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शनिवार, 9 जून 2018

भारतीय वास्तुकला (श्रृंखला-चार)


भारतीय वास्तुकला में विदेशियों का भी योगदान है यहां बहुत सी ऐसी स्थापत्य कला हमें देखने के मिलती है जिसे मुस्लिम स्थापत्य कला के रूप में जानते है। जब मुस्लिम स्थापत्य कला का भारत में प्रवेश हुआ तो यह हिंदु-मुस्लिम स्थापत्य कला या इंडो-इस्लामिक स्थापत्य कला हो गई। मुस्लिम धर्म में मूर्ति पूजा वर्जित है जिसके कारण मुस्लिम शासकों के द्वारा तैयार किए गए स्मारकों, मस्जिदों,मकबरों,भवनों या किसी भी संरचना में मूर्ति देखने को नहीं मिलती है। मूर्तियों की जगह फूल-पत्ती, मेहराब, गुंबद, मीनार, बुर्ज, जाली आदि ने लियी। इनके उपयोग से भारत में नए-नए स्थापत्य कला का विकास हुआ।

मुस्लिम शासकों ने अपने शासन में सर्वाधिक जोर मस्जिद बनाने में दिया। मस्जिगों में मीनार, गुंबद, मेहराब पर दिया गया। जहां मंदिरों में शिखर हुआ करते थे वही मस्जिदों में उनकी जगह गुंबद ने ली। भारत का सबसे बड़ा गुंबद कर्नाटक के बीजापुर में स्थित है। यह अपने आप में कारीगरी का बेमिसाल उदाहरण है। यह बीजापुर के शासक ने बनवाया था। यह बलुआ पत्थर से तैयार किया गया है। गुंबद बनाने गोलाकार या यूं कहे कि उल्टा कटोरा होता है। उत्तर भारत और दक्षिण भारत दोनों में सामग्री के इस्तेमाल में विभिन्न पाई गई है। मुगलों समय जहां उत्तर भारत में लाल पत्थर का उपयोग किया वही दक्षिण भारत में ग्रेनाइट और बलुआ पत्थर का उपयोग किया गया।

मीनार, मुस्लिम स्थापत्य कला का अभिन्न हिस्सा हैजिसे सामान्यतया हर मस्जिद देखा जा सकता है। मस्जिद में अजान के लिए इन मीनारों का उपयोग किया जाता था। भारत की सबसे ऊंची मीनार कुतुब मीनार है जो विश्व विरासत स्थल में शामिल है। इसका निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक ने करवाया था जिसे पूरा कराने का श्रेय इल्तुतमिश हो जाता है। इन मीनार का निर्माण भी स्थान विशेष पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर किया जा जाता था। कही लाल पत्थर,तो कही बलुआ पत्थर तो कही बेसाल्ट का उपयोग किया जाता था। मीनारों को कलात्मक बनाया जाता था जिसमें नक्काशी की जाती थी।


मीनार के शिखर पर जाने के लिए सीढ़ियां बनाई जाती थी। कई बार यह सीढ़ियों अंदर से होती थी और कई बार बाहर से। जैसे कुतुब मीनार में सीढ़ियां मीनार के अंदर से बनाई गई जबकि जूनागढ़ के बहाउद्दीन के मकबरे में मीनार के बाहर से बनाई गई है। इन मीनारों की कलात्मकता देखते ही बनती है। मीनारों को इस प्रकार भी बनाया जाता था कि यह मुख्य संरचना को कोई नुकसान न पहुंचाए। यदि कभी भूकंप वगैरह आए तो मीनार बाहर की ओर या मुख्य संरचना से विपरीत गिरें। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ताजमहल है जिसमें मीनारों को इस प्रकार बनाया है कि मीनारें बाहर की ओर गिरे।

किसी भी संरचना को सुंदर बनाने के लिए बड़ी-बड़ी मीनारों के अलावा छोटी-छोटी मीनारों का उपयोग किया जाता था। ताजमहल में इस प्रकार की संरचना देखने को मिलती है।

मुगलकाल और बाद दरवाजें बनवाने का प्रचलन चला। अकबर ने गुजरात विजय पर भारत का सबसे ऊंचा दरवाजें का निर्माण करवाया। जिसका नाम फतेहपुर सीकरी का बुलंद दरवाजा है। इसका निर्माण लाल पत्थर से किया गया है। इसके अलावा लखनऊ, जयपुर, मांडू, भोपाल, अहमदाबाद  आदि जगह दरवाजा परम्परा देखने को मिलती है। दरवाजों को सुंदर और कलात्मक के साथ-साथ भव्य बनाया जाता था। इसका कारण यह था कि जो पड़ोसी राज्य है उसके राज्य की वैभव-विलासता को पहचान सके। दरवाजों का वर्णन हमें प्राचीन समय से सुनने को मिलता है लेकिन यहां बात इस्लामिक संरचना पर बने दरवाजों की हो रही है।


इस्लामिक स्थापत्य कला में एक विशेष प्रकार की सामग्री का उपयोग किया गया। वह सामग्री है संगमरमर। इसकी सबसे बड़ी मिसाल ताजमहल है। ताजमहल, संगमरमर से बनी पहली इमारत नहीं है बल्कि आगरा में ही बनी ऐतमाद्दौला का मकबरा है। पूर्ण रूप से संगमरमर से बनी यह पहली इमारत थी। इन दोनों इमारत को बनाने में मकराना के संगमरमर का उपयोग किया गया है। मुगलों के काल में राजस्थान से संगमरमर के साथ-साथ लाल पत्थर का भी निर्यात किया जाता था।

भारत में विदेश से कई प्रकार की कला का आगमन हुआ जिसमें पेट्राडोरा या पित्रादुरा कहते है। पेट्राडोरा एक कला है जिसका आगमन ईरान से हुआ है। यह कला संगमरमर के पत्थर पर विभिन्न प्रकार को रत्नों को खोदकर सजाया जाता है। विभिन्न प्रकार के आकार और आकृति के पत्थर पर अलग-अलग सजावट के साथ बनाया जाता है। इसमें पेड़- पौधे, फूल, पत्ती, विभिन्न प्रकार की आकृतियों को उकेरकर उसमें विभिन्न रंगों जैसे लाल, पीला, हरा, नीला, गुलाबी, फिरोजी आदि रंगों का उपयोग किया जाता है।


इस्लामिक स्थापत्य कला में एक और कला सामने आती है। जाली, इस्लामिक स्थापत्य कला में एक अहम स्थान रखती है। चाहे मकबरा हो या मस्जिद हो या दरगाह हो या किला हो या महल हो या छतरी हो मुगलकाल से जाली का महत्व बढ़ गया। अहमदाबाद में   निर्मित जामा मस्जिद या जुम्मा मस्जिद में हिन्दु स्थापत्य कला या भारतीय स्थापत्य कला या मंदिर स्थापत्य कला  की छाप आसानी से देखने को मिलती है। यहां आसानी कई ऐसी आकृतियां देखने को मिलता  है भारतीय संस्कृति और संस्कार को दर्शाती हैं। इसके अलावा हैदराबाद की चार मीनार भी शानदार नमूना है। यह एक दरवाजे की तरह है जिसमें चार मीनार है। मध्यप्रदेश के मांडू में बने अनेक महल इस्लामिक स्थापत्य कला को दर्शाते हैं। इन महलों या संरचना में जहाज की आकृति के तरह बना जहाज महल, गुजरी महल, होशंगशाह का मकबरा, अशर्फी महल  आदि सभी एक प्रतीक है।

दिल्ली और आगरा का लाल किला, हुमाऊं का मकबरा, सिकंदरा मकबरा, हौज खास, कशमीरी गेट, फतेहपुर सीकरी, भोपाल की ताज-उल-मस्जिद, हैदराबाद की मोती मस्जिद, गोलकुंडा का किला, बीजापुर का गोल गुबंद आदि इस्लामिक स्थापत्य कला के नमूने हैं। इस्लामिक स्थापत्य कला में आगरा स्थित ताजमहल को बेमिसाल प्रतीक माना जाता है। लखनऊ का बड़ा इमामबाड़ा, छोटा इमामबाड़ा, बुरहानपुर की ऐतिहासिक इमारत इसी स्थापत्य कला का नमूना। बुरहानपुर में स्थित कुंडी भंडारा जल व्यवस्था का अद्वितीय उदाहरण है। वही कुछ बदसूरत इमारत भी भारत में देखने को मिलता है। ऑरंगजेब द्वारा बनवाया गया बीबी मकबरा ताजमहल की फूहड नकल मात्र है।


भारत में इस्लामिक स्थापत्य कला में इमारत ही नहीं बल्कि एक और संरचना दिखाई देती है। यह संरचना "चार बाग" है। चार बाग एक प्रकार से गार्डन ही है। यह संरचना मुगलकाल से सामने आया या शुरु हुआ। इसमें एक गार्डन बनाया जाता है जिसे समकोण पर काटती दो सड़क द्वारा गार्डन को चार भाग में विभक्त कर दिया जाता है। चार बाग के साथ एक संरचना और जुड़ी हुई है जिसका नाम फव्वारा है। फव्वारा के कारण इमारत की सुंदरता बढ़ जाती है।

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शुक्रवार, 8 जून 2018

पुस्तक समीक्षा: हम असहिष्णु लोग


आप तो मां सरस्वती के पुत्र हो तर्क के आधार पर सरकार को कठघरे में खड़े कीजिए। वरना समाज तो यही कहेगा कि आप साहित्य को राजनीति में घसीट रहे हैं। इन्हीं तथ्यपरक बातों के साथ देश में फैली अराजकता पर कटाक्ष करती एक पुस्तक 'हम असहिष्णु लोग'। अर्चना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक लोकेन्द्र सिंह ने लिखी है। इस पुस्तक में देश में हो रहे कथित आंदोलनों और मुहिमों पर कड़ा तमाचा जड़ा है। लेखक ने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित अपने लेखों के संग्रह को एक पुस्तक की शक्ल दी है।

पुस्तक के शीर्षक को देखें तो एक बार ऐसा लगता है कि यह किसी अराजकता की बात कह रहा है लेकिन ऐसा नहीं है। इस पुस्तक का शीर्षक 'हम असहिष्णु लोग' रखने के पीछे लेखक का देश में हो रही गतिविधियों से हैं जिसमें कुछ लोग स्वयं अराजकता फैला रहे है और समाज व देश की भोली-भाली जनता को बरगलाने की कोशिश कर रहे हैं साथ ही अव्यवस्था का ठीकरा किसी और फोड़ रहे हैं। यह पुस्तक उन अनैतिक गतिविधियों की गवाह है जिन्हें देश में बड़े जोर-शोर से चलाया जाता रहा। अवॉर्ड वापसी, यह एक ऐसा अभियान था जिसमें लेखक, साहित्यकार आदि में अपने अवॉर्ड वापस करने की होड़ मची थी। इस मुहिम को लेखक ने अवॉर्ड वापसी गैंग का नाम दिया है। सच ही है कि यह एक गैंग है जिसने असहिष्णुता के नाम पर अवॉर्ड वापसी की मुहिम चलाकर लोगों को बरगलाया गया। चाहे नयनतारा सहगल हो या अशोक बाजपेयी हो ने अपने अवॉर्ड वापस किए और तर्क भी ऐसे दिए कि जिनका मेल दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। एक साहित्यकार ने तो तर्क दिया कि सिक्ख दंगों के वजह से मैं अपना अवॉर्ड वापस कर रहा हूं। इसी मुहिम के खिलाफ लेखक ने जमकर लताड़ लगाई है।

इस पुस्तक में अवॉर्ड वापसी के अलावा असहिष्णुता के मुद्दे पर देश भर में फैलाई जा रही भ्रांतियों के बारे में लिखा है कि कैसे एक अभिनेता अपनी असुरक्षा के बारे में बात करता है और उनकी पत्नी कहती है कि यदि ऐसा ही माहौल रहा तो हमें देश छोड़ना होगा। देश में अव्यवस्था फैलाने  वाले ऐसे लोगों पर तर्क सहित अपनी बातें रखी हैं। चाहे मामला गोमांस भक्षण का हो या किसी वर्ग विशेष को प्रोत्साहन देने की इन विषयों पर लेखक ने अपनी बात को बेबाकी से रखा है। सारे आम गोमांस खाकर हिन्दु धर्म के लोगों को चिढ़ाया जा रहा है और इसे बीफ पार्टी का नाम दिया जा रहा है। केरल जैसे राज्य जहां साक्षतरता दर सर्वाधिक है वहां सार्वजनिक स्थलों पर बीफ पार्टी का आयोजन किया जा रहा है। इसी विषय को किताब में जगह दी गई है और तर्कों के साथ बताया है कि किस प्रकार कुछ मुट्ठी भर लोग समाज में अव्यवस्था और साम्प्रदायिकता  फैलाने का कार्य कर रहे हैं।

इन सबके अलावा पुस्तक में देश विरोधी अभियान और देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में हुई देश विरोधी गतिविधियों को भी शामिल किया गया है। जहां जेएनयू जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारे सुनाई दिए वही देश के अन्य विश्वविद्यालयों में देश और समाज को बांटने वाली गतिविधियों के तार्किक विश्लेषण को लेखक ने अपनी किताब में जगह दी है। यहां तक की विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय आस्था की केन्द्र भारतमाता और हिन्दु धर्म की बेइज्जती के मामले में भी लेखक ने बड़ी सटीकता के साथ लिखा है। अफजल गुरु और याकूब मेनन को महिमामंडित करके उनके पक्ष में नारे लगाकर देश की न्यायव्यवस्था को धता बताया गया, जिस पर लेखक ने अपनी पुस्तक में कटाक्ष किया है।

रास्ते के नाम बदलने की बात हो या  पूर्व उपराष्ट्रपति  हामिद अंसारी की कर्त्तव्यपरायणता की बात हो सभी मुद्दों को लेखक ने जगह दी। कुछ वर्ग विशेष के द्वारा केन्द्र सरकार के उस फैसले पर रोष जताया जिसमें ऑरंगजेब रोड का नाम बदलकर कलाम रोड किया गया। लेखक ने इसका तथ्यपरक विश्लेषण करके अपनी किताब में लिखा कि कैसे कुछ लोग अभी भी उस व्यक्ति को याद करना चाहते है जिसने देश को लूटा, अत्याचार किया, मानवता को तार-तार किया। इसके अलावा पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के उन गतिविधियों पर करारा प्रहार किया जिसमें उनके द्वारा सेना को सलामी न देना, राष्ट्रीय ध्वज को सलामी न देना और हिन्दु-मुस्लिम राजनीति की बात करना जैसे मुद्दे शामिल है।

हम असहिष्णु लोग पुस्तक देश में हो रही देश विरोधी गतिविधियों का एक प्रमाण है जिसमें उन अराजक ताकतों के बारे में लिखा है जो देश को बांटने का काम कर रही है। इस पुस्तक में  सभी मुद्दों को  तथ्यों और तार्किक के साथ बड़ी सटीकता से लिखा गया है। एक बार जरूर पढ़े 'हम असहिष्णु लोग'।

📃BY_vinaykushwaha




बुधवार, 16 मई 2018

कर्नाटक चुनाव विश्लेषण


भारत में ऐसा बहुत कम होता है कि ओपिनियन पोल, एक्जिट पोल और चुनाव का नतीजा बिल्कुल एक जैसा हो। इस बार कर्नाटक के परिप्रेक्ष्य में यह सही साबित हुआ। सभी नतीजों में बीजेपी को सबसे बड़ी पार्टी के रूप में दिखाया जा रहा था वही कांग्रेस को दूसरे नंबर पर और जेडीएस को तीसरे नंबर पर दिखाया जा रहा था। लेकिन इन सब के बीच किसी पार्टी को बहुमत नहीं दिया जा रहा था जो अन्त्वोगत्वा सही निकला। इस चुनाव भले ही बीजेपी को सबसे बड़ी पार्टी के रूप में दिखाया जा रहा हो लेकिन वह इस हालत में नहीं है कि वह कर्नाटक में सरकार बना सके। बीजेपी ने इस चुनाव 104 सीटों विजय हासिल की। वही कांग्रेस ने 77, जेडीएस ने 37 और अन्य को 3 सीटें मिली।

एक चौंका देने वाली बात यह है कि बहुजन समाज पार्टी को भी एक सीट मिली। दक्षिण भारत के राज्य बीएसपी का चुनाव जीतना चौंका सकता है लेकिन यह पहला मौका नहीं है जब बहुजन समाज पार्टी कर्नाटक में चुनाव लड़ रही है। 2013 में भी बीएसपी ने चुनाव लड़ा था और लगभग 1.5 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किए थे।  इस बार सबसे बड़ी बात यह है कि बीएसपी का वोट शेयर घटा हैं जो 0.3 प्रतिशत तक जा पहुंचा हैं। इसके बावजूद बीएसपी को एक सीट पर कब्जा करने में कामयाबी मिली है।

इस चुनाव में बीएसपी और मायावती की चर्चा हो रही है। पहला कारण तो बीएसपी का एक सीट पर कब्जा करना और दूसरा कारण मायावती की पार्टी बीएसपी का पूर्व प्रधानमंत्री एच डी दैवेगौडा की जेडीएस की पार्टी का गठबंधन। यह गठबंधन चुनाव पूर्व किया गया था। मायावती का जेडीएस की चुनावी रैली में दिखना आम बात थी। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण मायावती का दैवेगौडा का फोन करके कांग्रेस के साथ कर्नाटक में  सरकार बनाने की बात कहना। क्या यह कहा जा सकता है कि मायावती के कहने पर दैवेगौडा, कांग्रेस के साथ कर्नाटक में सरकार बनाने के लिए राजी हुए हैं।

कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला के सामने सरकार बनाने का प्रस्ताव रखा है। कांग्रेस ने एच डी दैवेगौडा के सुपुत्र कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार किया है। कांग्रेस और जेडीएस (77+37=114) के जादूई आंकडें को छू लिया है। इन सबके अलावा यह सवाल करना सही रहेगा कि क्या यह सरकार कितने दिनों तक काबिज रहेगी? अभी बगावती सुर बुलंद हो गए हैं। वोक्कालिंगा, लिंगायत और कुरबा अलग-अलग जातियों से आने वाले विधायकों ने अपनी-अपनी को विरोध के रूप में कहने का प्रयास किया है। जेडीएस के कुछ विधायक सिद्धारमैया को स्वीकार नहीं करना चाहते क्योंकि वे कुरबा जाति से आते है।

एक और बात सामने आती है कि क्या दैवेगौडा सिद्धारमैया को सरकार में स्वीकार करेंगे? यह वही सिद्धारमैया है जिन्होंने बगावत करते हुए जनता दल (एस) को तोड़ने की कोशिश की थी। सबसे बड़ी बात तो यह है कि क्या दैवेगौडा, सिद्धारमैया को अपने से ऊपर देखना चाहेंगे क्योंकि सिद्धारमैया कभी दैवेगौडा के शिष्य रह चुके हैं। उन्हीं के सानिध्य में सिद्धारमैया ने राजनीतिक गुर सीखें हैं। कर्नाटक की सरकार में मुख्यमंत्री के रूप में रहते हुए सिद्धारमैया पर कई आरोप लगे जिनमें मंहगी वस्तुओं का उपयोग करना, भ्रष्टाचार और सबसे बड़ा आरोप है कि लिंगायत समाज को एक अलग धर्म के रूप में मान्यता देना। सिद्धारमैया को इसका खामियाजा सरकार की बलि देकर चुकाना पड़ा।

इस चुनाव सर्वाधिक वोट प्रतिशत कांग्रेस का 37.9 प्रतिशत रहा जबकि सर्वाधिक सीट लाने बीजेपी का वोट प्रतिशत 36 प्रतिशत रहा। सीटों की बात कही जाए तो बीजेपी ने तटीय कर्नाटक में शानदार प्रदर्शन किया में 21 में से 18 जीतकर कांग्रेस को तीन सीटों पर समेट दिया। बीजेपी उन जगह सबसे अच्छा प्रदर्शन किया जहां लिंगायत समुदाय जनसंख्या ज्यादा है। यह कांग्रेस की नाकामयाबी का नतीजा है जिसका फायदा बीजेपी ने उठाया है। बंगलुरू रीजन में भी बीजेपी का प्रदर्शन अच्छा रहा।

किसी पार्टी को बहुमत न मिलने से नतीजा त्रिशंकु आया।  देखना होगा कि कौन सरकार बनाने की रेस में पहले नंबर पर होगा। कही कांग्रेस का हाल मणिपुर और गोवा की तरह न हो जाए या ऐसा भी कह सकते है कि बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद भी सरकार न बना सके। कांग्रेस ने बीजेपी से सबक लेते हुए जल्दी से एक्शन लिया है। अपने दो कद्दावर नेता गुलाम नबी आजाद और अशोक गहलोत को बंगलुरू भेजकर सरकार बनाने की बात कही। वही सिद्धारमैया राज्यपाल से मिलने में देरी नहीं की। इसके साथ ही कुमारस्वामी ने भी राज्यपाल से मुलाकात की।

कांग्रेस ने बीजेपी से एक ज्ञान नहीं लिया कि कैसे सोशल इंजीनियरिंग की जाती है? गुजरात चुनाव की तरह कर्नाटक में कांग्रेस ने जनता से संपर्क साधना में देर कर दिया जिसका नतीजा उसे भुगतना पड़ा। संघ की बदौलत  आज बीजेपी इतनी उझल रही है यदि संघ का स्वयंसेवक जमीन पर न उतरता तो स्थिति कुछ और होती।

सरकार जिसकी भी बने स्थिर रहे। भ्रष्टाचार मुक्त रहे। कावेरी और महादयी जैसे मुद्दे सुलझाने में कामयाब रहे। भाषा को लेकर विरोध की राजनीति न हो।

📃BY_vinaykushwaha


शनिवार, 12 मई 2018

गुरुकुल


गुरुकुल, भारतीय शिक्षा पद्धति का प्रतीक है। गुरुकुल सतयुग से लेकर  कलियुग तक विद्यमान है। गुरुकुल अर्थात् गुरु का कुल अर्थात् गुरु का कुटुम्ब या गुरु का परिवार । जब बच्चा अपने अभिभावक का घर छोड़कर गुरु के घर रहने  और  शिक्षा ग्रहण करने  चला जाता है । जहां  वह बच्चा  जाता है , उसे गुरुकुल कहा जाता है।

गुरुकुल की परपंरा युगों पुरानी है। त्रेतायुग में श्रीराम, द्वापरयुग में श्रीकृष्ण ने गुरुकुल में रहकर शिक्षा ग्रहण की थी। गुरुकुल एक ऐसा वातावरण तैयार करता है जिसमें बच्चा खेलता भी है और सीखता भी है। जीवन की छोटी-छोटी बातों को सीखता भी है। गुरुकुल में बच्चा एक नए अभिभावक को पाता है। माता-पिता के छोड़कर गुरुकुल जाने वाले बच्चों में सदा इस बात की ललक रहती है कि कैसे मस्ती के बहाने ढूंढे जाए लेकिन गुरुकुल का दूसरा नाम ही अनुशासन है।

गुरुकुल को जीवन जीने की कला कहा जाए तो सच्चे अर्थों में सही होगा। गुरुकुल कोई विद्यालय नहीं होता है बल्कि यह तो अपने जीवन को कैसे आयामित करना है यह सिखाने की पाठशाला है। यहां कोई किताबी ज्ञान नहीं दिया जाता है क्योंकि यहां किताबें मायने नहीं रखती बल्कि उनका सार ही महत्वपूर्ण होता है। वेद, उपनिषद्, जैसे महान कृतियों से अवगत कराया जाता है ताकि बच्चे भारतीय ज्ञान परपंरा से अवगत रहे हैं। वो ज्ञान परपंरा जिसे हमारे ऋषि-मुनियों ने कई वर्षों की तपस्या से संजोकर रखा है।

गुरुकुल में शिक्षा का मतलब वेद और उपनिषद् ही बल्कि उन्हें गणित, ज्योतिष, भूगोल, भाषाविज्ञान जैसे विषयों का ज्ञान कराना है। गुरुकुल में मूल रूप से शिक्षा पद्धति को दो भागों में बांटा गया है पहला शास्त्र ज्ञान और दूसरा शस्त्र ज्ञान। गुरुकुलों ने समय के अनुसार अपने आप को ढ़ालना सीख लिया है। पहले जहां केवल सीमित विषयों का ज्ञान दिया जाता था वही आज अंग्रेजी, विज्ञान, गणित ज्योतिष जैसे विषयों का अध्ययन-अध्यापन का कार्य किया जाता है। आजकल के लोगों के मन भ्रांति है कि गुरुकुल में केवल संस्कृत नीत विषयों को पढ़ाया जाता है और बच्चों को वेदपाठी बना दिया जाता है।

मेरा यह निजी अनुभव रहा है कि गुरुकुल में संस्कृत ही नहीं अंग्रेजी, हिन्दी, स्थानीय भाषाओं के अलावा विदेशी भाषाओं को भी सिखाया जाता है। इन गुरुकुलों में बच्चों को उच्च श्रेणी का ज्ञान दिया जाता है जहां अनुशासन में रहना सिखाया जाता है। नैतिक शिक्षा जैसे विषय पर ध्यान दिया जाता है जिससे बच्चे पारिवारिक मूल्यों को समझ सके और व्यक्ति व्यवहार कैसे करना है? इसका ज्ञान भी हो जाए। इन सभी के अलावा भारतीय गणित जिसे हम वैदिक गणित का ज्ञान भी दिया जाता है। वैदिक गणित कोई साधारण विषय नहीं बल्कि यह तो गणित को साधारण करने वाला विषय है।

मन को स्थिर रखने के लिए योग, प्राणायाम, व्यायाम , ध्यान आदि का सहारा लिया जाता है। यदि मन स्थिर नहीं रहेगा तो फिर कैसे इंसान बाकी कार्यों पर ध्यान लगा सकता है। गुरुकुल परंपरा में शस्त्र विद्या भी सिखाई जाती है। पहले जब राजा के पुत्र गुरुकुलों में पढ़ने जाया करते थे तो उन्हें केवल शास्त्र का ज्ञान नहीं दिया जाता है बल्कि उन्हें शस्त्र का ज्ञान भी दिया जाता था। इस शस्त्र ज्ञान में उन्हें धनुष-बाण चलाना, भाला-बरछा चलाना, तलवार चलाना जैसे शस्त्रों से अवगत कराया जाता था। शारीरिक शिक्षा भी दी जाती थी। जिसमें सूर्य नमस्कार, शरीर सौष्ठव, कुश्ती की शिक्षा दी जाती थी। प्राचीन काल के गुरुकुलों में मल्लयुद्ध की कला सिखाई जाती है।

आधुनिक गुरुकुलों में शस्त्र विद्या की जगह शारीरिक शिक्षा ने ले ली है लेकिन किसी-किसी गुरुकुलों में आजकल शस्त्र विद्या का ज्ञान दिया जाता है। लाठी चलाना, तलवार चलाना, भाला चलाना आदि शस्त्र विद्या दी जाती है। इन शस्त्रों के अलावा कुश्ती, मार्शल आर्ट, भारतीय खेलों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके अलावा भारत की प्राचीन मार्शल आर्ट जैसे केरल के कलियारीपयाट्टू को कही हद बचाने का श्रेय गुरुकुल को ही जाता है। गुरुकुल केवल एक विद्यालय ही नहीं है बल्कि यह जीवन निर्माण करने वाली संस्था है। गुरुकुल में भगवान श्रीकृष्ण ने 64 विद्या और 16 कलाओं की शिक्षा मात्र 64 दिनों में पूरा कर लिया था।

प्राचीन काल के गुरुकुलों में शिक्षक दो प्रकार के होते थे, पहले जो शास्त्र का ज्ञान देते थे और दूसरे जो शस्त्र का ज्ञान देते थे। आज के गुरुकुल आधुनिक हो गए हैं। आज प्रत्येक विषय के लिए अलग से शिक्षकों को अध्यापन कार्य के लिए रखा जाता है। आज का युग  तकनीकी का युग है। इसी तकनीकी युग में गुरुकुल भी तकनीकी हो गए हैं। गुरुकुलों में आज कम्प्यूटर ज्ञान दिया जाता है। इसी कारण गुरुकुल जीवित है क्योंकि गुरुकुलों ने समय के साथ बदलना सीख लिया है। भारत में ऐसे कई गुरुकुल है जो भारतीय ज्ञान परपंरा को आगे बढ़ाने में तत्पर हैं जिनमें हेमाचंद्राचार्य संस्कृत पाठशाला, ऋषि सांदीपनि वेद प्रतिष्ठा संस्थान, मैत्रेयी गुरुकुल, वीर लोंकाशाह संस्कृत ज्ञानपीठ जोधपुर आदि है।

भारत में आज भी ज्ञान परपंरा गुरुकुलों की वजह से बची हुई है क्योंकि यह हमारी शान हैं।

📃BY_vinaykushwaha


शुक्रवार, 11 मई 2018

भारतीय वास्तुकला (श्रृंखला-पांच)

विराट गुरुकुल सम्मेलन

भारत का पहला विराट गुरुकुल सम्मेलन मध्यप्रदेश की आध्यात्मिक नगरी उज्जैन में 28-30अप्रैल को आयोजित किया गया। असलियत में इस आयोजन का पूरा नाम अंतरराष्ट्रीय गुरुकुल सम्मेलन था। इसका आयोजन भारतीय शिक्षण मंडल और मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग के सहयोग से संपन्न हुआ। आखिर उज्जैन में ही क्यों इसका आयोजन किया गया? इसके पीछे सबसे बड़ा कारण रहा है, ऋषि सांदीपनि का आश्रम। यह वही ऋषि है जिन्होंने भगवान श्रीकृष्ण और बलराम को शिक्षा-दीक्षा दी थी।

यह विराट गुरुकुल सम्मेलन में भारत समेत विश्व के सात देशों के गुरुकुल या उनके प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इनमें  नेपाल, भूटान, म्यानमार, थाईलैंड, जापान, इंडोनेशिया और कतर जैसे देश थे। भारत की इस धरा पर इस प्रकार का यह प्रथम आयोजन था।

इस आयोजन को करने के पीछे उद्देश्य क्या था? गुरुकुल परंपरा को बचाना या परपंरा को समृद्धि बनाना। इस परपंरा को भारत की पहचान कही जाए तो अतिश्योक्ति न होगी। जहां शिक्षा पद्धति बिना किसी लोभ के दी जाती है और बच्चों के सर्वांगीण विकास की बात की जाती है तो इस परपंरा को बचाना हमारा कर्त्तव्य बनता है। इस सम्मेलन में भारत के हर कोने से गुरुकुल में सम्मिलित होने के लिए लोगों का आगमन हुआ। लगभग 3000 प्रतिनिधियों ने इस आयोजन में हिस्सा लिया।

इस आयोजन का मूल गुरुकुल शिक्षा पद्धति को बढ़ावा देना और आधुनिक शिक्षा पद्धति को कैसे गुरुकुल शिक्षा पद्धति के माध्यम से सरल बनाया जा सकता है? इस पर देश के कोने-कोने से प्रबुद्ध और विद्वतजनों ने चर्चा की। गुरुकुल केवल वेदपाठ या संस्कृत का अध्ययन नहीं कराता बल्कि यह तो बौद्धिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, तकनीकी, तार्किक और शारीरिक शिक्षा देता है। लोगों के मन में भ्रम रहता है कि गुरुकुलों में केवल संस्कृत और वेद -उपनिषद् जैसे विषयों का ही ज्ञान दिया जाता है। इसी भावना को तोड़ने के लिए और लोगों को गुरुकुल से जोड़ने के लिए इस प्रकार का भव्य आयोजन किया गया।

गुरुकुल सम्मेलन भारत और विदेशी गुरुकुलों का आपसी मिलन भी था। इस सम्मेलन के माध्यम से एक गुरुकुल ने दूसरे गुरुकुल को जानने की कोशिश की। यही नहीं उनकी शिक्षा पद्धति को आवश्यक रुप से समृद्ध करने की कोशिश की। आज विश्वभर में गुरुकुल परपंरा को अपनाने की बात चल रही है। इसका एक ही कारण है प्राचीन भारतीय ज्ञान परपंरा के साथ-साथ आधुनिक विषयों का अध्ययन-अध्यापन करना।

सम्मेलन में विभिन्न वक्ताओं के द्वारा भारतीय ज्ञान परपंरा और शिक्षा पद्धति को जानने का मौका मिला। कार्यशालाओं का आयोजन किया गया जिसमें भारतीय ज्ञान परपंरा जिसमें आयुर्वेद, ज्योतिष, वैदिक गणित, गणित पर गहन चर्चा हुई। इसके साथ ही भारतीय और विदेशों से आए प्रतिनिधियों के साथ संवाद चर्चा का भी आयोजन किया गया। पाकशाला, गौशाला जैसी कार्यशाला का आयोजन किया गया, जिसमें माता-पिता, गुरु और बच्चों की बीच भावनात्मक जुड़ाव पर गंभीरता से चर्चा की गई।

कार्यशाला के आयोजन के अलावा सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया गया। इसमें बौद्धिक, शारीरिक और नृत्य आदि का मंचन किया गया। मंच से कत्थक, भरतनाट्यम, कालबेलिया जैसे नृत्यों की प्रस्तुति हुई तो वही भारतीय मार्शल आर्ट कलियारीपयाट्टू, मलखंभ, रोपमलखंभ का आयोजन किया गया। वही मंच से वैदिक गणित जैसे साश्वत विषय पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

प्रदर्शनी का आयोजन भी किया गया जिसमें केवल वस्तुओं की प्रदर्शनी ही नहीं बल्कि स्वदेशी को प्रोत्साहित करती हुई प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। इसमें कॉटन के कपड़ा से लेकर लकड़े के सामान तक इस प्रकार के स्टॉल को लगाकर इस प्रदर्शनी को चार-चांद लगाए गए। पुराने सिक्कों का संग्रहण हो या भारतीयता को दर्शाता पुस्तकों हो सभी प्रदर्शनी जान नजर आ रही थी।

इस आयोजन की सबसे बड़ी बात श्रोत यज्ञ का आयोजन था। यह यज्ञ विश्व के कल्याण के लिए आयोजित किया गया था। इस यज्ञ का उद्देश्य और पूर्णाहूति "सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया" की भावना से किया गया था।

मंगलवार, 17 अप्रैल 2018

विश्व धरोहर दिवस


विश्व धरोहर दिवस जिसे इंग्लिश भाषा में world heritage day के नाम से जाना जाता है। यह प्रतिवर्ष 18 अप्रैल को मनाया जाता है। 1982 से प्रतिवर्ष यह मनाया जा रहा है। इस दिन को विश्व विरासत स्थल के लिए समर्पित किया गया है। यह दिवस केवल विश्व धरोहर को सहेजने के लिए ही नहीं बल्कि इसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए भी है। विश्व में कुल 1052 विश्व विरासत स्थल है। इन धरोहरों में से भारत में कुल 35 विश्व धरोहर है।  विश्व धरोहर स्थल की घोषणा यूनेस्को के द्वारा किया जाता है जो कि संयुक्त राष्ट्र का ही अंग है।

यह तो हुई सामान्य जानकारी कि क्याें? कैसे? कब? हमें सर्वप्रथम यह जानना चाहिए कि विश्व विरासत दिवस क्यों मनाना चाहिए? जब यह तय हुआ कि विश्व विरासत दिवस मनाया जाएगा तो उसका उद्देश्य था कि विश्व विरासत स्थल के संरक्षण और समृद्धि के लिए इस दिवस को मनाया जाएगा। लेकिन हम यह भूल गए कि जो स्मारक विश्व विरासत स्थल की सूची में शामिल नहीं है क्या उनका संरक्षण, रखरखाव और समृद्ध करना हमारा कर्तव्य नहीं बनता। आखिरकार यही स्मारक आगे जाकर विश्व विरासत स्थल बनेंगे।

यूनेस्को विश्व विरासत स्थल को तीन भागों में बांटा है पहला सांस्कृतिक, दूसरा प्राकृतिक और तीसरा मिश्रित। तीनों का अपना-अपना महत्व है। लेकिन जैसा कि मैं मानता हूं कि हमें सभी को उतना ही महत्व देना चाहिए जितना कि हम ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को देते है। यदि प्रकृति को बचा लेते है तो बाकी की धरोहरों का अपने आप ही संरक्षण हो जाएगा। बायो डायवर्सिटी रिजर्व हो या नेशनल पार्क या अभ्यारण्य हो या सामान्य वन क्षेत्र इनके अलावा भी भूमि, जल, पर्वत आदि का संरक्षण शामिल है।

अब बात आती है कि विश्व विरासत स्थल क्यों? विश्व धरोहर स्थल की वास्तविकता में जरुरत है क्योंकि इनके होने से इन स्मारकों के संरक्षण की गारंटी बढ़ जाती है। केवल संरक्षण ही नहीं यह स्मारक कमाऊ भी बन जाते है। जितनी विश्व विरासत स्थल है आज कमाऊ होने से उनके रखरखाव में आसानी हुई है। इससे देश, व्यक्ति और स्मारक सभी को लाभ मिलता है।

भारत में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, पुरातात्विक महत्व की स्मारकों की संख्या में कमी नहीं है। यहां के हर शहर में इसकी झलक आसानी से देखने को मिल जाती है। पक्षपात पूर्ण रवैए के चलते भारत को प्रतिनिधित्व का मौका कम मिल पाया है। भारत से ज्यादा स्मारकों को  विश्व विरासत का नाम इटली, फ्रांस, चीन, स्पेन की स्मारकों को मिला है। यह कहां तक न्यायसंगत है। भारत का केवल एकमात्र शहर विश्व विरासत शहर है अहमदाबाद। इसे भी 2017 में स्वीकारा गया था।

हमें तो केवल इतना ध्यान रखना है कि अपने इतिहास को संजोकर रखना है।

📃BY_vinaykushwaha