यह ब्लॉग खोजें

गुरुवार, 13 अगस्त 2020

लडूरे प्रसंग


पुरी से अजमेर जा रही ट्रेन भुवनेश्वर स्टेशन पर रुकती है। रात के लगभग 11:30 बजे है और स्टेशन पर लगभग सन्नाटा सा है। प्लेटफॉर्म की सफाई करने वाली मशीन की आवाज घड़ - घड़ सुनाई दे रही है और इक्का-दुक्का चलते लोगों की आवाजें। ट्रेन की बोगी नंबर एस5 से एक दुबला-पतला औसत कद-काठी का लड़का उतरता है। हिलते-डुलते कॉफी स्टॉल पर पहुंचता है और कहता है कि तीन कॉफी देना। तीन कॉफी के रुपए देते हुए वह दुकानदार से पूछता है कि 'लडूरे मिलेगें' । दुकानदार जबाव में एक सवाल पूछता है कि ये लडूरे क्या होते हैं; वो लड़का अपनी हंसी को रोकता हुआ कहता है कि ' 'एक छोटी सी मिठाई'। दुकानदार ने कहा, मेरे पास नहीं हैं। लड़के ने कहा, बाहर तो मिल रही थी कहकर मुस्कुराता हुआ ट्रेन की ओर चल दिया। उस लड़के का एक साथी और उतरता है उससे मुस्कुराहट का राज जानता है। सबकुछ मालूम चलने पर दोनों ठहाका मारकर हंसते है और ट्रेन में बैठे अपने तीसरे साथी को खिड़की से कॉफी देते हुए प्रसंग सुनाकर फिर हंसते है।

सच में लडूरे एक छोटी-सी मिठाई है या और कुछ, जानने के लिए हम थोड़ा फ्लैशबैक में चलते हैं। पुरी स्टेशन के प्लेटफॉर्म छह पर बैठ कर विनय और इंद्रभूषण जोर-जोर से ठहाके लगा रहे थे। दूर खड़े शिवम् ने फोन से बात खत्म करते हुए पूछा क्या हुआ? इंद्रभूषण ने शिवम् को बताया कि जब हम भोपाल पहुंचेगें तो भैया से पूछेगें कि लडूरे खाओगे? मेरी तरफ से खाओगे या विनय की तरफ से या शिवम् कि तरफ से। आखिरकार लडूरे है क्या? एक छोटी-सी मिठाई? या और कुछ?

लडूरे के बारे में और जानने के लिए हम और फ्लैशबैक में चलते हैं। भगवान जगन्नाथ जी के दर्शन करने बाद तीन दोस्त शिवम्, विनय और इंद्रभूषण ने जगन्नाथ के भात को खाकर मिठाई की दुकानों की ओर प्रस्थान किया। जहां तरह-तरह की और नई-नई मिठाईयां देखने को मिली। उत्तरी और मध्य भारत के घरों में एक विशेष प्रकार की मिठाई बनाई जाती है जिसे 'खाजा' कहते है। उसी प्रकार की मिठाई हमें देखने को मिली जिसका नाम रखा गया 'लडूरे'।

क्या सच वो लडूरे थे जो भैया ने खाया या और कुछ नाम था उसका। इति लडूरे प्रसंग।


चलते-चलते (श्रृंखला 7)


कभी-कभी मन में ख्याल आता है कि दुनिया बहुत छोटी है जैसे एक मेंढ़क को लगता है। कुएं में रहना वाले मेंढ़क को लगता है कि यही दुनिया है, इसके बाहर कुछ नहीं है। भारत एक विशाल देश है जहां एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए कई दिनों तक का समय लग जाता है। यही बात हमें बताती है कि दुनिया छोटी नहीं  हैं। सभी की अपनी एक दुनिया होती है परंतु दुनिया सबके लिए एक जैसी होती है।

हम इंसानों की एक आदत होती है कि हम अपनी-अपनी एक छोटी-सी दुनिया तैयार कर लेते हैं। हमारे दोस्तों वाली दुनिया, हमारे परिवार वाली दुनिया, कॉलेज वाली दुनिया, ऑफिस वाली दुनिया आदि मिलकर हम अपनी-अपनी दुनिया तैयार करते हैं। यह हमारे लिए एक घेरा बन जाता है जहां हम अपने आप को सहज महसूस करते है। हम अपने उस सहज घेरे को छोड़कर नहीं जाना चाहते क्योंकि हम कष्ट नहीं झेलना नहीं चाहते।

जब हम अपने घेरे से बाहर निकलते है तो एक नई दुनिया को देखते है; तब हमें मालूम चलता है कि दुनिया छोटी-सी नहीं है। दुनिया बहुत बड़ी है, यह हमें केवल घेरे से निकलकर ही पता चलता है। घेरे से बाहर निकलकर पता चलता है कि लोगों के व्यवहार में बदलाव नज़र आने लगता है, नए-नए खान-पान, पहनावा और यहां तक कि चेहरे तक बदलने लगते हैं। थोड़े समय पहले कि बात है मैं और मेरे दो दोस्त छत्तीसगढ़ और ओडिशा की यात्रा पर थे।

ओडिशा और छत्तीसगढ़ के लोग में रंग और रूप का अंतर होता है। वे उत्तर भारतीयों की तरह साफ रंग के नहीं होते हैं। मैं दुर्ग में था और रेस्टॉरेंट के तरफ जा रहे थे। मेरे एक दोस्त शिवम पोरवाल ने कहा कि यहां सब काले-काले और नक्सलवादी की तरह दिखते हैं। मैंने तुरंत जबाव देते हुए कहा यहां लोग ऐसे ही होते है क्योंकि वे जनजातीय समाज से संबंध रखते हैं। सारे लोग नक्सलवादी नहीं होते हैं। आखिरी में मैंने कहा कि असलियत में आरक्षण की इन्हीं लोगों को जरुरत हैं। तभी इंद्रभूषण ने बोला कि 'कभी आरक्षण से इनका भला नहीं हो सकता है।' मैंने तंज कसते हुए बोला कि सही है इन्हें कहां आरक्षण की जरुरत।

इंद्रभूषण को लगता है कि आरक्षण लोगों को अपंग बनाता और कभी भी आरक्षण से इनका भला नहीं हो सकता है। मैनें सोचा बहस करना मुनासिब नहीं होगा। मैनें मन में सोचा कि जब संविधान में आरक्षण का प्रावधान किया गया था, तब उनका लक्ष्य यह था कि दलित, पिछड़े, अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति जो समाज के अन्य वर्गों के समान सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक रूप से बराबर नहीं है उन्हें बराबरी पर लाना है। वो बात अलग है कि कुछ राजनीतिक पार्टियों और नेताओं ने अपने स्वार्थ के लिए आरक्षण का गलत उपयोग किया।

दुनिया छोटी-सी नहीं है बल्कि बहुत बड़ी है। यहां लोगों को समझना जरुरी है।

📃BY_ vinaykushwaha


हमारी स्वतंत्रता


अहो भाग्य हमारे कि हम स्वतंत्र भारत में जन्में। जीवन में स्वतंत्रता से खुलकर श्वास ले सके, घूम सके, वह सब कुछ कर सके जिसके लिए हमारे राष्ट्र निर्माताओं ने ब्रिटिश हूकुमत से लड़ झगड़ कर हासिल किया था। आजादी का क्या मतलब होता है? हमें उस परिंदे से पूछना चाहिए जिसके पंख होने के बाद भी पिंजरे में होने के कारण उड़ नहीं पाता। यदि पंछी को पिंजरे से बाहर निकाल दिया जाता है तो वह गगन की नई ऊंचाईयों को छूता है। भारत को आज आजादी के 70 वर्ष हो चुके हैं। आज भारत कई बुलंदियों को छू चुका है और कई को छूना बाकी है।

भारत को यह आजादी बस यूं ही नहीं मिल गई। हमारे राष्ट्र निर्माताओं ने स्वयं को बलि वेदी पर न्यौछावर कर मातृभूमि को बंधन से मुक्त कराने का प्रयास किया। अंग्रेजी  शासन की चूले हिलाकर रख दी साहस, अदम्य उत्साह और वीरता से। अपना परिवार छोड़कर सारे देश को अपना घर माना और देशवासियों को परिवार का सदस्य माना। किसी ने प्रेस की आजादी के लिए लड़ाई की, किसी ने स्वराज की मांग के लिए, किसी ने प्रकृति के लिए, किसी ने खेती के लिए लड़ाई कि तो किसी ने अधिकारों के लिए। सभी के उद्देश्य भले ही अलग-अलग हो परंतु ध्येय तो एक ही था 'स्वतंत्रता'। स्वतंत्रता, बिना संप्रभुता के बिना सहेजी नहीं जा सकती है। संप्रभुता किसी भी देश को स्वयं के पैरों पर खड़ा होना सिखाती है।

भारत के हर हिस्से से स्वतंत्रता के लिए लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। कर्नाटक के सूदूर कोने में बसे कित्तूर की रानी चेनम्मा ने हडप नीति का विरोध करते हुए अंग्रेजों से युद्ध लड़ा और उनके दांत खट्टे कर दिए। रानी चेनम्मा ने रानी लक्ष्मीबाई से कई वर्ष पहले ही अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाई।

भारत के सूदूर दक्षिण राज्य केरल में कोट्टयम राज्य के राजा पजहस्सी ने भी अपने अदम्य साहस से अपनी ओर ध्यान खींचा। पजहस्सी राजा को केरल सिंहम् की संज्ञा दी गई है। पजहस्सी ने कर वसूली के विरोध में आवाज उठाकर अंग्रेजों से लोहा लिया लेकिन कुछ विश्वासघातियों और छद्म युद्ध के कारण पजहस्सी ने अपने आप को देश के लिए न्यौछावर कर दिया।

अझगू मुत्तू कोणे एक महान क्रांतिकारी थे जो पोरिगर राजा के सेनापति थे। तमिलनाडु में उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाई। 1857 की क्रांति से लगभग 100 साल पहले ही उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ बगावती सुर बुलंद करके उनका जीना मुहाल कर दिया था।

अल्लूरी सीताराम राजू ने आंध्रप्रदेश के वनवासी के लिए अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा था। राजू एक प्रखर बुद्धि के धनी व्यक्ति थे। जब अंग्रेजों के वनवासी क्षेत्र में दमन बढ़ने लगा तो राजू ने अपने साहस और वनवासी दल बनाकर अंग्रेजों को नाकों चने दबाने पर मजबूर कर दिया। महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस ने सीताराम राजू भूरी-भूरी प्रशंसा की।

तिलका मांझी को स्वतंत्रता संग्राम का पहले शहीद होने का दर्जा प्राप्त है। तिलका मांझी ने संथाल विद्रोह को आगे बढ़ाया था। मुंडा विद्रोह को जन्म देने बिरसा मुंडा को कौन नहीं जानता। बिरसा मुंडा ने अंग्रेजों के खिलाफ तीर-कमान लेकर युद्ध छेड़ दिया था। तिलका मांझी और बिरसा मुंडा दोनों ने ही अपनी वीरता का जौहर दिखाया।

टंट्या भील को बहुत ही कम लोग जानते होगें। टंट्या भील आदिवासी क्रांतिकारी के रूप में जाना जाता है। मध्यप्रदेश के निमाड़ क्षेत्र से आने वाले टंट्या ने अंग्रेजों को सोचने पर मजबूर कर दिया था। उन्हें रॉबिनहुड के नाम से भी जाना जाता था। अंग्रेजों के द्वारा जब-जब गिरफ्तार किया तब-तब वे बिना जेल तोड़े भाग जाते थे जो कि एक आश्चर्य का विषय था। एक बार  गिरफ्तार करके अंग्रेजों ने उन्हें फांसी पर लटका दिया। आज भी  टंट्या भील जिंदा क्योंकि वे एक महान वीर है।

रानी गोडिनेल्यू पूर्वोत्तर में अंग्रेजों के खिलाफ विरोध करने वाली एक छोटी सी उम्र की लड़की से कौन अपरिचित होगा। नगालैण्ड में अंग्रेजों के अत्याचारों से तंग आकर उन्होने कई तरीकों से विरोध किया। इसी कारण पंडित जवाहर लाल नेहरू ने गोडिनेल्यू को 'नगा
रानी' की उपाधि दी थी।

शंभुधन फुलगो ने असम के कछार क्षेत्र में अंग्रेजों के खिलाफ लोहा लिया वही राजस्थान के दालजी भीची ने भी भील जनजाति की ओर से नेतृत्व किया। संन्यासी विद्रोह ने भी बंगाल में अंग्रेजों को सोचने पर मजबूर कर दिया।

भारत इन्हीं के त्याग, समर्पण और बलिदान से मिलकर बना है। कोटि-कोटि नमन। वंदे मातरम्।

मेरे सपनों का भारत


मेरे सपनों का भारत उस पंछी के समान हो जिसकी उड़ान कोई रोक न सके मतलब चहुंओर तरक्की करें।
भारत एक देश ही नहीं बल्कि यह विचारधारा का परिणाम है। आज भारत इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर चुका है। हमारा संविधान किशोर अवस्था में पहुंच चुका है। सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक रूप से तो कोई भी देश तरक्की कर सकता है परंतु जिसका इतिहास समृद्ध हो वही महान बन सकता है। मेरे सपनों का भारत देशों की कतार में पहले नंबर पर खड़ा होना चाहिए।

मेरे सपनों का भारत गरीबी से मुक्त होना चाहिए जिसमें सभी के लिए समान अधिकार प्राप्त हो। जीवन में हर खुश प्राप्त करने और प्रति व्यक्ति आय में सतत् वृद्धि हो और भारत गरीबी मुक्त हो जाना चाहिए।

मेरा भारत शिक्षित होना चाहिए जिसमें समस्त नागरिक समाहित हो। शिक्षित होने से पर्याय मात्र पढ़ना और लिखना ही नहीं है बल्कि समझ, सूझ-बूझ, जागरुकता, जिज्ञासा की भावना का प्रसार हो। रोजगार परक शिक्षा दी जाए ताकि हमारे युवा देश के साथ-साथ विश्व का कल्याण करने में मदद कर सके।

मेरा भारत भ्रष्टाचार मुक्त होना चाहिए। भ्रष्टाचार से मुक्त भारत विकास की नई राह को पकड़ेगा और नित नए कीर्तिमान स्थापित करते जाएगा। मेरे सपनों के भारत में किसी व्यक्ति को भ्रष्टाचार से किसी भी प्रकार समस्या नहीं होनी चाहिए।

मेरे सपनों के भारत में डिजिटल क्रांति वाला होना चाहिए ताकि सभी लोग अपने आप को तकनीक से जोड़े रख पाए। डिजिटल क्रांति भारत और मेरे सपनों को साकार करने में मदद करेगा।

मीडिया की भूमिका मेरे सपनों के भारत में निष्पक्ष होगी और महत्वपूर्ण होगी। मीडिया ऐसा काम करेगी जिससे विकास को सदैव बढ़ावा मिले और विकासोन्मुखी योजना का प्रचार प्रसार हो।

मैं अपने भारत को विश्व नेता की तरह देखना चाहता हूं।
भारत को फिर से सोने की चिड़िया बनते देखना चाहता हूं।

मेरे सपनों का भारत भयमुक्त, भेदभाव रहित होगा जिसमें सभी को समान अधिकार प्राप्त होगें। मौलिक अधिकार की समान रूप से प्राप्ति हो। भारत में आधी आबादी की बात हो ताकि लैंगिक भेदभाव को दूर किया जा सके।

मेरा भारत स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद, राजा राममोहनराय, डॉ एपीजे अब्दुल कलाम, ज्योतिबा के विचार को साकार करने वाला होना चाहिए।

📃BY_ vinaykushwaha


भारतीय वास्तुकला (श्रृंखला 2)


भारत में  सिंधु घाटी सभ्यता का काल लगभग 3500 से लेकर 1750 ईपू तक माना जाता है। जब इस सभ्यता का पतन हुआ तो एक नई सभ्यता ने जन्म लिया जिसका नाम है 'वैदिक सभ्यता'। वैदिक सभ्यता का काल 1500 ईपू से 500 ईपू तक माना जाता है। वैदिक सभ्यता कहने के पीछे सबसे बड़ा कारण है कि इसी समय इंडो-यूरोपियन भाषा में सबसे पहला ग्रंथ लिखा गया जिसका नाम था 'ऋग्वेद'। ऋग्वेद को भारत का ही नहीं विश्व का सबसे प्राचीन ग्रंथ माना जाता है और जेंद अवेस्ता के समकक्ष माना जाता है। इस सभ्यता को स्थापित करने वालों को आर्य कहा गया।

आर्य कहां से आए इतिहासकारों के बीच मतभेद का विषय है परंतु एक सर्वमान्य मत है कि मध्य एशिया से आए। इस सभ्यता के बारे में कुछ जानकारी बोगाजकोई अभिलेख से प्राप्त होती है जो लगभग 1700 ईपू का है। इतिहासकारों ने वैदिक सभ्यता को दो भागों में बांटा है पहला ऋग्वैदिक काल जो लगभग 1500 से 1000 ईपू तक था। दूसरा उत्तर वैदिक काल जो लगभग 1000 से 500 ईपू तक था। यह सभ्यता सप्तसैंधव या सप्तसिंधु की निवासी थी जो सिंधु से लेकर गंगा नदी के दोआब का क्षेत्र था। ऋग्वैदिक काल में लोग पश्चिम क्षेत्र में रहते थे। लेकिन उत्तर वैदिक काल में लोग पूर्व और दक्षिण की ओर बढ़े।

इस सभ्यता में लोग खेती करना सीख गए थे। वैदिक काल में गाय और पशुओं का विशेष महत्व था। गाय का विशेष महत्व होता था। गाय के लिए युद्ध तक लड़े जाते थे जिसे 'गविष्ठि' कहा जाता था। आर्य कभी भी एक जगह नहीं रहते थे, सदा एक सथान से दूसरे स्थान पर विचरण करते थे।

खानाबदोश न होते हुए भी आर्य एक स्थान से दूसरे स्थान तक यात्रा करते और कबीलों का निर्माण करते थे। विशेष रूप से आर्यन कबीलाई ही थे। ईंटों से निर्मित घर की शुरुआत सिंधु घाटी सभ्यता से हो चुकी थी। वैदिक काल में मिट्टी और ईंट से बने घर उत्खनन (excavation) से मिले हैं।

ऋग्वैदिक काल में आर्यन अपने घरों का निर्माण मिट्टी से बनी दीवार छत पर घास-फूंस का प्रयोग करते थे। घर के अंदर का फर्श को पीट-पीटकर चिकना कर दिया जाता था। घर स्थाई नहीं होते थे। घर एक घेरे में बने होते थे जिसके बीचोंबीच एक हवनवेदी (अग्निकुण्ड)होती थी। पशुओं को रखने के लिए एक स्थान होता था विशेषकर गाय। ऋग्वैदिक काल में वास्तुकला कोई ज्यादा प्रभावशाली नहीं रही।

उत्तर वैदिक काल में वास्तुकला बिल्कुल ऋग्वैदिक काल की तरह थी। इस काल में एक और बात जुड़ गई जिसमें हवनवेदी(अग्निकुण्ड) जरुरी हो गई। लोगों में स्थायित्व आ गया क्योंकि लोगों ने पशुपालन को मुख्य व्यवसाय से हटकर कृषि को मुख्य व्यवसाय बना लिया। वर्ण व्यवस्था की व्यापकता बढ़ गई। कही-कही यह भी उदाहरण मिलता है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की अलग-अलग बस्तियां करती थी। 

यही है वैदिक सभ्यता की वास्तुकला।

📃BY_ vinaykushwaha


चलते - चलते (श्रृंखला 6)


समाज की सबसे छोटी इकाई व्यक्ति होता है। एक व्यक्ति जब परिवार बसा लेेता है, तब परिवार बनता है। परिवार मिलकर समाज का निर्माण करते हैं। विभिन्न तरह के समाज मिलकर देश का निर्माण करते हैं। यह समाज में विभिन्न प्रकार के लोगों से मिलकर बनता है जिसमें भाषा, वेशभूषा, संस्कृति, खान-पान आदि अलग हो सकता है। विश्व के इतिहास में सब कुछ बदल गया है परंतु एक ऐसी प्रक्रिया है जो आज भी कायम है वह है 'विनिमय' (EXCHANGE)। विनिमय सेवा, वस्तु, ज्ञान आदि का हो सकता है।

प्रकृति से लेकर भौतिक जगत तक सभी जगह विनिमय के उदाहरण बिखरे पड़े हैं। नदी बहती है और जाकर सागर में मिल जाती है। सूरज की तपिश के कारण पानी वाष्पीकृत होकर बादलों का रूप लेता है और फिर से धरती पर बरसकर नदियों में मिल जाता है। यह मात्र प्रकृति का एक छोटा-सा उदाहरण है।

आज से लगभग 5000 साल पहले मिस्त्र(Egypt) की सभ्यता, मेसोपोटामिया, सुमेर और सिंधु घाटी सभ्यता के बीच विनिमय बड़ी मात्रा में उदाहरण के रूप में  देखने को मिलता है। व्यापारिक गतिविधियों का बड़ी मात्रा में प्रमाण मिलता है जिसमें सिंधु घाटी सभ्यता से कपास का निर्यात किया जाता था बदले में मिस्त्र से कीमती धातुओं का आयात किया जाता था। धीरे-धीरे सभ्यता में वस्तु विनिमय का प्रचलन बढ़ता गया और अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया। कई सभ्यताएं मिट गई परंतु विनिमय कभी खत्म नहीं हुआ और नाही होगा।

सिकंदर जैसे महान राजा ने विश्व विजेता बनने का सपना देखा था परंतु भारत को नहीं जीत पाया और विश्व विजेता बनने का सपना उसके साथ ही दफ़न हो गया। सिकंदर ने कई बड़ी सभ्यताओं को रौंद डाला। कई राज्यों को युद्ध के द्वारा अपने राज्य में मिला लिया। कई राज्यों ने अपनी अधीनता स्वीकार कर ली। सिकंदर उनका संरक्षक बनने को तैयार हो गया ताकि दूसरा देश उन पर हमला करें तो सिकंदर की सेना उस राज्य की मदद करें जिसे संरक्षित किया गया है।

भारत में वैदिक सभ्यता में 'गाय ही युद्ध था और समाधान भी गाय ही थी।' आर्य गाय के लिए जब युद्ध करते थे तो उसे 'गविष्ठ' कहते थे। आर्य कबीलाई थे वे दूसरे कबीले पर हमला करके अधिकार क्षेत्र को बढ़ाते थे। हमले को रोकने के लिए गाय का दान किया जाता था।

भारत में कई राजवंशों ने अपने राज्यों को हमलावरों और साम्राज्यवादियों को रोकने के लिए विवाह की परम्परा अपनाई। मुगलों के समय यह बहुतायत में देखने को मिलता है कि राजस्थान में बहुत से राजाओं द्वारा वैवाहिक संबंध स्थापित किया गया। इस विनिमय (EXCHANGE) का सबसे बड़ा उदाहरण जोधा-अकबर है। इसके बाद मुगलों के घर में कई हिंदु स्त्रियों का गृहप्रवेश हुआ।

पुरातन समाज में जीवन यापन करने के लिए वस्तु विनिमय (commodity exchange) एक जरुरी प्रक्रिया थी जिसमें अनाज के बदलेे फल, सब्जी, कपड़े आदि को खरीदा जाता था। वस्तु से सेवा का विनिमय भी होता था। जैसे अनाज के बदले नाऊ से हजामत बनवाना आदि है। ब्राह्मण से कथा, पूजा, यज्ञ के बदले दक्षिणा के द्वारा विनिमय करना।

कई जगह सेवा या वस्तु का विनिमय नहीं चलता वहां उच्च गुणवत्ता के भाव होना आवश्यक है। प्रेम एक ऐसा व्यवहार है जिसमें एक-दूसरे के प्रति सम्मान और श्रृंगार रस का भाव  होना चाहिए। राधा-कृष्ण का प्रेम इसी प्रकार के प्रेम को परिलक्षित करता है। कई बार विनिमय में समानता नहीं होती हैं जैसे महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी, पैगम्बर मोहम्मद साहब, जीसस क्राइस्ट आदि कष्ट सहकर और समाज के सारे दु:खों को ग्रहण करके समाज को प्रगति का रास्ता दिखलाया।

जब मुद्रा का चलन हो गया तो मुद्रा विनिमय (currency exchange) या मुद्रा के बदले सेवा या वस्तु का प्रचलन हो गया। आज का समय मुद्रा विनिमय (currency exchange)  और मुद्रा के बदले वस्तु का विनिमय(exchange) बहुत ज्यादा चलन में है। राजाओं के समय से कर प्रणाली(tax system) चली आ रहा है जिसे आज के समय में ज्यादा प्रोत्साहन दिया जा रहा ताकि देश का विकास सुचारु रूप से हो सके। मध्यकाल में राजाओं के द्वारा भारी कर(tax) लगाया जाता था और सेवा नगण्य थी। छत्रपति शिवाजी भी चौथ और सरदेशमुखी नामक विनिमय अपने शत्रु राज्य से करते थे।

विनिमय आज के युग की जरुरत बन चुकी है। विनिमय से ही बहुत से कार्य सफल हो पाते हैं। कई जगह विनिमय की भावना नहीं होनी चाहिए नहीं तो जीवन विनाश की कगार पर पहुंच जाएगा।

प्रकृति और मानवों के बीच तो विनिमय अतिआवश्यक है।

📃BY_ vinaykushwaha


भारतीय वास्तुकला (श्रृंखला - एक )

 भारत का इतिहास  लगभग 5000 वर्ष पुराना है। सिंधु घाटी की सभ्यता से लेकर आज तक कई प्रकार के बदलाव हो चुके हैं। खान-पान, वेशभूषा, रहन-सहन और स्थापत्य कला आदि सब कुछ बदल चुका है। स्थापत्य कला में सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर आज तक कई बदलाव हो चुके है। जहां सिंधु घाटी सभ्यता एक सुनियोजित नगरीय व्यवस्था थी वही वैदिक सभ्यता ग्रामीण व्यवस्था थी। कई दौर से गुजरते हुए स्थापत्य कला ने कई तरीके से विकास किया। हिंदु , मुस्लिम, मिश्रित, गोथिक आदि शैली में भवनों का निर्माण भारत में हुआ।

भारत में स्थापत्य कला का विकास  ईसा से 3500 वर्ष पूर्व शुरु हो गया था। सिंधु घाटी सभ्यता भारत की ही नहीं विश्व की सबसे प्राचीन और समृद्ध सभ्यताओं में से एक है। यह सभ्यता भारत के पश्चमोत्तर क्षेत्र में फैली थी। इस सभ्यता में लोगों के रोजगार का मुख्य स्त्रोत व्यापार था और यह व्यापार मिस्त्र, ईरान, मेसोपोटामिया आदि जगह अर्थात् पूरे विश्व में था। सबसे बड़ी बात तो यह थी कि नगरीय सभ्यता होने के कारण आज के जैसे जल निकास व्यवस्था, सड़कें, जल प्रबंधन, अन्नागार आदि थे।

सिंधु घाटी सभ्यता में नगर की स्थापना में एक मुख्य बात को ध्यान रखा जाता था संभ्रांत लोगों के रहने के लिए  और आमजन के रहने के लिए अलग-अलग स्थान तय थे। संभ्रांत लोग ऊंची पहाड़ी पर महल नुमा आकृति के घर में रहते थे जो चारों ओर दीवार से घिरा होता था। आमजन एक निचले क्षेत्र में रहते थे। इनके मकानों में भव्यता नहीं होती थी और इनका रहवासी क्षेत्र दीवार से घिरा नहीं होता था। कई स्थानों पर इस प्रकार की व्यवस्था भी थी कि संभ्रांत और आमजन दोनों के घर दीवार से युक्त थे। घर एक मंजिल और दो मंजिल तक के होते थे। नीचे वाली मंजिल से ऊपर जाने के लिए सीढ़ियां भी बनाई जाती थी। घरों का निर्माण पकी हुई ईंटों से किया जाता था।

घरों से निकलने वाले गंदे पानी के लिए नाली की व्यवस्था की गई थी। पेय जल की उत्तम व्यवस्था की गई थी। लोथल इसका शानदार उदाहरण है जहां आज भी उस समय के साक्ष्य मौजूद है। कुओं के माध्यम से पेय जल उपलब्ध कराया जाता था। उत्खनन (excavation) में एक विशाल स्नानागार का पता चला जो कि सामूहिक स्नान के लिए प्रयुक्त किया जाता होगा।

नगर विन्यास की सबसे अच्छी बात यह थी कि सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती है। छोटी सड़के बड़ी सड़को में आकर मिलती थी। घरों के दरवाजें मुख्य सड़क की ओर न खुलकर दूसरी तरफ खुलते थे। उत्खनन (excavation) से एक विशाल अन्नागार की खोज की गई जो अनाज आदि रखने के लिए प्रयुक्त होता था। व्यापार करने के लिए नदी-गोदी( rever port) का निर्माण किया था जो कि अपने आप में एक अद्वितीय उदाहरण है। सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान विभिन्न देवी-देवता के पूजन का उल्लेख मिलता है परंतु मंदिर का कोई नामोनिशान नहीं मिलता।

उपरोक्त वर्णन से हम समझ सकते है कि भारत की भवन निर्माण शैली कितनी समृद्ध और विकसित है। आज से  लगभग 5000 साल पहले भी इतना समृद्ध होना लाजबाव है।

इसी तरह पढ़ते रहिए भारत में स्थापत्य कला का विकास कैसे हुआ। आगे आने वाले पोस्ट में 

📃BY_ vinaykushwaha