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शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

चलते-चलते (सीरीज 14)

ये लॉकडाउन भी बड़ी अजीब चीज है। इस लॉकडाउन ने या यूं कहें कि कोरोना वायरस ने सारी दुनिया को ही लॉक कर दिया। सड़कें, पार्क, मार्केट को खाली करा दिया। उड़ते हुए मशीनी पक्षी को जमीन पर लैंड करा दिया, ट्रेनों की रफ्तार को विराम दे दिया और बसों के पहिए थाम दिए। लॉकडाउन बड़ी चीज है। मैं  भी इस लॉकडाउन का हिस्सा बन गया हूं। इक्कीस दिन के इस लॉकडाउन ने जीवन जीने का और देखने का नजरिया ही बदल दिया। मैं इस तरह भी कह सकता हूं कि बहुत कुछ बदल गया है।
लोग घरों में कैद हो चुके हैं। कैद भी इस तरह की घरों से बाहर निकलना भी डरावना लगता है। सोशल डिस्टेंसिंग ने तो लोगों के बीच और दूरियाँ बढ़ा दी हैं। पहले जहां छोटी दूरियां थीं और बड़ी-बड़ी हो गई हैं। इस लॉकडाउन में जीवन बड़ा-सा लगने लगा है। दोपहर के दिन वीरान और रात बहुत काली लगने लगी है। दिन की दुपहरिया में तपता गांव आज का शहर बन चुका है। सूरज की रोशनी से तपती सड़कें और उस पर चलते इक्का-दुक्का लोग जीवन तलाशते हुए आगे बढ़ते हैं।

इस लॉकडाउन ने कुछ अच्छी चीज भी दी है जिसमें ये नीला आकाश भी शामिल है। आमतौर पर ये नीला आकाश कहां देखने को मिलता है। आकाश को काले धुएं से भरने वाली ये चिमनियों ने भी जहर उगलना अब बंद कर दिया है। अब आसमान में सफेद बादल और उनके बीच उड़ते पक्षी बचपन वाले दौर की याद दिलाते हैं। अब तो पक्षियों की आवाज भी सुनाई देती है क्योंकि गाड़ियों का शोर कम हो गया है। उजाला सब कुछ बयां करता है, सबकुछ। दिन में आज भी शोर होता है लेकिन ये प्रकृति का शोर है। अब तो केवल दिन में पुलिस और एंबुलेंस की चहलकदमी नजर आती है।

रात भले ही भयानक सी लगने लगी हो लेकिन इस रात में अब वो दम वापस आ गया जो शायद छिन गया था। अनंत तक फैला ये आकाश कहता है कि विशालता मेरा ही दूसरा पर्याय है। तारों को अपनी गोद में खिलाता ये आकाश अब ज्यादा सुनहरा लगता  है जो पहले कहीं गुम हो गया था। बचपन वाले तारे, ढेर सारे तारे और चांद की चमक भी कुछ ज्यादा ही है। अब तो मैं नोएडा के आकाश में सप्तर्षि, कालपुरुष, शर्मिष्ठा, ध्रुव तारे को आसानी से देख पा रहा हूं। शुक्र का चमकीला अंदाज भी मैं देख पा रहा हूं। सुबह का उगता सूरज और डूबता सूरज नारंगी की तरह साफ-साफ दिखाई देता है।

इस लॉकडाउन में प्रकृति ने अपना अलग ही रंग बिखेर दिया है। ऐसा लगता है मानो प्रकृति इंसानी चलुंग से आजाद है और आजाद होकर स्वच्छंद होकर श्वास ले रही है। फूलों को अब कोई छेड़ता नहीं, पत्तियों को अब कोई तोड़ता नहीं, टहनियों को कोई अब खींचता नहीं और पेड़ों को अब झकझोरता नहीं। अब धीरे-धीरे लगने लगा है कि प्रकृति का अलग ही जलवा है। घास फिर अपने मनमाफिक बढ़ने लगी है क्योंकि अब उसे विरोध नहीं झेलना पड़ता। अब सूरज की किरणें भी प्रदूषण की चादर से छनकर नहीं आती, सीधे 15 करोड़ किमी की दूरी तय करके नन्हीं पत्तियों तक पहुंचती है।

पक्षियों ने फिर चहकना शुरू कर दिया है। नीले आकाश में ऊंची उड़ान भरना शुरू कर दिया है। अब केवल कबूतर ही नहीं आकाश में चील, कौआ, कोयल, गौरैया जैसे पक्षी दिखाई देते हैं लेकिन पहले की तरह अब भी रात में चमगादड़ दिखाई देते हैं। नीलगाय को मॉल के पास घूमते देखना हो या बारहसिंगा का हरिद्वार की बस्ती में घूमना एक अलग ही अनुभव है। अब सोसायटी के कुत्ते भी भौंक कर पूछते हैं तुम कौन हो बे?

इस लॉकडाउन ने कई लोगों को मुसीबत में डाला है तो कुछ अच्छा काम भी किया है। प्रदूषण का स्तर उस दर्जे का कम हुआ है जो लोग सपने में सोचते थे कि ऐसा यहां कभी हो सकता है। हां, अब मेरी छत से सुपरनोवा टॉवर, सेक्टर 18 और 16 की बिल्डिंग आसानी से दिख जाती है।

ये आसान नहीं है फिर आसान है। 

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2020

चलते-चलते (श्रृंखला 13)

ट्रेन का सफर सबक और लोगों को समझने का मौका होता है। ट्रेनों में लोग पैसेंजर बनकर सफर ही नहीं करते है बल्कि गांव-घर से लेकर देश की राजनीति की बात भी करते हैं। कभी-कभी तो ये बातचीत इतनी भयानक मोड़ ले लेती है कि नौबत बहस से आगे पहुंच जाती है। खासकर वो बातें और रोमांचक होती हैं। दिसंबर की बात थी मैं दिल्ली से कटनी जा रहा था। कई लोग अपने बच्चों की मानसिक क्षमता का प्रदर्शन कर रहे थे। ये समझ लीजिए कि दो गुट बन गए थे एक सवाल पूछता और दूसरा जवाब देता। सवाल और जवाब की प्रतियोगिता में कई सवाल और जवाब बड़े रोमांचित कर देने वाले थे। 

एक गुट ने दूसरे से पूछा कि देश का राष्ट्रपति कौन? सामने से जवाब आया नरेंद्र मोदी। फिर सामने वाले गुट ने सही जवाब बताते हुए कहा रामनाथ कोविंद। फिर सवाल आया देश का प्रधानमंत्री कौन? जवाब आया अमित शाह। सही जवाब देते हुए दूसरे गुट ने कहा अमित शाह नहीं नरेंद्र मोदी। मैंने अपना माथा पीट लिया। जिन लोगों को देश का प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति का नाम मालूम ना हो वे क्या करेंगे? 

मुझे इन सबके बीच वो वीडियो याद आ गया जिसमें दो बच्चियां नरेंद्र मोदी और अमित शाह को अपशब्द कहते हुए दिखाई देती हैं। वो कहती हैं कि दोनों मुसलमानों को भारत में नहीं रहने देना चाहता। फिर इन्हीं दो बच्चियों से आजादी वाले नारे लगवाए जाते हैं। क्या इन्हें पता है कि वे क्या कर रहीं हैं? अपशब्दों से किसका भला हुआ है? आजादी वाले नारे लगाने से क्या होगा? क्या वे जानती हैं कि वे जाने-अनजाने जहर बोने वालों को और सबल दे रही हैं। बच्चियों के मन में इतना जहर किसने घोला? जहर घोलने वाले लोग हमारे बीच में से ही कोई है जो आने वाली पीढ़ी को सच से वाकिफ नहीं करवाना चाहती। 

सड़कों पर उतरे ये लोग बच्चों की आड़ में गलत बात कहकर बचना चाहते हैं। भ्रम फैलाकर लोगों को गुमराह करना चाहते है। सोशल मीडिया से लेकर वास्तविक दुनिया तक वाहवाही लूटना चाहते हैं। बच्चे तो गीली मिट्टी होती है जिसे जो आकार दिया जाए वो पा लेता है। यदि हम बच्चों को सच नहीं बताएंगे और झूठ के सहारे उन्हें बड़ा करेंगे तो उनका जीवन देश के लिए नासूर बन जाएगा। 

रविवार, 26 जनवरी 2020

संविधान का जबलपुर कनेक्शन...


                   (संविधान की प्रस्तावना) 

आजकल देश में संविधान की प्रस्तावना की चर्चा हो रही है। जहां देखों वहां संविधान और प्रस्तावना की बात कहकर नीति और न्याय की चर्चा की जा रही है। केरल में पहली बार दस हजार मस्जिदों में तिरंगा फहराया गया। तिरंगा फहराने के अलावा यहां लोगों ने संविधान की प्रस्तावना को संकल्प की तरह पढ़ा। संविधान की प्रस्तावना को संविधान का निचोड़ भी कहा जाता है। कहा जाता है कि संविधान में कही गईं बातें प्रस्तावना से गुजरकर जाती हैं। 

भारतीय संविधान दुनिया का सबसे बड़ा संविधान है जिसमें दुनिया के कई देशों के संविधान से अच्छी बातों को लिया गया है। संविधान 26 नंवबर 1949 को बनकर तैयार हुआ था और इसे पहली बार 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया था। इसे 26 जनवरी को लागू करने के पीछे कारण ये था कि 26 जनवरी 1930 को कांग्रेस अधिवेशन में रावी नदी के किनारे संविधान लागू करने की बात की गई थी।

संविधान का कनेक्शन मध्यप्रदेश से रहा है। बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर जिन्हें संविधान का निर्माता कहा जाता है वे एमपी के महू में जन्में थे। इस शहर को अब अंबेडकरनगर के नाम से भी जाना जाता है। इसके अलावा एमपी का संविधान से एक और कनेक्शन है, संविधान में की गई चित्रकारी से। संविधान की प्रस्तावना समेत 22 भागों में चित्रकारी की गई है। संविधान के निर्माण के बाद भारत सरकार ने देश के प्रसिद्ध चित्रकार नंदलाल बोस को चित्रकारी करने के लिए आग्रह किया। 

नंदलाल बोस ने सरकार का आग्रह स्वीकार कर लिया और अपने 22 छात्रों को इस काम को सौंप दिया। इन छात्रों में सबसे प्रिय छात्र थे राम मनोहर सिंहा। नंदलाल बोस ने राम मनोहर को देश भ्रमण के लिए भेजा और कहा कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता को परखो और जानो। संविधान में की गई चित्रकारी में संपूर्ण भारत की झलक साफ-साफ देखी जा सकती है। संविधान की प्रस्तावना के चारों ओर जो चित्रकारी की गई उसका श्रेय राम मनोहर सिंहा को जाता है। इनका पूरा नाम व्यौहार राममनोहर सिंहा था। इनके पिता व्यौहार राजेंद्र सिंहा प्रसिद्ध रचनाकार रहे हैं। सिंहा का संबंध एमपी के जबलपुर से रहा है। शांति निकेतन में वे नंदलाल बोस के करीबी रहे हैं। 



                  (व्यौहार राममनोहर सिंहा) 

प्रस्तावना के चारों ओर की गई चित्रकारी कोई आम चित्रकारी नहीं है। एक नजर में ये चित्रकारी सामान्य सी नजर आती है लेकिन ऐसा है नहीं। इसमें भारतीयता के प्रतीक छिपे हुए हैं। प्रस्तावना में की गई चित्रकारी में कुल सात प्रतीकों का इस्तेमाल किया है। इन प्रतीकों में वृषभ (बैल), गज(हाथी), मयूर(मोर), अश्व(घोड़ा), पद्म(कमल), हंस और व्याघ्र (बाघ) हैं। ये केवल प्रतीक ही नहीं भारतीय संविधान की विशेषता बतलाते हैं। 

पृष्ठ के ऊपरी बाएं कोने में वृषभ है। वृषभ यानी धैर्यवान और साधुवत, ऊपरी दाएं कोने पर गज है जो की संविधान को उच्च बौद्धिक स्तर का बताता है। नीचे के हिस्से के दाएं कोने में बाघ का होना प्रतीक है कि हमारा संविधान निर्भीक और संप्रभुता संपन्न होगा। बायें कोने पर अश्व होना दर्शाता है कि संविधान गति और शक्ति से परिपूर्ण है। मोर सुचिता का प्रतीक है। हंस नैतिकता का प्रतीक है। पद्म प्रतीक है नव सृजन का। इस प्रकार से व्यौहार राम मनोहर सिंहा ने सिर्फ अलंकरण का कार्य नहीं किया बल्कि लोगों के बीच भारत की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक धरोहरों को खूबसूरती से प्रस्तुत किया।

व्यौहार राममनोहर सिंहा अपने सौम्य व्यवहार के लिए जाने जाते थे। जिन लोगों ने संविधान निर्माण योगदान उनके हस्ताक्षर संविधान में मौजूद है। जब व्यौहार राममनोहर सिंहा से हस्ताक्षर करने के लिए कहा गया तो उन्होंने सरकार साफ-साफ इनकार कर दिया। जब नंदलाल बोस ने सिंहा पर जोर दिया तो उन्होंने छोटे से हस्ताक्षर करते हुए राम लिख दिया। ऐसे थे व्यौहार राममनोहर सिंहा और ये था संविधान से एमपी का कनेक्शन। 

📃BY_vinaykushwaha

मंगलवार, 12 नवंबर 2019

चलते-चलते(श्रृंखला 12)

ये दूसरा साल है जब मैं दीपावली पर घर नहीं गया। मम्मी और पापा को आस थी कि मैं इस बार उनका बेटा जरूर आएगा। मैंने उनकी आस को तोड़ते हुए कहा कि मैं अब देवउठनी एकादशी पर आऊंगा। हमारे यहां देवउठनी एकादशी को ग्यारस भी कहा जाता है। कई लोग इसे छोटी दीवाली या देव दीपावली भी कहते हैं। दीवाली से ग्यारहवें दिन देवउठनी एकादशी होती है। यह त्यौहार हमारे घर पर बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इसी पर्व के साथ दीपावली के त्यौहार का समापन हो जाता है। 

इस साल एकादशी 8 नवंबर को थी। मैंने बॉस को पहले ही इत्तिला कर दिया था कि मुझे 8 नवंबर से 18 नवंबर तक छुट्टी चाहिए। मुझे जाने की इजाजत भी मिल गई थी। मैंने जाने और आने का थर्ड एसी का टिकट करा लिया था। जबसे नौकरी लगी है तबसे थर्ड एसी से नीचे टिकट नहीं ली भले सफर तीन घंटे का ही क्यों ना हो। यहां तो 16 घंटों की बात थी। घर जाने की उत्सुकता मन में संजोए मैं रोज कुछ नया सोचता रहा था। कभी सोचता घर जाकर ये करूंगा या घर जाकर वो करूंगा। मम्मी-पापा ने भी कई तरीके से सोचकर रखा था कि बेटा घर आ रहा है तो अच्छा है। 

इन सबके बीच मेरी मम्मी को सबसे ज्यादा उत्सुकता मेरे घर आने की थी और क्यों ना होती? मैं सात महीने बाद घर जा रहा था। मैं पिछली बार घर होली पर गया था। उसके बाद अब जाने का समय मिला था। जीवन में कई बार कुछ अनोखे काम होते हैं। मैं उन बच्चों में से था जो मां-बाप से कभी अलग नहीं रहा लेकिन आज मुझे घर से बाहर रहते हुए 6 साल हो गए हैं। इन 6 सालों में मुझे अलग-अलग अनुभव मिले। जीवन कैसे जिया जाता इन्ही 6 सालों में पता चला। जीवन में किरदार किस तरह के होते हैं इन्ही 6 सालों में पता चला। दोस्त क्या होते हैं? नशा क्या होता है? गाली क्या होती है? सबकुछ इन्हीं 6 सालों में पता चला। जिंदगी में एक बार ज्ञान जरूर मिलता है मुझे इन 6 सालों के हर एक दिन ज्ञान मिला। 

एक कहावत है कि "समय बड़ा बलवान" । मेरे साथ भी समय ने बड़ा खेल खेला। कई सम्मिलित कारणों की वजह से मेरी छुट्टी रद्द हो गई। ये पहली बार था कि जब मेरी छुट्टियों पर ग्रहण लगा। मैं पहली बार बहुत मायूस रहा ना तो मैंने उस दिन नाश्ता किया ना ही उस दिन में खाना खाया। मुझे अभी भी आशा किरण घोर अंधेरे में जलती हुई लौ की तरह दिखाई दे रही थी। कुछ हो ना सका। अब लग रहा था कि धरती फट जाए तो मैं उसमें समा जाऊं। मुझे सबसे ज्यादा चिंता मम्मी-पापा की थी कि मैं उन्हें किस तरह बताऊंगा कि मैं नहीं आ रहा। लेकिन जैसे-तैसे उनको समझाया और बताया कि मैं क्यों नहीं आ रहा। 

मैं छुट्टी लेने के बारे में ज्यादा नहीं सोचता लेकिन ये पहली बार था जब मुझे घर के लिए आस थी। मैंने बॉस को कई तरीके से मनाने की कोशिश की। इतना दुख तो मुझे टिकट कैंसिल करते समय एक हजार रुपये की बलि चढ़ाते वक्त भी नहीं हुआ। मैं जब इंदौर में रहा या भोपाल में रहा तब कई बार 15 दिनों से ज्यादा घर पर छुट्टियां मना चुका हूं। लेकिन अब ऑफिस में ऐसे स्वर्णिम पल कहां हैं? अब तो बमुश्किल 10 दिनों की छुट्टियां मिल जाएं तो बड़ी बात है। इस पोस्ट का मतलब यही है कि "समय बड़ा बलवान"। 

📃BY_vinaykushwaha


शुक्रवार, 1 नवंबर 2019

एमपी अजब है, एमपी गजब है

एमपी हिन्दुस्तान का दिल। आज एमपी 63 साल का हो गया मतलब 1 नंवबर 1956 को एमपी बॉम्बे स्टेट से अलग हुआ था। साल 1956 के पहले तक एमपी को सेंट्रल प्रोविंस एंड बरार के नाम से जाना जाता था। एमपी और छत्तीसगढ़ पहले एक ही थे फिर 1 नंबवर 2000 को छत्तीसगढ़ एक अलग राज्य बन गया। आज छत्तीसगढ़ पूरे 19 साल का हो गया। दोनों को मेरी तरफ से हैप्पी बर्थडे। मैं मध्यप्रदेश का मूल निवासी तो बात करूंगा केवल एमपी की। मैं हूं घुमक्कड़ इंसान तो एमपी की सैर कराता हूं। 
एमपी टूरिज्म के लिए भारत की सबसे मुफीद जगहों में से एक है। नेटिव प्लेनेट डॉट कॉम ने 2020 में एमपी को घूमने के लिए विशलिस्ट में बताया है। साइट का कहना है कि एमपी वाइल्डलाइफ के मामले में बेहद समृद्ध है इसमें विशेषतौर से बंगाल टाइगर हैं। भारत सरकार का हालिया सर्वे भी यही कहता है कि एमपी में सबसे ज्यादा टाइगर हैं। एमपी में दस नेशनल पार्क और 28 वाइल्डलाइफ सेंचुरी हैं। पन्ना नेशनल पार्क(पन्ना), बांधवगढ़ नेशनल पार्क(उमरिया), सतपुड़ा नेशनल पार्क(होशंगाबाद), कान्हा नेशनल पार्क (मंडला) , पेंच नेशनल पार्क(सिवनी), रातापानी अभ्यारण्य(रायसेन) में टाइगर रिजर्व भी है। साइट का कहना है कि जो लोग वाइल्डलाइफ का मजा लेने अफ्रीका जाते हैं उन्हें यहां सस्ते में वाइल्डलाइफ का मजा लेना चाहिए। 

सबसे ज्यादा वन क्षेत्र वाला प्रदेश कई सारे जीव-जंतुओं का घर है, इनमें तेंदुआ, भालू, जंगली सुअर, हिरण, बारहसिंगा वो भी ब्रेडरी प्रकार का, लकड़बग्गा, नीलगाय और भी बहुत से जानवर। केन अभ्यारण(छतरपुर) और चंबल अभ्यारण (भिंड) मगरमच्छ और घड़ियाल के लिए हैं। पन्ना नेशनल पार्क में सर्प उद्यान(Snake Park) है वहीं ओरछा में गिद्धों के लिए संरक्षित स्थान है। एमपी बड़े कमाल की जगह है। क्षेत्रीय विषमता के होते हुए भी भारत में प्राकृतिक विविधताओं को समेटे हुए। 
भारत सरकार के द्वारा दिए जाने वाले टूरिज्म एक्सीलेंस अवॉर्ड में एमपी ने चार अवॉर्ड जीते। अवॉर्ड तो केवल दिखाने के लिए होता है लेकिन एमपी के पास सचमुच दिखाने के लिए बहुत कुछ है। प्राकृतिक जगहों(Natural Places) से लेकर ऐतिहासिक जगहों(Historical Places) तक सबकुछ बेमिसाल है। एमपी के पास तीन-तीन विश्व धरोहर स्थल(world Heritage site) हैं जिनमें खजुराहो के मंदिर(छतरपुर), सांची के स्तूप(रायसेन) और भीमबेटका की गुफाएं(रायसेन) शामिल हैं। तीनों अपने-अपने समय की कहानी बयान करती हैं। हजारों साल से ये कहानी बयान कर रहे हैं कि एमपी कभी आधुनिकता की रेस में कभी पीछे नहीं रहा। भीमबेटका की गुफाएं दस हजार साल से भी ज्यादा पुरानी हैं। यहां आदिमानव(Primitive Man) द्वारा उकेरी गईं कलाकृतियां आज भी दिखाई पड़ती हैं जिनमें यूएफओ(UFO) तक का जिक्र मिलता है। सांची का स्तूप तो कलाकृति में एक कदम आगे है। बौद्ध धर्म में आस्था रखने वाले और अहिंसा को परम धर्म मानने वाले यहां आकर शांति और ध्यान करते हैं। हजारों साल पुराने खजुराहो के मंदिर की कला का कहना ही क्या। यहां आने वाला हर शख्स कहता है कि एमपी अजब है सबसे गजब है। कंदरिया महादेव मंदिर कलाकृति का बेमिसाल नमूना है। आज तक इतनी बेमिसाल कृति विश्व में नहीं है। 
भारत के सबसे शांत प्रदेशों में से एक मध्यप्रदेश हमेशा शांति और अहिंसा का संदेश देता रहा है। भारत की ऐसा कोई धार्मिक स्थल नहीं है जहां देवी अहिल्याबाई ने निर्माण कार्य ना कराया हो। काशी विश्वनाथ मंदिर से लेकर पुष्कर के घाट तक, कुरूक्षेत्र से लेकर भीमाशंकर तक देवी अहिल्याबाई की देन है। एमपी के पूर्व से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण तक पवित्र स्थलों से भरा पड़ा है। चित्रकूट, जहां भगवान राम ने अपने वनवास के बारह वर्ष गुजारे। मैहर जहां माता सती का हार गिरा आज शारदा माता मंदिर के नाम से जाना जाता है। दुनिया का सबसे बड़ा शिवलिंग भोजपुर में स्थित है। उज्जैन के महाकालेश्वर को कौन भूल सकता है। उज्जैन तो मंदिरों का शहर कहा जाता है। मांधाता स्थित ओमकारेश्वर दो शिवलिंगों से पूर्ण होते हैं। सोनगिर के जैन मंदिर, बावनगजा की मूर्ति, मुक्तागिरी हो या पुष्पागिरी सभी से अहिंसा का भावना सामने आती है। 
ऐतिहासिक स्थानों(Historical Places) के मामले में भारत के समृद्ध राज्यों में से एक है। सम्राट अशोक के शिलालेखों से लेकर आधुनिक भारत की स्थापत्य कला तक सब कुछ है मध्य प्रदेश में। उत्तर में मितावली के चौंसठ योगिनी के मंदिर से लेकर दक्षिण में बुरहानपुर की ऐतिहासिक विरासत तक, पूर्व में रीवा की रियासत से लेकर पश्चिम में महेश्वर के घाट तक सबकुछ अनोखा और नया अनुभव है। बटेश्वर के 11वीं शताब्दी के मंदिर हो या नरसिंहगढ़ का बेमिसाल किला। बुरहानपुर को तो दक्षिण का द्वार कहा जाता है। एक समय मुगलों के लिए ये जगह पड़ाव थी। यदि ताजमहल आगरा में ना होता तो बुरहानपुर में ही होता। मांडू को कैसे भूला जा सकता है? इसका दूसरा नाम सिटी ऑफ जॉय है। एक समय था जब इसे मुगलों की आरामगाह कहा जाता था। धार का मशहूर किला हो या रायसेन का दुर्ग अपनी विशालता का संदेश देते हैं। चंदेरी अपने नायाब कलाकृतियों के जाना जाता है। दतिया,लघु वृंदावन कहलाता है यहीं एक ऐसी इमारत जो भारत की पहली सात मंजिला इमारत है। 

ओरछा अपने प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ भगवान राम को राजा के रूप पूजे जाने वाला एकमात्र जगह है। यहीं वीर सिंह बुंदेला पैलेस, जहांगीर महल जैसी अद्वितीय इमारतें हैं। उदयपुर का मंदिर हो या सागर का एरण लेख सभी को इतिहास की अनुपम झलक दिखाता है। महेश्वर का किला, घाट, मंदिरों तो अद्भुत, अकल्पनीय, अविश्वसनीय हैं। अमरकंटक के कल्चुरीकालीन मंदिर हों या बुरहानपुर का अजेय असीरगढ़ दुर्ग इनका कहना ही क्या। 
भारत में सबसे ज्यादा नदियों का उद्गम(Origin) एमपी ही है। नर्मदा, चंबल, सोन, बेतवा, ताप्ती, केन, माही, पेंच, क्षिप्रा, तमस जैसी नदियों का उद्गम स्थल एमपी में ही है। इनके उद्गम स्थलों को देखना आनंद से भर जाना जैसा है। अमरकंटक तो तीन-तीन नदियों का उद्गम स्थल है जिनमें नर्मदा, सोन और जोहिला सोन शामिल हैं। वहीं चंबल नदी का उद्गम स्थल जानापाव तो बेहद सुंदर है। यही वह स्थान है जहां भगवान परशुराम का जन्म हुआ। नदियों के उद्गम के अलावा एमपी में झरने भी ढेर सारे हैं। रीवा को झरनों का शहर कहना सही होगा यहां पूर्वा,बहुटी,चचाई जैसी कई झरने या फॉल है। इनके अलावा राहतगढ़, तिंचा,पातालपानी, कपिलधारा,दूधधारा, बीफॉल, डचेस फॉल, सहस्त्र धारा नाम से कई जलप्रपात (Falls) हैं। एमपी का एकमात्र हिल स्टेशन पचमढ़ी घूमने के लिए बेहद शानदार जगह है। सतपुड़ा पर्वत की सबसे ऊंची चोटी धूपगढ़ यहीं स्थित है यहां से सनराइज़ और सनसेट का आनंद लेना रोमांचक है। 

एमपी के चार सबसे बड़े शहर इंदौर, भोपाल, जबलपुर और ग्वालियर अपनी चार कहानियां बयां करते हैं। एमपी का सबसे बड़ा शहर इंदौर मिनी मुंबई के नाम से जाना जाता है। एक समय ये होल्कर साम्राज्य की राजधानी हुआ करता था। यहां राजबाड़ा, कृष्णपुरा छतरी, मालवा पैलेस, गांधी भवन, शिव विलास पैलेस, बोलिया सरकार की छतरी, गोमटगिरी, बड़ा गणपति, महू का किला, जाम गेट, अंबेडकर जन्मस्थली देखने लायक हैं। भोपाल की बात करें तो राजा भोज की नगरी कहा जाता है क्योंकि दुनिया का सबसे बड़ा मैनमेड स्ट्रक्चर बड़ी झील के रूप में यही है। भोपाल को झीलों का शहर भी कहा जाता है। एशिया की सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक ताजुल मस्जिद और दुनिया की सबसे छोटी मस्जिद ढाई सीढ़ी मस्जिद दोनों भोपाल में हैं। इनके अलावा गौहर महल, गोलघर, ताजमहल, मोती मस्जिद, जामा मस्जिद, इंदिरा गांधी मानव संग्रहालय जैसी कई जगह हैं। और हां कभी भोपाल जाएं तो ट्राइबल म्यूजियम जाना ना भूलें। 
जबलपुर एमपी का तीसरा सबसे बड़ा शहर जिसे सिटी ऑफ मार्बल भी कहा जाता है। ये शहर अपने धुंआधार जलप्रपात के कारण जाना जाता है। ये शहर कल्चुरी राजाओं से लेकर आधुनिक भारत के राजनेताओं का पसंदीदा शहर रहा है। यहां पंचवटी, ग्वारीघाट, तिलवाराघाट, चौंसठ योगिनी मंदिर, त्रिपुरसुंदरी मंदिर, मदन महल, डुमना नेचर पार्क, रानी दुर्गावती की समाधि स्थल है। एमपी का चौथा सबसे बड़ा शहर ग्वालियर कई सारी ऐतिहासिक विरासत को समेटे हुए है। इसे सिटी ऑफ जिब्राल्टर भी कहा जाता है। ग्वालियर का किला भारत के सबसे लंबे दुर्गों में शुमार है। ग्वालियर किले की लंबाई 3 किमी है जो इसे अनोखा बनाती है। किले के अलावा यहां इटेलियन गार्डन, जयविलास पैलेस, महाराजबाड़ा, महारानी लक्ष्मीबाई की समाधि आदि है। 
अब एमपी आएंगे तो चटपटा, खट्टा-मीठा, जायकेदार खाने का स्वाद जरूर लेकर जाएंगे। रीवा के चंद्रहार से लेकर इंदौर के भुट्टे कीस तक, ग्वालियर की बेड़ई से लेकर बुरहानपुर की जलेबी तक सबकुछ एक नंबर है। इंदौर को चटोरों का शहर कहा जाता है। इसके अलावा इसे पोहे की राजधानी, नमकीन कैपिटल भी कहा जाता है। सुबह की शुरूआत पोहे से होती है और रात में सराफा में जाकर खत्म होती है। भोपाल का सींक कबाब हो या जबलपुर की मुंगोड़ी, ग्वालियर की चटपटी कचौड़ी हो या करेली का आलू बड़ा सबकुछ बेमिसाल है। दाल-बाटी चूरमा खाना बिल्कुल मत भूलना यदि भूल गए तो दाल-बाफले खा लेना। मुरैना की गजक कैसे भूल सकते हैं आप और फिर पेट पूजा हो जाए तो पुराने भोपाल का पान खाना मत भूलिएगा। 

अरे, जरा ठहरिए एक बात तो बताना ही भूल गया यदि आपको व्हाइट टाइगर देखना हो तो पूरी दुनिया में घूमने की जरूरत नहीं है। आप सीधे रीवा की मुकुंदपुर व्हाइट टाइगर सफारी आ जाइए। 

एक बात तो पक्की है एमपी अजब है, एमपी गजब है। 
एमपी हिन्दुस्तान का दिल। आज एमपी 63 साल का हो गया मतलब 1 नंवबर 1956 को एमपी बॉम्बे स्टेट से अलग हुआ था। साल 1956 के पहले तक एमपी को सेंट्रल प्रोविंस एंड बरार के नाम से जाना जाता था। एमपी और छत्तीसगढ़ पहले एक ही थे फिर 1 नंबवर 2000 को छत्तीसगढ़ एक अलग राज्य बन गया। आज छत्तीसगढ़ पूरे 19 साल का हो गया। दोनों को मेरी तरफ से हैप्पी बर्थडे। मैं मध्यप्रदेश का मूल निवासी तो बात करूंगा केवल एमपी की। मैं हूं घुमक्कड़ इंसान तो एमपी की सैर कराता हूं। 

एमपी टूरिज्म के लिए भारत की सबसे मुफीद जगहों में से एक है। नेटिव प्लेनेट डॉट कॉम ने 2020 में एमपी को घूमने के लिए विशलिस्ट बताया है। साइट का कहना है कि एमपी वाइल्ड के मामले में बेहद समृद्ध है इसमें विशेषतौर से बंगाल टाइगर हैं। भारत सरकार का हालिया सर्वे भी यही कहता है कि एमपी में सबसे ज्यादा टाइगर हैं। एमपी में दस नेशनल पार्क और 28 वाइल्डलाइफ सेंचुरी हैं। पन्ना नेशनल पार्क(पन्ना), बांधवगढ़ नेशनल पार्क(उमरिया), सतपुड़ा नेशनल पार्क(होशंगाबाद), कान्हा नेशनल पार्क (मंडला) , पेंच नेशनल पार्क(सिवनी), रातापानी अभ्यारण्य(रायसेन) में टाइगर रिजर्व भी है। साइट का कहना है कि जो लोग वाइल्डलाइफ का मजा लेने अफ्रीका जाते उन्हें सस्ते में यहां सस्ते में वाइल्डलाइफ का मजा लेना चाहिए। 

सबसे ज्यादा वन क्षेत्र वाला प्रदेश कई सारे जीव-जंतुओं का घर है, इनमें जंगली सुअर, हिरण, बारहसिंगा वो भी ब्रेडरी प्रकार का, लकड़बग्गा, नीलगाय और भी बहुत से जानवर। केन अभ्यारण(छतरपुर) और चंबल अभ्यारण (भिंड) मगरमच्छ और घड़ियाल के लिए हैं। पन्ना नेशनल पार्क में सर्प उद्यान(Snake Park) है वहीं ओरछा में गिद्धों के लिए संरक्षित स्थान है। एमपी बड़े कमाल की जगह है। क्षेत्रीय विषमता के होते हुए भी भारत में प्राकृतिक विविधताओं को समेटे हुए। 

भारत सरकार के द्वारा दिए जाने वाले टूरिज्म एक्सीलेंस अवॉर्ड में एमपी ने चार अवॉर्ड जीते। अवॉर्ड तो केवल दिखाने के लिए होता है लेकिन एमपी के पास सचमुच दिखाने के लिए बहुत कुछ है। प्राकृतिक जगहों(Natural Places) से लेकर ऐतिहासिक जगहों(Historical Places) तक सबकुछ बेमिसाल है। एमपी के पास तीन-तीन विश्व धरोहर स्थल(world Heritage site) हैं जिनमें खजुराहो के मंदिर(छतरपुर), सांची के स्तूप(रायसेन) और भीमबेटका की गुफाएं(रायसेन) शामिल हैं। तीनों अपने-अपने समय की कहानी बयान करती हैं। हजारों से ये कहानी बयान कर रहे हैं कि एमपी कभी आधुनिकता की रेस में कभी पीछे नहीं रहा। भीमबेटका की गुफाएं दस हजार साल से भी ज्यादा पुरानी हैं। यहां आदिमानव(Primitive Man) द्वारा उकेरी गईं कलाकृतियां आज भी दिखाई पड़ती हैं जिनमें यूएफओ(UFO) तक का जिक्र मिलता है। सांची का स्तूप तो कलाकृति एक कदम आगे है। बौद्ध धर्म में आस्था रखने वाले और अहिंसा को परम धर्म मानने वाले यहां आकर शांति और ध्यान करते हैं। हजारों साल पुराने खजुराहो के मंदिर की कला का कहना ही क्या। यहां आने वाला हर शख्स कहता है कि एमपी अजब है सबसे गजब है। कंदरिया महादेव मंदिर जो कलाकृति मिसाल है। आज तक इतनी बेमिसाल कृति विश्व में नहीं है। 

भारत के सबसे शांत प्रदेशों में से एक मध्यप्रदेश हमेशा शांति और अहिंसा का संदेश देता रहा है। भारत की ऐसा कोई धार्मिक स्थल नहीं है जहां देवी अहिल्याबाई ने निर्माण कार्य ना कराया हो। काशी विश्वनाथ मंदिर से लेकर पुष्कर के घाट तक, कुरूक्षेत्र से लेकर भीमाशंकर तक देवी अहिल्याबाई की देन है। एमपी के पूर्व से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण तक पवित्र स्थलों से भरा पड़ा है। चित्रकूट एमपी में ही जहां भगवान राम ने अपने वनवास के बारह वर्ष गुजारे। मैहर जहां माता सती का हार गिरा आज शारदा माता मंदिर के नाम से जाना जाता है। दुनिया का सबसे बड़ा शिवलिंग भोजपुर में स्थित है। उज्जैन के महाकालेश्वर को कौन भूल सकता है। उज्जैन तो मंदिरों का शहर कहा जाता है। मांधाता स्थित ओमकारेश्वर दो शिवलिंगों से पूर्ण होते हैं। सोनगिर के जैन मंदिर, बावनगजा की मूर्ति, मुक्तागिरी हो या पुष्पागिरी सभी से अहिंसा का भावना सामने आती है। 

ऐतिहासिक स्थानों(Historical Places) के मामले में भारत के समृद्ध राज्यों में से एक है। सम्राट अशोक के शिलालेखों से लेकर आधुनिक भारत की स्थापत्य कला तक सब कुछ है मध्य प्रदेश में। उत्तर में मितावली के चौंसठ योगिनी के मंदिर से दक्षिण में बुरहानपुर की ऐतिहासिक विरासत तक, पूर्व में रीवा की रियासत से लेकर पश्चिम में महेश्वर के घाट तक सबकुछ अनोखा और नया अनुभव है। बटेश्वर के 11वीं शताब्दी मंदिर हो या नरसिंहगढ़ का बेमिसाल किला। बुरहानपुर को तो दक्षिण का द्वार कहा जाता है। एक समय मुगलों के लिए ये जगह पड़ाव थी। यदि ताजमहल आगरा में ना होता तो बुरहानपुर में ही होता। मांडू को कैसे भूला जा सकता है? इसका दूसरा नाम सिटी ऑफ जॉय है। एक समय था जब इसे मुगलों की आरामगाह कहा जाता था। धार का मशहूर किला हो या रायसेन का दुर्ग अपनी विशालता का संदेश देते हैं। चंदेरी अपने नायाब कलाकृतियों के जाना जाता है। दतिया इसे लघु वृंदावन कहलाता है यहीं एक ऐसी इमारत जो भारत की पहली सात मंजिला इमारत है। 

ओरछा अपने प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ भगवान राम को राजा के रूप पूजे जाने वाला एकमात्र जगह है। यहीं वीर सिंह बुंदेला पैलेस, जहांगीर भवन जैसी अद्वितीय इमारतें हैं। उदयपुर का मंदिर हो या सागर का एरण लेख सभी को इतिहास की अनुपम झलक दिखाता है। महेश्वर का किला, घाट, मंदिरों तो अद्भुत, अकल्पनीय, अविश्वसनीय हैं। अमरकंटक के कल्चुरीकालीन मंदिर हों या बुरहानपुर का अजेय असीरगढ़ दुर्ग इनका कहना ही क्या। 

भारत की सबसे ज्यादा नदियों का उद्गम(Origin) एमपी ही है। नर्मदा, चंबल, सोन, बेतवा, केन, माही, पेंच, क्षिप्रा, तमस जैसी नदियों का उद्गम स्थल एमपी में ही है। इनके उद्गम स्थलों को देखना आनंद से भर जाना जैसा है। अमरकंटक तो तीन-तीन नदियों का उद्गम स्थल है जिनमें नर्मदा, सोन और जोहिला सोन शामिल हैं। वहीं तक चंबल नदी का उद्गम स्थल जानापाव तो बेहद सुंदर है। यही वह स्थान है जहां भगवान परशुराम ने तपस्या की थी। नदियों के उद्गम के अलावा एमपी में झरने भी ढेर सारे हैं। रीवा को झरनों का शहर कहना सही होगा यहां पूर्वा,बहुटी,चचाई जैसी कई झरने या फॉल है। इनके अलावा राहतगढ़, तिंचा,पातालपानी, कपिलधारा,दूधधारा, बीफॉल, डचेस फॉल, सहस्त्र धारा नाम से कई जलप्रपात (Falls) हैं। एमपी का एकमात्र हिल स्टेशन पचमढ़ी घूमने के लिए बेहद शानदार जगह है। सतपुड़ा पर्वत की सबसे ऊंची चोटी धूपगढ़ यहीं स्थित है यहां से सनराइज़ और सनसेट का आनंद लेना रोमांचक है। 

एमपी के चार सबसे बड़े शहर इंदौर, भोपाल, जबलपुर और ग्वालियर अपनी चार कहानियां बयां करते हैं। एमपी का सबसे बड़ा शहर इंदौर मिनी मुंबई के नाम से जाना जाता है। एक समय ये होल्कर साम्राज्य की राजधानी हुआ करता था। यहां राजबाड़ा, कृष्णपुरा छतरी, मालवा पैलेस, गांधी भवन, शिव विलास पैलेस, बोलिया सरकार की छतरी, गोमटगिरी, बड़ा गणपति, महू का किला, जाम गेट, अंबेडकर जन्मस्थली देखने लायक हैं। भोपाल की बात करें तो राजा भोज की नगरी कहा जाता है क्योंकि दुनिया सबसे बड़ा मैनमेड स्ट्रक्चर बड़ी झील के रूप में यही है। भोपाल को झीलों का शहर भी कहा जाता है। एशिया का सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक ताजुल मस्जिद और दुनिया की सबसे छोटी मस्जिद ढाई सीढ़ी मस्जिद दोनों भोपाल में हैं। इनके अलावा गौहर महल, गोलघर, ताजमहल, मोती मस्जिद, जामा मस्जिद, इंदिरा गांधी मानव संग्रहालय जैसी कई जगह हैं। और हां कभी भोपाल जाएं तो ट्राइबल म्यूजियम जाना ना भूलें। 

जबलपुर एमपी का तीसरा सबसे बड़ा शहर जिसे सिटी ऑफ मार्बल भी कहा जाता है। ये शहर अपने धुंआधार जलप्रपात के कारण जाना जाता है। ये शहर कल्चुरी राजाओं से लेकर आधुनिक भारत के राजनेताओं का पसंदीदा शहर रहा है। यहां पंचवटी, ग्वारीघाट, तिलवाराघाट, चौंसठ योगिनी मंदिर, त्रिपुरसुंदरी मंदिर, मदन महल, डुमना नेचर पार्क, रानी दुर्गावती की समाधि स्थल है। एमपी का चौथा सबसे बड़ा शहर ग्वालियर कई सारी ऐतिहासिक विरासत को समेटे हुए है। इसे सिटी ऑफ जिब्राल्टर भी कहा जाता है। ग्वालियर का किला भारत के सबसे लंबे दुर्गों में शुमार है। ग्वालियर किले की लंबाई 3 किमी है जो इसे अनोखा बनाती है। किले के अलावा यहां इटेलियन गार्डन, जयविलास पैलेस, महाराजबाड़ा, महारानी लक्ष्मीबाई की समाधि आदि है। 

अब एमपी आएंगे तो चटपटा, खट्टा-मीठा, जायकेदार खाने का स्वाद जरूर लेकर जाएंगे। रीवा के चंद्रहार से लेकर इंदौर भुट्टे की किस तक, ग्वालियर की बेड़ई से लेकर बुरहानपुर की जलेबी तक सबकुछ एक नंबर है। इंदौर को चटोरों का शहर कहा जाता है। इसके अलावा इसे पोहे की राजधानी, नमकीन कैपिटल भी कहा जाता है। सुबह की शुरूआत पोहे से होती है और रात में सराफा में जाकर खत्म होती है। भोपाल का सींक कबाब हो या जबलपुर की मुंगोड़ी, ग्वालियर की चटपटी कचौड़ी हो या करेली का आलू बड़ा सबकुछ बेमिसाल है। दाल-बाटी चूरमा खाना बिल्कुल मत भूलना यदि भूल गए तो दाल-बाफले खा लेना। मुरैना की गजक कैसे भूल सकते हैं आप और फिर पेट पूजा हो जाए तो पुराने भोपाल का पान खाना मत भूलिएगा। 

अरे, जरा ठहरिए एक बात तो बताना ही भूल गया यदि आपको व्हाइट टाइगर देखना हो तो पूरी दुनिया में घूमने की जरूरत नहीं है। आप सीधे रीवा की मुकुंदपुर व्हाइट टाइगर सफारी आ जाइए। 

एक बात तो पक्की है एमपी अजब है, एमपी गजब है। 

सोमवार, 15 जुलाई 2019

बारिश का जल 'वरदान'

तारीख 4 जुलाई 2019, जगह - गुरुग्राम, हरियाणा ; शहर को बारिश ने तरबतर कर दिया था। लगातार तीन घंटों की बारिश ने अव्यवस्था और बिना योजना के बनाए गए शहर की पोल खोल दी। गुरुग्राम से लेकर नोएडा तक पूरे एनसीआर का यही हाल है। बारिश के बाद रोड़ पर नाव चलाने जैसी हालत हो जाती है। भारत में औधोगिक दुनिया में धाक जमाने वाले ये शहर बारिश के आगे बेदम हो जाते है। बारिश में पानी-पानी होने वाले ये शहर छोटे-छोटे शहरों के लोगों को आकर्षित करते हैं क्योंकि ये रोजी-रोटी के लिए ये भारत के महत्वपूर्ण शहर हैं। लोगों की बढ़ती आबादी शहरों की कमर तोड़ रही है और जल व्यवस्था में कमी का कारण भी यही भीड़ है। लेकिन हम जल व्यवस्था में कमी को पूरी तरह से भीड़ और जनसंख्या वृद्धि से नहीं जोड़ सकते हैं। इस मामले में प्रशासन(Administration) को पाक-साफ नहीं कहा जा सकता। शासन और प्रशासन(government and administration) की असफल नीतियों का नतीजा ही है कि बारिश के समय शहरों में जलभराव  होता है।

आपने हर साल देखा होगा कि मुंबई में बारिश होती है और सड़कें तालाब बन जाती हैं। मानसून में करोड़ों लीटर पानी बह जाता है। घरों की छत से पानी छोटी नालियों और फिर नालों से होता हुआ सागर में समा जाता है। बारिश के इसी पानी को बचाने की जरूरत है। मैं इस लेख में दो मुद्दों पर बात करूंगा पहला स्वच्छ जल की आपूर्ति और जल भराव(water logging) का मुद्दा। बारिश के पानी से जलभराव के कई कारण हैं जिनमें नाले-नालियों की समय पर साफ-सफाई ना होना, रोड पर पानी निकासी की जगह ना होना, ड्रेनेज सिस्टम ना होना, रोड का डिजाइन सही ना होना, लोगों का जागरुक ना होना, सीवर सिस्टम का सही ना होना, अत्याधिक बारिश भी जलभराव का एक महत्वपूर्ण कारण है।

अत्याधिक बारिश से बाढ़ आती है ये तो सभी को मालूम है। सामान्य बारिश होने पर बारिश का पानी छतों से होता हुआ नालियों में बह जाता है और गंदा हो जाता है। बारिश के पानी को सहेजा जा सकता है। कई तरीकों से बारिश के पानी को सहेजकर हम सूखे की स्थिति को काफी हद तक कम कर सकते  हैं। ठंड का मौसम आने तक भारत के राजस्थान, मराठवाड़ा, विदर्भ, बुंदेलखंड, कच्छ में पानी के लिए मची चीख-पुकार सुनाई देने लगती है। गर्मियों के आने पर तस्वीर और भी ज्यादा भयावह हो जाती है। साल 2018 में शिमला के जलसंकट के बारे में सुनने को मिला जहां कुछ दिनों के लिए पानी बचा हुआ था। शिमला के आसपास के जलाशय सूख जाने से पानी की आपूर्ति(supply) में बहुत ज्यादा कमी आ गई। पर्यटकों को शिमला ना आने की हिदायत दी गई और निवासियों से कम से कम पानी के उपयोग के लिए प्रशासन ने गुजारिश की। साल 2019 में भी ऐसा ही एक और शहर हमारे सामने आया। उसका नाम था चेन्नई। चेन्नई शहर में लगभग 88 लाख लोग रहते हैं। पानी की कमी के कारण लोगों को भारी कष्ट उठाना पड़ा। लोगों को चेन्नई ना आने की हिदायत दी गई, रेस्टोरेंट में खाना परोसने के लिए पत्तल का उपयोग किया जाने लगा। चेन्नई में जलसंकट इतना बढ़ गया था कि एक ड्रम पानी की कीमत 2-3 हजार रुपये तक पहुंच गई थी। चेन्नई के लिए यह दुर्भाग्य की बात है कि पहली बार कोई रेलगाड़ी पानी लेकर चेन्नई पहुंची। लोगों ने तो चेन्नई को भारत का केप टाउन कहना शुरू कर दिया था।

केप टाउन दक्षिण अफ्रीका का शहर है। यह दक्षिण अफ्रीका की राजधानी भी है। इस शहर को 2018 में जीरो सिटी घोषित कर दिया गया था। जीरो सिटी से मतलब होता है कि जिस शहर में पानी बचा ही ना हो। केप टाउन में पीने के लिए भी पानी की किल्लत हो गई थी। दूसरे शहरों से पानी की कमी को पूरा किया गया। केप टाउन ने लीकेज की समस्या को दूर करके जलसंकट को 40 फीसदी तक कम कर दिया। यही बात भारतीय शहरों को  भी सीखना होगा। एक रिपोर्ट के अनुसार 2020 तक भारत के बीस शहरों का ग्राउंड वॉटर लेवल जीरो हो जाएगा। यदि यह सच हुआ तो हमारे लिए खतरे की घंटी है।

नरेंद्र मोदी ने दोबारा भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। मोदी सरकार 2 में एक नए मंत्रालय का गठन किया गया जिसका नाम  जल शक्ति मंत्रालय है। जल शक्ति मंत्रालय के गठन के पीछे मोदी सरकार की नीति जल संरक्षण और जलापूर्ति पर विशेष तौर पर है। संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी ने 2024 तक हर घर नल-हर घर जल की बात कही। इसके बाद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी बजट के दौरान 2024 तक हर घर नल-हर घर जल की बात को दोहराया। मुझे लगता है कि यह सब तो जरूरी है कि लोगों को साफ पानी मिले लेकिन कैसे? हमारी नदियां, तालाब, ग्राउंड वॉटर सूख रहा है तो जलापूर्ति कैसे होगी?

सरकार को सबसे पहला अपने जल स्त्रोतों को बचाना होगा।  नमामि गंगे जैसी योजना केवल गंगा तक सीमित नहीं रखना चाहिए बल्कि देश की अन्य नदियों के लिए भी इसी प्रकार की योजना लागू करना चाहिए। दक्षिण की दो सबसे बड़ी नदियां गोदावरी और कावेरी का गर्मियों में क्या हाल हुआ सब जानते हैं। तालाबों को पाटकर इमारतें बनाई जा रही हैं, कुओं को और ज्यादा गहरा करने की जगह उन्हें डस्टबिन बनाया जा रहा है। बावड़ियों को साफ ना करके उन्हें कचरे के ढेर में तब्दील किया जा रहा है। समय आ गया है कि हम आसपास के जल स्त्रोतों को बचाएं। कुओं की साफ-सफाई करवाकर गहरीकरण करवाया जाए, तालाबों का गहरीकरण किया जाए, बावड़ियों को  उनके पुराने स्वरूप में लाया जाए, नदियों को जोड़ने का काम जल्द से जल्द पूरा किया जाए, बड़े डैम की जगह छोटे डैम को तबज्जो दी जाए।

सबसे आखिर में बारिश के पानी का संग्रह किया जाए। रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को उपयोग में लाया जाए। नालियों में बारिश के पानी को बहने से रोका जाए। बारिश के पानी का ट्रीटमेंट करके पीने योग्य बनाया जाए। बारिश का पानी केवल बॉलीवुड के गानों की तरह भीगने पर मजा नहीं देता बल्कि इसके संग्रह से यह आपको कई महीनों तक के लिए जलापूर्ति करता है।