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सोमवार, 4 मई 2020

राजा रवि वर्मा : एक ऐसा चित्रकार जिसने चित्रों में भगवान को जीवित कर दिया


रविवर्मा भातखण्डे भाग्यचन्द्रः स भूपतिः
कलावंतश्च विख्याताः स्मरणीया निरन्तरम्‌॥
इस संस्कृत के श्लोक में उन लोगों के नाम हैं जिन्होंने कला को भारत में सर्वोच्च स्थान दिया। चाहे चित्रकला हो, संगीत हो, नृत्य हो भारत में एक अलग ही स्थान पर स्थापित करवाया। आज हम देवी लक्ष्मी, देवी सरस्वती, महाराणा प्रताप, शंकुतला, जटायु वध, अर्जुन-सुभद्रा, सैरंध्री, कार्तिकेय जैसे जो चित्र देखते हैं जो मानव रूप में दिखाई देते हैं। इन चित्रों में जान फूंकने का काम किया है भारत के महान चित्रकार राजा रविवर्मा ने। रविवर्मा ने भारतीय चित्रकला को वो आयाम दिया जिससे भारत में कला की क्रांति आ गई।

ऐसा बिल्कुल नहीं है कि राजा रवि वर्मा से पहले भारत में चित्रकला नहीं होती थी। मध्यप्रदेश के रायसेन जिले में स्थित भीमबेटका में तो ईसा से हजारों साल पहले की चित्रकारी देख सकते हैं। यही नहीं महाराष्ट्र की अजंता गुफाओं, एमपी की बाघ की गुफाओं, लेपाक्षी मंदिर और तंजौर के मंदिर में मानवीय रूप में चित्रकारी की गई। यह सिलसिला चलता रहा और बाद में कई क्षेत्रीय कला में इसे प्रोत्साहन मिलता चला गया। रवि वर्मा ने केवल चित्रकारी ही नहीं की बल्कि प्रयोग किए हैं।


केरल के किलिमानूर में जन्मे रवि वर्मा बचपन से ही चित्रकारी में धनी रहे हैं। केरल में एक प्रथा थी जिसमें विवाह करने के बाद पति अपनी पत्नी के घर पर ही रहता था। रवि वर्मा के माता-पिता ने भी इसी प्रथा को मानते हुए रवि वर्मा के मामा राजा राज वर्मा के घर रूके। रवि वर्मा को बचपन में लोग प्यार से कोच्चू के नाम से पुकारते थे। एक बार कोच्चू और उनकी बहन मंदिर के बगल में स्थित बगीचे में खेल रहे थे। उन्होंने अपनी बहन से बोला कि मैं मंदिर की दीवार पर घोड़े की आकृति बनाता हूं। उनकी बहन ने बोला जी भइया। बहन ने कोच्चू को कोयला का टुकड़ा उठाकर दिया। इसी कोयले के टुकड़े से कोच्चू ने मंदिर की दीवार पर एक शानदार छलांग भरता हुआ घोड़ा बनाया।

मंदिर की दीवार पर घोड़े की आकृति देखकर माली ने बच्चों से कहा कि मैं तुम दोनों की शिकायत राजा से करता हूं। माली ने बच्चों की शिकायत राजा से की। राजा राज वर्मा ने माली से कहा कि वो चित्रकारी कहां है मुझे भी देखना है। जैसे ही राजा राज वर्मा उस दीवार के पास पहुंचे तो उनके मुंह से चित्रकारी की  तारीफ के अलावा कुछ नहीं निकला। माली ने राजा राज वर्मा से कहा कि इन बच्चों ने मंदिर की दीवार गंदी कर दी और आप तारीफ कर रहे हैं। राजा राज वर्मा ने माली से कहा कि कोच्चू ने वाकई अच्छी चित्रकारी की है। कोच्चू के मामा स्वयं भी एक चित्रकार थे। कोच्चू अर्थात रवि वर्मा के शुरुआती गुरु उनके मामा ही थे।


कई लोग कहते हैं कि रवि वर्मा को प्रारंभिक चित्रकारी उनके चाचा ने सिखाई थी। राजा राज वर्मा ने किलीमानूर में रवि वर्मा को चित्रकारी वॉटर कलर से करना सिखाया। रवि वर्मा कुशाग्र बुद्धि के धनी व्यक्ति थे। रवि वर्मा ने मात्र 18 वर्ष की उम्र में तमिल, मलयालम भाषा का ज्ञान, संगीत, वादन और कथकली नृत्य सीख लिया था। पहले तिरुवनंतपुरम को त्रिवेंद्रम के नाम से भी जाना जाता था। त्रिवेंद्रम के राजा तिरुनल ने राजा राज वर्मा को बुलावा भेजा और संदेश दिया कि वे राजधानी त्रिवेंद्रम आएं और साथ में एक ऐसे बालक को लेकर आएं जिसकी आयु विवाह योग्य हो। राजा राज वर्मा अपने साथ तरुण रवि वर्मा को ले गए। राज वर्मा ने जब राजा तिरुनल से रवि वर्मा के बारे में बताया तो तिरुनल आश्चर्यचकित रह गया। राजा राज वर्मा ने आग्रह किया कि रवि वर्मा किलीमानूर में जितनी शिक्षा ग्रहण कर सकता था कर चुका है। यदि आप चाहें तो रवि वर्मा त्रिवेंद्रम में रहकर आगे कुछ सीख सकता है। राजा तिरुनल ने इस आग्रह को तुरंत स्वीकार कर लिया।


कोच्चू अब राजा रवि वर्मा बनने की दिशा में पैर रख चुका था। एक ऐसी दिशा जहां उसे संघर्ष, हुनर, इज्जत, शोहरत और बेइज्जती मिलने वाली थी। अब कोच्चू त्रिवेंद्रम में रहने लगा। राजा तिरुनल ने उस समय के प्रसिद्ध चित्रकार रामास्वामी नायकर को कोच्चू के शिक्षक के रूप में नियुक्त कर दिया। रामास्वामी नायकर को जब मालूम चला कि रंगों की कूची चलाने में कोच्चू मुझसे ज्यादा माहिर है तो वह सिखाने में टालमटोल करने लगा। हां, कोच्चू ने नायकर से कुछ सीखा हो या नहीं एक अच्छी शुरुआत जरूर हुई वो थी ऑयल पेंटिंग। जब राजा तिरुनल को पता चला कि नायकर कोच्चू को चित्रकारी नहीं सिखा रहा तब राजा ने कोच्चू को पुराने चित्र देकर अभ्यास करने के लिए कहा। यही अभ्यास कोच्चू को आगे तक ले गए।


इसी समय नीदरलैंड्स का प्रसिद्ध चित्रकार थियोडोर जेंसन राज दरबार में आया हुआ था। राजपरिवार ने जेंसन को पोट्रेट बनवाने  के लिए बुलवाया था। राजा तिरुनल ने तय किया कि कोच्चू चित्रकार थियोडोर जेंसन से पोट्रेट बनाने और ऑयल पेंटिंग के गुर सीखेगा। जेंसन को जब मालूम चला कि राजा इस बारे में सोच रहे हैं तो उसने कोच्चू को सिखाने से मना कर दिया। इस बात पर राजा नाराज हो गया और कहा कि हमें पोट्रेट नहीं बनवाना है। इसके बाद थियोडोर जेंसन ने कोच्चू को पोट्रेट बनाना सिखाया क्योंकि वो ऐसा ना करता तो उसे मोटी रकम और इज्जत गंवानी पड़ती। रवि वर्मा ने जैसे-तैसे पोट्रेट बनाना सीख ही लिया। जो रवि वर्मा के जीवन में बड़ा काम आया। पोट्रेट, चित्रकारी की विधा है जिसमें चित्रकार सामने बैठे किसी व्यक्ति की चित्रकारी कैनवास पर उतारता है।


रवि वर्मा ने आगे की शिक्षा मैसूर और बडौदा में हासिल की। रवि  वर्मा ने देशभर के चक्कर लगाए। भारतीय संस्कृति को समझने में रवि वर्मा को भारत यात्रा बहुत काम आई। इन्हीं यात्राओं के बाद रवि वर्मा ने अपनी चित्रकारी की जादूगरी बिखेरी। भारत यात्रा से पहले भी रवि वर्मा ने कई चित्र बनाए थे लेकिन उन्हें अब समझ आ गया था कि उन्हें करना क्या है? भारतीय संस्कृति के नायकों और देवी-देवताओं की ऑयल पेटिंग बनाना शुरू कर दी। देवी लक्ष्मी, देवी सरस्वती, भगवान कार्तिकेय, राधा-कृष्ण, सीता हरण, जटायु वध, अष्टसिद्धि, भीष्म प्रतिज्ञा, अर्जुन-सुभद्रा, शांतनु-मत्स्यगंधा, कण्व ऋषि और ऋषि कन्या, राम की वरुण विजय जैसी शानदार ऑयल पेंटिंग रवि वर्मा ने बनाई। शुरुआत में रवि वर्मा पेंटिंग में तंजौर कला का उपयोग करते थे लेकिन समय के साथ-साथ एक मिश्रित कला में बदल गई।


देवी-देवताओं के चित्र के अलावा राजा रवि वर्मा ने महाराणा प्रताप, अप्सरा-रंभा, फल के साथ महिला, ग्वालिन,नायर जाति की स्त्री, विचारमग्न युवती शामिल हैं। यहां तक की रवि वर्मा ने अपनी बहू का पोट्रेट भी बनाया। रवि वर्मा की सर्वश्रेष्ठ कलाकृति रही शकुंतला। पत्र लिखती शकुंतला, बगीचे में सखियों के साथ पीछे मुड़कर देखती शकुंतला, राजा के सम्मुख खड़ी शकुंतला जैसे अनेक चित्र बनाए। महाकवि कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तलम् पर आधारित ये चित्र इतने प्रसिद्ध रहे की विदेश में भी इसकी चर्चा हुई। इसी समय सर मोनियर विलियम्स ने अभिज्ञानशाकुन्तलम् का अंग्रेजी अनुवाद किया और पुस्तक के प्रथम पृष्ठ पर रवि वर्मा से प्रेम पत्र लिखती शकुंतला का चित्र छापने का आग्रह किया। इस आग्रह को रवि वर्मा ने स्वीकार कर लिया।


रवि वर्मा से चित्र और पोट्रेट बनवाने की मानो होड़ सी लग गई। अंग्रेज अफसरों से लेकर राजा-महाराजाओं ने रवि वर्मा से चित्र और पोट्रेट बनवाए। एक बार इसी काम के लिए उन्हें मैसूर राजघराने ने उन्हें दो हाथी तोहफे में दिए। एक बार रिचर्ड टैंपल-ग्रेनविले भारत आए तो उनका स्वागत त्रावणकोर के महाराज और उनके छोटे भाई ने किया। इस पेंटिंग की अंग्रेजों के बीच बहुत तारीफ हुई और इसकी नीलामी 1.2 मिलियन डॉलर में हुई। रवि वर्मा ने मुंबई में लिथोग्राफिक प्रेस भी खेला। इस प्रेस से उन्होंने बहुत धन कमाया और इज्जत भी। धन और इज्जत कई लोगों को हजम नहीं होती। रवि वर्मा पर यह कहते हुए आरोप लगाया कि वे नग्न तस्वीर बनाते हैं और मुंबई स्थित प्रेस पर कई लोगों ने हमला कर दिया। प्रेस को जला दिया गया जिससे कई सारी पेंटिंग जलकर स्वाहा हो गईं।


राजा रवि वर्मा की मुझे 'गैलेक्सी ऑफ म्युजिसियन्स' नामक की पेंटिंग सबसे अच्छी लगी। इस पेंटिंग विभिन्न परिधानों में 11 महिलाएं हैं जो भारत को प्रस्तुत कर रही हैं। कोई महिला वायलिन बजा रही है तो कोई तानपुरा सभी के चेहरे पर शांत और गंभीर भाव देखने मिल रहा है। पेंटिंग का भाव महिला केंद्रित है जिसमें ये बताया गया है कि महिला ही इस ब्रह्मांड की जननी है।


लोगों ने रवि वर्मा की प्रेस को तो जला दिया लेकिन हुनर अभी भी जिंदा था जो ताउम्र उनके साथ रहा। अबनीन्द्रनाथ टैगोर जैसे चित्रकार ने तो रवि वर्मा को भारतीय चित्रकार होने पर ही प्रश्न खड़ा कर दिया। उनका कहना था कि रवि वर्मा पेंटिंग बनाने के लिए विदेशी तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। अंग्रेजों ने उन्हें कैसर-ए-हिंद सम्मान से नवाजा। राजा की उपाधि भी मिली और वे बन गए राजा रवि वर्मा। साल 1906 में मात्र 58 साल की उम्र में राजा रवि वर्मा का देहांत हो गया। शरीर भले ही नश्वर हो लेकिन उनकी कलाकृति आज भी जीवित है। सच में वे चित्रकारों में राजा थे राजा। आज भी उनके बनाए गए चित्र बडौदा के लक्ष्मी विलास पैलेस म्यूजियम में देखने को मिल जाएंगे। 

📃BY_vinaykushwaha

(नोट :- राजा रवि वर्मा की पेंटिंग्स के सभी चित्र इंटरनेट से डाउनलोड किए गए हैं।) 



बुधवार, 29 अप्रैल 2020

कोरोना के संकटकाल में खाने का कैसे प्रबंध करें...


रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए ना ऊबरै , मोती, मानस, चून ।। रहीम ने आज से लगभग 500 साल पहले बताया था कि पानी का क्या महत्व है। पानी के बिना जीवन कितना अधूरा है। पानी को सहेजना होगा क्योंकि मानव (Human) से लेकर मोती (Pearl) तक सबकुछ पानी से ही है। पानी ही सबकुछ है लेकिन कोरोना के संकटकाल में लोगों को पता चल गया कि केवल पानी ही सबकुछ नहीं है। जीवन जीने के लिए और जीवित रहने के लिए हमें सूखे खाने को भी इकट्ठा करने की जरूरत है।

इतिहास बताता है कि आक्रमणकारी कई दिनों की यात्रा करके एक स्थान से दूसरे स्थान जाया करते थे। इनकी विशाल सेना में हाथी, घोड़े, शस्त्र-अस्त्र के अलावा ढेर सारा खाना भी होता था। वे ऐसा खाना लेकर चलते थे जो आसानी से खाया जा सके। जब किसी जगह पडाव होता था तो वहां के स्थानीय फसल और शिकार का इस्तेमाल किया जाता था। ये आक्रमणकारी अपने साथ फल, सूखे मेवे जैसे खाने के सामान लेकर चलते थे। इतना ही नहीं ये लोग अपने साथ मसाले भी ले जाया करते थे।

भारतीय पाक कला हजारों साल पुरानी है। इसमें कोई संदेह  नहीं है कि आज से लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों से चावल के प्रमाण मिले हैं जो ये बताता है कि वे केवल पशुपालन पर निर्भर नहीं थे। सिंधु घाटी सभ्यता के समय भारत का व्यापार मिस्त्र (Egypt), मेसोपोटामिया जैसी सभ्यताओं से रहा था। भारतीय व्यापारी इन सभ्यताओं को अनाज और कपास निर्यात करते थे बदले में ये सभ्याताएं मसाले और रत्न, कीमती धातु देते थे। धीरे-धीरे व्यापार का स्वरूप बदलता गया। मौर्य साम्राज्य के समय यूनान (Greece) के साथ व्यापारिक संबंध अच्छे थे।

ग्रीस मौर्य दरबार में अपने राजदूत नियुक्त करते थे। इसके बदले में भारत को सूखे मेवे जैसे खूबानी और इसके अलावा शराब आयात की जाती थी। व्यापारी जब एक जगह से दूसरी जगह जाते थे तो कई दिनों का सफर तय करते थे। इन कई दिनों के सफर में ऐसा खाना ले जाते थे जो हल्का हो जिससे वजन ना बढ़े और जल्दी खराब ना हो। गुजरात और राजस्थान के व्यापारियों में इस तरह के प्रमाण मिलते है कि वे अपने साथ बेसन से बने खाद्य पदार्थ के अलावा अचार भी ले जाया करते थे।

आज भी दोनों राज्यों के खानपान पर बेसन का प्रभाव साफ-साफ दिखाई देता है। गुजरात के व्यापारियों के खाने से लेकर अचार तक में शक्कर का इस्तेमाल किया जाता था। इसके पीछे एक  कारण था कि शरीर में ग्लूकोज की मात्रा में कमी ना हो। शक्कर खाने में होने से व्यापारियों को अलग से मीठे खाद्य पदार्थ लेने की आवश्यकता ही नहीं थी। राजस्थान में तो इसके उलट खाने में लाल मिर्च का इस्तेमाल किया जाता है। राजस्थान के व्यंजनों में लाल मिर्च डालने का सबसे बड़ा कारण शरीर से विषाक्तता निकलना। लाल मिर्च का सेवन करने से पसीना आता था और इससे शरीर से अनावश्यक पदार्थ बाहर निकल जाते थे।

भारत में हर क्षेत्र की अपनी एक विशेषता है। यही विशेषता खाने में साफ-साफ दिखाई देती है। दक्षिण भारत में चावल की अधिक  पैदावार होती है जो वहां के खाने में दिखाई देती है। इडली, डोसा, पुतरेकू, अवियल जैसे खाने तो सामान्य तौर पर खाते ही हैं लेकिन चावल से बने सूखे पदार्थ को लंबे समय तक खाने के लिए रखा जाता है। दक्षिण भारत में जून से सितंबर तक भारत की सबसे ज्यादा बारिश वाला समय होता है तब ये काम आता है।

मैं मध्यप्रदेश का रहने वाला हूं जहां हर मौसम की एक फसल होती है। यहां बारिश का मौसम तेज बरसात वाला और लंबा होता है जिस कारण हरी सब्जियां मिलना मुश्किल होता है। बरसात के मौसम में खाने में बड़ी (बरी) और बिजौरे का होता है। ठंड के समय कद्दू और उड़द की दाल से बनी बरी और तिल के साथ बनने वाले बिजौरे काम आते हैं। एमपी में सोयाबीन की पैदावार अच्छी होने के कारण यहां सोयाबीन की बरी खाने का प्रचलन है। सूखे खाद्य पदार्थ जो ऐसे समय काम आते हैं जब आपको हरी सब्जियां उपलब्ध नहीं होती हैं।

भारत में ठंड का मौसम हरी सब्जियों वाला होता है। इस मौसम में सब्जियां बहुतायत में पैदा होती हैं। मेथी (Fenugreek), पालक (Spinach) जैसी हरे पत्तेदार सब्जियां होती हैं। इन्हें सुखाकर बरसात के समय खाने में इस्तेमाल किया जाता है। पहाड़ी इलाकों में राजमा, चने, चौले, मटर जैसी सब्जियां होती है  जो सालभर खाने में सब्जी के रूप में इस्तेमाल की जाती है। खाना समुचित पोषक तत्व से भरपूर हो इसके लिए भारत में हमेशा से इसका ध्यान रखा जाता है। ठंड के समय तिल, राजगीर, लाई, गुड के लड्डू बनाए जाते हैं जो पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। पूर्वी एमपी और छत्तीसगढ़ में चावल की पैदावार जमकर होती है यही चावल ठंड के समय लड्डू बनाने के काम भी आता है।

जम्मू कश्मीर में आए दिन लॉकडाउन और बंद का सामना करना पड़ता है। लॉकडाउन और बंद के अलावा यहां सर्दियां कटीली और कष्टदायक होती है। इसी वजह से यहां सूखे खाद्य पदार्थ को इकट्ठा करने की विशेषता रही है। यहां राजमा, काबुली चने, सूखे मेवे का इस्तेमाल किया जाता है। ठंड के समय में चाय बनाने के लिए समोवार का इस्तेमाल किया जाता है जिसमें चायपत्ती की जगह गुलदाउदी की पत्ती, केसर, मेवे और नमक का इस्तेमाल किया जाता है। यहां समोवार में बनने वाली चाय मीठी नहीं नमकीन होती है। इसी तरह उत्तराखण्ड और हिमाचल में आलू की पैदावार अच्छी होती है जो यहां के खाने में सालभर दिखाई देता है।

कोविड-19 की वजह से भारत में लॉकडाउन के 36 दिन पूरे हो चुके हैं। करोड़ों लोग को सरकार और समाजसेवी संगठन राशन और सब्जियां उपलब्ध करा रहे हैं। भारत के उन इलाकों जहां सरकार और समाजसेवी संगठन की पहुंच नहीं वहां हाल क्या है ये वही बता सकता है जो भुक्तभोगी है। भारत और भारतीयों के लिए सीख है कि हमें अपने आप से सीखना होगा कि कैसे किसी विपदा से तैयार रहे हैं। जमाखोरी नहीं करना है बल्कि इसका दूसरा विकल्प खोजना है। इस विकल्प में ऐसे खाद्य पदार्थ एकत्रित करना है जो आसान से ही हमारे लिए उपलब्ध है। जैसे चाय बनाने के लिए चाय पत्ती ना हो तो आप सेवंती के फूल या गुलदाउदी के फूल को सुखा कर चायपत्ती के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। यदि ऐसा संभव ना हो पाए तो घर के गमलों का इस्तेमाल करें एक गमले में अगिया घास लगाएं जो चायपत्ती के जगह इस्तेमाल किया जा सकता है।

विपदा के समय घर के गमले काम आ सकते हैं। इन गमले में केवल फूल और शो पत्ती ना उगाएं। इनका इस्तेमाल हरी सब्जी उगाने के लिए इस्तेमाल करें। किचन गार्डन में केवल गार्डन ना हो फल और सब्जियां उगाएं। गमलों में आप हरी धनिया, हरी मिर्च, लौकी, करेला, गिलकी, सेम, पुदीना, करी पत्ता, आलू, टमाटर जैसी सब्जी उगा सकते हैं। जब आपके घर में खाद्य तेल (edible oil) खत्म हो जाए तो उसका क्या विकल्प है? इसका विकल्प ये है कि दूध से घी बनाना सीखें जो आपका सालभर साथ देगा।

ये छोटी-छोटी चीज हैं जो भारत को विपदा में बचा सकती है। लोग अपने आप को सुरक्षित और जीवन में खुशहाली ला सकते हैं। 

📃BY_vinaykushwaha🙂

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

इतिहास की महान गायिका तीजनबाई

मंच पर रखे दो माइक, छत्तीसगढ़ की पारंपरिक वेशभूषा, एक हाथ में एकतारा और नंगे पैर मंच पर महाभारत के पात्रों को सजीव करती हैं महान तीजनबाई। पंडवानी से लोगों का मन मोह लेने वाली तीजनबाई नहीं... नहीं... डॉ तीजनबाई। छत्तीसगढ़ की लोक नाट्य शैली पंडवानी महाभारत की कथा है। इस कथा को डॉ तीजनबाई मंच जीवित करती हैं, एक बार नहीं कई बार करती है। चाहे दु:शासन वध हो या द्रौपदी चीर हरण सजीव कर देती हैं। तीजनबाई स्वयं कहती हैं कि जब मंच पंडवानी गाती हैं तो लगता महाभारत फिर जिंदा हो गई।

मंच पर पान खाने से हुए लाल दांत लिए जब वे पंडवानी गाती हैं तो आंखें द्रवित और रोम-रोम जाग उठता है। मंच पर योद्धा की तरह अग्रसर बनकर अपनी पुरुष मंडली को दिखाती हैं कि महिला में कितनी ताकत है। बचपन में जब उन्हें पंडवानी गाने के लिए ताने और मां से पिटाई मिलती थी तब ये नहीं पता था कि वे एक दिन वे पहली महिला पंडवानी गायक बनेंगी। पुरुषों के वर्चस्व को तोड़ते हुए आकाश का तारा बनेंगी।

स्वभाव से बेहद विनम्र डॉ तीजनबाई जमीन से जुड़ी हुई कलाकार हैं। वे मंच से कहती हैं कि मैं अंगूठाछाप हूं मुझे ज्यादा अच्छे से हिंदी नहीं आती, कोई भूल हो जाए तो माफ करना। ऐसे कलाकार को महान कहना न्यायोचित होगा। तीजनबाई का एकतारा कभी भीम का गदा बनता है तो कभी वीणा। एक तारे पर लगे मोरपंख भगवान कृष्ण को इंगित करते हैं। डॉ तीजनबाई  कहती हैं कि पंडवानी उनका जीवन है, बिना पंडवानी के तीजनबाई संपूर्ण नहीं है।

छत्तीसगढ़ के दुर्ग के एक छोटे से गांव से भारत के दूसरे सबसे बड़े सम्मान पद्म विभूषण का सफर तीजनगाथा को बताता है। बिना पढ़े लिखे तीजनबाई से डॉ तीजनबाई का सफर आसान नहीं रहा लेकिन प्रतिभा और कला ने सबकुछ आसान बना दिया। मुझे एक बार महान तीजनबाई के पंडवानी गायन को सुनने का मौका मिला। सच बताऊं तो मेरा अनुभव एक शब्द कहता है अद्वितीय। महाभारत को सुनते ही रोगंटे खड़े हो गए।

तीजनबाई ने अपनी पहली प्रस्तुति दुर्ग के ही एक छोटे से गांव में दी थी। इससे पहले ही उन्हें 10 रूपये प्रोत्साहन मिल चुका था जो तीजनबाई को छुपकर गाने से करके मंच तक खींच लाया। शायद ही लोग जानते हों कि श्याम बेनेगल के भारत एक खोज में भी तीजनबाई हिस्सा रहीं। देश से लेकर विदेश तक अपनी प्रतिभा अलख जगाने वाली तीजनबाई का आज जन्मदिन है। मैं उम्मीद करता हूं कि उन्हें भारतरत्न दिया जाए ताकि हुनर और संघर्ष को असली जगह मिल पाए।

मंच पर रखे दो माइक, छत्तीसगढ़ की पारंपरिक वेशभूषा, एक हाथ में एकतारा और नंगे पैर मंच पर महाभारत के पात्रों को सजीव करती हैं महान तीजनबाई। पंडवानी से लोगों का मन मोह लेने वाली तीजनबाई नहीं... नहीं... डॉ तीजनबाई। छत्तीसगढ़ की लोक नाट्य शैली पंडवानी महाभारत की कथा है। इस कथा को डॉ तीजनबाई मंच जीवित करती हैं, एक बार नहीं कई बार करती है। चाहे दु:शासन वध हो या द्रौपदी चीर हरण सजीव कर देती हैं। तीजनबाई स्वयं कहती हैं कि जब मंच पंडवानी गाती हैं तो लगता महाभारत फिर जिंदा हो गई।

मंच पर पान खाने से हुए लाल दांत लिए जब वे पंडवानी गाती हैं तो आंखें द्रवित और रोम-रोम जाग उठता है। मंच पर योद्धा की तरह अग्रसर बनकर अपनी पुरुष मंडली को दिखाती हैं कि महिला में कितनी ताकत है। बचपन में जब उन्हें पंडवानी गाने के लिए ताने और मां से पिटाई मिलती थी तब ये नहीं पता था कि वे एक दिन वे पहली महिला पंडवानी गायक बनेंगी। पुरुषों के वर्चस्व को तोड़ते हुए आकाश का तारा बनेंगी।

स्वभाव से बेहद विनम्र डॉ तीजनबाई जमीन से जुड़ी हुई कलाकार हैं। वे मंच से कहती हैं कि मैं अंगूठाछाप हूं मुझे ज्यादा अच्छे से हिंदी नहीं आती, कोई भूल हो जाए तो माफ करना। ऐसे कलाकार को महान कहना न्यायोचित होगा। तीजनबाई का एकतारा कभी भीम का गदा बनता है तो कभी वीणा। एक तारे पर लगे मोरपंख भगवान कृष्ण को इंगित करते हैं। डॉ तीजनबाई  कहती हैं कि पंडवानी उनका जीवन है, बिना पंडवानी के तीजनबाई संपूर्ण नहीं है।

छत्तीसगढ़ के दुर्ग के एक छोटे से गांव से भारत के दूसरे सबसे बड़े सम्मान पद्म विभूषण का सफर तीजनगाथा को बताता है। बिना पढ़े लिखे तीजनबाई से डॉ तीजनबाई का सफर आसान नहीं रहा लेकिन प्रतिभा और कला ने सबकुछ आसान बना दिया। मुझे एक बार महान तीजनबाई के पंडवानी गायन को सुनने का मौका मिला। सच बताऊं तो मेरा अनुभव एक शब्द कहता है अद्वितीय। महाभारत को सुनते ही रोगंटे खड़े हो गए।

तीजनबाई ने अपनी पहली प्रस्तुति दुर्ग के ही एक छोटे से गांव में दी थी। इससे पहले ही उन्हें 10 रूपये प्रोत्साहन मिल चुका था जो तीजनबाई को छुपकर गाने से करके मंच तक खींच लाया। शायद ही लोग जानते हों कि श्याम बेनेगल के भारत एक खोज में भी तीजनबाई हिस्सा रहीं। देश से लेकर विदेश तक अपनी प्रतिभा अलख जगाने वाली तीजनबाई का आज जन्मदिन है। मैं उम्मीद करता हूं कि उन्हें भारतरत्न दिया जाए ताकि हुनर और संघर्ष को असली जगह मिल पाए।

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

चलते-चलते (सीरीज 14)

ये लॉकडाउन भी बड़ी अजीब चीज है। इस लॉकडाउन ने या यूं कहें कि कोरोना वायरस ने सारी दुनिया को ही लॉक कर दिया। सड़कें, पार्क, मार्केट को खाली करा दिया। उड़ते हुए मशीनी पक्षी को जमीन पर लैंड करा दिया, ट्रेनों की रफ्तार को विराम दे दिया और बसों के पहिए थाम दिए। लॉकडाउन बड़ी चीज है। मैं  भी इस लॉकडाउन का हिस्सा बन गया हूं। इक्कीस दिन के इस लॉकडाउन ने जीवन जीने का और देखने का नजरिया ही बदल दिया। मैं इस तरह भी कह सकता हूं कि बहुत कुछ बदल गया है।
लोग घरों में कैद हो चुके हैं। कैद भी इस तरह की घरों से बाहर निकलना भी डरावना लगता है। सोशल डिस्टेंसिंग ने तो लोगों के बीच और दूरियाँ बढ़ा दी हैं। पहले जहां छोटी दूरियां थीं और बड़ी-बड़ी हो गई हैं। इस लॉकडाउन में जीवन बड़ा-सा लगने लगा है। दोपहर के दिन वीरान और रात बहुत काली लगने लगी है। दिन की दुपहरिया में तपता गांव आज का शहर बन चुका है। सूरज की रोशनी से तपती सड़कें और उस पर चलते इक्का-दुक्का लोग जीवन तलाशते हुए आगे बढ़ते हैं।

इस लॉकडाउन ने कुछ अच्छी चीज भी दी है जिसमें ये नीला आकाश भी शामिल है। आमतौर पर ये नीला आकाश कहां देखने को मिलता है। आकाश को काले धुएं से भरने वाली ये चिमनियों ने भी जहर उगलना अब बंद कर दिया है। अब आसमान में सफेद बादल और उनके बीच उड़ते पक्षी बचपन वाले दौर की याद दिलाते हैं। अब तो पक्षियों की आवाज भी सुनाई देती है क्योंकि गाड़ियों का शोर कम हो गया है। उजाला सब कुछ बयां करता है, सबकुछ। दिन में आज भी शोर होता है लेकिन ये प्रकृति का शोर है। अब तो केवल दिन में पुलिस और एंबुलेंस की चहलकदमी नजर आती है।

रात भले ही भयानक सी लगने लगी हो लेकिन इस रात में अब वो दम वापस आ गया जो शायद छिन गया था। अनंत तक फैला ये आकाश कहता है कि विशालता मेरा ही दूसरा पर्याय है। तारों को अपनी गोद में खिलाता ये आकाश अब ज्यादा सुनहरा लगता  है जो पहले कहीं गुम हो गया था। बचपन वाले तारे, ढेर सारे तारे और चांद की चमक भी कुछ ज्यादा ही है। अब तो मैं नोएडा के आकाश में सप्तर्षि, कालपुरुष, शर्मिष्ठा, ध्रुव तारे को आसानी से देख पा रहा हूं। शुक्र का चमकीला अंदाज भी मैं देख पा रहा हूं। सुबह का उगता सूरज और डूबता सूरज नारंगी की तरह साफ-साफ दिखाई देता है।

इस लॉकडाउन में प्रकृति ने अपना अलग ही रंग बिखेर दिया है। ऐसा लगता है मानो प्रकृति इंसानी चलुंग से आजाद है और आजाद होकर स्वच्छंद होकर श्वास ले रही है। फूलों को अब कोई छेड़ता नहीं, पत्तियों को अब कोई तोड़ता नहीं, टहनियों को कोई अब खींचता नहीं और पेड़ों को अब झकझोरता नहीं। अब धीरे-धीरे लगने लगा है कि प्रकृति का अलग ही जलवा है। घास फिर अपने मनमाफिक बढ़ने लगी है क्योंकि अब उसे विरोध नहीं झेलना पड़ता। अब सूरज की किरणें भी प्रदूषण की चादर से छनकर नहीं आती, सीधे 15 करोड़ किमी की दूरी तय करके नन्हीं पत्तियों तक पहुंचती है।

पक्षियों ने फिर चहकना शुरू कर दिया है। नीले आकाश में ऊंची उड़ान भरना शुरू कर दिया है। अब केवल कबूतर ही नहीं आकाश में चील, कौआ, कोयल, गौरैया जैसे पक्षी दिखाई देते हैं लेकिन पहले की तरह अब भी रात में चमगादड़ दिखाई देते हैं। नीलगाय को मॉल के पास घूमते देखना हो या बारहसिंगा का हरिद्वार की बस्ती में घूमना एक अलग ही अनुभव है। अब सोसायटी के कुत्ते भी भौंक कर पूछते हैं तुम कौन हो बे?

इस लॉकडाउन ने कई लोगों को मुसीबत में डाला है तो कुछ अच्छा काम भी किया है। प्रदूषण का स्तर उस दर्जे का कम हुआ है जो लोग सपने में सोचते थे कि ऐसा यहां कभी हो सकता है। हां, अब मेरी छत से सुपरनोवा टॉवर, सेक्टर 18 और 16 की बिल्डिंग आसानी से दिख जाती है।

ये आसान नहीं है फिर आसान है। 

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2020

चलते-चलते (श्रृंखला 13)

ट्रेन का सफर सबक और लोगों को समझने का मौका होता है। ट्रेनों में लोग पैसेंजर बनकर सफर ही नहीं करते है बल्कि गांव-घर से लेकर देश की राजनीति की बात भी करते हैं। कभी-कभी तो ये बातचीत इतनी भयानक मोड़ ले लेती है कि नौबत बहस से आगे पहुंच जाती है। खासकर वो बातें और रोमांचक होती हैं। दिसंबर की बात थी मैं दिल्ली से कटनी जा रहा था। कई लोग अपने बच्चों की मानसिक क्षमता का प्रदर्शन कर रहे थे। ये समझ लीजिए कि दो गुट बन गए थे एक सवाल पूछता और दूसरा जवाब देता। सवाल और जवाब की प्रतियोगिता में कई सवाल और जवाब बड़े रोमांचित कर देने वाले थे। 

एक गुट ने दूसरे से पूछा कि देश का राष्ट्रपति कौन? सामने से जवाब आया नरेंद्र मोदी। फिर सामने वाले गुट ने सही जवाब बताते हुए कहा रामनाथ कोविंद। फिर सवाल आया देश का प्रधानमंत्री कौन? जवाब आया अमित शाह। सही जवाब देते हुए दूसरे गुट ने कहा अमित शाह नहीं नरेंद्र मोदी। मैंने अपना माथा पीट लिया। जिन लोगों को देश का प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति का नाम मालूम ना हो वे क्या करेंगे? 

मुझे इन सबके बीच वो वीडियो याद आ गया जिसमें दो बच्चियां नरेंद्र मोदी और अमित शाह को अपशब्द कहते हुए दिखाई देती हैं। वो कहती हैं कि दोनों मुसलमानों को भारत में नहीं रहने देना चाहता। फिर इन्हीं दो बच्चियों से आजादी वाले नारे लगवाए जाते हैं। क्या इन्हें पता है कि वे क्या कर रहीं हैं? अपशब्दों से किसका भला हुआ है? आजादी वाले नारे लगाने से क्या होगा? क्या वे जानती हैं कि वे जाने-अनजाने जहर बोने वालों को और सबल दे रही हैं। बच्चियों के मन में इतना जहर किसने घोला? जहर घोलने वाले लोग हमारे बीच में से ही कोई है जो आने वाली पीढ़ी को सच से वाकिफ नहीं करवाना चाहती। 

सड़कों पर उतरे ये लोग बच्चों की आड़ में गलत बात कहकर बचना चाहते हैं। भ्रम फैलाकर लोगों को गुमराह करना चाहते है। सोशल मीडिया से लेकर वास्तविक दुनिया तक वाहवाही लूटना चाहते हैं। बच्चे तो गीली मिट्टी होती है जिसे जो आकार दिया जाए वो पा लेता है। यदि हम बच्चों को सच नहीं बताएंगे और झूठ के सहारे उन्हें बड़ा करेंगे तो उनका जीवन देश के लिए नासूर बन जाएगा। 

रविवार, 26 जनवरी 2020

संविधान का जबलपुर कनेक्शन...


                   (संविधान की प्रस्तावना) 

आजकल देश में संविधान की प्रस्तावना की चर्चा हो रही है। जहां देखों वहां संविधान और प्रस्तावना की बात कहकर नीति और न्याय की चर्चा की जा रही है। केरल में पहली बार दस हजार मस्जिदों में तिरंगा फहराया गया। तिरंगा फहराने के अलावा यहां लोगों ने संविधान की प्रस्तावना को संकल्प की तरह पढ़ा। संविधान की प्रस्तावना को संविधान का निचोड़ भी कहा जाता है। कहा जाता है कि संविधान में कही गईं बातें प्रस्तावना से गुजरकर जाती हैं। 

भारतीय संविधान दुनिया का सबसे बड़ा संविधान है जिसमें दुनिया के कई देशों के संविधान से अच्छी बातों को लिया गया है। संविधान 26 नंवबर 1949 को बनकर तैयार हुआ था और इसे पहली बार 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया था। इसे 26 जनवरी को लागू करने के पीछे कारण ये था कि 26 जनवरी 1930 को कांग्रेस अधिवेशन में रावी नदी के किनारे संविधान लागू करने की बात की गई थी।

संविधान का कनेक्शन मध्यप्रदेश से रहा है। बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर जिन्हें संविधान का निर्माता कहा जाता है वे एमपी के महू में जन्में थे। इस शहर को अब अंबेडकरनगर के नाम से भी जाना जाता है। इसके अलावा एमपी का संविधान से एक और कनेक्शन है, संविधान में की गई चित्रकारी से। संविधान की प्रस्तावना समेत 22 भागों में चित्रकारी की गई है। संविधान के निर्माण के बाद भारत सरकार ने देश के प्रसिद्ध चित्रकार नंदलाल बोस को चित्रकारी करने के लिए आग्रह किया। 

नंदलाल बोस ने सरकार का आग्रह स्वीकार कर लिया और अपने 22 छात्रों को इस काम को सौंप दिया। इन छात्रों में सबसे प्रिय छात्र थे राम मनोहर सिंहा। नंदलाल बोस ने राम मनोहर को देश भ्रमण के लिए भेजा और कहा कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता को परखो और जानो। संविधान में की गई चित्रकारी में संपूर्ण भारत की झलक साफ-साफ देखी जा सकती है। संविधान की प्रस्तावना के चारों ओर जो चित्रकारी की गई उसका श्रेय राम मनोहर सिंहा को जाता है। इनका पूरा नाम व्यौहार राममनोहर सिंहा था। इनके पिता व्यौहार राजेंद्र सिंहा प्रसिद्ध रचनाकार रहे हैं। सिंहा का संबंध एमपी के जबलपुर से रहा है। शांति निकेतन में वे नंदलाल बोस के करीबी रहे हैं। 



                  (व्यौहार राममनोहर सिंहा) 

प्रस्तावना के चारों ओर की गई चित्रकारी कोई आम चित्रकारी नहीं है। एक नजर में ये चित्रकारी सामान्य सी नजर आती है लेकिन ऐसा है नहीं। इसमें भारतीयता के प्रतीक छिपे हुए हैं। प्रस्तावना में की गई चित्रकारी में कुल सात प्रतीकों का इस्तेमाल किया है। इन प्रतीकों में वृषभ (बैल), गज(हाथी), मयूर(मोर), अश्व(घोड़ा), पद्म(कमल), हंस और व्याघ्र (बाघ) हैं। ये केवल प्रतीक ही नहीं भारतीय संविधान की विशेषता बतलाते हैं। 

पृष्ठ के ऊपरी बाएं कोने में वृषभ है। वृषभ यानी धैर्यवान और साधुवत, ऊपरी दाएं कोने पर गज है जो की संविधान को उच्च बौद्धिक स्तर का बताता है। नीचे के हिस्से के दाएं कोने में बाघ का होना प्रतीक है कि हमारा संविधान निर्भीक और संप्रभुता संपन्न होगा। बायें कोने पर अश्व होना दर्शाता है कि संविधान गति और शक्ति से परिपूर्ण है। मोर सुचिता का प्रतीक है। हंस नैतिकता का प्रतीक है। पद्म प्रतीक है नव सृजन का। इस प्रकार से व्यौहार राम मनोहर सिंहा ने सिर्फ अलंकरण का कार्य नहीं किया बल्कि लोगों के बीच भारत की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक धरोहरों को खूबसूरती से प्रस्तुत किया।

व्यौहार राममनोहर सिंहा अपने सौम्य व्यवहार के लिए जाने जाते थे। जिन लोगों ने संविधान निर्माण योगदान उनके हस्ताक्षर संविधान में मौजूद है। जब व्यौहार राममनोहर सिंहा से हस्ताक्षर करने के लिए कहा गया तो उन्होंने सरकार साफ-साफ इनकार कर दिया। जब नंदलाल बोस ने सिंहा पर जोर दिया तो उन्होंने छोटे से हस्ताक्षर करते हुए राम लिख दिया। ऐसे थे व्यौहार राममनोहर सिंहा और ये था संविधान से एमपी का कनेक्शन। 

📃BY_vinaykushwaha