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मंगलवार, 14 मई 2019

लद्दाख के निर्माता - कुशोक बकुला रिम्पोछे



जम्मू कश्मीर के लद्दाख को अपनी खूबसूरती के लिए जाना जाता है। हिमालय की ऊंची-ऊंची पर्वतश्रृंखला, बौद्ध मठ और दूर-दूर तक फैली शांति सभी को लद्दाख आकर्षित करती है। लद्दाख की चीन की सीमा से करीबी सुरक्षा की दृष्टि से डर पैदा करता है। लद्दाख में इस डर का सबसे पहले जिक्र कुशोक बकुला रिम्पोछे ने किया था। कुशोक बकुला रिम्पोछे को आधुनिक लद्दाख का निर्माता कहा जाता है। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने लद्दाख में एयरपोर्ट का उद्घाटन किया तो उन्होंने कुशोक बकुला रिम्पोछे को आधुनिक लद्दाख का निर्माता कहा था। कुशोक बकुला रिम्पोछे का जन्म 19 मई 1917 में लद्दाख में हुआ था। कुशोक बकुला का असली नाम लोबजंग थुबथन छोगनोर था। असलियत में कुशोक बकुला को भगवान बुद्ध के सोलह अर्हतों में से एक माना जाता है। बकुला भगवान बुद्ध के समकालीन थे और उन्हें बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए स्वयं भगवान बुद्ध ने कहा था। बकुला के उन्नीसवें अवतार को कुशोक बकुला रिम्पोछे के नाम से जाना जाता है।

कुशोक बकुला की शिक्षा-दीक्षा तिब्बत में हुई थी। तिब्बत में कुशोक ने चौदह वर्षों तक बौद्ध धर्म का अध्ययन किया और शिक्षा पूरी की। लद्दाख के साथ-साथ उन्होंने बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार विदेशों में भी किया। लद्दाख के गांव-गांव में जाकर उन्होंने बुद्ध और उनकी शिक्षा को जन-जन तक पहुंचाने का काम किया। भारत के विभिन्न हिस्सों में जाकर उन्होंने बुद्ध के बचनों को लोगों तक पहुंचाया। मंगोलिया जाकर बकुला ने बौद्ध धर्म को फिर से जागृत करने का काम किया। मंगोलिया को ईसाई धर्म के मिशनरियों से बचाकर उन्होंने बौद्ध धर्म की पताका मंगोलिया में लहराने दी। 1996 में ब्रिटेन में मजहबों और पर्यावरण संरक्षण सम्मेलन में भारत से कुशोक बकुला रिम्पोछे और स्वामी चिदानंद गए थे। कुशोक ने इस सम्मेलन में ईसाई मिशनरियों के बारे में काले सच को उजागर किया कि कैसे ईसाई मिशनरी लोगों से जबरन धर्म परिवर्तन करा रहे हैं और ईसाई धर्म कबूल करवाने पर मजबूर कर रहे हैं। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से निवेदन किया की भगवान बुद्ध के दो शिष्यों सारिपुत्त और महामोदगलायन के अस्थि अवशेषों को लद्दाख लाया जाए। इस निवेदन को जवाहर लाल नेहरू ने स्वीकार और महाबोधि सभा की देखरेख में लेह में ले जाया गया। यहां ढ़ाई महीने तक लोगों ने अस्थि अवशेषों के दर्शन किए।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब जम्मू कश्मीर में पाकिस्तान की ओर से गतिविधियां बढ़ गईं तो उन्होंने इस पर चिंता जाहिर की। पंडित जवाहर लाल नेहरू से इस बात को साझा किया। तत्कालीन जम्मू कश्मीर के राजा डॉ हरिसिंह के निर्णय के खिलाफ कुशोक ने नाराजगी जताई थी। हरिसिंह ने जम्मू कश्मीर को अलग देश बनाने की मांग रखी थी। जम्मू कश्मीर को जब भारत का अंग बनाया गया तब कुशोक बकुला ने यह आशंका जताई थी कि पाकिस्तान के कबीले और सेना जम्मू कश्मीर को अस्थिर करने की कोशिश करेंगे। उन्होंने कारगिल को बेहद संवेदनशील इलाका कहा था और लद्दाख को मुख्य धारा से जोड़ने की बात कही थी। कुशोक बकुला लद्दाख की आधारभूत संरचना(fundamental development)बारे में कहते थे। जब वे लद्दाख से विधायक बने तो केवल विधायक ही नहीं बने बल्कि उन्होंने लद्दाख को वो सबकुछ देने की कोशिश की जो एक पिता करता है। शेख अब्दुल्ला की सरकार में उन्हीं की पार्टी से विधायक होते हुए उन्होंने लद्दाख को दी जा रही धनराशि के बारे में प्रश्न उठाया। जम्मू कश्मीर की विधानसभा में उन्होंने लद्दाख को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए आधारभूत संरचना को मजबूत करने, आधुनिक शिक्षा पद्धति लागू करने, विश्वविद्यालय और कॉलेज खोलने की बात कही। इसके साथ-साथ उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार को कभी बाधक नहीं बनने दिया।

लद्दाख में बोली जाने वाली भोटी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में  शामिल करने के लिए संघर्षरत रहे। जम्मू कश्मीर सरकार में विधायक रहते हुए उन्होंने सरकारी कामकाज की भाषा अंग्रेजी और उर्दू का विरोध किया। उनका कहना था कि अंग्रेजी और उर्दू दोनों कश्मीर की भाषा नहीं हैं इसकी जगह पर डोगरी,कश्मीरी या भोटी को शामिल किया जाना चाहिए। कुशोक बकुला कहते थे कि भोटी भाषा लद्दाख से अरुणाचल तक बोली जाती है और इस भाषा को बोलने वालों की संख्या 5 लाख है। अरुणाचल सरकार ने बाद में भोटी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए एक प्रस्ताव भी पारित किया था। ऐसा नहीं था कि उन्होंने और प्रयास नहीं किए। जब वे सांसद बने तो उन्होंने संसद में इस मुद्दे के साथ-साथ लद्दाख के विकास के मुद्दे को भी उठाया था। संसद के सदन में कुशोक बकुला ने उन रुपयों का जिक्र भी किया जो लद्दाख के विकास के लिए भेजे जाते थे। उनका कहना था कि लद्दाख के लिए जो धनराशि जारी की जाती है वो धनराशि लद्दाख तक पहुंचती नहीं है।

तिब्बत के जनसामान्य के बीच दलाई लामा का जितना महत्व है ठीक उसी तरह लद्दाख वासियों के लिए कुशोक बकुला रिम्पोछे का महत्व था। कुशोक बकुला के जीवन में तिब्बत का विशेष स्थान था। तिब्बत में उन्होंने शिक्षा-दीक्षा ग्रहण की और जीवन जीने की कला भी उन्होंने तिब्बत से ही सीखी थी। कुशोक बकुला, चौदहवें दलाई लामा के बारे में चिंतित रहते थे। सन 1956 में भारत सरकार ने भगवान गौतम बुद्ध की 2500वीं जयंती मनाने का निर्णय लिया। इस अवसर पर भारत सरकार ने एक प्रतिनिधिमंडल का गठन किया। इस प्रतिनिधिमंडल का काम था तिब्बत जाकर दलाई लामा और पंचेन लामा का समारोह के लिए आमंत्रित करना। इस प्रतिनिधिमंडल का अध्यक्ष कुशोक बकुला रिम्पोछे को बनाया गया। कुशोक हमेशा से ही तिब्बत की सलामती के बारे में सोचते थे। कुशोक बकुला तिब्बत को एक राष्ट्र के रूप में देखना चाहते थे। उनका कहना था कि यदि तिब्बत एक राष्ट्र के रूप में उभरता है तो यह चीन और भारत के बीच बफर जोन की तरह काम करेगा। वे हमेशा चीन की तरफ से आने वाले संकट की ओर इशारा करते थे। शायद उन्हें पहले ही ज्ञात हो गया था कि चीन ,भारत के विरुद्ध युद्ध छेड़ कर कायराना हरकत करेगा। सन् 1959 में तिब्बत में हालात बेहद नाजुक हो गए थे। चीन सरकार जबरदस्ती तिब्बत वासियों को नास्तिकता की ओर धकेल रही थी। इसी समय चौदहवें दलाई लामा को भारत लाया गया।

दलाई लामा और उनके साथ आए अनुयायियों को बसाने की जिम्मेदारी कुशोक बकुला ने अपने हाथ ले ली थी। सरकार की तरफ से तिब्बतियों को बसाने के लिए 1200 एकड़ जमीन दी गई। कुशोक बकुला रिम्पोछे ने  तिब्बतियों को जल्द से जल्द बसाने का काम करने के लिए उन्होंने भारत सरकार को पत्र लिखा। कुशोक बकुला, दलाई लामा के साथ कई बौद्ध समारोह में हिस्सा लिया। दलाई लामा और कुशोक बकुला साथ में मंगोलिया भी गए थे। दलाई लामा ने वहां पर ईसाई मिशनरी द्वारा किए जा रहे कार्य की सराहना की लेकिन कुशोक बकुला इस व्यक्तव्य के साइड इफेक्ट को समझ गए थे। उन्हें पता था कि दलाई लामा की बात का ईसाई मिशनरी फायदा उठाएंगे। ऐसा इसलिए था क्योंकि साम्यवादी विचारों को मंगोलिया पर थोपा जा रहा था। चीन, मंगोलिया को ईनर मंगोलिया कहकर चीन का हिस्सा का बताता था।

जब मंगोलिया के वे राजदूत बने तो उन्होंने अपने आपको दूसरा भिक्खू कहकर संबोधित किया। भारत से पाकिस्तान और चीन के रिश्ते हमेशा ठीक नहीं रहे। सन् 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण करके लद्दाख का कुछ हिस्सा छीन लिया। इस हिस्सा को चीन, अक्साई चीन कहता है। कुशोक बकुला ने हमेशा से चीन तरफ से आने वाले संकट की ओर इशारा किया था। वहीं वे आतंरिक शांति पर जोर देते थे। कुशोक बकुला का कहना था कि शांत रहकर बड़े से बड़ा काम किया जा सकता है। शेख अब्दुल्ला की सरकार में विधायक रहते हुए उन्होंने जम्मू कश्मीर विधानसभा में लद्दाख के संदर्भ में जोरदार भाषण दिया। कुशोक बकुला का भाषण भोटी भाषा में था। इस भाषण का सदन के कई सदस्यों ने भाषण की भाषा को लेकर सवाल उठाया। कुशोक बकुला ने इस भाषण में लद्दाख के विकास को लेकर शेख अब्दुल्ला सरकार को जो लताड़ लगाई उससे तो स्वयं शेख अब्दुल्ला को बगले झांकने पर मजबूर होना पड़ा। शेख अब्दुल्ला ने जम्मू कश्मीर में एक कानून बनाया जिसमें कोई भी 22 एकड़ से ज्यादा जमीन नहीं रख सकता था। इस कानून का कुशोक बकुला ने विरोध किया। इस कानून से मोनेस्ट्री का नुकसान होता।

भगवान गौतम बुद्ध की 2545वीं जयंती पर लद्दाख में कार्यक्रम का आयोजन किया गया। पूरे देश से लोग कुशोक बकुला से मिलने और आशीर्वाद लेने आए। अपनी आखिरी मंगोलिया यात्रा के दौरान उन्हें निमोनिया हो गया। मंगोलिया में ट्रीटमेंट और अस्पताल की ठीक व्यवस्था ना होने के कारण उन्हें एयर एंबुलेंस से चीन की राजधानी बीजिंग ले जाया गया। बीजिंग में कुशोक बकुला की तबीयत सुधरने के जगह और बिगड़ने लगी। कुशोक बकुला को बीजिंग से नई दिल्ली लाया गया और एम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया। समय को जो मंजूर होता है वही होता है। दिल्ली आने के बाद भी कुशोक बकुला की तबीयत सुधरी नहीं और चीवरधारी यह प्रखर व्यक्तिव्य इस दुनिया को छोड़कर चले गया।


📃BY_vinaykushwaha 

सोमवार, 29 अप्रैल 2019

चुनाव आयोग की लाठी में आवाज नहीं होती है...




भारत में चुनाव आयोग एक महत्वपूर्ण संस्था है। चुनाव आयोग भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 से 329 के तहत काम करता है। संविधान के तहत काम करने के कारण न्यायपालिका, कार्यपालिका और व्यवस्थापिका को चुनाव आयोग की बातों पर गौर करना होता है। चुनाव आयोग का सबसे महत्वपूर्ण कार्य देश में समय-समय पर चुनाव करवाना और राजनीतिक दलों को चुनाव चिन्ह देने के साथ-साथ उन्हें राष्ट्रीय,क्षेत्रीय और राज्य की राजनीतिक पार्टियों में विभाजित करना है। चुनाव आयोग को लोग कई बार बिना दांत का शेर कह देते हैं क्योंकि चुनाव आयोग दहाड़ तो देता है लेकिन कार्रवाई नहीं करता है। चुनाव के समय चुनाव आयोग का महत्व बढ़ जाता है। ये काफी हद सही है। 2019 आम चुनाव में चुनाव आयोग की कार्रवाई को देखकर तो बिल्कुल नहीं लगता कि चुनाव आयोग बिना दांत का शेर है।

चुनाव आयोग ने 2019 के आम चुनाव में बता दिया कि उसके पास क्या अधिकार हैं और वह क्या कर सकता है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जीवन पर बनी फिल्म पर चुनाव आयोग ने रोक लगी दी। चुनाव आयोग का कहना था कि इससे एक पार्टी विशेष को फायदा होगा। जब फिल्म पर रोक लगाई गई तो फिल्म के निर्माता सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। सुप्रीम कोर्ट में निर्माताओं ने यह दलील दी की चुनाव आयोग ने बिना फिल्म देखे फिल्म पर रोक लगा दी। इस पर सु्प्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा कि आपको फिल्म देखना चाहिए। चुनाव आयोग के अधिकारियों ने फिल्म देखी और फिल्म के कुछ डायलॉग पर आपत्ति जता दी। आखिरकार परिणाम क्या हुआ? फिल्म पर बैन बरकरार है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि चुनाव आयोग द्वारा फिल्म पर रोक लगाई है इसमें कोई दखल नहीं दे सकते। यानि फिल्म अब 19 मई के बाद ही रिलीज होगी।

बात केवल फिल्म की नहीं है बल्कि वेब सीरीज और ऑनलाइन टीवी की भी है। चुनाव आयोग ने तमाम वेबसाइट पर उपलब्ध प्रधानमंत्री से संबंधित फिल्म जो वेबसाइट पर हैं उन पर भी बैन लगा दिया है। इसके अलावा नमो टीवी पर आंशिक बैन लगा दिया। इस टीवी  में लाइव प्रोग्राम का प्रसारण किया जा सकता है लेकिन मतदान से 48 घंटे पहले तक किसी भी प्रकार के रिकॉर्डेड प्रोग्राम का प्रसारण नहीं कर सकते। नमो टीवी एक ऑनलाइन टीवी चैनल है जिस पर प्रधानमंत्री के भाषण और बीजेपी से जुड़ी जानकारियां प्रसारित की जाती हैं। इन सब पर बैन लगाकर जता दिया की चुनाव आयोग क्या कर सकता है? इसके अलावा ममता बनर्जी पर बनी फिल्म 'बाघिनी' के ट्रेलर पर चुनाव आयोग ने रोक लगा दी। ममता बनर्जी पर बनी फिल्म का ट्रेलर पांच वेबसाइट पर रिलीज होना था।

हाल ही में आयकर विभाग ने दिल्ली और मध्यप्रदेश के कई ठिकानों पर आयकर छापेमारी की। इसे विपक्षी दल कांग्रेस ने बदले की कार्रवाई कहा। चुनाव आयोग ने इस पर संज्ञान लेते हुए आयकर विभाग से कहा कि किसी भी छापेमारी से पहले चुनाव आयोग को इस बाबत जानकारी दे। इस पर आयकर विभाग ने कहा कि हमें इस बात की जानकारी है कि आदर्श आचार संहिता के दौरान चुनाव आयोग को लूप में लिया जाना है। इस पर चुनाव आयोग ने कहा कि जब आपको जानकारी थी तो आपने इसका पालन क्यों नहीं किया?

चुनाव आयोग इस बार सख्ती बरतने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। सोशल मीडिया पर होने वाले प्रचार पर भी चुनाव आयोग की गिद्ध दृष्टि है। चुनाव आयोग का कहना है कि राजनीतिक पार्टियों द्वारा सोशल मीडिया पर प्रचार के लिए खर्च की गई राशि को भी जोड़ा जाएगा। ऐसा करना चुनाव आयोग ने अनिवार्य कर दिया है। यदि कोई राजनीतिक पार्टी या राजनेता चुनाव आयोग का कहना नहीं मानते तो उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। चुनाव आयोग ने 628 कंटेंट सोशल मीडिया से हटाए। इन कंटेंट में सबसे ज्यादा 574 फेसबुक पेज हैं। गूगल, फेसबुक, व्हाट्एप चुनाव प्रचार के लिए प्राथमिकता की सूची में हैं। चुनाव आयोग ने भी इन सोशल साइट्स को भी निर्देश दिया है कि ऐसी किसी भी प्रकार का कंटेंट अपनी साइट्स में ना रखें जिससे चुनाव प्रचार के साथ-साथ वैमनस्यता फैलाई जा रही हो।

तेलंगाना के 62 उम्मीदवारों ने अपनी संपत्ति का सही ब्यौरा नहीं दिया तो चुनाव आयोग ने उनका नामांकन ही रद्द कर दिया। नामांकन में विसंगतियां पाए जाने के बाद चुनाव आयोग ने कई उम्मीदवारों के नामांकन रद्द कर दिए हैं। नामांकन रद्द करने के पीछे कारण केवल चुनाव आयोग द्वारा अपनी उपस्थिति दर्ज कराना नहीं है बल्कि चुनाव प्रक्रिया को 'स्पष्ट और निष्पक्ष' बनाना है। चुनाव आयोग ने cVIGIL नाम से गूगल प्ले स्टोर पर एक एप उपलब्ध कराई है। इस एप की सहायता से आप जिस निर्वाचन क्षेत्र में रहते हैं उस निर्वाचन क्षेत्र के बारे में शिकायत कर समाधान पा सकते हैं। यदि आपके क्षेत्र में किसी उम्मीदवार ने आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन किया है तो उसकी फोटो खींचकर या वीडियो बनाकर चुनाव आयोग को सूचित कर सकते हैं। यदि आपको किसी भी प्रकार की सहायता या शिकायत करनी है तो आप चुनाव आयोग के नंबर 1950 पर कॉल कर सकते हैं। भारत के आम चुनाव कोई आम चुनाव नहीं होते बल्कि यह विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का पर्व होता है। चुनाव आयोग इस चुनाव को वोटर फ्रेंडली बनाना चाहता है।

कई बार कहा जाता है कि अक्सर बड़ी मछलियां जाल में नहीं फंसती हैं, हमेशा छोटी मछलियों को ही त्याग करना पड़ता है। चुनाव के दौरान जितनी बदजुबानी होती है शायद ही और कभी होती हो। चुनाव के दौरान बड़े-बड़े नेता कुछ भी बोलकर निकल लेते थे। इस बार चाहे मछली छोटी हो या बड़ी सभी पर शिकंजा कसा है। इस बार चुनाव आयोग ने बीजेपी, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी के नेताओं की बोलती बंद की है। चुनाव आयोग ने मायावती, मेनका गांधी, आजम खान, नवजोत सिंह सिद्धू, जया प्रदा, सतपाल सिंह
सत्ती, योगी आदित्यनाथ, मिलिंद देवड़ा आदि पर कार्रवाई की। आयोग ने केवल कार्रवाई ही नहीं की बल्कि 48 से 72 घंटे का बैन लगाकर बता दिया की चुनाव आयोग क्या कर सकता है। बैन के दौरान इन नेताओं को रैली करने, प्रेस कॉन्फ्रेंस करने, सोशल मीडिया में प्रचार करने, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से प्रचार करने पर रोक थी। चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले के अणुव्रत मंडल को नजरबंद करने का आदेश दे दिया। अणुव्रत को नजरबंद करने के पीछे केवल इतना कारण था कि वह एक बाहुबली नेता है और मतदान के समय अड़चनें पैदा कर सकता है।

भारत में चुनाव आयोग को मामूली सा विभाग समझ लिया जाता है। आज के परिदृश्य में देखें तो चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा को धन्यवाद कहना चाहिए। मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपनी गरिमा के अनुसार काम किया है। सुनील अरोड़ा ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषन की याद को ताजा कर दिया। शेषन ने चुनाव आयुक्त के पद पर रहते हुए बहुत से सुधार किए और कई बेहतरीन मिसालें पेश की। शेषन ने मुख्य चुनाव आयुक्त रहते 17 सूत्रीय मांग भारत सरकार के सामने रखी। शेषन ने साफ-साफ कहा कि देश में तब तक चुनाव नहीं होंगे जब तक 17 सूत्रीय मांग पूरी नहीं कर ली जाती हैं। शेषन ने तो चुनाव आयोग को भारत सरकार का अंग मानने से मना कर दिया था। शेषन कहते थे कि अब मुख्य चुनाव आयुक्त कानून मंत्री के ऑफिस के बाहर मीटिंग के लिए समय की आशा में नहीं बैठेगा।   


📃BY_vinaykushwaha

बुधवार, 24 अप्रैल 2019

ये चुनावी बदजुबानी....



बोया पेड़ बबूल का आम कैसे फरें? ये कहावत हम बचपन से सुनते हुए आ रहे हैं। भारतीय राजनीति में सबकुछ बहुत जल्दी बदल जाता है। नेता अपने वादों से मुकर जाते हैं और उनकी नीयत पार्टी से बदल जाती है। चुनाव आते ही सारे नेता जुबानी जंग में इस तरह तैयार होकर निकलते हैं जैसे उन्हें किसी किले को फतह करना हो। किला फतह हो ना हो पर एक बात उनके साथ अच्छी हो जाती है कि वे फेमस हो जाते हैं। फेमस हैं तो और फेमस हो जाते हैं। प्रधानमंत्री से लेकर छोटे से उम्मीदवार तक जुबानी जंग इतनी बदजुबानी हो जाती है कि लगता है कि ये नेता एक-दूसरे के खून के प्यासे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राहुल गांधी को नामदार  के नाम से बुलाते हैं। जब एक इंटरव्यू में उनसे पूछा जाता है कि वे राहुल गांधी को उनके नाम से क्यों नहीं बुलाते हैं? प्रधानमंत्री की ओर से जवाब मिलता है कि इससे आपको क्या तकलीफ है? सर हमें तकलीफ क्यों होगी? हम पत्रकार की जमात हैं। हमें सवाल पूछने की आदत है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महागठबंधन को महामिलावटी तक कहते हैं। यूपी में बीएसपी, एसपी और आरएलडी का गठबंधन हुआ तो पीएम मोदी ने इसे संक्षिप्त रूप से 'सराब' कहा। सराब को उन्होंने कही ना कही शराब से जो़ड़ना चाहा। इस जुबानी जंग में अकेले प्रधानमंत्री नहीं हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है।

राहुल गांधी तो एक कदम आगे निकलते हुए प्रधानमंत्री को चोर ही कह दिया। राहुल गांधी ने ‘चौकीदार चोर है’  का नारा गढ़ा। राहुल गांधी  अपनी हर रैली में मंच से खड़े होकर बोलते है कि चौकीदार, जनता के बीच से आवाज आती है कि चोर है। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका जवाब ऐसे दिया कि वे मंच से बोलते है कि फिर एक बार, जनता के बीच से आवाज आती है ‘मोदी सरकार’।

राजनीति में दोस्ती और रिश्तेदारी कितने दिन टिकेगी ये कहना मुश्किल होता है। कांग्रेस प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी कुछ दिन पहले तक बीजेपी और शिवसेना के खिलाफ खुलकर बोलती थीं। आज शिवसेना में शामिल होकर राजनीति में ताल ठोक रही हैं। आजम खान और जया प्रदा राजनीति के आकाश में तब नजर आए जब आजम खान ने जया प्रदा के बारे में ऐसे शब्द बोले कि मैं यहां लिख नहीं सकता। मर्यादा कहा रह गई है। ये वही आजम खान हैं जिन्हें जया प्रदा को राजनीति में लाने का श्रेय जाता है।

हिमाचल प्रदेश के बीजेपी अध्यक्ष सतपाल सिंह सत्ती भी इतनी महान आत्मा है कि चुनावी मंच से गाली देने में नहीं डरते। इतनी अश्लील भाषा का उपयोग करते हैं कि मैं वो शब्द यहां लिख नहीं सकता। राहुल गांधी को गाली सूचक शब्दों से पुकारना या कहना कितना सही है?

केंद्र सरकार में मंत्री महेश शर्मा तो व्ययंग में विश्वास रखते हैं। प्रियंका गांधी के राजनीति में पदार्पण करने और कांग्रेस की उपाध्यक्ष बनने पर ऐसा कुछ कह दिया कि सुर्खियां बन गईं। महेश शर्मा ने कहा- अभी तक राजनीति में पप्पू था अब पप्पू की पप्पी भी आ गई। यह कहना उचित है? मेरे हिसाब से तो बिल्कुल उचित नहीं है।

उदाहरणों की कमी मेरे पास तो नहीं है। महागठबंधन के फतेहपुर सीकरी से प्रत्याशी गुड्डू पंडित भी किसी से पीछे नहीं हैं। गुड्डू पंडित कहते हैं कि राज बब्बर के .....और उसकी नचनियां को दौड़ा-दौड़ाकर चप्पलों से पीटूंगा, यदि समाज में झूठ फैलाया तो गंगा मां की सौगंध चप्पलों से पीटूंगा।

भोपाल से बीजेपी प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा कहती हैं कि मुंबई हमले में शहीद हेमंत करकरे को मेरा श्राप लगा इसलिए मारे गए। साध्वी प्रज्ञा ने बाद में सफाई दी कि हेमंत करकरे ने मुझे जेल में प्रताड़ित किया इसलिए मैंने ऐसा कहा। बिहार के बक्सर से सांसद और फिर से बीजेपी उम्मीदवार अश्विनी चौबे भी गजब करते हैं। लालू यादव की पत्नी और बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी को कहते हैं कि, राबड़ी जी भाबी हैं उन्हें घूंघट में रहना चाहिए। इस पर राबड़ी देवी ने जवाब दिया कि उनकी पार्टी की कितनी महिला नेता घूंघट में रहती हैं, पहले उन्हें घूंघट में रहने के लिए बोलिए। अश्विनी चौबे बयानवीर हैं। उनका एक और बयान हवा में तैर रहा है कि मुझे कलेक्टर का बुखार उतारना आता है। इन बयानों से क्या होगा? राजनीति में थोड़ी प्रसिद्धि जरूर मिल जाएगी लेकिन बाद में आप एक दागदार की तरह दिखने लगेंगे। ना तो आप कामदार रह जाएंगे और ना ही नामदार।

मेरठ से बीजेपी उम्मीदवार राजेंद्र अग्रवाल कहते हैं कि शहीद हेमंत करकरे कैसे ATS चीफ थे जो बिना तैयारी के आतंकियों से लड़ने गए। बाद में सफाई देते हुए कहते हैं कि मेरे ट्विटर हैंडल का दुरुपयोग करके किसी ने ट्वीट किया। एक कहावत है प्यार और जंग में सब कुछ जायज है। आज नेताओं ने राजनीति को लड़ाई का अखाड़ा बना दिया है। इस अखाड़ा में धर्म को हथियार बनाकर लड़ा जाता है। इस चुनाव में भगवान हनुमान को राजनीति में लाकर खड़ा कर दिया। एक तरफ भगवान हनुमान की जाति बताई जाती है वहीं दूसरी ओर जाति के आधार पर वोट मांगा जाता है। बेगूसराय से बीजेपी प्रत्याशी गिरिराज सिंह SP नेता आजम खान से
कहते हैं कि एक बार बेगूसराय का चुनाव खत्म हो जाए फिर हम रामपुर आकर बताएंगे कि हनुमान क्या हैं? भगवान के नाम पर डराया जाता है।

आजम खान के किस्से यहीं खत्म नहीं होते। आजम खान तो मतदाताओं को गद्दार कहने से नहीं चूकते। आजम खान की की भाषा में विपक्षी जो उन पर बयानबाजी करते हैं वे गंदगी खाने के बराबर वाला काम करते हैं। वे कहते हैं कि यदि गंदगी खाना है तो चांदी का वर्क लगाकर मत खाओ, गंदगी खाना है तो सीधे खाओ। आजम खान के सुपुत्र तो और आगे निकलकर कहते है कि, ‘हमें अली भी चाहिए और बजरंगबली भी चाहिए लेकिन अनारकली नहीं चाहिए’। ऐसी कौन सी राजनीति है जो इस तरह की भाषा बोलने पर मजबूर करती है।

आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तरह-तरह की उपमाओं से नवाजा जाता है। कांग्रेस और उसके सहयोगी दल तरह-तरह के शब्दों का उपयोग करते हैं। हिटलर, हत्यारा, और चोर आदि तक की संज्ञा दी गई। बीजेपी ने तो पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को मौन-मोहन तक कहा। एक कांग्रेस नेता ने तो MODI का नया मतलब M = मसूद अजहर, O = ओसामा, D = दाउद, I = आईएसआई बताया। यह मतलब किस हद तक सही है। यह तय करना जनता का काम है। जहां तक बदजुबानी की बात है तो जनता का निर्णय सर्वोपरि होता है। चुनाव नेताओं के बीच होता है लेकिन जीत उसी की होती है जिसे जनता पसंद करती है।

 मैंने इस लेख की शुरुआत में एक कहावत लिखी थी कि बोया पेड़ बबूल का तो आम कैसे फरें। इस कहावत के लिखने का मतलब था कि आप अपने उम्मीदवार का चयन सावधानी से करें ताकि बाद में आपको पछताना ना पड़े।

BY_vinaykushwaha

सोमवार, 1 अप्रैल 2019

जाति का विनाश कितना जरूरी है?

जात-पात तोड़ दो, तिलक-दहेज छोड़ दो।समाज के प्रवाह को नयी दिशा में मोड़ दो। यह उद्बोधन जेपी ने अपने आंदोलन के समय दिया था। जात-पात तोड़ दो, यह बात सबको आकर्षित करती है क्योंकि भारत में निम्न जाति के लोगों ने कभी न कभी जातिवाद का दंश झेला ही है। मैंने कुछ समय पहले एक किताब पढ़ी थी जिसका नाम "जाति का विनाश" है। यह किताब "Annihilation of caste" का हिंदी रूपांतरण है। इस किताब को बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने लिखी है। दरअसल यह एक किताब की शक्ल में भाषण का संकलन है। इस किताब में उसी भाषण का जिक्र किया गया है जिसे जात-पात तोड़क मंडल ने उन्हें देने नहीं दिया। जात-पात तोड़क मंडल का कहना था कि आंबेडकर जी का भाषण जाति व्यवस्था के बहिष्कार से ज्यादा हिंदू धर्म का अपमान है। जब कार्यक्रम रद्द हो गया तो आंबेडकर ने अपने भाषण को किताब की रूपरेखा में ढ़ाल  दिया। उन्होंने बताया कि उन्हें क्यों भाषण देने नहीं दिया गया? उनका कहना था कि जब मुझे अपने शब्दों को कहने की आजादी नहीं है तो मैं भाषण देने क्यों जाऊं?

जाति का विनाश किताब में बताया गया है कि कैसे जाति और जाति व्यवस्था हिंदू धर्म और मानने वाले लोगों के लिए अभिशाप है। उच्च जाति के लोग किस तरह निम्न जाति के लोगों पर कहर बरपाते हैं। आंबेडकर ने अपनी किताब में बताया कि कैसे जाति व्यवस्था भारत में आया और अब जड़ों तक समा चुका है। वैदिक सभ्यता के समय इस तरह के साक्ष्यों को पहली बार देखा गया था। उत्तर वैदिक काल में निम्न जाति को वेद आदि पढ़ने की अनुमति नहीं थी। जहां ऋग्वैदिक काल में व्यक्ति अपनी सुविधानुसार अपनी जाति बदल सकता था वहीं उत्तर वैदिक काल में यह व्यवस्था बदल गई। वैदिक काल में चार वर्णों वाली व्यवस्था अस्तित्व में आई थी उसने और विकराल रूप धारण कर लिया। वैदिक काल के बाद धीरे-धीरे जातीयता अन्य मुद्दों पर हावी होने लगी। ब्राह्मणवाद का विस्तार हिन्दू धर्म की नींव का हिलाने वाला था। किताब मैं बताया गया है कि वर्ण व्यवस्था में तिरस्कार केवल शूद्र को ही उठाना पड़ा है। किताब में महार जाति के बारे में बताया गया है कि कैसे उनके साथ गलत व्यवहार किया जाता था? जब महार जाति का कोई व्यक्ति  सड़क से निकलता था तो उसे कमर में झाड़ू बांधने और गले में एक मटका बांधने की सख्त हिदायत दी जाती थी। इस तरह की हिदायत देने का मतलब यह था कि सड़क गंदगी न हो। लेकिन इन सबके पीछे मुख्य कारण अपने वर्ण को सर्वश्रेष्ठ साबित करना था।

आंबेडकर ने अपनी आपबीती बताते हुए लिखा है कि कैसे  उनके साथ बचपन से लेकर नौकरी के समय तक छुआछूत किया जाता था। जहां बचपन में उन्हें स्कूल में अन्य बच्चों के साथ बैठने नहीं दिया जाता था और दिनभर उन्हें प्यासा रखा जाता था। जब उनकी नौकरी वडोदरा में लगी तो वहां नौकर उन्हें फाइल्स फेंक कर देता था और दिनभर प्यासा रखा जाता था। किताब में उन्होंने विभिन्न प्रकार के आंदोलन का जिक्र किया जिसमें सबसे महत्वपूर्ण महाड़ सत्याग्रह था। इसमें उन्होंने गांव के शूद्र जाति के लोगों के साथ जाकर तालाब के पानी को पिया और आचमन किया। किताब में एक मंदिर, एक कुंआ की बात लिखी हुई है। यह बात दर्शाती है कि कैसे निम्न जाति के लोगों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता था।

किताब में केवल जाति व्यवस्था जैसी कुरीति पर जमकर कटाक्ष किया गया है। इस किताब में पूना पैक्ट 1932 के बारे में जिक्र किया गया है। यह समझौता महात्मा गांधी और आंबेडकर के बीच हुआ था। इस समझौते में आंबेडकर ने महात्मा गांधी की बात मानी और "Depressed class" (दमित वर्ग) को चुनाव में दिए जाने वाले आरक्षण को वापस ले लिया। इससे आंबेडकर दुखी हुए क्योंकि वे दलितों को उनका हक दिलाना चाहते थे। इस किताब में कई संदर्भ दिए गए हैं जब आंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच तीखी बहस होती थी। महात्मा गांधी  अपने समाचार पत्र हरिजन में जाति व्यवस्था पर लेख लिखते थे। इन्हीं लेखों की आलोचना आंबेडकर पत्र व्यवहार के माध्यम से करते थे। इस पत्र का जवाब महात्मा गांधी भी मूकनायक में प्रकाशित लेख को आधार बनाकर देते थे। आंबेडकर अनुसूचित जाति वर्ग के लोगों को "Depressed class" कहते थे जबकि महात्मा गांधी हरिजन शब्द का उपयोग किया करते थे। इस किताब से स्पष्ट होता है कि कहीं न कहीं अनुसूचित जाति को अधिकार प्राप्त न होने के पीछे महात्मा गांधी को जिम्मेदार मानते थे।

आंबेडकर ने जहां अपनी किताब में आर्य समाज और स्वामी दयानंद सरस्वती की तारीफ की है। इसके अलावा उन्होंने राजा राममोहन राय की तारीफ की है क्योंकि उन्होंने समाज को कुरीतियों से मुक्त कराने लिए बहुत से काम किए। आंबेडकर ने दूसरी ओर हिन्दू धर्म में व्याप्त कुरीतियों छुआछूत, बाल-विवाह, सती प्रथा, अंतर जातीय विवाह पर प्रतिबंध के मामले पर जमकर लताड़ लगाई। किताब में डॉ आंबेडकर ने तो यहां तक लिख दिया कि हिन्दू धर्म की जाति व्यवस्था की वजह से भारत में अन्य धर्मों में जाति व्यवस्था के बीज फूट पड़े हैं। किताब में एक जगह यह भी लिखा है कि जातिवाद और वर्ण व्यवस्था का आरोप मनु पर नहीं लगा सकते हैं क्योंकि उसने तो जाति की एक व्यवस्था तैयार की थी

अपनी किताब में डॉ आंबेडकर ने विदेशी लोगों को भी नहीं छोड़ा उन्होंने उनकी भी जमकर खिंचाई की। रंगभेद में उनसे आगे कोई नहीं है। वे काले और गोरे में भेद करते हैं। ऐसा कहना था डॉ बाबासाहेब आंबेडकर का।
आपत्ति:- डॉ आंबेडकर ने जाति व्यवस्था जैसी कुरीति को केवल हिन्दू धर्म के साथ जोड़ा जबकि यह आधा सत्य है। अन्य धर्मों में भी जाति और वर्गों की प्रधानता है। ईसाई धर्म कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट, एवनजीलक, आर्थोडॉक्स आदि शाखाओं में बंटा हुआ है। इन सभी के अलग-अलग चर्च होते हैं और ये एक-दूसरे के चर्च में नहीं जाते। यही हाल मुस्लिम धर्म का भी है। बौद्ध धर्म भी मुख्यतया दो भागों में विभाजित है हीनयान और महायान। जातिवाद का सारा दोष हिन्दू धर्म पर मढ़ना गलत है। 
एक बार जरूर इस किताब को पढ़ें और निष्कर्ष पर पहुंचें।
BY_vinaykushwaha

रविवार, 11 नवंबर 2018

"अवनी" पर राजनीति क्यों?

"कोई बाघ आदमखोर खुद से नहीं बनता है बल्कि उसे मजबूरी में आदमखोर बनना पड़ता है।" यह पंक्ति है मशहूर बाघ संरक्षक जिम कार्बेट की। जिम कार्बेट को बाघों का संरक्षक कहा जाता है। जिम के साथ एक विरोधाभास जुड़ा हुआ है कि उन्होंने 33 बाघ-बाघिन को मारा था। इनमें मैन ईटर ऑफ कुमाऊं भी शामिल है। इस मैन ईटर ने 435 आदमियों को मारा था। अपनी किताब मैन ईटर ऑफ कुमाऊं में उन्होंने इस बात का जिक्र किया था। जिम की छवि एक अच्छे व्यक्ति के रुप में है क्योंकि उन्होंने आदमखोरों के आतंक से मुक्ति दिलाई थी। लेकिन बाद में उन्होंने बंदूक की जगह कलम को उठा लिया था। वे इस बात से वाकिफ थे कि हिमालय में बाघों की संख्या कम होने का मतलब है कि पारिस्थितिकी तंत्र में गड़बड़ी होना है। जिम कार्बेट लेखक और दार्शनिक भी रहे हैं। उन्हीं के नाम पर उत्तराखंड के राष्ट्रीय पार्क का नाम जिम कार्बेट नेशनल पार्क है। इसी नेशनल पार्क से प्रोजेक्ट टाइगर मिशन की शुरुआत की गई थी।

तारीख 2 नवंबर 2018 सभी को वैसे तो पता होगी लेकिन यह एक ऐसा दिन जिस दिन से सभी को पशुओं के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया है। लोग अब यह भी सोचने लगे हैं कि जानवरों को क्यों मारा जा रहा है। मैं बात कर रहा हूं बाघिन 'अवनि' की। कई लोग बाघिन अवनि को अवनी लिख रहे हैं। इस बाघिन का अाधिकारिक नाम टी-1 है। बाघिन अवनी को मार दिया गया। अवनी पर आरोप था कि उसने दो सालों में 14 लोगों की जान ली है। अवनी को मारने के लिए बकायदा वन विभाग से 100 लोगों की टीम को तैयार किया गया। पांढरकवड़ा के जंगल में बाघिन को खोजने के लिए गोल्फर ज्योति रंधावा के खोजी कुत्तों को बुलाया गया। पेड़ों आदि पर कैमरों का कड़ा पहरा लगा दिया गया। बाघिन को चारा देने के नाम पर नकली भेड़-बकरियों को बांधा गया। अमेरिकी से विशेष प्रकार का इत्र मंगाया गया ताकि बाघिन आकर्षित होकर जल्द से जल्द घने जंगलों से निकलकर खुले मैदान में आ जाए।

सारे जाल बिछा दिए गए बस अब बाघिन का फंसना बाकी  था। बाघिन आई और जाल में फंस गई। हैदराबाद से शार्प शूटर शाफत अली खान को बुलाया गया था। शाफत के पास एक लंबा अनुभव था कि कैसे जानवर को मारा जाता है। उनके दादा भी यही काम करते थे। वन विभाग के अनुसार शाफत को मुख्य रुप से बाघिन को ट्रैंकुलाइज  करने के लिए बुलाया गया था। अवनी जैसे ही थोड़े खुले हिस्से में आई तो उसे पहले ट्रैंकुलाइज गन से टैंकुलाइज्ड किया गया फिर उसे 10 मीटर दूर से पिछले हिस्से में गोली मार दी गई। आखिरकार आदमखोर बाघिन का अंत हो गया। यह बाघिन अवनी की दुखद अंत की कहानी है।

असली कहानी तो अवनी की मौत के बाद शुरू होती है। अवनी की मौत के बाद कई पशुप्रेमी और राजनेता सामने आए और उन्होंने जमकर इस बात का विरोध किया की अवनी की हत्या की गई है। अवनी की मौत से पहले कई पशु प्रेमियों और एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका देकर अवनी पर दया दिखाकर जीवनदान की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने दया याचिका को यह कहते हुए नकार दिया था कि चीफ लाइफ वार्डन ने यह स्वीकार किया है कि अवनी पर कार्रवाई जरुरी है। अब आते हैं राजनीति पर। केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने महाराष्ट्र के सीएम देवेन्द्र फडणवीस को पत्र लिखकर महाराष्ट्र के वन मंत्री सुधीर मुनगंटीवार को बर्खास्त करने की मांग की। आपको यहां बताते चलें कि मेनका गांधी की छवि एक पशु प्रेमी की है, वे कई सालों से पशुओं के संरक्षण में काम  रही हैं। मेनका गांधी शायद भूल गई थी कि केन्द्र में उनकी सरकार और महाराष्ट्र में एनडीए नीत सरकार फिर पत्र की औपचारिकता क्यों? इसके बाद सुधीर मुनगंटीवार ने उल्टा मेनका गांधी पर आरोप लगाते हुए कहा कि वे भी तो फर्जी बाबा के पास जाती हैं। मुझे नहीं लगता है कि इतने संवेदनशील मुद्दे पर ऐसी बात उछालने की जरूरत थी।

बात यदि महाराष्ट्र की हो और शिवसेना का जिक्र ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता। शिवसेना ने सरकार पर आरोप मढ़ दिया की सरकार ने अवनी की हत्या की है। मनसे भी कहां पीछे रहने वाली थी। राज ठाकरे ने अवनी पर बयान दे दिया। सबसे आखिर में एंट्री हुई कांग्रेस की। मुंबई से पूर्व सांसद संजय निरुपम ने इस सारे मामले को हगणदारी प्रथा से जोड़ दिया। हगणदारी प्रथा, महाराष्ट्र में खुले में शौच मुक्त करने के अभियान से जुड़ा है। संजय निरुपम ने हगणदारी प्रथा का जिक्र इसलिए किया क्योंकि वे बताना चाहते थे कि चंद्रपुर में जंगल में शौच करने गई महिला को बाघ ने मार दिया। अब बात अवनी की मौत से हगणदारी तक पहुंच गई। इस पर महाराष्ट्र के वन मंत्री सुधीर मुनगंटीवार कहते हैं कि अवनी की मौत पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। अरे साहब असली राजनीति की शुरुआत तो आपने ही की थी।

11 नवंबर को 168 संस्थाओं ने कैंडल मार्च निकालकर बाघिन अवनी की मौत का विरोध किया। यह कैंडल मार्च मात्र दिखावा नहीं बने। इस बात की बेहद अहमियत है कि पर्दे के पीछे की सच्चाई क्या है? बात यह है कि बाघिन को मारने के बाद उसे नागपुर ले जाया गया जहां उसे डॉक्टर ने मृत घोषित कर दिया। पोस्टमार्टम में यह पता चला कि उसके पिछले भाग पर गोली मारी गई थी। ऑटोप्सी करने के बाद पता चला कि अवनी ने 4-5 दिनों से कुछ खाया ही नहीं था क्योंकि उसके पेट में गैस और तरल पदार्थ भरा हुआ था। इसके अलावा उसके शरीर में नमी की कमी पाई गई और इंसानी मांस का कहीं कोई जिक्र नहीं हुआ। अवनी तो चली गई लेकिन अपने कई राज छोड़ गई।

बाघ और जंगली जानवर इतने आक्रामक क्यों रहे हैं? इसका सीधा सटीक कारण है अतिक्रमण। इंसान अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए वन्य जीवों के क्षेत्र में अतिक्रमण कर रहा है। खेती और आवास के लिए जंगलों का सफाया किया जा रहा है। नेशनल पार्क और अभ्यारण्यों में वन्यजीवों के आवास को छेड़ा जा रहा है। इन सबसे वन्यजीवों की इंसानी बस्ती में चहलकदमी बढ़ गई है। इन सबका नतीजा सबके सामने है। हमारे संविधान के भाग-4 में राज्य के नीति निर्देशक तत्वों का जिक्र किया है। अनुच्छेद 48(क) में जिक्र है कि पर्यावरण और वन्यजीवों का राज्यों द्वारा संरक्षण और संवर्धन किया जाएगा। मैं राज्यों से पूछना चाहता हूं कि अवनी की तरह? यह हमारा भी व्यक्तिगत दायित्व बनता है कि हम अपने पर्यावरण और वन्यजीवों को संरक्षित और संवर्धित करें।

अब सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे देश का कानून क्या कहता है? क्या अवनी को मारना सही है? महाराष्ट्र वन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार बताया गया कि उन्हें राष्ट्रीय व्याघ्र संरक्षण प्राधिकरण से अवनी पर कार्रवाई की इजाजत प्राप्त थी। भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अनुसार बाघिन अवनी की हत्या नहीं हुई है। उसे मारना सही है। अधिनियम कहता है कि यदि कोई बाघ आदमखोर हो चुका है, गंभीर बीमारी से ग्रस्त है या किसी अन्य कारण को लेकर चीफ लाइफ वार्डन तय कर सकता है कि बाघ को मारा जाए या नहीं। चीफ लाइफ वार्डन ही तय करता है कि उसे बेहोश किया जाए, स्थानांतरित किया जाए या गोली मार दी जाए। हमारा कानून यह भी कहता है कि आत्मरक्षा के लिए आप बाघ को मार सकते है और इसके साथ ही यदि वह सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है तो उसे मारा जा सकता है। यह है हमारा कानून। वन विभाग की टीम ने आत्मरक्षा का तर्क देते हुए बाघिन पर गोली चलाई थी। कई पशु प्रेमियों का कहना है कि यह गलत है कि उस पर गोली चलाई गई यदि आत्मरक्षा के लिए गोली चलाई गई होती तो गोली बाघिन के पिछले हिस्से की जगह अगले हिस्से में लगती।

अवनी चली गई। अपने पीछे कई सवाल छोड़ गई और बहस के लिए विषय भी। अवनी अपने पीछे दो नन्हें बच्चे भी छोड़ गई जिनका ध्यान रखना हमारा दायित्व है।

📃BY_vinaykushwaha

रविवार, 28 अक्टूबर 2018

बात केवल जमाल खाशोगी की नहीं है....



प्राचीनकाल में एक राजा अपना संदेश  दूसरे राजा  तक पहुंचाने के लिए अपना दूत भेजता था। दोनों राजाओं में भले ही कितनी भी शत्रुता हो लेकिन दूत को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुंचाई जाती थी। किसी भी प्रकार से दूत को नुकसान नहीं पहुंचाया जाता था। दूत को संदेशवाहक या मैसेंजर के रूप में देखना ठीक होगा। ये मैसेंजर समाचार और जानकारी को एक राज्य से दूसरे राज्य तक पहुंचाते थे। सामान्य जानकारी से लेकर युद्ध जैसी विध्वंस जानकारी भी पहुंचाई जाती थी। आज के दौर में दूत पत्रकार का रूप धारण कर चुके हैं। पत्रकार एक ऐसा प्राणी होता है जो कि दुनिया के सामने खबर को लेकर आता है।

पत्रकार का काम केवल खबरों को सबके सामने लेकर आना बस नहीं है। जो खबर वह लेकर आता है उसका विश्लेषण करना है और नफा-नुकसान के बारे में लोगों को अगाह करना है। पहले जहां पत्रकार स्वतंत्र होकर अपनी पत्रकारिता को अंजाम देते थे वही आज विभिन्न संगठनों से जुड़कर समाचारों का आदान-प्रदान किया जाता है। इस समय खबरों का दायरा बढ़ गया है और विविधता भी आई है। इसी कारण पत्रकारिता करने के तौर-तरीके भी बदले हैं। जहां पहले पत्रकारिता केवल समाचारपत्रों तक सीमित थी वही आज इसका दायरा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रिंट मीडिया, डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया तक फैल चुका है। एक बात जो पुराने समय से आजतक नहीं बदली है वह जान का खतरा।

पुराने समय में जहां लेख लिखने पर सरकार आपको जेल में डाल देती थी क्योंकि उसमें सरकार और उनके नेताओं की आलोचना होती थी। आपातकाल के समय सरकार ने कुछ इसी तरह का काम किया था। प्रेस सेंसरशिप लागू कर दी थी‌। पत्रकारों को सरकार के अनुरूप लिखना पड़ा था। जिन पत्रकारों ने इसके खिलाफ आवाज उठाई उनकी कलम की नोंक को तोड़ दिया गया। साल 1977 की तुलना वर्नाकुलर प्रेस एक्ट से करना बाजिव होगा। अंग्रेजी हुकूमत ने अखबारों को केवल इंग्लिश में लिखने की इजाजत दी थी। इंग्लिश में लिखने की इजाजत मतलब यह था कि किसी अन्य भारतीय भाषा में लिखने से आपको गैर-कानूनी समझा जाता था। इस पूरे वर्नाकुलर प्रेस एक्ट का सार यह था कि तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत ने पत्रकारिता में अन्य भाषाओं पर बैन इसलिए लगाया था ताकि वे ब्रिटिश सरकार के खिलाफ छापी जा खबरों पर नियंत्रण लगाया जा सके। इंग्लिश में लिखने से किसी भी गंभीरता को जल्दी से पकड़ा जा सकता था।

इसी एक्ट के कारण कई अखबारों ने खुद को रातों-रात स्थानीय भाषा से इंग्लिश में बदल लिया। इन अखबारों में बंगाल का अमृतबाजार पत्रिका शामिल है। अमृतबाजार पत्रिका ने इंग्लिश में लिखने के बावजूद आलोचना करना नहीं छोड़ा।  दो सम्पादकीय  'टु हूम डज इण्डिया बिलांग?'  और 'अरेस्ट ऑफ मिस्टर गांधी : मोर आउटरेजेज? इंग्लिश में छपे। इन्हीं सम्पादकीय के कारण समाचार पत्र की सम्पादकीय फीस जब्त कर ली गई। इस तरह पत्रकारिता ने अपना जीवन जिया है। इस घुटन भरे समय में पत्रकारिता करना दुष्कर था पता चलता है। 1878 और 1977 में 99 साल का अंतर है लेकिन बात वहीं की वहीं है। तब भी सत्ता डरती थी और आज भी डरती है। साल 1878 में किसी तरह का कोई तंत्र नहीं था लेकिन 1977 में लोकतंत्र होने के बावजूद पत्रकारिता राजतंत्र में जी रही थी।

भारत में आपातकाल लागू हुए 41 साल हो चुके हैं और आज भी पत्रकारिता का भय काल बनकर सत्ता को डराता है। आज भी कई ऐसे मामले सुनने में आते हैं जो कि डरा देने वाले होते हैं। पत्रकारों को जान से मारा जा रहा है। राजदेव रंजन हत्याकांड एक बेहद ही चौंका देने वाला हत्याकांड रहा है। इसने न केवल पत्रकारिता का गला नहीं घोंटा बल्कि पत्रकारिता को तिल-तिलकर मरने पर मजबूर किया। समाचार का सार न बताने पर इस तरह मारना वीभत्सता है। इन सबमें सबसे बड़ी बात यह है कि राजनेताओं का इन सब में हाथ होना है। इसी साल की खबर है जब जून 2018 में  शुजात बुखारी की हत्या कर दी गई। शुजात अंग्रेजी अखबार 'राइजिंग कश्मीर' के प्रधान संपादक थे। उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई। वे कश्मीर में स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा देने और शांति बहाल करने में लगे हुए थे। इस बात से किसको दिक्कत होगी कि वे इस तरह का एक शानदार काम रहे थे।

पत्रकारों की जमात में कुछ जयचंद भी होते है जो आसमान में कलंक की तरह होते हैं। शासन और प्रशासन की चाटुकारिता में तल्लीन होते हैं ताकि अपनी साख बनाए रखें और लंबी पारी खेल सकें। कुछ पत्रकार अडिग होते जो किसी लालच के बिना काम करते हैं। इन्हीं पत्रकारों पर सबसे ज्यादा मुसीबतें आती है। पत्रकारों का काम केवल अब खबरों का प्रकाशन मात्र नहीं रह गया है। इन सबसे आगे खबरों पर चर्चा और विश्लेषण एक बड़ा भाग बन चुका है। इसमें भी सरकार को समस्या है। इसी समस्या के कारण कुछ टीवी चैनलों को परेशान किया जा रहा है। पत्रकारों और संपादक को चैनल से बाहर निकलवाया जा रहा है। चैनलों पर एक अजीब तरह की सेंसरशिप लगी हुई है जिसमें लोग काम कर रहे हैं। जीवन जीने का माध्यम बन चुकी पत्रकारिता अब भी जीवंत है। सरकार के मन मुताबिक काम न करने पर चैनल को ब्लैक आउट करने की परंपरा बन गई है। यह कितना सही है और गलत यह समझने में किसी को देर नहीं लगेगी।

जर्मनी की एक प्रसिद्ध पत्रिका 'शार्ली एब्दो' पर आतंकियों ने 2015 में हमला कर दिया। इस हमले ने 12 लोगों की जान ले ली। इल्जाम लगा अलकायदा पर। पत्रिका की गलती केवल इतनी थी कि उसने व्यंग्य के लिए मोहम्मद साहब का कार्टून बना दिया। इससे घबराए लोगों ने पत्रिका के ऑफिस हमला बोल दिया। यह कितना सही है कि आपको जो अच्छा न लगे उसे हटा दें। विकल्प हमेशा मौजूद हैं। पाकिस्तान में ईशनिंदा के नाम पर जाने कितने पत्रकार भेंट चढ़ गए। कुछ साल पहले बांग्लादेश में ब्लॉगर्स का कत्ल-ए-आम चल रहा था। इस कत्ल-ए-आम में उन ब्लॉगर्स को निशाना बनाया गया जो कि सरकार के खिलाफ लिख रहे थे। इन ब्लॉगर्स को अपनी जान देकर पत्रकारिता का धर्म निभाना पड़ा।

दुनिया भर में इस तरह के किस्से हैं। चीन एक ऐसा देश है जहां सरकार तय करती है कि मीडिया में किस तरह का कंटेंट जाएगा। एक बार बीजिंग एयरपोर्ट पर एक बम ब्लास्ट हुआ जिसकी खबर कई घंटों तक मीडिया में नहीं आ पाई उसका कारण यह था कि यदि यह खबर मीडिया में आ जाती तो सरकार पर सुरक्षा लिहाज से अंगुली उठती। इसके अलावा चीन में केवल मेनस्ट्रीम मीडिया पर ही नहीं बल्कि सोशल मीडिया और माइक्रोब्लॉगिंग साइट पर भी कड़े प्रतिबंध लगाकर रखें गए हैं। इन प्रतिबंधों का कारण है कि लोगों पर निगरानी रखना है। चीन के पश्चिमी प्रांत शिंजियांग में उइगुर मुस्लिमों पर अत्याचार के किस्से जगजाहिर है। इसी साल चीन ने चार पत्रकारों को चीन का वीजा नहीं दिया। वीजा न देने का कारण था वे शिंजियांग प्रांत जाकर वहां की ग्राउंड रिपोर्ट करना चाहते थे। इन चार पत्रकारों में भारतीय मूल की अमेरिकी पत्रकार मेघा राजगोपालन भी थी।

मिस्त्र की क्रांति के समय कई पत्रकारों को इजिप्ट आने से रोक दिया गया था। इन पत्रकारों में सबसे कड़वा अनुभव अल-जजीरा का है। इसका कारण यह था कि अल-जजीरा ने कई सच को उजागर किया था। अल-जजीरा हमेशा से निशाने पर रहा है। चाहे अमेरिका हो या मध्य-पूर्व उसे सभी ने हाथोंहाथ लिया है। अल-जजीरा को तो अपना अमेरिका स्थित ब्यूरो ऑफिस ही बंद करना पड़ा। कतर का यह चैनल दुनिया भर में मशहूर है कारण साफ है पत्रकारिता की धार। कतर पर 2017 में छह मध्य पूर्व के देशों ने प्रतिबंध लगाए थे और राजनयिक संबंधों को तोड़ने के साथ-साथ अल-जजीरा पर भी प्रतिबंध लगा दिया था।

पत्रकारिता जगत को इस साल की सबसे बड़ी दुर्घटना का सामना करना पड़ा। जमाल खाशोगी की हत्या। जमाल सउदी अरब मूल के अमेरिकी पत्रकार थे। उन्हें केवल इसलिए मरवा दिया गया क्योंकि वे शाही परिवार की आलोचना कर रहे थे। परिवार के गलत निर्णयों के खिलाफ लिख रहे थे। लिखने की सजा उन्हें जान गवांकर  देनी पड़ी। सबसे बड़ी बात यह है कि उनकी हत्या न तो अमेरिका में हुई और न तो सउदी अरब में हुई। उनकी हत्या तुर्की में सउदी अरब के दूतावास में हुई। उनकी हत्या से पत्रकारिता जगत स्तब्ध है। सउदी अरब और तुर्की दोनों हत्या पर राजनीति कर रहे हैं। हत्या का इल्जाम सउदी अरब पर जा रहा है क्योंकि जब जमाल ने सउदी दूतावास के अंदर गए तो दुबारा नहीं लौटे। यहां तक उनका शव भी नहीं मिला। ऐसा तो कभी हो नहीं सकता कि तुर्की को इस हत्या के बारे में जानकारी न हो। उसके देश में दो प्राइवेट प्लेन से हत्यारे आते हैं और हत्या करके चले जाते हैं। इसका पता तुर्की को न हो ऐसा तो हो ही नहीं सकता ।

अब यह मुद्दा केवल जांच का नहीं रह गया है। यह मुद्दा पत्रकारिता और पत्रकारों को बचाने का भी है। आने वाला समय किसने देखा है परंतु पत्रकारिता जीवित रहे यह मेरी आस है।

📃BY_vinay Kushwaha

गुरुवार, 18 अक्टूबर 2018

इलाहाबाद और भी हैं...

भारत एक शानदार देश है। इसकी महानता इसकी विशालता और विविधता से दिखाई पड़ती है। भारत कोई एक झटके में बनने वाला देश नहीं है। इसने कई उतार-चढ़ाव देखें हैं। भारत का नाम शकुंतला के पुत्र भरत के नाम पड़ा। भारत को और भी अनेक नामों से जाना जाता था और है। इन नामों में आर्यावर्त, जम्बूद्वीप जैसे नाम हैं। भारत को भारत आज कितने लोग बोलते हैं? यह सवाल  नहीं बल्कि भारत सरकार के लिए एक बड़ा सवाल है। अंग्रेजों के आने के बाद भारत इंडिया बन गया। वास्कोडिगामा ने भारत की खोज नहीं की थी बल्कि इंडिया की खोज की। भारत को उसके बाद से इंडिया नाम से नाम भी जाना जाने लगा। आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत इंडिया है न कि भारत। यह हमारी बिडंबना है कि भारत, भारत में है और भारत से बाहर इंडिया। हमारे देश के कुछ अंग्रेजीदां लोग भी भारत की एवज में इंडिया ही बोलते हैं।

नामकरण संस्कार सोलह संस्कारों में से एक महत्वपूर्ण संस्कार है। जब बच्चा बड़ा होने लगता है तो उसे नाम की जरूरत होती है। नामकरण संस्कार इसी का कारण किया जाता है। इसी तरह किसी देश, राज्य और शहरों का नामकरण किया जाता है। किसी भी जगह का नामकरण उसके इतिहास, भूगोल, राजनैतिक कारण, व्यक्तिगत योगदान आदि पर निर्भर करता है। ताजा विवाद इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज रखने को लेकर है। इलाहाबाद उत्तरप्रदेश का एक महत्वपूर्ण शहर है।  इसका इतिहास कई दशकों का नहीं बल्कि कई युगों का है। यहां मनु के वंशज पुरुरवा एल का उल्लेख मिलता है। उत्तर प्रदेश सरकार ने यह कहते हुए नाम बदल दिया कि इलाहाबाद का पुरातन काल से नाम प्रयागराज ही था। एक और कारण बताया कि क्या आपका(मनुष्य) एक बार नामकरण करने बाद नाम बदला जाता है? नहीं बदलते तो फिर शहर का नाम क्यों? इसके अलावा इलाहाबाद का इतिहास भी हवा में तैर गया कि इसका नाम अकबर ने इलाहाबाद में बदल दिया था। इलाहाबाद का अर्थ निकाला गया कि अल्लाह का आबाद किया हुआ।

आज मैं एक लेख पढ़ रहा था जिसमें इलाहाबाद का नाम प्रयागराज करने को लेकर कटाक्ष किया गया था कि इलाहाबाद का अर्थ अल्लाह का आबाद शहर नहीं है। इसका कुछ और ही अर्थ होता है। उस लेख में इलाहाबाद का संबंध मनु की बेटी इला से जोड़ा गया। उसमें यह बताया गया कि इलाहाबाद का पहले नाम इलावास था। इलावास बाद में इलाहाबाद बन गया।

नाम बदलने की परंपरा कोई नहीं है। इसमें राजनीतिक प्रभाव ज्यादा रहा है। भारत में शहरों से लेकर राज्यों तक के नामों को बदला गया है। अंग्रेजों के समय मुंबई का नाम बॉम्बे था जो बाद में बंबई हो गया और आखिरी में मुंबई रखा गया। मुंबई रखने पीछे कारण दिया गया मुंबा देवी। मुंबा देवी के नाम पर मुंबई का नामकरण किया गया। केवल मुंबई ही नहीं और भी कई ऐसे शहर है जिनके नाम बदले गए। लोगों की भावना को बरकरार रखने के लिए तुष्टिकरण के लिए आदि। कोलकाता का पुराना नाम कलकत्ता था। कलकत्ता नाम अंग्रेज उपयोग किया करते थे। मद्रास का नाम चेन्नई किया गया। बंगलौर से बंगलुरू हो गया, त्रिवेंद्रम से तिरूवनंतपुरम हो गया, मैसूर , मैसूरू हो गया, पूना से पुणे हो गया। यह सब कुछ एक रात में नहीं हुआ। इन सबके पीछे बात यह थी कि अंग्रेजों की सोच को पीछे छोड़ना चाहते थे। लेकिन हमारे साथ दिक्कत है कि हम भावनाओं में बह जाते हैं।

इससे पहले गुड़गांव का नाम गुरुग्राम करने पर खूब विवाद हुआ लेकिन आखिरकार नाम बदल दिया गया। अब सवाल यह उठता है कि क्या बाकि शहरों का नाम भी बदला जाएगा। मथुरा को मधुपुर कहा जाएगा? कानपुर को कर्णनगरी? लखनऊ को लक्ष्मणावती? कर दिया जाएगा? इस सारे विवाद में वे शहर भी शामिल हैं जो अपने पुराने नामों से पहचाने जाने चाहिए। अजमेर को अजयमेरु, जैसलमेर को जैसलमेरु, अहमदाबाद को कर्णावती, भोपाल को भोजपाल, हैदराबाद को भाग्यनगर, इंदौर को इंदुर, भुवनेश्वर को बिंदु सरोवर, मेरठ को मयराष्ट्र, जबलपुर को जबआलीपुरम, दमोह को तुंडीकेर कर देना चाहिए। क्या यह संभव है? परंपरा और पुरातन व्यवस्था के आधार पर नाम बदलना कहां तक उचित है। क्या सरकार में हिम्मत है कि वह दिल्ली का नाम इंद्रप्रस्थ और पटना का पाटिलीपुत्र करके दिखाए।

राज्यों का नाम भी समय-समय पर बदला गया। उत्तरांचल को उत्तराखंड कर दिया। उड़ीसा को ओडिशा कर दिया। क्या असम का नाम भी प्रागज्योतिष रखा जाएगा? महाभारत में असम का उल्लेख प्रागज्योतिष‌ के नाम से मिलता है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ का रामायण में दंडकारण्य के नाम से उल्लेख मिलता है।

सरकार को नाम बदलने से बढ़िया है कि काम करें। लोगों का हित देखे। लोगों के जीवन में समृद्धि आए ऐसे काम करें। नाम बदलना सरकार काम नहीं है। जब जनता चाहेगी तब नाम बदल जाएगा। सरकार को नामकरण को ट्रेंड नहीं बना लेना चाहिए। छत्तीसगढ़ सरकार की तरह नया रायपुर का बदलकर अटल नगर कर दिया। इतिहास गवाह है कि सत्ता जिसके हाथ में रही है उसने अपने पूर्व की सत्ता की बातों को पलटा है। 

पुराने समय से लेकर आज तक इतिहास उठाकर देखिए एक शहर कितने नामों से जाना गया है। एक शहर के कम से कम दो नाम जरुर मिलेंगे। जब मुस्लिम आक्रमणकारी आए तो उन्होंने अरबी और फारसी वाले खूब नामकरण किए। लगभग सारे बाद वाले शहर इन्हीं की देन है। मुगलों के बाद अंग्रेज,डच, फ्रांसीसी, पुर्तगाली आए तो इन्होंने अपनी भाषा में शहर का नाम रखा। इसके बाद सुविधानुसार शहर का नाम बदलते गए और शहर भी।

📃BY_vinaykushwaha