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शुक्रवार, 31 मई 2019

सिर्फ और सिर्फ नरेंद्र



लोकसभा चुनाव आखिरकार खत्म हुआ। सात चरणों में लोकसभा चुनाव का 23 मई को समापन हो गया। इस बार कई लोगों के लिए आंकड़े चौंकाने वाले रहे तो कई लोगों को सुकून देने वाले। इस बार एग्जिट पोल की भविष्यवाणी सच साबित हुई, यदि कुछ एग्जिट पोल को छोड़ दिया जाए तो। लगभग इस बार सभी एग्जिट पोल ने एनडीए को 350 के पार पहुंचाया था। एग्जिट पोल की डगर पर चलते हुए लोकसभा के नतीजे भी सच साबित हुए। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह समेत पार्टी के तमाम नेता कहते थे कि पिछले बार मोदी लहर थी लेकिन इस बार मोदी की सुनामी है। अमित शाह स्वयं कहते थे कि बीजेपी 300 से अधिक सीटें लेकर आएगी और एनडीए 350 सीटें जीतेगी। बीजेपी ने 2014 को दोहराते हुए 2019 में एक बड़े आंकड़े तक पहुंच बनाई। इस बार के आम चुनाव के नतीजों में बीजेपी अपनी दम पर 303 सीटें लेकर आई है तो वहीं एनडीए का आंकड़ा 350 के पार पहुंच गया है।

2019 के आम चुनाव में मोदी इतनी सीटें लाने में कैसे सफल रहे? क्या मोदी के खिलाफ कोई एंटी इंकम्बेंसी नहीं थी? लोगों में मोदी के खिलाफ गुस्सा नहीं था? क्या मोदी से बड़ा नेता आज भारत में कोई नहीं है? विपक्ष इतना कमजोर है कि मोदी का मुकाबला कर पाने में सक्षम नहीं है? इस पूरे परिदृश्य में जो चीज उभरकर सामने आती है वो यह है कि इस बार पॉलिटिकल पंडितों की सारी भविष्यवाणियां फेल हो गईं है। मैं इस लेख में बीजेपी की जीत पर प्रकाश डालूंगा। तथ्यों को सामने लाने की कोशिश करूंगा।

सबसे पहले मैं बात करूंगा नरेंद्र मोदी की छवि की। मोदी की छवि के कारण कहीं ना कहीं बीजेपी को फायदा मिला है। 2014 के बाद मोदी और बड़ी छवि बनकर उभरे हैं। आज के समय में कहा जाए तो मोदी से बड़ा नेता देश में कोई दूसरा नहीं है। केंद्र में सरकार बनाने के बाद नरेंद्र मोदी ने कई ऐसे काम किए जिसने मोदी की छवि बदलने का काम किया। मोदी के इन कामों में सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक, अभिनंदन की रिहाई, मसूद अजहर को ग्लोबल आंतकी घोषित करवाना, स्वच्छ भारत अभियान, 21 जून को योग दिवस घोषित करवाना जैसे मुद्दे शामिल हैं। इन कामों ने मोदी की छवि को बड़े से और बड़ा कर दिया। नरेंद्र मोदी की बोलने की कला और भाषण के दौरान लोगों से जुड़ने की कला, मोदी को लोगों के नजदीक लेकर गई। मोदी देश के जिस भी हिस्से में जाते हैं वहां की भाषा के शब्दों को अपने भाषण में शामिल करते हैं। पीएम नरेंद्र मोदी ने 5 साल के दौरान हर महीने के आखिरी रविवार को मन की बात करते हुए लोगों से उन्होंने जुड़ाव बनाए रखा। इसके अलावा शिक्षक दिवस के दिन छात्रों से बात करते थे।

नरेंद्र मोदी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में 146 रैलियां की। पूरब से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण तक पीएम ने रैलियां की। मेरठ से अपनी चुनावी सभा की शुरूआत करके एमपी के खरगोन में अपनी चुनावी अभियान को विराम दिया। कांग्रेस का 'चौकीदार चोर है' वाले बयान को लेकर पीएम ने अपनी हर रैली में कांग्रेस पर चौकीदार नाम का बम फोड़ा। ट्विटर पर अपने नाम के आगे चौकीदार लगाकर चौकीदार वर्ग का वोट समेट लिया। कांग्रेस के साथ-साथ महागठबंधन और टीएमसी को इस चुनाव में मोदी ने आड़े हाथों लिया। जहां महागठबंधन को महामिलावट कहा तो वहीं ममता बनर्जी को स्पीड ब्रेकर कहा। इन सब में सबसे बड़ी बात यह रही की इस बार बीजेपी कांग्रेस से भी ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ रही थी। बीजेपी ने 2019 का आम चुनाव 435 सीटों पर लड़ा। बीजेपी ने भले ही 435 सीटों पर चुनाव लड़ी लेकिन प्रत्याशी केवल एक ही था वो है 'मोदी'। बीजेपी ने पिछला आम चुनाव मोदी लहर के नाम पर लड़ा था लेकिन यह चुनाव बीजेपी ने मोदी के नाम पर लड़ा। बीजेपी नेता कहते भी थे कि पिछले चुनाव में मोदी लहर थी तो इस बार मोदी की सुनामी है।

विपक्ष हमेशा कहता था कि पीएम मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करते, इंटरव्यू नहीं देते, पीएम हमेशा वन-वे कम्यूनिकेशन करते हैं। पीएम नरेंद्र मोदी ने इस चुनाव में इंटरव्यू के साथ-साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टीवी से लेकर प्रिंट तक सभी को इंटरव्यू दिया। आखिरी चरण के चुनाव प्रचार के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की। इस बार प्रधानमंत्री मोदी ने पॉलिटिकल इंटरव्यू के साथ-साथ नॉन-पॉलिटिकल इंटरव्यू भी दिया। इसके अलावा मोदी ने कई रोड शो भी किए जिसमें काशी में किया रोड शो भव्य था।

बीजेपी की इस शानदार जीत के पीछे एक बहुत बड़ा कारण है मोदी-शाह की जोड़ी। पिछले आम चुनाव की तरह इस चुनाव में भी मोदी-शाह की जोड़ी ने कमाल कर दिखाया। पॉलिटिकल पंडित कहते थे कि बीजेपी को सरकार बनाने के लिए दूसरे दलों की जरुरत पड़ेगी। दोनों की जोड़ी ने इस बात को नकार दिया। अमित शाह को बीजेपी का चाणक्य कहा जाता है। अमित शाह ने शिवसेना को मनाने का काम किया, जेडीयू को फिर से एनडीए में लाने का श्रेय भी अमित शाह को जाता है। अमित शाह ने नरेंद्र मोदी से 17 रैलियां ज्यादा करके लोगों तक पहुंच बनाई। बूथ मैनेजमेंट और लोगों को बीजेपी से जोड़ने का काम अमित शाह ने किया। नरेंद्र मोदी की बिजनेस मैन, फिल्मी सितारों के साथ बैठक आदि भी अमित शाह के दिमाग की उपज है। बीजेपी ने राजस्थान, बिहार, उत्तरप्रदेश, झारखंड, तमिलनाडु, महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों से गठबंधन किया। तमिलनाडु को यदि छोड़ दिया तो बाकी राज्यों में बीजेपी ने अच्छा प्रदर्शन किया। अमित शाह की रणनीति के काऱण आज बंगाल में बीजेपी 18 सीटें लाने में सफल रही है। इस चुनाव में बीजेपी का फोकस यूपी और बिहार ना होकर पश्चिम बंगाल और ओडिशा था। इन दोनों राज्यों में बीजेपी ने अच्छा प्रदर्शन किया। बीजेपी अध्यक्ष होने के नाते अमित शाह ने बीजेपी को सशक्त बनाया बल्कि एनडीए को भी और ज्यादा मजबूत किया। बीजेपी की इस धुंआधार जीत के पीछे प्रचार-प्रसार का अहम योगदान रहा। इसमें कोई शक नहीं है कि बीजेपी ने इस चुनाव में प्रचार में सबसे ज्यादा पैसे खर्च किए हैं। सोशल मीडिया से लेकर ग्राउंड जीरो तक बीजेपी ने खूब पैसे बहाए। इस चुनाव में बीजेपी का चुनाव प्रचार विवाद का विषय रहा। नमो टीवी को लेकर विपक्ष बहुत आक्रामक रहा। व्हाट्सएप ग्रुप से लेकर फेसबुक और व्यक्तिगत रूप से फोन करके लोगों को बीजेपी के पक्ष में लाने का प्रयास बीजेपी ने किया। बीजेपी के साथ अपार जनसमर्थन जुड़ने के पीछे एक कारण और भी है।

सरकार की योजनाओं को घर-घर तक पहुंचाना और उनका प्रचार-प्रसार करना। उज्ज्वला योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, स्वच्छ भारत अभियान के तहत शौचालय का निर्माण करवाना। जिन परिवारों के पास ये सारी सुविधाएं नहीं थी यदि उऩको यह सब मिलता है तो व्यक्ति-व्यक्ति का लाभ पहुंचाने वालों को ही जाएगा।
कमजोर विपक्ष का होना भी बीजेपी के लिए फायदेमंद साबित हुआ। 2014 के अपेक्षा बीजेपी 2019 में और बड़ी पार्टी बनकर उभरी। 2014 में बीजेपी को अपने दम पर जहां 282 सीट मिली थीं तो वहीं 2019 में बढ़कर 303 हो गईं। विपक्ष और कमजोर हो गया। ऐसा कहना गलत वहीं होगा कि विपक्ष ने कोई प्रयास ही नहीं किया। मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को 2014 के आम चुनाव में 44 सीटें मिली थीं तो 2019 में यह मामूली बढ़त के साथ 52 हो गईं। इन सबमें सबसे बड़ी बात यह है कि देश के सबसे बड़े सियासी सूबे में कांग्रेस सिमटकर एक पर आ गई।  17 राज्यों में कांग्रेस खाता तक नहीं खोल पाई। बिहार जैसे राज्य में एनडीए ने 40 में से 39 सीटें जीतने में कामयाब रही। पश्चिम बंगाल में बीजेपी दो से 18 सीटों वाली बनी तो वहीं ओडिशा में बीजेपी एक से आठ पर पहुंच गई।  कई राज्यों में बीजेपी क्लीन स्वीप करने में कामयाब रही जिनमें राजस्थान, गुजरात, हिमाचल, उत्तराखंड, दिल्ली, हरियाणा, चंडीगढ़ जैसे राज्य शामिल हैं। 2019 का आम चुनाव कई दिग्गजों की हार वाला चुनाव रहा जिसमें दिग्विजय सिंह, शरद यादव,  राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सुशील कुमार शिंदे, नबाम टुकी जैसे बड़े-बड़े नाम धराशायी हो गए। 

विपक्ष ने मेहनत की या नहीं की इसका कोई मतलब नहीं क्योंकि बीजेपी ने बाजी मार ली है। नरेंद्र मोदी में एक बात बहुत खास है कि वे विपक्ष के मुद्दे को कैच कर लेते हैं।  2017 के गुजरात चुनाव में मणिशंकर अय्यर ने पीएम मोदी को नीच कहा था।  इस बयान को पीएम मोदी ने इतना प्रचार किया कि कांग्रेस को इसका भुगतान भुगतना पड़ा। 2019 के आम चुनाव में राहुल गांधी ने चौकीदार चोर है नारा लगवाया तो नरेंद्र मोदी ने ट्विटर हैंडल पर अपना बदल कर चौकीदार नरेंद्र मोदी कर दिया। राहुल गांधी के द्वारा उठाए गए भष्ट्राचार के मुद्दे को पलटकर बोफोर्स तक ले गए।  सैम पित्रोदा के सिख दंगों पर दिए हुआ तो हुआ वाले बयान पर पीएम ने आधी जंग ही जीत ली।

कहते हैं कि चुनाव में जातीय समीकरण मायने रखते हैं। पार्टियां अपने उम्मीदवारों को जातीय आधार पर उतारती है।  इस चुनावी में सारे जातीय समीकरण लोधी-कुर्मी, एम-वाय, सवर्ण-दलित सभी समीकरण फेल हो गए। इस बार राष्ट्रवाद का मुद्दा हावी रहा। राष्ट्रवाद के साथ-साथ आतंकवाद का मुद्दा हावी रहा। सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक ने इसे और हवा दी। 

जिस तरह सुनामी में सब कुछ तबाह हो जाता है ठीक उसी तरह मोदी नाम की सुनामी में 2019 में विपक्ष बह गया। 
BY_vinaykushwaha

सोमवार, 20 मई 2019

आम और ये मैंगो पीपुल!


आज जब मैं यह पोस्ट लिख रहा हूं तो 2019 का आम चुनाव खत्म हो चुका है। आम चुनाव खत्म होने के साथ ही देश भर में चुनाव प्रचार का शोर थम चुका है। अब सबकी नजर 23 मई को आने चुनाव के नतीजे पर हैं। यह पोस्ट नॉन पॉलिटिकल है जिस तरह प्रधानमंत्री का इंटरव्यू नॉन पॉलिटिकल था। अभिनेता अक्षय कुमार के सवाल का जवाब देते पीएम बड़े ही मासूम नजर आ रहे थे। आम की कहानी तो उन्होंने इस तरह बताई की मुझे अपने बचपन के दिन ध्यान आ गए क्योंकि हम भी लग्जरी में पले-बढ़े नहीं हैं। पत्रकार रवीश कुमार को तो बाकायदा प्राइम टाइम ही आम करना पड़ा। आम सफेदा हो या लंगड़ा, बादाम हो या दशहरी यही बताना पड़ा। गर्मी के मौसम में आम और आम से बने जूस आदि का आनंद हर व्यक्ति उठाता है। मैंने बचपन से लेकर आजतक बादाम, केसरी, तोतापरी, नीलम, लंगड़ा, दशहरी, चौसा, मोती, कल्मी, गोविंदगढ़ का आम खाया है। बचपन में हमने भी आम तोड़कर खाया है। हम भी प्रधानमंत्री बने तो कोई हमसे पूछे कि क्या आप भी आम खाते हैं? मेरा जवाब तैयार होगा हां, हमारी फैमिली में ऐसी कोई लक्जरी तो नहीं कि हम आम खरीद कर खा पाएं।

मैं नहीं जानता कितने लोगों ने अपनी जिंदगी गांव में बिताई है या गांव में रहकर गांव के जीवन को करीब से देखा है। मेरे पिताजी गांव से निकलकर शहर में नौकरी करने चले गए। शहर का जीवन मैंने जीया है लेकिन गांव को मैंने करीब से देखा है। गर्मी में स्कूल के छुट्टी के दरम्यान हम (हम मतलब मम्मी, भइया और मैं) गांव का रुख करते थे। सीधी-सीधी बात कहूं तो गांव का जीवन चले जाते थे। चूल्हे पर पकी चाय का सौंधापन क्या शानदार लगता था। मैंने चाय बेची नहीं है। हंडी में पकी दाल और हाथों से पोई रोटी का स्वाद जो गांव के खाने में था आज मैं याद करता हूं। उस खाने को भुलाया नहीं जा सकता है। आकाश तले रात गुजारना और दिन में बिजली आने का इंतजार करना दोनों का एक सुखद अनुभव था। गर्मी के दिनों में खाट पर सोना और कुत्तों के भौंकने की तेज आवाज आज भी याद आती है। खेत के किनारे खाट डालकर सोने का अनुभव तो और भी शानदार था। रात में फसल को छूकर आने वाली हवा गर्मी की उजाले वाली रात को और भी ठंडा कर देती थी।

मेरे गांव के घर में एक बारी थी। जो लोग बारी के बारे में कुछ नहीं जानते तो उनको बताता चलूं कि बारी एक ऐसी जगह होती है जिसे हम छोटा-सा बगीचा कह सकते हैं। गांव वाली बारी में एक छोटा-सा घर था जिसमें दादा-दादी रहते थे। इसी घर से दो कदम की दूरी पर एक बड़ा-सा कुंआ था। गर्मियों में इसी कुंए से पानी निकालकर हम ठंडा-ठंडा पानी पिया करते थे। गांव की बारी में कटहल (jack fruit), करौंदा, नींबू, सीताफल (custard apple) और आम के पेड़ थे। हम जब भी गांव जाते थे तो आम के पेड़ पर चढ़कर आम खाते थे क्योंकि हमारे पास कोई लक्जरी तो थी नहीं। दादी अक्सर खटिया पर अमावट बनाती थी। अमावट को शायद ही आजकल के लोग जानते हों। अमावट पके हुए आम का गूदा निकालकर उसे खटिया में चादर बिछाकर एक परतदार के रूप में आकार दिया जाता है। मैं बघेली हूं और हमारे यहां आम और आम से बनीं चीजों का बहुत इस्तेमाल किया जाता है। आम चाहे कच्चा हो या पका दोनों का इस्तेमाल बराबर होता है।

मैं जब छोटा था तो मई-जून के महीने में तूफान बारिश होने पर कैरियां गिर जाती थीं। मैं और मेरे दोस्त कैरियां अपनी टी-शर्ट में भरकर घर ले जाते थे। कई बार तो पत्थर मारकर,बांस की लग्गी बनाकर कैरी तोड़ी हैं क्योंकि हमारे पास कोई लक्जरी तो थी नहीं। कैरी बड़े काम का फल है। बघेली लोग कैरी की सब्जी, कैरी की कढ़ी, कैरी की चटनी, कैरी का पना, कैरी से आचार, कैरी को सुखाकर अमचूर बनाते हैं। कैरी से बने कई सारे पाकवान के बारे में लोग जानते हैं लेकिन डिश जो बघेली बड़े चाव से खाते हैं वो है 'बगजा'। बगजा, कैरी से बनता है। कैरियों को उबाला जाता है। कैरी का गूदा निकाला जाता है। इस गूदे में गुड़ मिलाया जाता है इसके साथ नमक,भुना जीरा मिलाया जाता है। इसके बाद बेसन का घोल तैयार करके सेंव बनाया जाता है। गूदे को सरसों के तेल में खड़ी लाल मिर्च, जीरा, खड़े मसाले के साथ छौंक लगाया जाता है। इस छौंक में सेंव को मिलाया जाता है, इसे कहते हैं 'बगजा'। बघेली इस डिश को बड़े चाव से खाते हैं और मैं भी क्योंकि हमारे पास कोई लक्जरी तो थी नहीं।

जैसे-जैसे बड़े होते गए तो आम खाने का तरीका बदलता गया। पहले तो हमें केवल रीवा के गोविंदगढ़ का आम और दशहरी पता था। जैसे-जैसे बड़े होते गए वैसे-वैसे आम के नए-नए नाम भी पता चलते गए। मैं मध्यप्रदेश से हूं। एमपी से यूपी तक आते-आते आम का राजा भी बदल गया। एमपी में जहां बादाम आम का राजा था तो वहीं यूपी आने के बाद आम का राजा सफेदा हो गया। आम रस तो बचपन में भी पीते थे। आमरस के साथ दाल की रोटी खाने का आनंद तो सच्चा बघेली ही जान सकता है। बचपन में आम का रस निकालकर हम उसमें काजू,किशमिश,बादाम, दूध और थोड़ी शक्कर मिलाकर फ्रिज में जमने के लिए रख देते थे। यही हमारे लिए आइसक्रीम थी। अब तो केवल दुकानों में ही मैंगो फ्लेवर वाली आइसक्रीम खाना होता है। आम रस के नाम पर बाजार में दस-पांच रुपये में मिल रहे मैंगो जूस को पीकर अपने आप को तृप्त करते हैं।

आम को फलों का राजा कहा जाता है। आम सच में फलों का राजा होने लायक है भी क्योंकि आम खाने के लिए किसी प्रकार की लक्जरी की जरूरत नहीं है। एक आम इंसान से लेकर अमीर तक आम को खाता है। मैंने आज तक आम खाने के लिए किसी व्यक्ति को कहते हुए नहीं सुना कि हमारे पास लक्जरी तो थी नहीं, सिवाय एक के। आम के लिए अब तो एक मौसम विशेष तक रुकने की जरुरत भी नहीं है क्योंकि अब आम बारहमासी हो गया है। जब मन करे आम खरीदो और खाओ। आम की टक्कर आज कीवी, ड्रेगन फ्रूट, आवोकाडो से हो गई है। मेरे लिए तो आम ही 'द बेस्ट' है जिसके लिए लक्जरी की जरुरत नहीं पड़ती है। हां मैंने आज तक मैंगो लस्सी का स्वाद नहीं चखा है। मैंगो लस्सी का स्वाद तो मैं कभी चख लूंगा लेकिन इसके लिए मैं लक्जरी को दोष नहीं दूंगा। मैंगो लस्सी के एवज में मैंने मैंगो फ्लेवर वाली टॉफी जरूर खाई है। पता नहीं और क्या बाकी है और क्या नहीं लेकिन मेरे हिसाब भारत का कोई भी वर्ग हो उसे आम खाने के लिए लक्जरी की जरुरत नहीं है।  आम की तरह हम भी तो मैंगो पीपुल(mango people) हैं।

मंगलवार, 14 मई 2019

लद्दाख के निर्माता - कुशोक बकुला रिम्पोछे



जम्मू कश्मीर के लद्दाख को अपनी खूबसूरती के लिए जाना जाता है। हिमालय की ऊंची-ऊंची पर्वतश्रृंखला, बौद्ध मठ और दूर-दूर तक फैली शांति सभी को लद्दाख आकर्षित करती है। लद्दाख की चीन की सीमा से करीबी सुरक्षा की दृष्टि से डर पैदा करता है। लद्दाख में इस डर का सबसे पहले जिक्र कुशोक बकुला रिम्पोछे ने किया था। कुशोक बकुला रिम्पोछे को आधुनिक लद्दाख का निर्माता कहा जाता है। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने लद्दाख में एयरपोर्ट का उद्घाटन किया तो उन्होंने कुशोक बकुला रिम्पोछे को आधुनिक लद्दाख का निर्माता कहा था। कुशोक बकुला रिम्पोछे का जन्म 19 मई 1917 में लद्दाख में हुआ था। कुशोक बकुला का असली नाम लोबजंग थुबथन छोगनोर था। असलियत में कुशोक बकुला को भगवान बुद्ध के सोलह अर्हतों में से एक माना जाता है। बकुला भगवान बुद्ध के समकालीन थे और उन्हें बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए स्वयं भगवान बुद्ध ने कहा था। बकुला के उन्नीसवें अवतार को कुशोक बकुला रिम्पोछे के नाम से जाना जाता है।

कुशोक बकुला की शिक्षा-दीक्षा तिब्बत में हुई थी। तिब्बत में कुशोक ने चौदह वर्षों तक बौद्ध धर्म का अध्ययन किया और शिक्षा पूरी की। लद्दाख के साथ-साथ उन्होंने बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार विदेशों में भी किया। लद्दाख के गांव-गांव में जाकर उन्होंने बुद्ध और उनकी शिक्षा को जन-जन तक पहुंचाने का काम किया। भारत के विभिन्न हिस्सों में जाकर उन्होंने बुद्ध के बचनों को लोगों तक पहुंचाया। मंगोलिया जाकर बकुला ने बौद्ध धर्म को फिर से जागृत करने का काम किया। मंगोलिया को ईसाई धर्म के मिशनरियों से बचाकर उन्होंने बौद्ध धर्म की पताका मंगोलिया में लहराने दी। 1996 में ब्रिटेन में मजहबों और पर्यावरण संरक्षण सम्मेलन में भारत से कुशोक बकुला रिम्पोछे और स्वामी चिदानंद गए थे। कुशोक ने इस सम्मेलन में ईसाई मिशनरियों के बारे में काले सच को उजागर किया कि कैसे ईसाई मिशनरी लोगों से जबरन धर्म परिवर्तन करा रहे हैं और ईसाई धर्म कबूल करवाने पर मजबूर कर रहे हैं। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से निवेदन किया की भगवान बुद्ध के दो शिष्यों सारिपुत्त और महामोदगलायन के अस्थि अवशेषों को लद्दाख लाया जाए। इस निवेदन को जवाहर लाल नेहरू ने स्वीकार और महाबोधि सभा की देखरेख में लेह में ले जाया गया। यहां ढ़ाई महीने तक लोगों ने अस्थि अवशेषों के दर्शन किए।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब जम्मू कश्मीर में पाकिस्तान की ओर से गतिविधियां बढ़ गईं तो उन्होंने इस पर चिंता जाहिर की। पंडित जवाहर लाल नेहरू से इस बात को साझा किया। तत्कालीन जम्मू कश्मीर के राजा डॉ हरिसिंह के निर्णय के खिलाफ कुशोक ने नाराजगी जताई थी। हरिसिंह ने जम्मू कश्मीर को अलग देश बनाने की मांग रखी थी। जम्मू कश्मीर को जब भारत का अंग बनाया गया तब कुशोक बकुला ने यह आशंका जताई थी कि पाकिस्तान के कबीले और सेना जम्मू कश्मीर को अस्थिर करने की कोशिश करेंगे। उन्होंने कारगिल को बेहद संवेदनशील इलाका कहा था और लद्दाख को मुख्य धारा से जोड़ने की बात कही थी। कुशोक बकुला लद्दाख की आधारभूत संरचना(fundamental development)बारे में कहते थे। जब वे लद्दाख से विधायक बने तो केवल विधायक ही नहीं बने बल्कि उन्होंने लद्दाख को वो सबकुछ देने की कोशिश की जो एक पिता करता है। शेख अब्दुल्ला की सरकार में उन्हीं की पार्टी से विधायक होते हुए उन्होंने लद्दाख को दी जा रही धनराशि के बारे में प्रश्न उठाया। जम्मू कश्मीर की विधानसभा में उन्होंने लद्दाख को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए आधारभूत संरचना को मजबूत करने, आधुनिक शिक्षा पद्धति लागू करने, विश्वविद्यालय और कॉलेज खोलने की बात कही। इसके साथ-साथ उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार को कभी बाधक नहीं बनने दिया।

लद्दाख में बोली जाने वाली भोटी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में  शामिल करने के लिए संघर्षरत रहे। जम्मू कश्मीर सरकार में विधायक रहते हुए उन्होंने सरकारी कामकाज की भाषा अंग्रेजी और उर्दू का विरोध किया। उनका कहना था कि अंग्रेजी और उर्दू दोनों कश्मीर की भाषा नहीं हैं इसकी जगह पर डोगरी,कश्मीरी या भोटी को शामिल किया जाना चाहिए। कुशोक बकुला कहते थे कि भोटी भाषा लद्दाख से अरुणाचल तक बोली जाती है और इस भाषा को बोलने वालों की संख्या 5 लाख है। अरुणाचल सरकार ने बाद में भोटी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए एक प्रस्ताव भी पारित किया था। ऐसा नहीं था कि उन्होंने और प्रयास नहीं किए। जब वे सांसद बने तो उन्होंने संसद में इस मुद्दे के साथ-साथ लद्दाख के विकास के मुद्दे को भी उठाया था। संसद के सदन में कुशोक बकुला ने उन रुपयों का जिक्र भी किया जो लद्दाख के विकास के लिए भेजे जाते थे। उनका कहना था कि लद्दाख के लिए जो धनराशि जारी की जाती है वो धनराशि लद्दाख तक पहुंचती नहीं है।

तिब्बत के जनसामान्य के बीच दलाई लामा का जितना महत्व है ठीक उसी तरह लद्दाख वासियों के लिए कुशोक बकुला रिम्पोछे का महत्व था। कुशोक बकुला के जीवन में तिब्बत का विशेष स्थान था। तिब्बत में उन्होंने शिक्षा-दीक्षा ग्रहण की और जीवन जीने की कला भी उन्होंने तिब्बत से ही सीखी थी। कुशोक बकुला, चौदहवें दलाई लामा के बारे में चिंतित रहते थे। सन 1956 में भारत सरकार ने भगवान गौतम बुद्ध की 2500वीं जयंती मनाने का निर्णय लिया। इस अवसर पर भारत सरकार ने एक प्रतिनिधिमंडल का गठन किया। इस प्रतिनिधिमंडल का काम था तिब्बत जाकर दलाई लामा और पंचेन लामा का समारोह के लिए आमंत्रित करना। इस प्रतिनिधिमंडल का अध्यक्ष कुशोक बकुला रिम्पोछे को बनाया गया। कुशोक हमेशा से ही तिब्बत की सलामती के बारे में सोचते थे। कुशोक बकुला तिब्बत को एक राष्ट्र के रूप में देखना चाहते थे। उनका कहना था कि यदि तिब्बत एक राष्ट्र के रूप में उभरता है तो यह चीन और भारत के बीच बफर जोन की तरह काम करेगा। वे हमेशा चीन की तरफ से आने वाले संकट की ओर इशारा करते थे। शायद उन्हें पहले ही ज्ञात हो गया था कि चीन ,भारत के विरुद्ध युद्ध छेड़ कर कायराना हरकत करेगा। सन् 1959 में तिब्बत में हालात बेहद नाजुक हो गए थे। चीन सरकार जबरदस्ती तिब्बत वासियों को नास्तिकता की ओर धकेल रही थी। इसी समय चौदहवें दलाई लामा को भारत लाया गया।

दलाई लामा और उनके साथ आए अनुयायियों को बसाने की जिम्मेदारी कुशोक बकुला ने अपने हाथ ले ली थी। सरकार की तरफ से तिब्बतियों को बसाने के लिए 1200 एकड़ जमीन दी गई। कुशोक बकुला रिम्पोछे ने  तिब्बतियों को जल्द से जल्द बसाने का काम करने के लिए उन्होंने भारत सरकार को पत्र लिखा। कुशोक बकुला, दलाई लामा के साथ कई बौद्ध समारोह में हिस्सा लिया। दलाई लामा और कुशोक बकुला साथ में मंगोलिया भी गए थे। दलाई लामा ने वहां पर ईसाई मिशनरी द्वारा किए जा रहे कार्य की सराहना की लेकिन कुशोक बकुला इस व्यक्तव्य के साइड इफेक्ट को समझ गए थे। उन्हें पता था कि दलाई लामा की बात का ईसाई मिशनरी फायदा उठाएंगे। ऐसा इसलिए था क्योंकि साम्यवादी विचारों को मंगोलिया पर थोपा जा रहा था। चीन, मंगोलिया को ईनर मंगोलिया कहकर चीन का हिस्सा का बताता था।

जब मंगोलिया के वे राजदूत बने तो उन्होंने अपने आपको दूसरा भिक्खू कहकर संबोधित किया। भारत से पाकिस्तान और चीन के रिश्ते हमेशा ठीक नहीं रहे। सन् 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण करके लद्दाख का कुछ हिस्सा छीन लिया। इस हिस्सा को चीन, अक्साई चीन कहता है। कुशोक बकुला ने हमेशा से चीन तरफ से आने वाले संकट की ओर इशारा किया था। वहीं वे आतंरिक शांति पर जोर देते थे। कुशोक बकुला का कहना था कि शांत रहकर बड़े से बड़ा काम किया जा सकता है। शेख अब्दुल्ला की सरकार में विधायक रहते हुए उन्होंने जम्मू कश्मीर विधानसभा में लद्दाख के संदर्भ में जोरदार भाषण दिया। कुशोक बकुला का भाषण भोटी भाषा में था। इस भाषण का सदन के कई सदस्यों ने भाषण की भाषा को लेकर सवाल उठाया। कुशोक बकुला ने इस भाषण में लद्दाख के विकास को लेकर शेख अब्दुल्ला सरकार को जो लताड़ लगाई उससे तो स्वयं शेख अब्दुल्ला को बगले झांकने पर मजबूर होना पड़ा। शेख अब्दुल्ला ने जम्मू कश्मीर में एक कानून बनाया जिसमें कोई भी 22 एकड़ से ज्यादा जमीन नहीं रख सकता था। इस कानून का कुशोक बकुला ने विरोध किया। इस कानून से मोनेस्ट्री का नुकसान होता।

भगवान गौतम बुद्ध की 2545वीं जयंती पर लद्दाख में कार्यक्रम का आयोजन किया गया। पूरे देश से लोग कुशोक बकुला से मिलने और आशीर्वाद लेने आए। अपनी आखिरी मंगोलिया यात्रा के दौरान उन्हें निमोनिया हो गया। मंगोलिया में ट्रीटमेंट और अस्पताल की ठीक व्यवस्था ना होने के कारण उन्हें एयर एंबुलेंस से चीन की राजधानी बीजिंग ले जाया गया। बीजिंग में कुशोक बकुला की तबीयत सुधरने के जगह और बिगड़ने लगी। कुशोक बकुला को बीजिंग से नई दिल्ली लाया गया और एम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया। समय को जो मंजूर होता है वही होता है। दिल्ली आने के बाद भी कुशोक बकुला की तबीयत सुधरी नहीं और चीवरधारी यह प्रखर व्यक्तिव्य इस दुनिया को छोड़कर चले गया।


📃BY_vinaykushwaha 

सोमवार, 29 अप्रैल 2019

चुनाव आयोग की लाठी में आवाज नहीं होती है...




भारत में चुनाव आयोग एक महत्वपूर्ण संस्था है। चुनाव आयोग भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 से 329 के तहत काम करता है। संविधान के तहत काम करने के कारण न्यायपालिका, कार्यपालिका और व्यवस्थापिका को चुनाव आयोग की बातों पर गौर करना होता है। चुनाव आयोग का सबसे महत्वपूर्ण कार्य देश में समय-समय पर चुनाव करवाना और राजनीतिक दलों को चुनाव चिन्ह देने के साथ-साथ उन्हें राष्ट्रीय,क्षेत्रीय और राज्य की राजनीतिक पार्टियों में विभाजित करना है। चुनाव आयोग को लोग कई बार बिना दांत का शेर कह देते हैं क्योंकि चुनाव आयोग दहाड़ तो देता है लेकिन कार्रवाई नहीं करता है। चुनाव के समय चुनाव आयोग का महत्व बढ़ जाता है। ये काफी हद सही है। 2019 आम चुनाव में चुनाव आयोग की कार्रवाई को देखकर तो बिल्कुल नहीं लगता कि चुनाव आयोग बिना दांत का शेर है।

चुनाव आयोग ने 2019 के आम चुनाव में बता दिया कि उसके पास क्या अधिकार हैं और वह क्या कर सकता है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जीवन पर बनी फिल्म पर चुनाव आयोग ने रोक लगी दी। चुनाव आयोग का कहना था कि इससे एक पार्टी विशेष को फायदा होगा। जब फिल्म पर रोक लगाई गई तो फिल्म के निर्माता सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। सुप्रीम कोर्ट में निर्माताओं ने यह दलील दी की चुनाव आयोग ने बिना फिल्म देखे फिल्म पर रोक लगा दी। इस पर सु्प्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा कि आपको फिल्म देखना चाहिए। चुनाव आयोग के अधिकारियों ने फिल्म देखी और फिल्म के कुछ डायलॉग पर आपत्ति जता दी। आखिरकार परिणाम क्या हुआ? फिल्म पर बैन बरकरार है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि चुनाव आयोग द्वारा फिल्म पर रोक लगाई है इसमें कोई दखल नहीं दे सकते। यानि फिल्म अब 19 मई के बाद ही रिलीज होगी।

बात केवल फिल्म की नहीं है बल्कि वेब सीरीज और ऑनलाइन टीवी की भी है। चुनाव आयोग ने तमाम वेबसाइट पर उपलब्ध प्रधानमंत्री से संबंधित फिल्म जो वेबसाइट पर हैं उन पर भी बैन लगा दिया है। इसके अलावा नमो टीवी पर आंशिक बैन लगा दिया। इस टीवी  में लाइव प्रोग्राम का प्रसारण किया जा सकता है लेकिन मतदान से 48 घंटे पहले तक किसी भी प्रकार के रिकॉर्डेड प्रोग्राम का प्रसारण नहीं कर सकते। नमो टीवी एक ऑनलाइन टीवी चैनल है जिस पर प्रधानमंत्री के भाषण और बीजेपी से जुड़ी जानकारियां प्रसारित की जाती हैं। इन सब पर बैन लगाकर जता दिया की चुनाव आयोग क्या कर सकता है? इसके अलावा ममता बनर्जी पर बनी फिल्म 'बाघिनी' के ट्रेलर पर चुनाव आयोग ने रोक लगा दी। ममता बनर्जी पर बनी फिल्म का ट्रेलर पांच वेबसाइट पर रिलीज होना था।

हाल ही में आयकर विभाग ने दिल्ली और मध्यप्रदेश के कई ठिकानों पर आयकर छापेमारी की। इसे विपक्षी दल कांग्रेस ने बदले की कार्रवाई कहा। चुनाव आयोग ने इस पर संज्ञान लेते हुए आयकर विभाग से कहा कि किसी भी छापेमारी से पहले चुनाव आयोग को इस बाबत जानकारी दे। इस पर आयकर विभाग ने कहा कि हमें इस बात की जानकारी है कि आदर्श आचार संहिता के दौरान चुनाव आयोग को लूप में लिया जाना है। इस पर चुनाव आयोग ने कहा कि जब आपको जानकारी थी तो आपने इसका पालन क्यों नहीं किया?

चुनाव आयोग इस बार सख्ती बरतने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। सोशल मीडिया पर होने वाले प्रचार पर भी चुनाव आयोग की गिद्ध दृष्टि है। चुनाव आयोग का कहना है कि राजनीतिक पार्टियों द्वारा सोशल मीडिया पर प्रचार के लिए खर्च की गई राशि को भी जोड़ा जाएगा। ऐसा करना चुनाव आयोग ने अनिवार्य कर दिया है। यदि कोई राजनीतिक पार्टी या राजनेता चुनाव आयोग का कहना नहीं मानते तो उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। चुनाव आयोग ने 628 कंटेंट सोशल मीडिया से हटाए। इन कंटेंट में सबसे ज्यादा 574 फेसबुक पेज हैं। गूगल, फेसबुक, व्हाट्एप चुनाव प्रचार के लिए प्राथमिकता की सूची में हैं। चुनाव आयोग ने भी इन सोशल साइट्स को भी निर्देश दिया है कि ऐसी किसी भी प्रकार का कंटेंट अपनी साइट्स में ना रखें जिससे चुनाव प्रचार के साथ-साथ वैमनस्यता फैलाई जा रही हो।

तेलंगाना के 62 उम्मीदवारों ने अपनी संपत्ति का सही ब्यौरा नहीं दिया तो चुनाव आयोग ने उनका नामांकन ही रद्द कर दिया। नामांकन में विसंगतियां पाए जाने के बाद चुनाव आयोग ने कई उम्मीदवारों के नामांकन रद्द कर दिए हैं। नामांकन रद्द करने के पीछे कारण केवल चुनाव आयोग द्वारा अपनी उपस्थिति दर्ज कराना नहीं है बल्कि चुनाव प्रक्रिया को 'स्पष्ट और निष्पक्ष' बनाना है। चुनाव आयोग ने cVIGIL नाम से गूगल प्ले स्टोर पर एक एप उपलब्ध कराई है। इस एप की सहायता से आप जिस निर्वाचन क्षेत्र में रहते हैं उस निर्वाचन क्षेत्र के बारे में शिकायत कर समाधान पा सकते हैं। यदि आपके क्षेत्र में किसी उम्मीदवार ने आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन किया है तो उसकी फोटो खींचकर या वीडियो बनाकर चुनाव आयोग को सूचित कर सकते हैं। यदि आपको किसी भी प्रकार की सहायता या शिकायत करनी है तो आप चुनाव आयोग के नंबर 1950 पर कॉल कर सकते हैं। भारत के आम चुनाव कोई आम चुनाव नहीं होते बल्कि यह विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का पर्व होता है। चुनाव आयोग इस चुनाव को वोटर फ्रेंडली बनाना चाहता है।

कई बार कहा जाता है कि अक्सर बड़ी मछलियां जाल में नहीं फंसती हैं, हमेशा छोटी मछलियों को ही त्याग करना पड़ता है। चुनाव के दौरान जितनी बदजुबानी होती है शायद ही और कभी होती हो। चुनाव के दौरान बड़े-बड़े नेता कुछ भी बोलकर निकल लेते थे। इस बार चाहे मछली छोटी हो या बड़ी सभी पर शिकंजा कसा है। इस बार चुनाव आयोग ने बीजेपी, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी के नेताओं की बोलती बंद की है। चुनाव आयोग ने मायावती, मेनका गांधी, आजम खान, नवजोत सिंह सिद्धू, जया प्रदा, सतपाल सिंह
सत्ती, योगी आदित्यनाथ, मिलिंद देवड़ा आदि पर कार्रवाई की। आयोग ने केवल कार्रवाई ही नहीं की बल्कि 48 से 72 घंटे का बैन लगाकर बता दिया की चुनाव आयोग क्या कर सकता है। बैन के दौरान इन नेताओं को रैली करने, प्रेस कॉन्फ्रेंस करने, सोशल मीडिया में प्रचार करने, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से प्रचार करने पर रोक थी। चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले के अणुव्रत मंडल को नजरबंद करने का आदेश दे दिया। अणुव्रत को नजरबंद करने के पीछे केवल इतना कारण था कि वह एक बाहुबली नेता है और मतदान के समय अड़चनें पैदा कर सकता है।

भारत में चुनाव आयोग को मामूली सा विभाग समझ लिया जाता है। आज के परिदृश्य में देखें तो चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा को धन्यवाद कहना चाहिए। मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपनी गरिमा के अनुसार काम किया है। सुनील अरोड़ा ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषन की याद को ताजा कर दिया। शेषन ने चुनाव आयुक्त के पद पर रहते हुए बहुत से सुधार किए और कई बेहतरीन मिसालें पेश की। शेषन ने मुख्य चुनाव आयुक्त रहते 17 सूत्रीय मांग भारत सरकार के सामने रखी। शेषन ने साफ-साफ कहा कि देश में तब तक चुनाव नहीं होंगे जब तक 17 सूत्रीय मांग पूरी नहीं कर ली जाती हैं। शेषन ने तो चुनाव आयोग को भारत सरकार का अंग मानने से मना कर दिया था। शेषन कहते थे कि अब मुख्य चुनाव आयुक्त कानून मंत्री के ऑफिस के बाहर मीटिंग के लिए समय की आशा में नहीं बैठेगा।   


📃BY_vinaykushwaha

बुधवार, 24 अप्रैल 2019

ये चुनावी बदजुबानी....



बोया पेड़ बबूल का आम कैसे फरें? ये कहावत हम बचपन से सुनते हुए आ रहे हैं। भारतीय राजनीति में सबकुछ बहुत जल्दी बदल जाता है। नेता अपने वादों से मुकर जाते हैं और उनकी नीयत पार्टी से बदल जाती है। चुनाव आते ही सारे नेता जुबानी जंग में इस तरह तैयार होकर निकलते हैं जैसे उन्हें किसी किले को फतह करना हो। किला फतह हो ना हो पर एक बात उनके साथ अच्छी हो जाती है कि वे फेमस हो जाते हैं। फेमस हैं तो और फेमस हो जाते हैं। प्रधानमंत्री से लेकर छोटे से उम्मीदवार तक जुबानी जंग इतनी बदजुबानी हो जाती है कि लगता है कि ये नेता एक-दूसरे के खून के प्यासे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राहुल गांधी को नामदार  के नाम से बुलाते हैं। जब एक इंटरव्यू में उनसे पूछा जाता है कि वे राहुल गांधी को उनके नाम से क्यों नहीं बुलाते हैं? प्रधानमंत्री की ओर से जवाब मिलता है कि इससे आपको क्या तकलीफ है? सर हमें तकलीफ क्यों होगी? हम पत्रकार की जमात हैं। हमें सवाल पूछने की आदत है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महागठबंधन को महामिलावटी तक कहते हैं। यूपी में बीएसपी, एसपी और आरएलडी का गठबंधन हुआ तो पीएम मोदी ने इसे संक्षिप्त रूप से 'सराब' कहा। सराब को उन्होंने कही ना कही शराब से जो़ड़ना चाहा। इस जुबानी जंग में अकेले प्रधानमंत्री नहीं हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है।

राहुल गांधी तो एक कदम आगे निकलते हुए प्रधानमंत्री को चोर ही कह दिया। राहुल गांधी ने ‘चौकीदार चोर है’  का नारा गढ़ा। राहुल गांधी  अपनी हर रैली में मंच से खड़े होकर बोलते है कि चौकीदार, जनता के बीच से आवाज आती है कि चोर है। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका जवाब ऐसे दिया कि वे मंच से बोलते है कि फिर एक बार, जनता के बीच से आवाज आती है ‘मोदी सरकार’।

राजनीति में दोस्ती और रिश्तेदारी कितने दिन टिकेगी ये कहना मुश्किल होता है। कांग्रेस प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी कुछ दिन पहले तक बीजेपी और शिवसेना के खिलाफ खुलकर बोलती थीं। आज शिवसेना में शामिल होकर राजनीति में ताल ठोक रही हैं। आजम खान और जया प्रदा राजनीति के आकाश में तब नजर आए जब आजम खान ने जया प्रदा के बारे में ऐसे शब्द बोले कि मैं यहां लिख नहीं सकता। मर्यादा कहा रह गई है। ये वही आजम खान हैं जिन्हें जया प्रदा को राजनीति में लाने का श्रेय जाता है।

हिमाचल प्रदेश के बीजेपी अध्यक्ष सतपाल सिंह सत्ती भी इतनी महान आत्मा है कि चुनावी मंच से गाली देने में नहीं डरते। इतनी अश्लील भाषा का उपयोग करते हैं कि मैं वो शब्द यहां लिख नहीं सकता। राहुल गांधी को गाली सूचक शब्दों से पुकारना या कहना कितना सही है?

केंद्र सरकार में मंत्री महेश शर्मा तो व्ययंग में विश्वास रखते हैं। प्रियंका गांधी के राजनीति में पदार्पण करने और कांग्रेस की उपाध्यक्ष बनने पर ऐसा कुछ कह दिया कि सुर्खियां बन गईं। महेश शर्मा ने कहा- अभी तक राजनीति में पप्पू था अब पप्पू की पप्पी भी आ गई। यह कहना उचित है? मेरे हिसाब से तो बिल्कुल उचित नहीं है।

उदाहरणों की कमी मेरे पास तो नहीं है। महागठबंधन के फतेहपुर सीकरी से प्रत्याशी गुड्डू पंडित भी किसी से पीछे नहीं हैं। गुड्डू पंडित कहते हैं कि राज बब्बर के .....और उसकी नचनियां को दौड़ा-दौड़ाकर चप्पलों से पीटूंगा, यदि समाज में झूठ फैलाया तो गंगा मां की सौगंध चप्पलों से पीटूंगा।

भोपाल से बीजेपी प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा कहती हैं कि मुंबई हमले में शहीद हेमंत करकरे को मेरा श्राप लगा इसलिए मारे गए। साध्वी प्रज्ञा ने बाद में सफाई दी कि हेमंत करकरे ने मुझे जेल में प्रताड़ित किया इसलिए मैंने ऐसा कहा। बिहार के बक्सर से सांसद और फिर से बीजेपी उम्मीदवार अश्विनी चौबे भी गजब करते हैं। लालू यादव की पत्नी और बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी को कहते हैं कि, राबड़ी जी भाबी हैं उन्हें घूंघट में रहना चाहिए। इस पर राबड़ी देवी ने जवाब दिया कि उनकी पार्टी की कितनी महिला नेता घूंघट में रहती हैं, पहले उन्हें घूंघट में रहने के लिए बोलिए। अश्विनी चौबे बयानवीर हैं। उनका एक और बयान हवा में तैर रहा है कि मुझे कलेक्टर का बुखार उतारना आता है। इन बयानों से क्या होगा? राजनीति में थोड़ी प्रसिद्धि जरूर मिल जाएगी लेकिन बाद में आप एक दागदार की तरह दिखने लगेंगे। ना तो आप कामदार रह जाएंगे और ना ही नामदार।

मेरठ से बीजेपी उम्मीदवार राजेंद्र अग्रवाल कहते हैं कि शहीद हेमंत करकरे कैसे ATS चीफ थे जो बिना तैयारी के आतंकियों से लड़ने गए। बाद में सफाई देते हुए कहते हैं कि मेरे ट्विटर हैंडल का दुरुपयोग करके किसी ने ट्वीट किया। एक कहावत है प्यार और जंग में सब कुछ जायज है। आज नेताओं ने राजनीति को लड़ाई का अखाड़ा बना दिया है। इस अखाड़ा में धर्म को हथियार बनाकर लड़ा जाता है। इस चुनाव में भगवान हनुमान को राजनीति में लाकर खड़ा कर दिया। एक तरफ भगवान हनुमान की जाति बताई जाती है वहीं दूसरी ओर जाति के आधार पर वोट मांगा जाता है। बेगूसराय से बीजेपी प्रत्याशी गिरिराज सिंह SP नेता आजम खान से
कहते हैं कि एक बार बेगूसराय का चुनाव खत्म हो जाए फिर हम रामपुर आकर बताएंगे कि हनुमान क्या हैं? भगवान के नाम पर डराया जाता है।

आजम खान के किस्से यहीं खत्म नहीं होते। आजम खान तो मतदाताओं को गद्दार कहने से नहीं चूकते। आजम खान की की भाषा में विपक्षी जो उन पर बयानबाजी करते हैं वे गंदगी खाने के बराबर वाला काम करते हैं। वे कहते हैं कि यदि गंदगी खाना है तो चांदी का वर्क लगाकर मत खाओ, गंदगी खाना है तो सीधे खाओ। आजम खान के सुपुत्र तो और आगे निकलकर कहते है कि, ‘हमें अली भी चाहिए और बजरंगबली भी चाहिए लेकिन अनारकली नहीं चाहिए’। ऐसी कौन सी राजनीति है जो इस तरह की भाषा बोलने पर मजबूर करती है।

आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तरह-तरह की उपमाओं से नवाजा जाता है। कांग्रेस और उसके सहयोगी दल तरह-तरह के शब्दों का उपयोग करते हैं। हिटलर, हत्यारा, और चोर आदि तक की संज्ञा दी गई। बीजेपी ने तो पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को मौन-मोहन तक कहा। एक कांग्रेस नेता ने तो MODI का नया मतलब M = मसूद अजहर, O = ओसामा, D = दाउद, I = आईएसआई बताया। यह मतलब किस हद तक सही है। यह तय करना जनता का काम है। जहां तक बदजुबानी की बात है तो जनता का निर्णय सर्वोपरि होता है। चुनाव नेताओं के बीच होता है लेकिन जीत उसी की होती है जिसे जनता पसंद करती है।

 मैंने इस लेख की शुरुआत में एक कहावत लिखी थी कि बोया पेड़ बबूल का तो आम कैसे फरें। इस कहावत के लिखने का मतलब था कि आप अपने उम्मीदवार का चयन सावधानी से करें ताकि बाद में आपको पछताना ना पड़े।

BY_vinaykushwaha

सोमवार, 1 अप्रैल 2019

जाति का विनाश कितना जरूरी है?

जात-पात तोड़ दो, तिलक-दहेज छोड़ दो।समाज के प्रवाह को नयी दिशा में मोड़ दो। यह उद्बोधन जेपी ने अपने आंदोलन के समय दिया था। जात-पात तोड़ दो, यह बात सबको आकर्षित करती है क्योंकि भारत में निम्न जाति के लोगों ने कभी न कभी जातिवाद का दंश झेला ही है। मैंने कुछ समय पहले एक किताब पढ़ी थी जिसका नाम "जाति का विनाश" है। यह किताब "Annihilation of caste" का हिंदी रूपांतरण है। इस किताब को बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने लिखी है। दरअसल यह एक किताब की शक्ल में भाषण का संकलन है। इस किताब में उसी भाषण का जिक्र किया गया है जिसे जात-पात तोड़क मंडल ने उन्हें देने नहीं दिया। जात-पात तोड़क मंडल का कहना था कि आंबेडकर जी का भाषण जाति व्यवस्था के बहिष्कार से ज्यादा हिंदू धर्म का अपमान है। जब कार्यक्रम रद्द हो गया तो आंबेडकर ने अपने भाषण को किताब की रूपरेखा में ढ़ाल  दिया। उन्होंने बताया कि उन्हें क्यों भाषण देने नहीं दिया गया? उनका कहना था कि जब मुझे अपने शब्दों को कहने की आजादी नहीं है तो मैं भाषण देने क्यों जाऊं?

जाति का विनाश किताब में बताया गया है कि कैसे जाति और जाति व्यवस्था हिंदू धर्म और मानने वाले लोगों के लिए अभिशाप है। उच्च जाति के लोग किस तरह निम्न जाति के लोगों पर कहर बरपाते हैं। आंबेडकर ने अपनी किताब में बताया कि कैसे जाति व्यवस्था भारत में आया और अब जड़ों तक समा चुका है। वैदिक सभ्यता के समय इस तरह के साक्ष्यों को पहली बार देखा गया था। उत्तर वैदिक काल में निम्न जाति को वेद आदि पढ़ने की अनुमति नहीं थी। जहां ऋग्वैदिक काल में व्यक्ति अपनी सुविधानुसार अपनी जाति बदल सकता था वहीं उत्तर वैदिक काल में यह व्यवस्था बदल गई। वैदिक काल में चार वर्णों वाली व्यवस्था अस्तित्व में आई थी उसने और विकराल रूप धारण कर लिया। वैदिक काल के बाद धीरे-धीरे जातीयता अन्य मुद्दों पर हावी होने लगी। ब्राह्मणवाद का विस्तार हिन्दू धर्म की नींव का हिलाने वाला था। किताब मैं बताया गया है कि वर्ण व्यवस्था में तिरस्कार केवल शूद्र को ही उठाना पड़ा है। किताब में महार जाति के बारे में बताया गया है कि कैसे उनके साथ गलत व्यवहार किया जाता था? जब महार जाति का कोई व्यक्ति  सड़क से निकलता था तो उसे कमर में झाड़ू बांधने और गले में एक मटका बांधने की सख्त हिदायत दी जाती थी। इस तरह की हिदायत देने का मतलब यह था कि सड़क गंदगी न हो। लेकिन इन सबके पीछे मुख्य कारण अपने वर्ण को सर्वश्रेष्ठ साबित करना था।

आंबेडकर ने अपनी आपबीती बताते हुए लिखा है कि कैसे  उनके साथ बचपन से लेकर नौकरी के समय तक छुआछूत किया जाता था। जहां बचपन में उन्हें स्कूल में अन्य बच्चों के साथ बैठने नहीं दिया जाता था और दिनभर उन्हें प्यासा रखा जाता था। जब उनकी नौकरी वडोदरा में लगी तो वहां नौकर उन्हें फाइल्स फेंक कर देता था और दिनभर प्यासा रखा जाता था। किताब में उन्होंने विभिन्न प्रकार के आंदोलन का जिक्र किया जिसमें सबसे महत्वपूर्ण महाड़ सत्याग्रह था। इसमें उन्होंने गांव के शूद्र जाति के लोगों के साथ जाकर तालाब के पानी को पिया और आचमन किया। किताब में एक मंदिर, एक कुंआ की बात लिखी हुई है। यह बात दर्शाती है कि कैसे निम्न जाति के लोगों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता था।

किताब में केवल जाति व्यवस्था जैसी कुरीति पर जमकर कटाक्ष किया गया है। इस किताब में पूना पैक्ट 1932 के बारे में जिक्र किया गया है। यह समझौता महात्मा गांधी और आंबेडकर के बीच हुआ था। इस समझौते में आंबेडकर ने महात्मा गांधी की बात मानी और "Depressed class" (दमित वर्ग) को चुनाव में दिए जाने वाले आरक्षण को वापस ले लिया। इससे आंबेडकर दुखी हुए क्योंकि वे दलितों को उनका हक दिलाना चाहते थे। इस किताब में कई संदर्भ दिए गए हैं जब आंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच तीखी बहस होती थी। महात्मा गांधी  अपने समाचार पत्र हरिजन में जाति व्यवस्था पर लेख लिखते थे। इन्हीं लेखों की आलोचना आंबेडकर पत्र व्यवहार के माध्यम से करते थे। इस पत्र का जवाब महात्मा गांधी भी मूकनायक में प्रकाशित लेख को आधार बनाकर देते थे। आंबेडकर अनुसूचित जाति वर्ग के लोगों को "Depressed class" कहते थे जबकि महात्मा गांधी हरिजन शब्द का उपयोग किया करते थे। इस किताब से स्पष्ट होता है कि कहीं न कहीं अनुसूचित जाति को अधिकार प्राप्त न होने के पीछे महात्मा गांधी को जिम्मेदार मानते थे।

आंबेडकर ने जहां अपनी किताब में आर्य समाज और स्वामी दयानंद सरस्वती की तारीफ की है। इसके अलावा उन्होंने राजा राममोहन राय की तारीफ की है क्योंकि उन्होंने समाज को कुरीतियों से मुक्त कराने लिए बहुत से काम किए। आंबेडकर ने दूसरी ओर हिन्दू धर्म में व्याप्त कुरीतियों छुआछूत, बाल-विवाह, सती प्रथा, अंतर जातीय विवाह पर प्रतिबंध के मामले पर जमकर लताड़ लगाई। किताब में डॉ आंबेडकर ने तो यहां तक लिख दिया कि हिन्दू धर्म की जाति व्यवस्था की वजह से भारत में अन्य धर्मों में जाति व्यवस्था के बीज फूट पड़े हैं। किताब में एक जगह यह भी लिखा है कि जातिवाद और वर्ण व्यवस्था का आरोप मनु पर नहीं लगा सकते हैं क्योंकि उसने तो जाति की एक व्यवस्था तैयार की थी

अपनी किताब में डॉ आंबेडकर ने विदेशी लोगों को भी नहीं छोड़ा उन्होंने उनकी भी जमकर खिंचाई की। रंगभेद में उनसे आगे कोई नहीं है। वे काले और गोरे में भेद करते हैं। ऐसा कहना था डॉ बाबासाहेब आंबेडकर का।
आपत्ति:- डॉ आंबेडकर ने जाति व्यवस्था जैसी कुरीति को केवल हिन्दू धर्म के साथ जोड़ा जबकि यह आधा सत्य है। अन्य धर्मों में भी जाति और वर्गों की प्रधानता है। ईसाई धर्म कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट, एवनजीलक, आर्थोडॉक्स आदि शाखाओं में बंटा हुआ है। इन सभी के अलग-अलग चर्च होते हैं और ये एक-दूसरे के चर्च में नहीं जाते। यही हाल मुस्लिम धर्म का भी है। बौद्ध धर्म भी मुख्यतया दो भागों में विभाजित है हीनयान और महायान। जातिवाद का सारा दोष हिन्दू धर्म पर मढ़ना गलत है। 
एक बार जरूर इस किताब को पढ़ें और निष्कर्ष पर पहुंचें।
BY_vinaykushwaha

रविवार, 11 नवंबर 2018

"अवनी" पर राजनीति क्यों?

"कोई बाघ आदमखोर खुद से नहीं बनता है बल्कि उसे मजबूरी में आदमखोर बनना पड़ता है।" यह पंक्ति है मशहूर बाघ संरक्षक जिम कार्बेट की। जिम कार्बेट को बाघों का संरक्षक कहा जाता है। जिम के साथ एक विरोधाभास जुड़ा हुआ है कि उन्होंने 33 बाघ-बाघिन को मारा था। इनमें मैन ईटर ऑफ कुमाऊं भी शामिल है। इस मैन ईटर ने 435 आदमियों को मारा था। अपनी किताब मैन ईटर ऑफ कुमाऊं में उन्होंने इस बात का जिक्र किया था। जिम की छवि एक अच्छे व्यक्ति के रुप में है क्योंकि उन्होंने आदमखोरों के आतंक से मुक्ति दिलाई थी। लेकिन बाद में उन्होंने बंदूक की जगह कलम को उठा लिया था। वे इस बात से वाकिफ थे कि हिमालय में बाघों की संख्या कम होने का मतलब है कि पारिस्थितिकी तंत्र में गड़बड़ी होना है। जिम कार्बेट लेखक और दार्शनिक भी रहे हैं। उन्हीं के नाम पर उत्तराखंड के राष्ट्रीय पार्क का नाम जिम कार्बेट नेशनल पार्क है। इसी नेशनल पार्क से प्रोजेक्ट टाइगर मिशन की शुरुआत की गई थी।

तारीख 2 नवंबर 2018 सभी को वैसे तो पता होगी लेकिन यह एक ऐसा दिन जिस दिन से सभी को पशुओं के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया है। लोग अब यह भी सोचने लगे हैं कि जानवरों को क्यों मारा जा रहा है। मैं बात कर रहा हूं बाघिन 'अवनि' की। कई लोग बाघिन अवनि को अवनी लिख रहे हैं। इस बाघिन का अाधिकारिक नाम टी-1 है। बाघिन अवनी को मार दिया गया। अवनी पर आरोप था कि उसने दो सालों में 14 लोगों की जान ली है। अवनी को मारने के लिए बकायदा वन विभाग से 100 लोगों की टीम को तैयार किया गया। पांढरकवड़ा के जंगल में बाघिन को खोजने के लिए गोल्फर ज्योति रंधावा के खोजी कुत्तों को बुलाया गया। पेड़ों आदि पर कैमरों का कड़ा पहरा लगा दिया गया। बाघिन को चारा देने के नाम पर नकली भेड़-बकरियों को बांधा गया। अमेरिकी से विशेष प्रकार का इत्र मंगाया गया ताकि बाघिन आकर्षित होकर जल्द से जल्द घने जंगलों से निकलकर खुले मैदान में आ जाए।

सारे जाल बिछा दिए गए बस अब बाघिन का फंसना बाकी  था। बाघिन आई और जाल में फंस गई। हैदराबाद से शार्प शूटर शाफत अली खान को बुलाया गया था। शाफत के पास एक लंबा अनुभव था कि कैसे जानवर को मारा जाता है। उनके दादा भी यही काम करते थे। वन विभाग के अनुसार शाफत को मुख्य रुप से बाघिन को ट्रैंकुलाइज  करने के लिए बुलाया गया था। अवनी जैसे ही थोड़े खुले हिस्से में आई तो उसे पहले ट्रैंकुलाइज गन से टैंकुलाइज्ड किया गया फिर उसे 10 मीटर दूर से पिछले हिस्से में गोली मार दी गई। आखिरकार आदमखोर बाघिन का अंत हो गया। यह बाघिन अवनी की दुखद अंत की कहानी है।

असली कहानी तो अवनी की मौत के बाद शुरू होती है। अवनी की मौत के बाद कई पशुप्रेमी और राजनेता सामने आए और उन्होंने जमकर इस बात का विरोध किया की अवनी की हत्या की गई है। अवनी की मौत से पहले कई पशु प्रेमियों और एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका देकर अवनी पर दया दिखाकर जीवनदान की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने दया याचिका को यह कहते हुए नकार दिया था कि चीफ लाइफ वार्डन ने यह स्वीकार किया है कि अवनी पर कार्रवाई जरुरी है। अब आते हैं राजनीति पर। केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने महाराष्ट्र के सीएम देवेन्द्र फडणवीस को पत्र लिखकर महाराष्ट्र के वन मंत्री सुधीर मुनगंटीवार को बर्खास्त करने की मांग की। आपको यहां बताते चलें कि मेनका गांधी की छवि एक पशु प्रेमी की है, वे कई सालों से पशुओं के संरक्षण में काम  रही हैं। मेनका गांधी शायद भूल गई थी कि केन्द्र में उनकी सरकार और महाराष्ट्र में एनडीए नीत सरकार फिर पत्र की औपचारिकता क्यों? इसके बाद सुधीर मुनगंटीवार ने उल्टा मेनका गांधी पर आरोप लगाते हुए कहा कि वे भी तो फर्जी बाबा के पास जाती हैं। मुझे नहीं लगता है कि इतने संवेदनशील मुद्दे पर ऐसी बात उछालने की जरूरत थी।

बात यदि महाराष्ट्र की हो और शिवसेना का जिक्र ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता। शिवसेना ने सरकार पर आरोप मढ़ दिया की सरकार ने अवनी की हत्या की है। मनसे भी कहां पीछे रहने वाली थी। राज ठाकरे ने अवनी पर बयान दे दिया। सबसे आखिर में एंट्री हुई कांग्रेस की। मुंबई से पूर्व सांसद संजय निरुपम ने इस सारे मामले को हगणदारी प्रथा से जोड़ दिया। हगणदारी प्रथा, महाराष्ट्र में खुले में शौच मुक्त करने के अभियान से जुड़ा है। संजय निरुपम ने हगणदारी प्रथा का जिक्र इसलिए किया क्योंकि वे बताना चाहते थे कि चंद्रपुर में जंगल में शौच करने गई महिला को बाघ ने मार दिया। अब बात अवनी की मौत से हगणदारी तक पहुंच गई। इस पर महाराष्ट्र के वन मंत्री सुधीर मुनगंटीवार कहते हैं कि अवनी की मौत पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। अरे साहब असली राजनीति की शुरुआत तो आपने ही की थी।

11 नवंबर को 168 संस्थाओं ने कैंडल मार्च निकालकर बाघिन अवनी की मौत का विरोध किया। यह कैंडल मार्च मात्र दिखावा नहीं बने। इस बात की बेहद अहमियत है कि पर्दे के पीछे की सच्चाई क्या है? बात यह है कि बाघिन को मारने के बाद उसे नागपुर ले जाया गया जहां उसे डॉक्टर ने मृत घोषित कर दिया। पोस्टमार्टम में यह पता चला कि उसके पिछले भाग पर गोली मारी गई थी। ऑटोप्सी करने के बाद पता चला कि अवनी ने 4-5 दिनों से कुछ खाया ही नहीं था क्योंकि उसके पेट में गैस और तरल पदार्थ भरा हुआ था। इसके अलावा उसके शरीर में नमी की कमी पाई गई और इंसानी मांस का कहीं कोई जिक्र नहीं हुआ। अवनी तो चली गई लेकिन अपने कई राज छोड़ गई।

बाघ और जंगली जानवर इतने आक्रामक क्यों रहे हैं? इसका सीधा सटीक कारण है अतिक्रमण। इंसान अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए वन्य जीवों के क्षेत्र में अतिक्रमण कर रहा है। खेती और आवास के लिए जंगलों का सफाया किया जा रहा है। नेशनल पार्क और अभ्यारण्यों में वन्यजीवों के आवास को छेड़ा जा रहा है। इन सबसे वन्यजीवों की इंसानी बस्ती में चहलकदमी बढ़ गई है। इन सबका नतीजा सबके सामने है। हमारे संविधान के भाग-4 में राज्य के नीति निर्देशक तत्वों का जिक्र किया है। अनुच्छेद 48(क) में जिक्र है कि पर्यावरण और वन्यजीवों का राज्यों द्वारा संरक्षण और संवर्धन किया जाएगा। मैं राज्यों से पूछना चाहता हूं कि अवनी की तरह? यह हमारा भी व्यक्तिगत दायित्व बनता है कि हम अपने पर्यावरण और वन्यजीवों को संरक्षित और संवर्धित करें।

अब सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे देश का कानून क्या कहता है? क्या अवनी को मारना सही है? महाराष्ट्र वन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार बताया गया कि उन्हें राष्ट्रीय व्याघ्र संरक्षण प्राधिकरण से अवनी पर कार्रवाई की इजाजत प्राप्त थी। भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अनुसार बाघिन अवनी की हत्या नहीं हुई है। उसे मारना सही है। अधिनियम कहता है कि यदि कोई बाघ आदमखोर हो चुका है, गंभीर बीमारी से ग्रस्त है या किसी अन्य कारण को लेकर चीफ लाइफ वार्डन तय कर सकता है कि बाघ को मारा जाए या नहीं। चीफ लाइफ वार्डन ही तय करता है कि उसे बेहोश किया जाए, स्थानांतरित किया जाए या गोली मार दी जाए। हमारा कानून यह भी कहता है कि आत्मरक्षा के लिए आप बाघ को मार सकते है और इसके साथ ही यदि वह सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है तो उसे मारा जा सकता है। यह है हमारा कानून। वन विभाग की टीम ने आत्मरक्षा का तर्क देते हुए बाघिन पर गोली चलाई थी। कई पशु प्रेमियों का कहना है कि यह गलत है कि उस पर गोली चलाई गई यदि आत्मरक्षा के लिए गोली चलाई गई होती तो गोली बाघिन के पिछले हिस्से की जगह अगले हिस्से में लगती।

अवनी चली गई। अपने पीछे कई सवाल छोड़ गई और बहस के लिए विषय भी। अवनी अपने पीछे दो नन्हें बच्चे भी छोड़ गई जिनका ध्यान रखना हमारा दायित्व है।

📃BY_vinaykushwaha