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रविवार, 26 जनवरी 2020
संविधान का जबलपुर कनेक्शन...
मंगलवार, 12 नवंबर 2019
चलते-चलते(श्रृंखला 12)
इस साल एकादशी 8 नवंबर को थी। मैंने बॉस को पहले ही इत्तिला कर दिया था कि मुझे 8 नवंबर से 18 नवंबर तक छुट्टी चाहिए। मुझे जाने की इजाजत भी मिल गई थी। मैंने जाने और आने का थर्ड एसी का टिकट करा लिया था। जबसे नौकरी लगी है तबसे थर्ड एसी से नीचे टिकट नहीं ली भले सफर तीन घंटे का ही क्यों ना हो। यहां तो 16 घंटों की बात थी। घर जाने की उत्सुकता मन में संजोए मैं रोज कुछ नया सोचता रहा था। कभी सोचता घर जाकर ये करूंगा या घर जाकर वो करूंगा। मम्मी-पापा ने भी कई तरीके से सोचकर रखा था कि बेटा घर आ रहा है तो अच्छा है।
इन सबके बीच मेरी मम्मी को सबसे ज्यादा उत्सुकता मेरे घर आने की थी और क्यों ना होती? मैं सात महीने बाद घर जा रहा था। मैं पिछली बार घर होली पर गया था। उसके बाद अब जाने का समय मिला था। जीवन में कई बार कुछ अनोखे काम होते हैं। मैं उन बच्चों में से था जो मां-बाप से कभी अलग नहीं रहा लेकिन आज मुझे घर से बाहर रहते हुए 6 साल हो गए हैं। इन 6 सालों में मुझे अलग-अलग अनुभव मिले। जीवन कैसे जिया जाता इन्ही 6 सालों में पता चला। जीवन में किरदार किस तरह के होते हैं इन्ही 6 सालों में पता चला। दोस्त क्या होते हैं? नशा क्या होता है? गाली क्या होती है? सबकुछ इन्हीं 6 सालों में पता चला। जिंदगी में एक बार ज्ञान जरूर मिलता है मुझे इन 6 सालों के हर एक दिन ज्ञान मिला।
एक कहावत है कि "समय बड़ा बलवान" । मेरे साथ भी समय ने बड़ा खेल खेला। कई सम्मिलित कारणों की वजह से मेरी छुट्टी रद्द हो गई। ये पहली बार था कि जब मेरी छुट्टियों पर ग्रहण लगा। मैं पहली बार बहुत मायूस रहा ना तो मैंने उस दिन नाश्ता किया ना ही उस दिन में खाना खाया। मुझे अभी भी आशा किरण घोर अंधेरे में जलती हुई लौ की तरह दिखाई दे रही थी। कुछ हो ना सका। अब लग रहा था कि धरती फट जाए तो मैं उसमें समा जाऊं। मुझे सबसे ज्यादा चिंता मम्मी-पापा की थी कि मैं उन्हें किस तरह बताऊंगा कि मैं नहीं आ रहा। लेकिन जैसे-तैसे उनको समझाया और बताया कि मैं क्यों नहीं आ रहा।
मैं छुट्टी लेने के बारे में ज्यादा नहीं सोचता लेकिन ये पहली बार था जब मुझे घर के लिए आस थी। मैंने बॉस को कई तरीके से मनाने की कोशिश की। इतना दुख तो मुझे टिकट कैंसिल करते समय एक हजार रुपये की बलि चढ़ाते वक्त भी नहीं हुआ। मैं जब इंदौर में रहा या भोपाल में रहा तब कई बार 15 दिनों से ज्यादा घर पर छुट्टियां मना चुका हूं। लेकिन अब ऑफिस में ऐसे स्वर्णिम पल कहां हैं? अब तो बमुश्किल 10 दिनों की छुट्टियां मिल जाएं तो बड़ी बात है। इस पोस्ट का मतलब यही है कि "समय बड़ा बलवान"।
📃BY_vinaykushwaha
शुक्रवार, 1 नवंबर 2019
एमपी अजब है, एमपी गजब है
सोमवार, 15 जुलाई 2019
बारिश का जल 'वरदान'
शुक्रवार, 31 मई 2019
सिर्फ और सिर्फ नरेंद्र
सबसे पहले मैं बात करूंगा नरेंद्र मोदी की छवि की। मोदी की छवि के कारण कहीं ना कहीं बीजेपी को फायदा मिला है। 2014 के बाद मोदी और बड़ी छवि बनकर उभरे हैं। आज के समय में कहा जाए तो मोदी से बड़ा नेता देश में कोई दूसरा नहीं है। केंद्र में सरकार बनाने के बाद नरेंद्र मोदी ने कई ऐसे काम किए जिसने मोदी की छवि बदलने का काम किया। मोदी के इन कामों में सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक, अभिनंदन की रिहाई, मसूद अजहर को ग्लोबल आंतकी घोषित करवाना, स्वच्छ भारत अभियान, 21 जून को योग दिवस घोषित करवाना जैसे मुद्दे शामिल हैं। इन कामों ने मोदी की छवि को बड़े से और बड़ा कर दिया। नरेंद्र मोदी की बोलने की कला और भाषण के दौरान लोगों से जुड़ने की कला, मोदी को लोगों के नजदीक लेकर गई। मोदी देश के जिस भी हिस्से में जाते हैं वहां की भाषा के शब्दों को अपने भाषण में शामिल करते हैं। पीएम नरेंद्र मोदी ने 5 साल के दौरान हर महीने के आखिरी रविवार को मन की बात करते हुए लोगों से उन्होंने जुड़ाव बनाए रखा। इसके अलावा शिक्षक दिवस के दिन छात्रों से बात करते थे।
नरेंद्र मोदी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में 146 रैलियां की। पूरब से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण तक पीएम ने रैलियां की। मेरठ से अपनी चुनावी सभा की शुरूआत करके एमपी के खरगोन में अपनी चुनावी अभियान को विराम दिया। कांग्रेस का 'चौकीदार चोर है' वाले बयान को लेकर पीएम ने अपनी हर रैली में कांग्रेस पर चौकीदार नाम का बम फोड़ा। ट्विटर पर अपने नाम के आगे चौकीदार लगाकर चौकीदार वर्ग का वोट समेट लिया। कांग्रेस के साथ-साथ महागठबंधन और टीएमसी को इस चुनाव में मोदी ने आड़े हाथों लिया। जहां महागठबंधन को महामिलावट कहा तो वहीं ममता बनर्जी को स्पीड ब्रेकर कहा। इन सब में सबसे बड़ी बात यह रही की इस बार बीजेपी कांग्रेस से भी ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ रही थी। बीजेपी ने 2019 का आम चुनाव 435 सीटों पर लड़ा। बीजेपी ने भले ही 435 सीटों पर चुनाव लड़ी लेकिन प्रत्याशी केवल एक ही था वो है 'मोदी'। बीजेपी ने पिछला आम चुनाव मोदी लहर के नाम पर लड़ा था लेकिन यह चुनाव बीजेपी ने मोदी के नाम पर लड़ा। बीजेपी नेता कहते भी थे कि पिछले चुनाव में मोदी लहर थी तो इस बार मोदी की सुनामी है।
विपक्ष हमेशा कहता था कि पीएम मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करते, इंटरव्यू नहीं देते, पीएम हमेशा वन-वे कम्यूनिकेशन करते हैं। पीएम नरेंद्र मोदी ने इस चुनाव में इंटरव्यू के साथ-साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टीवी से लेकर प्रिंट तक सभी को इंटरव्यू दिया। आखिरी चरण के चुनाव प्रचार के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की। इस बार प्रधानमंत्री मोदी ने पॉलिटिकल इंटरव्यू के साथ-साथ नॉन-पॉलिटिकल इंटरव्यू भी दिया। इसके अलावा मोदी ने कई रोड शो भी किए जिसमें काशी में किया रोड शो भव्य था।
बीजेपी की इस शानदार जीत के पीछे एक बहुत बड़ा कारण है मोदी-शाह की जोड़ी। पिछले आम चुनाव की तरह इस चुनाव में भी मोदी-शाह की जोड़ी ने कमाल कर दिखाया। पॉलिटिकल पंडित कहते थे कि बीजेपी को सरकार बनाने के लिए दूसरे दलों की जरुरत पड़ेगी। दोनों की जोड़ी ने इस बात को नकार दिया। अमित शाह को बीजेपी का चाणक्य कहा जाता है। अमित शाह ने शिवसेना को मनाने का काम किया, जेडीयू को फिर से एनडीए में लाने का श्रेय भी अमित शाह को जाता है। अमित शाह ने नरेंद्र मोदी से 17 रैलियां ज्यादा करके लोगों तक पहुंच बनाई। बूथ मैनेजमेंट और लोगों को बीजेपी से जोड़ने का काम अमित शाह ने किया। नरेंद्र मोदी की बिजनेस मैन, फिल्मी सितारों के साथ बैठक आदि भी अमित शाह के दिमाग की उपज है। बीजेपी ने राजस्थान, बिहार, उत्तरप्रदेश, झारखंड, तमिलनाडु, महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों से गठबंधन किया। तमिलनाडु को यदि छोड़ दिया तो बाकी राज्यों में बीजेपी ने अच्छा प्रदर्शन किया। अमित शाह की रणनीति के काऱण आज बंगाल में बीजेपी 18 सीटें लाने में सफल रही है। इस चुनाव में बीजेपी का फोकस यूपी और बिहार ना होकर पश्चिम बंगाल और ओडिशा था। इन दोनों राज्यों में बीजेपी ने अच्छा प्रदर्शन किया। बीजेपी अध्यक्ष होने के नाते अमित शाह ने बीजेपी को सशक्त बनाया बल्कि एनडीए को भी और ज्यादा मजबूत किया। बीजेपी की इस धुंआधार जीत के पीछे प्रचार-प्रसार का अहम योगदान रहा। इसमें कोई शक नहीं है कि बीजेपी ने इस चुनाव में प्रचार में सबसे ज्यादा पैसे खर्च किए हैं। सोशल मीडिया से लेकर ग्राउंड जीरो तक बीजेपी ने खूब पैसे बहाए। इस चुनाव में बीजेपी का चुनाव प्रचार विवाद का विषय रहा। नमो टीवी को लेकर विपक्ष बहुत आक्रामक रहा। व्हाट्सएप ग्रुप से लेकर फेसबुक और व्यक्तिगत रूप से फोन करके लोगों को बीजेपी के पक्ष में लाने का प्रयास बीजेपी ने किया। बीजेपी के साथ अपार जनसमर्थन जुड़ने के पीछे एक कारण और भी है।
सरकार की योजनाओं को घर-घर तक पहुंचाना और उनका प्रचार-प्रसार करना। उज्ज्वला योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, स्वच्छ भारत अभियान के तहत शौचालय का निर्माण करवाना। जिन परिवारों के पास ये सारी सुविधाएं नहीं थी यदि उऩको यह सब मिलता है तो व्यक्ति-व्यक्ति का लाभ पहुंचाने वालों को ही जाएगा।
विपक्ष ने मेहनत की या नहीं की इसका कोई मतलब नहीं क्योंकि बीजेपी ने बाजी मार ली है। नरेंद्र मोदी में एक बात बहुत खास है कि वे विपक्ष के मुद्दे को कैच कर लेते हैं। 2017 के गुजरात चुनाव में मणिशंकर अय्यर ने पीएम मोदी को नीच कहा था। इस बयान को पीएम मोदी ने इतना प्रचार किया कि कांग्रेस को इसका भुगतान भुगतना पड़ा। 2019 के आम चुनाव में राहुल गांधी ने चौकीदार चोर है नारा लगवाया तो नरेंद्र मोदी ने ट्विटर हैंडल पर अपना बदल कर चौकीदार नरेंद्र मोदी कर दिया। राहुल गांधी के द्वारा उठाए गए भष्ट्राचार के मुद्दे को पलटकर बोफोर्स तक ले गए। सैम पित्रोदा के सिख दंगों पर दिए हुआ तो हुआ वाले बयान पर पीएम ने आधी जंग ही जीत ली।
कहते हैं कि चुनाव में जातीय समीकरण मायने रखते हैं। पार्टियां अपने उम्मीदवारों को जातीय आधार पर उतारती है। इस चुनावी में सारे जातीय समीकरण लोधी-कुर्मी, एम-वाय, सवर्ण-दलित सभी समीकरण फेल हो गए। इस बार राष्ट्रवाद का मुद्दा हावी रहा। राष्ट्रवाद के साथ-साथ आतंकवाद का मुद्दा हावी रहा। सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक ने इसे और हवा दी।
जिस तरह सुनामी में सब कुछ तबाह हो जाता है ठीक उसी तरह मोदी नाम की सुनामी में 2019 में विपक्ष बह गया।
सोमवार, 20 मई 2019
आम और ये मैंगो पीपुल!
आज जब मैं यह पोस्ट लिख रहा हूं तो 2019 का आम चुनाव खत्म हो चुका है। आम चुनाव खत्म होने के साथ ही देश भर में चुनाव प्रचार का शोर थम चुका है। अब सबकी नजर 23 मई को आने चुनाव के नतीजे पर हैं। यह पोस्ट नॉन पॉलिटिकल है जिस तरह प्रधानमंत्री का इंटरव्यू नॉन पॉलिटिकल था। अभिनेता अक्षय कुमार के सवाल का जवाब देते पीएम बड़े ही मासूम नजर आ रहे थे। आम की कहानी तो उन्होंने इस तरह बताई की मुझे अपने बचपन के दिन ध्यान आ गए क्योंकि हम भी लग्जरी में पले-बढ़े नहीं हैं। पत्रकार रवीश कुमार को तो बाकायदा प्राइम टाइम ही आम करना पड़ा। आम सफेदा हो या लंगड़ा, बादाम हो या दशहरी यही बताना पड़ा। गर्मी के मौसम में आम और आम से बने जूस आदि का आनंद हर व्यक्ति उठाता है। मैंने बचपन से लेकर आजतक बादाम, केसरी, तोतापरी, नीलम, लंगड़ा, दशहरी, चौसा, मोती, कल्मी, गोविंदगढ़ का आम खाया है। बचपन में हमने भी आम तोड़कर खाया है। हम भी प्रधानमंत्री बने तो कोई हमसे पूछे कि क्या आप भी आम खाते हैं? मेरा जवाब तैयार होगा हां, हमारी फैमिली में ऐसी कोई लक्जरी तो नहीं कि हम आम खरीद कर खा पाएं।
मैं नहीं जानता कितने लोगों ने अपनी जिंदगी गांव में बिताई है या गांव में रहकर गांव के जीवन को करीब से देखा है। मेरे पिताजी गांव से निकलकर शहर में नौकरी करने चले गए। शहर का जीवन मैंने जीया है लेकिन गांव को मैंने करीब से देखा है। गर्मी में स्कूल के छुट्टी के दरम्यान हम (हम मतलब मम्मी, भइया और मैं) गांव का रुख करते थे। सीधी-सीधी बात कहूं तो गांव का जीवन चले जाते थे। चूल्हे पर पकी चाय का सौंधापन क्या शानदार लगता था। मैंने चाय बेची नहीं है। हंडी में पकी दाल और हाथों से पोई रोटी का स्वाद जो गांव के खाने में था आज मैं याद करता हूं। उस खाने को भुलाया नहीं जा सकता है। आकाश तले रात गुजारना और दिन में बिजली आने का इंतजार करना दोनों का एक सुखद अनुभव था। गर्मी के दिनों में खाट पर सोना और कुत्तों के भौंकने की तेज आवाज आज भी याद आती है। खेत के किनारे खाट डालकर सोने का अनुभव तो और भी शानदार था। रात में फसल को छूकर आने वाली हवा गर्मी की उजाले वाली रात को और भी ठंडा कर देती थी।
मेरे गांव के घर में एक बारी थी। जो लोग बारी के बारे में कुछ नहीं जानते तो उनको बताता चलूं कि बारी एक ऐसी जगह होती है जिसे हम छोटा-सा बगीचा कह सकते हैं। गांव वाली बारी में एक छोटा-सा घर था जिसमें दादा-दादी रहते थे। इसी घर से दो कदम की दूरी पर एक बड़ा-सा कुंआ था। गर्मियों में इसी कुंए से पानी निकालकर हम ठंडा-ठंडा पानी पिया करते थे। गांव की बारी में कटहल (jack fruit), करौंदा, नींबू, सीताफल (custard apple) और आम के पेड़ थे। हम जब भी गांव जाते थे तो आम के पेड़ पर चढ़कर आम खाते थे क्योंकि हमारे पास कोई लक्जरी तो थी नहीं। दादी अक्सर खटिया पर अमावट बनाती थी। अमावट को शायद ही आजकल के लोग जानते हों। अमावट पके हुए आम का गूदा निकालकर उसे खटिया में चादर बिछाकर एक परतदार के रूप में आकार दिया जाता है। मैं बघेली हूं और हमारे यहां आम और आम से बनीं चीजों का बहुत इस्तेमाल किया जाता है। आम चाहे कच्चा हो या पका दोनों का इस्तेमाल बराबर होता है।
मैं जब छोटा था तो मई-जून के महीने में तूफान बारिश होने पर कैरियां गिर जाती थीं। मैं और मेरे दोस्त कैरियां अपनी टी-शर्ट में भरकर घर ले जाते थे। कई बार तो पत्थर मारकर,बांस की लग्गी बनाकर कैरी तोड़ी हैं क्योंकि हमारे पास कोई लक्जरी तो थी नहीं। कैरी बड़े काम का फल है। बघेली लोग कैरी की सब्जी, कैरी की कढ़ी, कैरी की चटनी, कैरी का पना, कैरी से आचार, कैरी को सुखाकर अमचूर बनाते हैं। कैरी से बने कई सारे पाकवान के बारे में लोग जानते हैं लेकिन डिश जो बघेली बड़े चाव से खाते हैं वो है 'बगजा'। बगजा, कैरी से बनता है। कैरियों को उबाला जाता है। कैरी का गूदा निकाला जाता है। इस गूदे में गुड़ मिलाया जाता है इसके साथ नमक,भुना जीरा मिलाया जाता है। इसके बाद बेसन का घोल तैयार करके सेंव बनाया जाता है। गूदे को सरसों के तेल में खड़ी लाल मिर्च, जीरा, खड़े मसाले के साथ छौंक लगाया जाता है। इस छौंक में सेंव को मिलाया जाता है, इसे कहते हैं 'बगजा'। बघेली इस डिश को बड़े चाव से खाते हैं और मैं भी क्योंकि हमारे पास कोई लक्जरी तो थी नहीं।
जैसे-जैसे बड़े होते गए तो आम खाने का तरीका बदलता गया। पहले तो हमें केवल रीवा के गोविंदगढ़ का आम और दशहरी पता था। जैसे-जैसे बड़े होते गए वैसे-वैसे आम के नए-नए नाम भी पता चलते गए। मैं मध्यप्रदेश से हूं। एमपी से यूपी तक आते-आते आम का राजा भी बदल गया। एमपी में जहां बादाम आम का राजा था तो वहीं यूपी आने के बाद आम का राजा सफेदा हो गया। आम रस तो बचपन में भी पीते थे। आमरस के साथ दाल की रोटी खाने का आनंद तो सच्चा बघेली ही जान सकता है। बचपन में आम का रस निकालकर हम उसमें काजू,किशमिश,बादाम, दूध और थोड़ी शक्कर मिलाकर फ्रिज में जमने के लिए रख देते थे। यही हमारे लिए आइसक्रीम थी। अब तो केवल दुकानों में ही मैंगो फ्लेवर वाली आइसक्रीम खाना होता है। आम रस के नाम पर बाजार में दस-पांच रुपये में मिल रहे मैंगो जूस को पीकर अपने आप को तृप्त करते हैं।
आम को फलों का राजा कहा जाता है। आम सच में फलों का राजा होने लायक है भी क्योंकि आम खाने के लिए किसी प्रकार की लक्जरी की जरूरत नहीं है। एक आम इंसान से लेकर अमीर तक आम को खाता है। मैंने आज तक आम खाने के लिए किसी व्यक्ति को कहते हुए नहीं सुना कि हमारे पास लक्जरी तो थी नहीं, सिवाय एक के। आम के लिए अब तो एक मौसम विशेष तक रुकने की जरुरत भी नहीं है क्योंकि अब आम बारहमासी हो गया है। जब मन करे आम खरीदो और खाओ। आम की टक्कर आज कीवी, ड्रेगन फ्रूट, आवोकाडो से हो गई है। मेरे लिए तो आम ही 'द बेस्ट' है जिसके लिए लक्जरी की जरुरत नहीं पड़ती है। हां मैंने आज तक मैंगो लस्सी का स्वाद नहीं चखा है। मैंगो लस्सी का स्वाद तो मैं कभी चख लूंगा लेकिन इसके लिए मैं लक्जरी को दोष नहीं दूंगा। मैंगो लस्सी के एवज में मैंने मैंगो फ्लेवर वाली टॉफी जरूर खाई है। पता नहीं और क्या बाकी है और क्या नहीं लेकिन मेरे हिसाब भारत का कोई भी वर्ग हो उसे आम खाने के लिए लक्जरी की जरुरत नहीं है। आम की तरह हम भी तो मैंगो पीपुल(mango people) हैं।


