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गुरुवार, 13 अगस्त 2020

भारतीय वास्तुकला (श्रृंखला 4)


भारतीय संस्कृति में मूर्ति एक अभिन्न हिस्सा रही हैं। भारतीय स्थापत्य कला की बात की जाए और मूर्तियों के बारे में चर्चा न हो ऐसा हो ही नहीं सकता है। भारत का इतिहास उठाकर देखा जाए तो सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर आज तक मूर्ति का महत्व बना हुआ है। जहां सिंधु घाटी सभ्यता में उत्खनन में अनेकों मूर्ति मिली जिनमें एक पुरोहित की टेराकोटा की मूर्ति और नृत्य करती हुई कांसे से निर्मित नृतकी की मूर्ति सर्वाधिक प्रसिद्ध है। भारतीय मूर्तिकला में मूर्तियां बनाने में कई प्रकार की धातुएं जिनमें पीतल, तांबा, कांसा, फूला, सोना, चांदी,अष्टधातु , प्रस्तर(stone), मिट्टी आदि उपयोग किया जाता था और है। मूर्ति कला भारतीय स्थापत्य कला का अभिन्न हिस्सा है।

सिंधु घाटी की सभ्यता से बहुत पहले प्रौगेतिहासिक काल में मिट्टी से बने बहुत सी मूर्तियां प्राप्त हुई है जिनमें छोटे-छोटे विकृत रुप में कई आकृतियां प्राप्त होती हुई हैं। मिट्टी से मूर्तियां बनाना तब तक जारी रहा जब तक कि अन्य धातुओं से मूर्ति बनाने की तकनीक का ज्ञान नहीं हुआ था। मिट्टी से अभी भी मूर्तियां बनाई जाती है परंतु आज की मूर्तियों में और पहले मिट्टी से निर्मित मूर्तियों में जमीन आसमान का अंतर है। लेकिन प्रस्तर पर निर्मित मूर्तियां आज भी अद्वितीय है जिनकी बराबरी आज के कारीगरों द्वारा असंभव है। प्रस्तर निर्मित मूर्तिकला का बेमिसाल नमूना खजुराहों का मंदिर समूह है जो विभिन्न कहानी कहता हुआ प्रतीत होता है। प्रस्तर से निर्मित मूर्तियों के मामलों में भारतीय मंदिरों को देखा जा सकता है जिसमें कहानी को कहने के लिए मूर्तियों को मंदिर की दीवारों पर उकेरा जाता है। द्वारपाल आदि को उकेरा जाता है। कोणार्क का सूर्य मंदिर तो पूर्ण से कहा जाए तो एक मूर्ति ही है जिसे एक एक रथ का आकार दिया गया है। प्रस्तर पर मूर्ति कला के लिए द्रविड शैली में बने मंदिर के शिखर पर बने विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्ति अप्रतिम उदाहरण है।

मूर्ति कला भारत के विभिन्न हिस्सों में पहुंची तो उसी के अनुरुप ढ़ल गई। शारीरिक बनावट, रंग-रुप, अंलकार(रुपसज्जा, आभूषण, केशसज्जा, परिधान आदि), आस-पास का वातावरण का विवरण आदि। भारत में मूर्ति कला उत्तर भारत में अलग और दक्षिण भारत में अलग ही तरह से है जिसमें अंलकार, रुप-रंग आदि सबकुछ अलग-अलग है। यहां तक की देवी-देवताओं की मूर्तियों में अंतर स्पष्ट देखा जा सकता है। प्रस्तर की उपलब्धता भी मूर्ति कला में अहम योगदान देता है। उत्तर भारत में बलुआ पत्थर और दक्षिण भारत में बेसाल्ट की उपलब्धता प्रचुर मात्रा में है।जिसका उपयोग करके वहां मूर्ति बनाई जाती है। जब दक्षिण भारत से भारतीय संस्कृति इंडोनेशिया द्वीप समूह पहुंची तो मूर्तिओं में भारतीयता बनी रही परंतु रुप-रंग और वेशभूषा बदल गया।

इतिहास की बात करें तो विभिन्न काल समय में तरह-तरह की मूर्तियों के प्रमाण मिलते है। सिंधु घाटी सभ्यता में कई प्रकार की मूर्तियों का प्रमाण मिलता है जिनमें प्रकृति देवी की प्रतिमा, पुरोहित की प्रतिमा, नृतकी की प्रतिमा आदि है। सिंधु घाटी सभ्यता में पशु-पक्षियों को विशेष महत्व दिया जाता था उसमें भी बैल को। सिंधु घाटी सभ्यता के क्षेत्र के उत्खनन(excavation)से एक सील प्राप्त हुआ है जिसमें पशुपतिनाथ की आकृति को उकेरा गया है जिसमें पशुपतिनाथ के आस-पास गैंडा,भैंसा, हिरण, हाथी आदि को दिखाया गया है। सिंधु घाटी सभ्यता के क्षेत्र में उत्खनन(excavation) से लिंग और योनि की मिट्टी से बनी आकृतियां प्राप्त हुई हैं। यदि यह कहा जाए कि सिंधु घाटी सभ्यता में मूर्ति कला फल-फूल रही थी तो अतिश्योक्ति न होगी।

मौर्यकाल में मूर्तिकला ज्यादा प्रचलित तो नहीं हुई परंतु एक सीढ़ी और ऊपर चढ़ गई। परिष्कृत रुप में और ज्यादा निखर के सामने आई। अशोक स्तंभ जिसमें चार सिंहों की आकृति के नीचे अशोक चक्र और अशोक चक्र के एक ओर घोड़ा और दूसरी ओर बैल की आकृति बनी है और इसके नीचे उल्टा शतदल कमल बना हुआ है जिसे एक स्तंभ पर स्थापित किया गया था। सम्राट अशोक  के द्वारा बनवाए इस स्तंभ को भारत के विभिन्न हिस्सों में देखा जा सकता है जिनमें सांची, सारनाथ आदि अहम है। मौर्य कालीन इस बेमिसाल नमूने को भारत सरकार ने अपनी अधिकारिक मुहर के रुप में अपनाया है। सम्राट अशोक के समय एक और स्तंभ देखने को मिलता है जिसमें एक स्तंभ पर उल्टे शतदल कमल पर एक बैठा हुआ शेर दिखाई देता है। यद्यपि मौर्यकाल में स्तूपों, चैत्यों, गुफाओं का निर्माण कराया गया लेकिन मूर्तिकला पर ध्यान नहीं दिया।

गुप्तकाल को भारतीय स्थापत्य कला का स्वर्णयुग कहा जाता है। गुप्तकाल में मूर्तिकला खूब फली-फूली। मौर्यकाल में बौद्ध धर्म को ज्यादा प्रश्रय दिया वही गुप्तकाल में हिंदु धर्म के शैव,वैष्णव, शाक्त संप्रदाय,जैन धर्म और बौद्ध धर्म को अलग-अलग राजाओं ने मूर्ति के माध्यम से खूब बढ़ावा दिया। विष्णु, उमा-महेश्वर, ब्रह्मा, गंगा, यमुना, सरस्वती,जैन तीर्थंकर ( आदिनाथ, शांतिनाथ, पार्श्वनाथ,महावीर स्वामी आदि), महात्मा बुद्ध, यक्ष-यक्षिणी, अप्सरा, वराह अवतार, नारद,इंद्र, महिषासुरमर्दिनी, कंकाली देवी आदि की मूर्तियां स्पष्ट दिखाई देती हैं। गुप्तकालीन राजाओं के द्वारा निर्मित गुफाओं में हिंदु, जैन और बौद्ध धर्म की स्पष्ट झलक देखने को मिलती है जिनमें मध्यप्रदेश के विदिशा जिले में उदयगिरि की गुफा में इसका उदाहरण मौजूद है जिसमें एकलिंग प्रतिमा, वराह अवतार की तेरह फुट की मूर्ति, जैन तीर्थंकर की प्रतिमा दिखाई देता है। उदयगिरि के अलावा बाघ की गुफाओं में भी साफ-साफ सर्वधर्म समभाव की झलक देखने को मिलती है। जहां मौर्य काल में वृहद मात्रा में बलुआ पत्थर का उपयोग किया गया वही गुप्तकाल में बेसाल्ट,बलुआ पत्थर दोनों का उपयोग किया गया। गुप्तकाल में आग्नेय शैल (IGNEOUS ROCK) का ज्यादा उपयोग किया गया है।

मौर्य और गुप्तकाल के बीच के संक्रमण काल में शुंग आदि वंश की कामगारी को नहीं भुलाया जा सकता जिसमें सांची स्तूप के चारों दरवाजों पर उत्कीर्ण जातक कथाएं अद्वितीय है।

गुप्तकाल के बाद अनेक ऐसे शासनकाल आए जिन्होंने मूर्तिकला को बहुत ज्यादा बढ़ावा दिया। राष्ट्रकूट, पल्लव, चोल, चेर, होयसल, कल्चुरि, परमार, चंदेल, चौहान,  गांगेय, यादव आदि। अजंता-एलोरा, कान्हेरी, एलीफेन्टा,हाथीगुम्फा आदि गुफाएं बौद्ध मूर्तिकला का बेजोड़ उदाहरण है। परमार काल में राजा मुंज और राजा भोज ने विशेष योगदान दिया। राजा भोज ने मध्यप्रदेश के रायसेन के भोजपुर में एक भोजेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया। इस मंदिर में दुनिया की सबसे बड़ी  शिवलिंग स्थापित की गई है साथ ही गंगा, यमुना, अप्सरा, पार्वती,सरस्वती,लक्ष्मी,विष्णु की मूर्तियों को देखा जा सकता है। कल्चुरीकालीन राजाओं के द्वारा बहुत से मंदिर के निर्माण का कार्य किया गया लेकिन इनकी सबसे अनोखी दो बातें हैं पहली शाक्त परम्परा को बढ़ावा देना तथा वराह मूर्ति की स्थापना करना।

पूर्वी मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कल्चुरीकालीन मूर्तिकला को आसानी से देखा जा सकता है। अमरकंटक में जहां मंदिर समूहों में विभिन्न देवी-देवताओं जैसे कर्ण,सूर्य,लक्ष्मी,पातालेश्वर शिव मंदिर का निर्माण करवाया साथ ही साथ कलात्मक प्रतिमा स्थापित करवाई। जबलपुर में भेड़ाघाट के निकट कल्चुरी  शैली में निर्मित चौसठ योगिनी का मंदिर जिसमें एक गोलाकार मंदिर में चौसठ योगिनियों की प्रतिमा स्थापित की गई है साथ ही मंदिर के बीचोंबीच शिव-पार्वती का मंदिर है। मध्यप्रदेश में अनेकों जगह कल्चुरी शैली के कार्य की छाप देखने को मिलती है। मंदिरों के बाहर वराह की मूर्ति की झलक देखने को मिलती है। चंदेल शासकों की अनुपम धरोहर है खजुराहों के मंदिर समूह जिसमें लगभग हर देवी-देवताओं की मूर्ति देखना सुलभ है। खजुराहों की एक मूर्ति बहुत प्रसिद्ध है जिसमें एक लड़की अपने दोनों हाथों से बैठकर शेर के दोनों अगले पैरों को पकड़े हुए है। खजुराहों अपनी विशेष प्रकार की मूर्तिकला के लिए जाना जाता है कामुकता से परिपूर्ण नग्न मूर्तियां दिखाई देती है जो ऋषि वात्सायायन के कामसूत्र पर आधारित है।

दक्षिण भारत में राजराजा जैसे अनेकों राजा हुए है जिन्होंने मूर्तिकला को बढ़ावा दिया है। चोल राजाओं के समय में तो कांस्य(bronze) मूर्ति का निर्माण अपनी चरम सीमा पर था। नटराज की कांस्य प्रतिमा आज भी मू्र्तिकला में सर्वोच्च स्थान रखती है। दक्षिण भारत में मंदिरों में स्थापित मूर्तियां लगभग आग्नेय शैल(IGNEOUS ROCK)निर्मित है। मूर्तियों के श्रृंगार पर विशेष ध्यान दिया जाता है। बालाजी, स्वामी अयप्पा, मुरुगन, मीनाक्षी, विरुपाक्षी, शिवलिंग का श्रृंगार अनोखे तरीके से किया जाता है। कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में भगवान बाहुबली की सबसे ऊंची प्रतिमा स्थापित की गई है।

राजस्थान में लालपत्थर और संगमरमर की प्रचुरता होने से यहां मूर्ति कला बहुत तीव्र गति फला-फूला। मकराना का संगमरमर आज भी बहुत प्रसिद्ध है। जयपुर की एक गली का नाम तो मू्र्ति निर्माण के कारण खजाने वालों की गली रख दिया गया है। राजस्थान में राजाओं की कृपा से जैन धर्म अच्छी तरह फला फूला है जिसमें माउंट आबू का दिलवाड़ा मंदिर, रनकपुर का ऋषभदेव मंदिर आदि उदाहरण है। गुजरात में काले पत्थर का उपयोग मूर्तिकला में किया गया है।

भारत में हम जितना पूर्व की ओर जाते है तो वनों की सघनता उतनी बढ़ती जाती है। वनों की सघनता के कारण लकड़ी से बनने वाले सामान की मात्रा भी अधिक है। यहां लकड़ी से मूर्ति बनाने का काम भी सहज ही किया जाता है। चाहे हम ओडिशा से मणिपुर देखे तो लकड़ी की मूर्तियां दिखाई देती हैं। पुरी के जगन्नाथ जी की प्रतिमा हो या अन्य प्रतिमा लकड़ी से बनी हुई है।

भारत में वैसे तो कहा जाए तो मूर्तिकला तीन प्रकार से विभाजित किया है, गांधार,मथुरा और अमरावती शैली। गांधार शैली जिसे ग्रीको-रोमन,हिंद-यूनानी शैली भी कहा जाता है। इसे यह नाम देने के पीछे सीधा सा कारण है कि इसे बनाने की कला ग्रीस आई थी। इस शैली के बौद्ध प्रतिमा की यह खासियत है कि गौतम बुद्ध तपस्या में रत है साथ ही गहन मुद्राओं को धारण किए हुए है। उनके कपड़ों की सिलवट साफ-साफ देखी जा सकती है तथा आभूषण की मात्रा बिल्कुल कम है। इस शैली की मूर्तियां बनाने में बलुआ पत्थर और काले पत्थर का उपयोग किया जाता था। इस मूर्ति कला का प्रमुख क्षेत्र भारतीय सीमा से लेकर पश्चिमी पाकिस्तान और अफगानिस्तान का गांधार (कंधार)प्रदेश था।  मथुरा शैली पूर्णत: भारतीय मूर्तिकला का उदाहरण है। जिसे बलुआ पत्थर में निर्मित किया जाता था। इस शैली के बौद्ध प्रतिमा की खासियत यह है कि इसमें गौतम बुद्ध प्रसन्नचित्त अवस्था में दिखाई देते है जो कि अपनी विभिन्न मुद्राओं में पद्मासन में बैठे हुए दिखाई देते है। केश विन्यास खुला हुआ होता है जो कि उन्मुक्तता को प्रदर्शित करता है। अमरावती शैली दक्षिण भारत में विकसित हुए एक अनोखी शैली है। इस शैली के अंतर्गत मूर्ति बनाने में संगमरमर का उपयोग किया जाता है। इसमें जातक कथाओं के अनुसार गौतम बुद्ध की प्रतिमा को गढ़ा जाता है।

मुस्लिम आक्रमणकर्ताओं के आगमन के बाद भारतीय मूर्तिकला पर प्रतिबंध लग गया। भारत पर मुस्लिम शासकों ने लगभग 600 सालों तक शासन किया। इस्लाम में बुत अर्थात् मूर्ति परस्ती गैर-इस्लाम माना जाता है इसी कारण मुस्लिम शासकों के समय में अनेकों मूर्तियों के तोड़ा गया और किसी भी प्रकार की मूर्तिकला को बढ़ावा नहीं दिया गया। इसी कारण यह दौर भारतीय इतिहास में मूर्तिकला के लिए काला युग कहा जाता है। उसके बाद अंग्रेजों के 200 साल के शासन में भारतीय मूर्तिकला को ध्वस्त ही कर दिया क्योंकि भारतीय इस दौर में दो जून की रोटी के लिए तरसता था।

अंधेरा हमेशा के लिए नहीं होता है सूरज हर सुबह निकलता है। उसी तरह आज फिर से भारतीय मूर्तिकला उन्नति की राह पर अग्रसर हो रहा है।राजस्थान की संगमरमर से निर्मित मू्र्ति हो या ओडिशा की लकड़ी से निर्मित मू्र्ति या बस्तर में निर्मित पीतल की मूर्ति हो और कांसे से निर्मित मूर्ति हो या कर्नाटक की प्रस्तर मूर्तियां अपने शिखर पर हैं। भारतीय मूर्तिकला में फ्यूजन भी देखने को मिल रहा जिसमें भारतीय टच के साथ-साथ विदेशों से आयतित तकनीक का उपयोग कर मूर्ति कला को और समृद्ध बनाया जा रहा है।

                          ।।जय हिंद।।

📃BY_vinaykushwaha


कच्ची धूप

अचार की बरनी, रजाई, गद्दा और धूप सेंकते मानव शरीर सभी एक-दूसरे से बात कर रहे हैं ,धूप कच्ची है। ठंड की आवक वातावरण के साथ-साथ घर की दहलीज़ पर भी दस्तक देती है। धूप केवल धूप ही रह जाती है। ठंड के आने के साथ ही हवा में अलग ही तरह की ठंडक और मिठास घुल जाती है।ओस गिरने लगती है। ओस की बूंदें फूल की पखुंडियों पर एक नए तरीके की आकृतियां बनाती है, यही ओस की बूंदें पत्तियों पर से एक-एक बूंद मिलकर पानी की धार बनकर गिरती है। मकड़जाल को ओस तब और ज्यादा सुंदर बना देती है जब सूर्य की किरण मकड़जाल में गसी बूंदों में से होकर गुजरती है। रात के आगोश में ओस अपना खेल दिखाती है और सुबह की बेला में सूरज को किरणों को पीछे धकेलने का प्रयास करती है जिसके लिए साथ मिलता है धुंध का।

धुंध सूरज को एक ऐसे पारभासी चादर में समेट लेती जिसमें मानवजाति को लगता है कि सूरज का आभास होता है परंतु दिखाई नहीं देता। सूरज कोहरे की चादर में लिपटा हुआ संसार की सारी गतिविधियों को देखता रहता है। कोहरा, धुंध का बड़ा भाई है और भयावह रूप है। कभी-कभी सड़कों और रेल्वे ट्रेक पर अनहोनी का कारण बनता है। कोहरा सूरज को आसमान में आने से रोकने के लिए जीभर प्रयास करता है। कभी सफल हो जाता है तो दोपहर तक सूरज को अपना प्रकाश धरती पर नहीं आने देता और कोहरे के सामने सूरज बेबस नज़र आता है। कभी-कभी परिस्थितियां भिन्न होती जो सारी गतिविधियों को पलट देती है। सूरज कोहरे को किसी सुई की तरह भेदता हुआ अपनी किरणों से चहुंओर प्रकाशित कर देता है और कभी-कभी धीरे-धीरे कोहरे को चीरता हुआ अपनी लालिमा बिखेरता है। परंतु सूरज की किरणों में वो तीखापन नहीं होता जैसा शेष मौसम में होता है।

सुबह की रोशनी का फीकापन लिए सूरज दोपहर तक आसमान पर परवान चढ़ता है और अपने तेज से वातावरण को दीप्तमान करता है साथ ही गर्माहट भी। इस गर्माहट में वो ताकत नहीं होती जो हम सोचते हैं क्योंकि यह गर्माहट होती सर्दियों वाली धूप की। ठंड के मौसम में जीव और अजीव दोनों को धूप की जरुरत महसूस होती है। मगरमच्छ की तरह इंसान भी अपने शरीर को गर्म करने की कोशिश में लगे रहता ताकि विटीमिन डी की कमी न हो। धूप की जरुरत तो जीवों के लिए तो आसानी से समझ आती लेकिन यदि हम बारीकी से देखे तो अजीवों के लिए भी धूप का विशेष महत्व है। रेल की पटरियां ठंड के कारण सिकुड़ जाती है और धूप पाते ही अपनी वास्तविक अवस्था में आ जाती है, लेकिन धूप कच्ची होती है। पक्की वाली धूप का इंतजार कम से कम तीन महीनों का तो होता ही हैं। बरी, पापड़, चकली, बिजौरा के साथ-साथ विटीमिन डी पाने वालों के लिए धूप पर्याप्त होती है क्योंकि धूप कच्ची है।

जिस प्रकार हमारे जीवन में समय का महत्व होता है ठीक उसी प्रकार ठंड में धूप का होता है। ठंड की धूप एक निश्चित समय के लिए आती है फिर हमें लगता है कि आज दिन जल्दी ढ़ल गया। धूप कच्ची होती हुए भी कई सारे काम को अंजाम देती है। जैसे-जैसे सूरज आसमान में ऊपर चढ़ता जाता है वैसे-वैसे धूप मद्धम होती जाती है और अपना अस्तित्व खोती जाती है, अतत: दिन ढ़लने के बाद सूर्य के साथ-साथ धूप भी अस्त हो जाती है।

क्योंकि "धूप कच्ची" है।

📃BY_ vinaykushwaha

प्रेस दिवस



    खींचो न कमानों को, न तलवार निकालो। 
    जब तोप मुकाबिल हो, तो अखबार निकालो।।

आज हम ऐसे युग में है जहां सूचना का खुला प्रवाह हो रही है। आज प्रेस का मतलब केवल समाचार पत्र तक सीमित नहीं रह गया है। सूचना प्रौधोगिकी के इस युग में सूचना का संचार बहुत तेज गति से और विभिन्न रास्तों को तय करते हुए लोगों के बीच पहुंच रहा है। आज प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक के अलावा वेब मीडिया भी आ चुका है जो आज के लोगों का हथियार बन चुका है। इस प्रेस नामक हथियार का प्रयोग लोग अपने अधिकारों की रक्षा के लिए बड़ी सजगता से कर रहे हैं।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्व प्रेस दिवस 3 मई को मनाया जाता है जबकि यह भारत में 16 नंवबर को मनाया जाता है। 16 नंवबर को प्रेस दिवस मनाने के पीछे एक कारण है वह यह कि इसी दिन प्रेस कांसिल ऑफ इंडिया ने कार्य करना शुरु किया था। प्रेस कांसिल ऑफ इंडिया के स्थापना के पीछे प्रेस को स्वतंत्रता प्रदान करना था जिससे प्रेस स्वछंदता से कार्य कर सके।

आज हमारा समाज बहुत आगे निकल चुका है जिसने कई तरह की उपलब्धियों को हासिल कर लिया है। प्रेस की कल्पना अब केवल समाचार पत्र के माध्यम से नहीं की जा सकती है। समाचार पत्रों का स्वरूप भी बदल चुका है समाचार पत्र ई-पेपर के रूप में पाठक समक्ष मौजूद है। जिसे जब चाहे , जहां चाहे पढ़ा जा सकता है। भले ही आज न्यूज पेपर की सर्वाधिक ग्रोथ भारत में हो परंतु आज हम इलेक्ट्रॉनिक और वेब माध्यम को झुठला नहीं सकते है।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को समाचार पत्र के विकल्प के रूप में देखा जा रहा था परंतु वेब मीडिया ने उसका वो स्थान छीन लिया है। कुछ समय के लिए इलेक्ट्रॉनिक राजा के सिंहासन पर बैठा था परंतु यह समय अत्यल्प था। वेब मीडिया आज का ही नहीं आने वाले कल का माध्यम भी है। वेब मीडिया पर आज वो सबकुछ मौजूद है जो इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में उपलब्ध नहीं है। वेब मीडिया आज ताज को पहने हुए है।

वेब मीडिया आज भी कई लोगों की पहुंच से बाहर है। वेब मीडिया समाज के लगभग हर वर्ग तक पहुंच चुका है परंतु कुछ समस्याओं के चलते समानांतर मीडिया का विकल्प भी  आज खुला हुआ है। समानांतर मीडिया आज भले ही मुख्य धारा से अलग हो परंतु समाज में संचार करने के लिए उपयोगी है।

मीडिया या प्रेस का केवल तीन काम होता है to educate, to inform and to entertain । इन्हीं तीन कार्यों के इर्द-गिर्द सारा मीडिया कार्य करता है।

हमारे देश में प्रेस कांसिल ऑफ इंडिया एक स्वायत्त संस्था है जो कि प्रेस को दिग्भ्रमित होने से बचाने का कार्य करती है। नियम एवं कानून का सही तरीके से पालन करने के लिए प्रेस निर्देशित करती है। किसी भी प्रकार से पक्षपात रहित खबर बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहित करती है।

प्रेस दिवस मनाने के पीछे वास्तविकता से कहा जाए तो प्रेस की उपस्थिति समाज के लिए क्या है यह बताना है।

सर्वकामना सिद्ध करें मां नर्मदा


नमामि देवी नर्मदे .... के स्वर से अमरकंटक से भरुच तक का कण-कण गुंजायमान होता है। आदिगुरू शंकराचार्य जी जब अमरकंटक आए और यहां मां नर्मदा का सौंदर्य निहारा तो उनका मन-मतिष्क नर्मदा का महिमा गान करने से नहीं रोक पाया। उन्होंने नर्मदाष्टक की रचना कर दी। भारत की पवित्रतम नदी जो मेरे लिए तो मां से कम नहीं है क्योंकि जिसने दुनिया की सबसे पुरानी संस्कृति को जन्म दिया हो वो भला मां न हो तो क्या हो? जो लाखों-करोड़ों लोगों को अपना शीतल, मृदु , कंचन जल प्रदान करती हो वो भला मां न हो तो क्या हो? जो लाखों किसानों की मदद करते हुए धरती को शस्य-श्यामला बनाती हो तो वो भला मां न हो तो क्या हो? जो लाखों लोगों को रोजगार प्रदान करें वो भला मां न हो तो क्या हो? जो अपने दोनों पार्श्वों ( सतपुडा पर्वत और विन्ध्याचल पर्वत) को पोषित करती हो वो भला मां न हो तो क्या हो? भांति-भांति...

मां नर्मदा ने अपने कई रुप धारण किए हुए है लेकिन वो रुप जिसमें भारत की अन्य सरिता बहती है वो है कुवांरी। मां नर्मदा भी अन्य नदियों की तरह कुवांरी है जो सदा कल-कल की धारा के साथ प्रवाहित होती रहती है। अमरकंटक में मां नर्मदा अपने बचपन की अटखेलियां करती है। माई की बगिया में आप अपने बचपन के बचपनों को साकार रुप देती है। भूगोलशास्त्री (geographer) के अनुसार नदी की तीन अवस्था होती है युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था। लेकिन मेरे अनुसार तो मां नर्मदा की केवल एक ही अवस्था है युवावस्था। उछल-कूद करता हुआ पानी मैकल की पहाड़ियों से पश्चिम दिशा में आगे बढ़ता जाता है। घने जंगलों और एक के बाद एक जलप्रपात बनाते हुए नर्मदा आगे बढ़ती जाती है। अमरकंटक में दुग्धधारा और कपिलधारा जलप्रपात बनाते हुए अपनी सखी सहेली और दोस्त(सोन, जोहिला सोन) को पीछे छोड़ते हुए आगे सतपुडा और विन्ध्याचल के बीच कही जॉर्ज तो कही महाखड्ड तो कही रैविन बनाते हुए आगे बढ़ते जाती है। घने जंगलों से होकर कही लुप्त हो जाती है तो कही प्रकट होकर अपनी उपस्थिति दर्ज करा देती है।

कही मनोरम धुंआधार जलप्रपात बनाती है तो कही मार्बल रॉक के बीच से होकर गुजरते हुए मनभावन कलात्मक कारीगरी करती है तो कही सहस्त्र धाराओं में बंटकर सहस्त्रधारा जलप्रपात बनाती है। गुजरात में समुद्र में मिलने से पूर्व नर्मदा जलप्रपात का निर्माण करती है।

मां नर्मदा मनुष्यों को ही नहीं वन्यजीवों को भी जीवन प्रदान करती है। पेंच,कान्हा,सतपुडा जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय उद्यान के जीवों को जीवन देती है। भारत के सबसे पुराने वनों में से एक को जीवित रखती है। महाशीर से लेकर राजासॉरस नर्मदेन्सिस और जबलपुरसॉरस को भी जीवन दिया ऐसी है मां नर्मदा।

मां नर्मदा को शंकर भगवान की पुत्री कहा जाता है इसलिए इन्हें शांकरी भी कहा जाता है। नर्मदा जिसका अर्थ है कि सुख को देने वाली अर्थात् सुखदात्री मां। नर्मदा का हर पत्थर एक शिवलिंग के समान है क्योंकि भगवान शिव ने स्वयं मां नर्मदा को वरदान दिया था कि नदी एवं तुम्हारे तट पर स्थित हर पत्थर एक शिवलिंग है जिसे बिना प्राण-प्रतिष्ठा के स्थापित किया जा सकता है। मां नर्मदा की बात ही निराली क्योंकि इस सृष्टि का सर्वनाश होने पर भी मां नर्मदा सदा प्रवाहित होती रहेंगी। हमारे धर्म ग्रंथों में नर्मदा को रेवा नाम से पुकारा गया है जिसका अर्थ है 'उछलने कूदने वाली नदी' क्योंकि मां नर्मदा ऐसा मार्ग चुनती है जो ऊंची-ऊंची पहाडियों और दुर्गम रास्ते वाला है। मां नर्मदा के इनके अलावा कई और नाम है जैसे नामोदास, सामोद्भवा (सोम पर्वत से जिसका उद्भव हुआ हो ), मैकलसुता (मैकल पुत्री)।

मां नर्मदा ने कई युगों को देखा। कई शासन को पोषित किया या यूं कहे कि कल्चुरी, गौंड जैसी शासक व्यवस्था को बनाए रखने में मदद किया। भारतीय पुरातत्व विभाग कहता है कि भारत की सबसे पुरानी सभ्यता जिसे हम नर्मदा घाटी सभ्यता कहते है उसने यही जन्म लिया। नर्मदा ने कई तीर्थों अमरकंटक, ओंकारेश्वर, महेश्वर को जन्म दिया। मां नर्मदा को मध्यप्रदेश की जननी कहा जाता है या यूं कहे कि जीवन का आधार या मध्यप्रदेश की जीवन रेखा।

जिस प्रकार जीवन प्रति क्षण देश लिए समर्पित है ठीक उसी प्रकार इस शरीर का रोम-रोम मां नर्मदा के लिए समर्पित। भगवान शंकर ने वरदान देकर मां नर्मदा को पापनाशिनी या नर्मदा को देखने वाले के पाप नष्ट हो जाएंगे। ऐसी मां सर्व कामना सिद्ध करें मां नर्मदा।


बनारस की बात


जनवरी की ठंड और गंगा का किनारा हो तो पल को और ज्यादा रोमांचक बना देता है। कोहरे में लिपटा हुआ गंगा के किनारे के साथ-साथ घाटों को और ज्यादा आकर्षक बना देती है। बनारस की हर बात निराली है। चाहे यहां का पान हो या साड़ी , चाहे चाय हो या फैना , चाहे गलियां हो या घाट , चाहे मंदिर हो या मौसम सब कुछ बिंदास है। बनारस की फिज़ा ही कुछ अलग है।बनारस कहो या काशी या वाराणसी सभी शहर के पर्याय होने के बाद भी वही अनुभव देता है। बनारस की एक खूबी हो तो कुछ बोलूं और लिखूं यहां तो इतना है कि कोटि-कोटि बोलना ही सही होगा।

बनारस के घाट का जीवन अनोखा ही है। एक तरह से कहा जा सकता है कि यहां सामान्य जीवन नहीं होता है। दैनिक जीवन में जो हम जिंदगी जीते है वह यहां लागू नहीं होती। या यूं कहा जाए कि इन घाटों ने सदियों से जीवन की रुपरेखा का बदलकर रख दी है। गंगा के पश्चिमी किनारे पर दूर-दूर तक फैले घाट अपनी विशालता का अनुभव कराते हैं। सामान्य जनमानस में जहां दशाश्वमेध और मणिकर्णिका घाट ही प्रचलित है वही ऐसे कई घाट है जो अपने अस्तित्व का परिचय खुद ही दे रहे हैं। घाटों का जीवन एक अलग ही दुनिया की ओर ले जाता है।

गंगा का जल घाटों पर बार-बार कुलाचें मारता है। गंगा पर नाव अपनी चहल-पहल से इस घाट वाली जिंदगी को सतरंगी दुनिया में प्रवेश करा देती हैं। गंगा के पश्चिमी किनारे से पूर्वी किनारे तक जहां केवल रेत का
टीला है नावों की आवा-जाही बनी रहती है। टीले से घाटों का नज़ारा देखने लायक होता है, जिसके लिए मेरे पास शब्दों की कमी हो गई है। मोबाइल का कैमरा भी वाइड एंगल नहीं ले पा रहा है। सच में धन्य है वाराणसी। मल्लाहों के बोल-बोला से घाट से रेत के टीले तक जाने का सफर और ज्यादा सुगम हो जाता है। कोहरे में लिपटी यह काशी अपने अनेकों रंग-बिरंगे परिवेश से लेकर घाटों पर अवतरित तरह-तरह के लोगों के लिए जानी जाती है।

बनारस की शुरुआत तो तभी हो जाती है जब लोगों में यह उत्सुकता बढ़ जाती है कि ट्रेन स्टेशन पहुंचने वाली है। भगवान भोलेनाथ की नगरी की फिज़ा बनारसी ठंडाई से महकने लगती है। कुल्हड़ की चाय से लेकर सतरंगी-अतरंगी बाजारों तक बनारस की बात ही कुछ और है। एक ओर तांबे-पीतल के चमकदार बर्तनों की दुकान तो एक ओर पेड़े की दुकान , वही एक ओर कंठी-माला तो दूसरी ओर प्रसादों से सजी दुकानें। कही छनती पूड़ियां-कचौडियां तो कही पान पर लगता गुलकंद सब की बात ही बेमिसाल है क्योंकि यह बनारस है।

हर-हर महादेव, बाबा विश्वनाथ की जय , बम-बम भोले के गान सहज ही कानों को छूकर जाते है। यहां की हर गलियां तो यही कह रही होती है यह बाबा विश्वनाथ का शहर है। यहां तो एक ही मालिक है बाबा विश्वनाथ। एक ओर जहां बाबा विश्वनाथ मंदिर में घंटा-ध्वनि सुनाई देती है वही दूसरी ओर ज्ञानवापी मस्जिद से सुनाई देती अज़ान समां में कुछ अलग ही रंग घोलती है।


दुकान में सजी या यूं कहा जाए कि दुकान की ओट से झांकती जरी वाली चटक रंग की बनारसी साड़ियां बरवश ही अपनी ओर खींचती है। कारीगरी की बेमिसाल नमूना यह साड़ी बनारस की आन-बान-शान कहा जाए तो अतिश्योक्ति न होगा। कपड़ों का सतरंगी आसमां बनारस की गलियों को और ज्यादा रोचक बना देता हैं। कही मंदिर के लिए लगी कतारें तो कही साधु-सन्यासियों का जमावड़ा बिल्कुल बनारस वाला टच देता है।

डॉ राजेन्द्र प्रसाद घाट हो या लाली घाट , पांडेय घाट हो या अहिल्या घाट सभी उसी तरह है जैसे सूर्य का प्रकाश। कोई इन घाटों पर ट्रेवलर बनाकर आया है तो कोई श्रद्धालु के रुप में मां गंगा का आशीर्वाद लेने आया है। कही साधु-सन्यासी ध्यान में मग्न नज़र आते है तो कही लोगों को ज्ञान बांटते हुए। कही कोई वैरागी चिलम पीते हुए मिलता है तो कोई अक्खड़पन में अपनी चाल में चलता हुआ। इस शहर में देशी क्या? विदेशी क्या? सभी एक ही रंग में नज़र आते हैं, वह रंग है बनारस। विदेशी अपनी जिज्ञासा को शांत करने, ज्ञान की तलाश में, भारतीयों की अटूट धार्मिक श्रद्धा देखने और कुछ पर्यटन के उद्देश्य से आते हैं। इन घाटों की जितनी महिमा गाई जाए उतनी कम है।

बनारस में सभी को एक रस प्राप्त होता है जिसे आनंद कहते है। मनुष्य यहां हर रुप में सहज ही मिल जाता है। जहां एक ओर मनुष्य दशाश्वमेध घाट पर धार्मिक अनुष्ठान के जरिए नए क्षण के लिए प्रतिबद्ध होता है वही दूसरी ओर मणिकर्णिका घाट से एक नए जीवन की शुरुआत करने के लिए देहार्पित करता है।

                          ।।जय हिंद।।

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समीक्षा: देश कठपुतलियों के हाथ में


प्राचीन भारत में सारी सत्ता राजा के इर्द-गिर्द घूमती थी। शासन की प्रणाली प्रजातांत्रिक न होकर राजतंत्र वाली होती थी जिसमें राजा ही सर्वोपरि होता था। राजा का आदेश ही सबकुछ होता था। राज्य की प्रजा राजा के माध्यम से ही देश के लिए कार्य करती थी। प्रजा से कर वसूला जाता था और राज्य के विकास, राजा के महल और सेना पर बड़ी मात्रा में खर्च किया जाता था। कर की राशि कहां और कितनी खर्च की गई इसका हिसाब -किताब लगभग नगण्य ही होता था। ना तो उस जमाने में लोकपाल था ना ही कैग ना ही ईडी था और ना ही सीबीआई। राजा अपने राज्य में स्वयं ही न्यायालय होता था। यदि ऐसा कुछ आज के समय यानि  इक्कीसवीं शताब्दी में हो कि प्रजातंत्र से चुनी गई सरकार अपनी मनमानी करें और शासन को बपौती समझ ले। ऐसा ही कुछ भारत में सन् 2004 से लेकर 2014 तक के शासन में हुआ। इसी समय का हाल-ए-बयां करती एक पुस्तक " देश कठपुतलियों के हाथ में "।

यह पुस्तक श्री लोकेन्द्र सिंह जी के द्वारा लिखी गई जो स्पंदन भोपाल के द्वारा प्रकाशित हुई है। यह किताब कोई शब्दों का जाल नहीं बुनती। समय-समय पर विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित लेखों को एक प्रकार से गागर में सागर भरने की कोशिश की गई है। यह पुस्तक, भारतीय राजनीति में 2004 से 2014 तक का समय किस प्रकार उथल-पुथल भरा रहा और किस प्रकार प्रजातांत्रिक मूल्यों को ताक पर रखकर एक टेक्नोक्रेट को प्रधानमंत्री बनाकर एक प्रकार से रिमोट कंट्रोल सरकार चलाई। यही लेख इस पुस्तक का शीर्षक बना।

यह पुस्तक हमें सरकार के सुशासन से कुशासन की ओर जाने की कहानी बयां कर रही है। भारतीय शिक्षण पद्धति को किस प्रकार प्रभावित किया जा रहा है। जहां बच्चों को देशभक्ति परक शिक्षा दी जानी चाहिए वही उन्हें कट्टर वामपंथ की ओर ढ़केला जा रहा है। गांधी की जगह लेनिन को स्थान दिया जा है। वही सरकार के द्वारा तुष्टीकरण की नीतियों को बढ़ावा देने की बात हो या कश्मीर में अलगाववादियों को रियायत देने की बात हो। पाकिस्तान में हिन्दुओं के साथ हो रहे अत्याचारों से मुहं मोड़ना हो या भारत में मुस्लिम समुदाय के प्रति अति सहायता का भाव रखना हो सभी मुद्दों पर इस पुस्तक में प्रकाश ड़ाला गया है।

किस प्रकार संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरु और मुंबई पर हमले करने वाले आमिर अजमल कसाब को येन-केन-प्रकारेण बचाने की कोशिश की गई। आंतकियों को शहीदों का दर्जा तक देने की कोशिश होती रही इस पुस्तक में अच्छे सलीके से बताया गया है।

नरेन्द्र मोदी, गुजरात के मुख्यमंत्री होने के साथ-साथ उनकी छवि तत्कालीन समय में एक राष्ट्रीय नेता की थी और कई नेताओं को डर था कि कही यह प्रधानमंत्री न बन इसलिए दुष्प्रचार की सीमाएं लांघी गई।

भ्रष्टाचार समाज को किस प्रकार खोखला बना देता है और जनता की गाढ़ी कमाई एवं राष्ट्रहित के लिए उपयोग में आने वाले धन का किस प्रकार दुरुपयोग किया गया। इस प्रकार समाज में नवचेतना जगाने वाले  कुल 46 लेख इस पुस्तक में है जो भारतीय राजनीति को समझने में आपकी समझ और विकसित करेंगे।

कृप्या एक बार जरूर यह पुस्तक पढ़े।

                          ।।जय हिंद।।

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संकल्प से सिद्धि


यदि दुनिया 9/11 की शिक्षाओं को ग्रहण करता और उसे त्यागता ना तो 9/11 जैसा भीषण कांड न होता। मैं बात कर रहा हूं उस वक्तव्य कि जो भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वामी विवेकानंद के शिकागो की धर्मसंसद में दिए भाषण के 125 वीं वर्षगांठ पर दिया। एक नरेन्द्र वो थे जिन्होंने शिकागो में भारत की संस्कृति का डंका बजाया और एक नरेन्द्र आज है जिन्होंने भारत की गरिमामय उपस्थिति समूचे विश्व के समक्ष रखी। जहां स्वामी विवेकानंद ने शिकागो धर्मसंसद 1893 में सभी को भाइयों और बहनों कहकर संबोधित किया वही आज प्रधानमंत्री लगभग अपने सभी भाषण में भाइयों और बहनों का संबोधन करते है।

9 सितंबर 2017 को स्वामी विवेकानंद के द्वारा शिकागो में दिए भाषण  के 125 वर्ष पूर्ण हो चुके है जिसे वर्तमान सरकार 'संकल्प से सिद्धि दिवस' के रूप में मना रही है। प्रधानमंत्री ने भाषण के बारे में कहा कि ' क्या कभी किसी व्यक्ति द्वारा दिए भाषण की 125 वीं सालगिरह मनाई जाती है वो केवल स्वामी विवेकानंद है।' आगे उन्होंने कहा कि स्वामी जी भारत से बाहर जब रहते थे तब भारत की संस्कृति और महानता की तारीफ करते हुए नहीं थकते थे और जब भारत में होते थे तो वे भारत में व्याप्त कुरीतियों पर कुठाराघात करते थे। वे उस समय इस प्रकार की भाषा का प्रयोग करते थे जिसका उपयोग आज भी करना मुश्किल होगा।

'जनसेवा ही प्रभुसेवा', प्रधानमंत्री आगे कहते है कि स्वामी विवेकानंद जनसेवा को ही प्रभुसेवा मानते थे क्योंकि जब तक मानव दु:खी है तो प्रभु को पाने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। इसी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने आगे बताया कि स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन की शुरुआत इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए की थी। जहां सभी लोग कुछ पाने की तलाश में रहते थे वही स्वामी विवेकानंद सत्य की तलाश में थे।

भारत की दो घटनाओं ने विश्व में भारत को अपना स्थान बनाने में कामयाबी पाई। पहली घटना जब 9/11 हुआ और दूसरी जब रवींद्रनाथ टैगोर को नोबेल पुरस्कार मिला। स्वामी जी ने idea को idealism  में बदला और institutional framework तैयार किया गया।

लोग कहते है कि इक्कीसवीं सदी एशिया की होगी। स्वामी विवेकानंद ने आज से लगभग 125 वर्ष पहले ही कह दिया था कि आने वाली सदी एशिया की होगी और one Asia concept भी दिया था जो दुनिया को दिशा प्रदान करेगीं।

भाषण में आगे बोलते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि आज जो मेक इन इंडिया का कार्यक्रम चल रहा है इसे स्वामी जी ने आज से कई साल पहले जमशेद जी टाटा से किए गए पत्र व्यवहार के द्वारा जाना जा सकता है जिसमें स्वामी जी ने जमशेद जी टाटा को उधोग लगाने की बात कही थी।

स्वामी विवेकानंद प्रखर बुद्धि के धनी थे। वे भविष्य की संभावनाओं को पहले से ही जानते थे वे गजब के दूरदृष्टा थे।

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