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रविवार, 28 अक्टूबर 2018
बात केवल जमाल खाशोगी की नहीं है....
गुरुवार, 18 अक्टूबर 2018
इलाहाबाद और भी हैं...
भारत एक शानदार देश है। इसकी महानता इसकी विशालता और विविधता से दिखाई पड़ती है। भारत कोई एक झटके में बनने वाला देश नहीं है। इसने कई उतार-चढ़ाव देखें हैं। भारत का नाम शकुंतला के पुत्र भरत के नाम पड़ा। भारत को और भी अनेक नामों से जाना जाता था और है। इन नामों में आर्यावर्त, जम्बूद्वीप जैसे नाम हैं। भारत को भारत आज कितने लोग बोलते हैं? यह सवाल नहीं बल्कि भारत सरकार के लिए एक बड़ा सवाल है। अंग्रेजों के आने के बाद भारत इंडिया बन गया। वास्कोडिगामा ने भारत की खोज नहीं की थी बल्कि इंडिया की खोज की। भारत को उसके बाद से इंडिया नाम से नाम भी जाना जाने लगा। आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत इंडिया है न कि भारत। यह हमारी बिडंबना है कि भारत, भारत में है और भारत से बाहर इंडिया। हमारे देश के कुछ अंग्रेजीदां लोग भी भारत की एवज में इंडिया ही बोलते हैं।
नामकरण संस्कार सोलह संस्कारों में से एक महत्वपूर्ण संस्कार है। जब बच्चा बड़ा होने लगता है तो उसे नाम की जरूरत होती है। नामकरण संस्कार इसी का कारण किया जाता है। इसी तरह किसी देश, राज्य और शहरों का नामकरण किया जाता है। किसी भी जगह का नामकरण उसके इतिहास, भूगोल, राजनैतिक कारण, व्यक्तिगत योगदान आदि पर निर्भर करता है। ताजा विवाद इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज रखने को लेकर है। इलाहाबाद उत्तरप्रदेश का एक महत्वपूर्ण शहर है। इसका इतिहास कई दशकों का नहीं बल्कि कई युगों का है। यहां मनु के वंशज पुरुरवा एल का उल्लेख मिलता है। उत्तर प्रदेश सरकार ने यह कहते हुए नाम बदल दिया कि इलाहाबाद का पुरातन काल से नाम प्रयागराज ही था। एक और कारण बताया कि क्या आपका(मनुष्य) एक बार नामकरण करने बाद नाम बदला जाता है? नहीं बदलते तो फिर शहर का नाम क्यों? इसके अलावा इलाहाबाद का इतिहास भी हवा में तैर गया कि इसका नाम अकबर ने इलाहाबाद में बदल दिया था। इलाहाबाद का अर्थ निकाला गया कि अल्लाह का आबाद किया हुआ।
आज मैं एक लेख पढ़ रहा था जिसमें इलाहाबाद का नाम प्रयागराज करने को लेकर कटाक्ष किया गया था कि इलाहाबाद का अर्थ अल्लाह का आबाद शहर नहीं है। इसका कुछ और ही अर्थ होता है। उस लेख में इलाहाबाद का संबंध मनु की बेटी इला से जोड़ा गया। उसमें यह बताया गया कि इलाहाबाद का पहले नाम इलावास था। इलावास बाद में इलाहाबाद बन गया।
नाम बदलने की परंपरा कोई नहीं है। इसमें राजनीतिक प्रभाव ज्यादा रहा है। भारत में शहरों से लेकर राज्यों तक के नामों को बदला गया है। अंग्रेजों के समय मुंबई का नाम बॉम्बे था जो बाद में बंबई हो गया और आखिरी में मुंबई रखा गया। मुंबई रखने पीछे कारण दिया गया मुंबा देवी। मुंबा देवी के नाम पर मुंबई का नामकरण किया गया। केवल मुंबई ही नहीं और भी कई ऐसे शहर है जिनके नाम बदले गए। लोगों की भावना को बरकरार रखने के लिए तुष्टिकरण के लिए आदि। कोलकाता का पुराना नाम कलकत्ता था। कलकत्ता नाम अंग्रेज उपयोग किया करते थे। मद्रास का नाम चेन्नई किया गया। बंगलौर से बंगलुरू हो गया, त्रिवेंद्रम से तिरूवनंतपुरम हो गया, मैसूर , मैसूरू हो गया, पूना से पुणे हो गया। यह सब कुछ एक रात में नहीं हुआ। इन सबके पीछे बात यह थी कि अंग्रेजों की सोच को पीछे छोड़ना चाहते थे। लेकिन हमारे साथ दिक्कत है कि हम भावनाओं में बह जाते हैं।
इससे पहले गुड़गांव का नाम गुरुग्राम करने पर खूब विवाद हुआ लेकिन आखिरकार नाम बदल दिया गया। अब सवाल यह उठता है कि क्या बाकि शहरों का नाम भी बदला जाएगा। मथुरा को मधुपुर कहा जाएगा? कानपुर को कर्णनगरी? लखनऊ को लक्ष्मणावती? कर दिया जाएगा? इस सारे विवाद में वे शहर भी शामिल हैं जो अपने पुराने नामों से पहचाने जाने चाहिए। अजमेर को अजयमेरु, जैसलमेर को जैसलमेरु, अहमदाबाद को कर्णावती, भोपाल को भोजपाल, हैदराबाद को भाग्यनगर, इंदौर को इंदुर, भुवनेश्वर को बिंदु सरोवर, मेरठ को मयराष्ट्र, जबलपुर को जबआलीपुरम, दमोह को तुंडीकेर कर देना चाहिए। क्या यह संभव है? परंपरा और पुरातन व्यवस्था के आधार पर नाम बदलना कहां तक उचित है। क्या सरकार में हिम्मत है कि वह दिल्ली का नाम इंद्रप्रस्थ और पटना का पाटिलीपुत्र करके दिखाए।
राज्यों का नाम भी समय-समय पर बदला गया। उत्तरांचल को उत्तराखंड कर दिया। उड़ीसा को ओडिशा कर दिया। क्या असम का नाम भी प्रागज्योतिष रखा जाएगा? महाभारत में असम का उल्लेख प्रागज्योतिष के नाम से मिलता है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ का रामायण में दंडकारण्य के नाम से उल्लेख मिलता है।
सरकार को नाम बदलने से बढ़िया है कि काम करें। लोगों का हित देखे। लोगों के जीवन में समृद्धि आए ऐसे काम करें। नाम बदलना सरकार काम नहीं है। जब जनता चाहेगी तब नाम बदल जाएगा। सरकार को नामकरण को ट्रेंड नहीं बना लेना चाहिए। छत्तीसगढ़ सरकार की तरह नया रायपुर का बदलकर अटल नगर कर दिया। इतिहास गवाह है कि सत्ता जिसके हाथ में रही है उसने अपने पूर्व की सत्ता की बातों को पलटा है।
पुराने समय से लेकर आज तक इतिहास उठाकर देखिए एक शहर कितने नामों से जाना गया है। एक शहर के कम से कम दो नाम जरुर मिलेंगे। जब मुस्लिम आक्रमणकारी आए तो उन्होंने अरबी और फारसी वाले खूब नामकरण किए। लगभग सारे बाद वाले शहर इन्हीं की देन है। मुगलों के बाद अंग्रेज,डच, फ्रांसीसी, पुर्तगाली आए तो इन्होंने अपनी भाषा में शहर का नाम रखा। इसके बाद सुविधानुसार शहर का नाम बदलते गए और शहर भी।
📃BY_vinaykushwaha
शुक्रवार, 14 सितंबर 2018
अटल सोचते होंगे

शुक्रवार, 24 अगस्त 2018
पाकिस्तान और इमरान खान
क्या इमरान पाकिस्तान के पीएम रहते हुए अपना कार्यकाल पूरा कर पाएंगे?
इमरान खान ने 18 अगस्त को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के पद की शपथ लिया. शपथ लेने के साथ ही इमरान पाकिस्तान के अधिकारिक रूप से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बन गए. सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वे अपना कार्यकाल पूरा कर पाएंगे. पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास गवाह है कि आज तक कोई भी प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया है. अभी हालिया उदाहरण हमारे सामने नवाज शरीफ के रूप में है. जिन्हें पनामा पेपर लीक मामले में पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने उनकी उम्मीदवारी को अयोग्य घोषित कर दिया है. उम्मीदवारी अयोग्य घोषित होने के साथ ही उन्हें प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा और 14 साल की सजा हो गई.
नवाज शरीफ के साथ कोई यह पहली बार नहीं हुआ है. साल 1993 में नवाज शरीफ सरकार को तत्कालीन राष्ट्रपति गुलाम खान ने बर्खास्त कर दिया. यह मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा और सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सरकार को बहाल कर दिया. मामला यही नहीं थमा बल्कि राष्ट्रपति गुलाम खान ने फिर से उन्हें पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 58-2b के तहत फिर से बर्खास्त करने का प्रयास किया गया. मामला फिर से सुप्रीम कोर्ट गया और शरीफ ने मामले पर समझौता करते हुए इस्तीफा दे दिया. सरकार केवल 2 साल 7 महीने तक चली.
इसके बाद 1997 में नवाज शरीफ ने फिर से सरकार बनाई. इस बार भी काली परछाइयों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा. जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ उस समय सेना प्रमुख थे. साल 1999 में परवेज़ मुशर्रफ़ ने नवाज शरीफ की सरकार को हटाकर मार्शल लॉ लगा दिया. फिर से नवाज सरकार अपना कार्यकाल पूरा करने में नाकाम रही. मुशर्रफ़ ने देश पर 1999 से लेकर 2001 तक तानाशाह के रूप में शासन किया. साल 2001 में परवेज़ मुशर्रफ़ राष्ट्रपति बन गया. राष्ट्रपति के रूप में उसने देश में 2001 से 2008 तक शासन किया.
परवेज़ के राष्ट्रपति के रूप में रहते हुए चार प्रधानमंत्री हुए. जिनमें से किसी ने भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया. कोई तीन साल तो कोई दो महीने के लिए प्रधानमंत्री बना. मुशर्रफ़ के राष्ट्रपति रहते हुए युसूफ़ रजा गिलानी ही एकमात्र प्रधानमंत्री थे जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा करने से करीब 10 महीने से चूक गए. उन्होंने 4 साल 2 महीने का कार्यकाल पूरा किया. युसूफ़ को न्यायालय की अवमानना के मामले में उनकी सीट को 2012 में अयोग्य घोषित कर दिया. शेष बचा हुआ कार्यकाल परेवज़ अशरफ़ ने पूरा किया.
पाकिस्तान के इतिहास में यह पहली बार नहीं था कि किसी सेना प्रमुख ने प्रधानमंत्री को उसके पद से हटाने के बाद सत्ता की बागड़ोर अपने हाथ में ले ली हो. इससे पहले 1958 में फ़िरोज खान नून की सरकार को तत्कालीन राष्ट्रपति शकंदर मिर्जा ने बर्खास्त करते हुए मार्शल लॉ लागू कर दिया. इस काम में उनका साथ अयूब़ खान ने दिया जो तत्कालीन सेना प्रमुख थे. नून सरकार ने अपना हनीमून पीरियड भी पूरा नहीं कर पाई. अयूब़ खान ने अपने दोस्त यानी शकंदर मिर्जा को भी नहीं बख्श़ा, हिरासत में ले लिया. बाद में शकंदर को देश से निकाल दिया जिनकी बाद में ब्रिटेन में मृत्यु हो गई. अब पाकिस्तान पर अयूब़ खान का राज था. अयूब़ खान ने 1958 से 1969 तक राष्ट्रपति के रूप में राज किया.
अयूब़ खान के बाद देश के राष्ट्रपति याह्या खान बने. याह्या खान 1969 लेकर 1971 तक देश के राष्ट्रपति रहे. पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में 1958 से लेकर 1971 तक कोई भी प्रधानमंत्री नहीं रहा. याह्या खान के राष्ट्रपति रहते हुए नुरुल अमीन मात्र 13 दिनों के लिए प्रधानमंत्री बने.
वर्ष 1971 में बंगलादेश युद्ध हुआ. जुल्फिकार अली भुट्टो 1971 से 1973 तक राष्ट्रपति रहे. इस दौरान कोई भी प्रधानमंत्री नहीं बना. साल 1973 में जब जुल्फिकार अली भुट्टो देश के प्रधानमंत्री बने. जुल्फिकार के प्रधानमंत्री रहते हुए 1977 में सेना प्रमुख जिआ-उल-हक को नियुक्त किया गया. जैसे ही जिआ-उल-हक सेना प्रमुख बने उसी वर्ष जुल्फिकार सरकार को हटाकर मार्शल लॉ लगा दिया. साल 1978 में जिआ-उल-हक खुद ही राष्ट्रपति बन गया. पाकिस्तान पर 1978 से लेकर 1988 तक राष्ट्रपति रहे. जिआ के काल में केवल एक बार चुनाव हुए. वर्ष 1985 में हुए इस चुनाव में मोहम्मद खान जूनेजो प्रधानमंत्री बने. इस चुनाव की सबसे बड़ी बात यह थी कि यह निष्पक्ष चुनाव नहीं था. यह पार्टी बेस्ड चुनाव न होकर स्वतंत्र चुनाव था. जूनेजो 1985 से लेकर 1988 तक प्रधानमंत्री रहे.
साल 1988 में फिर से पाकिस्तान में चुनाव हुए. इन चुनावों पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की जीत हुई. बेनजीर भुट्टो पाकिस्तान की पहली महिला प्रधानमंत्री बनी. बेनजीर, जुल्फिकार अली भुट्टो की बेटी थी. यह सरकार भी ज्यादा दिनों तक नहीं चली. पाकिस्तान में फिर से 1990 में चुनाव हुए जिसमें नवाज शरीफ चुनकर आए. इन्हें मार्शल लॉ के जरिए हटा दिया गया.
पाकिस्तान वैसे तो एक लोकतांत्रिक देश है लेकिन उसका पूरा नाम इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान है. क्रिकेट से राजनीति की दुनिया में आए इमरान खान पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में कुछ नया करने के लिए आए. भले ही उन्हें चुनावों में पूर्ण बहुमत न मिला हो लेकिन वे जनता के मुद्दों को उठाने में सफल रहे हैं. इमरान ने पाकिस्तान के चार बड़े मुद्दों पर खुलकर आवाज बुलंद की जिनमें बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, पाकिस्तान की चरमराती अर्थव्यवस्था और आतंकवाद है.
राजनीति में आने के बाद इमरान ने हमेशा ऐसे मुद्दों को अपनी आवाज दी है जो जनता को प्रभावित करते हैं। नवाज शरीफ, आसफ अली जरदारी जैसे राजनेताओं को कड़ी टक्कर दी। पाकिस्तान की दो सबसे बड़ी पार्टियां मुस्लिम लीग और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को इमरान की नवांकुर पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ ने चुनौती दी है। आम चुनाव 2018 में तो दोनों पार्टियां घुटने टेकते हुए नज़र आईं। भारत के विषय में इमरान ने हमेशा सधी टिप्पणी की है। क्रिकेटर यह बात अच्छे से समझता है कि किस गेंद पर चौका और किस गेंद पर छक्का लगाना है.
अभी तक इमरान तीन शादियां कर चुके हैं. तीसरी पत्नी बुशरा मानेका ने उन्हें एक बार कहा था कि यदि आप प्रधानमंत्री बनना चाहते हो तो आपको तीसरी शादी करनी होगी. बुशरा मानेका एक पीरनी है, उन्हें पिंकी पीर के नाम से भी जाना जाता है. अब देखना होगा कि बुशरा बीबी की भविष्यवाणी किस हद तक सही होगी और कब तक इमरान को पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनाकर रखेंगी।
यही दौर पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में चलता रहा है. आगे क्या होगा यह तो समय ही बताएगा. इमरान की सरकार शायद अपनी सरकार के पांच साल पूरा करने में कामयाब हो.
📃BY_vinaykushwaha
शनिवार, 9 जून 2018
भारतीय वास्तुकला (श्रृंखला-चार)
भारतीय वास्तुकला में विदेशियों का भी योगदान है यहां बहुत सी ऐसी स्थापत्य कला हमें देखने के मिलती है जिसे मुस्लिम स्थापत्य कला के रूप में जानते है। जब मुस्लिम स्थापत्य कला का भारत में प्रवेश हुआ तो यह हिंदु-मुस्लिम स्थापत्य कला या इंडो-इस्लामिक स्थापत्य कला हो गई। मुस्लिम धर्म में मूर्ति पूजा वर्जित है जिसके कारण मुस्लिम शासकों के द्वारा तैयार किए गए स्मारकों, मस्जिदों,मकबरों,भवनों या किसी भी संरचना में मूर्ति देखने को नहीं मिलती है। मूर्तियों की जगह फूल-पत्ती, मेहराब, गुंबद, मीनार, बुर्ज, जाली आदि ने लियी। इनके उपयोग से भारत में नए-नए स्थापत्य कला का विकास हुआ।
मुस्लिम शासकों ने अपने शासन में सर्वाधिक जोर मस्जिद बनाने में दिया। मस्जिगों में मीनार, गुंबद, मेहराब पर दिया गया। जहां मंदिरों में शिखर हुआ करते थे वही मस्जिदों में उनकी जगह गुंबद ने ली। भारत का सबसे बड़ा गुंबद कर्नाटक के बीजापुर में स्थित है। यह अपने आप में कारीगरी का बेमिसाल उदाहरण है। यह बीजापुर के शासक ने बनवाया था। यह बलुआ पत्थर से तैयार किया गया है। गुंबद बनाने गोलाकार या यूं कहे कि उल्टा कटोरा होता है। उत्तर भारत और दक्षिण भारत दोनों में सामग्री के इस्तेमाल में विभिन्न पाई गई है। मुगलों समय जहां उत्तर भारत में लाल पत्थर का उपयोग किया वही दक्षिण भारत में ग्रेनाइट और बलुआ पत्थर का उपयोग किया गया।
मीनार, मुस्लिम स्थापत्य कला का अभिन्न हिस्सा हैजिसे सामान्यतया हर मस्जिद देखा जा सकता है। मस्जिद में अजान के लिए इन मीनारों का उपयोग किया जाता था। भारत की सबसे ऊंची मीनार कुतुब मीनार है जो विश्व विरासत स्थल में शामिल है। इसका निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक ने करवाया था जिसे पूरा कराने का श्रेय इल्तुतमिश हो जाता है। इन मीनार का निर्माण भी स्थान विशेष पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर किया जा जाता था। कही लाल पत्थर,तो कही बलुआ पत्थर तो कही बेसाल्ट का उपयोग किया जाता था। मीनारों को कलात्मक बनाया जाता था जिसमें नक्काशी की जाती थी।
मीनार के शिखर पर जाने के लिए सीढ़ियां बनाई जाती थी। कई बार यह सीढ़ियों अंदर से होती थी और कई बार बाहर से। जैसे कुतुब मीनार में सीढ़ियां मीनार के अंदर से बनाई गई जबकि जूनागढ़ के बहाउद्दीन के मकबरे में मीनार के बाहर से बनाई गई है। इन मीनारों की कलात्मकता देखते ही बनती है। मीनारों को इस प्रकार भी बनाया जाता था कि यह मुख्य संरचना को कोई नुकसान न पहुंचाए। यदि कभी भूकंप वगैरह आए तो मीनार बाहर की ओर या मुख्य संरचना से विपरीत गिरें। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ताजमहल है जिसमें मीनारों को इस प्रकार बनाया है कि मीनारें बाहर की ओर गिरे।
किसी भी संरचना को सुंदर बनाने के लिए बड़ी-बड़ी मीनारों के अलावा छोटी-छोटी मीनारों का उपयोग किया जाता था। ताजमहल में इस प्रकार की संरचना देखने को मिलती है।
मुगलकाल और बाद दरवाजें बनवाने का प्रचलन चला। अकबर ने गुजरात विजय पर भारत का सबसे ऊंचा दरवाजें का निर्माण करवाया। जिसका नाम फतेहपुर सीकरी का बुलंद दरवाजा है। इसका निर्माण लाल पत्थर से किया गया है। इसके अलावा लखनऊ, जयपुर, मांडू, भोपाल, अहमदाबाद आदि जगह दरवाजा परम्परा देखने को मिलती है। दरवाजों को सुंदर और कलात्मक के साथ-साथ भव्य बनाया जाता था। इसका कारण यह था कि जो पड़ोसी राज्य है उसके राज्य की वैभव-विलासता को पहचान सके। दरवाजों का वर्णन हमें प्राचीन समय से सुनने को मिलता है लेकिन यहां बात इस्लामिक संरचना पर बने दरवाजों की हो रही है।
इस्लामिक स्थापत्य कला में एक विशेष प्रकार की सामग्री का उपयोग किया गया। वह सामग्री है संगमरमर। इसकी सबसे बड़ी मिसाल ताजमहल है। ताजमहल, संगमरमर से बनी पहली इमारत नहीं है बल्कि आगरा में ही बनी ऐतमाद्दौला का मकबरा है। पूर्ण रूप से संगमरमर से बनी यह पहली इमारत थी। इन दोनों इमारत को बनाने में मकराना के संगमरमर का उपयोग किया गया है। मुगलों के काल में राजस्थान से संगमरमर के साथ-साथ लाल पत्थर का भी निर्यात किया जाता था।
भारत में विदेश से कई प्रकार की कला का आगमन हुआ जिसमें पेट्राडोरा या पित्रादुरा कहते है। पेट्राडोरा एक कला है जिसका आगमन ईरान से हुआ है। यह कला संगमरमर के पत्थर पर विभिन्न प्रकार को रत्नों को खोदकर सजाया जाता है। विभिन्न प्रकार के आकार और आकृति के पत्थर पर अलग-अलग सजावट के साथ बनाया जाता है। इसमें पेड़- पौधे, फूल, पत्ती, विभिन्न प्रकार की आकृतियों को उकेरकर उसमें विभिन्न रंगों जैसे लाल, पीला, हरा, नीला, गुलाबी, फिरोजी आदि रंगों का उपयोग किया जाता है।
इस्लामिक स्थापत्य कला में एक और कला सामने आती है। जाली, इस्लामिक स्थापत्य कला में एक अहम स्थान रखती है। चाहे मकबरा हो या मस्जिद हो या दरगाह हो या किला हो या महल हो या छतरी हो मुगलकाल से जाली का महत्व बढ़ गया। अहमदाबाद में निर्मित जामा मस्जिद या जुम्मा मस्जिद में हिन्दु स्थापत्य कला या भारतीय स्थापत्य कला या मंदिर स्थापत्य कला की छाप आसानी से देखने को मिलती है। यहां आसानी कई ऐसी आकृतियां देखने को मिलता है भारतीय संस्कृति और संस्कार को दर्शाती हैं। इसके अलावा हैदराबाद की चार मीनार भी शानदार नमूना है। यह एक दरवाजे की तरह है जिसमें चार मीनार है। मध्यप्रदेश के मांडू में बने अनेक महल इस्लामिक स्थापत्य कला को दर्शाते हैं। इन महलों या संरचना में जहाज की आकृति के तरह बना जहाज महल, गुजरी महल, होशंगशाह का मकबरा, अशर्फी महल आदि सभी एक प्रतीक है।
दिल्ली और आगरा का लाल किला, हुमाऊं का मकबरा, सिकंदरा मकबरा, हौज खास, कशमीरी गेट, फतेहपुर सीकरी, भोपाल की ताज-उल-मस्जिद, हैदराबाद की मोती मस्जिद, गोलकुंडा का किला, बीजापुर का गोल गुबंद आदि इस्लामिक स्थापत्य कला के नमूने हैं। इस्लामिक स्थापत्य कला में आगरा स्थित ताजमहल को बेमिसाल प्रतीक माना जाता है। लखनऊ का बड़ा इमामबाड़ा, छोटा इमामबाड़ा, बुरहानपुर की ऐतिहासिक इमारत इसी स्थापत्य कला का नमूना। बुरहानपुर में स्थित कुंडी भंडारा जल व्यवस्था का अद्वितीय उदाहरण है। वही कुछ बदसूरत इमारत भी भारत में देखने को मिलता है। ऑरंगजेब द्वारा बनवाया गया बीबी मकबरा ताजमहल की फूहड नकल मात्र है।
भारत में इस्लामिक स्थापत्य कला में इमारत ही नहीं बल्कि एक और संरचना दिखाई देती है। यह संरचना "चार बाग" है। चार बाग एक प्रकार से गार्डन ही है। यह संरचना मुगलकाल से सामने आया या शुरु हुआ। इसमें एक गार्डन बनाया जाता है जिसे समकोण पर काटती दो सड़क द्वारा गार्डन को चार भाग में विभक्त कर दिया जाता है। चार बाग के साथ एक संरचना और जुड़ी हुई है जिसका नाम फव्वारा है। फव्वारा के कारण इमारत की सुंदरता बढ़ जाती है।
📃BY_vinaykushwaha
शुक्रवार, 8 जून 2018
पुस्तक समीक्षा: हम असहिष्णु लोग
आप तो मां सरस्वती के पुत्र हो तर्क के आधार पर सरकार को कठघरे में खड़े कीजिए। वरना समाज तो यही कहेगा कि आप साहित्य को राजनीति में घसीट रहे हैं। इन्हीं तथ्यपरक बातों के साथ देश में फैली अराजकता पर कटाक्ष करती एक पुस्तक 'हम असहिष्णु लोग'। अर्चना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक लोकेन्द्र सिंह ने लिखी है। इस पुस्तक में देश में हो रहे कथित आंदोलनों और मुहिमों पर कड़ा तमाचा जड़ा है। लेखक ने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित अपने लेखों के संग्रह को एक पुस्तक की शक्ल दी है।
पुस्तक के शीर्षक को देखें तो एक बार ऐसा लगता है कि यह किसी अराजकता की बात कह रहा है लेकिन ऐसा नहीं है। इस पुस्तक का शीर्षक 'हम असहिष्णु लोग' रखने के पीछे लेखक का देश में हो रही गतिविधियों से हैं जिसमें कुछ लोग स्वयं अराजकता फैला रहे है और समाज व देश की भोली-भाली जनता को बरगलाने की कोशिश कर रहे हैं साथ ही अव्यवस्था का ठीकरा किसी और फोड़ रहे हैं। यह पुस्तक उन अनैतिक गतिविधियों की गवाह है जिन्हें देश में बड़े जोर-शोर से चलाया जाता रहा। अवॉर्ड वापसी, यह एक ऐसा अभियान था जिसमें लेखक, साहित्यकार आदि में अपने अवॉर्ड वापस करने की होड़ मची थी। इस मुहिम को लेखक ने अवॉर्ड वापसी गैंग का नाम दिया है। सच ही है कि यह एक गैंग है जिसने असहिष्णुता के नाम पर अवॉर्ड वापसी की मुहिम चलाकर लोगों को बरगलाया गया। चाहे नयनतारा सहगल हो या अशोक बाजपेयी हो ने अपने अवॉर्ड वापस किए और तर्क भी ऐसे दिए कि जिनका मेल दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। एक साहित्यकार ने तो तर्क दिया कि सिक्ख दंगों के वजह से मैं अपना अवॉर्ड वापस कर रहा हूं। इसी मुहिम के खिलाफ लेखक ने जमकर लताड़ लगाई है।
इस पुस्तक में अवॉर्ड वापसी के अलावा असहिष्णुता के मुद्दे पर देश भर में फैलाई जा रही भ्रांतियों के बारे में लिखा है कि कैसे एक अभिनेता अपनी असुरक्षा के बारे में बात करता है और उनकी पत्नी कहती है कि यदि ऐसा ही माहौल रहा तो हमें देश छोड़ना होगा। देश में अव्यवस्था फैलाने वाले ऐसे लोगों पर तर्क सहित अपनी बातें रखी हैं। चाहे मामला गोमांस भक्षण का हो या किसी वर्ग विशेष को प्रोत्साहन देने की इन विषयों पर लेखक ने अपनी बात को बेबाकी से रखा है। सारे आम गोमांस खाकर हिन्दु धर्म के लोगों को चिढ़ाया जा रहा है और इसे बीफ पार्टी का नाम दिया जा रहा है। केरल जैसे राज्य जहां साक्षतरता दर सर्वाधिक है वहां सार्वजनिक स्थलों पर बीफ पार्टी का आयोजन किया जा रहा है। इसी विषय को किताब में जगह दी गई है और तर्कों के साथ बताया है कि किस प्रकार कुछ मुट्ठी भर लोग समाज में अव्यवस्था और साम्प्रदायिकता फैलाने का कार्य कर रहे हैं।
इन सबके अलावा पुस्तक में देश विरोधी अभियान और देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में हुई देश विरोधी गतिविधियों को भी शामिल किया गया है। जहां जेएनयू जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारे सुनाई दिए वही देश के अन्य विश्वविद्यालयों में देश और समाज को बांटने वाली गतिविधियों के तार्किक विश्लेषण को लेखक ने अपनी किताब में जगह दी है। यहां तक की विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय आस्था की केन्द्र भारतमाता और हिन्दु धर्म की बेइज्जती के मामले में भी लेखक ने बड़ी सटीकता के साथ लिखा है। अफजल गुरु और याकूब मेनन को महिमामंडित करके उनके पक्ष में नारे लगाकर देश की न्यायव्यवस्था को धता बताया गया, जिस पर लेखक ने अपनी पुस्तक में कटाक्ष किया है।
रास्ते के नाम बदलने की बात हो या पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी की कर्त्तव्यपरायणता की बात हो सभी मुद्दों को लेखक ने जगह दी। कुछ वर्ग विशेष के द्वारा केन्द्र सरकार के उस फैसले पर रोष जताया जिसमें ऑरंगजेब रोड का नाम बदलकर कलाम रोड किया गया। लेखक ने इसका तथ्यपरक विश्लेषण करके अपनी किताब में लिखा कि कैसे कुछ लोग अभी भी उस व्यक्ति को याद करना चाहते है जिसने देश को लूटा, अत्याचार किया, मानवता को तार-तार किया। इसके अलावा पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के उन गतिविधियों पर करारा प्रहार किया जिसमें उनके द्वारा सेना को सलामी न देना, राष्ट्रीय ध्वज को सलामी न देना और हिन्दु-मुस्लिम राजनीति की बात करना जैसे मुद्दे शामिल है।
हम असहिष्णु लोग पुस्तक देश में हो रही देश विरोधी गतिविधियों का एक प्रमाण है जिसमें उन अराजक ताकतों के बारे में लिखा है जो देश को बांटने का काम कर रही है। इस पुस्तक में सभी मुद्दों को तथ्यों और तार्किक के साथ बड़ी सटीकता से लिखा गया है। एक बार जरूर पढ़े 'हम असहिष्णु लोग'।
📃BY_vinaykushwaha
बुधवार, 16 मई 2018
कर्नाटक चुनाव विश्लेषण
भारत में ऐसा बहुत कम होता है कि ओपिनियन पोल, एक्जिट पोल और चुनाव का नतीजा बिल्कुल एक जैसा हो। इस बार कर्नाटक के परिप्रेक्ष्य में यह सही साबित हुआ। सभी नतीजों में बीजेपी को सबसे बड़ी पार्टी के रूप में दिखाया जा रहा था वही कांग्रेस को दूसरे नंबर पर और जेडीएस को तीसरे नंबर पर दिखाया जा रहा था। लेकिन इन सब के बीच किसी पार्टी को बहुमत नहीं दिया जा रहा था जो अन्त्वोगत्वा सही निकला। इस चुनाव भले ही बीजेपी को सबसे बड़ी पार्टी के रूप में दिखाया जा रहा हो लेकिन वह इस हालत में नहीं है कि वह कर्नाटक में सरकार बना सके। बीजेपी ने इस चुनाव 104 सीटों विजय हासिल की। वही कांग्रेस ने 77, जेडीएस ने 37 और अन्य को 3 सीटें मिली।
एक चौंका देने वाली बात यह है कि बहुजन समाज पार्टी को भी एक सीट मिली। दक्षिण भारत के राज्य बीएसपी का चुनाव जीतना चौंका सकता है लेकिन यह पहला मौका नहीं है जब बहुजन समाज पार्टी कर्नाटक में चुनाव लड़ रही है। 2013 में भी बीएसपी ने चुनाव लड़ा था और लगभग 1.5 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किए थे। इस बार सबसे बड़ी बात यह है कि बीएसपी का वोट शेयर घटा हैं जो 0.3 प्रतिशत तक जा पहुंचा हैं। इसके बावजूद बीएसपी को एक सीट पर कब्जा करने में कामयाबी मिली है।
इस चुनाव में बीएसपी और मायावती की चर्चा हो रही है। पहला कारण तो बीएसपी का एक सीट पर कब्जा करना और दूसरा कारण मायावती की पार्टी बीएसपी का पूर्व प्रधानमंत्री एच डी दैवेगौडा की जेडीएस की पार्टी का गठबंधन। यह गठबंधन चुनाव पूर्व किया गया था। मायावती का जेडीएस की चुनावी रैली में दिखना आम बात थी। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण मायावती का दैवेगौडा का फोन करके कांग्रेस के साथ कर्नाटक में सरकार बनाने की बात कहना। क्या यह कहा जा सकता है कि मायावती के कहने पर दैवेगौडा, कांग्रेस के साथ कर्नाटक में सरकार बनाने के लिए राजी हुए हैं।
कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला के सामने सरकार बनाने का प्रस्ताव रखा है। कांग्रेस ने एच डी दैवेगौडा के सुपुत्र कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार किया है। कांग्रेस और जेडीएस (77+37=114) के जादूई आंकडें को छू लिया है। इन सबके अलावा यह सवाल करना सही रहेगा कि क्या यह सरकार कितने दिनों तक काबिज रहेगी? अभी बगावती सुर बुलंद हो गए हैं। वोक्कालिंगा, लिंगायत और कुरबा अलग-अलग जातियों से आने वाले विधायकों ने अपनी-अपनी को विरोध के रूप में कहने का प्रयास किया है। जेडीएस के कुछ विधायक सिद्धारमैया को स्वीकार नहीं करना चाहते क्योंकि वे कुरबा जाति से आते है।
एक और बात सामने आती है कि क्या दैवेगौडा सिद्धारमैया को सरकार में स्वीकार करेंगे? यह वही सिद्धारमैया है जिन्होंने बगावत करते हुए जनता दल (एस) को तोड़ने की कोशिश की थी। सबसे बड़ी बात तो यह है कि क्या दैवेगौडा, सिद्धारमैया को अपने से ऊपर देखना चाहेंगे क्योंकि सिद्धारमैया कभी दैवेगौडा के शिष्य रह चुके हैं। उन्हीं के सानिध्य में सिद्धारमैया ने राजनीतिक गुर सीखें हैं। कर्नाटक की सरकार में मुख्यमंत्री के रूप में रहते हुए सिद्धारमैया पर कई आरोप लगे जिनमें मंहगी वस्तुओं का उपयोग करना, भ्रष्टाचार और सबसे बड़ा आरोप है कि लिंगायत समाज को एक अलग धर्म के रूप में मान्यता देना। सिद्धारमैया को इसका खामियाजा सरकार की बलि देकर चुकाना पड़ा।
इस चुनाव सर्वाधिक वोट प्रतिशत कांग्रेस का 37.9 प्रतिशत रहा जबकि सर्वाधिक सीट लाने बीजेपी का वोट प्रतिशत 36 प्रतिशत रहा। सीटों की बात कही जाए तो बीजेपी ने तटीय कर्नाटक में शानदार प्रदर्शन किया में 21 में से 18 जीतकर कांग्रेस को तीन सीटों पर समेट दिया। बीजेपी उन जगह सबसे अच्छा प्रदर्शन किया जहां लिंगायत समुदाय जनसंख्या ज्यादा है। यह कांग्रेस की नाकामयाबी का नतीजा है जिसका फायदा बीजेपी ने उठाया है। बंगलुरू रीजन में भी बीजेपी का प्रदर्शन अच्छा रहा।
किसी पार्टी को बहुमत न मिलने से नतीजा त्रिशंकु आया। देखना होगा कि कौन सरकार बनाने की रेस में पहले नंबर पर होगा। कही कांग्रेस का हाल मणिपुर और गोवा की तरह न हो जाए या ऐसा भी कह सकते है कि बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद भी सरकार न बना सके। कांग्रेस ने बीजेपी से सबक लेते हुए जल्दी से एक्शन लिया है। अपने दो कद्दावर नेता गुलाम नबी आजाद और अशोक गहलोत को बंगलुरू भेजकर सरकार बनाने की बात कही। वही सिद्धारमैया राज्यपाल से मिलने में देरी नहीं की। इसके साथ ही कुमारस्वामी ने भी राज्यपाल से मुलाकात की।
कांग्रेस ने बीजेपी से एक ज्ञान नहीं लिया कि कैसे सोशल इंजीनियरिंग की जाती है? गुजरात चुनाव की तरह कर्नाटक में कांग्रेस ने जनता से संपर्क साधना में देर कर दिया जिसका नतीजा उसे भुगतना पड़ा। संघ की बदौलत आज बीजेपी इतनी उझल रही है यदि संघ का स्वयंसेवक जमीन पर न उतरता तो स्थिति कुछ और होती।
सरकार जिसकी भी बने स्थिर रहे। भ्रष्टाचार मुक्त रहे। कावेरी और महादयी जैसे मुद्दे सुलझाने में कामयाब रहे। भाषा को लेकर विरोध की राजनीति न हो।
📃BY_vinaykushwaha







