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गुरुवार, 13 अगस्त 2020

सर्वकामना सिद्ध करें मां नर्मदा


नमामि देवी नर्मदे .... के स्वर से अमरकंटक से भरुच तक का कण-कण गुंजायमान होता है। आदिगुरू शंकराचार्य जी जब अमरकंटक आए और यहां मां नर्मदा का सौंदर्य निहारा तो उनका मन-मतिष्क नर्मदा का महिमा गान करने से नहीं रोक पाया। उन्होंने नर्मदाष्टक की रचना कर दी। भारत की पवित्रतम नदी जो मेरे लिए तो मां से कम नहीं है क्योंकि जिसने दुनिया की सबसे पुरानी संस्कृति को जन्म दिया हो वो भला मां न हो तो क्या हो? जो लाखों-करोड़ों लोगों को अपना शीतल, मृदु , कंचन जल प्रदान करती हो वो भला मां न हो तो क्या हो? जो लाखों किसानों की मदद करते हुए धरती को शस्य-श्यामला बनाती हो तो वो भला मां न हो तो क्या हो? जो लाखों लोगों को रोजगार प्रदान करें वो भला मां न हो तो क्या हो? जो अपने दोनों पार्श्वों ( सतपुडा पर्वत और विन्ध्याचल पर्वत) को पोषित करती हो वो भला मां न हो तो क्या हो? भांति-भांति...

मां नर्मदा ने अपने कई रुप धारण किए हुए है लेकिन वो रुप जिसमें भारत की अन्य सरिता बहती है वो है कुवांरी। मां नर्मदा भी अन्य नदियों की तरह कुवांरी है जो सदा कल-कल की धारा के साथ प्रवाहित होती रहती है। अमरकंटक में मां नर्मदा अपने बचपन की अटखेलियां करती है। माई की बगिया में आप अपने बचपन के बचपनों को साकार रुप देती है। भूगोलशास्त्री (geographer) के अनुसार नदी की तीन अवस्था होती है युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था। लेकिन मेरे अनुसार तो मां नर्मदा की केवल एक ही अवस्था है युवावस्था। उछल-कूद करता हुआ पानी मैकल की पहाड़ियों से पश्चिम दिशा में आगे बढ़ता जाता है। घने जंगलों और एक के बाद एक जलप्रपात बनाते हुए नर्मदा आगे बढ़ती जाती है। अमरकंटक में दुग्धधारा और कपिलधारा जलप्रपात बनाते हुए अपनी सखी सहेली और दोस्त(सोन, जोहिला सोन) को पीछे छोड़ते हुए आगे सतपुडा और विन्ध्याचल के बीच कही जॉर्ज तो कही महाखड्ड तो कही रैविन बनाते हुए आगे बढ़ते जाती है। घने जंगलों से होकर कही लुप्त हो जाती है तो कही प्रकट होकर अपनी उपस्थिति दर्ज करा देती है।

कही मनोरम धुंआधार जलप्रपात बनाती है तो कही मार्बल रॉक के बीच से होकर गुजरते हुए मनभावन कलात्मक कारीगरी करती है तो कही सहस्त्र धाराओं में बंटकर सहस्त्रधारा जलप्रपात बनाती है। गुजरात में समुद्र में मिलने से पूर्व नर्मदा जलप्रपात का निर्माण करती है।

मां नर्मदा मनुष्यों को ही नहीं वन्यजीवों को भी जीवन प्रदान करती है। पेंच,कान्हा,सतपुडा जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय उद्यान के जीवों को जीवन देती है। भारत के सबसे पुराने वनों में से एक को जीवित रखती है। महाशीर से लेकर राजासॉरस नर्मदेन्सिस और जबलपुरसॉरस को भी जीवन दिया ऐसी है मां नर्मदा।

मां नर्मदा को शंकर भगवान की पुत्री कहा जाता है इसलिए इन्हें शांकरी भी कहा जाता है। नर्मदा जिसका अर्थ है कि सुख को देने वाली अर्थात् सुखदात्री मां। नर्मदा का हर पत्थर एक शिवलिंग के समान है क्योंकि भगवान शिव ने स्वयं मां नर्मदा को वरदान दिया था कि नदी एवं तुम्हारे तट पर स्थित हर पत्थर एक शिवलिंग है जिसे बिना प्राण-प्रतिष्ठा के स्थापित किया जा सकता है। मां नर्मदा की बात ही निराली क्योंकि इस सृष्टि का सर्वनाश होने पर भी मां नर्मदा सदा प्रवाहित होती रहेंगी। हमारे धर्म ग्रंथों में नर्मदा को रेवा नाम से पुकारा गया है जिसका अर्थ है 'उछलने कूदने वाली नदी' क्योंकि मां नर्मदा ऐसा मार्ग चुनती है जो ऊंची-ऊंची पहाडियों और दुर्गम रास्ते वाला है। मां नर्मदा के इनके अलावा कई और नाम है जैसे नामोदास, सामोद्भवा (सोम पर्वत से जिसका उद्भव हुआ हो ), मैकलसुता (मैकल पुत्री)।

मां नर्मदा ने कई युगों को देखा। कई शासन को पोषित किया या यूं कहे कि कल्चुरी, गौंड जैसी शासक व्यवस्था को बनाए रखने में मदद किया। भारतीय पुरातत्व विभाग कहता है कि भारत की सबसे पुरानी सभ्यता जिसे हम नर्मदा घाटी सभ्यता कहते है उसने यही जन्म लिया। नर्मदा ने कई तीर्थों अमरकंटक, ओंकारेश्वर, महेश्वर को जन्म दिया। मां नर्मदा को मध्यप्रदेश की जननी कहा जाता है या यूं कहे कि जीवन का आधार या मध्यप्रदेश की जीवन रेखा।

जिस प्रकार जीवन प्रति क्षण देश लिए समर्पित है ठीक उसी प्रकार इस शरीर का रोम-रोम मां नर्मदा के लिए समर्पित। भगवान शंकर ने वरदान देकर मां नर्मदा को पापनाशिनी या नर्मदा को देखने वाले के पाप नष्ट हो जाएंगे। ऐसी मां सर्व कामना सिद्ध करें मां नर्मदा।


बनारस की बात


जनवरी की ठंड और गंगा का किनारा हो तो पल को और ज्यादा रोमांचक बना देता है। कोहरे में लिपटा हुआ गंगा के किनारे के साथ-साथ घाटों को और ज्यादा आकर्षक बना देती है। बनारस की हर बात निराली है। चाहे यहां का पान हो या साड़ी , चाहे चाय हो या फैना , चाहे गलियां हो या घाट , चाहे मंदिर हो या मौसम सब कुछ बिंदास है। बनारस की फिज़ा ही कुछ अलग है।बनारस कहो या काशी या वाराणसी सभी शहर के पर्याय होने के बाद भी वही अनुभव देता है। बनारस की एक खूबी हो तो कुछ बोलूं और लिखूं यहां तो इतना है कि कोटि-कोटि बोलना ही सही होगा।

बनारस के घाट का जीवन अनोखा ही है। एक तरह से कहा जा सकता है कि यहां सामान्य जीवन नहीं होता है। दैनिक जीवन में जो हम जिंदगी जीते है वह यहां लागू नहीं होती। या यूं कहा जाए कि इन घाटों ने सदियों से जीवन की रुपरेखा का बदलकर रख दी है। गंगा के पश्चिमी किनारे पर दूर-दूर तक फैले घाट अपनी विशालता का अनुभव कराते हैं। सामान्य जनमानस में जहां दशाश्वमेध और मणिकर्णिका घाट ही प्रचलित है वही ऐसे कई घाट है जो अपने अस्तित्व का परिचय खुद ही दे रहे हैं। घाटों का जीवन एक अलग ही दुनिया की ओर ले जाता है।

गंगा का जल घाटों पर बार-बार कुलाचें मारता है। गंगा पर नाव अपनी चहल-पहल से इस घाट वाली जिंदगी को सतरंगी दुनिया में प्रवेश करा देती हैं। गंगा के पश्चिमी किनारे से पूर्वी किनारे तक जहां केवल रेत का
टीला है नावों की आवा-जाही बनी रहती है। टीले से घाटों का नज़ारा देखने लायक होता है, जिसके लिए मेरे पास शब्दों की कमी हो गई है। मोबाइल का कैमरा भी वाइड एंगल नहीं ले पा रहा है। सच में धन्य है वाराणसी। मल्लाहों के बोल-बोला से घाट से रेत के टीले तक जाने का सफर और ज्यादा सुगम हो जाता है। कोहरे में लिपटी यह काशी अपने अनेकों रंग-बिरंगे परिवेश से लेकर घाटों पर अवतरित तरह-तरह के लोगों के लिए जानी जाती है।

बनारस की शुरुआत तो तभी हो जाती है जब लोगों में यह उत्सुकता बढ़ जाती है कि ट्रेन स्टेशन पहुंचने वाली है। भगवान भोलेनाथ की नगरी की फिज़ा बनारसी ठंडाई से महकने लगती है। कुल्हड़ की चाय से लेकर सतरंगी-अतरंगी बाजारों तक बनारस की बात ही कुछ और है। एक ओर तांबे-पीतल के चमकदार बर्तनों की दुकान तो एक ओर पेड़े की दुकान , वही एक ओर कंठी-माला तो दूसरी ओर प्रसादों से सजी दुकानें। कही छनती पूड़ियां-कचौडियां तो कही पान पर लगता गुलकंद सब की बात ही बेमिसाल है क्योंकि यह बनारस है।

हर-हर महादेव, बाबा विश्वनाथ की जय , बम-बम भोले के गान सहज ही कानों को छूकर जाते है। यहां की हर गलियां तो यही कह रही होती है यह बाबा विश्वनाथ का शहर है। यहां तो एक ही मालिक है बाबा विश्वनाथ। एक ओर जहां बाबा विश्वनाथ मंदिर में घंटा-ध्वनि सुनाई देती है वही दूसरी ओर ज्ञानवापी मस्जिद से सुनाई देती अज़ान समां में कुछ अलग ही रंग घोलती है।


दुकान में सजी या यूं कहा जाए कि दुकान की ओट से झांकती जरी वाली चटक रंग की बनारसी साड़ियां बरवश ही अपनी ओर खींचती है। कारीगरी की बेमिसाल नमूना यह साड़ी बनारस की आन-बान-शान कहा जाए तो अतिश्योक्ति न होगा। कपड़ों का सतरंगी आसमां बनारस की गलियों को और ज्यादा रोचक बना देता हैं। कही मंदिर के लिए लगी कतारें तो कही साधु-सन्यासियों का जमावड़ा बिल्कुल बनारस वाला टच देता है।

डॉ राजेन्द्र प्रसाद घाट हो या लाली घाट , पांडेय घाट हो या अहिल्या घाट सभी उसी तरह है जैसे सूर्य का प्रकाश। कोई इन घाटों पर ट्रेवलर बनाकर आया है तो कोई श्रद्धालु के रुप में मां गंगा का आशीर्वाद लेने आया है। कही साधु-सन्यासी ध्यान में मग्न नज़र आते है तो कही लोगों को ज्ञान बांटते हुए। कही कोई वैरागी चिलम पीते हुए मिलता है तो कोई अक्खड़पन में अपनी चाल में चलता हुआ। इस शहर में देशी क्या? विदेशी क्या? सभी एक ही रंग में नज़र आते हैं, वह रंग है बनारस। विदेशी अपनी जिज्ञासा को शांत करने, ज्ञान की तलाश में, भारतीयों की अटूट धार्मिक श्रद्धा देखने और कुछ पर्यटन के उद्देश्य से आते हैं। इन घाटों की जितनी महिमा गाई जाए उतनी कम है।

बनारस में सभी को एक रस प्राप्त होता है जिसे आनंद कहते है। मनुष्य यहां हर रुप में सहज ही मिल जाता है। जहां एक ओर मनुष्य दशाश्वमेध घाट पर धार्मिक अनुष्ठान के जरिए नए क्षण के लिए प्रतिबद्ध होता है वही दूसरी ओर मणिकर्णिका घाट से एक नए जीवन की शुरुआत करने के लिए देहार्पित करता है।

                          ।।जय हिंद।।

📃BY_vinaykushwaha



समीक्षा: देश कठपुतलियों के हाथ में


प्राचीन भारत में सारी सत्ता राजा के इर्द-गिर्द घूमती थी। शासन की प्रणाली प्रजातांत्रिक न होकर राजतंत्र वाली होती थी जिसमें राजा ही सर्वोपरि होता था। राजा का आदेश ही सबकुछ होता था। राज्य की प्रजा राजा के माध्यम से ही देश के लिए कार्य करती थी। प्रजा से कर वसूला जाता था और राज्य के विकास, राजा के महल और सेना पर बड़ी मात्रा में खर्च किया जाता था। कर की राशि कहां और कितनी खर्च की गई इसका हिसाब -किताब लगभग नगण्य ही होता था। ना तो उस जमाने में लोकपाल था ना ही कैग ना ही ईडी था और ना ही सीबीआई। राजा अपने राज्य में स्वयं ही न्यायालय होता था। यदि ऐसा कुछ आज के समय यानि  इक्कीसवीं शताब्दी में हो कि प्रजातंत्र से चुनी गई सरकार अपनी मनमानी करें और शासन को बपौती समझ ले। ऐसा ही कुछ भारत में सन् 2004 से लेकर 2014 तक के शासन में हुआ। इसी समय का हाल-ए-बयां करती एक पुस्तक " देश कठपुतलियों के हाथ में "।

यह पुस्तक श्री लोकेन्द्र सिंह जी के द्वारा लिखी गई जो स्पंदन भोपाल के द्वारा प्रकाशित हुई है। यह किताब कोई शब्दों का जाल नहीं बुनती। समय-समय पर विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित लेखों को एक प्रकार से गागर में सागर भरने की कोशिश की गई है। यह पुस्तक, भारतीय राजनीति में 2004 से 2014 तक का समय किस प्रकार उथल-पुथल भरा रहा और किस प्रकार प्रजातांत्रिक मूल्यों को ताक पर रखकर एक टेक्नोक्रेट को प्रधानमंत्री बनाकर एक प्रकार से रिमोट कंट्रोल सरकार चलाई। यही लेख इस पुस्तक का शीर्षक बना।

यह पुस्तक हमें सरकार के सुशासन से कुशासन की ओर जाने की कहानी बयां कर रही है। भारतीय शिक्षण पद्धति को किस प्रकार प्रभावित किया जा रहा है। जहां बच्चों को देशभक्ति परक शिक्षा दी जानी चाहिए वही उन्हें कट्टर वामपंथ की ओर ढ़केला जा रहा है। गांधी की जगह लेनिन को स्थान दिया जा है। वही सरकार के द्वारा तुष्टीकरण की नीतियों को बढ़ावा देने की बात हो या कश्मीर में अलगाववादियों को रियायत देने की बात हो। पाकिस्तान में हिन्दुओं के साथ हो रहे अत्याचारों से मुहं मोड़ना हो या भारत में मुस्लिम समुदाय के प्रति अति सहायता का भाव रखना हो सभी मुद्दों पर इस पुस्तक में प्रकाश ड़ाला गया है।

किस प्रकार संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरु और मुंबई पर हमले करने वाले आमिर अजमल कसाब को येन-केन-प्रकारेण बचाने की कोशिश की गई। आंतकियों को शहीदों का दर्जा तक देने की कोशिश होती रही इस पुस्तक में अच्छे सलीके से बताया गया है।

नरेन्द्र मोदी, गुजरात के मुख्यमंत्री होने के साथ-साथ उनकी छवि तत्कालीन समय में एक राष्ट्रीय नेता की थी और कई नेताओं को डर था कि कही यह प्रधानमंत्री न बन इसलिए दुष्प्रचार की सीमाएं लांघी गई।

भ्रष्टाचार समाज को किस प्रकार खोखला बना देता है और जनता की गाढ़ी कमाई एवं राष्ट्रहित के लिए उपयोग में आने वाले धन का किस प्रकार दुरुपयोग किया गया। इस प्रकार समाज में नवचेतना जगाने वाले  कुल 46 लेख इस पुस्तक में है जो भारतीय राजनीति को समझने में आपकी समझ और विकसित करेंगे।

कृप्या एक बार जरूर यह पुस्तक पढ़े।

                          ।।जय हिंद।।

📃BY_vinaykushwaha


संकल्प से सिद्धि


यदि दुनिया 9/11 की शिक्षाओं को ग्रहण करता और उसे त्यागता ना तो 9/11 जैसा भीषण कांड न होता। मैं बात कर रहा हूं उस वक्तव्य कि जो भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वामी विवेकानंद के शिकागो की धर्मसंसद में दिए भाषण के 125 वीं वर्षगांठ पर दिया। एक नरेन्द्र वो थे जिन्होंने शिकागो में भारत की संस्कृति का डंका बजाया और एक नरेन्द्र आज है जिन्होंने भारत की गरिमामय उपस्थिति समूचे विश्व के समक्ष रखी। जहां स्वामी विवेकानंद ने शिकागो धर्मसंसद 1893 में सभी को भाइयों और बहनों कहकर संबोधित किया वही आज प्रधानमंत्री लगभग अपने सभी भाषण में भाइयों और बहनों का संबोधन करते है।

9 सितंबर 2017 को स्वामी विवेकानंद के द्वारा शिकागो में दिए भाषण  के 125 वर्ष पूर्ण हो चुके है जिसे वर्तमान सरकार 'संकल्प से सिद्धि दिवस' के रूप में मना रही है। प्रधानमंत्री ने भाषण के बारे में कहा कि ' क्या कभी किसी व्यक्ति द्वारा दिए भाषण की 125 वीं सालगिरह मनाई जाती है वो केवल स्वामी विवेकानंद है।' आगे उन्होंने कहा कि स्वामी जी भारत से बाहर जब रहते थे तब भारत की संस्कृति और महानता की तारीफ करते हुए नहीं थकते थे और जब भारत में होते थे तो वे भारत में व्याप्त कुरीतियों पर कुठाराघात करते थे। वे उस समय इस प्रकार की भाषा का प्रयोग करते थे जिसका उपयोग आज भी करना मुश्किल होगा।

'जनसेवा ही प्रभुसेवा', प्रधानमंत्री आगे कहते है कि स्वामी विवेकानंद जनसेवा को ही प्रभुसेवा मानते थे क्योंकि जब तक मानव दु:खी है तो प्रभु को पाने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। इसी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने आगे बताया कि स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन की शुरुआत इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए की थी। जहां सभी लोग कुछ पाने की तलाश में रहते थे वही स्वामी विवेकानंद सत्य की तलाश में थे।

भारत की दो घटनाओं ने विश्व में भारत को अपना स्थान बनाने में कामयाबी पाई। पहली घटना जब 9/11 हुआ और दूसरी जब रवींद्रनाथ टैगोर को नोबेल पुरस्कार मिला। स्वामी जी ने idea को idealism  में बदला और institutional framework तैयार किया गया।

लोग कहते है कि इक्कीसवीं सदी एशिया की होगी। स्वामी विवेकानंद ने आज से लगभग 125 वर्ष पहले ही कह दिया था कि आने वाली सदी एशिया की होगी और one Asia concept भी दिया था जो दुनिया को दिशा प्रदान करेगीं।

भाषण में आगे बोलते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि आज जो मेक इन इंडिया का कार्यक्रम चल रहा है इसे स्वामी जी ने आज से कई साल पहले जमशेद जी टाटा से किए गए पत्र व्यवहार के द्वारा जाना जा सकता है जिसमें स्वामी जी ने जमशेद जी टाटा को उधोग लगाने की बात कही थी।

स्वामी विवेकानंद प्रखर बुद्धि के धनी थे। वे भविष्य की संभावनाओं को पहले से ही जानते थे वे गजब के दूरदृष्टा थे।

📃BY _vinaykushwaha


हिंदी का दिवस


व्यौहार राजेन्द्र सिंह का जन्म 14 सितंबर 1916 को हुआ और जन्मदिवस की 50वीं वर्षगांठ अर्थात् 14 सितंबर 1949 को भारत सरकार ने हिंदी को राजभाषा घोषित कर दिया। इसी दिन को 'हिंदी दिवस' के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। यह बहुत कम लोग जानते है कि हिंदी को राजभाषा के रूप में स्थापित करने का श्रेय व्यौहार राजेन्द्र सिंह को जाता है। जबलपुर की जागीरदार के घर जन्मे राजेन्द्र सिंह गांधीवादी विचारधारा के व्यक्ति थे। समाजसेवी और साहित्यकार भी थे। व्यौहार राजेन्द्र सिंह ने मैथिली शरण गुप्त, का का कालेलकर, सेठ गोविंददास और हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसी महान हस्तियों के साथ मिलकर दक्षिण भारत में हिंदी को राजभाषा के रूप में घोषित कराने के लिए अभियान चलाया। अमेरिका में सपन्न हुए पहले हिंदी सम्मेलन का सफल आयोजन कर भारतीय तिरंगा झंड़ा फहराया।

प्रतिवर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 343(1) के तहत इसे राजभाषा का दर्जा दिया गया। हिंदी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त है न कि राष्ट्रभाषा का क्योंकि हमारे संविधान में किसी भी भाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में चिन्हित नहीं किया गया है। हिंदी को संविधान की  आठवी अनुसूची में शामिल किया गया है। स्वतंत्रता पश्चात् सरकारी कामकाज और जनसामान्य में व्यवहार करने के लिए एक भाषा की जरुरत पड़ी। तत्कालीन भारत बिखरा हुआ था जिसमें आज की तरह राज्य नहीं थे। देश की भाषा के रूप में कई भाषा के लिए जनप्रतिनिधियों और आमजन ने तमिल, बंगाली, असमिया, हिंदुस्तानी जैसी भाषा का नाम आगे किया। संविधान सभा की भाषा समिति ने सभी से राय लेते हुए और देश की बहुसंख्यक आबादी की बोलने वाली भाषा के रूप में हिंदी को राजभाषा स्वीकार किया गया। हिंदी के साथ-साथ इंग्लिश को पन्द्रह वर्षों के लिए सरकारी भाषा के रूप में स्वीकार किया गया।

हिंदी भाषा की जननी संस्कृत को कहा जाता है जबकि ऐसा नहीं है। हिंदी को हिंदी बनने में बहुत लंबा समय लगा है। सबसे पहले संस्कृत भाषा आई फिर प्राकृत फिर अर्द्धमागधी फिर अपभ्रंश फिर अवहट्ट अंतत: हिंदी भाषा का जन्म हो गया। हिंदी उपरोक्त भाषाओं से ताकतवर भाषा बन गई है क्योंकि हिंदी ने बहुत से शब्द भंड़ार बाहर से ग्रहण किए है जिनमें संस्कृत सबसे अहम है। तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशी शब्दों का उपयोग करके हिंदी एक समृद्ध भाषा के रूप में विकसित हुई है। हिंदी भाषा की एक और ताकत है उसकी बोलियां जिसमें भोजपुरी, शौरसेनी अपभ्रंश, बघेली, छत्तीसगढ़ी, हडौती, ढूढांणी,मेवाती, मारवाडी, मालवी, निमाड़ी, ब्रज, अवधी, हरियाणवी, कुमायुनी आदि हैं। हिंदी भाषा को लिखने के लिए देवनागरी लिपि का प्रयोग किया जाता है।

भक्ति काल में हिंदी ने जनसामान्य में जगह बनाने की शुरुआत की इसमें बड़े-बड़े कवियों ने रचनाओं का सृजन कर हिंदी को समृद्ध किया। मीरा, कबीर, तुलसीदास, सूरदास, बिहारी, केशवदास, दादू , रहीम, भूषण आदि रचनाकार है जिन्होंने हिंदी साहित्य को समृद्ध बनाने की नींव रखी। आचार्य रामचंद्र शुक्ल, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, फणीश्वरनाथ रेणु, राही मासूम रज़ा, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, मैथिली शरण गुप्त, सुमित्रानंदन पंत, गजानन माधव मुक्तिबोध, गणेश शंकर विधार्थी, देवकीनंदन खत्री, माखनलाल चतुर्वेदी, भवानी प्रसाद मिश्र जैसे साहित्य के अग्रदूतों ने विशेष योगदान दिया।

हिंदी आज के समय में एक ऐसी भाषा बन चुकी है जिसका लोहा पूरी दुनिया मानती है। भाषाविद् हिंदी को भारोपीय श्रेणी में रखते है। हिंदी दुनिया की चौथी सर्वाधिक बोले जाने वाली भाषा बन चुकी है जिसके भारत समेत विश्व में लगभग 329 मिलियन बोलने वाले लोग है। हिंदी भारत में ही नहीं कई और देशों में बोली जाती है जिनमें गुएना, मॉरिशस, सिशेल्स, त्रिनिदाद और टुबैगो, फिजी आदि। फिजी की अधिकारिक भाषा फिजी हिंदी है। भारत के अलावा नेपाल, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, श्रीलंका, भूटान और मालद्वीप में हिंदी को समझने वाले आसानी से मिल जाते हैं।

इंटरनेट और सोशल साइट पर जहां इंग्लिश का एकछत्र राज था जिसे हिंदी ने खत्म करने में सफलता पाई है। आज इंटरनेट पर लगभग सभी जानकारी हिंदी में उपलब्ध है। सोशल मीडिया में धडल्ले से हिंदी का उपयोग किया जा रहा है। बड़ी-बड़ी सर्विस प्रोवाइडर कंपनियां और वेबसाइट्स हिंदी को महत्ता प्रदान कर रही है क्योंकि हिंदी आज विश्व में एक नवीन ताकत के रूप में उभर कर सामने आई है। जहां पहले उच्च शिक्षा बिना इंग्लिश माध्यम के सम्पन्न नहीं हो पाती थी वही आज भारत से लेकर विदेश तक उच्च शिक्षा के लिए हिंदी विश्वविधालय खुल रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र में पहली बार हिंदी में भाषण देने वाले प्रथम प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई हुए। आज नरेन्द्र मोदी अपने प्रत्येक कार्यक्रम में हिंदी ही भाषण देते है चाहे वे देश में हो या विदेश में। यह सब हिंदी भाषा को विश्व में गरिमामय उपस्थिति दर्ज कराने के लिए किया जा रहा है। हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की कामकाज की भाषा बनाने के लिए भारत प्रयासरत है।

हिंदी को किसी भाषा से डर नहीं परंतु कुछ लोग कुंठित मानसिकता के फलस्वरुप हिंदी भाषी और गैर हिंदी भाषी के बीच द्वंद कराने से नहीं चूकते है।

हिंदी तो सबकी है कृप्या हिंदी का प्रयोग करें।
हिंदी को बिंदी न बनाए।

📃विनय कुशवाहा कृत<


लडूरे प्रसंग


पुरी से अजमेर जा रही ट्रेन भुवनेश्वर स्टेशन पर रुकती है। रात के लगभग 11:30 बजे है और स्टेशन पर लगभग सन्नाटा सा है। प्लेटफॉर्म की सफाई करने वाली मशीन की आवाज घड़ - घड़ सुनाई दे रही है और इक्का-दुक्का चलते लोगों की आवाजें। ट्रेन की बोगी नंबर एस5 से एक दुबला-पतला औसत कद-काठी का लड़का उतरता है। हिलते-डुलते कॉफी स्टॉल पर पहुंचता है और कहता है कि तीन कॉफी देना। तीन कॉफी के रुपए देते हुए वह दुकानदार से पूछता है कि 'लडूरे मिलेगें' । दुकानदार जबाव में एक सवाल पूछता है कि ये लडूरे क्या होते हैं; वो लड़का अपनी हंसी को रोकता हुआ कहता है कि ' 'एक छोटी सी मिठाई'। दुकानदार ने कहा, मेरे पास नहीं हैं। लड़के ने कहा, बाहर तो मिल रही थी कहकर मुस्कुराता हुआ ट्रेन की ओर चल दिया। उस लड़के का एक साथी और उतरता है उससे मुस्कुराहट का राज जानता है। सबकुछ मालूम चलने पर दोनों ठहाका मारकर हंसते है और ट्रेन में बैठे अपने तीसरे साथी को खिड़की से कॉफी देते हुए प्रसंग सुनाकर फिर हंसते है।

सच में लडूरे एक छोटी-सी मिठाई है या और कुछ, जानने के लिए हम थोड़ा फ्लैशबैक में चलते हैं। पुरी स्टेशन के प्लेटफॉर्म छह पर बैठ कर विनय और इंद्रभूषण जोर-जोर से ठहाके लगा रहे थे। दूर खड़े शिवम् ने फोन से बात खत्म करते हुए पूछा क्या हुआ? इंद्रभूषण ने शिवम् को बताया कि जब हम भोपाल पहुंचेगें तो भैया से पूछेगें कि लडूरे खाओगे? मेरी तरफ से खाओगे या विनय की तरफ से या शिवम् कि तरफ से। आखिरकार लडूरे है क्या? एक छोटी-सी मिठाई? या और कुछ?

लडूरे के बारे में और जानने के लिए हम और फ्लैशबैक में चलते हैं। भगवान जगन्नाथ जी के दर्शन करने बाद तीन दोस्त शिवम्, विनय और इंद्रभूषण ने जगन्नाथ के भात को खाकर मिठाई की दुकानों की ओर प्रस्थान किया। जहां तरह-तरह की और नई-नई मिठाईयां देखने को मिली। उत्तरी और मध्य भारत के घरों में एक विशेष प्रकार की मिठाई बनाई जाती है जिसे 'खाजा' कहते है। उसी प्रकार की मिठाई हमें देखने को मिली जिसका नाम रखा गया 'लडूरे'।

क्या सच वो लडूरे थे जो भैया ने खाया या और कुछ नाम था उसका। इति लडूरे प्रसंग।


चलते-चलते (श्रृंखला 7)


कभी-कभी मन में ख्याल आता है कि दुनिया बहुत छोटी है जैसे एक मेंढ़क को लगता है। कुएं में रहना वाले मेंढ़क को लगता है कि यही दुनिया है, इसके बाहर कुछ नहीं है। भारत एक विशाल देश है जहां एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए कई दिनों तक का समय लग जाता है। यही बात हमें बताती है कि दुनिया छोटी नहीं  हैं। सभी की अपनी एक दुनिया होती है परंतु दुनिया सबके लिए एक जैसी होती है।

हम इंसानों की एक आदत होती है कि हम अपनी-अपनी एक छोटी-सी दुनिया तैयार कर लेते हैं। हमारे दोस्तों वाली दुनिया, हमारे परिवार वाली दुनिया, कॉलेज वाली दुनिया, ऑफिस वाली दुनिया आदि मिलकर हम अपनी-अपनी दुनिया तैयार करते हैं। यह हमारे लिए एक घेरा बन जाता है जहां हम अपने आप को सहज महसूस करते है। हम अपने उस सहज घेरे को छोड़कर नहीं जाना चाहते क्योंकि हम कष्ट नहीं झेलना नहीं चाहते।

जब हम अपने घेरे से बाहर निकलते है तो एक नई दुनिया को देखते है; तब हमें मालूम चलता है कि दुनिया छोटी-सी नहीं है। दुनिया बहुत बड़ी है, यह हमें केवल घेरे से निकलकर ही पता चलता है। घेरे से बाहर निकलकर पता चलता है कि लोगों के व्यवहार में बदलाव नज़र आने लगता है, नए-नए खान-पान, पहनावा और यहां तक कि चेहरे तक बदलने लगते हैं। थोड़े समय पहले कि बात है मैं और मेरे दो दोस्त छत्तीसगढ़ और ओडिशा की यात्रा पर थे।

ओडिशा और छत्तीसगढ़ के लोग में रंग और रूप का अंतर होता है। वे उत्तर भारतीयों की तरह साफ रंग के नहीं होते हैं। मैं दुर्ग में था और रेस्टॉरेंट के तरफ जा रहे थे। मेरे एक दोस्त शिवम पोरवाल ने कहा कि यहां सब काले-काले और नक्सलवादी की तरह दिखते हैं। मैंने तुरंत जबाव देते हुए कहा यहां लोग ऐसे ही होते है क्योंकि वे जनजातीय समाज से संबंध रखते हैं। सारे लोग नक्सलवादी नहीं होते हैं। आखिरी में मैंने कहा कि असलियत में आरक्षण की इन्हीं लोगों को जरुरत हैं। तभी इंद्रभूषण ने बोला कि 'कभी आरक्षण से इनका भला नहीं हो सकता है।' मैंने तंज कसते हुए बोला कि सही है इन्हें कहां आरक्षण की जरुरत।

इंद्रभूषण को लगता है कि आरक्षण लोगों को अपंग बनाता और कभी भी आरक्षण से इनका भला नहीं हो सकता है। मैनें सोचा बहस करना मुनासिब नहीं होगा। मैनें मन में सोचा कि जब संविधान में आरक्षण का प्रावधान किया गया था, तब उनका लक्ष्य यह था कि दलित, पिछड़े, अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति जो समाज के अन्य वर्गों के समान सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक रूप से बराबर नहीं है उन्हें बराबरी पर लाना है। वो बात अलग है कि कुछ राजनीतिक पार्टियों और नेताओं ने अपने स्वार्थ के लिए आरक्षण का गलत उपयोग किया।

दुनिया छोटी-सी नहीं है बल्कि बहुत बड़ी है। यहां लोगों को समझना जरुरी है।

📃BY_ vinaykushwaha