मदा को रेवा नाम से पुकारा गया है जिसका अर्थ है 'उछलने कूदने वाली नदी' क्योंकि मां नर्मदा ऐसा मार्ग चुनती है जो ऊंची-ऊंची पहाडियों और दुर्गम रास्ते वाला है। मां नर्मदा के इनके अलावा कई और नाम है जैसे नामोदास, सामोद्भवा (सोम पर्वत से जिसका उद्भव हुआ हो ), मैकलसुता (मैकल पुत्री)।

मां नर्मदा ने कई युगों को देखा। कई शासन को पोषित किया या यूं कहे कि कल्चुरी, गौंड जैसी शासक व्यवस्था को बनाए रखने में मदद किया। भारतीय पुरातत्व विभाग कहता है कि भारत की सबसे पुरानी सभ्यता जिसे हम नर्मदा घाटी सभ्यता कहते है उसने यही जन्म लिया। नर्मदा ने कई तीर्थों अमरकंटक, ओंकारेश्वर, महेश्वर को जन्म दिया। मां नर्मदा को मध्यप्रदेश की जननी कहा जाता है या यूं कहे कि जीवन का आधार या मध्यप्रदेश की जीवन रेखा।

जिस प्रकार जीवन प्रति क्षण देश लिए समर्पित है ठीक उसी प्रकार इस शरीर का रोम-रोम मां नर्मदा के लिए समर्पित। भगवान शंकर ने वरदान देकर मां नर्मदा को पापनाशिनी या नर्मदा को देखने वाले के पाप नष्ट हो जाएंगे। ऐसी मां सर्व कामना सिद्ध करें मां नर्मदा।